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हम दुःखी क्यों हैं ?


(पूज्य बापू जी की बोधमयी अमृतवाणी)

लोग बोलते हैं हम दुःखी हैं, दुःखी हैं, दुःखी हैं लेकिन वेदान्त कहता है दुःख का वजन कितना है ? 50 ग्राम, 100 ग्राम, 200 ग्राम, किलो, आधा किलो ? दुःख का कोई वजन देखा ? नहीं दुःख का रंग क्या है ? कोई भी रंग नहीं। दुःख का रूप क्या है ? रूप भी कोई नहीं। दुःख की ताकत कितनी है ? उसकी अपनी ताकत भी कुछ नहीं। दुःख ईश्वर के पास भी नहीं है, दुःख हम चाहते भी नहीं है फिर भी हम दुःखी हैं। दुःख ईश्वर ने बनाया नहीं, दुःख प्रकृति ने बनाया नहीं। माँ बच्चे के लिए दुःख बनाती है क्या ? फिर बच्चे दुःखी क्यों होते हैं ? नासमझी से। स्कूल जाने में फायदा है लेकिन माँ वहाँ ले जाती है तो दुःखी होते हैं, क्यों ? बेवकूफी से। स्नान करने से उनका मैल कटता है लेकिन ॐऽऽऽ करते हैं। दुःखी होते हैं। तो नासमझी के सिवाय दुःख का न रंग है, न रूप है, न वजन है।

दो प्रकार की दुनिया होती है। एक होती है – ईश्वर की दुनिया, उसमें दुःख नहीं है। दूसरी दुनिया हम बेवकूफी से बनाते हैं। जैसे हीरा-मोती, माणिक – ये ईश्वर ने बनाये लेकिन ये हीरे, मोती, माणिक इसके पास हैं, मेरे पास नहीं हैं….’ यह सोचकर दूसरा दुःखी हो रहा है। किन्तु जिसके पास हैं वह भी तो छोड़कर मरेगा। मेरे पास होंगे को तू भी छोड़कर मरेगा। अभी तू अंतरात्मा, परमात्मा को धन्यवाद दे कि खाने को है, रहने को है, ये पत्थर नहीं है तो क्या है, होंगे तो क्या है ! उसके पास है तो उसे अहंकार हो रहा है कि ‘मेरे पास हीरे हैं, मोती हैं, माणिक हैं।’ वह अहंकार से फँस रहा है और तू बेवकूफी से फँस रहा है। ईश्वर की सृष्टि में न हीरे दुःख देते हैं, न सुख देते हैं। ईश्वर तो कई रूप, कई रंग, कई प्रसंग पैदा करके तुम्हें आह्लादित करते हैं, आनंदित करते हैं, तुम्हारा ज्ञान बढ़ाते हैं, तुम्हारी प्रीति बढ़ाते हैं, तुम्हारी भक्ति बढ़ाते हैं। तुम जन्म लेकर माँ की गोद में आये तो तुम्हारे लिए दूध माँ ने नहीं बनाया, बाप ने नहीं बनाया, बाप-के-बाप ने भी नहीं बनाया। माँ तो रोटी-सब्जी खाती है लेकिन तुम्हारे आने से पहले ही भगवदसत्ता ने शरीर में दूध बना दिया। जब चाहिए, जितना चाहिए, सकुर, सकुर, सकुर पिया, फिर मुँह घुमा दिया। वह जूठा नहीं माना जाता, गर्म नहीं करना पड़ता, फ्रिज में नहीं रखना पड़ता। यह किसने बनाया ? परम दयालु की सत्ता ने ही तो बनाया। न ज्यादा ठंडा न ज्यादा गर्म, न ज्यादा मीठा न ज्यादा फीका, यह इतना बढ़िया, अनुकूल दूध किसी जड़ मशीन ने बनाया कि चेतन परमात्मा की सत्ता से बना ? बोलो ! किसी दुश्मन ने बनाया कि परम हितैषी ईश्वर ने बनाया, समझदारी से बनाया, करूणा से बनाया। भगवान कभी-कभी अनुकूलता देते हैं तो हमें उत्साहित करते हैं और कभी प्रतिकूलता देते हैं तो हमें सावधान करते हैं और कि हेकड़ी न लाओ। कभी बीमारी देते हैं कि बदपरहेजी न करो और कभी तंदरुस्ती देते हैं कि सेवा करो, भजन करो, मुझे पहचानो। तो बताओ भगवान दुःख देते हैं कि उन्नति देते हैं ! भगवान हमारे हितैषी हैं कि हमारे दुश्मन हैं ? हितैषी हैं। जब भगवान हमारी उन्नति चाहते हैं, हमारे हितैषी हैं, हम भी उन्नति चाहते हैं, अपना हित चाहते हैं फिर भी दुःख है तो क्यों है ? क्योंकि हम भगवान की हाँ-में-हाँ नहीं करते। हम अपनी बेवकूफी से भगवान को अपने ढंग से चलाना चाहते हैं – ऐसा कर दे, ऐसा कर दे, ऐसा हो जाये, ऐसा हो जाये…. सिनेमा में अच्छा महल, माड़ियाँ, बगीचे दिखते हैं। अब देखने वाला बोलेः “बस यही दिखेंगे, डाकू भी दिखेंगे, लवर-लवरियाँ भी दिखेंगे। ये सारे सिनेमा के बदलते हुए दृश्य हैं। अब कोई बोलेः ‘ये नहीं आयें, ऐसा ही हो, यह रूका रहे।’ तो तुम्हारे कहने से रूकेगा नहीं, थमेगा नहीं और चाहो कि चला जाय तो जायेगा नहीं। यह तो फिल्म है तुम्हें आह्लादित करने के लिए आनंदित करने के लिए, सुझबूझ बढ़ाने के लिए।

