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कर्म के प्रकार


(पुण्यतोया साबरमती के तट पर स्थित आश्रम में अपने एकांत निवास के दौरान कर्म के प्रकार का वर्णन करते हुए पूज्य श्री ने बतायाः)

कर्म तीन प्रकार के होते हैं- प्रारब्ध कर्म, संचित कर्म और क्रियमाण कर्म।

मान लो हजारों मन अनाज का ढेर पड़ा है, उसमें से आपने दस किलो अनाज पीसकर आटा बना लिया, तो जितने समय तक आप अनाज को सँम्भालकर रख सकते हैं, उतने समय तक आटे को सँभालकर नहीं रख सकते हैं। आटा जल्दी बिगड़ जाता है। अतः उसका सदुपयोग कर लेना पड़ता है। उस आटे को खाकर आप में शक्ति आयेगी, उससे आप काम करेंगे।

तो अनाज का जो ढेर है – वह है संचित कर्म। आटा है प्रारब्ध कर्म और वर्तमान में जो कर रहे हैं वह है क्रियमाण कर्म। आपके कर्मों के बड़े संचय में से अपने जरा-से कर्मों को लेकर आपने इस देह को धारण किया है। बाकी के संचित कर्म संस्कार के रूप में पड़े हैं।

किसके घर में जन्म, किसके साथ विवाह और कब मृत्यु – यह आप प्रारब्ध से ही लेकर आये हैं। जन्म प्रारब्ध के अनुसार हुआ है, शादी भी जिसके साथ होनी होगी, हो जायेगी और मृत्यु भी जब आने वाली होगी, आ ही जायेगी। संचित कर्म संस्कार के रूप में पड़े हैं, प्रारब्ध लेकर जन्मे और वर्तमान में जो कर रहे हैं – वे हैं आपके क्रियमाण कर्म।

ज्ञानी हो या अज्ञानी, भक्त हो या अभक्त, योगी हो या भोगी… प्रारब्ध का प्रभाव सबके जीवन पर पड़ता है। जैसे किसी का प्रारब्ध बढ़िया है, फिर वह भले ही दसवीं पढ़ा हुआ क्यों न हो ? महीने में वह हजारों लाखों कमा लेता है और कई होशियार हैं, पढ़े लिखे भी हैं, परन्तु प्रारब्ध साथ नही देता है तो सर्टीफिकेट लेकर घूमते हैं फिर भी नौकरी नहीं मिलती है।

किन्तु केवल प्रारब्ध का ही प्रभाव नहीं होता है, प्रारब्ध के साथ वातावरण का भी असर होता है, समाज का भी असर होता है और राजनीति का भी असर होता है। यह सब मिश्रित होता है। अतः केवल प्रारब्ध के भरोसे नहीं बैठे रहना चाहिए।

जैसे क्रियमाण कर्म करते हो, उसके हिसाब से प्रारब्ध बनता है। यदि आपने अच्छे कर्म किये तो उसके फलस्वरूप स्वर्ग मिलेगा, लेकिन पुण्य का प्रभाव क्षीण होते ही स्वर्ग से गिराये जा सकते हो। पुनः संचित कर्म के प्रभाव से धरती पर आना पड़ेगा और यदि पाप कर्म किये तो आपको नरक का दुःख भोगना पड़ता है।

इस प्रकार जब तक ज्ञानाग्नि से इस जीव के सब कर्म जल नहीं जाते, तब तक जन्म मरण होता ही रहता है। जीव बेचारा सुख-दुःख के थपेड़े खाता ही रहता है। गीताकार श्रीकृष्ण ने कहा हैः

यथैधांसि समिद्धोsग्निर्भस्मसात्कुरुतेsर्जुन।

ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।।

‘हे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईँधनोंको को भस्ममय कर देती है वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि संपूर्ण कर्मों को भस्ममय कर देती है।’ (गीताः 4.37)

