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कल्याणकारी छः बातें


पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से

परमात्मदेव का ज्ञान, परमात्मदेव की प्रीति, परमात्मदेव में विश्रांति मिले ऐसे कर्म, ऐसा चिंतन, ऐसा संग, ऐसे शास्त्रों का अध्ययन करना, ऐसा भाव बनाना पुरुषार्थ है और इसके विपरीत करना प्रमाद है । प्रमाद मौत की खाई में गिराता है । बार-बार जन्मो, बार-बार मरो, बार-बार माँ की कोख में फँसो… इस प्रकार न जाने कितने जन्म बीत गये, कितने माँ-बाप, कितने मित्र, कुटुम्बी छोड़के आये हो । तो अब यह जीवन विफल न हो इसलिए इन छः बातों का याद रखें-

1 अपना लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए ।

2 अपने जीवन में उत्साह बना रहे ।

3 भगवान में, अपने-आप में श्रद्धा बनी रहे ।

4 किस पर भरोसा करें, किस पर नहीं ? सावधान रहें ।

5 जीवन में धर्म होना चाहिए ।

6 अपनी अंतिम यात्रा कैसी हो ?

एक तो अपने लक्ष्य का निश्चय कर लें, अपना लक्ष्य ऊँचा बना लें । दो प्रकार के लक्ष्य होते हैं- एक होता है वास्तविक लक्ष्य, दूसरा होता है अवांतर लक्ष्य । परम सुख, परम ज्ञान, परम मुक्त अवस्था को पाना, आत्मा-परमात्मा का ज्ञान पाना यह वास्तविक लक्ष्य है । खाना-पीना, कमाना और इनके सहायक कर्म यह अवांतर लक्ष्य है । किसी से पूछा जाय कि ‘आपके जीवन का उद्देश्य क्या है ?’ तो बोलेंगे- ‘मैं वकील बनूँ, मैं सेठ बनूँ….’ नहीं, यह जीवन का वास्तविक उद्देश्य नहीं है, जीवन का वास्तविक उद्देश्य है शाश्वत सुख पाना और उसके सहायक सब कर्म साधन हैं ।

कुछ लोग लक्ष्य बना लेते हैं, ‘मैं डॉक्टर बनूँगा ।’ डॉक्टर बन गया बस । यह क्या लक्ष्य है ! यह तो मजूरी है । यदि तुमने वकील बनने का लक्ष्य बना लिया तो यह तो अवांतर लक्ष्य है बेटे ! मुख्य लक्ष्य है अपने आत्मा-परमात्मा को पाकर सदा के लिए दुःखों, कष्टों, चिंताओं से मुक्त हो जाना । फिर भी शरीर रहेगा तब तक ये दुःख, कष्ट आयेंगे लेकिन आप तक नहीं पहुँचेंगे, आप  अपने पृथक परमेश्वर स्वभाव में, अमर पद में प्रतिष्ठित रहोगे । तो ऐसे लक्ष्य का निश्चय कर लो ।

दूसरी बात है मन में उत्साह बना रहे । उत्साह का मतलब है सफलता, उन्नति, लाभ और आदर के समय चित्त में काम करने का जैसा जोश, तत्परता, बल बना रहता है, ठीक ऐसा ही प्रतिकूल परिस्थिति में बना रहे । जिसका उत्साह टूटा, मानो उसका जीवन सफल हो गया । उत्साहहीन जीवन व्यर्थ है ।

उत्साहसमन्वितः…. कर्ता सात्त्विक उच्यते ।

‘उत्साह से युक्त कर्ता सात्त्विक कहा जाता है ।’ (भगवद्गीताः 18.26)

जो काम करें उत्साह से करें, तत्परता से करें, लापरवाही न बरतें । उत्साह से काम करने से योग्यता बढ़ती है, आनंद आता है । उत्साहहीन होकर काम करने से कार्य बोझ बन जाता है ।