तो भगवान ने तो शास्त्र बनाये। ज्ञान का, भक्ति का, सत्कर्म का मार्ग बनाया। गुरुमंत्र पाने का सौभाग्य उपलब्ध किया। भगवान तो हमारा हित चाहते हैं। अब हम फिलम देखें, कूड़ कपट करें, शराब पियें, जुआ खेलें, दूसरे की निंदा करें तो हम ही तो दुःख बनाते हैं न !

तो दुःख का कोई रूप नहीं, दुःख का कोई रंग नहीं, दुःख का कोई वजन नहीं । बेवकूफी का नाम है दुःख। नासमझी का नाम है दुःख। दुराग्रह का नाम है दुःख।

कोई मरता है तो उसका दुःख नहीं लेकिन यदि उसके साथ ‘यह मेरा है’ की मान्यता है तो दुःख होता है। कोई जन्मता है तो उसका सुख नहीं किंतु ‘यह मेरे घर जन्मा है’। – यह मान्यता जुड़ी है तो सुख होता है तो हम शरीर को ‘मैं’ मानतें और संबंधों को ‘मेरा’ मानते हैं पर मैं जहाँ से स्फुरित होता है उस आत्मा-परमात्मा को मेरा मानें और संसार को सपना माने, यथायोग्य व्यवहार करें तो बहुत खुशी रहती है, आनंद रहता है। ‘ये हीरे मेरे हैं, ये मोती मेरे हैं, यह मकान मेरा है….’ अरे,यह है उसके पहले किसी के पास था, बाद में किसी के पास रहेगा। जिस जमीन को अपनी मानते हो वह पहले किसी की थी और तुम्हारे मरने के बाद या पहले किसी दूसरे की हो जायेगी। तो ‘ये चीजें मेरी हैं।’ नहीं, मेरी मानना ऊपर से, अंदर से समझो कि ‘यह सब सपना है। इसको जानने वाला मेरा प्रभु अपना है। मरने के बाद भी जो साथ नहीं छोड़ता वह प्रभु अपना है।’ इस प्रकार का ज्ञान आने से सदा आनंद है।

तो दुःख भगवान ने नहीं बनाया लाली ! लाले ! दुःख प्रकृति ने नहीं बनाया भैया ! बहन जी ! आसक्ति, अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष इन्हीं से दुःख होता है। अविद्या मिटेगी तत्त्वज्ञान से, राग-द्वेष मिटेगा ईश्वर की उपासना, ध्यान से। बस, हो गयी ईश्वर की प्रीति, परमानंद की प्राप्ति !

