Tag Archives: Vivek Vichar

हृदयकोष की रक्षा करो – पूज्य बापू जी


काम, क्रोध, लोभ, मोह के जो आवेग आते हैं, उनसे बचने के लिए सोचो कि ‘इन आवेगों के अनुसार कौन-सा काम करें, कौन सा न करें ?’ इसमें तुम्हारी पुण्याई चाहिए। पहले जानो। जानाति, इच्छति, करोति। जानो, फिर शास्त्र अनुरूप इच्छा करो, फिर कर्म करो। आप क्या करते हैं कि पहल कर्म करते हैं। इन्द्रियाँ कर्म में लगती हैं, मन उसके पीछे लगता है और बुद्धि को घसीट के ले जाता है तो धीरे-धीरे बुद्धि राग-द्वेषमयी हो जाती है।

इच्छा हुई तो सोचो कि ‘इच्छा के अनुसार कर्म करें या बुद्धि से सोच के कर्म करें ?’ इच्छा हुई, फिर मन से उसको सहमति दी और इच्छा के अनुरूप मन करना चाहता है तो धीरे-धीरे बुद्धि दब जायेगी। बुद्धि का राग-द्वेष का भाग उभरता जायेगा, समता मिटती जायेगी। अगर शास्त्र, गुरु और धर्म का विचार करके बुद्धि को बलवान बनायेंगे और समता बढ़ाने वाला, मुक्तिदायी जो काम है वह करेंगे तो बुद्धि और समता बढ़ेगी लेकिन मन का चाहा हुआ काम करेंगे तो बुद्धि और समता का नाश होता जायेगा। कुत्ते, गधे, घोड़े, बिल्ले, पेट से रेंगने वाले तुच्छ प्राणी और मनुष्य में क्या फर्क है ?

वसिष्ठजी कहते हैं- हे रामजी ! कभी ये मनुष्य थे लेकिन जैसी इच्छा हुई ऐसा मन को घसीटा और बुद्धि उसी तरफ चली गयी तो धीरे धीरे दुर्बुद्धि होकर केँचुए, साँप और पेट से रेंगने वाले प्राणियों की योनियों में पड़े हैं।

जो बहुत द्वेषी होता है वह साँप की योनि में जाता है। इसी प्रकार की और भी कई योनियाँ हैं। यह चार दिन की जिंदगी है, अगर इसको सँभाला नहीं तो चौरासी लाख जन्में की पीड़ाएँ सहनी पड़ती हें।

रक्षत रक्षत कोषानामपि कोषें हृदयम्।

यस्मिन सुरक्षिते सर्वं सुरक्षितं स्यात्।।

‘जिसके सुरक्षित होने से सब सुरक्षित हो जाता है, वह कोषों का कोष है हृदय। उसकी रक्षा करो, रक्षा करो।’

खरीदारी करके कमीशन खाना, चोरी करना, बेईमानी करना…. ले क्या जायेंगे, कहाँ ले जायेंगे ! प्रारब्ध में जो होगा वह नहीं माँगने पर भी मिलेगा और कितनी भी बेईमानी करो, देर-सवेर उसका फल बेईमान को दुःखद योनियों में ले जायेगा। यदि तुम दगाखोर और कपटी हुए तो उसका फल तुमको भी दुःखद योनियों में ले जायेगा। ऐसे कपटी, बगला भगत को फिर बगुले, बिलार वाली, कपट करके पेट भरने वाली योनियों में जाना पड़ता है। तो बुद्धि में लोभ का आवेग आया, काम का आवेग आया, क्रोध का आवेग आया इंद्रियों में शरीर में तो शास्त्र के अनुरूप परिणाम का ख्याल करके बुद्धि को बलवान बनायें और आवेग को सहन करें। लोभ के आवेग को सहन करें। सोचें, ‘अनीति का धन क्या करना, अनीति का भोग क्या करना ?’ पहले शास्त्र के ढंग से बुद्धि में औचित्य-अनौचित्य समझ लो। वासना कहती है यह कर्म करो, इच्छा बोलती है करो लेकिन बुद्धि बोलती है उचित तो नहीं है, तो धीरे-धीरे थोड़ा समय निकाल दो और मन को थोड़ा समझाओ अथवा दूसरे काम में लगाओ तो वासना और द्वेष की लहर शांत हो जायेगी। अगर करने का आवेगा है, मन भी कहता है करो, बुद्धि भी कहती है करो और करने का औचित्य भी है तो उसे कर डालो।

