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त्याग और पवित्रता


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

त्याग और पवित्रता – ये भारतीय संस्कृति के आध्यात्मिक खजाने की दो अनुपम कुंजियाँ हैं।

जीवन में त्याग होना चाहिए। आप कोई काम करते हैं और उसमें आपकी स्वार्थ बुद्धि होती है तो बुद्धि कुंठित हो जाती है और आपकी योग्यता कम हो जाती है। अगर स्वार्थरहित काम करते हैं तो थोड़ी-सी योग्यता वाले की योग्यता भी बहुत निखर जाती है।

दूसरी कुंजी है पवित्रता। खानपान में आहार-विहार में, वाणी में और कर्म में पवित्रता होनी चाहिए। कोई व्यक्ति हमसे प्रभावित हो जाय अथवा हमें उससे कुछ मिल जाय इस प्रकार की लालच होने से भी अपना कर्म नन्हा सा हो जाता है, तुच्छ हो जाता है। चाहे कोई संसार में हो अथवा ईश्वर के मार्ग पर हो… उसके जीवन में जितनी ईमानदारी होगी उतना ही जीवन सहज होता जायेगा, साधना सहज होती जायेगी।

त्याग और पवित्रता से अंतःकरण शुद्ध होता है और शुद्ध अंतःकरण में ज्ञान शीघ्र फलित होता है। शुद्ध अंतःकरण वाले का सहज साधन होता है अर्थात् उसे साधना करनी नहीं पड़ती बल्कि उससे साधना होने लगती है।

स्वाभाविक साधन में दो बाते हैं। एक तो यह कि इसमें गलती नहीं होती और दूसरी यह कि थकान भी नहीं होती। शरीर में कभी थकान होती भी है लेकिन मन प्रसन्न रहता है जिससे थकान का प्रभाव नहीं पड़ता है।

सहज साधन में सहज विश्राम है। सहज विश्राम में सब सहज हो जाता है। कबीर जी ने कहा है-

सहजो सहजो सब कहे, सहजो जाने न कोई।

इन्द्रिय आकर्षण विषय तजे, सो ही सहजो होई।।

जगत का आकर्षण, बाहर से सुखी होने का आकर्षण मिटाने के लिए साधन की आवश्यकता है। अतः, सुख लेने की जगह सुख दें, मान लेने की जगह मान दें। इससे हृदय शुद्ध होगा, साधन सहज में होगा।

सहज साधन क्या है ?

उचित श्रम और उचित विश्राम।

उचित श्रम क्या है ?

आलस्य न हो। मैं थका हूँ…. ऐसा कहकर व्यर्थ की थकान न बने और उचित विश्राम क्या है ? अति परिश्रम करके शरीर को श्रमित न बनायें। जब आराम की आवश्यकता हो तब शरीर को आराम दें ताकि फिर ध्यान-भजन में बैठने के काबिल बन जाय।

सुबह तो रातभर का आराम किया हुआ रहता है, अतः सूर्योदय से पहले नहा-धोकर बैठ जायें और भगवन्नाम सहित श्वासोच्छ्वास की गिनती करें। इससे मन की चंचलता मिटती है। प्रभात के समय में मन शांत और दिव्य भावों से जल्दी भरता है। कोई अगर सुबह दो घंटे यह साधन करे तो छः महीने में इतनी ऊँचाई पर पहुँच सकता है जहाँ सामान्यतया आठ साल में नहीं पहुँच सकता।

साधना में शीघ्र उन्नति के चार सोपान हैं-

पहला है विश्रांति, दूसरा है सजगता, तीसरा है भगवान की शरण और चौथा है कुछ भी नहीं करना। छः महीने के अंदर चौथे में पहुँच गये तो समझो, पूरा काम बन गया, लेकिन शर्त यह है कि विवेक, वैराग्य एवं तत्परता से चलना पड़ेगा। उस ईश्वर के होकर चलना पड़ेगा और उसकी कृपा होगी तब काम बनेगा।

परमात्मा कृपा कब करेंगे ?