ईश्वर ही सृष्टिकर्ता है, ईश्वर ही सर्जनहार है और कर्मों का नियामक, निर्वाहक एवं कर्मों का फल देने वाला वह ईश्वर आत्मरूप से साक्षीरूप में सभी के अंतःकरण में विराजमान है। हम कर्ताभाव से जैसे कर्म करते हैं उसी के अनुसार हमें अच्छा या बुरा फल मिलता है।

धर्मात्मा धर्म करके हर्षित होता है लेकिन अपने को धर्म करने वाला मानता है। अधार्मिक अधर्म की बातों से सुखी होता है लेकिन वह भी अपने को अधर्म करने वाला मानता है। दोनों ही अपने को कर्म का कर्ता मानते हैं, अतः, कर्म करके सभी सुखी होते हैं तो कभी दुःखी होते हैं क्योंकि,

जँह लगी है कर्तव्यता तँह लगी है अज्ञान।

‘कर्त्तव्यता अज्ञान से ही सिद्ध होती है।’

जबकि ज्ञानवान को न हर्ष होता है न शोक क्योंकि ज्ञान के द्वारा उसका कर्ताभाव समाप्त हो चुका है। ज्ञानी के द्वारा कितने भी अच्छे कर्म हो जायें उन्हें कभी नहीं होताः ‘मैंने इतने अच्छे कर्म किये…..’ अथवा वे किसी को डाँट भी देते हैं तो उन्हें ऐसा नहीं होताः ‘मुझसे बुरा कर्म हो गया…..’ क्योंकि ज्ञानी को पता है कि कर्म प्रकृति में हो रहे हैं।

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।

‘वस्तुतः, सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं तो भी जिसका अंतःकरण अहंकार से मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसा मानता है। (गीताः 3.27)

होता है कार्य प्रकृति में लेकिन अहंकार से जो विमूढ हो गया है वह अपने को कर्ता मानता है।

शरीर है प्रकृति का, चमड़ा अगर काला है तो वह अपने को काला मानता है। मन है प्रकृति का, लेकिन मन में अगर काम आ गया तो वह अपने को कामी मानता है। मन में क्रोध आ गया तो वह अपने को क्रोधी मानता है। मन में अगर चिंता आ गयी तो वह अपने को चिंतित मानता है। मन में अगर भय आ गया तो वह अपने को भयभीत मानता है।

वस्तुतः, काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, चिंता आदि सब आते जाते हैं। हम तो उनको देखऩे वाले हैं किंतु इसका हमें ज्ञान नहीं है इसीलिए उनसे प्रभावित हो जाते हैं, परंतु जिनको सत्कर्म, सदबुद्धि एवं सदगुरु की कृपा से ज्ञान हो गया है, वे महापुरुष इन सारी भ्रमणाओं से, सारी परिच्छिन्नताओं से पार हो जाते हैं।

भगवान कहते हैं-

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।

ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।।

जैसे, लकड़ी के ढेर को आग जलाकर भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञान की अग्नि से जीव के सारे कर्म-बंधन, संस्कार भस्मीभूत हो जाते हैं। जो संचित कर्म हैं वे भी भस्म हो जाते हैं। क्रियमाण कर्म भी वह कर्ताभाव से नहीं करता इसलिए उसे कर्म का फल नहीं भोगना पड़ता है और प्रारब्ध कर्म भी बीत जाते हैं।

अज्ञानी अपना प्रतिकूल प्रारब्ध रो-रोकर भोगता हैः ‘हाय ! मुझे इतना दुःख है…. ऐसा है… वैसा है….’ और अनुकूल प्रारब्ध को खुश होकर भोगता हैः ‘मैं बड़ा भाग्यशाली हूँ…. मैं बड़ा सुखी हूँ….।’ लेकिन ज्ञानी को प्रारब्ध कर्म होते हुए दिखते हैं। ज्ञानी अपने को सुविधा में सुखी नहीं मानता और असुविधा में दुःखी नहीं मानता। ज्ञानवान समझता है कि ‘प्रारब्ध शरीर का है, शरीर से गुजर रहा है…।’

अज्ञानी भोगे रोकर या आसक्त होकर, ज्ञानी भोगे साक्षी-सम होकर। अज्ञानी दुःख के दिन रोकर भोगता है और सुख के दिन आसक्त होकर भोगता है। ज्ञानी सुख के दिन भी विनोदमात्र में भोगते हैं और दुःख के दिन भी।

एक महात्मा से पूछा गयाः

“महाराज ! जब देखो, आप शांत और सुखी नजर आते हैं। क्या आपको दुःख नहीं होता है ?”

