Tag Archives: Vivek Vichar

परम मंगल किसमें है ?


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु….हमारा संकल्प शिव संकल्प हो अर्थात् मंगलकारी संकल्प हो।

मंगलकारी संकल्प क्या है ? परम मंगलकारी परमात्मा को पाना। मनुष्य को विचार करना चाहिए किः ʹमेरे ऐसे दिन कब आयेंगे जब मैं संसार को मिथ्या समझकर अपने शाश्वत् तत्त्व आत्मा में आराम पाऊँगा… हर्ष और शोक से पार रहूँगा ?ʹ

मुस्कराकर गम का जहर, जिनको पीना आ गया।

ये हकीकत है कि जहाँ में, उनको जीना आ गया।।

आप सदैव प्रसन्न रहो। आपके हृदय में अनंत अनंत ब्रह्माण्डों का नायक परमात्मा मौजूद है और आप जरा जरा सी बात में परेशान हो रहे हो ? जगन्नियन्ता आपके साथ है और आप चुल्लु भर पानी के लिए चिल्ला रहे हो ? आपके भीतर अमृत का दरिया लहरा रहा है और आप नाली के पानी के लिए मनौतियाँ मान रहे हो ?

उठो….जागो अपनी महिमा में। कोई जीता है दुनिया के लिए तो कोई भोगों के लिए, कोई आता है आने के लिए तो कोई जाता है जाने के लिए… लेकिन भगवान का प्यारा आता भी भगवान के लिए है और जाता भी भगवान के लिए है, हँसता भी भगवान के लिए है और रोता भी भगवान के लिए है, खाता भी भगवान के लिए है और पीता भी भगवान के लिए है। जिसका लक्ष्य परमात्म-प्राप्ति हो, उसकी हर चेष्टा प्रभु के लिए हो जाती है।

संत कँवरराम जी कहते हैं-

तू ही थम्भो तू ही थूणी। तू ही छपर तू ही छाँव।।

ʹहे प्रभु ! तू ही मेरे जीवन का खंभा है, तू ही छप्पर है और तू ही मेरे जीवन की छाया है। तू मेरे जीवन का सर्वस्व है।ʹ

आज से आप भी अपने आत्मदेव को जीवन का सर्वस्व समझकर, संसार-स्वप्न से जागकर अपना तो कल्याण करें, अपने कुल का भी उद्धार कर लें।

जिनको आत्मदृष्टि नहीं मिली है उऩके लिए आकारवाले देव की भावना की गयी है और हम जैसी भावना करते हैं वैसा ही फल भी मिलता है। आत्मज्ञान भावना का फल नहीं है, वह तो बहुत ऊँची अवस्था है। जिन्होंने उस अवस्था का अनुभव किया है, उनके नाम से मानी हुई मनौतियाँ प्रकृति पूरी करती है। उनके नाम से भक्त कुछ करते हैं तो वह फलीभूत हो जाता है। उनका नाम लेने से मन पवित्र होने लगता है।

आत्मज्ञान ऐसा पवित्र में पवित्र है, उत्तम में उत्तम है, पाने में सुगम है, धर्मयुक्त है एवं प्रत्यक्ष फल देने वाला है। शांति प्रत्यक्ष है, आनंद प्रत्यक्ष है, माधुर्य प्रत्यक्ष है। ऐसे आत्मज्ञान को प्राप्त ब्रह्मवेत्ता महापुरुष की कृपा से ही परम मंगल होता है।

गुरुकृपा ही केवलं शिष्यस्यं परं मंगलम्।

जप-तप, व्रत-अनुष्ठान एवं देवताओं के वरदान से मंगल हो सकता है लेकिन परम मंगल तो ब्रह्मवेत्ता सदगुरु की कृपा पचाने से ही संभव है।

ब्रह्म ज्ञान का मार्ग बड़ा न्यारा है। आपका चित्त अपरिपक्व है तो उसमें राग-द्वेष आदि की खटाई पड़ी रहती है लेकिन गुरुकृपा से जब वह परिपक्व होता है तो उसमें मधुरता आती है। जब तक चित्त की परिपक्व अवस्था नहीं आये, तब तक आदर से साधन करना चाहिए। गुरु का दामन नहीं छोड़ना चाहिए। आत्मज्ञान के बाद भी शिष्य को गुरुदेव की शरण नहीं छोड़नी चाहिए।

श्रीगुरुगीता में आया हैः

यावत्कल्पान्तको देहस्तावद्देवि गुरु स्मरेत्।

गुरलोपो न कर्त्तव्यः स्वच्छन्दो यदि वा भवेत्।।

ʹहे देवी ! देह कल्प के अन्त तक रहे तब तक श्री गुरुदेव का स्मरण करना चाहिए और आत्मज्ञानी होने के बाद भी (स्वच्छन्द अर्थात् स्वरूप का छन्द मिलने पर भी) शिष्य को ब्रह्मज्ञानी गुरुदेव की शरण नहीं छोड़नी चाहिए।ʹ

बुद्धिमान्, पवित्रात्मा वही है जो आत्मज्ञान के लिए यत्न करता है। आत्मा परमात्मा हमसे दूर नहीं है, उसकी प्राप्ति कठिन नहीं है। उसके लिए कहीं जाना नहीं है और कुछ पाना भी नहीं है। वह तो नित्य प्राप्त है, केवल उस आनंदस्वरूप का अनुभव करना है। वह सत् चित् आनन्द स्वरूप है। सत्स्वरूप है कि देहादि में परिवर्तन होता है और वे नष्ट भी होते हैं लेकिन उस परमात्मा का अस्तित्त्व सदा रहता है। चित्स्वरूप है कि अंतःकरण में उस चेतन की अनुभूति होती है। जो सत् है, वह चेतन है और जो चेतन है वह ज्ञान स्वरूप है। बिना ज्ञान के चेतन जड़ हो जायेगा और बिना चेतन के ज्ञान शून्य हो जायेगा। अतः जो चेतन है वही ज्ञान है, चेतन के बिना ज्ञान नहीं होता। आत्मा आनन्दस्वरूप है इसीलिए थोड़ी-थोड़ी सुख की झलकें आती हैं। उस सच्चिदानंद आत्मस्वरूप में जाग जाओ तो बस, हो गया काम पूरा।

