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तीन तत्त्वों का मिश्रणः मनुष्य


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

मनुष्य का शरीर इन तीन तत्त्वों का मिश्रण हैः पाशवीय तत्त्व, मानवीय तत्त्व और ईश्वरीय तत्त्व।

पाशवीय तत्त्व अर्थात् पशु जैसा आचरण। चाहे जैसा खाना-पीना, माता-पिता की बात को ठुकरा देना, समाज को ठुकरा देना। जैसे, ढोर चलता है ऐसे ही मन के अनुसार चलना। ये पाशवीय तत्त्व हैं।

मानवीय तत्त्व अर्थात् मानवोचित आचरण। यथायोग्य आहार-विहार, अच्छे संस्कार, अच्छा संग, माता-पिता एवं गुरु का आदर करना – ये मानवीय तत्त्व हैं।

ईश्वरीय तत्त्व। जब संत सदगुरु मिलते हैं एवं मानव साधन-भजन करता है, जप-ध्यान करता है, व्रत-उपवास करता है तब ईश्वरीय तत्त्व विकसित होता है।

जो मनमुख होता है, उसमें पाशवीय अंश जोरदार होता है। फिर वह चाहे अपना बेटा हो या भाई हो लेकिन पाशवीय अंश ज्यादा है इसीलिए हैरान करता है। जैसे पशु जरा-जरा बात में भौंकता है ऐसे ही पाशवीय अंशवाला मनुष्य जरा-जरा बात में अशांत हो जायेगा, जरा-जरा बात में राग-द्वेष की गाँठ बाँध लेगा। वह अपनी पाशवीय वासनापूर्ति में लगा रहता है। ये वासनाएँ जहाँ पूर्ण होती हैं वहाँ राग  करने लगेगा और जहाँ वासनापूर्ति में विघ्न आयेगा वहाँ द्वेष करने लगेगा। वासनापूर्ति में कोई अपने से बड़ा व्यक्ति विघ्न डालेगा तो भयभीत होगा, बराबरी का विघ्न डालेगा तो स्पर्धा करेगा और छोटा विघ्न डालेगा तो क्रोधित होगा। इस प्रकार राग-द्वेष, भय-क्रोध, संघर्ष, स्पर्धा आदि में मनुष्य की ईश्वरीय चेतना खर्च होती रहती है।

इससे कुछ ऊँचे लोग होते हैं, जो अपने कर्त्तव्य पालन में तत्पर होते हैं और मानवीय अंश विकसित किये हुए होते हैं। वे राग-द्वेष को कम महत्त्व देते हैं और अगर हो भी जाता है तो थोड़ा बहुत सँभल जाते हैं। मानवीय अंश विकसित होने के बावजूद भी यदि किसी में पाशवीय अंश का जोर रहा तो वह पशुयोनि में जाता है। जैसे, राजा नृग। उन्होंने मानवीय अंश तो विकसित कर लिया था फिर भी पाशवीय अंश का जोर था तो गिरगिट बनकर कुएँ में पड़े रहे। यदि किसी में मानवीय अंश का जोर रहा तो मरने के बाद वह पुनः मनुष्य शरीर में आता है और यदि मानवीय अंश के साथ ईश्वरीय अंश के विकास में भी लगा रहा तो वह यहाँ भी सुखी एवं शांतिप्रिय जीवन व्यतीत करेगा और मरने के बाद भी भगवान के धाम में जायेगा। लेकिन जो अपने में पूरा ईश्वरीय अंश विकसित कर लेगा, वह यहीं ईश्वरतुल्य होकर पूजा जायेगा।