एक तरफ इच्छा खींचती है और दूसरी तरफ बुद्धि और शास्त्र सहमति नहीं देते हैं तो वह कर्म अधर्म है। ऐसी स्थिति में थोड़ा समय गुजरने दो। जैसे समुद्र की लहर आयी और आप बैठ गये, समय गया तो लहर उतर गयी। ऐसे ही ये आवेग हैं। आवेग के समय थोड़ा शांत हो जायें, थोड़ा धैर्य रखें तो आवेग उतर जाता है। नहीं तो आवेग-आवेग में आदमी अंधा हो जाता है। आवेग-आवेग में अपनी खुशामद करने वाले चमचे अच्छे लगेंगे।

तो राग-द्वेष से बचें। आवेगों से बचें और भगवान में श्रद्धा करें। भगवान में सर्वसमर्थता, अंतर्यामीपना आदि दिव्य गुण हैं। आर्त्तभाव से प्रार्थना करे कि ‘प्रभु ! हमें अपने प्रसाद से पावन करो। हम तो आपके रस में नहीं आ रहे, आप ही हमें जबरदस्ती अपने रस में डुबा दो।’

आप चाहे कैसे भी हो, आर्त्तभाव से भगवान को प्रार्थना करते हो तो भगवान तुरंत आपको दोषों को झाड़ देते हैं और भगवदरस मिलता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2010, पृष्ठ संख्या 9,11 अंक 210

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

 

हर परिस्थिति का सदुपयोग


(पूज्य बापू जी की सर्वहितकारी अमृतवाणी)

आपके जीवन का मुख्य कार्य प्रभुप्राप्ति ही है। शरीर से संसार में रहो किंतु मन को हमेशा भगवान में लगाये रखो। समय बड़ा कीमती है, फालतू गप्पे मारने में अथवा व्यर्थ कि चेष्टाओं में समय बर्बाद न करके उसका सदुपयोग करना चाहिए। भगवदस्मरण, भगवदगुणगान और भगवदचिंतन में समय व्यतीत करना ही समय का सदुपयोग है। आपका हर कार्य भगवदभाव  युक्त हो, भगवान की प्रसन्नता के लिए हो इसका ध्यान रखें।

आपके पास क्या है, क्या नहीं है इसका महत्त्व नहीं है, जो है, जितना है उसका उपयोग किसलिए कर रहे हो इसका महत्त्व है। धन है, मान है और धन की हेकड़ी दिखा रहे होः “मैं बड़ा हूँ अथवा मेरे कुटुम्बी ऐसे हैं, वैसे हैं….।” धन का दिखावा करके दूसरों को प्रभावित करते हो और ईश्वर को भूलते हो तो धन का यह दुरुपयोग आपको दुःख में गिरा देगा। धन है, भगवान के रास्ते जाने में उसका सदुपयोग करते हो, जिसका है उसी की प्रीति के लिए लगाते हो तो धन आपका कल्याण कर देगा।

गरीब हो, मजदूरी करते हो, कमियाँ हैं इसकी परवाह न करो। इनका सदुपयोग करने से आपका मंगल हो जायेगा। आपके पास कैसी भी परिस्थिति आये – बीमारी की हो या तंदरुस्ती की, निंदा की हो या वाहवाही की, सबका सदुपयोग करो। आपके पास क्या है इसका मूल्य नहीं है, आप उसका उपयोग सत् के लिए, प्रभु को पाने के लिए करो तो आपका कल्याण हो जायेगा। शबरी भीलन अनपढ़ थी, नासमझ थी लेकिन मैं भगवान की हूँ, गुरु की हूँ….. ऐसा सोचकर गुरुआज्ञा में चली तो महान हो गयी। राजा जनक विद्वान थे, धनवान थे, धन को, विद्या को समाज के हित में लगा दिया तो महान हो गये।

बीमारी आयी। किस कारण आयी यह समझकर सावधान हो गये कि दुबारा वह गलती नहीं करेंगे। बीमारी आयी तो तपस्या हो गयी, वाह प्रभु ! ऐसे प्रसन्न हुए तो यह बीमारी का सदुपयोग हुआ। जरा सी बीमारी आयी और परेशान हो गये… तुरंत इंजेक्शन ले लिया, बिना विचार किये ऑपरेशन करा लिया और असमय बूढ़े हो गये। पैसे भी लुटवाये और शरीर भी खराब करा लिया तो यह बीमारी का दुरुपयोग हुआ।