मेहनत तो आप लो भी करते हैं और ज्ञानी भी करते हैं लेकिन ज्ञानी की मेहनत ठीक निशाने पर है इसलिए उनको शाश्वत फल मिलता है। आपकी मेहनत ठीक निशाने पर नहीं है इसलिए वह मजदूरी हो जाती है और आपको उसका नश्वर फल मिलता है। एक गाड़ी की जगह दो गाड़ी आ गयी…. एक करोड़ की जगह दो करोड़ हो गये… एक की जगह दो बेटे हो गये… आखिर क्या  ? जब तक परमात्मा का ज्ञान नहीं हुआ, तब तक सब कुछ मिल जाये फिर भी क्या फायदा ?

जेकर मिले त राम मिले, ब्यो सब मिल्यो त छा थ्यो?

दुनिया में दिल जो मतलब, पूरी थियो त छा थ्यो ?

ʹअगर मिले तो उस आत्माराम का सुख मिले, आत्मदेव का ज्ञान मिले, आत्मदेव की स्मृति आ जाये। दूसरा भी जो मिलेगा वह कब तक टिकेगा ?ʹ

दुःख आये तो उसको देखे, उससे दुःखी न हों और सुख आये तो उसको देखे, उससे दुःखी न हों और सुख आये तो उसको देखे, उसमें फँसे नहीं तो समझो आत्मदेव की स्मृति है। ऐसे ही मान मिले और उसका अहंकार न हो तथा अपमान मिले और उसका विषाद न हो तो समझो आत्मदेव की स्मृति है।

आत्मज्ञान अपना आपा है अतः उसकी स्मृति तो आसान है। रोज उसकी स्मृति आती है। सुबह उठते हैं तो सबसे पहले मन में यही भाव उठता है किः ʹमैं हूँ।ʹ ʹमैं फलाना हूँ… मैं बी.ए. हूँ….ʹ यह सब बाद में आता है। ʹमैं हूँʹ वही तो आत्मा है, परमात्मा है। ʹभगवान है कि नहीं?ʹ इसमें संशय हो सकता है… ʹस्वर्ग है कि नहीं?ʹ इसमें संशय हो सकता है लेकिन ʹमैं हूँ कि नहीं?ʹ इसमें कोई संशय नहीं है।

जगत की वस्तुओं का ज्ञान पाना कठिन है क्योंकि हम उन्हें भूल भी जाते हैं लेकिन अपने-आपको कहाँ भूलते हैं ? गहरी नींद में कुछ नहीं रहता। फिर भी जब उठते हैं तब बोलते हैं कि बड़ी गहरी नींद आयी।ʹ लेकिन गहरी नींद को देखने वाला, उसका आनंद लेने वाला तो था। आनंद की झलक उसी आत्मा से मिलती है। मन बदल जाता है तो फिर आनंद की वह झलक नहीं मिलती लेकिन आत्मा तो ज्यों-का-त्यों रहता है। झलक लेने के बजाय झलक के मूल उस आनन्दस्वरूप को पहचानकर उसमें टिक जायें तो आपका तो कल्याण हो ही जायेगा, जो आपके दर्शन करेगा उसका भी मंगल हो जायेगा।

परमात्मा का वह नित्य नवीन आनंद, रस एवं माधुर्य घट-घट में है। ऐसा परमात्मा जो सत् , चित् एवं आनंदस्वरूप है, वही हमारी आत्मा होकर बैठा है और आज तक हमने उसे जानने का प्रयास नहीं किया तो हम बुद्धिमान होते हुए भी बुद्धू हैं।

भाषा, कला आदि का ज्ञान अंत में व्यर्थ हो जाता है लेकिन परमात्मा का ज्ञान एक बार भी हो जाये तो फिर सदा-सदा के लिए सब दुःखों से मुक्ति दिला देता है।

श्री रामकृष्ण परमहंस कहते थेः “पहले सत्स्वरूप ईश्वर को जान लो फिर दुनिया का ज्ञान जानना। पहले सत्स्वरूप ईश्वर को पा लो फिर दुनिया का जो पाना है, पा लेना।”

फिर जानना क्या और पाना क्या ? प्रकृति तो आपकी दासी होकर रहेगी। सब वस्तुएँ आपके चरणों में न्यौछावर हो जायेंगी…. परम मांगल्य के द्वार खुल जायेंगे।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2001, पृष्ठ संख्या 3,4 अंक 99

ૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐ

 

मन बुद्धि को परमात्मा में लगायें….


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग प्रवचन से

ʹश्रीमद् भगवद् गीताʹ में आया हैः

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।

निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः।।

ʹमुझमें मन को लगा और मुझमें ही बुद्धि को लगा। इसके उपरान्त तू मुझमें ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।ʹ (गीताः12.2)

भगवान यहाँ जो ʹमुझमेंʹ शब्द बोलते हैं वह रथ पर विराजमान विग्रह के लिए नहीं बोलते, अपितु समग्र ब्रह्माण्ड में व्याप्त एवं आकाश से भी सूक्ष्म जो चिदानन्द स्वरूप है, समस्त प्राणियों के अंतःकरण में जो आत्मरूप से स्थित है उसको लक्ष्य करके ʹमुझमेंʹ शब्द का प्रयोग करते हैं।

शिष्य जब गुरुदेव से कहता है किः ʹगुरुदेव ! आप कण-कण में विद्यमान हैं….ʹ तो इसका अर्थ यह नहीं है कि गुरुदेव का शरीर कण-कण में घुस गया है। नहीं, जो गुरुतत्त्व है वह कण-कण में, जर्रे-जर्रे में छुपा है। जो गुरुदेव को शरीर मानेगा, वह स्वयं शरीर से पार कैसे जायेगा ? जो भगवान को देहधारी मानेगा, वह देह के बंधन से कैसे मुक्त होगा ?