उत्साह बिनु जो कार्य हो, पूरा कभी होता नहीं ।

उत्साह होता है जहाँ, होती सफलता है वहीं ।

उत्साह न छोड़ें और लापरवाही न करें, जीवन में धैर्य रखें ।

तीसरी बात है ईश्वर पर और अपने पर भरोसा रखें । ऊँचे लोगों पर भरोसा रखें । ऊँचे-में-ऊँचे हैं परमात्मा, जो परमात्मा के नाते जीवनयापन करते है ऐसे लोगों की बातो पर दृढ़ विश्वास रखें ।

चौथी बात है किस पर कितना विश्वास रखें, किस पर न रखें ? कर्म करने में, विचार करने में, संग करने में, विश्वास करने में सावधान रहें । किसकी बात पर विश्वास करें ? जो स्वार्थी हैं, द्वेषी हैं, निंदक हैं, कृतघ्न है, बेईमान हैं उनकी बातों पर विश्वास करें कि जो भगवान के रास्ते चल रहे हैं, भगवत्सुख में हैं, भगवद्ज्ञान में है, ‘बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय’ जिनका जीवन है उनकी बातों प ? किसका संग करना चाहिए और किसके संग से बचना चाहिए ? जो बहिर्मुख हैं, झगड़ालू हैं, विषय विकारों में पड़ रहे हैं, निंदक हैं उनसे बचें । जो अपने सजातीय हैं अर्थात् भगवान के रास्ते हैं, प्रीति में हैं, ज्ञान में हैं उनका संग करें, उनकी बातों में श्रद्धा करें । श्रद्धावान के संग से श्रद्धा निखरती है, साधक के संग से साधना निखरती है और शराबी के संग से जुआरीपना आता है तो हमको क्या चाहिए उसी प्रकार का ऊँचा संग करें ।

‘श्री योगवासिष्ठ महारामायण’ में वसिष्ठजी महाराज कहते हैं कि अच्छा संग करना चाहिए, अपने अंतःकरण का शोधन हो ऐसा संग करना चाहिए, सत्शास्त्रों का आश्रय लेना चाहिए । संतजनों का संग करके संसार-सागर से तरने का उपाय करना चाहिए अर्थात् आसुरी वृत्तियों से बचना चाहिए । जो हमारा समय, शक्ति, बुद्धि, जीवन खराब कर दें ऐसे संग से, ऐसे भोगों से ऐसे चिंतन से, ऐसे साहित्य से बचकर श्रेष्ठ साहित्य, श्रेष्ठ संग, श्रेष्ठ चिंतन और श्रेष्ठ में श्रेष्ठ परमात्मा की बार-बार स्मृति करके उसमें गोता मारने का अभ्यास कर दो तो अंत में जीवन भगवान से मिलाने वाला हो जायेगा ।

पाँचवी बात है जीवन में धर्म का नियंत्रण हो । जीवन में धर्म का नियंत्रण होगा तो अनुचित कार्यों पर रोक लग जायेगी और उचित होने लगेगा, अऩुचित में समय-शक्ति बर्बाद नहीं होगी । आप अनुचित नहीं करते तो लोग आपको बदनाम करने की साजिशें रचकर आपकी निंदा करवाते हों फिर भी आपके अंतःकरण में खलबली नहीं मचेगी । आपके जीवन में धर्म है, आपके जीवन में परोपकार, है, आपकी बुद्धि भगवत्प्रसादजा है तो आपका कुप्रचार करने वाले थक जायें, फिर भी आपका बाल बाँका नहीं होगा । जीवन में धर्म का फल है कि हर परिस्थिति में हम सम रहें । जैसे धर्मराज युधिष्ठिर को दुर्योधन ने कितना कष्ट दिया लेकिन धर्मराज का बाल बाँका नहीं हुआ ।

छठी बात है अपनी अंतिम यात्रा कैसी हो ? आखिर में कैसे मरना है यह याद रहे, मरना तो पड़ेगा ही । चिंता लेकर मरना है, तड़पते हुए मरना है, अधूरा काम छोड़कर मरना है, कुछ पाते-पाते या छोड़ते-छोड़ते मरना है, भय लेकर मरना है अथवा वासना के जाल में छटपटाते हुए मरकर बाद में कई जन्मों में भटकना पड़े ऐसे मरना है ? नहीं ! निश्चिंत होकर, पूर्णकाम होकर, आप्तकाम होकर मरना है । कोई इच्छा, कोई वासना न रहे, हमारे जीवन का उद्देश्य पूर्ण हो जाय बस ।

पूर्ण गुरु किरपा मिली, पूर्ण गुरु का ज्ञान ।…..