महात्मा बोलेः “दुःख आता है।”

“महाराज ! आपको दुःख नहीं होता है ?”

“नहीं, दुःख आता है। मैं दुःखी क्यों होऊँ ? मैं उससे मिलता नहीं हूँ। दुःख आता है, मैं उसे देखता हूँ।”

ऐसे ही आप भी दुःख से मिलो नहीं उसे देखो तो वह गुजर जायेगा। दुःख होता है मन में और हम मन से जुड़ जाते हैं इसीलिए दुःखी हो जाते हैं।

श्रीमद् आद्यशंकराचार्य जी ने कहा हैः

‘मनोबुद्धि अहंकारचित्तानि नाहं…. अर्थात् मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार हम नहीं हैं…’

इस बात का ज्ञान महापुरुषों से पाकर फिर इसका अभ्यास करें, पवित्र आहार-विहार करें तो परमात्मा का अनुभव भी कर सकते हैं और एक बार अनुभव हो गया तो समझो, काम बन गया।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 14,15 अंक 108

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साधक जीवन की दो समस्याएँ


संत श्री आसाराम बापू के सत्संग-प्रवचन से

साधक के जीवन में दो समस्याएँ आती हैं- एक तरफ संसार का आकर्षण और संसार की जवाबदारियाँ एवं दूसरी तरफ भगवत्प्राप्ति की लालसा।

जिस साधक के जीवन में भगवत्प्राप्ति की लालसा होती  वह संसारियों से ज्यादा दुःखी होता है क्योंकि संसारियों को तो केवल संसार की लालसा होती है, उनका लक्ष्य भगवत्प्राप्ति नहीं होता जबकि साधक का लक्ष्य होता है भगवत्प्राप्ति और साथ में उसे निभानी पड़ती है संसार  की जवाबदारियाँ।

संसारी आकांक्षाओं से थोड़े ऊपर उठे हुए साधक के जीवन में विक्षेप आता है। एक तरफ वह ईश्वर की महत्ता सुनता है, जानता है और उसका विवेक जागता है, दूसरी तरफ संसार की पुरानी आदतें उसे नीचे घसीटती हैं। वह जप करता है फिर भी उसे राग-द्वेष, काम-क्रोध आदि परेशान करते हैं और हर साधक को इस संघर्ष से गुजरना पड़ता है। नहीं चाहते हुए भी उससे कुछ ऐसी प्रवृत्तियाँ,ऐसा चिंतन हो जाता है जो उसे दुःख देता है क्योंकि उसका विवेक जग चुका है, उसके जीवन में कुछ प्रकाश हुआ है। आरम्भिक साधक की दशा कुछ ऐसी होती है किः

जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्ति। जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्ति।।

‘धर्म को जानता हूँ पर उसमें प्रवृत्ति नहीं होती और अधर्म को जानता हूँ परन्तु उससे निवृत्ति नहीं होती।’ हर साधक इस दशा में आता ही है।

सुकरात ब़ड़े बेचैन रहते थे। सुकरात से किसी मित्र ने कहाः “तुम इत़ने बेचैन रहते हो उसकी अपेक्षा तो यह सुअर पत्नी, पुत्रादिसहित नाले में प़ड़ा है बड़े आनन्द से जी रहा है, उसको कोई चिंता नहीं है। चिंतित सुकरात होने के बजाये निश्चिंत सुअर होना कहीं अधिक अच्छा है।”