भगवान और सदगुरु देह में होते हुए भी देह से परे हैं। श्रीमद् आद्य शंकराचार्य ने कहा हैः

अखंडमंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।

तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।।

भगवान कहते हैं- ʹतू मुझमें मन को लगा और मुझमें ही बुद्धि को लगा।ʹ वास्तव में देखा जाये तो मन और बुद्धि भगवान के सिवाय कहीं लग भी नहीं सकते हैं क्योंकि भगवान के सिवाय दूसरा कुछ है ही नहीं। सृष्टि के आदि में भगवान, अंत में भगवान… तो अभी जो है, वास्तव में भगवान ही है लेकिन माया के कारण हम जान नहीं पाते ।

भगवान की माया विवर्त दिखाती है। जो विवर्त है उसकी को संसार बोलते हैं और संसार सरकता जाता है अर्थात् बदलता जाता है। धातु वही की वही, लेकिन नाम और और रूप बदलते जाते हैं, इसी का नाम माया है। माया में स्थिरता नहीं है, शाश्वत सुख नहीं है, नित्य परिवर्तन है।

परिवर्तन जिसके आधार पर होता है वह आधार और जिसमें परिवर्तन होता है वह है आधेय। जैसे पानी में काई जम जाती है तो काई का आधार है पानी और आधेय है काई। आधेय काई अपने पानी को ढँक देती है। ऐसे ही माया आधेय है और  परमात्मा आधार है। काई पानी से पैदा होती है, पानी को ही ढँकती है और पानी में ही रहती है तथा उसमें जन्तु भी होते हैं। जन्तुओं में भी पानी के अंश होते हैं, काई में भी पानी के अंश होते हैं और मूल में भी पानी होता है। ऐसे ही मूल में परमात्मा, माया में भी चेतना परमात्मा की और माया से उत्पन्न हुए जीव में भी चेतना परमात्मा की होती है।

कबीर जी ने कहा हैः

जल में कुंभ कुंभ में जल है, बाहर भीतर पानी।

फूटा कुम्भ जल जलै समाना, यह अचरज है ज्ञानी।।

ईश्वर का पूर्ण ज्ञान होने पर ज्ञानी का आचरण कैसा होता है ? घड़े में पानी और पानी में घड़ा… घड़े की आकृति को विचार से तोड़ दें तो बाहर भीतर केवल पानी ही होता है। ऐसे ही देह को ʹमैंʹ मानने की मन-बुद्धि की जो बेवकूफी है उसे हटाकर, देह के भीतर और बाहर व्यापक चिदाकाश जो चैतन्य है उसमें मन-बुद्धि लगा दें तो फिर आप भगवान से अलग नहीं रहते और भगवान आपसे अलग नहीं रहते।

भगवान कहते हैं-

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।

अर्थात् ʹतू मेरे में मन और बुद्धि को लगा।ʹ

जब ʹमनʹ बोलते हैं तब मन के साथ चित्त को मान लेना चाहिए। ʹबुद्धिʹ बोलते हैं तब उसके साथ अहंकार को भी समाविष्ट कर लेना चाहिए। वैसे अंतःकरण चतुष्ट्य कहा जाता हैः मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। मन में चित्त का समावेश और बुद्धि में अहंकार का समावेश करना। जब मन बुद्धि को भगवान में लगा देंगे तब स्वयं भगवन्नमय हो जायेंगे।

यदि मन बुद्धि नश्वर देह और नश्वर संसार में लगे हैं तो फिर कितना भी तप करें, व्रत-उपवास करें, उसका फल नश्वर ही होगा। मन-बुद्धि जहाँ से उत्पन्न होते हैं उस चैतन्यस्वरूप परमात्मा को ʹमैंʹ मानकर उसमें लगे रहे तो फल शाश्वत होगा।

नानकजी ने ठीक ही कहा हैः

देखत नैन चल्यो जग जाई। का माँगूँ कछु थिर न रहाई।।

ʹसंसार में ऐसी कोई चीज नहीं है जो स्थिर रहे, तो भगवान से क्या माँगें ?ʹ

“भगवान ! जिसमें हमारा मंगल हो और जो आपको उचित लगे, वही दीजिये।”

भगवान कहेंगे- “तुम मुझमें मन-बुद्धि को लगा दो तो तुम और हम एक हो जायेंगे। अद्वैत ज्ञान हो जायेगा।”

यह है भी आसान और शाश्वत भी है। केवल काई जहाँ से पैदा हुई है और काई ने जिसको ढाँक दिया है उसको जानना है।

किन्हीं साधु बाबा के पास आकर एक व्यक्ति ने पूछाः “महाराज ” मैं बड़ा प्यासा हूँ। थक गया हूँ। आगे पानी है ?”