दुःख परमात्मा ने नहीं बनाया और दुःख तुम चाहते नहीं ! बेवकूफी का दूसरा नाम है दुःख और बेवकूफी मिटती है सत्संग से, सत्संग से विवेक जगता है।

बिनु सत्संग बिबेक न होई।

राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।

(श्री रामचरित. बा.कां. 2.4)

भगवान की सामान्य कृपा हुई तो मनुष्य जन्म मिला। भगवान की विशेष कृपा हुई तो श्रद्धा हुई और गुरु मिले। भगवान की और विशेष कृपा हुई तो गुरुमंत्र की दीक्षा मिली और भगवान प्यारे लगने लगे। भगवान प्यारे लगने लगे तो देर-सवेर उस दुलारे का ज्ञान भी प्रकट होगा, विवेक भी प्रकट होगा।

एक बार मंदी की लहर चली और एक बड़ा स्कूल बंद हो गया। मास्टर बेरोजगार हो गये और बेचारे रोजी-रोटी के लिए इधर-उधर भटकने लगे। कोई सर्कस में गया। सर्कसवाला उससे बोलाः “मास्टर साहब ! तुमको नौकरी तो मिलेगी पर तुमको शेर बनना पड़ेगा।”

“मैं शेर कैसे बनूँगा ?”

“अरे, डरो मत ! थोड़ा पैरों से और हाथों से चलने का प्रशिक्षण ले लो और शेर का मुँह और शेर की खाल पहना देंगे, फिर ऊपर तार पर चलना।”

“शेर की खाल ही पहननी है ?”

“हाँ।”

“बढ़िया नौकरी मिली। चलो, वहाँ गयी तो यहाँ रोजी चालू हो गयी।”

मास्टर ने प्रशिक्षण ले लिया। सर्कस में नाम हुआ। ‘एक नया शेर आया है, शेर-ए-बबर। शेर-ए-बबर तार पर चलेगा और नीचे रहेंगे गुर्राते हुए शेर…. सर्कस देखकर आप ताज्जुब करेंगे। हैरानी हो जाये हैरानी !’ लोगों ने टिकटें खरीदीं। सर्कस हाउसफुल ! मास्टर साहब शेर की खाल पहन कर चले और म्यूजिक से गुर्राता रहे… वह तो सर्कसवाले कर लेते हैं परंतु मास्टर ने देखा कि नीचे चार शेर गुर्रा रहे हैं। मास्टर जी घबराये, बैलेंस छूटा, धड़ाक-धूम ! वे जाली पर गिरे। अब देखा कि कहीं ये शेर खा न जायें ! तब वे जो चार शेर खड़े थे, बोलेः “पागल ! हम भी उसी स्कूल के बेरोजगार लोग हैं, तू डरता काहे को है ? हमारा भी तेरे जैसा मेकअप है।”

ऐसे ही संसार में कोई किसी धन से, कोई किसी सत्ता से, कोई और किसी से बड़ा तो दिखता है पर अंदर से बेचार सब वही-के-वही हैं, बिना रस के बेचारे ! जैसे बेरोजगार मास्टर, ऐसे ही भगवान से विमुख संसारी बेचारे किसी-न-किसी पीड़ा में मेकअप करके शेर बन के दिखते हैं लेकिन हैं वही-के-वही। कोई किसी दुःख में, कोई किसी चिंता में, कोई किसी तनाव में, कोई किसी समस्या में उलझा हुआ है।

