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सतयुग की पूजा पद्धति


संत श्री आशाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

पूर्वकाल में मंदिर-मस्जिद आदि कुछ नहीं था। लोग ब्रह्मवेत्ता सदगुरुओं को ईश्वररूप जानकर, उनका उपदेश सुनते, उनकी आज्ञा के अनुसार चलते एवं परमात्मज्ञान पा लेते थे।

बाद में रजो-तमोगुण बढ़ गया। महापुरुषों ने देखा कि ऐरे गैरे भी ‘ब्रह्मज्ञानी’ बनने का ढोंग करने लगे और इसके कारण लोग सच्चे ब्रह्मज्ञानियों पर भी शंका करने लगे इसलिए उन्होंने मूर्तियाँ लाकर रख दीं। सिर पटकते-पटकते 12 साल तप करो, पूजा-पाठ करते यात्रायें करो तब कुछ शुद्धि होगी, किसी सच्चे आत्मज्ञानी महापुरुष को खोजने की पुण्याई होगी। फिर आत्मज्ञान मिलेगा तो लाभ होगा। जब तक ब्रह्मवेत्ता सदगुरु नहीं मिलते तब तक भगवान की सेवा-पूजा करो, तीर्थों में जाओ, कहीं नाक रगड़ो, कहीं झख मारो। जब हृदय शुद्ध होगा, भगवान को पाने की तड़प होगी, सदगुरु की जरूरत पड़ेगी तब कोई गुरु मिलेंगे तो कदर होगी। मुफ्त में गुरु मिल जायेंगे तो क्या कदर करेंगे ?

सतयुग में मूर्तिपूजा नहीं थी, त्रेता में भी नहीं थी। द्वापर-त्रेता के संगम से मूर्तिपूजा चली। एक त्रिकालज्ञ ब्रह्मवेत्ता महापुरुष कहते हैं कि- पौराणिक युग से आज तक जो भी मूर्ति के भगवान हैं वे सब ब्रह्मज्ञानियों के बेटे हैं। ये जो भी देवी-देवता हैं या भगवान हैं, सारे के सारे ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों के मानसिक पुत्र हैं। ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों ने समाज को उन्नत करने के लिए मन से भगवत्तत्व की भावना की और तदनुसार शिल्पियों ने मूर्तियों की रचना की।

कर्षति आकर्षति इति कृष्णः। जो सभी को आकर्षित करता है उसका नाम है श्री कृष्ण। रोम रोम में रम रहा है इसलिए उसका नाम रखा श्री राम। वह कल्याण करता है इसलिए उसका नाम रखा शिव। वह आद्यशक्ति है इसलिए उसको जगदम्बमा कहके भी पूजते हैं।

महापुरुषों की ऊँची सूझ-बूझ और लोक मांगल्य की भावना के अनुसार मूर्तियों की रचना हुई एवं उऩ्होंने ध्यानावस्था में अपने परमात्मस्वरूप में एकाकार होकर जो बोला, वह शास्त्र बन गया। जितने भी शास्त्र हैं सब ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों की समाधिभाषा हैं। ज्ञानवान अपने आत्मानुभव में आकर जो वचन बोलते हैं, वे शास्त्र बन जाते हैं।

गुजरात में अखा भगत नाम के एक आत्मज्ञानी महापुरुष हो गये। लोगों को जगाने के लिए उन्होंने कहा हैः

सजीवाए निर्जीवा ने घडयो, पछी मने कहे मने कंई दे।

अखो तमनने ई पूछे, तमारी एक फूटी के बे ?

‘सजीव (मानव) ने निर्जीव मूर्ति का निर्माण किया, फिर उससे ही प्रार्थना करता है कि मुझे कुछ दे। अखा तुमसे पूछा है कि तुम्हारी एक आँख फूटी है कि दोनों ?’