महाराजः “बेटा ! पानी है। बहुत शीतल और स्वच्छ है। प्यास बुझ जायेगी।”

“बेटा ! बायें हाथ की और सौ कदम की दूरी पर है। लेकिन हरा-हरा सा दिखेगा क्योंकि काई से ढँका है। पानी शुद्ध है।”

वह व्यक्ति गया, देखा तो कहीं पानी नहीं दिखा। फिर याद आया कि काई (शैवाल) से ढँका है। कुछ हरा-हरा सा दिखा। निकट गया, काई को हटाया और चुल्लु भर पिया तो शीतल, अमृत जैसा जल ! पेट भर पिया और अपनी प्यास बुझाई। थका तो था ही। तालाब के किनारे एक वृक्ष के नीचे थकान मिटाने के लिए थोड़ी देर बैठा। जल तो पुनः काई से ढँक गया लेकिन अब उस व्यक्ति को जल का अज्ञान नहीं है क्योंकि उसने काई को हटाकर जल का अनुभव कर लिया है। ऐसे ही केवल तीन मिनट के लिए अज्ञान की काई हट जाये एवं गुरुकृपा से साधक परमात्म-तत्त्व का अनुभव कर ले तो फिर भले बाहर से अज्ञानी की नाईं संसार का व्यवहार करता दिखेगा लेकिन भीतर से उस अनुभव से तृप्त रहेगा। बाहर से ब्रह्म भले ढँका सा दिखेगा लेकिन जैसे जब चाहे तब वह काई हटा हटाकर जल पी सकता है, वैसे ही वह ज्ञानी पुरुष जब चाहे तब अंतरात्मा में गोता मारकर आत्मानुभव कर लेगा। कितना आसान है !

जब चाहें तब प्रधानमंत्री से मुलाकात नहीं हो सकती, जब चाहे सेठ को नौकर भी मिल सकता लेकिन वह परमात्मा सदा-सर्वत्र मिला हुआ ही है। मध्य रात्रि को शांत होकर बैठ गये तब भी उसका अनुभव, उसके रस में सराबोर…. सुबह, दोपहर, शाम को भी सराबोर… देश-परदेश में, बीमारी-तंदरुस्ती में, गृहस्थी-संन्यासी में….. जब चाहो तब उस परमात्मा के रस में सराबोर हो सकते हैं।

एक गृहस्थ संत थे। वे आस-पास के लोगों को बगीचे में बैठाकर सत्संग सुनाते थे किः ʹशरीर नश्वर है, पाँच भूतों का पुतला है। जो भी पैदा होता है वह अवश्य मरता है, किन्तु आत्मा अमर है। घड़े बनते हैं, फूटते हैं लेकिन आकाश ज्यों का त्यों रहता है। ऐसे ही शरीरर जन्मता-मरता है लेकिन आत्मा ज्यों-की-त्यों रहती है। अपने को आत्मा मानो। मन-बुद्धि को भगवान में लगाओ। संसार की मोह-माया में मत फँसो।ʹ

एक दिन उनका पोता मर गया। वे संत घर जाकर छाती कूटने लगे किः ʹबेटा ! तू क्यों चला गया ? तेरे बिना हम कैसे जियेंगे ?ʹ ऐसा कहकर वे इतना रोये, इतना रोये कि उनका बेटा एवं उनकी बहू जो पुत्र शोक से रो रहे थे, वे उन्हीं को चुप कराने लगे।

फिर बेटे की अंतिम क्रिया की, स्नानादि किया एवं पिता को खाना बनाकर खिलाया। पिता तो संत थे लेकिन वे लोग उनको नहीं जानते थे। पड़ोसी भी उन्हें अपना मित्र मानते थे। किसी ने पूछ लियाः

“भाई ! आप बातें तो बड़ी-बड़ी करते हैं कि ʹशरीर नाश्वान है, आत्मा अमर है।ʹ हमको तो उपदेश देते हैं और आपके पोते का देहांत हो गया तो आप इतना रोये कि आपके बहू-बेटे भी आपको चुप कराने लगे।”

संतः “अभी छोड़ो। बहू की सहेलियाँ और बेटे के मित्र सुन लेंगे। बाद में बतायेंगे।”

फिर समय पाकर सब बगीचे में मिले तब संत ने कहाः “मैं उस दिन समझकर रोया था। बेटे का इकलौता बेटा मर गया था। माँ-बाप दोनों रो रहे थे। यदि मैं उनको चुप कराने जाता तो वे और रोते कि ʹआपको क्या है ? हमारा इकलौता बेटा मर गया, हमारे तो मानों प्राण ही चले गये हैं….ʹ ऐसा करके वे ज्यादा रोते। मैंने सोचा, उनको चुप कराने के लिए रोने में अपने को घाटा भी क्या है ? मैं समझकर रो रहा था तो दुःख नहीं हो रहा था। वे मोह से रो-रोकर अपना बुरा हाल कर लेते।”

रंगमंच पर कोई भिखाई की भूमिका अदा करता है किः ʹदे दो, कोई पाँच-दस पैसे दे दोઽઽઽ.. तुम्हारे बाल-बच्चे सुखी रहेंगे….ʹ वही व्यक्ति रंगमंच से उतरने के बाद आराम से चाय-नाश्ता करता है और 100 रूपयों की नोट जेब में डालकर मजे से रह लेता है। लेकिन उसका अभिनय ऐसा होता है कि दर्शक को लगता है कि ʹहम सब उसे 1-1 रूपया दे देवें।

जो समझकर रोता है उसे दुःख के समय भी कोई दुःख नहीं होता।

अष्टावक्र जी महाराज राजा जनक से कहते हैं-

संतुष्टोपि न सन्तुष्टः खिन्नोपि न च खिद्यते।

तस्याश्चर्यदशां तां तां तादृशा एव जानते।।

ʹधीर पुरुष संतुष्ट होकर भी संतुष्ट नहीं होता है और दुःखी होकर भी दुःखी नहीं होता है। उसकी इस आश्चर्यमय दशा को वैसे ज्ञानी ही जानते हैं।ʹ (अष्टावक्र गीताः 18.56)

ऐसे महापुरुष शरीर के जीवन को अपना जीवन नहीं मानते और शरीर की मौत को अपनी मौत नहीं मानते क्योंकि उन्होंने अपने मन-बुद्धि को चैतन्यस्वरूप परमात्मा में लगा दिया है। उन्होंने समझ लिया है किः ʹजिसकी मौत होती है वह मैं नहीं हूँ और जो मैं हूँ उसकी कभी मौत नहीं होती।ʹ