कुल मिलाकर आपका आत्मा शाश्वत है, नित्य है।

ईश्वर अंस जीव अविनासी।

चेतन अमल सहज सुख रासी।।

(श्री रामचरित. उ.कां. 116.1)

आप सहज में सुखराशि हो लेकिन ये आगुतुक चिंता, विकार, मान्यताएँ आपको दुःखी कर देती हैं। आप दुःख चाहते नहीं, ईश्वर ने दुःख बनाया नहीं, माया ने, प्रकृति ने दुःख बनाया नहीं, दुःख अज्ञानता के कारण है। अपने को दुःखी और पीड़ित मानकर दुःख, पीड़ा को गहरा न उतरने दो। ‘दुःख मन में आता है, पीड़ा शरीर में आती है। मैं उन सबको जानने वाला भगवान का अमृतपुत्र हूँ।’ – ऐसा आत्मविचाररूपी उपाय करके दुःख को, पीड़ा को भगा सकते हो।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2010, पृष्ठ संख्या 14,15,16 अंक 213

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मनुष्य की विलक्षणता


(पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)

एक होती है कामना, जो जीवमात्र में होती है – खाने की, पीने की, भोगने की, रखने की। कुत्ते का भी जब पेट भर जाता है तब उसे कोई बढ़िया चीज मिलती है तो वह उसे उठाकर ले जाता है और गड्ढा खोदकर गाड़ देता है कि ‘कल खायेंगे’, यह कामना है। ‘पैसे अभी हैं पर थोड़े बैंक में पड़े रहे हैं, फिर काम आयेंगे’ – यह कामना है। पेड़-पौधों को भी कामना होती है परंतु उनकी कामना और होती है, मनुष्य की कामना और होती है, कुत्ते की कामना और होती है पर कामना सभी जीवों में होती है। मनुष्य में दो चीजें ऐसी होती हैं जो और जीवों में नहीं होतीं। पेड़ पौधों में कामना होती है खाद-पानी की, कीट-पतंग में कामना होती है अपने आहार की, अपने बच्चों को सुरक्षित रखने की लेकिन मनुष्य में कामना के साथ लालसा भी होती है और जिज्ञासा भी होती है। यह बहुत ऊँची चीज है। इस ऊँची चीज को महत्त्व दे और कामना को प्रारब्ध के, भगवान के हवाले छोड़ दे तो देखते-देखते मनुष्य महान आत्मा बन जायेगा, दिव्यात्मा बन जायेगा। इसीलिए कहते हैं कि मनुष्य-जीवन देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। देवताओं में भी लालसा और जिज्ञासा तो होती है परंतु देवताओं के यहाँ इतनी सुविधा, इतना सुख-वैभव है कि कामना-कामना में वे इतने मशगूल हो जाते हैं कि इन दो चीजों का फायदा उठाने से रह जाते हैं। जब पुण्य नष्ट होते हैं तो फिर मनुष्य शरीर में आते हैं परंतु मनुष्य-जन्म में ये चीजें ज्यों-की-त्यों बरकरार रहती हैं – लालसा और जिज्ञासा।

लालसा होती है भगवान का रसपान करने की, भगवान का माधुर्य पाने की। कितना भी धन हो जाये फिर भी अंदर से धनी भी भगवान की तरफ जाते हैं, किसी-न-किसी को मानते हैं। लगभग सभी लोग भगवान को मानते हैं, कोई-कोई नहीं मानता होगा। जो नहीं मानते, समझो उनकी मनुष्यता ही खो गयी।

मनुष्य में यह लालसा रहती है कि भगवत्सुख मिले, भगवत्प्रीति मिले, भगवदरस मिले, भगवदधाम मिले। हम लोग स्वर्ग बोलते हैं, कोई बिहिश्त बोलता है, कोई पैराडाइज बोलता है, कोई कुछ बोलता है किंतु यह लालसा मनुष्य में रहती है।