कई ऐसे बुद्धिमान लोग भी हैं जो ईश्वर को नहीं मानते और उनकी सारी बुद्धि शरीर की सुख-सुविधा इकट्ठी करने में ही खर्च हो जाती है। ऐसे बुद्धिजीवी अपने को श्रेष्ठ एवं दूसरों को तुच्छ मानते हैं जबकि वे स्वयं भी तुच्छता से घिरे हुए ही हैं क्योंकि जो शरीर क्षण-प्रतिक्षण में मौत की तरफ गति कर रहा है उसी को ʹमैंʹ मानते हैं और उससे संबंधित पद-प्रतिष्ठा एवं अधिकारों को ʹमेराʹ मानते हैं। लेकिन उन भोले मूर्खों को पता नहीं होता कि जैसे बिल्ली चूहे को सँभलने नहीं देती, वैसे ही मृत्यु भी किसी को सँभलने नहीं देती। कब मृत्यु आकर झपेट ले इसका कोई पता नहीं।

अमेरिका की अखबारें बताती हैं कि अब्राहम् लिंकन का प्रेतशरीर ʹव्हाइट हाउसʹ में दिखता है। अब्राहम लिंकन मानवतावादी तो थे किन्तु यदि साथ ही साथ उनका ईश्वरीय अंश विकसित होता तो मरने के बाद प्रेतयोनि में नहीं जाते बल्कि आध्यात्मिक यात्रा कर लेते।

कुछ लोग मरने के बाद प्रेत होते हैं। मृत्यु के समय पाशवीय वृत्तिवाले मनुष्य सुन्न हो जाते हैं। मृत्यु आती है तो सवा मुहूर्त तक उनका अंतःकरणयुक्त सूक्ष्म शरीर वातावरण में सुन्न सा मूर्च्छित-सा हो जाता है। वासना जगी रहती है अतः शरीर में घुसना चाहता है लेकिन नहीं घुस सकता। फिर मरने के बाद वासना के अनुसार उसकी गति होती है। जैसे, अभी प्यास लगी है, भूख लगी है, नींद आती है… इनमें से जिसका जोर ज्यादा होगा, वही काम आप पहले करेंगे। ऐसे ही मरने के बाद जो पाशवीय अथवा मानवीय वासना प्रबल होती है, उसी के अनुसार जीव की गति होती है।

जैसे, किसी भीड़ से छूटने के बाद कोई शराबी है तो शराब के अड्डे पर जायेगा, जुआरी है तो जुए के अड्डे पर जायेगा, सदगृहस्थ है तो अपनी प्रवृत्ति की ओर जायेगा, साधक है तो अपनी साधना में लगेगा या किसी आश्रम की ओर जायेगा। ऐसे ही मरने के बाद जीव भी अपनी-अपनी वासना एवं कर्म संस्कार के अनुसार विभिन्न योनियों में गति करते हैं।

मानों, इच्छा है कोई भोग भोगने की और शरीर छूट गया तो फिर अपने कर्मों की तारतम्यता से वह जीव चन्द्रमा की किरणों के द्वारा अथवा वृष्टि के द्वारा अन्न-फल इत्यादि में पड़ता है और उसको मनुष्यादि प्राणी खाते हैं। अगर उसका तारतम्य ठीक है तो उसकी वासना के अनुरूप उसे माता का गर्भ मिलता है और यदि ठीक नहीं है तो वह बेचारा पेशाब आदि के द्वारा नाली में बह जाता है। कहाँ तो बड़ा तीसमार खाँ था और कहाँ दुर्गति को प्राप्त हो गया ! ऐसे कई बार यात्राएँ करते-करते ठीक संयोग बनता है और उसे गर्भ में टिकने का अवसर मिलता है और वह जन्म लेता है। फिर वह अपनी वासना के अनुसार कर्म करता रहता है और नयी-नयी वासनाएँ बनती रहती हैं। ….तो पशुता और मानवता के संस्कार सबमें हैं। जीव को सत्ता तो ईश्वरीय तत्त्व देता है लेकिन वह ईश्वरीय तत्त्व का अनुसंधान नहीं करता तो कभी पशुयोनि में तो कभी मानवयोनि में जाता है तो कभी सज्जनता का पवित्र व्यवहार करके देवयोनि में जाता है और पुण्य भोगकर पुनः नीच योनि में आ जाता है।