कुछ लोग मानते हैं किः ʹइतने व्रत-उपवास करेंगे, इतने जप-तप करेंगे तब भगवान मिलेंगे…. इतने होम-हवन करेंगे तब भगवान मिलेंगे… हम मर जायेंगे तब भगवान के धाम में जायेंगे….ʹ उनकी यह धारणा ही उन्हें भगवान से दूर कर देती है।

वास्तव में भगवान मिला-मिलाया ही है किन्तु मन-बुद्धि परिवर्तनशील माया में लगे हैं इसलिए मिला-मिलाया भगवान भी पराया लगता है और पराई नश्वर चीजें अपनी लगती हैं। जिसे आप ʹमैंʹ बोलते हैं वह नश्वर शरीर भी आपका नहीं है, माया का विलासमात्र है। जिसकी सत्ता से आप ʹमैं-मैंʹ बोलते हैं उसकी गहराई में जाओ तो अपने स्वरूप का निश्चय हो जायेगा। वास्तव में निश्चय ʹस्वʹ में होता है और ʹस्वʹ शाश्वत में रहता है। दर्शनशास्त्र की यह सूक्ष्म बात है। इसको सुनने मात्र से हजारों कपिला गौदान करने का फल मिलता है।

मन ! तू ज्योतिस्वरूप, अपना मूल पिछान।

यदि मन अपने मूल को पहचान ले तो अपने-आप भगवान में लग जायेगा। बुद्धि अपने मूल को पहचानने लगे तो अपने-आप भगवान में लग जायेगी। यह ʹमैं-मैंʹ जिस चैतन्य से उत्पन्न होता है उसका ज्ञान हो जाये तो सभी दुःखों का सदा के लिए अंत हो जाये। लेकिन होता क्या है कि, यह ʹमैंʹ मन-इन्द्रियों से जुड़कर नश्वर चीजों को ʹमेराʹ मानने लगता है। ऐसे ʹमेरा-मेराʹ करते-करते कई बदल जाते हैं लेकिन ʹमैंʹ वही का वही रहता है। जिस ʹमैंʹ से मन बुद्धि उत्पन्न होते हैं, उसी ʹमैंʹ में मन बुद्धि को लगा दें तो शाश्वत के द्वार खुल जायें…..

उस वास्तविक ʹमैंʹ में मन बुद्धि को लगाने का अभ्यास करना चाहिए, लेकिन यह अभ्यास से नहीं होता।

“बापू ! अभ्यास करना चाहिए ऐसा आप कहते हैं और फिर ऐसा भी कहते हैं कि अभ्यास से नहीं होता है ?”

शरीर को ʹमैंʹ मानने का जो उल्टा अभ्यास पड़ गया है उस उल्टे को सुलटा करने के लिए अभ्यास करना चाहिए। जैसे रास्ता भूल कर आगे निकल जाते हैं तो वापस आना पड़ता है, ऐसे ही मन-बुद्धि जो नश्वर शरीर और संसार में लग गये हैं उन्हें ईश्वर में लगाना है। वैसे तो मन बुद्धि ईश्वर में ही लगे हुए हैं।

ईश्वर से ही मन बुद्धि स्फुरित होते हैं। जैसे तरंगें पानी से ही उठती हैं, ऐसे ही मन बुद्धि चैतन्यस्वरूप परमात्मा से ही उठते हैं। ये जहाँ से उठते हैं उसी को सत्य मानकर उसमें लग जायें तो काम बन जाये… लेकिन उठकर बाहर भागते हैं।

जैसे, इकलौता लड़का अपने करोड़पति पिता से अलग होकर एक दो कमरे को अपना माने, 100-200 रूपये छुपाकर रखे और कहे किः ʹये 200 रूपये मेरे हैं…ʹ तो उसे क्या कहा जाये ? अरे ! अपने को पिता माने तो उनकी करोड़ों की मिल्कियत उसी की है। ऐसे ही मन-बुद्धि को ईश्वर में लगाया तो सारा ब्रह्माण्ड आपका है, परमात्मा भी आपका है, ब्रह्माजी की ब्राह्मी स्थिति भी आपकी है….. आप ऐसे व्यापक ब्रह्म हो जाते हैं ! फिर सारी सृष्टियाँ आपके ही अंदर हैं, आप इतने महान हो जाते हैं ! सारे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उद्योगपति जिस परमात्मा से हैं उस परमात्मा के साथ आपका ऐक्य हो जाता है।

फिर धनाढ्य और सुखी होने की इच्छा नहीं रहती, कुछ बनने की इच्छा और बिगड़ने की चिन्ता नहीं रहती, मौत का भय और जीने की इच्छा नहीं रहती, ऐसे निर्वासनिक पद में आपकी स्थिति हो जाती है।

फिर तो आपके मन-बुद्धि स्वाभाविक ही परमात्मा में लगे रहेंगे। आपके द्वारा स्वाभाविक ही परमात्मा में लगे रहेंगे। आपके द्वारा स्वाभाविक ही लोगों का हित होने लगेगा लेकिन आपको करने का बोझ नहीं लगेगा। समाज की सच्ची सेवा या सच्ची उन्नति तो ज्ञानियों के द्वारा ही होती है। जिसे ज्ञान नहीं हुआ, आत्मतृप्ति नहीं मिली, स्वयं को जिसने ठीक से नहीं देखा वह औरों को क्या ठीक दिखायेगा ? सच्ची सेवा तो ज्ञानवान महापुरुष ही करते हैं, बाकी की सब कल्पित सेवाएँ हैं।

लोगों को नश्वर चीजें दिला दीं, अपने नश्वर अहं को पोष दिया तो क्या हो गया ? क्या सब लोग दुःख से मुक्त हो गये ? हजारों लोग सेवा करते हैं, हजारों लोग सेवा लेते हैं लेकिन सेवा करने वालों को कोई-न-कोई दुःख लगा रहता है और सेवा लेने वाले भी दुःखी रहते हैं। सुखी तो केवल वे ही हैं जिन्होंने ज्ञानी महापुरुष की शरण ली है, जिन पर ज्ञानी महापुरुष की करूणा कृपा है और जिन्होंने ज्ञानी महापुरुष की सेवा की है। ऐसे साधक फिर स्वयं दुःखभंजन हो जाते हैं।