तो वैसा अभ्यास और वैसी यात्रा रोज करते रहना चाहिए । इससे जीवन निर्भार रहेगा, निर्दुःख रहेगा । इस जीवन को अपने पूर्ण तत्त्व का अनुभव करने वाला जीवन बनाना चाहिए ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2009, पृष्ठ संख्या 2,3 अंक 196

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आत्महत्याः कायरता की पराकाष्ठा


पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से

मृत्यु एक ईश्वरीय वरदान है, फिर भी यदि कोई आत्महत्या करता है तो वह महापाप है । परमात्मा ने हमें यह अमूल्य मानव चोला दिया है तो हमारा कर्तव्य है कि हम इसे साफ सुथरा रखें, इसे स्वस्थ-तन्दुरुस्त रखें । ऐसा नहीं कि मृत्यु जरूरी है तो अनाप-शनाप खाकर मौत को आमंत्रण दें, आत्महत्या करें । यद्यपि कपड़ा मैला होता है, गलता है, फटता है लेकिन उसे जानबूझकर फाड़ देना तो बेवकूफी है । ऐसे ही शरीर बूढ़ा होता है, बीमार होता है, मरता है – यह प्रकृति की व्यवस्था है, शरीर को जानबूझकर मौत के मुँह में धकेलना ठीक नहीं ।

कुछ विद्यार्थी जो परीक्षा में विफल हो जाते हैं, व्यापारी जो बाजार की मंदी की चपेट में आ जाते हैं उनमें से कमजोर मनवाले कई घबरा के अथवा चिंता-तनाव से घिर के आत्महत्या कर लेते हैं । ऐसे लोगों को चाहिए कि वे कभी नकारात्मक न सोचें, पलायनवादिता के या हलके विचार न करें । असफल हो जायें तब भी भागने के या आत्महत्या के विचार न करें, फिर से पुरुषार्थ करें तो अवश्य सफल होंगे ।

मनुष्य का जीवन कुदरत ने ऐसा लचीला बनाया है कि वह जितनी चाहते उतनी उन्नति कर सकता है । कठिन से कठिन परिस्थिति से जूझकर, दुःख-मुसीबतों और विघ्न बाधाओं के सिर पर पैर रखकर परम पद तक पहुँच सकता है । बस, उस योग्यता का पता चल जाय, उस योग्यता पर पूरा विश्वास हो जाय ।

भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई । जिसके भौंह के इशारे मात्र से सृष्टि का प्रलय हो जाता है, ऐसा सर्वसमर्थ परब्रह्म परमात्मा तुम्हारा सखा होकर बैठा है और जरा सी मंदी आयी तो तुम फाँसी लगाकर मर गये, खेत-खली में जरा सी गड़बड़ हुई और तुम आत्महत्या करने लगे, क्या तुच्छ बुद्धि है ! धिक्कार है आत्महत्या करने वालों को ! ऐसे लोगों को हिजड़ा कहेंगे तो हिजड़े नाराज हो जायेंगे । बोलेंगेः ‘बाबा ! हम कहाँ आत्महत्या करते हैं ? हम तो चुनाव लड़कर राज्य भी कर लेते हैं । हमारा नाम ऐसे लोगों को क्यों देते हो ?’ ऐसे लोगों को गधा कह दें तो गधे भी नाराज हो जायेंगे । बोलेंगे- “बाबा ! हमने कहाँ आत्महत्या की ? हम तो डंडे सहते हैं, सर्दी-गर्मी सहते हैं, दुःख सहते हैं । खाने को मिला न मिला तो भी चुप्पी रखकर दूसरे दिन बोझा उठाते हैं, फिर भी हम कभी आत्महत्या नहीं करते ।’ आत्महत्यारे को कुत्ता बोलें तो कुत्ता बोलेगाः ‘हम भूख-प्यास फटकार सहते रहते हैं, डंडे पत्थर सहते हैं फिर भी आत्महत्या नहीं करते । हमें कहीं पूँछ दबानी पड़ती है, कहीं हिलानी पड़ती है लेकिन हम तो जी रहे हैं ।’ तो आत्महत्यारों को कुत्ता बोलोगे तो कुत्तों की बदनामी होगी । जो आत्महत्या करते हैं उनको गधा कहो, कुत्ता कहो, हिजड़ा कहो तो ये सब नाराज हो जायेंगे ।