जिज्ञासा होती है ‘हम वास्तव में कौन हैं ?’ इसे जानने की। शरीर मर जाता है फिर भी हम तो रहते हैं। अगर हम नहीं रहते तो स्वर्ग में कौन जाता है, नरक में कौन जाता है ? मरने के बाद भी हम तो हैं न ! तो हम कौन हैं और भगवान क्या हैं ? हमारे और भगवान के बीच क्या संबंध है, क्या दूरी है और वह कैसे मिटे, कैसे जानें ? यह जो जानने की भावना होती है वह जिज्ञासा है। भगवदरस पाने का जो लालच होता है उसे लालसा बोलते हैं और संसारी चीजों को पाने की इच्छा को वासना बोलते हैं।

तो मनुष्य में तीनों होती हैं – वासना, लालसा और जिज्ञासा। अगर वासना-ही-वासना है तो मनुष्य और कुत्ते में कोई ज्यादा फर्क नहीं है। दुःख आया तो मनुष्य दुःखी हो गया, घबड़ा गया… कुत्ता भी दुःख में घबड़ाता है, पूँछ दबा देता है और सुख आया तो पूँछ हिलाता है, खुशी दिखाता है, मनुष्य भी दिखाता है लेकिन कुत्ते से मनुष्य बहुत ऊँचा है। बैल, घोड़े, गधे, – सभी प्राणियों से मनुष्य ऊँचा है क्योंकि दो रत्न और भी हैं – लालसा और जिज्ञासा। मनुष्य उन रत्नों को महत्त्व दे दे तो वह देवताओं से भी आगे निकल जायेगा। देवता भगवान के बाप नहीं बने हैं परंतु मनुष्य भगवान के बाप भी बने हैं। देवता भगवान के गुरु नहीं बने हैं पर मनुष्य भगवान के गुरु भी बने हैं।

मनुष्यैः क्रियते यत्तु तन्न शक्यं सुरासुरैः।

‘जो ऊँचाई मनुष्य पा सकता है, वह सुर और असुर भी नहीं पा सकते।’

(ब्रह्म पुराणः 27.70)

मनुष्य अपनी जिज्ञासा और लालसा को महत्त्व देकर इतना ऊँचा उठ सकता है, इतना ऊँचा उठ सकता है कि जहाँ ऊँचाई की हद हो जाय ! यदगत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम। जहाँ जाने के बाद पतन ही नहीं होता। न तदभासयते सूर्यो न शशांको न पावकः। वहाँ सूर्य का प्रकाश, चन्द्रमा का प्रकाश या अग्नि का प्रकाश नहीं। अग्नि, चंदा और सूर्य को भी जो प्रकाशित करता है उस प्रकाशमय सत्त्व को, तत्त्व को, आत्मा को जानकर मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है। बाहर से इतनी गरीबी है कि शरीर पर केवल लँगोटी है, तीन थिगली (पैवंद) लगी हैं, सब्जी में नमक डालने के पैसे नहीं हैं किंतु जिज्ञासा और लालसा बढ़ गयी तो ऐसे पद को पाता है कि इन्द्र भी उसके आगे बबलू हो जाता है।

जिज्ञासा से ब्रह्मज्ञान हो जाता है, लालसा से ब्रह्म-परमात्मा का रस पैदा होता है। मैं तो आपको सलाह देता हूँ कि आपके अंदर ये दो दिव्य शक्तियाँ हैं, उनको सहयोग करो। लालसा और जिज्ञासा को बढ़ाओ। कामना में समय बर्बाद मत करो। कामनाएँ क्षीण होती जायें तथा जिज्ञासा और लालसा सफल होती जायें तथा जिज्ञासा और लालसा सफल होती जायें, यह सच्ची सफलता है।