अतः भगवान के वचनों को समझकर मन-बुद्धि को भगवान में लगाने का अभ्यास करना चाहिए। भगवद् प्राप्त महापुरुषों के सत्संग का श्रवण करें अथवा तो भगवान की चर्चा करें, इससे मन बुद्धि भगवान में लगेंगे।

ʹमैं-मेराʹ ʹतू-तेराʹ देखते हैं तो मन बुद्धि परेशानी में लगते हैं। ʹमैं-मेराʹ ʹतू-तेराʹ दिखेगा तो सही, लेकिन जिस परमात्मा की सत्ता से दिखता है उस पर नजर डालें तो मन-बुद्धि परमात्मा में लगने लगेंगे। फिर तो…

हरदम खुशी… हर हाल खुशी…

जब आशिक मस्त फकीर हुआ,

तो क्या दिलगीरी ? बाबा !

गुरुकृपा पचाने की कला आ जाये तो मुक्त होना बड़ा आसान है। जो पूर्ण परमात्मा है उसमें अपने मन  बुद्धि को लगा दें एवं बाकी के कार्यों को यत्न करके पूरा करें। जो भी कार्य हो, सेवा हो, उसे तत्परता से करें। सेवाकार्य तत्परता से करेंगे तो मन-बुद्धि उसी में स्थिर होंगे।

श्रीरामकृष्ण परमहंस कहा करते थेः ʹʹजो अपने सेवाकार्य में तत्पर नहीं है, वह अपनी आत्मा की उन्नति कैसे कर सकता है ?”

पलायनवादिता नहीं तत्परता चाहिए। अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताएँ न बढ़ायें, व्यक्तिगत आदतें पूरी करने के पीछे न लगें। जो भी अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति आये तो ʹयह भी गुजर जायेगा…ʹ ऐसा करके मन बुद्धि को ईश्वर में लगायें। अन्यथा मन-बुद्धि अनुकूलता में लग जायेंगे तो थोड़ी-सी प्रतिकूलता भी मुसीबत पैदा कर देगी। मन-बुद्धि वाहवाही और यश-मान में लग जायेंगे तो मान थोड़ा कम मिलने पर या अपमान होने पर परेशानी हो जायेगी। मन-बुद्धि शरीर में लगेंगे तो मरते समय शरीर में आसक्ति रह जायेगी और यह आसक्ति प्रेतयोनि में भटकायेगी। मन-बुद्धि को पुण्य-कार्य में, देवी-देवता के भजन में लगायेंगे तो पुण्य बढ़ने पर मनुष्य लोक में आयेंगे। धर्मविरुद्ध आचरण करने पर पाप बढ़ेंगे तो हल्की योनियों में जायेंगे। मन-बुद्धि ईश्वर मे लगायेंगे तो ईश्वर से मिलकर ईश्वरमय, ब्रह्ममय हो जायेंगे… मर्जी आपकी है।

इसीलिए भगवान कहते हैं-

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।

निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः।।

ʹमुझमें मन को लगा और मुझमें ही बुद्धि को लगा। इसके उपरान्त तू मुझमें ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।ʹ

देर-सवेर मन-बुद्धि को परमात्मा में लगाना ही पड़ेगा तो फिर अभी से क्यों नहीं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2001, पृष्ठ संख्या 3-7, अंक 98

ૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐ

भारतवासियो ! अब जागो


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

शास्त्रों में आता हैः

पूर्वे जनुषि या नारी गर्भघातकारी ह्यभूत्।

गर्भपातेन दुःखार्ता सात्र जन्मनि जायते।।

ʹजो स्त्री पूर्वजन्म में गर्भ का घात करती है, वह इस जन्म में भी गर्भपात का दुःख भोगने वाली होती है अर्थात् उसके कोई संतान नहीं होती।ʹ

अपने पेट में दवाएँ डलवाकर अथवा कातिल साधनों द्वारा बालक के टुकड़े-टुकड़े करके गर्भपात करवाना क्या पवित्र कार्य कहा जायेगा ? गर्भपात को पाप ही नहीं, महापाप माना गया है। जिस महिला ने गर्भपात करवाया हो, उस महिला के हाथ का भोजन करने से साधु-संतों की भी तपस्या नष्ट होती है तो उसके घर के लोगों के कितने पुण्य बचते होंगे ?

सोनोग्राफी करायी…. कन्या है तो करवा दो गर्भपात… कई बार तो कन्या होती ही नहीं है, पुत्र होता है, परन्तु पैसों की लालच में सोनोग्राफीवाले कन्या बता देते हैं।

उल्हासनगर, नंबर-3 में एक परिवार में प्रथम एक कन्या आयी। दूसरी सन्तान पुत्र हो, इस कामना से वे दम्पत्ति सत्संग में आये। पाँचवे महीने सोनोग्राफी करायी गयी तो डॉक्टर ने कहाः “कन्या है।” वे लोग घबरा गये। फिर वे अमदावाद आश्रम आये एवं बड़ बादशाह की प्रदक्षिणा करके उन्होंने पुत्र प्राप्ति के लिए मनौती मानी।

जब नौवाँ महीना शुरु हुआ तो उन्होंने पुनः सोनोग्राफी करवायी। रिपोर्यो में आया किः ʹलड़की है।ʹ यह सुनकर पति-पत्नी खूब रोये। रात्रि में स्वप्न में उनके गुरुदेव ने कहाः ʹघबराओ नहीं, बेटा होगा।

अतः गर्भपात के महापाप से तो वे बच गये लेकिन उनका रोना जारी रहा। जब प्रसूति हुई और बेटा आया तो बोल पड़ेः “पूज्य बापू जी ने लड़की में से लड़का बना दिया है।”