मनुष्य विषय-विलास, शराब-कबाब और डिस्को करके पिशाच-सा जीवन जीकर मरने को नहीं आया है । आत्महत्या करनी भोगी और कायर मन की पहचान है । सत्कर्म, सदगुरुओं का सान्निध्य-सेवन और आत्मसाक्षात्कार करके मुक्त होना यह साधक, भक्त और योगी मन की पहचान है ।

नासमझ लोग क्या करते हैं ? जरा सा दुःख पड़ता है तो दुःख देने वाले पर लांछन लगाते हैं, परिस्थितियों को दोष देते हं अथवा अपने को पापी समझकर अपने को ही कोसते हैं । कुछ कायर तो आत्महत्या करने तक का सोच लेते हैं । कुछ पवित्र होंगे तो किन्हीं संत-महात्मा के पास जाकर दुःख से मुक्ति पाते हैं ।

जो गुरुओं के द्वार पर जाते हैं उनको कसौटियों से पार होने की कुंजियाँ सहज में ही मिल जाती हैं । इससे उनके दोनों हाथों में लड्डू होते हैं । एक तो संत-सान्निध्य से हृदय की तपन शांत होती है, समस्या का हल मिलता है, साथ ही साथ जीवन को नयी दिशा भी मिलती है ।

मानव को किसी भी परिस्थिति में आत्महत्या का विचार नहीं करना चाहिए तथा अपने मन को दुःखी होने से बचाना चाहिए । दुनिया में जो भी दुःख है वह अज्ञान का फल है, नासमझी का ही फल है । जहाँ-जहाँ दुःख है, वहाँ-वहाँ नासमझी है । बिना नासमझी के दुःख टिक नहीं सकता, हो नहीं सकता । शरीर की बीमारी को अपनी बीमारी मानते हैं यह बेवकूफी है । नश्वर सफलता को अपनी सफलता मानते हैं, नश्वर विफलता को अपनी विफलता मानते हैं, अपने-आपको शरीर मानते हैं और जो छूट जाने वाली हैं उन चीजों को मेरी मानते हैं । यह अज्ञान है कि नहीं है ? मरने के बाद भी  जो रहेगा उसको नहीं जानते और जो मन जाने वाला है उसको मैं मानते हैं । बेवकूफी है कि नहीं है ?

छोटे-मोटे नहीं, गेटे जैसे विद्वान भी कभी आत्महत्या का विचार कर लेते हैं परंतु डर के मारे कर नहीं पाते । कई विद्वान भी आत्महत्या कर लेते हैं क्योंकि वेदव्यास जी का ज्ञान नहीं है । नहीं तो एक कुत्ता जिसकी टाँग कटी है, पूँछ कटी है, शरीर में घाव पड़े हैं उसको कोई मारने जाय तो अपने जीवन की रक्षा के लिए सब प्रयत्न करेगा और आज का मानव आत्महत्या कर लेता है, कितनी बेवकूफी है ! यह बरसात के पतंगे हैं न, दीये में आते हैं और अंग जल जाते हैं, फरफराते हैं, फिर भी आप उनको मारने की कोशिश करो तो बचने के लिए वे भी छटपटायेंगे, वहाँ से भागेंगे ।