बड़भागी तो वह है जो अपना ईश्वरीय अंश विकसित करने के लिए ईश्वरीय नाम का आश्रय लेता है, ईश्वर की प्राप्ति के लिए साधना करता है और मानवीयता के सुंदर सेवाकार्य करता है। सेवाकार्य भी वाहवाही के लिए नहीं, स्वर्गप्राप्ति के लिए नहीं, वरन् ईश्वरप्रीति के लिए ही करता है। भलाई के कार्य करने से अंतरात्मा विकसित होती है और आत्मबल बढ़ता है। ईश्वरीय अंश हमारी सहायता करता है और हमें सत्प्रेरणा देता है। इस प्रकार जो ईश्वरीय अंश को जगाने में लगता है और सतर्क रहता है वही मनुष्यलोक में बुद्धिमान है। वह सचमुच में भाग्यशाली है जो अपने हृदय में ईश्वरीय अंश को विकसित करके ईश्वरीय सत्प्रेरणा, ईश्वरीय ज्ञान, ईश्वरीय ध्यान और ईश्वरीय शांति पाने के लिए सत्कर्म करता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2001, पृष्ठ संख्या 12,13 अंक 97

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महासंकल्प और वर्तमान संकल्प


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनषज्जते।

सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते।।

ʹजिस काल में न तो इन्द्रियों के भोगों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है उस काल में सर्व संकल्पों का त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है।ʹ

(श्रीमद् भगवद् गीताः 6-4)

इस श्लोक के द्वारा भगवान स्वयं आपने भगवद-अनुभव की बात बता रहे हैं। भगवान ही भगवत्तत्त्व की बात बता रहे हैं। ʹयह मिले तो सुखी होऊँ….. वह छोड़ूँ तो सुखी होऊँ….ʹ आदि झंझटों से जब मनुष्य छूट जाता है तब वह योगारूढ़ कहा जाता है। कुछ करके सुखी होना यह रजोगुण है, कुछ न करके भी सुख की चाह करना यह तमोगुण है लेकिन ईश्वर के संकल्प में अपना संकल्प मिला देने से संकल्प-विकल्प की भीड़ शांत होने लगती है एवं साधक योगारूढ़ होने में समर्थ हो जाता है। कुछ पाने, देखने, भोगने, करने या न करने के सकंल्पों की पकड़ छूटते ही उसका मन निःसंकल्प नारायण में शांत होने लगता है।

संकल्प दो प्रकार के होते हैं-

महा संकल्प और वर्तमान संकल्प।

मनुष्य का महासंकल्प यह होता है किः ʹमैं कभी दुःखी न रहूँ….. सदा सुखी रहूँ… ऐसी चीज पा लूँ कि फिर पतन न हो….ʹ मानव मन की गहराई में यह महासंकल्प छुपा रहता है। इस महासंकल्प को साकार करने के लिए ही ध्यान, भजन, सत्संग, पूजन, धर्म, कर्म इत्यादि होते हैं।

वर्तमान (तात्कालिक) संकल्प क्या है ? कमा लिया, खा लिया…. इधर गये, उधर गये। यह दो प्रकार का कल होता है। धर्म के अनुकूल और मन के अनुकूल।

जो धर्मानुकूल तात्कालिक संकल्प के अनुसार जीते हैं, उनको महा संकल्प की पूर्ति में मदद मिलती है। जो धर्म-कर्म का आश्रय नहीं लेते और मन में जैसा आये वैसा ही करते हैं उनका महासंकल्प पूरा नहीं होता। वे महासंकल्प की तरफ चलने की इच्छा तो करते हैं किन्तु पहुँच नहीं पाते।