सुकरात ने कहाः ” मैं बेवकूफी से नाले में सुखी रहने की अपेक्षा, निश्चिंत सुअर होने की अपेक्षा छटपटाने वाले सुकरात के जीवन को अधिक पसंद करूँगा क्योंकि यह छटपटाहट मुझे परमात्मद्वार तक पहुँचा देगी।”

जो हतभागी होते हैं,मंदभागी होते है वो संसार को सार समझकर उससे चिपके रहते हैं और उसमें से कुछ मिलता है तो अपने जीवन को धन्य-धन्य मान लेते हैं,लेकिन साधक उसमें चिपकता नहीं है और यदि उसे कुछ मिलता है तब भी वह सोचता है कि आखिर क्या ?  उसे संसार में रस नहीं आता है।

जो भजन तो करता है, जप भी करता है लेकिन भगवदरस में पहुँचा नहीं है वह बेचारा संसार की जवाबदारियाँ, प्रलोभन या सुख-दुःख आने पर हिल जाता है, क्योंकि जप के साथ उसने ध्यान का माहात्म्य नहीं  जाना। कोई जप तो करता है लेकिन ध्यान द्वारा अपने भीतर का रस नहीं पाया तो उसे संसार का रस आकर्षित कर देगा। जिसने भीतर के निर्दुःखपने का स्वाद नहीं लिया, उसे संसार के दुःख हिला देते हैं। यदि हम सुख दुःख में हिल जाते हैं तो समझना चाहिए कि ध्यान-ज्ञान के प्रसाद में अभी पूर्ण स्थिति नहीं हुई। अभी तक वह प्रसाद नहीं मिला है, जिससे सब दुःखों की निवृत्ति होती है।

श्रीमद् भगवद् गीता में आता हैः

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।

प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते।।

‘प्रसाद से अर्थात् अंतःकरण की प्रसन्नता से सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्न चित्त वाले योगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भलीभाँति स्थिर हो जाती है।’ (गीताः 2.35)

जिन प्यारों पर सदगुरुओं की अहैतुकी कृपा होती है, वे ही बुलाये जाते हैं अर्थात् जिनके पुण्य परिपक्व होते हैं और जिन पर परमात्मा कि विशेष कृपा होती है, वे ही ऐसे प्रसाद की महफिल में बुलाये जाते हैं। औरों का इस महफिल में प्रवेश नहीं होता।

यदि भगवान की विशेष करूणा-कृपा होती है तो साधन-भजन की जगह नजदीक लगती है, भगवान नजदीक लगते हैं और यदि हम भगवान की विशेष कृपा के पात्र नहीं होते तो भोग नजदीक लगते हैं, भगवान दूर लगते हैं।

ईश्वरीय कृपा तो सब पर है लेकिन जो ईश्वर के लिए छटपटाता है उस पर उनकी विशेष कृपा होती है। जो ईश्वर के लिए काम करता है उस पर ईश्वर की विशेष कृपा होती है। जो भोग के लिए, वाहवाही के लिए, संसार के लिए काम करता है उस पर संसार की कृपा होती है और संसार की कृपा यही है कि वह दुःख बढ़ाता है। जितना संसार से प्रेम बढ़ेगा उतना दुःख बढ़ेगा और जितना भगवान से प्रेम बढ़ेगा उतना अंतरंगसुख, सच्चा सुख बढ़ेगा।

साधक के जीवन में एक तरफ उसे संसार खींचता है तो दूसरी तरफ परमात्मारस खींचता है। साधक बेचारा सीमा पर है। जब वह संसारियों का संग करता है और संसार की तरफ आता है तो अशांत होता है और भगवान की तरफ जाता है तो आनंद का अनुभव करता है।

वस्तुतः देखा जाये तो संसार में जो सुख दिखता है वह सुख है ही नहीं। जैसे मूर्ख कुत्ता सूखी हड्डी चबाता है और उसके मसूढ़ों से खून निकलने लगता है तो उसी के स्वाद में वह सुख मानता है। अगर उसको समझ में आ जाये कि इसमें कोई सार नहीं है तो वह हड्डी क्यों चबायेगा ? ऐसे ही अगर मनुष्य को समझ में आ जाये कि संसार में जो सुख दिखता है वह वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति का सुख नहीं अपितु अपने भीतर का ही सुख है तो वह उनमें क्यों फँसेगा ?