जीवनदाता ने जीवन दिया है तो अपनी तरफ से उसको बचाने का सब प्रयत्न करना चाहिए । जो आत्महत्या करते हैं उनको कई वर्षों तक शरीर नहीं मिलता और भटकते रहते हैं । जो आत्महत्या करके मर गया, उसको कंधा देने वाले को भी हानि होती है, दुःख उठाना पड़ता है । ‘पाराशर स्मृति’ व ‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ में तो यहाँ तक लिखा गया है कि जिसने आत्महत्या की उसने प्रकृति की, ईश्वर की दी हुई शरीर रूपी सौगात से खिलवाड़ किया है, उसका अपमान किया है, उस अभागे को कंधा मत दो । किसी गंदगी उठाने वाले को बोलो कि उसका शव रस्सी से बाँधकर मार्ग से घसीटता हुआ ले जाय, ताकि उसको देखकर दूसरा ऐसी बेवकूफी न करे ।

आप सत्य का, ईश्वर का आश्रय लीजिये और परिस्थितियों के प्रभाव से बचिये । जो लोग परिस्थितियों को सत्य मानते हैं वे उनसे घबराकर कभी आत्महत्या की बात भी सोचते करते हैं, यह बहुत बड़ा अपराध है ।

मैंने सूरत में सत्संग किया (दिसम्बर 2008 में) तब आर्थिक मंदी की चपेट में आये रत्न-कलाकारों को संदेश दिया कि जो मुसीबत में आकर आत्महत्या करने का विचार करते हैं उन्हें चाहिए कि अपनी दैन्य अवस्था का, लाचारी का तो पता चल गया, अब भगवान के सामर्थ्य का थोड़ा चिंतन करो और कमरा बंद करके भगवान को आर्त भाव से प्रार्थना करो, आँसू बहाओः ‘भगवान ! मैं कुटुम्ब का पालन नहीं कर सकता हूँ और आप सर्वसमर्थ हो…’ ऐसी प्रार्थना करते-करते भगवान को दंडवत प्रणाम करके लेट जाओ, भगवान के गले पड़ जाओ । अपनी तरफ से पुरुषार्थ में कमी न करो लेकिन जब आत्महत्या करने की नौबत आ रही है तो अहं का विसर्जन करो । उसी समय नहीं तो एकाध दिन में रास्ता निकल आयेगा ।

रात अँधियारी हो, काली घटायें छायी हों ।

मंजिल तेरी दूर हो, हर तरफ से मजबूर हों ।।

फिर क्या करोगे ?

अच्युतानन्त गोविन्द नामोच्चारणभेषजात् ।

नश्यन्ति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ।।

‘हे अच्युत ! हे अनंत ! हे गोविन्द ! – इस नामोच्चारणरूप औषध से तमाम रोग नष्ट हो जाते हैं, यह मैं सत्य कहता हूँ…. सत्य कहता हूँ ।’

आत्महत्या यह मानस रोग है । मन की कायरता की पराकाष्ठा होती है तभी आदमी आत्महत्या का विचार करता है तो उस समय भगवान को पुकारो ।

‘स्कंद पुराण’ के काशी खंड पूर्वार्द्ध (12.12,13) में आता हैः ‘आत्महत्यारे घोर नरकों में जाते हैं और हजारों नरक-यातनाएँ भोगकर फिर देहाती सूअरों की योनि में जन्म लेते हैं । इसलिए समझकर मनुष्य को कभी भूलकर भी आत्महत्या नहीं करनी चाहिए । आत्महत्यारों का न तो इस लोक में और न परलोक में ही कल्याण होता है ।’

‘पाराशर स्मृति (4.1,2)’ के अनुसार ‘आत्महत्या करने वाला मनुष्य 60 हजार वर्षों तक अंधतामिस्र नरक में निवास करता है ।’

मीडिया को समाज की यह सेवा करनी चाहिए कि जो आत्महत्या करते हैं उनकी तस्वीर देकर नीचे ऐसे कड़क शब्द लिखने चाहिए कि पढ़ने वाले कभी आत्महत्या का विचार न करें ।

जहाँ भी आत्महत्याएँ होती हों वहाँ इस सत्संग का जरा प्रचार होना चाहिए ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2009, पृष्ठ संख्या 18-20 अंक 196