चली चलो सब कोउ कहे, विरला पहुँचा कोय।

एक कंचन एक कामिनी, बीचे घाटी दोये।।

कोई थोड़ा ईश्वर के रास्ते चला, सफलता मिली, धन बढ़ा तो और अधिक दुकान-फैक्टरियाँ बढ़ाने में लग जायेगा या विषय-सुख में फँस जायेगा। इन दो घाटियों – कंचन (धन) एवं कामिनी (स्त्री) को पार कर गये तो फिर दूसरी घाटियाँ सामने आयेंगी।

माया तजना सहज है, सहज नारी का नेह।

मान-बड़ाई ईर्ष्या, दुर्लभ तजना एह।।

मान बड़ाई और ईर्ष्या भी महासंकल्प की पूर्ति में विघ्न डालते हैं। यदि मान बड़ाई परेशान करें तो याद रखें-

अभिमानं सुरापानं गौरवं रौरवस्तथा।

प्रतिष्ठा शूकरी विष्ठा त्रीणि त्यक्त्वा सुखी भवेत्।।

ʹअभिमान मदिरापान के समान, गौरव, रौरव नर्क के समान एवं प्रतिष्ठा सुअर की विष्ठा के समान है। अतः तीनों को त्यागकर सुखी हो जायें।ʹ

यदि आपके मन में किसी के प्रति ईर्ष्या होती है तो उसके पास जाकर कह दें किः ʹमुझे माफ करो। मुझे आपको देखकर ईर्ष्या होती है। आप भी प्रार्थना करें और मैं भी प्रार्थना करूँ ताकि आपके प्रति मेरी ईर्ष्या मिट जाये।ʹ

अगर मान बड़ाई, ईर्ष्या – ये छूट गये तो महासंकल्प पूर्ण हो जायेगा। ब्रह्मज्ञानियों का महासंकल्प था तभी तो उन्हें ब्रह्मज्ञान हुआ। भगवान का महासंकल्प है तभी तो वे पने भगवदस्वभाव को जानते हैं। ऐसे ही जब अपना भी महासंकल्प पूरा होगा तो फिर सब दुःखों से सदा के लिए निवृत्ति और परमानंद की प्राप्ति हो जायेगी।

अकाल पुरुष का साक्षात्कार करना यह महासंकल्प है। महासंकल्प क्यों कहा ? सब चाहते हैं कि ʹहम सदा सुखी होंʹ। यह महासंकल्प तभी पूरा होता है जब महान परमात्मा का ज्ञान प्राप्त होता है, इसीलिए इसे महासंकल्प कहा। अतः आप भी महासंकल्प पूरा करने के  लिए तत्पर हो जायें। उन्हीं तात्कालिक संकल्पों को पूरा करें जो कि धर्म एवं शास्त्र के अनुकूल और मर्यादित हों। मान-बड़ाई, ईर्ष्या, काम, क्रोध, लोभ आदि के संकल्पों को कभी भी सहयोग न दें।

ईर्ष्या और संसार के छोटे-मोटे दुःखों से प्रभावित होने के कारण मति मारी जाती है और जब मति मारी जाती है तब तात्कालिक संकल्प और भी तुच्छ होने लगते हैं। महासंकल्प पूरा होने की तो गुंजाइश ही नहीं रहती है अपितु तात्कालिक संकल्प भी तुच्छ होने लगते हैं। अतः सावधानी रखें  कि तुच्छ संकल्प, हल्के संकल्प न उठें। अगर उठ भी जायें तो उन्हें तुच्छ समझकर आप सावधान हो जायें।

प्रतिदिन संकल्प करें किः ʹमेरे तात्कालिक संकल्प ऐसे ही बनें कि मेरा महासंकल्प पूरा हो।ʹ ध्यान रखें कि) ʹमान-बड़ाई में कहीं हम खप तो नहीं रहे ? ईर्ष्या से हमारे हृदय का परमात्मरस नष्ट तो नहीं हो रहा  ? विषय-विकारों में कहीं हम अपना जीवन बरबाद तो नहीं कर रहे ?ʹ इसके लिए अपने ऊपर कड़ी निगरानी रखें, सतत सावधानी रखें, सदैव सजाग रहें।