एक बार भी यदि भीतर का सुख प्रकट हो जाये तो संसार के सुख कोई प्रभाव नहीं डाल सकते। हम लोग जप,तप, देवदर्शन आदि तो करते हैं लेकिन देवदर्शन जिससे किया जाता है उसमें गोता नहीं मारते, इसीलिए संसार का प्रभाव हमारे चित्त से दूर नहीं होता और संसार का प्रभाव यह है कि वह हर्ष और शोक देता है।

आनंद तो संसार में है ही नहीं। सुख तो संसार में है ही नहीं। हर्ष को ही हमने सुख मान लिया है। हमें सच्चे सुख का पता ही नहीं है इसीलिए हम लोग हर्ष को सुख समझ बैठे हैं। जितना हर्ष होता है उतना ही शोक भी बढ़ता है।

आज हम हर्ष के साथ बह जाते हैं, इसीलिए जीवन में शोक भी उतनी ही तेजी से आता है। पहले हर्ष को मूल्य नहीं दिया जाता था, भीतर की विश्रांति को मूल्य दिया जाता था। हमारे परदादे जितने प्रसन्न रहते थे, जितनी ईमानदारी से जीते थे और जितने तंदरुस्त रहते थे, उतनी हमारे दादाओं के पास योग्यताएँ नहीं थीं। हमारे दादाओं के पास जितनी योग्यताएँ थीं उतनी हमारे पिताओं के पास नहीं रहीं। हमारे पिताओं के पास जितनी योग्यताएँ हैं उतनी हमारे पास नहीं हैं और हमारे पास जितनी सहनशक्ति और भीतर की शांति है उतनी अपने बच्चों के पास हम नहीं देख पाते क्योंकि हमारे बच्चों के पास हर्ष के जितने अधिक साधन आये उतने वे अशांत हो गये, उतने वे शोकातुर हो गये।

संसार काजो सुख है, वह वास्तव में सुख नहीं है, हर्ष है। सुविधाओं को हमने सुख मान लिया है। सुविधाएँ हर्ष दे सकती हैं, सुख नहीं दे सकती। सुविधाओ का औषधवत् उपयोग किया जाय तो ठीक है। सुख तो भीतर का खजाना है। इसी को भगवान श्रीकृष्ण ने कहाः ‘प्रसादे सर्वदुःखानाम्…।’ उस प्रसाद से सब दुःख दूर होते हैं।

संसार में सब दुःख दूर करने की ताकत नहीं है। पूरा संसार मिलकर भी एक आदमी को पूरा सुख नहीं दे सकता और सारा संसार मिलकर भी एक आदमी के सारे दुःख दूर नहीं कर सकता। चाहे फिर वह किसी भी पद पर पहुँच जाये लेकिन प्रकृति वहाँ उसे ठहरने नहीं देगी।

सारी दुनिया में आपने पहलवानों में पहला स्थान पा लिया लेकिन फिर क्या ? आखिर तो मृत्यु झपेट लेगी। पूरे विश्व में आप अच्छे विद्वान घोषित हो गये लेकिन मृत्यु का झटका आपकी सारी विद्वता को झपेट लेगा। सारे विश्व में आप धनवानों में पहले नंबर पर हो गये लेकिन आखिर क्या ? संत नरसिंह मेहता ने कहा हैः