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विचार की शक्ति


पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से

गाड़ी-मोटर से, जहाज से, एटम बम से भी विचार की शक्ति ज्यादा है । विचारों से एटम बम फोड़े और रोके जाते हैं, खोजे और बनाये जाते हैं इसलिए विचारों की महत्ता है । विचार में जितना भगवान का आश्रय होगा, भगवान को पाने का विचार होगा उतना ही वह सुखदायी होगा । द्वेष का विचार अपनी और दूसरों की तबाही करता है । राग का विचार अपने को और दूसरे को भोगी बनाता है । ईश्वरप्रीति के उद्देश्य से विचार करने से राग और द्वेष शिथिल हो जाते हैं ।

एक विचार मित्रता बना देता है, एक विचार शत्रुता व कलह पैदा कर देता है । एक विचार साधक को गिराकर संसारी बना देता है, एक विचार संसारी को संयमी बनाकर भगवान बना देता है । सिद्धार्थ के एक सुविचार ने उनको संयमी बनाकर भगवान बना दिया । इसलिए सुविचार की बलिहारी है । सुविचार आये तो उसे पकड़ रखना चाहिए ।

एक नीच विचार करोड़ों आदमियों को परेशान कर देता है । रावण के एक छोटे विचार ने देखो, पूरी लंका को परेशान कर दिया, बंदरों को परेशान कर दिया । ऐसे ही सिकंदर के, हिटलर के एक नीच विचार ने कई लोगों की बलि ले ली, तबाही मचा दी ।

ब्रिटेन के विश्वविख्यात ‘कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय’ के अंग्रेज प्रोफेसरों ने अब्दुल लतीफ नाम के एक विद्यार्थी को हलकट विचार दिया कि हिन्दुस्तान का कुछ हिस्सा अलग करके पाकिस्तान बनाया जाय । अब्दुल पाकिस्तान के नक्शे बनाकर उसके संबंध में पोस्टर व छोटी-छोटी पुस्तिकाएँ छापकर भारत में भेजने लगा । पहले तो किसी ने उसकी सुनी नहीं । मि. जिन्ना भी दंग रह गये कि यह क्या पागलपन है ! यह संभव ही नहीं है । लेकिन कुविचार को हवा देने वालों ने ऐसा सत्यानाश कर दिया कि भारत में से कुछ हिस्सा अलग होकर पाकिस्तान बना और अभी तक हम उसका भोग बन रहे हैं । उसी से आतंक चला और अब भी सज्जन लोग सताये जा रहे हैं । अलग से फौज, अलग से मिसाइलें, अलग से लड़ाई के जहाज…. एक ही हिन्दुस्तान के दो हिस्से हो के आपस में लड़कर अपनी शक्ति का ह्रास कर रहे हैं । कितने अरबों-खऱबों रूपये चट हो गये एक कुविचार के कारण ! उस कुविचार ने उस समय एक करोड़ लोगों को तो बेघर कर दिया था, लाखों निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार दिया, हजारों महिलाओं की इज्जत लूटी व हजारों बच्चों की लाशें गिरा दी थीं ।

मेरे गुरुदेव का एक सुविचार कि उस परमात्मा को खोजोगे, लाखों-लाखो लोगों को भगवान के ज्ञान, सज्जना व सात्त्विक जीवन से मिला रहा है । लोगों का कितना भला हो रहा है ।

सुविचार मिलता है सत्संग से और कुविचार मिलता है भड़काने वालों से । ‘इस्लाम खतरे में…. मारो-काटो काफिरों को !’ – यह कुविचार है लेकिन बख्तू बीबी ने अपने बेटे को कहाः “बेटा ! इस कुविचार का शिकार मत बनना । हिन्दुओं में भी वही अल्लाह है और मुसलमानों में भी वही राम है । ईश्वर-अल्लाह तेरे नाम । सबको सन्मति दें भगवान ।।”