मैं व्यासपीठ पर बैठा हूँ, सत्य कहता हूँ कि मैंने लड़की में से लड़का नहीं बनाया, वह सचमुच में लड़का ही था। केवल स्वप्न में उन्हें प्रेरणा मिली कि ʹलड़का है, घबराओ नहीं।ʹ

अगर कन्या भी आ जाये तो क्या है ? आऩे वाले 5-7 वर्षों के बाद आप देखेंगे कि अभी जिन कन्याओं के माँ बाप को लड़के के माँ-बाप को हाथ जोड़ने पड़ते हैं उन्हीं को लड़के के माँ-बाप हाथ जोड़ेंगे किः ʹहमारा बेटा कुँवारा है, कुछ कर दीजिये।ʹ

आज से 52-53 वर्ष पूर्व मेरे भाई की जो शादी हुई थी वह हाथा जोड़ी करके ही हुई थी क्योंकि उस जमाने में लड़के ज्यादा थे, कन्याएँ कम। मेरे नगरसेठ पिता ने अपने आदमी के द्वारा एक हलवाई के यहाँ हाथ जोड़कर यह संदेश भिजवाया किः ʹआपके यहाँ कन्या है, हमारे जेठानंद की कुछ व्यवस्था करवा दें।ʹ चौदह वर्षीय जेठानंद कहीं शादी के बिना न रह जाये अतः 12-13 वर्ष की कन्या एवं चौदह वर्षीय जेठानंद का मंगलम् भगवान….ʹ हुआ अर्थात् विवाह हुआ।

विभाजन के बाद भारत आये फिर भी वर्षों तक दोनों को पता ही नहीं था कि वे पति-पत्नी हैं। वे लोग साथ में खेलते थे, मैं भी उनके साथ खेलता था। जब कबड्डी के खेल में मेरा भाई भाभी को हराने के लिए हाथ मारता तो वह कहतीः “परायी कन्या को मारता है ? आज एकादशी है, तुझे शरम नहीं आती है ? मुए !”

उस भाभी को पता नहीं था कि वह जिसे ʹमुआʹ कह रही है वही उसका पति है। वर्षों के बाद उन्हें पति-पत्नी के जगत का ख्याल आया।

कहने का तात्पर्य यह है कि ʹगर्भ में कन्या हैʹ यह मानकर गर्भपात न करवायें। गर्भपात महापाप है। संयम से जियें।

कई लोग ऐसा प्रचार करते हैं किः ʹखुदा की खेती है, बढ़ने दो… बस्ती बढ़ेगी तो ʹवोट बैंकʹ बढ़ेगा, अपने वाले आयेंगे और अपने वालों का यहाँ झण्डा भी लगेगा।ʹ तो कई लोग कहते हैं किः ʹGift of the God.ʹ अर्थात् बच्चा भगवान का दिया हुआ उपहार है। बढ़ाये जाओ… ऐसा होगा तो भारत में हमारा साम्राज्य पुनः स्थापित होने की सम्भावना बढ़ जायेगी….ʹ जबकि गीता-रामायण एवं उपनिषदों में, भगवन्नाम में, परोपकार एवं सहिष्णुता में विश्वास रखने वाली जनता को सिखाया जाता है किः ʹगुलशन में बस एक ही फूल, दूसरी कभी न होवे भूल…. दूसरा अभी नहीं, तीसरा कभी नहीं।ʹ किन्तु दूसरे लोगों के 8-8 और 12-12 हैं, उसका क्या ?

कोई कहे किः ʹउन्हें भले हैं हमें तो सिंह जैसा एक ही बेटा हो तो बहुत है।ʹ परन्तु भैया ! वोटिंग का जमाना है। आपका सिंह पिंजरे में भूखा रहेगा और बकरेवालों का राज्य हो जायेगा। थोड़े समझदार बनो। एक का एक बेटा है…. बेटी तो ससुराल गयी और न करे नारायण.. बेटा पत्नी के संग में आकर घरजमाई बन जाये तो आपका कौन ? विदेश में कमाने गया अथवा देश की सीमा पर गया तो आपका कौन ? न करे नारायण… फिर भी बीमार पड़े या दुर्घटनाग्रस्त हो जाये तो आपका कौन ? थोड़ा समझ जाओ, भैया !

कम-से-कम देश को ऐसे 2-4 बेटे देते जाना जो भारतीय संस्कृति के संस्कारों से सम्पन्न हों। यह भी देश की सेवा है। एकाध परदेश से पैसे खींच लाये, एकाध देश की सेवा के लिए सेना में जाये, एकाध यहीं रहकर समाज एवं धर्म की सेवा में लगे और एकाध माता पिता की सेवा करे।

जल्दबाजी में ऑपरेशन मत करवा लेना। जो शराबी-कबाबी हैं और जिन्हें राष्ट्र से प्रेम नहीं है ऐसे लोग शादी से पहले ही ऑपरेशन करवा दें तो राष्ट्र का भला होगा। लेकिन जिनमें भगवान की भक्ति है, परोपकारिता है, दिव्य ज्ञान है वे कभी ऑपरेशन न करायें, गर्भपात की तो बात भी न करें।

कोई कहेः “बापू ! बस्ती बढ़ जायेगी तो लोग खायेंगे क्या ?”

