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आत्मबल ही जीवन है


(पूज्य बापू जी के सत्संग प्रवचन से)

रोग प्रतिकारक शक्ति कमजोर होती है तभी रोग पकड़ते हैं, विकार-प्रतिकारक शक्ति कमजोर होती है तभी विकार हावी होते हैं, चिंता को कुचलने के शक्ति कमजोर होती है तभी चिंता हावी हो जाती है। जैसे दुर्बल शरीर को बीमारियाँ घेर लेती हैं, ऐसे ही दुर्बल विचारशक्तिवाले को तरह-तरह के लोफर आ-आकर घेर लेते हैं। सबल जो भी करता है और उसके द्वारा जो भी होता है, उसके लिए तो ढोल-नगारे बजते हैं और दुर्बल जो करता है उसके लिए वह स्वयं तो असफल होता है, ऊपर से लानत भी पाता है। सबल वे हैं जिन्होंने काम-क्रोध आदि लोफरों को जीतकर अपने-आप में स्थिति पा ली है और निर्बल वे हैं जो इन लोफरों से पराजित होते रहते हैं।

भगवान ने कहा हैः नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः। बलहीन को आत्मा-परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती। बलवान बनो, वीर्यवान बनो। परिस्थिति चाहे कितनी ही विषम क्यों न आ जाय, निर्भयता के साथ अपने कर्तव्य-मार्ग पर आगे बढ़ते जाओ। न गुंडे बनो, न गुंडागर्दी चलने दो। न दुष्ट बनो, न दुष्टों के आगे घुटने टेको। दुर्बलता छोड़ो, हीन विचारों को तिलांजली दो। उठो…. जागो…

परमदेव परमात्मा कहीं आकाश में, किसी जंगल, गुफा या मंदिर-मस्जिद-चर्च में नहीं बैठा है। वह चैतन्यदेव आपके हृदय में ही स्थित है। वह कहीं को नहीं गया है कि उसे खोजने जाना पड़े। केवल उसको जान लेना है। परमात्मा को जानने के लिए किसी भी अनुकूलता की आस मत करो। संसारी तुच्छ विषयों की माँग मत करो। विषयों की माँग कोई भी हो, तुम्हें दीन हीन बना देगी। विषयों की दीनतावालों को भगवान नहीं मिलते। इसलिए भगवान की पूजा करनी हो तो भगवान बन कर करो। देवो भूत्वा यजेद् देवम्। जैसे भगवान निर्वासनिक हैं, निर्भय हैं, आनंदस्वरूप है, ऐसे तुम भी निर्वासनिक और निर्भय होकर आनंद, शांति तथा पूर्ण आत्मबल के साथ उनकी उपासना करो कि ‘मैं जैसा-तैसा भी हूँ भगवान का हूँ और भगवान मेरे हैं और वे सर्वज्ञ हैं, सर्वसमर्थ हैं तथा दयालु भी हैं तो मुझे भय किस बात का !’ ऐसा करके निश्चिंत नारायण में विश्रांति पाते जाओ।

बल ही जीवन है, निर्बलता ही मौत है। शरीर का स्वास्थ्यबल यह है कि बीमारी जल्दी न लगे। मन का स्वास्थ्य बल यह है कि विकार हमें जल्दी न गिरायें। बुद्धि का स्वास्थ्य बल है कि इस जगत के माया जाल को, सपने को हम सच्चा मानकर आत्मा का अनादर न करें। ‘आत्मा सच्चा है, ‘मैं’ जहाँ से स्फुरित होता है वह चैतन्य सत्य है। भय, चिंता, दुःख, शोक ये सब मिथ्या हैं, जाने वाले हैं लेकिन सत्-चित्-आनंदस्वरूप आत्मा ‘मैं’ सत्य हूँ सदा रहने वाला हूँ’ – इस तरह अपने ‘मैं’ स्वभाव की उपासना करो। श्वासोच्छवास की गिनती करो और यह पक्का करो कि ‘मैं चैतन्य आत्मा हूँ।’ इससे आपका आत्मबल बढ़ेगा, एक एक करके सारी मुसीबतें दूर होती जायेंगी।