बख्तू बीबी ने अपने बेटे फरीद को ऐसा सुविचार दिया कि वह बाबा फरीद हो गया । अब भी मुझे बख्तू बीबी और बाबा फरीद के लिए सद्भाव है, इज्जत है । गाँधी जी ने ‘राजा हरिश्चन्द्र’ नाटक देखा और ऊँचा विचार किया कि झूठा नहीं बोलेंगे, परहित करेंगे तो फायदा भी ऐसा हुआ । सनकादि ऋषियों के ब्रह्मज्ञान के विचार ने नारद जी को ‘श्रीमद्भागवत’ की तरफ प्रेरित कर दिया । राजा परीक्षित का कल्याण करने के निमित्त श्री शुकदेव जी ने ‘भागवत’ कही । उनके विचार ने करोड़ों लोगों का भला किया । अब्दुल के कुविचार ने करोड़ों लोगों की तबाही की तो शुकदेव जी और वेदव्यास जी के सुविचार ने करोड़ों लोगों का भला किया । संत तुलसीदास जी के सुविचार ने करोड़ों लोगों को शांति दी, ‘रामायण’ के रस से आनंदित कर दिया । रामानंद सागर के सुविचार ने हम लोगों को घर बैठे रामायण दिखाया । विचारों की बड़ी भारी महत्ता है । जिसके प्रति द्वेष-विचार आया तो सद्गुण दिखते हैं लेकिन श्रद्धा विचार आया तो उसमें परमात्मा दिखेंगे । नामदेव जी महाराज को भूत में भी परमात्मा दिखा, जिनको गुरु जी में भी परमात्मा नहीं दिखते, कैसे हैं उन लोगों के विचार !

अब्दुल लतीफ का पाकिस्तान बनाने का कुविचार अब भी मानव के गले की फाँसी बन बैठा है । इसलिए जो कुविचार देते हैं वे अपने लिए व दुसरों के लिए मुसीबत करते हैं । कुविचार का जहर घोलने वाले मर-मिट गये हैं लेकिन समाज उनके कुविचारों की पीड़ा से पीड़ित हो रहा है, आतंकित हो रहा है ।

एक नूर ते सब जग उपजा, कौन भले कौन मंदे ?

एक ही उस चैतन्य प्रभु से सब उपजे हैं । कुविचार भड़काने वाले तो चले जाते हैं, फिर न जाने कौन-से नरक में पड़ते हैं लेकिन प्रजा शोषित होती है और सुविचार चलाने वाले तो भगवान को पाते हैं और प्रजा पोषित होती है ।

जहाँ सुविचार मिलते हैं उसको सत्संग कहा जाता है और कुविचार मिलते हैं उसको कुसंग कहा जाता है । विचारवान मनुष्य की पहचान है कि वह सत्संग को खोजेगा, सत्पुरुष को देखते-देखते प्रीतिपूर्वक आनंदित हो जायेगा । एकलव्य विचारवान थे, गुरुमूर्ति को देखते-देखते कैसी विद्या जगा ली ! ध्रुव विचारवान थे, नारद जी का संग करके कितने महान बन गये ! मीरा विचारवान थी, गुरु रविदास जी की कृपा कैसे पचा ली !

छल, छिद्र, कपट मनुष्य को कुविचारी बना देता है, तबाह कर देता है । ये तीन दुर्गुण जिसमें नहीं हैं वह तो संत बन जायेगा । ईश्वर के सिवाय कौन-सी चीज हमारी रहेगी, विचार करके देखो । किसके लिए कपट करना, किसके लिए द्वेष करना, किसके लिए पापकर्म करना ? क्यों दोषारोपण करना ? सब अपने-अपने प्रारब्ध और प्राकृतिक स्वभाव के अनूरूप जीते हैं बेचारे । ‘सबका मंगल, सबका भला…’ ऐसा विचार करके आदमी सुखी हो जाता है ।

जो लोग फरियाद करते रहते हैं- ‘ऐसा नहीं है, वैसा नहीं है’, वे लोग अपने विचारों से ही अपना गला घोंटते हैं । फरियादात्मक विचार नहीं, ऐसे उन्नत विचार करो जिससे आत्मा-परमात्मा की भूख  जगे । गलत विचार करने से सत्यानाश हो जाता है । फरियादात्मक विचार, द्वेषपूर्ण विचार, झगड़ा करने-कराने वाले विचार से तो आदमी की कीमत नष्ट हो जाती है । तोड़ने वाला आदमी खुद ही टूट जाता है । फरिदायादात्मक विचार व्यक्ति को खिन्न बना देते हैं, तुच्छ बना देते हैं । दुर्जन सज्जन हो जाय, सज्जन को शांति मिले, शांत मुक्तात्मा हो जाय और मुक्तात्मा ब्रह्मज्ञानी दया करके संसारी लोगों के बीच में आयें-जायें, रहें ताकि संसारी ऊपर उठें, नहीं तो पशु की नाईं नीचे गिरेंगे ।