जनसंख्या-नियंत्रण का काम परमात्मा का है, किसी नेता या व्यक्ति का नहीं। जब भारत की जनसंख्या 40 करोड़ थी तब गेहूँ, खाद्य तेल वगैरह बाहर से आता था। आज 100 करोड़ से भी ऊपर का आँकड़ा है और भारत से चावल एवं अन्य खाद्य सामग्रियाँ विदेशों में जा रही हैं। आवश्यकता आविष्कार की जननी है। जनसंख्या बढ़ेगी तो आवश्यकताएँ भी बढ़ेंगी और आवश्यकताएँ बढ़ेंगी तो नये-नये आविष्कार भी होंगे।

ʹक्या खायेंगे ?ʹ यह सोचकर अपने ही बच्चों को मार देना कहाँ तक उचित है ? जो जीव 84 लाख योनियों में भटकते-भटकते आप जैसे पवित्र कुलों में दिव्य ज्ञान पाने, भक्ति, साधना-सेवा करके मुक्ति के मार्ग पर जाने के लिए आया, उसी को आप पैसे देकर, जहरीले दवाओं-इन्जैक्शनों के द्वारा अथवा कातिल औजारों के द्वारा टुकड़े-टुकड़े करवाकर फिंकवा दोगे ?

डॉक्टरों की एक गुप्त बात हैः ʹWork number on finished or not ?ʹ  अर्थात् पहले नंबर का काम पूरा हुआ कि नहीं ? पहले नंबर का काम क्या है ? गर्भ के अंदर जो बालक है उसके सिर के टुकड़े-टुकड़े हुए कि नहीं ?

आपके यहाँ जो निर्दोष नन्हा-मुन्ना आऩे वाला था, जिसने आपका कुछ भी नहीं बिगाड़ा था, गर्भ में जिसके आपने मात्र से आपको (गर्भ धारण करने वाली पत्नी को) आनंद मिला था, ऐसे निर्दोष ऋषि के आप टुकड़े-टुकड़े करवाकर कचरे में फिंकवा दो, यह कहाँ तक उचित है ?

यह कर्मभूमि है। जो जैसे कर्म करता है, वैसे ही फल पायेगा।

करम प्रधान बिस्व करि राखा।

जो जस करई सो तस फलु चाखा।।

(श्रीरामचरित. अयोध्याकाण्डः 218-2)

गर्भपात ʹभ्रूणहत्याʹ कहलाती है। इन्सान की हत्या से धारा ʹ302ʹ की कलम लगती है, परन्तु भ्रूणहत्या ऋषि हत्या के तुल्य है। परलोक में उसकी सजा अवश्य भुगतनी पड़ती है।

शास्त्रकारों ने तो ऐसा भी कहा है कि जो महिला गर्भपात कराती है, उसे फिर 10-10 जन्मों तक सन्तान नहीं होती। अतः आज तक जो भूल हो गयी उसका प्रायश्चित करके फिर वह भूल न दोहरायी जाये-इसकी सावधानी रखो।

ʹजनसंख्या बढ़ जायेगी….ʹ ऐसी चिन्ता करवाने वालों को ही इसकी चिन्ता करने दो। वे तो रोज संख्या बता देंगे। थोड़ा विवेक का उपयोग करो, संयम एवं समझ का उपयोग करो।

जो जीव पवित्र कुल, पवित्र वातावरण में आने की इच्छा रखता है उसे टुकड़े-टुकड़े करवाकर नाली में फेंक दोगे और वही जीव फिर आपके देश में ʹबम ब्लास्टिंगʹ करे ऐसे परिवार में जायेगा तो ? आपके देश के टुकड़े करवाने वाली संस्कृति में जाकर जन्म लेगा तो ? आपके देश में हर साल डेढ़ करोड़ बालकों को सात्त्विक लोगों के यहाँ आने से रोककर नाली में फेंक दिया गया, वे ही फिर विधर्मियों के यहाँ जन्म लें तो आपको वर्ष में 3 करोड़ जनसंख्या की हानि होगी। फिर आप कहाँ जाकर रहोगे ?

दुबई में मंदिर बनाने की सख्त मनाई है। एक जगह पर कुछ लोग गुप्त रूप से मंदिर बना रहे थे तो उन पर डंडे पड़े और उन्हें कहा गया किः ʹयहाँ नहीं बनाना है।ʹ अमुक पर्व-त्यौहार पर आप एयरपोर्ट पर उतरो एवं आपके हाथ में कोई अच्छी पुस्तक हो जिसमें किसी देवी-देवता का फोटो हो तो आपको वापस भेज दिया जायेगा। फिर आप कहाँ रहने जाओगे ? जो राष्ट्र धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं वहाँ तो दूसरे धर्म के लोग पूजा-स्थल नहीं बना सकते लेकिन जो राष्ट्र धर्मनिरपेक्ष कहलाते हैं वे भी व्यवहार में अपने धर्म को बढ़ावा देने वाली नीति ही अपनाते हैं। जैसे कि स्विटजरलैण्ड में दूसरे धर्म के लोग अपना पूजा-स्थल नहीं बना सकते। जबकि आपके देश में बीच रास्ते में भी लोग अपना पूजा-स्थल बना लेते हैं। अतः आपके ही देश में आपको सौतेली माँ की संतान के रूप में न चलना पड़े, इसके लिए जरा सावधान हो जाओ।

अपने मन के साथ, अपने शरीर के साथ, अपनी संतानों एवं राष्ट्र के साथ जुल्म न करो। अपने शरीर को स्वस्थ रखो, संयमी बनो एवं राष्ट्र के लिए अपनी संतति को भई स्वस्थ एवं संयमी बनाओ। स्वयं भी महानता के पथ पर चलो और अपनी संतति को भी उसी पर अग्रसर करो। इसके लिए सत्शास्त्रों का अध्ययन, संतों का संग, सत्संग का श्रवण, जप-ध्यान, साधन-भजन करो ताकि आपकी बुद्धि में बुद्धिदाता का प्रकाश आये…. आपकी बुद्धि, बुद्धि न रहे, ऋतंभरा प्रज्ञा बन जाये… तभी आपका मानव जीवन सार्थक होगा, धन्य-धन्य होगा। आप भी तरोगे, अपने सात कुल के भी तारणहार बनोगे।

ૐ आनंद… ૐ….ૐ….

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2001, पृष्ठ संख्या 22-24, अंक 98

ૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