आप सजीव हैं और मूर्ति निर्जीव है। मंदिर मस्जिद और चर्चों ने इंसान को नहीं बनाया, इन्सान ने उन्हें बनाया है।

गुजरात के ऊँझा नामक स्थान में उमिया माता का मंदिर है। उस मंदिर का उदघाटन था तो वहाँ मेरा जाना हुआ। सारा पटेल समाज वहाँ उपस्थित था।  लोग वहाँ के एक वृद्ध ‘चेयरमैन’ को मेरे पास लाये एवं बोलेः “स्वामी जी ! ये साठ वर्ष से काँवर में पानी लाकर माता जी को पानी चढ़ाते हैं।”

लोगों ने उन्हें हार पहनाया, मेरे आशीर्वचन दिलाये फिर मुझे विचार आया कि साठ वर्ष से कंधे पर काँवर रखकर पानी लाते हैं और माता जी को चढ़ाते हैं, अगर साठ वर्ष तो क्या साठ माह भी किसी ब्रह्मवेत्ता महापुरुष के श्रीचरणों में शांत बैठे होते तो बेड़ा पार हो गया होता।

जो माता जी को पानी नहीं चढ़ाते हैं, नास्तिक हैं, उनकी अपेक्षा तो इन काका को धन्यवाद है लेकिन हमें ऐसे काका नहीं होना है। हमें तो तेजी से चलना है। वर्तमान में जिस प्रकार यात्रा के तीव्र साधन हुए, संदेश पहुँचाने के तार, टेलिफोन आदि के तीव्र साधन हुए, रसोई बनाने के तीव्र साधन हुए वैसे ही प्रभुप्राप्ति के लिए भी तीव्र गति से यात्रा करके मंजिल तक पहुँच जायें।

मुख में पत्थर रखकर राजसी मनुष्य तप करते हैं। आखिरी समय तपस्याकाल में धृतराष्ट्र केव पवनाहार करते थे, गांधारी केवल जलाहार करती थीं और कुंताजी महा में केवल एक ही बार भोजन करती थीं। आप भी ऐसे ही तप करो ऐसा कहने का हेतु नहीं है क्योंकि उस समय का शरीर एवं उस  समय की निष्ठा आज के शरीर एवं आज की निष्ठा से बिल्कुल भिन्न थी। फिर भी कभी-कभी तो उपवास अवश्य करना चाहिए।

कभी स्वाभाविक श्वासोच्छवास को गिनते जायें तो कभी हरि के ध्यान में तल्लीन हो जायें। कभी जप करते-करते शांत होते जायें। कभी जप करते-करते मनन-निदिध्यासन करते जायें तो कभी सेवा द्वारा अंतःकरण को पावन करते जायें।

किन्हीं ब्रह्मवेत्ता महापुरुष को खोज लें और उनकी बतायी हुई युक्तियों का अनुसरण करें तो शीघ्र ही बेड़ा पार हो जायेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2001, पृष्ठ संख्या 9,10 अंक 103

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ज्ञानी का पूजन


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

दो प्रकार के मनुष्य होते हैं- आस्तिक और नास्तिक

आस्तिक एक की शरण लेता है जबकि  नास्तिक को हजारों की शरण लेनी पड़ती है। नास्तिक हजार-हजार जगह खुशामद करता है, फिर भी उसका बेड़ा गर्क हो जाता है जबकि आस्तिक केवल एक भगवान की शरण लेता है और उसका बेड़ा पार हो जाता है।

नास्तिक भी दो प्रकार के होते हैं- नकारात्मक और उदासीन।

पहले प्रकार के मनुष्य घोर नास्तिक होते हैं। वे मानते हैं कि ईश्वर जैसी चीज कुछ है ही नहीं। वे संतों एवं साधु पुरुषों की निंदा भी करते हैं। वे ऐसा मानते हैं किः ‘यह शरीर मैं हूँ और मैं ही सब कुछ हूँ…’ ऐसे मनुष्य कालांतर में वृक्ष, पशु, पक्षी आदि योनियों को प्राप्त होते हैं।

दूसरे होते हैं उदासीन या अर्द्ध नास्तिक जिन्हें ईश्वर की कुछ पड़ी ही नहीं होती किः ‘ईश्वर का अस्तित्व हो या न हो, अपने को क्या ? अपने को तो नौकरी-धंधा करके कमाना-खाना है और जीना है।’ ऐसे लोगों को समय पर सुख-दुःख की थपेड़ें खानी पड़ती हैं।

आस्तिक मनुष्य भी दो प्रकार के होते हैं-

एक ऐसे होते हैं जो ईश्वर एवं संतों को मानते हैं, भगवान की पूजा-अर्चना करते हैं ताकि जीवन में कोई विघ्न न आये, कोई दुःख मुसीबत सहन न करनी पड़े। वे ईश्वर को तो स्वीकारते हैं लेकिन संसार के सुख की इच्छा करते हैं। वे चाहते हैं कि उनकी संसार की गाड़ी ठीक से चलती रहे। ऐसे आस्तिकों की प्रीति संसार में होती है और आवश्यकता भगवान की पड़ती है। ऐसे भक्तों को बहुत समय बाद भगवद् प्राप्ति होती है।