कामनावाले से तो वृक्ष भी डरते हैं। आप बस-स्टैंड पर खड़े हैं और कोई भिखमंगा कामना करके आता है तो आपको अच्छा नहीं लगता है। जान छुड़ाने के लिए कुछ पैसे डाल देते हो। औज जिनको कामना नहीं है ऐसे संत को हाथ जोड़कर, माथा टेककर भी पीछे-पीछे घूमते हो कि “बाबाजी ! जरा यह फल-फूल ले लो।” बाबाजी बोलते हैं- “नहीं चाहिए बेटे !” आप फिर से ‘बाबा ! बाबा !!’ करते हैं, मानो उन्होंने लिया तो हम पर मेहरबानी कर दी। कामना रहित पुरुष को कुछ देते हैं तो वह महापुण्य बन जाता है और कामनावाले को देते हो तो जान छुड़ाने के लिए। आप भगवान से, समाज से या प्रकृति से भिखमंगे होकर कामनापूर्ति के गुलाम मत बनो तो प्रकृति आपके पीछे-पीछे घूमेगी। मैंने अपने आश्रमों में बोर्ड लगा रखे हैं कि ‘चीज-वस्तु, रूपये पैसे की कोई जरूरत नहीं है। आश्रम के नाम पर कोई रूपया-पैसा माँगता है तो मुख्यालय को खबर करो।’ आज तक मैंने कोई आश्रम बनाने के लिए चंदा नहीं किया, फिर भी आपको पता है कि कितने सारे आश्रम चल रहे हैं। कितनी गौशालाएँ चल रही हैं, कितने औषधालय चल रहे हैं और गरीबों को रोजी-रोटी नहीं मिलती, काम-धंधा नहीं मिलता तो आश्रमों में, समितियों में ‘भजन करो, भोजन करो, दक्षिणा पाओ’ केन्द्र चल रहे हैं। मैंने कामना नहीं की आप मुझे यह चीज दो, रूपया दो। अरे, जो प्रारब्ध में होगा, आयेगा। बच्चा माँ के गर्भ से जन्म लेता है तो क्या कामना करता है कि मेरे लिए दूध बन जाय, दूध बन जाय ? प्रकृति और परमात्मा की व्यवस्था है, अपने आप दूध बन गया न ! तो प्रारब्ध-वेग से सब मिलता रहता है। क्या आप कामना करते हो कि श्वास मिल जाय, मिल जाय ? अरे, आपकी आवश्यकता है तो श्वास मिलता रहता है। इसलिए कामना करके अपनी इज्जत मत बिगाड़ो, लालसा और जिज्ञासा करके, उनको बढ़ाकर अपना खजाना पा लो बस !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2010, पृष्ठ संख्या 20,21 अंक 212

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भगवान को अपना माने बिना तुम्हारी खैर नहीं !


(पूज्य बापू जी की हृदय स्पर्शी अमृतवाणी)

भगवान को अपना माने बिना तुम्हारी खैर नहीं ! जिसको भगवान अपने नहीं लगते उसको माया ऐसा बिलो देती है, ऐसा मथ देती है कि तौबा-तौबा ! आया काम तो सारे शरीर को मथ के निचोड़ डालेगा। आया क्रोध तो सारे शरीर को मथ के सिर में गर्मी चढ़ा देगा। आया लोभ तो बस, रूपया-रूपया दिखेगा, डॉलर-डॉलर दिखेगा। खूब तेज भगायी गाड़ी…. कहाँ जा रहे हैं ? नौकरी पर जा रहे हैं। फिर क्या ? डॉलर आ गये। कुछ खरीद लिया, बेच दिया। फिर क्या ?  फिर क्या ? ओहो ! जिंदगी बिलो डाली।

जवान व्यक्ति कहता है जीवन मजे से भरपूर है परंतु बुद्धिमान व्यक्ति कहता है (संसारी) जीवन में दुःख ही दुःख भरा है। यह संसार सपने जैसा है, मूर्ख इसमें सुख खोजने जाता है। जो भगवान को अपना और अपने को भगवान का नहीं मानता उसको माया ऐसा बिलो देती है, ऐसा बिलो देती है कि दही में से तो मक्खन निकलता है पर इसके मथने से तो मुसीबतें निकलती हैं। फिर घोड़ा, गधा, कुत्ता, बिलार बन जाते हैं। अजनाभ खंड के एक छत्र सम्राट भरत, जिनके नाम से इस देश का नाम भारत पड़ा, उन्हें हिरण प्यारा लगा और मरने के बाद वे हिरण बन गये, राजा नृग गिरगिट हो गये, राजा अज अजगर बन गये… माया ऐसा मथ डालती है !