घर का आदमी भी अगर यह साधना करेगा तो पूरे परिवार में बरकत आयेगी। अगर एक भी बंदा यह साधना करता है तो दूसरे लोगों को भी फायदा होता है और यहाँ का फायदा तो बहुत छोटी बात है, परमात्मप्राप्ति का, मोक्षप्राप्ति का फायदा बहुत ऊँची बात है, वह भी सुलभ हो जाता है।

आत्मा तो सभी का बहुत महान है लेकिन भिखारियों की दोस्ती ने आदमी को भिखारी बना दिया है। जैसे राजाधिराज सम्राट घर में आया है तो उसका अपमान किया और भिखारियों के पास जाकर जश्न मनाता है तो वह व्यक्ति अपनी ही इज्जत गँवाता है। ऐसे ही ये विकार भिखमंगे हैं। नाक से, आँख से मजा लिया, जीभ से स्वाद लेकर मजा लिया, ये सारे मजे जो हैं वे मनुष्य को आत्मा से नीचे गिरा देते हैं।

शरीर में 22 मुख्य नाड़ियाँ हैं। ऐसे तो करोड़ों हैं। उनमें 22वीं नाड़ी है ‘ब्रह्मनाड़ी’। ब्रह्मचर्य का पालन करने से वह मजबूत होती है और उसी में ब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार होता है, ध्यान होता है। संयम आदि करके एक बार ब्रह्म परमात्मा का स्वाद ले लिया, जैसे एक बार दही मथकर मक्खन निकाल लिया फिर मक्खन को छाछ में फेंको तो भी तैरेगा। शादी हो जाये फिर भी संयम करके ब्रह्मनाड़ी को मजबूत बना के एक बार ईश्वरप्राप्ति कर ले, फिर उसको लेप नहीं चाहे वह कहीं भी रहे – ब्रह्मज्ञानी सदा निर्लेपा।

एक बार अमृत चख लिया फिर लफंगों के साथ रहे तो भी कोई फर्क नहीं। लफंगे सुधरेंगे, उसको कोई फर्क नहीं पड़ेगा। राष्ट्रपति चपरासियों के पास बैठे तो क्या है, चपरासी थोड़े ही हो जायेगा ! ऐसे ही ब्रह्मज्ञान हो गया, ईश्वरप्राप्ति हो गयी फिर चाहे कहीं रहे।

समर्थ को नहीं दोष गुसाईं।

एक बार समर्थ हो जाओ, ईश्वरप्राप्ति कर लो बस। उसके पहले अगर संसार में गिरे तो फिर तौबा है। नास्तिक तो दुःखी है लेकिन आस्तिक भी वास्तविक ज्ञान के अभाव में चक्कर काटते हैं। आत्मा में चित्त लगाया तो आत्मा तो परमात्मा है, आपकी शक्ति बढ़ जायेगी और लोफरों से चित्त लगाया तो आपकी शक्ति कम हो जायेगी।

काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, चिंता, शोक ये लोफर हैं, आने जाने वाले हैं लेकिन आप सदा रहने वाले हैं। तो आप शुद्ध हैं ये अशुद्ध हैं, आप नित्य हैं ये अनित्य हैं। नित्य नित्य से प्रीति करे। बेईमानी अनित्य है, आत्मा नित्य है। तो बेईमानी करके आत्मा के ऊपर पर्दा क्यों डालें !