जब आप कृपा के लायक बनते जायेंगे तो कृपा मिलती जायेगी। सूर्य का  प्रकाश तो मिलता ही रहता है लेकिन किसान बीज बोये तभी सूर्य की कृपा को पा सकता है। ऐसे ही आप परमात्मा के लिए त्यागमय एवं पवित्र जीवन बितायें तो उसकी कृपा तो राह देख ही रही है।

जीवन में पवित्रता और त्याग जितना ईमानदारी पूर्वक होगा उतना ही आप परमात्मा की शरण जा पाओगे तथा जितनी शरणागति होगी मन-बुद्धि उतनी ही विश्रांति पा सकेंगे, उतने ही आप विकारों से सजग रह सकेंगे, उतने ही विलक्षण अनुभव कर पायेंगे और उतने ही परमात्मा में रहकर दिव्य अनुभव पाते जायेंगे।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2002, पृष्ठ संख्या 8,9 अंक 111

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तीन तनावों में पिसा जा रहा है संसार…


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

सारा संसार तीन तनावों में तना जा रहा हैः शारीरिक तनाव, मानसिक तनाव और भावनात्मक तनाव।

इन तीनों तनावों की भीषण चक्की में देश विदेश के सभी मनुष्य पिसे जा रहे हैं। आत्महत्या के कारणों की जाँच करने वाले एक अध्ययन के अनुसार 98 प्रतिशत आत्महत्याएँ मानसिक एवं भावनात्मक तनावों के कारण ही होती हैं। लाख आत्महत्याओं में 98000 का कारण मानसिक एवं भावनात्मक तनाव है। सारे सुख-सुविधाएँ होते हुए भी इन तनावों के कारण बेचारे लोग आत्महत्या करके मर जाते हैं।

इसी प्रकार 95 % हृदयघात भी मानसिक तनाव के शिकार लोगों को ही होता है। कई लोगों को खानपान का उचित विवेक नहीं होता है इस कारण भी वे हृदयघात का शिकार बन जाते हैं।

‘सुख-दुःख में सम रहना, सदैव प्रसन्न रहना ईश्वर की सर्वोपरि भक्ति है।’ गीता का यह ज्ञान, इस प्रकार का सत्संग जिन्होंने पाया है ऐसे लोग इन तनावों से नहीं तनते। उन्होंने ही जीवन जीने का सही ढंग सीखा है।

ऐसा ज्ञान पाने वाला साधक इन तनावों का शिकार होने से काफी तक बच जाता है, क्योंकि वह न तो अति परिश्रम करेगा और न ही अति आराम करेगा। साधक परिश्रम भी करेगा तो उसे कठिन नहीं लगेगा, क्योंकि वह ऐसा नहीं मानेगा, ‘मैं परिश्रम कर रहा हूँ’ वरन् वह तो मानेगा, ‘परिश्रम शरीर कर रहा है।’ ऐसा समझकर वह शारीरिक तनाव से बचता चला जायेगा और मानसिक तथा भावनात्मक तनाव से बचने की विधि भी वह सत्संग के द्वारा जान लेता है।

मेरो चिंत्यो होत नाहीं हरि को चिंत्यो होय।

हरि को चिंत्यो हरि करे मैं रहूँ निश्चिंत।।

तुलसी भरोसे राम के निश्चिंत होई सोय।

अनहोनी होती नहीं होनी होय सो होय।।

सब अपना-अपना प्रारब्ध लेकर आते हैं। फिर भी मनुष्य को अपना पुरुषार्थ करना चाहिए और पुरुषार्थ तो करे लेकिन उसका फल पाने की इच्छा न रखे बल्कि ‘भगवान ! तेरी मर्जी पूरण हो… मेरी इच्छा, वासना, कामना जल जाय और तेरी इच्छा पूरी ही जाय।’ इस भाव से प्रयत्न करे, सदगुरु के इस प्रकार के वचन सुनकर एवं उसका अभ्यास करके  विवेक, वैराग्यसम्पन्न सुदृढ़ सत्संगी मानसिक तनावों से इतने नहीं पीड़ित होते हैं जितने कि निगुरे पीड़ित हो जाते हैं।