व्यर्थ के संकल्प न करें। व्यर्थ के संकल्पों से बचने के लिए ʹहरि ૐ….ʹ के गुंजन का भी प्रयोग किया जा सकता है। ʹहरि ૐ…..ʹ के गुंजन में एक विलक्षण विशेषता है कि उससे फालतू संकल्प-विकल्पों की भीड़ कम हो जाती है। ध्यान के समय भी ʹहरि ૐ….ʹ का गुंजन करें फिर शांत हो जायें। मन इधर-उधर भागे फिर गुंजन करें। यह व्यर्थ संकल्पों को हटायेगा एवं महासंकल्प की पूर्ति में मददरूप होगा।

तात्कालिक संकल्पों में भी व्यर्थ संकल्पों की बड़ी भीड़ होती है। व्यर्थ स्फुरणाएँ ही संकल्प बन जाती हैं। फिर कुछ तात्कालिक संकल्प धर्म के अनुकूल होते हैं, कुछ वासना के वेगवाले संकल्प होते हैं। उनमें जरा सावधान रहना पड़ेगा। धर्मानुकूल संकल्पों की पूर्ति महासंकल्प की पूर्ति में सहायक होगी किन्तु वासनायुक्त संकल्पों की पूर्ति में लगे तो महासंकल्प पूर्ण न कर पायेंगे।

अपने दोषों को निकालने का प्रयत्न आपको स्वयं ही करना पड़ेगा। यदि आप स्वयं निकालने में तत्पर नहीं होंगे तो गुरुदेव भी नहीं निकाल सकेंगे। बच्चा यदि अपनी लापरवाही का दोष खुद न निकाले तो शिक्षक कितना भी बढ़िया हो, उसका विकास कैसे होगा ?

शास्त्रकारों ने कहा हैः

मूरख हृदय न चेत, यद्यपि गुरु मिलहिं बिरंचि सम।

ईर्ष्या, मान-बड़ाई आदि से युक्त होकर जिसकी बुद्धि मारी गयी है ऐसे व्यक्ति को यदि ब्रह्माजी भी गुरु के रूप में मिलें तो वह लाभ नहीं ले पायेगा। इसलिए तात्कालिक संकल्प भी शुभ हों, ज्ञानसंयुक्त संकल्प हों, शास्त्रसम्मत संकल्प हों और महासंकल्प की पूर्ति करने वाले हों इसका ध्यान रखें।

प्रतिदिन संकल्प करें किः ʹकुछ भी हो जाये, आज मैं मान और अपमान को पचा लूँगा…. कुछ भी हो जाये, आज मैं विकारों के आवेग में नहीं गिरूँगा… कुछ भी हो जाये, आज मैं ईर्ष्या से संतप्त नहीं होऊँगा… मेरा जो महासंकल्प है उसकी पूर्ति में लगूँगा…. मैं गुरु का शिष्य हूँ, भगवान का भक्त हूँ…. कुछ भी हो जाये, व्यर्थ संकल्पों में आज का दिन बरबाद नहीं करूँगा।ʹ

एक महासंकल्प हो गया तो बाकी के अवांतर संकल्प भी उसी रूप में होते हैं। जैसे, ʹमुझे परमात्मा को पाना है…ʹ यह महासंकल्प हो गया तो बाकी के छोटे-मोटे अवांतर संकल्प उसी के अनुरूप बनेंगे और फालतू संकल्प कम हो जायेंगे। इसलिए प्रतिदिन इस महासंकल्प को पोषण दें किः ʹमुझे तो इसी जन्म में परमात्मा को पाना है, ब्रह्मज्ञान पाना है, ईश्वर का दर्शन करना है, संसारी आकर्षणों से पार होकर समत्वयोग में जागना है….ʹ