लोग आपका मजाक उड़ाते हैं तो सावधान हो जाओ कि ‘मरने वाले शरीर का मजाक उड़ा रहे हैं, मसखरी कर रहे हैं। मैं इसको जानने वाला हूँ। ॐआनन्द… तो यह उस परिस्थिति का सदुपयोग हो गया।

कैसी भी परिस्थिति आये, उसका सदुपयोग करके अपने-आपको जानने की, भगवान को पाने की कला सीख लो।

बोलेः महाराज ! हमको भगवान पाने की इच्छा तो है लेकिन हमारे पतिदेव मर गये न, उनकी याद आ रही है। पति में बड़ा मोह था हमारा।

कोई बात नहीं, मोह को रहने दो, मोह को तोड़ो मत। पतिदेव चले गये तो चले गये, भगवान की तरफ गये। मेरे पति को भगवान ने अपने-आपमें समा लिया। अब पति की आकृति में ममता और विकार सब चला गया, भगवान रह गये। हम उस भगवान के रो रहे हैं- ‘हे प्रभु ! कब मिलेंगे….’ यह ममता का, रुदन का सदुपयोग हो गया।

“बाबा ! झूठ बोलने की आदत है। क्या करें?”

ठीक है, खूब झूठ बोलो किंतु उसका सदुपयोग करो, भगवान खुश हो जायेंगे। आप मन ही मन ठाकुरजी के लिए सिंहासन सजाओ और भगवान से झूठ बोलो कि ‘प्रभु ! आओ, आपके लिए सोने का सिंहासन बनाया है, बहुत नौकर-चाकर लगा रखे हैं, मक्खन मिश्री रखी है….’ इस प्रकार मन में जो भी भाव आये ठाकुर जी को प्रसन्न करने के लिए बंडल पर बंडल मारते जाओ। झूठ बोलने की आदत है, कोई बात नहीं, उसको दबाओ मत और कर्मों में फँसाने वाला झूठ कभी बोलो मत। ठाकुर जी को रिझाने वाला झूठ रोज बोलो, धीरे-धीरे झूठ चला जायेगा। ठाकुर जी की प्रीति, ठाकुर जी की निगाहें और ठाकुर जी का माधुर्य आपके हृदय  रति, प्रीति और तृप्ति के रूप में प्रगट होगा। कैसी है सनातन धर्म की व्यवस्था !

मिले हुए का आदर, जाने हुए में दृढ़ता और प्रभु में विकल्परहित विश्वास से आपका कर्मयोग हो जायेगा, भक्तियोग हो जायेगा, ज्ञानयोग हो जायेगा।

गरीबी से भी निर्दुःखता नहीं आती, अमीरी से भी निर्दुःखत नहीं आती बल्कि गरीबी व अमीरी का सदुपयोग करने से निर्दुःखता आती है और हृदय में परमात्मा का प्रागट्य हो जाता है। आपके पास गरीबी है तो डरो मत, उसका सदुपयोग करो, इससे आपके पास वह प्रगट होगा जिसके लिए दुनिया तरसती है। आप पठित हो या अनपढ़ हो, विद्वान हो या मूर्ख हो, बीमार हो या स्वस्थ हो, जैसे भी हो उसका सदुपयोग करे, भाई है तो भाईपने का सदुपयोग करे। मुख्य सम्पादक है तो सम्पादकपने का सदुपयोग करे। पत्रकार हो तो पत्रकारिता का सदुपयोग करे। सदुपयोग में इतनी शक्ति है कि उसके सहारे भगवान मिल जाते हैं।

‘बाबा ! दुर्घटना हो जाय, दुःख आये उसका सदुपयोग करें तो क्या भगवान मिल जायेंगे ?’ हाँ ! मर्खता का विद्वता का, धन-धान्य का सदुपयोग करें तो क्या भगवान मिल जायेंगे ?’ हाँ बिल्कुल मिल जायेंगे। कुछ भी नहीं है, निपट-निराले एकदम कंगाल हैं, इस परिस्थिति का भी सदुपयोग करें तो क्या भगवान मिल जायेंगे ?’ बोलेः हाँ !

