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कौन है तुम्हारा जीवन सारथी ?


(पूज्य बापू जी)

तीन मित्र थे। उन्होंने शर्त रखी कि देखें, अधिक समय बदबू कौन सहन कर सकता है ? वे एक बूढ़ा बकरा, जिसके शरीर पर गंदगी, मैल लगी थी, ले आये और कमरे में रख दिया। एक मित्र कमरे के अंदर गया और पाँच मिनट में वापस आ गया कि ‘अपने से यह बदबू सहन नहीं होती।’ फिर दूसरा गया… गया और वापस आया। फिर तीसरा गया। तीसरा गया तो उसकी बदबू से बकरा ही बाहर आ गया।

अब यह है दृष्टांत। ऐसे ही हमारा अहंकार, हमारी मैली वासना जब भीतर चली जाती है आँख के द्वारा, कान के द्वारा, किसी के द्वारा तो हमारा आनंद बाहर चला जाता है, सुख भाग जाता है। वासना में इतनी बदबू होती है कि हमारी जान निकाल देती है वह। जीवरूपी बकरे को इतना सताती है वासना कि वह भी बेचारा कह उठता है कि ‘मेरी तो जान निकल गयी है !’

आपे देखा होगा व्यवहार में, ऐसे-ऐसे काम करते हैं कि आपकी जान निकल जाती है। आप ऐसा महसूस करते हैं कि ‘मकान तो बना लेकिन हमारी तो जान निकल गयी। फलाना-फलाना काम करते हुए हमारी जान निकल गयी !’ अनुभव होता है ! तो वासना दिखती तो साफ सुथरी, हट्टी-कट्टी है लेकिन वह अपनी जान को, अपनी मस्ती को, सुख को बाहर निकाल देती है। चुपचाप बैठे हैं और ऐसे कोई घड़ियाँ हैं जिनमें कोई वासना नहीं तो वह एकाध घड़ी इतनी महत्त्वपूर्ण है, वह एकाथ क्षण इतना सुखद है कि उस सुखद क्षण का इन्द्र के वैभव के साथ मुकाबला करो तो इन्द्र का वैभव भी तुच्छ दिखता है, इतनी उस निर्वासनिक अवस्था में शांति, आनंद, माधुर्य की झलकियाँ होती है।

देवताओं के पास सुख-सुविधाएँ ज्यादा होती हैं, वे भोगी होते हैं इसलिए परमात्मा को नहीं पा सकते हैं। दैत्यों में तमोगुण होता है इसलिए वे विवेक की गद्दी पर नहीं बैठ सकते। एक मनुष्य-शरीर ऐसा है कि न अति तमो है न अति सत्त्व, न अति भोग हैं। मनुष्य है मध्य का। अब जिधर का वह संग करे, चाहे गुणातीत तत्त्व का संग करे…

एक बात और समझ लेना। जो आदमी जैसा संग करता है, वह वैसा हो जाता है। तुच्छ काम करने वाले व्यक्तियों का संग करो तो तुम्हारी प्रतिष्ठा भी तुच्छ होने लगती है। पवित्र आत्मा, परोपकारी आत्मा, संत, साधक जिनका हृदय ऊँचा है, चरित्र ऊँचा है, ऐसे व्यक्तियों का संग करते हैं तो आप ऊँचे होने लगते हैं। वासना अति तुच्छ है और इन्द्रियों रूपी नाली के द्वारा वह मजा चाहती है। अगर आदमी वासना का संग करता है तो तुच्छ हो जाता है और विवेक का संग करता है तो परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कारी ज्ञानीस्वरूप, ईश्वरस्वरूप हो जाता है। अगर हम विवेक का संग करते हैं तो हम ईश्वर के साथ हो जाते हैं और वासना का संग करते हैं तो नरक के साथ हो जाते हैं। हम मध्य में हैं। मनुष्य जन्म एक जंक्शन है, अब जिधर को जायें।

वासना और कमजोरी के विचार आदमी का जितना सत्यानाश करते हैं, उतना तो मौत भी नहीं करती। मौत तो एक बार मारती है लेकिन कमजोर विचार और वासनाएँ करोड़ों जन्मों तक मारती रहेंगी। वासना जीव को अंधा कर देती है। अपने तुच्छ स्वभाव, मलिन स्वभाव से जीव इतने आक्रान्त हो जाते हैं कि हृदय में बैठे हुए विश्वेश्वर का कोई पता ही नहीं ! तुम्हारे जीवनरथ का सारथी कौन है ? अपने-आपसे पूछना चाहिए।