क्योंकि निगुरे आदमी को तो गुरु के वचन सुनने को नहीं मिलते। कभी पुण्यवश संत-महापुरुष के वचन सुनने को मिल भी जायें तो वह उन्हें सुनता तो है लेकिन उस प विचार नहीं कर पाता है, उन वचनों को स्वीकार नहीं कर पाता है। उसे लगता है ‘यह तो करना चाहिए, वह तो करना चाहिए….’ तो करो और मरो, कर्त्ता हो कर पचते रहो तनावों में।

‘मैं कुछ बनकर दिखाऊँ, कुछ करके दिखाऊँ….’ का जो भूत है वह निगुरे लोगों को मानसिक और भावनात्मक तनाव में ताने रखता है। अरे, बनकर क्या देखना है ? तू मिट जा भैया ! बनेगा तो अहंकारी हो जायेगा। तू बनने की कोशिश न कर, मिटने का यत्न कर।

जो तिद् भावे सो भलिकार…..

फिर भी कुछ बनने का शौक है तो भगवान का बनकर देख, सदगुरु का बनकर देख।

संसार में थोड़े-बहुत सफल हो गये तो अहंकार मार गिराता है और विफल हो गये तो विषाद दबोच लेता है। इसलिए ‘मैं कुछ होकर दिखाऊँ, कुछ बनकर दिखाऊँ, कुछ प्रसिद्ध होकर दिखाऊँ….’ ऐसी कामना सत्शिष्य को नहीं होती।

कुछ बनकर नहीं दिखाना है वरन् यह जो कुछ बनकर दिखाने का भूत है उसको हटाओ। फिर देखो, वह घड़वैया तुम्हें कैसा घड़ता है ! हमने कभी नहीं सोचा, ‘मैं आसुमल हूँ, आसाराम बनकर दिखाऊँ… प्रसिद्ध होकर दिखाऊँ….’ नहीं नहीं।

मेरी हो सो जल जाय तेरी हो सो रह जाय….

कुम्हार के हाथ में मिट्टी को जाने दो फिर वह घड़ा बनाये, सुराही बनाये, कुल्हड़ बनाये उसकी मर्जी…. संसार का कुम्हार तो बनता है अपने स्वार्थ के लिए लेकिन परमात्मा और सदगुरुरूपी कुम्हार अपने स्वार्थ के लिए नहीं बनायेंगे वरन् तुम्हें ही परमेश्वरमय बना देंगे।

यदि तू अपनी अकड़-पकड़ छोड़ दे, अपनी वासना छोड़ दे और अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए चिंतन करना छोड़ दे तो बहुतों की भलाई के लिए ईश्वर तेरे द्वारा बहुत कुछ करवाने को तैयार है। अगर तू कुछ बनने की कोशिश करेगा तो मानसिक तनाव में, भावनात्मक तनाव में और अहंकार में ही तनता रहेगा। इसी प्रकार भावनात्मक तनाव भी लोगों को पीड़ित कर रहा है।

एक आदमी बीच सड़क से जा रहा था। उससे पूछ गयाः “भाई ! तू बीच सड़क पर क्यों रहे हो ?”

आदमी बोलाः “एक बार कोई आदमी सड़क के किनारे से जा रहा था और किनारे के किसी मकान की दीवार गिर गयी तो उससे वह आदमी दब गया था। अब मुझे भी डर लगता है कि कहीं किनारे वाली दीवार गिर जायेगी तो मैं भी दबकर मर जाऊँगा। इसीलिए बीच सड़क पर चलता हूँ।”