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।

सुखं वा यदि वा दुखं स योगी परमो मतः।।

‘हे अर्जुन ! जो योगी अपनी भाँति सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है और सुख या दुःख को भी सबमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।’

(भगवदगीताः 6.32)

परिस्थिति कैसी भी आयें, उनमें डूबो मत। उनका उपयोग करो। समझदार लोग संतों से, सत्संग से सीख लेते हैं और सुख-दुःख का सदुपयोग करके बहुतों के लिए सुख, ज्ञान व प्रकाश फैलाने में भागीदार होते हैं और मूर्ख लोग सुख आता है तो अहंकार में तथा दुःख आता है तो विषाद में डूब के स्वयं का तो सुख, ज्ञान और शांति नष्ट कर लेते हैं, औरों को भी परेशान करके संसार से हारकर चले जाते हैं।

संसार से जाना तो सभी को है, हमको भी जाना है, आपको भी जाना है, यहाँ सब जाने वाले ही आते हैं। भगवान राम, भगवान श्रीकृष्ण, बुद्ध-महावीर सब आये और चले गये, हमारे दादे-परदादे सब चले गये तो हम कब तक ? यह शरीर तो जाने वाला है। जो जाने वाला है उसके जाने का सदुपयोग करो और जो रहने वाला है उसको सत्संग के द्वारा पहचान कर अभी आप निहाल हो जाओ, खुशहाल हो जाओ, पूर्ण हो जाओ।

पूर्ण गुरु किरपा मिली, पूर्ण गुरु का ज्ञान।…..

तो अब करना क्या है ? गरीब होना है ? अमीर होना है ? यहाँ रहना है ? परदेश जाना है ? क्या करना है ?

कुछ करना नहीं है, कोई परिवर्तन की इच्छा नहीं करनी है, जो कुछ हो रहा है उसका सदुपयोग करना है। ‘ऐसा हो जाय, वैसा हो जाय, ऐसा बन जाऊँ….’ इस चक्कर में मत पड़ो।

प्रारब्ध पहले रच्यो, पीछे भयो शरीर।

तुलसी चिंता क्या करे, भज ले श्री रघुवीर।।

पुरुषार्थ अपनी जगह पर है, प्रारब्ध अपनी जगह पर है, दोनों का सदुपयोग करने वाला धन्य हो जाता है।

परिस्थिति कैसी भी आये, अपने चित्त में दुःखाकार या सुखाकार वृत्ति पैदा होगी लेकिन उस वृत्ति को बदलकर भगवदाकार करना, यह है परिस्थिति का सदुपयोग। धन आया, सत्ता आयी, योग्यता आयी और अहंकार बढ़ाया तो आपने इनका दुरुपयोग किया। यदि धन से बहुजन हिताय-बहुजनसुखाय का नजरिया बना और मिली हुई योग्यता का सत्यस्वरूप ईश्वर के ज्ञान में, शांति में, ईश्वरप्रसादजा बुद्धि बनाने में सदुपयोग किया तो आप और ऊपर उठते जायेंगे, अनासक्त भाव से और ऊँचाइयों को छूते जायेंगे। बाहर की ऊँचाई दिखे चाहे न दिखे लेकिन अंतरात्मा की संतुष्टि, प्रीति और तृप्ति आपके हृदय में आयेगी।

ऋषि प्रसाद, जून 2010, पृष्ठ संख्या 18,19,20 अंक 210

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

 

एक भरोसा, एक आस, एक विश्वास…. – पूज्य बापू जी


सच्चिदानंदरूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे।

तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुमः।।

जो सत् है, चित् है, जो आनन्दस्वरूप है उस पूर्ण परमात्मा का भरोसा, उसी की आस, उसी का विश्वास …..! पूर्ण की आस पूर्ण कर देगी, पूर्ण का भरोसा पूर्णता में ला देगा, पूर्ण का विश्वास पूर्णता प्रदान कर देगा। नश्वर की आस, नश्वर का भरोसा, नश्वर का विश्वास नाश करता रहता है।

एक भरोसो एक बल, एक आस बिस्वास।

संत तुलसीदास जी कहते हैं कि एक भगवान का ही भरोसा, भगवान को पाने की ही आस और परम मंगलमय भगवान ही हमारे हितकारी हैं, ऐसा विश्वास हमें निर्दुःख, निश्चिंत, निर्भीक बना देता है। जगत का भरोसा, जगत की आस, जगत का विश्वास हमें जगत में उलझा देता है। भरोसा, आस और विश्वास मिटता नहीं, यह तो रहता है लेकिन जो इसे नश्वर से हटाकर शाश्वत में ला देता है वह धनभागी हो जाता है।