दूसरे आस्तिक होते हैं जो संतों से लाभ उठा लेते हैं। वे भगवान को मानते हैं और भगवद् प्राप्ति के बिना जीवन व्यर्थ है’ यह भी जानते हैं, सत्शास्त्रों का पठन-मनन करते हैं, इसी जन्म में ईश्वरप्राप्ति का दृढ़ संकल्प करते हैं और ईश्वरीय शांति, ईश्वरीय आनंद पा लेते हैं।

कहते हैं कि मंदिर जाने एवं मूर्तिपूजा करने से एकतरफा पुण्यलाभ होता है किन्तु जिनको परमात्मा का साक्षात्कार हुआ है, ऐसे महापुरुषों का पूजन करने से दोतरफा लाभ होता है। मूर्ति अपनी ओर से भक्त के लिए शुभ संकल्प नहीं करती बल्कि भक्त को उसकी भावना के अनुसार फल मिलता है। लेकिन आत्मसाक्षात्कारी महापुरुष के पूजन-अर्चन में हमारी भावना तो काम करती ही है, साथ ही उनकी दृष्टि, उनके संकल्प एवं दिव्य परमाणुओं से भी हमारा शुभ संकल्प फलित होने लगता है।

अखा भगत कहते हैं-

सजीवाए निर्जीवाने घड्यो अने पछी कहे मन कई दे।

अखो तमने ई पूछे के तमारी एक फूटी के बे ?

‘सजीव ने (मनुष्य ने) निर्जीव  (पत्थर की मूर्ति को) बनाया और फिर उसी से माँगने लगा किः ‘मुझे कुछ दो।’ अखा भगत आपको यह पूछता है कि आपको एक आँख फूट गई है कि दोनों ?”

मूर्तिपूजा करके जितना लाभ उठाया जा सकता है, उससे कई गुना लाभ ज्ञानी महापुरुष की पूजा करने से होता है।

ब्रह्मज्ञानी आप परमेश्वर। ब्रह्मज्ञानी को ढूँढे महेश्वर।।

शंकरजी ढूँढते रहते हैं किः ‘मुझे कहीं कोई ब्रह्मज्ञानी मिल जाये।’ मूर्ति से जितना लाभ मिलता है, वह अपनी श्रद्धा से मिलता है। जितनी श्रद्धा मूर्ति में होगी, उससे उतना ही लाभ होगा। मूर्ति स्वयं किसी के लिए लाभ का संकल्प नहीं करती।

जागृत महापुरुषों के हृदय में तो संकल्प होता है किः ‘चलो, इसका मंगल हो… कल्याण हो…. यह और प्रसिद्ध हो…. यशस्वी हो…. तेजस्वी हो… बुद्धिमान हो…. ज्ञानवान हो….’ संत के हृदय में तो परहित की भावना होती है। इसीलिए मूर्तिपूजा की अपेक्षा ज्ञानी-महापुरुषों की पूजा श्रेष्ठ है। तीर्थ में जाने की अपेक्षा ज्ञानी महापुरुषों के पास जाना श्रेष्ठ है।

तीर्थ में तो जितनी तीर्थत्व बुद्धि होगी, उतना ही फल मिलेगा जबकि ज्ञानी-महापुरुषों के पास तो आत्मतीर्थ का वातावरण होता है जहाँ गंगा भी आकर पवित्र होती है एवं तीर्थराज प्रयाग भी पवित्र होने को आते हैं। अतः तीर्थ में जाने की अपेक्षा आत्मज्ञानी महापुरुष के यहाँ जाना हजारगुना अच्छा है।

चांद्रायण व्रत अथवा दूसरे व्रत करने की अपेक्षा ज्ञानी का प्रसाद ग्रहण करणा श्रेष्ठ है क्योंकि ज्ञानी की पूजा में श्रद्धालु की श्रद्धा और ज्ञानी-महापुरुष का संकल्प दोनों मिल जाते हैं। इससे उसमें द्विगुण बल आ जाता है। श्रीहरि बाबा जी महाराज कभी-कभी कहते थे कि यदि संसार में दो व्यक्तियों के मन सर्वथा मिल जायें तो वे विश्वविजयी हो जायेंगे।