महासंकल्प की पूर्ति होने पर अंतःकरण में महान सुख उत्पन्न होता है और संसार से मजे लेकर सुखी होने की भ्रांति चली जाती है। ऐसे महासंकल्प की पूर्ति करने में जो महापुरुष सफल हो जाते हैं, वे सुख लेने के लिए इधर-उधर भटकते नहीं हैं अपितु उनके अंतःकरण से ज्ञान और सुख का दरिया ऐसा छलकता है कि उनके सम्पर्क में आने वाले लोग भी सुख शांति का एहसास करने लगते हैं। वे स्वयं तो तृप्त रहते ही हैं, दूसरों को भी तृप्त करते हैं। वे स्वयं तो तर जाते हैं, दूसरों को भी तारते हैं। स तरति लोकान् तारयति।

………और यह महासंकल्प सबके अंतःकरण में दबा हुआ है। जिसके अंतःकरण में पुण्यों के प्रताप से उस महासंकल्प को पूरा करने का उत्साह जागा होता है, दृढ़ता जागी होती है, वही भगवान का भक्त अथवा सदगुरु का सत्शिष्य योगारूढ़ बन पाता है।

महासंकल्प माना महान सुख, जिसे मौत का बाप भी नहीं छिन सकता। निंदक निंदा कर ले, प्रशंसक प्रशंसा कर ले फिर भी जिसका चित्त महासंकल्प के सुख से परिपूर्ण है वह कभी विचलित नहीं होता। वही जीते जी मुक्तात्मा है, महात्मा है।

महासंकल्प को जितना ज्यादा महत्त्व देंगे, उतना ही साधारण संकल्प का महत्त्व क्षीण होता जायेगा। मान लो, आपने दृढ़ संकल्प कर लिया किः ʹमुझे आश्रम जाना है….ʹ अन्य व्यर्थ संकल्प नहीं फुरेंगे बल्कि अवांतर संकल्प होने लगेंगे किः ʹबस में जाना है… रिक्शा में जाना है…. मोपेड पर जाना है….ʹ ऐसे ही महासंकल्प हो जाये किः ʹमुझे ईश्वर को पाना है….ʹ फिर उसके लिए ʹजप करना है… ध्यान करना है…. संयम से रहना है…. सत्संग करना है…..ʹ ऐसे अनुकूल अवांतर सकंल्प फुरने लगेंगे।

महासंकल्प को महत्त्व देंगे तो अवांतर संकल्प सात्त्विक होंगे, अच्छे होंगे। महासंकल्प का पता नहीं तो मन तात्कालिक संकल्प-विकल्पों में, फिर कुसंकल्पों में चला जायेगा किः ʹइसका बदला लेना है….. इसकी खबर लेनी है…..ʹ आदि। जिनके जीवन में महासंकल्प नहीं जागा, उनके सारे संकल्प व्यर्थ होते हैं। जिनको महासंकल्प का ज्ञान है वे व्यर्थ संकल्पों से यत्नपूर्वक बच जाते हैं। वे व्यर्थ का नहीं खाते, व्यर्थ का नहीं भोगते, व्यर्थ का नहीं सोचते क्योंकि उनका एक महासंकल्प है। फिर उसे महा संकल्प कह दें, ईश्वर प्राप्ति कह दें, ज्ञान प्राप्ति कह दें या योग की पराकाष्ठा कह दें अथवा योगारूढ़ होना कह दें…. एक ही बात है।

एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि महासंकल्प केवल मनुष्य ही कर सकता है। गाय, भैंस आदि पशु, पक्षी तो कभी सोच भी नहीं सकते किः ʹहम सदा के लिए सुखी रहें।ʹ हालाँकि सुख तो भैंस भी चाहती है। प्रतिकूलता से वह भी भागती है लेकिन सदा सुखी रहने की मति उसके पास नहीं होती। केवल मनुष्य ही चाहता है किः ʹमैं सदा सुखी रहूँ।ʹ