ऐसे ही किसी को आठ साल की एक बेटी है और दूसरी संतति भी बेटी ही हुई तो माँ को चिंता लग गयी कि इसके लिए दहेज देना पड़ेगा….। दहेज तो देना पड़ेगा 18-20 साल के बाद लेकिन तनाव अभी से घुस गया… और 18-20 साल के बाद परिस्थितियाँ बदल जायेंगी। अभी कन्याएँ कम हो रही हैं और लड़के ज्यादा। इन आँकड़ों के हिसाब से आने वाला समय इससे कुछ दूसरा ही होगा। अभी बेचारे कन्या वाले गिड़गिड़ाते हैं, तब लड़के वाले आजी-निजारी, मन्नतें करते, कन्या माँगते रहेंगे जो कि सन् 1947 के पूर्व की स्थिति थी। लड़कों की इतनी कीमत नहीं रहेगी, लड़की मिले तो कृपा हो गयी ऐसा होने वाला है।

लड़की दस साल की हो गयी… तब भी चिंता हो रही है कि इसकी शादी करनी पड़ेगी। लड़की 18 वर्ष की हो गयी…. 20 की हो गयी… सगाई नहीं हो रही है तब भी चिंता हो रही है, भावनात्मक तनाव की लकीरें दिन-प्रतिदिन खिंचती चली जाती हैं। अरे ! जो होना होगा सो होगा। तुम प्रयत्न करो, कार्य में ध्यान रखो लेकिन चिंता मत करो।

शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए खूब आविष्कार हो रहे हैं परन्तु व्यक्ति अगर तीन-चार घंटे भी नींद कर ले तो आराम से स्वस्थ रह सकता है, परन्तु खानपान और आहार-विहार की गड़बड़ी करता है तो 7-8 घंटे सोने पर भी अपने को थका हुआ महसूस करता है। फिर थोड़ा काम करता है तो ‘मैंने बहुत काम कर लिया और मैं बहुत थक गया हूँ… मैं बीमार हूँ और मैं कुछ नहीं कर सकता हूँ….’ ऐसे बेकार के चिंतनों में पड़कर शारीरिक तनाव से पीड़ित हो जाता है।

शारीरिक और मानसिक तनाव बढ़ने से फिर उस आदमी को सिगरेट की, दारू की जरूरत पड़ने लगती है। पति अथवा पत्नी के साथ अपना सत्यानाश करने की इच्छा – यह शारीरिक और मानसिक तनाव का फल है। बिनजरूरी काम विकार, बिन जरूरी खाना, बिनजरूरी बोलना – ये भी शारीरिक और मानसिक तनाव के लक्षण हैं।

मनुष्य अगर इसी ढंग से जीवन जीता रहे तो उसके पास मौत की चार चिट्ठियाँ आ जाती हैं- शरीर पर झुर्रियाँ, बालों की सफेदी, आँखों की रोशनी में कमी और नसों की कमजोरी।

अगर कोई इन मुसीबतों से बचना चाहता है तो उसे चाहिए कि आसन प्राणायाम के द्वारा शरीर को स्वस्थ रखे, श्वासोच्छ्वास की गिनती करे और ‘मैं शरीर नहीं हूँ तो रोग मुझे कैसे छू सकता है ?’ ऐसा सोचे, संतों के सत्संग का लाभ ले तो वह शारीरिक और मानसिक तनाव से मुक्ति पा लेगा।

अपनी जीवन में तीन बातों का ध्यान रखोः

शरीर को अति थकाओ मत।

मैं थक गया हूँ – ऐसा सोचकर मन से भी मत थको। मन को तनाव में न डालो। जो होगा देखा जायेगा।

भावनाओं एवं कल्पनाओं में मत उलझो।

सारा संसार इन्हीं तीन तनावों से तप रहा है – शारीरिक तनाव, मानसिक तनाव और भावनात्मक तनाव। कोई भगत है, मंदिर में भी जाता है फिर भी यदि उसके जीवन में सत्संग नहीं है, संत पुरुषों का मार्गदर्शन नहीं है तो वह भी भावनात्मक तनाव से तन जाता है। कुछ अच्छा हो गया तो खुश हो जायेगा कि ‘भगवान की बड़ी कृपा है’ और कुछ बुरा हो गया तो कहेगाः “भगवान ने ऐसा नहीं किया, वैसा नहीं किया।’ लेकिन उसे क्या पता कि भगवान उसका कितना हित चाहते हैं ? इसलिए कभी भी अपने को दुःखद चिंतन में नहीं गिराना चाहिए, निराशा की खाई में नहीं गिराना चाहिए और न ही अहंकार के दलदल में फँसना चाहिए वरन् यह विचार करें कि संसार सपना है इसमें ऐसा तो होता रहता है।….