सत्य समान तप नहीं, झूठ समान नहीं पाप।

कपट-बेईमानी करके, विकारों को महत्त्व देकर जीव तुच्छ हो जाता है। सच्चाई से साधन-भजन करे। एकलव्य की नाईं गुरुमूर्ति या भगवान को एकटक देखते हुए कम से कम दस मिनट ‘हरि ॐ’ का लम्बा उच्चारण करे। फिर गुरुमंत्र का जप करते हुए त्रिबन्धयुक्त प्राणायाम करे तो तुच्छ से तुच्छ आदमी भी महान हो जायेगा। गुरु की प्रतिमा से प्रकाश आने लगता है, गुरु प्रकट हो जाते हैं। सपने में बातचीत होने लगती है, प्रेरणा देने लगते हैं। लोफरों से छुटकारा मिलने लगता है। अंतर्यात्रा शुरु हो जाती है, जीवन रसमय होने लगता है। साधक का हृदय प्रभु के प्रसाद से, आत्मबल से सम्पन्न हो जाता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2010, पृष्ठ संख्या 24, 25 अंक 207

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आपका भाव कैसा है ?


(पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)

आप भगवान का स्मरण करोगे तो भगवान आपका स्मरण करेंगे क्योंकि वे चैतन्यस्वरूप हैं। आप पैसों का, बँगले का स्मरण करोगे तो जड़ पैसों का, बँगले का स्मरण करोगे तो जड़ पैसों को, जड़ बँगले को पता नहीं है कि आप उनका स्मरण कर रहे हो। आप गाड़ी का स्मरण करोगे तो वह अपने-आप नहीं मिलेगी लेकिन भगवान का स्मरण करोगे तो वे स्वयं आकर मिलेंगे। शबरी ने भगवान का स्मरण किया तो वे पूछते-पूछते शबरी के द्वार पर आ गये। भावग्रही जनार्दनः….. मीरा ने स्मरण किया तो जहर अमृत हो गया। वह हृदयेश्वर आपके भाव के अनुसार किसी भी रूप में कहीं भी मिलने में सक्षम है, अगर सोऽहंस्वरूप में मिलना चाहो तो सोऽहंस्वरूप में भी अपना अनुभव कराने में समर्थ है। केवल अपनी बुद्धि में उसके प्रति भाव होना चाहिए। देवी देवता का, मूर्ति का आदर-पूजन, माता-पिता अथवा गुरु का आदर-पूजन यह हमारी बुद्धि में भगवदभाव को, भगवदज्ञान को, भगवदरस को प्रकट करने का मार्ग है।

भाव की बड़ी महिमा है। मान लो, एक सुपारी है। एक को उसे खाने का भाव है, दूसरे को उससे कमाने का भाव है, तीसरे को उसे पूजने का भाव है। तो फायदा किसने लिया ? खाने वाले ने, कमाने वाले ने कि पूजने वाले ने ? सुपारी तो जड़ है, प्रकृति की चीज है, उसमें भगवदबुद्धि करने से भगवदभाव पैदा होता है और खाने की भावना करते हैं तो तुच्छ लाभ होता है। बेचकर कमाने की भावना करते हैं तो ज्यादा लाभ होता है लेकिन उसमें गणेश जी का भाव करके पूजा करते हैं तो और ज्यादा लाभ होता है। सुपारी तो वही-की-वही है परंतु खाना है तो भोग, कमाना है तो लोभ और पूज्यभाव, भगवदभाव है तो भगवदरस देके भगवान के समीप कर देगी। अब सुपारी को खाके मजा लो, बेचके मजा लो या उसका पूजन करके मजा लो तुम्हारी मर्जी।  खाके मजा लिया तो भोगी, बेचके मजा लिया तो लोभी और सुपारी में गणपति-बुद्धि की तो आप उपासक हो गये, भक्त हो गये और सुपारी का तत्त्व जान के अपना तत्त्व और सुपारी का तत्त्व एकमेव अद्वितीयं कर दिया तो हो गये ब्रह्म !