ज्यां लागी आत्मतत्व चीन्यो नहीं, त्यां लगी साधना सर्व झूठी।

अर्थात्

जब तक आत्मा को नहीं पहचाना, तब तक झूठी हैं सब साधना।

दुनिया के पदों को पाने की सारी उपलब्धियों,योग्यताओं को मृत्यु छीन लेती है लेकिन आत्मज्ञान पाने की जो साधना है वह तो बेड़ा पार कर देती है। आत्मज्ञान आपको तो निहाल कर देता है लेकिन आपकी मीठी निगाहें जिन पर पड़ती हैं उनको भी खुशहाल कर देता है। आत्मज्ञान की ऐसी महिमा है ! अतः ऊँचा लक्ष्य बनायें। हर्ष शोक में बह न जायें। व्यर्थ के शोक व चिंता में समय न गँवायें….. हरि ૐ तत्सत् और सब गपशप….

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 10-12, अंक 107

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एक का ही आश्रय लें…………


(कल-कल, छल-छल करती पतित पावन गंगा, यमुना एवं सरस्वती का त्रिवेणी संगम स्थल अर्थात् तीर्थराज प्रयाग में पूज्य श्री ने तीन महीने के मौन के बाद बहायी गीता-ज्ञान गंगा….)

क्यों सिद्ध बनना चाहता, तुझी से सब सिद्ध हैं।

हैं खेल सारी सिद्धियाँ, तू सिद्ध का भी सिद्ध है।।

अपनी आत्मा को देखो, अपने परमेश्वर से नाता जोड़कर चेष्टा करो। अपने दिलबर को पीठ देकर शरीर का अहं सजाओगे तो कहीं के नहीं रहोगे। रावण और कंस इसी में तबाह हो गये। हिटलर और सिकंदर में भी बहुत-सी योग्यताएँ थीं लेकिन… शरीर का नाम भी कब तक रहेगा

परमेश्वर के नाते आप सबसे मिलें… परमेश्वर के नाते पति की, पत्नी की, साधक की, संत की, सबकी सेवा करें, बस। तभी आपको विश्रांति मिलेगी और विश्रांति आपकी मांग है। परमात्मा में विश्रांति पाने से आपका जीवन स्वाभाविक ही स्वस्थ, सुखी और सन्मानित हो जायेगा, उसके लिए आपको कोई नाटक नहीं करना पड़ेगा, उसके लिए आपको कोई नाटक नहीं करना पड़ेगा उसके लिए आपको कोई षड्यंत्र नहीं करना पड़ेगा। मैं हाथ जोड़कर आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप जो करें, ईश्वर के नाते करें।

‘मुझे यह सुख देगा… यह काम में आयेगा….’ ऐसा सोचकर परमेश्वर के साथ क्यों गद्दारी करता है ? जो मौत के बाद भई तेरा साथ नहीं छोड़ेगा, उसको छोड़कर तू मरने वाले का आश्रय लेता है ? मिटने वाले का आश्रय लेता है ? अमिट का आश्रय छोड़कर मिटने वाले का कब तक आश्रय लेगा ? शाश्वत को छोड़कर नश्वर की शरण कब तक जायेगा ?

‘यह मेरे काम आयेगा…. वह मेरे काम आयेगा….’ ना, ना ! ये शरीर के काम आयेंगे तो अहंकार बढ़ेगा और काम नहीं आयेंगे तो दुःख, विषाद व अशांति होगी। तेरे काम तो केवल तेरा पिया आयेगा। तू नींद में रोज उसी में जाता है, कभी ध्यान में बैठे-बैठे भी उसमें जा…. तेरा तो कल्याण होगा, तेरी मीठी निगाहें जिस पर पड़ेंगीं वह भी उन्नत होने लगेगा, महान आत्मा होने लगेगा।

‘श्रीमद् भगवदगीता’ में आता हैः

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।

बहवो ज्ञानतपसा पूता मद् भावमागताः।।

‘राग, भय और क्रोध से सर्वथा रहित, मेरे में ही तल्लीन, मेरे ही आश्रित तथा ज्ञानरूप तप से पवित्र हुए बहुत से भक्त मेरे भाव को, मेरे स्वरूप को, मेरे अनुभव को प्राप्त हो चुके हैं।’ (गीताः 4.10)