चहौं न सुगति, सुमति, संपति कछु,

रिधि-सिधि बिपुल बड़ाई।

यह बिनती रघुबीर गुसाई।

और आस-बिस्वास-भरोसो,

हरो जीव-जड़ताई।।

नश्वर चीजों की आस, नश्वर चीजों का भरोसा, नश्वर चीजों का विश्वास यह जीवात्मा की जड़ता है। हे प्रभु ! आप शाश्वत हैं, हमारा आत्मा होकर बैठे हैं। आप पर विश्वास, आपका भरोसा और आपकी आस छोड़कर जो वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, संबंध, सम्पदा पहले नहीं थी, बाद में नहीं रहेगी और अब भी बदल रही है उन्हीं की आस, विश्वास और भरोसा करना यह हमारी जड़ता है। इस जड़ता को हर लो महाराज, बस।

नश्वर चीजों की आशा है – पेंशन आयेगी फिर आराम से भजन करूँगा। हे भैया ! आराम तो अपने राम में है। सुविधाजन्य भजन तेरे को खोखला बना देगा। पेंशन का आधार, मित्र का आधार, कुटिया का आधार, वातावरण का आधार तेरे को खोखला बना देगा।

मैंने भी यह गलती की थी। गुरुजी ने आज्ञा दी की ‘डीसा में जाकर रहो’। जहाँ कुटिया थी उसके आसपास में झोंपड़पट्टी थी। एक दिन भी रहने की इच्छा नहीं होती थी। कुछ दिन रहा, फिर गुरुजी को चिट्ठी लिखी कि ‘कृपा करके आज्ञा प्रदान करें कि मैं नर्मदा किनारे मेरे मित्र संत की गुफा है, वहाँ स्वतन्त्रता से रहके अनुष्ठान आदि आराम से कर  सकता हूँ, मैं वहाँ रहूँ ?”

गुरुजी ने उत्तर भेजा कि ‘वहें रहो।’ महीना-दो महीना खींचा, मन को सँभाल के फिर चिट्ठी लिखीः ‘हे गुरुदेव ! आपको न कहूँगा तो किसको कहूँगा। मेरे मन में आता है कि कुटिया को और बाउण्ड्री को ताला लगाकार चाबियाँ बाउण्ड्री में फेंककर नर्मदा किनारे भाग जाऊँ। वहाँ शांति है, एकांत है और तपस्या भूमि है। यहाँ झोंपड़पट्टी के बच्चे दिन-रात चिल्लाते रहते हैं, आपस में गालियाँ बोलते और दीवालों पर भी लिखते रहते हैं।’ गुरुजी ने कहाः ‘गालियाँ निकालते हैं तो वे तो आकाश में चली गई, रात को कुत्ते भौंकते हैं तो ॐ ॐ बोलते हैं – ऐसी भावना क्यों नहीं करते ! बैठे रहो वहीं !’

सात साल वहाँ निकाले और गुरुदेव ने ऐसा पक्का, मजबूत बना दिया कि हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि इतनी भीड़, बाहर की इतनी प्रवृत्ति के अंदर भी निर्लेप नारायण की आस, भरोसा, विश्वास पर मौज ही मौज, आनन्द ही आनन्द है।

हम अपनी मान्यता की आशा रखते हैं, अपनी चीज वस्तु, बुद्धिमत्ता का भरोसा रखते हैं लेकिन ये सब बेचारे, बेचारे ही हैं। एक आस, एक भरोसा, एक विश्वास परमात्मा को देखो।

संत तुलसीदास जी कहते हैं कि और देवियों की पूजा करो तो खुश होती हैं लेकिन आशा देवी का भरोसा छोड़ने से आप पूर्ण सुखी हो जाते हैं।

आशा देवी की पूजा छोड़ दो, आशा देवी का भरोसा छोड़ दो, आशा का विश्वास न करो, आशाओं के दास न बनो, आशा के राम बन जाओ बस !