ऐसे ही अगर आप गुरु से संसारी फायदा लेते हैं तो यह भोगबुद्धि हुई लेकिन गुरु चिन्मय हैं, दिव्य हैं, ब्रह्मस्वरूप हैं, ज्ञानस्वरूप हैं, तारणहार हैं, व्यापक हैं, सबके अंतरात्मा, भूतात्मस्वरूप हैं, प्राणिमात्र के हितैषी हैं, सुहृद हैं – ऐसा अहोभाव करते हैं और उनके वचनों में विश्वास करते हैं, उनके अनुसार चलते हैं तो कितना फायदा होता है !

आप सुपारी में गणपति का भाव करो तो सुपारी उसी समय आपके लिए ऐसा भाव नहीं कर सकती कि ‘यह मुक्तात्मा हो जाय, चिंतारहित हो जाये…।’ ऐसा सोचकर सुपारी उपदेश नहीं देगी। आपके अपने भाव के अनुसार अंतःकरण की वृत्ति बनेगी लेकिन गुरू के प्रति भगवदभाव, ब्रह्मभाव, अहोभाव करोगे तो गुरूदेव के अंतःकरण से भी आपके उद्धार के लिए शुभ संकल्प की, विशेष कृपा की वर्षा होने लगेगी, उनके द्वारा ऊँचा सत्संग मिलेगा, आनंद-आनंद हो जायेगा। सुपारी वही की वही लेकिन नजरिया बदलने से लाभ बदल जाता है। गुरु वही के वही लेकिन नजरिया बदलने से लाभ बदल जाता है।

कर्मों में भी अलग-अलग भाव अलग-अलग फल देते हैं। जहाँ राग से, द्वेष से सोचा जाता है, वहाँ कर्म बंधनकारक हो जाता है। जहाँ करने का राग मिटाने के लिए सबकी भलाई के, हित के भाव से सोचा और किया जाता है, वहाँ कर्म बंधन से छुड़ाने वाला  हो जाता है। जैसे कोई दुष्ट है, धर्म का, संस्कृति का, मानवता का हनन कर-करके अपना कर्मबन्धन बढ़ाने वाले दुष्कर्म में लिप्त है और न्यायाधीश उसकी भलाई के भाव से उसे फाँसी देता है तो न्यायाधीश को पुण्य होता है। ‘हे प्रभु जी ! अब इस शरीर में यह सुधरेगा नहीं, इसलिए मैं इसे फाँसी दे दूँ यह आपकी सेवा है’ – इस भाव से अगर न्यायाधीश फाँसी देता है तो उसका अंतःकरण ऊँचा हो जाता हो जायेगा लेकिन ‘यह फलाने पक्ष का है, अपने पक्ष का नहीं है…. इसलिए फाँसी दे दो’ – ऐसा भाव है तो फिर न्यायाधीश का फाँसी देना अथवा सजा देना बंधन हो जायेगा।

आपके कर्मों में हित की भावना है, समता है तो आपके कर्म आपको बंधनों से मुक्त करते जायेंगे। अगर स्वार्थ, अधिकार और सत्ता पाने की या द्वेष की भावना है तो आपके कर्म से किसी को लाभ मिलता है तो अपनी संसार का आसक्ति मिटती है, दूसरे की भलाई का, हृदय की उदारता का आनंद आता है लेकिन दूसरे का हक छीना तो संसार की आसक्ति और कर्मबन्धन बढ़ता है।

आप जैसा देते हैं वैसा ही आपको वापस मिल जाता है। आप जो भी दो, जिसे भी दो भगवदभाव से, प्रेम से और श्रद्धा से दो। हर कार्य को ईश्वर का कार्य समझकर प्रेम से करो, सबमें परमेश्वर के दर्शन करो तो आपका हर कार्य भगवान का भजन हो जायेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2010, पृष्ठ संख्या 17,18 अंक 206

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भ्रांति में न आना, निष्ठा निभाना