मान लो, मैं अपने गुरुदेव की तरफ से कह दूँ किः ʹभगवान करें आप एक साल के लिए बहुत सुखी हें और बाद में आपके पास मुसीबतें आयें !ʹ ….तो आपको अच्छा लगेगा क्या ? ʹपाँच साल तक आप बहुत सुखी रहें, बाद में आप पर दुःख-मुसीबत आये !ʹ…. तो गहरे मन से आप नहीं चाहेंगे कि पाँच साल के बाद आपके जीवन में ऐसा हो। मैं कह दूँ किः ʹभगवान करें कि जीवन भर आप सुखी रहें किन्तु मरने के बाद आप घोर नरक में जायें !ʹ नहीं, आपको यह भी अच्छा नहीं लगेगा। ….तो यह महासंकल्प है कि आप जीते-जी भी सुख चाहते हैं और मरने के बाद भी सुख चाहते हैं, दुःख नहीं चाहते। आप परम सुख और सदा रहने वाला सुख चाहते हैं। यही महासंकल्प है।

गर्मी लग रही है और पंखा चला दिया तो तात्कालिक दुःख निवृत्त हुआ। भूख लगी और रोटी खायी तो तात्कालिक भूख निवृत्त हुई लेकिन सदा के लिए तृप्ति नहीं होगी। ऐसे ही तुच्छ तात्कालिक संकल्पों की पूर्ति में समय न गँवाएँ। उन पर नियंत्रण रखें। धर्मानुकूल तात्कालिक संकल्पों की ही पूर्ति करें। तात्कालिक संकल्प अधिक होंगे तो महासंकल्प के लिए जो योग्यता चाहिए, वह नहीं आयेगी।

जप, ध्यान, उपासना, सत्संग आदि से तात्कालिक संकल्पों में तो सामर्थ्य आयेगा ही, महासंकल्प की पूर्ति में भी मदद मिलेगी। ʹहम सदा सुखी रहें….ʹ यह महासंकल्प तो समझ लिया लेकिन इस दिशा में यात्रा करने के लिए आप सजग रहना ताकि आपके संकल्प का बल बढ़े। जिनके संकल्प में बल हैं तो वे एक महापुरुष अपने संकल्प के बल से हजारों लाखों व्यक्तियों को अपनी बात समझा सकते हैं, मनवा सकते हैं। जिनके संकल्प में बल नहीं, उनकी बातें श्रद्धा से कौन सुनेगा ? उनकी बात कौन मानेगा ? जिन्होंने अपना महा संकल्प पूर्ण कर लिया है फिर बल तो उनका स्वभाव बन जाता है। महासंकल्प की पूर्ति होने पर योगी का योग सिद्ध हो जाता है, भक्त की भक्ति सफल हो जाती है और ज्ञानी को ज्ञान की पराकाष्ठा मिल जाती है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2001, पृष्ठ संख्या 8-11, अंक 97

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भक्ति की महिमा


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

श्रीकृष्ण कहते हैं-

न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव।

न स्वाध्यायस्तपस्तयागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता।।

ʹउद्धव ! योग-साधन, ज्ञान-विज्ञान, धर्मानुष्ठान, जप-पाठ और तप-त्याग मुझे प्राप्त कराने में उतने समर्थ नहीं हैं जितनी दिनों-दिन बढ़ने  वाली अनन्य प्रेममयी मेरी भक्ति।ʹ (श्रीमद् भागवतः 11.14.20(

भले ही कोई धन-दौलत के अंबार पर खड़ा हो, बड़ा सत्ताधीश हो उसका हृदय तो तपता ही रहता है लेकिन जिसको भगवान की भक्ति का छोटा-सा भी सूत्र मिल जाता है, उसके हृदय में शांति होती है, शीतलता होती है, तृप्ति होती है।