इन तीनों तनावों से छुटकारा पाने का एक ही उपाय है, बाकी के सब उपाय तो तनावरूपी वृक्ष के पत्ते और टहनियों के तोड़ने  के समान हैं। तनावरूपी वृक्ष की जड़ में कुल्हाड़ी मारना हो तो एक ही कुल्हाड़ी है – वह है आत्मयोग की।

आत्मयोग क्या है ?

जो दिख रहा है वह सब स्वप्न है, स्फुरणमात्र है और जिससे दिख रहा है वह आत्मा ही सत्य है। उस सत्य में विश्रांति पाने का नाम ही है – आत्मयोग। इससे तीनों तनाव अपने आप दूर हो जाते हैं।

सब लोग इन तीन तनावों में से किसी न किसी तनाव से कम या अधिक अंशों में पीड़ित हैं। कोई एक से तो कोई दो से अथवा कोई-कोई तो तीनों तनावों से पीड़ित हैं। इन तीनों तनावों से पार हुआ अपने परमेश्वर स्वभाव में, अपने आत्मस्वभाव में जगा हुआ तो कोई विरला महापुरुष ही मिलता है।

ऐसे आत्मवेत्ता महापुरुष इन तीन तनावों से पार होने की कुंजी बताते हैं, प्रयोग बताते हैं और परमात्म-प्रसन्नता की प्राप्ति भी करा देते है। धनभागी है वे लोग जो उनके पदचिन्हों पर सच्चाई एवं श्रद्धापूर्वक चलाते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2002, पृष्ठ संख्या 10-12, अंक 111

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मानव-जीवन के बीस दोष


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

महाभारत के अनुशासन पर्व में देवगुरु बृहृस्पति एवं धर्मराज युधिष्ठिर का संवाद आता है। धर्मराज युधिष्ठिर के पूछने पर धर्मशास्त्रज्ञ, संयममूर्ति, देवों से पूजित, देवगुरु बृहस्पतिजी जीव के दोषों एवं उनकी गति का वर्णन करते हुए कहते हैं-

1.जो ब्राह्मण चारों वेदों का अध्ययन करने के बाद भी मोहवश पतित व्यक्ति का दान लेता है, वह 15 वर्ष तक गधे की योनि में रहकर 7 वर्ष तक बैल बनता है। बैल का शरीर छूटने पर 3 मास तक ब्रह्मराक्षस होता है।

2.जो ब्राह्मण पतित पुरुष का यज्ञ कराता है, वह मरने के बाद 15 वर्ष कीड़ा बनता है। फिर 5 वर्ष गधा, 5 वर्ष शूकर, 5 वर्ष मुर्गा, 5 वर्ष सियार और 1 वर्ष कुत्ता होता है।

3.धर्मराज युधिष्ठिर हाथ जोड़कर नम्रता से प्रश्न करते हैं- “हे देवगुरु बृहस्पति जी ! जो शिष्य मूर्खतावश गुरु का अपराध करता है, गुरु हित चाहते हैं फिर भी गुरु की बात को महत्त्व नहीं देता है और अपने मान-अपमान को पकड़कर, गुरु के कहने का सीधा अर्थ नहीं लेता है उसकी क्या गति होती है ?”