विचार करो ! मन में जैसा आया ऐसा भजन तो सभी लोग करते हैं । सारी जिंदगी कर-करके बूढ़े होकर, दुःखी होके मर रहे हैं । कौन दुःखों के ऊपर पैर रखकर महान हुआ ? ऐसा विचार करके ऐसे मुक्तात्मा गुरु की शरण में जाओ, ऐसे गुरु से वफादार रहो । वफादारी होगी सद्विचार से, गद्दारी होगी अविचार से । द्वेष होगा अविचार से, समता आयेगी विचार से ।

‘श्री योगवासिष्ठ’ में वसिष्ठ जी कहते हैं- “हे राम जी ! विचार से जीव ऐसे पद को प्राप्त होता है जो नित्य, स्वच्छ, अनंत पर परमानंदरूप है उसको पाकर फिर उसके त्याग की इच्छा नहीं होती है ।

जब ब्रह्मविचार की प्राप्ति हो तब जगत-भ्रम नष्ट हो जाय । कीचड़ का कीट, गर्त का कंटक और अँधेरे बिल में सर्प होना भला है परंतु विचार से रहित होना तुच्छ है ।”

उतना रुदन रोगी और कष्टवान पुरुष भी नहीं करता जितना रुदन विचारहीन व्यक्ति दुःख, पीड़ा, क्लेश, कलह, निंदा, बकबक, झकझक करके परेशान होकर करता है ।

वसिष्ठ जी कहते हैं- “जो पुरुष विचार से रहित होकर भोग में दौड़ता है वह श्वान है ।”

कुत्ते जैसे विचारहीन होकर भौंकते रहते हैं, कितने परेशान होते है ! एक कुत्ता भौंके तो उसके सामने दूसरा भी भौंकता है । रात भर दो-तीन गुट बनाकर भौंकते रहते हैं । देखो तो कुछ अर्थ नहीं निकलता । राग-द्वेष से प्रेरित होकर कर्म करना, अपने अहं को पोसना यह विचाररहित होना है । ‘अपना अहं ईश्वर में कैसे विसर्जित हो ?’ – यह सुविचार है ।

ऐसा विचार करें कि ‘मैं कौन हूँ ? यह जगत क्या है ? दुःख किसको होता है ? सुख किसको होता है ? जन्म-मरण क्यों होता है ? जन्म-मरण से पार कैसे होऊँ ? भगवान अपने आत्मा होकर बैठे हैं तो भी मिले नहीं हैं, तो कैसे पायें ?’ – ऐसे ऊँचे विचार को पकड़कर लग जाना चाहिए । नीच लोग नीच विचार को पकड़कर लग जाते हैं लेकिन ऊँचे लोगे ऊँचे विचार को पकड़कर फिर छोड़ देते हैं, उसमें महत्त्वबुद्धि नहीं रखते !

ऊँचे  विचारों में सबसे ऊँचा विचार है आत्मा – परमात्मा को पाने का, उससे ऊँचा और कोई विचार नहीं है । परमात्मा को पाने का विचार हो और अपनी योग्यता के अनुसार साधन करे । अपनी योग्यता के अनुसार साधन करे । अपनी योग्यता के अनुसार साधन आदमी को परम लक्ष्य परमात्मप्राप्ति तक पहुँचा देता है । लेकिन अपनी योग्यता का पता कैसे चले ? भगवान कहते हैं इसके लिए ज्ञानियों के पास जाओ ।

तद्विद्वि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ।।

‘उस ज्ञान को तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ, उनको भलीभाँति दण्डवत् प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्म-तत्त्व को भलीभाँति जानने वाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्त्वज्ञान का उपदेश करेंगे ।’ (भगवद्गीताः 4.34)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2009, पृष्ठ संख्या 2-4 अंक 195

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