महामंडलेश्वर आचार्य 1008 स्वामी श्री परमात्मानंदजी महाराज, वृन्दावन

महान संत आसाराम बापू जी को हम सच्चा कुंदन समझते हैं, उनको सच्चा पारसमणि समझते हैं। हमने उनको नजदीक से देखा है, कम से कम 50 साल से देखते आ रहे हैं। ऐसा संत इस विश्व में न भूतो न भविष्यति। उन पर ये चाण्डाल-चाण्डाल लोग जो दोषारोपण कर रहे हैं वह सम्पूर्णतया मिथ्या है। थोड़े दिन के अंदर दूध का दूध पानी का पानी हो जायेगा। हमारे आसारामजी बापू महाराज निर्दोष थे, निर्दोष हैं और निर्दोष ही रहेंगे। आप किसी भ्रांति में नहीं आना, किसी अज्ञानता में न आना, किसी के षडयंत्र में नहीं आना बल्कि अपनी श्रद्धा, अपना विश्वास, अपनी आस्था, अपनी निष्ठा प्राणपण से निभाना।

देखिये, जो सत्य होता है उसके लिए कोई क्रियाएँ नहीं करनी पड़तीं लेकिन जो झूठ होता है उसके लिए सौ-सौ षडयंत्र करने पड़ते हैं। दो और दो चार, यह सत्य है लेकिन दो और दो चार को पाँच बनाने के लिए चेष्टा करनी पड़ेगी, षडयंत्र करना पड़ेगा और फिर भी कभी-न-कभी पोल खुल ही जायेगी।

जो समाज के शरीर को कष्ट देना चाहता है वह शासक नहीं होता, शासक वह होता है जो समाज के हृदय में बैठ जाय। राष्ट्र के सही नियामक, सही प्रशासक तो बापू आसारामजी जैसे संत हैं, जो समाज को शांति दे रहे हैं। सच्चा शासन तो संत करते हैं।

शासन करने में रावण भी बड़ा प्रभावशाली था, राम भी बड़े प्रभावशाली थे लेकिन याद रखना, रावण में एक चीज़ थी और राम में दूसरी चीज़ थी जो हमारे संतों में है। रावण में प्रभाव था लेकिन ‘स्व’ भाव नहीं था और राम में प्रभाव भी था और ‘स्व’ भाव भी था इसलिए सारे राष्ट्र में राम जी के प्रति पूज्यभाव है।

हमारे आसारामजी बापू में प्रभाव भी है, सारा विश्व जानता है और ‘स्व’ भाव भी है, आत्मीय भाव भी है, नहीं तो उनके लिए यहाँ बैठते इतने संत-महापुरूष, भक्त ! भाव से आये हैं। जैसा भाव तुम्हारे हृदय में होगा वैसा ही तुम्हारा संसार बनेगा। यह भाव तन में आ जाय तो दान बन जाता है, पाँव में आ जाये तो नृत्य बन जाता है, वाणी में आ जाय तो प्रेमाश्रु बन जाता है, होठों में आ जाय तो मुस्कराहट बन जाता है। यही भाव हृदय में आ जाय तो प्रेम बन जाता है और आसारामजी जैसे साधु-संतों और गुरुओं के प्रति हो जाय तो श्रद्धा बन जाता है और वहाँ दृढ़ हो जाये तो भगवान से एकाकार करने वाली परम आनंददायिनी भक्ति बन जाता है।

कुछ विषधर साँपों ने समाज की संस्कृति को हड़पने का षडयंत्र किया है, सँभल जाना। ये संत समाज की शांति है, समाज का विश्वास है, राष्ट्र की अमानत है, राष्ट्र के मनीषी हैं, राष्ट्र का धर्म हैं, राष्ट्र के भगवान हैं और इनकी रक्षा करना हमारा धर्म है। धर्मो रक्षति रक्षितः। तुम धर्म की रक्षा करो, धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2010, पृष्ठ संख्या 7

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