शरीर रथ है, इन्द्रियाँ घोड़े हैं। अब सारथी कामना है, काम है कि राम है ? बुद्धि निर्णय करे, मन उसके विषय में विचार करे और इन्द्रियाँ तदनुकूल चलें तो समझो आप राम तक पहुँच जायेंगे। इन्द्रियों ने देखा, मन ने उसकी प्राप्ति के लिये सोचा और बुद्धि उसमें लग गयी तो समझो बरबादी हो गयी। कभी-कभी आपका विवेक इन्कार करता है लेकिन इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि उधर को खींचते हैं। बुद्धि कुछ कह रही है और हृदय कुछ और कह रहा है तो उस वक्त बुद्धि की बात को ठुकरा दो, क्योंकि वह भीतरवाला अंतर्यामी जो है न, तुम्हारा हृदय जो है न, वह ईश्वर के करीब होता है, विवेक के करीब होता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2011, पृष्ठ संख्या 6,7 अंक 218

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आठ गुणों का विकास, जीवन में लाये ज्ञान-प्रकाश


(पूज्य बापू जी की बोधमयी अमृतवाणी)

अगर आपको अपना व्यक्तित्व निखारना है, अपना प्रभाव विकसित करना है तो जीवन में आठ सदगुण ले आईये। ये आठ सदगुण और नौवीं आरोग्यप्रद ‘स्थलबस्ति’ आपके प्रभाव में चार चाँद लगायेंगे। कितना भी साधारण आदमी हो, तुच्छ हो तो भी वह बड़ा प्रभावशाली हो जायेगा।

कला प्रभावोत्पादक मानवीय व्यवहारः पशु जैसा व्यवहार नहीं, कूड़ कपट, बेईमानी नहीं, मानी जैसा व्यवहार नहीं, मनुष्य को शोभा दे ऐसा व्यवहार करें। कर्मों की गति गहन है, इसलिए ऐसे कर्म करो जिससे भगवान की प्रीति जगे। ऐसा चिंतन करो कि अपना आत्मा परमात्मा, जो अपने साथ, अपने पास है, उसको जानने की ललक जगे।

दूसरों के महत्त्व को भी स्वीकार करें। दूसरों के अंदर भी गुण है। अपने द्वारा उनका विकास हो तो अच्छा है, नहीं तो उनका अंदर से मंगल चाहें। डाँटें तो भी मंगल की भावना से।

आनंदित रहें, प्रसन्न रहें, मित्र भावना से सम्पन्न रहें। आनन्दित और प्रसन्न रहने के लिए बैठे-बैठे या लेटे-लेटे दोनों नथुनों से खूब श्वास लें, पेट भर लें, फिर ‘अशांति, खिन्नता और रोग के कण बाहर निकल रहे हैं।’ ऐसी भावना करते हुए मुँह से छोड़ें। इससे निरोगता भी बढ़ेगी और प्रसन्नता भी बढ़ेगी। रोज सुबह 10 से 12 बार ऐसा करें।

आत्मसंयमः जो नहीं खाना चाहिए, जो नहीं करना चाहिए, बस उससे अपने को बचायें तो जो करना चाहिए वह अपने-आप होने लगेगा।

अपना उद्देश्य निश्चित करें कि मुझे अपने आत्मा-परमात्मा को पाना हैः जिसको पाना सहज है, अभागा मन, अभागी बुद्धि तू उधर क्यों नहीं चलती ! जिसको पाये बिना दुर्भाग्य का अंत नहीं होता और जिसको पाने से कोई कमी नहीं रहती, तू उसको पा ले न !’ – ऐसा अपने मन को समझायें।

‘यह बना लिया, वह बना लिया….’ जैसे हाथी दलदल में एक बार चला गया तो ज्यों निकलने की कोशिश करता है, त्यों फँसता जाता है। वैसे ही ‘जरा यह कर लूँ… जरा वह कर लूँ…. जरा मिल्कियत इकट्ठी कर लूँ… जरा यह ठीक कर लूँ…..’ ऐसा करते-करते जीव संसार की दलदल में और फंसता जाता है।

अपने को बेठीक करके तेरा क्या ठीक हुआ ? मृत्यु का एक झटका आयेगा तो सब बेठीक हो जायेगा। मरने वाले अपने शरीर को कितना भी ठीक करोगे, मौत सब मिट्टी में मिला देगी। मौत सब मिट्टी में मिला के बेठीक करे इसके पहले जहाँ मौत की दाल नहीं गलती उस अपने अमर स्वभाव को नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा…. कर लो न, अमर स्वभाव की स्मृति, अनुभव कर लो, फिर शोक नहीं रहेगा, दुःख नहीं रहेगा, मोह नहीं रहेगा, भय नहीं रहेगा, चिंता नहीं रहेगी। आप आनंदित-आह्लादित, मधुमय होंगे, परम सुख में रहेंगे और अपनी दृष्टि और वचन से दूसरों का भी सच्चा सर्वांगीण विकास करने में सक्षम होते जायेंगे। ऐसा आत्मसुख, आत्मलाभ, आत्मज्ञान पा लो भैया ! ‘जो छोड़ के मरना है उसके पीछे कब तक मरता रहेगा और जो कभी नहीं मरता उसका अभाव कब तक मानेगा, उसका अनादर कब तक करेगा ?’ – अपनि मन को ऐसे समझायें तो पतनोन्मुखी विचार दूर हो जायेंगे। जहाँ आपको पहुँचना है उसी प्रकार के विचार करें।