वीतराग…. राग को हटाता जा…. भयक्रोधा…. डर क्यों लगता है ? शरीर को ‘मैं’ मानता है, वस्तुओं को सच्चा मानता है इसलिए तू डरता है, विकारों को पोषता है इसलिए तू डरता है, कपट रखता है इसलिए तू डरता है। तू सच्चाई की शरण ले। भय हटा दे।

क्रोध क्यों होता है ? वासना की पूर्ति में कोई छोटा विघ्न डालता है तो उस पर क्रोध होता है, बड़े से भय लगता है, बराबरी वाले से द्वेष होता है। तू वासना को महत्व को न दे, तू परमात्मा की प्रीति को महत्व दे मेरे प्यारे ! तो तू सचमुच में प्रभु का प्यारा हो जायेगा।

तू परमात्मा की प्रीति को महत्व न दे, तू परमात्मा की प्रीति को महत्व दे मेरे प्यारे ! तो तू सचमुच में प्रभु का प्यारा हो जायेगा।

तू परमात्मा की प्रीति को महत्व देना भूल गया है इसलिए क्रोध में पचता है, भय से काँपता है, राग में फँसता है मेरे भैया ! तू  फँसने के लिए, तपने के लिए नहीं आया। तू संसार के स्वामी का अनुभव करके मुक्त होने के लिए संसार में आया है।

जरा जरा बात में क्यों डरता है ? जरा-जरा बात में क्यों चिंतित होता है ? दो रोटी ही तो खानी हैं। किसी करोड़पति की स्त्री फुटपाथ पर दो रोटी माँगे तो इज्जत किसकी जायेगी ? करोड़पति की जायेगी। ऐसे ही करोड़पतियों के बाप के भी बाप परमेश्वर ने तुझे पैदा किया है, वह अगर तुझे भूखा और नंगा रखता है तो उसकी इज्जत का सवाल है, इसमें तेरा क्या बिगड़ता है ?

उसकी शान  वह सँभलता है। फिर क्यों कपट करें ? क्यों चिंता करें ? क्यों डरें ? क्यों रोयें ? राग, भय और क्रोध को आज से ही अलविदा कर दे। जैसे त्रिवेणी में बालू और तिनके बह जाते हैं ऐसे ही सत्संग की त्रिवेणी में आज वे तीनों चीजें बहा दें, बस ! ‘भय, क्रोध और राग तू जा…. प्रीति, नम्रता और प्रभु-आस्था तू मेरे दिल में आ…’

‘मुझे बड़ी चिंता है, मैं क्या करूँ….?’ अरे ! जन्म लेना तेरे हाथ में नहीं है। बालों को सफेद होने से रोकना तेरे हाथ में नहीं है। मौत को थाम लेना तेरे हाथ में नहीं है। अन्न पचाना तेरे हाथ में नहीं है। भूख लगाना तेरे हाथ में नहीं है। रक्त का संचार करना तेरे हाथ में नहीं है। वह परमात्मा ये सब कर रहा है तो बाकी का भी उसके चरणों में सौंपकर तू विश्रांति पा। फिर देख, हँसने का भी मजा…. खाने का भी मज़ा… पीने का भी मज़ा…. जीने का भी मज़ा… मरने का भी मज़ा… तू चिंता मत कर, चिंतन कर, भैया !

मन्मया….. अर्थात् उसी ब्रह्म परमात्मा के चिंतन के एकाकार होना। मामुपाश्रिताः…. मेरे आश्रित हो जा ! जैसे, बच्चा माँ-बाप, दादा-दादी के आश्रित होता है तो मध्यरात्रि में भी उन्हें दोड़-धूप करा देता है क्योंकि बच्चा उनके आश्रित है। ऐसे ही तुम भी परमात्मा के आश्रित हो जाओ। फिर देखो, वह कितना सँभालता है….