आशा तो एक राम की, और आस निराश।

अगर मिले तो राम मिले, और मिला तो क्या मिला ! मिलकर बिछड़ जायेगा। यह जीव की जड़ता ही है कि आशा छोड़ नहीं सकता। कहीं न कहीं विश्वास तो रखना ही पड़ता है, किसी-न-किसी पर भरोसा रखना ही पड़ता है तो रखिये भरोसा प्रकृति से परे उस परमात्मा पर।

असंगो ह्यं पुरुषः।

आप उसी की आस, उसी का भरोसा और उसी में विश्वास करते हो तो जैसी आस, जैसा भरोसा, जैसा विश्वास रखते हैं और जैसा आपका भाव होता है, वह सत्-चित्-आनंदघन परमात्मा उसी रूप में आपके आगे लीला करके आपको संतुष्ट कर सकते हैं। परंतु आप अपना आग्रह छोड़िये की ‘ठाकुरजी ! आप ऐसे रूप में मिलो, वैसे रूप में मिलो……।’ नहीं, आप तो प्रार्थना करो। ‘महाराज ! तुम कैसे हो यह हम नहीं जानते लेकिन हम कैसे हैं तुम जानते हो। मम हृदय भवन प्रभु तोरा। मेरा हृदय तो तेरा भवन है मेरे परमेश्वर ! तू सत् है, तू चित् है, तू आनन्दस्वरूप है यह हम जानते नहीं हैं, शास्त्र और महापुरुषों के वचनों से मानते हैं।

जगत की ऐसी वस्तु मिलेगी, ऐसा निवास मिलेगा, ऐसा एकांत मिलेगा, ऐसी साधना मिलेगी तब मैं भजन करूँगा – यह मेरी आशा हर लो महाराज ! आप सर्वत्र हो, हर हाल में हो।’

स्वामी रामतीर्थ ने उस परमेश्वर की महिमा को कुछ जानते हुए गुनगुनायाः

कोई हाल मस्त, कोई माल मस्त,

कोई तूती मैना सूए में।

कोई खान मस्त, पहरान मस्त,

कोई राग रागिनी दोहे में।।

‘ऐसा हाल हो तब मैं सुखी होऊँगा’ – यह भ्रम निकाल दो। इतनी माल मिल्कियत होगी तब सुखी होंगे’ – यह आशा भटकाती है। इन तुच्छ अवस्थाओं की आशा, विश्वास और भरोसा करके हम फँस जाते हैं। इनके बिना भी हम अपने-आप में पूर्ण सुखी रह सकते हैं।

नानक जी कहते हैं-

पूरा प्रभु आराधिआ पूरा जा का नाउ।

नानक पूरा पाइआ पूरे के गुन गाउ।।

सुखमनी साहिब

कोई अवस्था अभी नहीं है, आयेगी तब हम सुखी होंगे तो आप नश्वर की आशा करते हैं, नश्वर पर भरोसा करते हैं, नश्वर पर विश्वास करते हैं।

एक बार दरिया में जोरों का तुफान उठा। पालवाली नाव तरंगो में उछलने लगी। समुद्री तुफान को देख यात्रियों के प्राण कंठ में आ गये। अब क्या करें, किसकी आशा करें, किसका भरोसा करें, किस पर विश्वास करें ? अब गये-अब गये, रोये चीखे चिल्लाये। यात्रियों में एक दूल्हा-दुल्हन भी थे। दुल्हन देख रही थी के मेरे पति आकाश की ओर शांत भाव से देख रहे हैं।

वह बोलीः “अजी ! ऐसी आँधी चल रही है, तुफान आ रहा है। अब क्या होगा, कोई पता नहीं। सब चीख रहे हैं, हे प्रभु ! बचाओ। और आप निश्चिंत हो !”

दूल्हे ने म्यान में तलवार निकाली और उसके गले पर रख दी। दुल्हन पति के सामने देखने लगी।

पति बोलाः तुझे डर नहीं लगता ? मौत तेरे सिर पर आ गयी है।”

“मैं क्यें डरूँगी ! तलवार है तो मेरी गर्दन पर लेकिन मेरे स्वामी के हाथ में है। यह तलवार मेरा क्या बिगाड़ेगी !”