दो मन एक हो जायें तो बल बढ़ जाता है। शुंभ-निशुंभ दैत्य थे। उन दोनों के मन मिल गये तो उन्होंने देवताओं की की नाक में दम कर दिया। दो समकक्ष मन मिल जायें तो कार्य बन जाता है।

अतः श्रुति ज्ञानी की विभूति का वर्णन करके उसकी पूजा का विधान करती है।

जिसकी संसारी कामना है वह भी आत्मज्ञानी संत का यजन-पूजन करे एवं जो निष्कामी है वह भी निष्कामता के फल को पाने के लिए, निष्कामता में दृढ़ होने के लिए ज्ञानी का पूजन करे। जिसको ज्ञान चाहिए वह भी ज्ञानी का आदर करे और जिसको भोग चाहिए वह भी ज्ञानी का पूजन करे।

ज्ञानी-महापुरुषों के संग की महिमा का वर्णन करते हुए भगवान कृष्ण ‘श्रीमद् भागवत’ में कहते हैं-

न रोधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव।

न स्वाध्यायस्तपस्तयागो नेष्टापूर्तं न दक्षिणा।।

व्रतानि यज्ञश्छन्दासि तीर्थानि नियमा यमाः।

यथावरुन्धे सत्संगः सर्वसंगापहो हि माम्।।

‘हे उद्धव जी ! अन्य सब संगों को दूर करने वाला सत्संग जैसे मुझे वश में करता है, वैसे योग, सांख्य, धर्म, स्वाध्याय, तप, त्याग, इष्टापूर्त (अग्निहोत्रादि इष्ट, कूप-तड़ागादि पूर्त), दक्षिणा, व्रत, यज्ञ, छन्द, तीर्थ, नियम और यम – ये सब साधन में वश में नहीं करते।’

श्रीमद् भागवतः 11.12.1,2

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2001, पृष्ठ संख्या 9,10 अंक 100

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चारित्रिक क्रान्ति के उन्नायक पूज्य बापू


भारत की इस पावन धरा तथा ऋषियों के वंशजों पर भगवान की विशेष कृपा रही है। जब कभी भी इस भारत भूमि पर मानवजाति को किसी दुर्गुण ने ग्रसित किया, उसको पतनोन्मुख बनाने की कुचेष्टा की तब-तब यहाँ भगवान एवं भगवद् प्राप्त महापुरुषों का अवतरण होता रहा है। विश्व के किसी भी दूसरे देश में ऐसा अनुपम उदाहरण नहीं मिलता है।

इस भारतभूमि पर तो भगवान ने स्वयं प्रतिज्ञा की हैः

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।

‘हे भारत ! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात् साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ।’ (गीताः 4.7)

इस अनंत कालचक्र से जूझ रहे मानव के समक्ष समय-समय पर ऐसी बाधाएँ आती हैं जो उसकी वास्तविक उन्नति में बाधक बन जाती हैं। काल का दुष्प्रभाव और उसके पुराने कुसंस्कार सामाजिक संस्कारों को विकृत कर देते हैं जिससे पूरा समाज पतन के गर्त में गिरता चला जाता है।

समाज कको ऐसी विकट परिस्थिति से निकालकर उसे सच्ची सुख-शांति एवं वास्तविक उन्नति के मार्ग पर ले जाने के लिए ही भगवान तथा भगवद् प्राप्त महापुरुष इस अवनि पर अवतरित होते हैं। विभिन्न युक्तियों से मानव का वास्तविक कल्याण करने में समर्थ ऐसे अलौकिक पुरुष विरले ही होते हैं। परन्तु यह बात भी उतनी ही सच है कि यह भारतभूमि ऐसे विरले सत्पुरुषों से रिक्त कभी नहीं हुई।

आज जब भारतवासी अपनी महान संस्कृति को भूलकर विकृत पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण करने में लगे हुए हैं और इसके दुष्प्रभाव से विश्वगुरु कहलाने वाले भारत में चारित्रिक पतन का विनाशकारी तांडव चल रहा है। ऐसे समय में चारित्रिक क्रान्ति के उन्नायक पूज्यपाद संत श्री आसाराम जी बापू हमारे बीच उपस्थित हैं।

भारतीय ब्रह्मर्षियों की गूढ़ रहस्यमयी आत्मविद्या के आचार्य तथा योग-सामर्थ्य के धनी पूज्य बापू भारतभूमि के ऐसे ही एक दुर्लभ संतरत्न है। भारतवर्ष की आध्यात्मिक एवं चारित्रिक उन्नति की बागडोर अपने समर्थ हाथों में लेकर आपने जागृति का जो शंखनाद किया है वह एक अभूतपूर्व दैवी कार्य है।