‘मुझे तो बहुत मिला है। मैं आपको क्या बताऊँ ? मैं एक आसाराम नहीं, हजार आसाराम हों और एक-एक आसाराम की हजार-हजार जिह्वाएँ हो फिर भी उसने जो दिया है, उसका बयान नहीं कर सकता हूँ ! आपको सच बोलता हूँ। आप उसका आश्रय लें, आपसे मैं हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ।

जो सभी का आश्रय है, आपका भी सचमुच में वही आश्रय है लेकिन आप कपट का आश्रय लेकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हैं…. आप काम का आश्रय लेकर अपने को नोचते हैं… आप द्वेष का आश्रय लेकर अपने को सताते हैं… आप लोभ का आश्रय लेकर अपने को डुबोते हैं। आप उसी का आश्रय लीजिये, जो ब्रह्माण्डों का आश्रयदाता है, आपका भी वही आश्रयदाता है। जो मेरी जीभ का आश्रयदाता है, आपके कानों का भी वही आश्रयदाता है। इतने निकट के आश्रयदाता को छोड़कर कब तक भटकते रहोगे ? कब तक गिड़गिड़ाते रहोगे ? कब तक पचते रहोगे ?… क्या आपकी बुद्धि निर्णय कर सकती है उसके आश्रय के बिना ? क्या आपका मन सोच सकता है उसके आश्रय के बिना ? क्या आपका शरीर चल सकता है उसके आश्रय के बिना ? क्या धरती टिक सकती है उसके आश्रय के बिना ?

इतने समर्थ प्रभु का आश्रय छोड़कर कहाँ तक भटकोगे ? कब तक भटकोगे ? भैया !

कबीरा माँगे माँगणा प्रभु दीजे मोहे दोय।

संत समागम हरि कथा मो उर निशदिन होय।।

संत समागम, हरि-कथा हरि स्वरूप के आश्रय में स्थित करते हैं। उस आश्रय में गोता मारना ही सत्संग का उद्देश्य है।

हम आश्रय तो भगवान का लेते हैं और प्रीति संसार से करते हैं। नहीं, आश्रय भी भगवान का और प्रीति भी भगवान की। आपका तो  काम बने जायेगा, आपकी मीठी निगाहें जिस पर पड़ेंगी उसका भी मंगल होने लगेगा। यह बिल्कुल सच्ची बात है। उसका आश्रय लेकर तो देखो ! हम परमात्मा का थोड़ा बहुत आश्रय लेते भी हैं लेकिन प्रीति संसार की होने से उस आश्रय का पूरा लाभ, पूरा सुख नहीं ले पाते। उसका पूरा लाभ व पूरा सुख पाने के लिए आश्रय भी उसी का और प्रीति भी उसी की हो।

आश्रय तो श्रद्धालु भी लेते हैं लेकिन उसको बाहर खोजते हैं, दूर खोजते हैं। कहते तो हैं- ‘हम भगवान की शरण में हैं।’ लेकिन आप अपने को तो जानो कि शरण में जाने वाला कौन है ? और जिस भगवान की शरण में जाते हो उसकी शरण को भी जान लो। कैसे जानें ? ज्ञानरूपी तप से।

भगवान कहते हैं-

…..बहवो ज्ञानतपसा पूता मद् भावमागताः।।

……. बहुत से भक्त ज्ञानरूप तप से पवित्र हुए मेरे भाव को प्राप्त हो चुके हैं।’ अर्थात् जैसे भगवान मुक्तात्मा, ब्रह्म परमात्मा हैं ऐसे ही अपने को मुक्तात्मा, ब्रह्म परमात्मा समझकर कई भक्त भगवान को प्राप्त हो चुके हैं। आप भी भगवान को जानकर मुक्तात्मा हो जाओ। अपना लक्ष्य ऊँचा बना लो और उसका बार-बार सुमिरन करो। दोहराओः

लक्ष्य न ओझल होने पाये, कदम मिलाकर चल।

सफलता तेरे चरण चूमेगी, आज नहीं तो कल।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 3,4 अंक 107

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