बृहस्पति जी बोलेः “इस अपराध से वह मरने के बाद कुत्ते की योनि में जाता है और भौं-भौं करता रहता है, बकवास करता है। गुरु अपने हित की बात बतायें और वह सफाई देता है तो देता रहे… रात भर भौंकता रहे, ऐसी कुत्ते की योनि उसे मिलती है। उसके बाद राक्षस एवं गधे की योनि में भटकता है, फिर प्रेत-योनि में भटकता है। इस प्रकार अनेक कष्ट भुगतने के बाद उसे मनुष्य योनि मिलती है।”

4.जो शिष्य मूर्खतावश गुरु की बात का अनादर करता है उसको पशु योनि मिलती है और हिंसक मनुष्यों के बाण सहने पड़ते हैं। गुरु हित की बात करें और शिष्य न सुने तो फिर वह ऐसी पाशवी नीच योनियों में जायेगा कि दुःख-पीड़ा सहेगा, मरेगा-जन्मेगा और अन्य पशुओं से, शिकारियों से शोषित होगा….

5.जो पुत्र अपने माता-पिता का अनादर करता है वह भी मरने के बाद पहले 10 साल तक गधे का शरीर पाता है। फिर 1 साल तक घड़ियाल की योनि में रहने के बाद मानव-योनि का अवसर पाता है।

6.जिस पुत्र पर माता-पिता रुष्ट हों, उसकी क्या गति होती है ? वह मरकर 10 मास तक गधे की योनि में, 14 महीने तक कुत्ते की योनि में और 7 माह तक बिलाव की योनि में भटककर फिर मनुष्य होने का अवसर पाता है।

7.जो व्यक्ति माता-पिता को गाली देता है, तू कहकर बुलाता है – ‘ऐ बुढ़िया ! तू चुप रह। ऐ बुड्ढे ! तू चुप रह। तू क्या जाने ?’ ऐसा व्यक्ति मरने के बाद मैना बनता है।

8.जो माता-पिता को मारता है वह 10 वर्ष तक कछुआ होता है। वैसे तो कछुए की आयु लंबी होती है लेकिन वह 10 वर्ष तक कछुआ रहकर मर जाता है फिर 3 वर्ष तक साही और 6 महीने तक सर्प होता है।

9.जो किसी राजा का सेवक होते हुए भी मोहवश राजा के शत्रुओं की सेवा करता है अथवा जो गुरु का सेवक है लेकिन गुरु की सेवा के बहाने उनकी अवहेलना करके उनके उपदेश के विपरीत काम करता है, वह मरने के बाद 10 वर्ष तक वानर, 5 वर्ष चूहा और 6 महीने तक कुत्ता होकर फिर मनुष्य-शरीर को पाता है।

10.दूसरों की धरोहर हड़पने वाला मनुष्य यमलोक में जाता है और क्रमशः सौ योनियों में भ्रमण करके अंत में 15 वर्ष तक कीड़ा होता है।

11.जो दूसरों के दोष देखता है और एक दूसरे को चिढ़ाता रहता है वह हिरण की योनि में जन्म लेता है।

12.दूसरों से विश्वासघात करने वाला 8 वर्ष तक मछली की योनि में भटकता है, 4 मास तक मृग बनता है, 1 वर्ष तक बकरा होने के बाद कीड़े की योनि में जन्म लेता है। इस प्रकार की नीच योनियों को भोगने के बाद उसे मनुष्य योनि मिलती है।

13.जो अनाज चुराता है वह मरने के बाद पहले चूहा बनता है। फिर गोदाम में से अनाज चुराते रहो और बिल में ले जाओ….। चूहे की योनि के बाद सूअर की योनि पाता है। वह सुअर जन्म लेते ही रोग से मर जाता है। फिर 5 वर्ष तक कुत्ता होने के पश्चात मनुष्य जन्म पाता है।

14.परस्त्रीगमन का पाप करके मनुष्य क्रमशः भेड़िया, कुत्ता, सियार, गीध, साँप, कंक (सफेद चील) और बगुला होता है।

15.जो भाई की स्त्री के साथ व्यभिचार करता है, वह 1 वर्ष तक कोयल की योनि में पड़ा रहता है।