माया ऐसी नागिनी जगत रही लिपटाय।

जो तिसकी सेवा करे वा को ही वो खाय।।

जो जितना भगवान को चाहता है माया उतनी उसकी सेवा करके हाथ जोड़कर अलग से ठहरती है कि कहीं भगवान के दुलारे को दुःख न हो, कष्ट न हो। माया उसके अनुकूल हो जाती है, कष्ट नहीं देती है और जो माया को जितना चाहता है, माया उतना ही उसको बिलो देती है।

कोई खानदानी महिला हो और उसको कोई अपनी औरत की नजर से देखे तो जूते खायेगा कि नहीं खायेगा ? खायेगा। फिर लक्ष्मी तो है भगवान की, ऐसे ही माया है तो भगवान की और कोई उसे अपनी बनाना चाहे तो जूते खायेगा कि नहीं खायेगा ? खायेगा। धोबी जैसे कपड़े उठा-उठा के, घुमा-घुमा के पटकता है, ऐसे ही माया फिर उसको घुमा-घुमा के फेंक देती है गधे की योनि में, कुत्ते की योनि में, भैंसे की योनि में….. कि ‘अब बन जा भैंसा, बन जा कुत्ता, बन जा मगर बन जा कुछ-का-कुछ….. अरे, मैं भगवान की सती-साध्वी और तू मुझे अपना बनाने को आया ! मालिक बनता है मेरा !’ भगवान तुम्हारे हैं, तुम भगवान के हो। लक्ष्मीपति भगवान हैं माया के पति। तुम माया के पति बनने गये, माया के स्वामी बनने गये तो दे धोखम-धोखा !

कराटे वाले कैसी पिटाई कर देते हैं, कैसे मारपीट करते हैं कि पता भी न चले, खून भी न निकले और मार खाने वाले तौबा पुकार लेते हैं। माया तो उससे भी ज्यादा पिटाई करती है। कराटेवालों की पिटाई के बाद तो दो दिन में थोड़ा आराम हो जाय पर यह माया तो चौरासी लाख जन्मों तक बराबर पिटाई करती रहती है। मरते समय भी इसी की चिंता लगी रहती है कि ‘मेरे लड़कों का क्या होगा, मेरे कारखाने का क्या होगा, मेरी दुकान का क्या होगा ?’

इन्सान की बदबख्ती अंदाज से बाहर है।

कमबख्त खुदा होकर बंदा नजर आता है।।

है तो भगवान का अंश, है तो ‘चेतन अमल सहज सुख रासी‘ परंतु माया में ऐसा फँसा है कि तौबा हो रही है। ऐसे-ऐसे बिलोया जाता है कि बस फिर वही-का-वही। समर्थ रामदास कहते हैं कि मरता तो कोई है पर शोक दूसरे करते हैं और शोक करने वाले बेवकूफों को पता नहीं कि हम भी ऐसे ही जायेंगे। कभी-कभी तो किसी को श्मशान में छोड़कर जाते ही कोई खुद मर जाता है।

कोई आज गया, कोई गल गया,

कोई जावन को तैयार खड़ा।

यही रीति है संसार की। इसमें किसी का इन्कार चलता ही नहीं। तो अब क्या करें ?