दूसरों के लिए हित की भावना और अपने लिए मितव्ययः अपने लिए ज्यादा ऐश नहीं। अपने लिए ज्यादा खर्च न करें और लोगों के हित का व्यवहार करें। हित, मित और प्रिय वाणी आपके हृदय को उन्नत बना देगी।

संतुलित मनोरंजनः मनोरंजन हो, विनोद हो लेकिन वह भी संतुलित हो, नियंत्रित हो। मनोरंजन की सीमा हो।

आत्मसाक्षात्कार के लिए अमिट उत्साहः जब तक परमात्मा का साक्षात्कार नहीं हुआ, तब तक आत्मा परमात्मा को पाने का उत्साह बना रहे। ‘अभी क्यों नहीं हो रहा है ? कैसे पाऊँ प्रभु को ?’ इस तरह उत्साह से लगे रहें।

ये आठ सदगुण अपने हृदय में भर लें तो आपका प्रभाव खूब ही हो जायेगा। जिसके जीवन में ये सदगुण आ गये वह तो धन्य हो गया, उसका कुटुम्ब भी धन्य हो गया और उससे मिलने वाले भी धनभागी हो जाते हैं। राजे महाराजे आपके आगे मत्था टेककर अपना भाग्य बना लेंगे, ऐसी शक्ति आपके अंदर पड़ी है। आप चले जायेंगे फिर भी खूब लोग आपके नाम की मनौतियाँ मानेंगे, जैसे – नानकजी, लीलाशाह बापू जी आदि संतों को नाम की मनौतियाँ मानते हैं। ये आठ सदगुण आ गये तो आपको तो ईश्वर मिल जायेंगे, साथ ही आपके पदचिह्नों पर हजारों लाखों लोग चलेंगे। और इन सब सदगुणों को साकार करने में स्थलबस्ति, जो आपको दीक्षा के समय सिखायी जाती है, वह चार चाँद लगायेगी और आसान कर देगी। आरोग्य और प्रभावशाली व्यक्तित्व में, निर्विकारता में और ईश्वरप्राप्ति में बेजोड़ सहयोग कर देगी।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2011, पृष्ठ संख्या 28, अंक 217

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भगवान का प्रिय बनना है ?


आप भगवान को अपने-अपने ढंग से, अपनी-अपनी मान्यता से प्रेम करते हैं परंतु यदि आप भगवान से ही पूछें कि ‘प्रभु ! आपको कौन विशेष प्यारा है ? और भगवान के मार्गदर्शन में प्रेम-पथ पर चलना शुरू करें तो वह दिन दूर नहीं जब आप प्रेममूर्ति, भगवन्नमूर्ति, आनंदमूर्ति हो जायेंगे। भगवान कहते हैं ऐसे भक्त मुझे प्रिय हैं-

जो किसी से द्वेष नहीं करते। सबके मित्र हैं, दयालु हैं। जिनमें न ममता है, न अहंकार है। सुख-दुःख दोनों जिनके लिए समान हैं। जो क्षमावान हैं।

जो सदा संतोषी हैं, योगी हैं। शरीर, इन्द्रिय तथा मन को वश में रखते हैं। दृढ़ निश्चयवाले हैं। मन और बुद्धि जिन्होंने भगवान को अर्पित कर रखी है।

न तो उनसे किसी जीव को भय होता है, न उन्हें किसी जीव से भय होता है। उन्हें न तो हर्ष है, न संताप।

उन्हें किसी चीज की इच्छा नहीं रहती। बाहर भीतर से वे पवित्र रहते हैं, चतुर होते हैं। किसी से पक्षपात नहीं करते। दुःखों से मुक्त रहते हैं। किसी भी कर्म में कर्तापन का अभिमान नहीं रखते।

दुःखी प्रसन्न दिखते हुए भी ऐसे महापुरुष गहराई में सम रहते हैं। वे न किसी बात का शोक करते हैं, न कुछ चाहते हैं। शुभ और अशुभ सभी कर्मों का फल उन्होंने छोड़ रखा है।

मित्र और शत्रु में उनका एक सा भाव रहता है। मान और अपमान, गर्मी और सर्दी, सुख और दुःख उनके लिए बराबर हैं। संसार में उनकी कोई आसक्ति नहीं है।

निंदा और स्तुति उनके लिए बराबर हैं। वे मौन रहते हैं। जो मिल जाये उसी में वे संतुष्ट रहते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2010, पृष्ठ संख्या 7, अंक 216

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