16.जो मित्र, गुरु और राजा की पत्नी के साथ कुकर्म करता है वह 5 वर्ष तक सुअर, 10 वर्ष तक भेड़िया, 5 वर्ष तक बिलाव, 10 वर्ष तक मुर्गा, 3 महीने तक चींटी और 14 महीने तक कीड़े की योनि में रहता है। ऐसे करते-कराते फिर मनुष्य योनि में आने का वह अवसर पाता है।

17.जो यज्ञ, दान अथवा विवाह के शुभ वातावरण में विघ्न डालता है वह 15 वर्ष तक कीड़े की योनि में जन्म लेता है।

18.बड़ा भाई पिता के समान होता है। जो बड़े भाई का अनादर करता है उसे मृत्यु के बाद 1 वर्ष तक क्रौंच पक्षी की योनि में रहना पड़ता है। फिर वह चीरक की जाति का पक्षी होता है, उसके बाद मनुष्य योनि में आता है।

19.जो कृतघ्न है अर्थात् किसी के द्वारा की गयी भलाई या उपकार को न मानने वाला, ऐसे व्यक्ति को यमलोक में बड़ी कठोर यातनाएँ मिलती हैं। उसके पश्चात 15 वर्ष तक कीड़े की योनि में जन्मता है। फिर पशुओं के गर्भ में आकर गर्भावस्था में ही मर जाता है। इस प्रकार सौ बार गर्भ की यंत्रणा भोगकर फिर तिर्यग (पक्षी) योनि में जन्म लेता है। इन योनियों में बहुत वर्षों तक दुःख भोगने के पश्चात वह फिर कछुआ होता है।

20.जो मानव विश्वासपूर्वक रखी हुई किसी की धरोहर को हड़प लेता है, वह मछली की योनि में जन्म पाता है। फिर मनुष्य बनता है लेकिन उसकी आयु बहुत कम होती है। मनुष्य तो बनता है, गर्भ की पीड़ा सहता है, बचपन की मारपीट सहता है और कुछ समझने की उम्र आती है तब तक तो मर जाता है। जैसे तुम्हारी मानवीय सृष्टि में 307 के केस की कितनी सज़ा…. पहले से निर्धारित है, ऐसे ही ईश्वरीय सृष्टि का कायदा भी पहले से ही बना-बनाया है। इन कर्मजन्य, भावजन्य, विचारजन्य, संगजन्य आदि दोषों से बचने का उपाय है-सत्संग एवं भगवन्नाम-जप, जिनसे अपनी मति-गति एवं कर्म ऊँचे बन जाते हैं और ईश्वरार्पण बुद्धि से किये गये सत्कर्म नैष्कर्म सिद्धि देकर ईश्वरप्राप्ति करा देते हैं। अतः बुद्धिमान मनुष्यों को चाहिए कि वे नीच कर्मों से बचें एवं ईश्वरीय आनंद ईश्वरीय सुख को पा लें और मुक्त हो जायें। नीच कर्मवाले निगुरे व्यक्ति नीच योनियों में भटकते हैं और सत्कर्म में रत सत्संगी-सन्मार्गी सत्पद को पाते हैं।

जिसके जीवन में सत्संग नहीं होगा, भगवन्नाम-जप नहीं होगा, जो सावधान नहीं होगा, वह, इन 20 दोषों में से किसी-न-किसी दोष का शिकार बन जायेगा। चाहे विश्वासघाती बने, चाहे कृतघ्नी बने, चाहे विघ्न डालने वाला बने, चाहे बड़े भाई का अनादर करने वाला बने, चाहे माता-पिता का अनादर करने वाला बने…. लेकिन ईश्वर के मार्ग पर चलने से भाई, माता-पिता, कुटुम्बी कोई भी रोके तो उनकी बात की अवहेलना करने से कोई पाप नहीं लगता है। इन 20 दोषों से बचने हेतु सत्शास्त्र का पठन-मनन और सच्चे संतों का सत्संग सर्वोपरि है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2002, पृष्ठ संख्या 12, अंक 110

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