‘धन गया तो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य गया तो कुछ-कुछ गया परन्तु चरित्र गया तो सब कुछ गया।’ भारतीय मनीषियों के इस सिद्धान्त को स्वीकार करते हुए आप भी चरित्रनिर्माण पर विशेष बल देते हैं। चरित्रनिर्माण के साथ आध्यात्मिकता का संगम करके आप मानव को महामानव तथा महामानव को महेश्वर बनाने के एक अदभुत मार्ग पर ले जा रहे हैं।

पूज्य बापू जी के इस  महान दैवी कार्य का जीवंत उदाहरण यह छोटी सी घटना है जो छोटी होने पर भी बहुत कुछ सीख दे देती है।

एक बार साबरमती, अमदावाद में स्थित संत श्री आसारामजी आश्रम में ‘ध्यान योग शिविर’ चल रहा था। उस समय आश्रम छोटा-सा ही था अतः साधकों के लिए नहाने-धोने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी। साबरमती नदी में पानी की गहरी धारा बह रही थी उसी पर महिलाओं एवं पुरुषों के नहाने-धोने के लिए दो अलग-अलग घाट बना दिये गये।

नदी के उस पार भारतीय सेना की छावनी है जिसे ‘हनुमान कैम्प’ कहा जाता है। सुबह के समय सेना के दो जवान दौड़ लगाते हुए नदी के किनारे तक पहुँच गये जहाँ महिलाओं के स्नान का घाट बना था। उनके कारण उन शिविरार्थी साधिकाओं को नहाने में परेशानी हो रही थी क्योंकि वे दोनों जवान जानबूझकर वहाँ से खड़े-खड़े साधिकाओं को घूर रहे थे।

पूज्य बापू नित्य सुबह नदी किनारे घूमने जाया करते थे। पूज्य श्री की दृष्टि दूर से उन जवानों पर पड़ी। घट-घट की जानने वाले समर्थ योगी को वस्तुस्थिति समझने में कैसे देर लगती ? पूज्य श्री शीघ्र ही उन जवानों के पास पहुँचे और उनके हाथ पकड़कर बोलेः “चुपचाप मेरे साथ चलो।”

पूज्य बापू के मुखमण्डल तथा वाणी के तेज को देखकर वे जवान मानो सूखी लकड़ी के खम्भे से हो गये। उनकी हिम्मत ही नहीं हुई कि वे कुछ बोलें या प्रतिकार करें। रस्सी से बँधी गाय की तरह वे पूज्य बापू के साथ चल दिये।

दोनों को नाव से इस पार लाया गया। पूज्य श्री दोनों का गिरेबान (कॉलर) पकड़कर अपनी कुटिया की ओर बढ़ने लगे। कुछ आश्रमवासियों ने देखा तो दौड़कर पूज्यश्री के पास आये और बोलेः

“बापू जी ! हम पकड़ें ?”

पूज्य बापू जी ने दृढ़तापूर्वक उत्तर दियाः “नहीं, इनमें इतनी शक्ति नहीं है कि अपने-आपको मुझसे छुड़ा सकें।” फिर उन्हें अपनी कुटिया में  ले जाकर बंद कर दिया और सेवकों को आदेश दिया किः “इनके मुखिया को फोन करके कहो कि यदि अपने जवान चाहिए तो यहाँ आकर ले जाय।”

थोड़ी ही देर बाद सेना का एक ऑफिसर गाड़ी लेकर आश्रम में पहुँचा। गाड़ी से उतरते ही वह कुटिया की सीढ़ियाँ चढ़ने लगा तो भक्तों ने उसे रोककर कहाः “भाई साहब ! आपके जूते उतार दो। यह बापू जी का निवासस्थान है। जूते ले जाना मना है।”