“तेरा अपने स्वामी पर भरोसा है तो तू निश्चिंत है, तो मेरा भी मेरे स्वामी पर भरोसा है इसलिए मैं निश्चिंत हूँ। मेरे स्वामी पर मेरा विश्वास है कि जो करेंगे भले के लिए करेंगे। अगर यह नाव डुबाते हैं तो नया शरीर देना चाहेंगे, उसमें भी मेरा भला है और इसी जीवन में सत्संग-साधना में आगे बढ़ाना चाहेंगे तो नाव किनारे लगायेंगे। हमारे हाथ की बात तो है नहीं कि आँधी, तूफान को रोक दें लेकिन आशा, विश्वास और भरोसा उन्हीं का है, उनको जो भी अच्छा लगेगा ये करेंगे।”

एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास।

एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास।।

तुलसी दोहावलीः 277

जैसे चातक की नजर एक ही जगह पर होती है, ऐसे ही हे प्रभ ! हमारी दृष्टि तुम पर रख दो। भगवान पर भरोसा करोगे तो क्या शरीर बीमार नहीं होगा, बूढा नहीं होगा, मरेगा नहीं ? अरे भाई ! जब शरीर पर, परिस्थितियों पर भरोसा करोगे तो जल्दी बूढ़ा होगा, जल्दी अशांत होगा, अकाल भी मर सकता है। भगवान पर भरोसा करोगे तब भी बूढ़ा होगा, मरेगा लेकिन भरोसा जिसका है देर-सवेर उससे मिलकर मुक्त हो जाओगे और भरोसा नश्वर पर है तो बार-बार नाश होते जाओगे। ईश्वर की आशा है तो उसे पाओगे व और कोई आशा है तो वहाँ भटकोगे। पतंगे का आस-विश्वास-भरोसा दीपज्योति के मजे पर है तो उसे क्या मिलता है ? परिणाम क्या आता है ? जल मरता है ।

मत कर रे गुमान, गुलाबी रंग उड़ी जावेलो।

इस बाहर के सौंदर्य पर, बाहर के धन पर, बाहर के प्रमाणपत्रों पर आस, विश्वास, भरोसा न रख, उस अंतर्यामी परमात्मा पर आस, विश्वास भरोसा कर। तू तो तर जायेगा, तू तो ‘उस’ मय हो जायेगा और तेरे सम्पर्क में आने वाले भी तर जायेंगे।

एक आस, एक भरोसा, एक विश्वास…. परमात्मा के ज्ञान में ही रहना और दूसरों को लगाना, आप प्रसन्न रहना और दूसरों को प्रसन्न करना – इस ईश्वरीय सिद्धान्त में रहे।

यह संसार तो ऐसा है, आप झूठ का मिथ्या आरोप का, कपट का आश्रय लेते हैं, उस पर विश्वास रखते हैं तो देर सवेर बेड़ा गर्क होता है परंतु सत्य का आश्रय लेते हैं, सत्यस्वरूप ईश्वर पर विश्वास रखते हैं, भरोसा रखते हैं तो आपकी नाव डोलेगी तो सही लेकिन डूबेगी नहीं। अगर वह डुबाकर भी पूरा वचन करना चाहता है तो आपको दिव्य जीवन देने की उसकी व्यवस्था होगी क्योंकि अपने उसका भरोसा किया है। उसकी आस, उस पर विश्वास किया है। एक आस, एक भरोसा, एक विश्वास बस !

यह मत सोचो कि क्या खायेंगे, क्या होगा ? जब उसके लिए चल पड़े तो फिर क्या है !

अखण्डानंद जी चल पड़े थे, उड़िया बाबा चल पड़े थे। जहाँ किसी व्यक्ति की संभावना नहीं, वहाँ भी कोई न कोई आकर दे जाता, खिला जाता है। मार्ग भूलते हैं तो कोई रास्ता दिखा जाता है। कोई डूबने लगता है और उसी की आस, उसी का भरोसा रखकर पुकारता है तो उस जल में कौन सी ऐसी सत्ता है जो हाथ पकड़कर किनारे पर देती है ?

कर्तुं शक्यं अकर्तुं शक्यं अन्यथा कर्तुं शक्यम्।

उस परमात्मा की आस, भरोसा और विश्वास परम हितकारी, परम मंगलमय है। इसका मतलब यह नहीं कि अपना पुरुषार्थ छोड़ दें, चलो बैठे रहें। नहीं, पुरुषार्थ करें किंतु अपने अहं पर भरोसा करके पुरुषार्थ न करें, शाश्वत आत्मा-परमात्मा का भरोसा…. नश्वर का भरोसा, नश्वर की आस, नश्वर का विश्वास नाश की तरफ ले जाता है। शाश्वत आत्मा-परमात्मा का भरोसा, उसी को पाने की आस और उसी पर विश्वास उसी से मिला देता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2010, पृष्ठ संख्या 2,3,4,8. अंक 210.

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