जहाँ मौत की दाल नहीं गलती उस चैतन्य देव को जान लो, उसमें प्रीति करो, उसको पहचान लो बस।

कैसे पहचानें ? भगवान कहते हैं-

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।।

‘उन निरंतर मेरे ध्यान आदि में लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।’

(गीताः 10.10)

एक मनुष्य सूरज को देख सकता है तो सारी मनुष्य-जाति सूरज को देख सकती है। एक मनुष्य आकाश को देख सकता है तो सभी मनुष्य आकाश को देख सकते हैं। एक मनुष्य पृथ्वी गोल है यह जान सकता है तो सभी मनुष्य ऐसा जान सकते हैं। ऐसे ही एक मनुष्य अपने आत्मा-परमात्मा को जान सकता है तो सभी मनुष्य जान सकते हैं। फिर काहे को निराश होना ! काहे को हताश होना ! काहे को उस महान लाभ से वंचित रहना, दुर्लभ समझना !

एक व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री बन गया तो दूसरा व्यक्ति पहले के हटने तक दंड-बैठक करे परंतु एक को साक्षात्कार हो गया तो दूसरे सब्र तैयार हो जायें, दंड बैठक की जरूरत नहीं है। प्रधानमंत्री की कुर्सी एक है किंतु आत्मा तो आप सबके पास वही-का-वही है। आत्मा भी एक है किंतु कुर्सी परिच्छिन्न है और आत्मा व्यापक है, ब्रह्म है।

जैसे – आकाश एक है और उसमें कई घड़े हैं। अब एक घड़ा अपने भीतर के आकाश-तत्त्व को जान ले तो क्या जब तक वह न फूटेगा, तब तक दूसरे घड़े अपने भीतर के आकाश-तत्त्व को नहीं जान सकेंगे ? नहीं पा सकेंगे ? अरे ! एक ने जाना तो दूसरे उत्साहित होंगे। दूसरे घड़े भी अपने आकाश-तत्त्व को जान ले तो दूसरे व्यक्ति भी अपने परमात्म-तत्त्व को पा सकते हैं।

एक प्रधानमंत्री बनता है तो दूसरे के प्रधानमंत्री होने की सम्भावना पाँच साल तक दब जाती है किंतु यहाँ एक को साक्षात्कार हो जाता है तो हजारों की सम्भावनाएँ जागृत हो जाती हैं। साक्षात्कार जब होगा तब होगा पर उसका आनंद, झलक और सच्चाई सहित रसमय जीवन तो अभी हो रहा है। बिल्कुल सच्ची बात है, पक्की बात है। किसी ने कोई पद पाया है तो उस पद का रस तो जब तक वह हटेगा या मरेगा नहीं तब तक दूसरा नहीं पा सकेगा परंतु परमात्म-पद, परमात्म-रस आपने पाया है तो आपके होते ही कइयों को उसका स्वाद, रस, उत्साह, मदद मिलती है। इसीलिए यह रास्ता जोड़ने वाला है, इस रास्ते में संवादिता है। भोग में विवादिता है, भोग का रास्ता तोड़ने वाला है। विषय विकारी सुख सीमित हैं और परमात्मा असीम है। विषय-विकारी सुख अनित्य हैं और परमात्मा नित्य है, जीवात्मा भी नित्य है।

जब तक नित्य (जीवात्मा) को नित्य (परमात्मा) का सुख, नित्य का ज्ञान, नित्य की मुलाकात नहीं होगी, तब तक अनित्य का कितना भी मिला, कुछ भी हाथ में आने वाला नहीं है।

अगले जन्म के पैसे, बेटे, पत्नी कहाँ गयी ? पति कहाँ गये ? ऐसा ही इस बार भी होने वाला है। अपने परमात्मा पति को जान लो। फिर पति के लिए पत्नी वफादार हो जायेगी, पत्नी के लिए पति वफादार हो जायगा। ईश्वर में टिकते हैं न, तो संसार का व्यवहार भी अच्छी तरह से होता है। उसमें भी कुशलता आ जाती है। संसार के सारे प्रमाणपत्र पाकर भी आदमी इतना कुशल नहीं होता, जितना परमात्म-विश्रान्ति को पाने से कुशल हो जाता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, पृष्ठ संख्या 4,5, 10. अंक 212, अगस्त 2010

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