इस पर उसने चिढ़कर जवाब दियाः “हम  मिलेट्रीवाले जूते नहीं उतारते। ये हमारी वर्दी के अन्तर्गत आते हैं, समझे ?” लेकिन ज्यों ही उसने अपना पैर दूसरी सीढ़ी पर रखना चाहा त्यों ही उसका शरीर पसीना-पसीना हो गया। उसने शायद ही कभी सोचा होगा कि ऐसा भी हो सकता है। उसका पैर पहली सीढ़ी से आगे नहीं बढ़ सका। लाख प्रयास करने के बाद भी वह अपने पैर को ऊपर की सीढ़ी पर नहीं रख सका। अब उसकी सारी अक्कड़ धूल में मिल चुकी थी। घबराते हुए वह नीचे उतरा और जूते उतारकर बड़े नम्र भाव से कुटिया को प्रणाम करके अंदर गया। अंदर पहुँचते ही उसने पूज्य बापू  देखकर प्रणाम किया।

पूज्य श्री ने उसे डाँटते हुए कहाः “तुम लोग देश के रक्षक हो या भक्षक ? देशवासियों ने तुम्हें यह वर्दी इस देश की माँ-बहनों की लाज बचाने के लिए पहनाई है या उन पर बुरी नजर डालने के लिए ? जब तुम लोग ही ऐसा पाप करने लगोगे तो दूसरों को कैसे सुधारा जायेगा ?”

पूज्य श्री की निर्भीक तेजस्वी वाणी को सुनकर वह थर-थर काँपने लगा। इन समर्थ योगी की महान शक्ति का छोटा सा अनुभव तो वह सीढ़ियों पर चढ़ते समय ही कर चुका था। गिड़गिड़ाते हुए उसने पूज्य श्री से क्षमा माँगी और वचन दिया किः “जो आप कहेंगे इनको वही सजा दी जायेगी।”

पूज्य श्री ने उन दोनों जवानों को कमरे से बाहर निकाला। उन्हें चरित्र की महानता बतायी और फिर तीनों को प्रसाद दिया। पूज्य बापू ने उनके ऑफीसर से कहाः “इन्हें कोई सजा नहीं देना। अब ये दुबारा ऐसी गलती नहीं करेंगे।”

वाह री संतों की करुणा ! कैसी महानता है ! क्रोध ऐसा कि मानो अभी प्रलय हो जाय और कुछ ही देर में प्रेम भी उतना ही ! संसार में रहकर भी संसार से परे। अपनी अविचल आत्ममस्ती में रमण करने वाले संतों की लीला को कोई संत ही जान सकते हैं।

15-20 दिन बाद वे दोनों जवान सत्संग में आये और बापू जी को प्रणाम करके बोलेः

“महाराज ! जब आपने हमें पकड़ा था तब हमारी शक्ति पता नहीं कहाँ चली गई थी ! उस दिन के बाद हमें अण्डा, माँस, शराब आदि से घृणा होने लगी है। हमारे दुर्गुण अपने आप पलायन हो रहे हैं और कोई अदृश्य शक्ति हमें बार-बार यहाँ सत्संग में आने की प्रेरणा देती है।”

कैसी अदभुत लीला होती है संतों की ! जवानों का कॉलर पकड़कर लाये, कमरे में बंद किया, डाँट लगायी परन्तु इस कठोरता के द्वारा उन्हें सच्चे मनुष्य बना दिये। प्रेम करके तो कृपा करते ही हैं लेकन सजा देकर भी वैसी ही कृपा करते हैं। दोनों तरफ से कल्याण करने की शक्ति भगवान और भगवद् प्राप्त संतों के अलावा और भला किसमें हो सकती है ?

‘श्रीरामचरितमानस’ में संतों की करुणा-कृपा का बखान करते हुए संत श्री तुलसीदास जी कहते हैं किः ‘कवियों ने संतों के हृदय को मक्खन के समान कह तो दिया परन्तु वे असली बात नहीं कह सके। क्योंकि मक्खन तो अपने को ताप मिलने के कारण पिघलता है जबकि परम पवित्र संत दूसरों के दुःख से पिघलते हैं।’

भारत के नवयुवकों में बढ़ रहे चारित्रिक पतन को देखते हुए पूज्य बापू ने युवाओं के चारित्रिक एवं आध्यात्मिक उत्थान के लिए ‘युवाधन सुरक्षा अभियान’ के रूप में चारित्रिक क्रांति का सूत्रपात किया है। पूज्य श्री के मार्गदर्शन एवं आशीर्वाद से यह अभियान पूरे भारत में चल रहा है। आइये, हम सभी इस महान् भारत  भावी कर्णधारों को सुसंस्कारवान् एवं चरित्रवान बनाने के दैवी कार्य में सहभागी बनकर अपना जीवन सार्थक करें।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2001, पृष्ठ संख्या 13-15, अंक 100

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