अधिक धन मिलने से, बड़ी सत्ता मिलने से, अधिक अधिकार मिलने से कोई व्यक्ति सुखी हो जाये ऐसी बात नहीं है। धन, सत्ता व अधिकार के बिना भी यदि हृदय में भगवद् प्रीति हो, संतों के लिए प्रेम हो, सत्कर्म में रूचि हो और परमेश्वर को पाने की ललक हो तो वह व्यक्ति तो धन्य है ही, उसके माता-पिता धन्य हैं, उसका कुल धन्य है और वह जिस घऱ में रहता है वह धरती भी धन्य मानी जाती है।

भक्ति के बिना मनुष्य पशु से भी बदतर है। पशु को बेटे-बेटी की शादी की कोई चिंता नहीं होती, महँगाई की कोई चिंता नहीं होती, तबादले का कोई तनाव नहीं होता। ʹनो इन्कमटैक्सʹ…. ʹनो सेल्सटैक्सʹ… ʹनो सरचार्जʹ…. ʹनो अदर चार्जʹ…. उसे कोई चिन्ता नहीं होती, जबकि मनुष्य को ये सब चिंताएँ होती हैं।

गाय कभी गाली नहीं देती, हाथी कभी झूठ नहीं बोलता, पहाड़ कभी चोरी नहीं करता फिर वे वही के वहीं हैं। जबकि मनुष्य गाली भी देता है, झूठ भी बोलता है, चोरी भी करता है फिर भी सभी से ऊँचा माना जाता है क्योंकि वह चाहे तो जप-तप करके, साधन-भजन करके, सत्संग-स्वाध्याय करके महान भी बन सकता है।

मनुष्य के गिरने की नौबत आ जाती है लेकिन उसे सत्संग मिल जाये, संत-सान्निध्य मिल जाये तो वह इतना ऊँचा उठ जाता है कि भगवान का सखा बन जाता है, मित्र बन जाता है, सत्पुरुष भी बन जाता है। अरे ! भगवान का माई-बाप भी बन जाता है।

शास्त्र में आता हैः भजनस्य किं लक्षणम् ? भजन का लक्षण क्या है ?

भजनस्यं लक्षणम् रसनम्। अंतरात्मा का रस जिससे उभरे, उसका नाम है भजन।

वस्तु, व्यक्ति, भोग-सामग्री के बिना भी हृदय में जो आनंद आता है, रस आता है वह भजन का रस है। वस्तु के बिना, व्यक्ति के बिना, विशेष परिस्थिति के बिना ही आपके हृदय में अपने अंतर्यामी आत्मदेव का रस आने लगे तो समझना कि भजन हो रहा है।

ताल-लय के साथ राग अलापने का नाम भजन नहीं है, माला घुमाने का नाम भजन नहीं है लेकिन हृदय में अंतरात्मा का रस प्रगट हो जाये तो समझना कि भजन हो रहा है। फिर चाहे शबरी भीलन की भाँति प्रभु के लिए बुहारी करते हो तो भजन है, शिवाजी की तरह गुरुआज्ञा मानकर शत्रुओं से भिड़ते हो तो भी भजन है और हनुमान जी की नाँई प्रभुसेवा में लंका जला देते हो तो भी भजन है। बस, अंतःकरण से शुद्ध रस प्रगट हो जाये तो समझना कि हो गया भजन।

मनु महाराज कहते हैं किः “मनुष्य को तब तब सत्कर्म और निष्काम कर्म खोज-खोजकर करने चाहिए जब तक आत्मसंतोष न हो, आत्मरस न प्रगटे।”

जब आत्मरस प्रगट होता है तो भजन अपने आप हो जाता है, भक्त भगवद्-कृपा का अधिकारी हो जाता है। भगवान की कृपा के आगे दुनिया का पाप क्या महत्त्व रखता है ? ऐसा कौन-सा अपराध है जो भगवान की कृपा से बड़ा हो ? ऐसा कौन सा रोग है जो परमात्मा से बड़ा हो ? भगवान कहते हैं-

यथाग्निः सुसमृद्धार्चिः करोत्येधांसि भस्मसात्।

तथा मद्विषया भक्तिरूद्धवैनांसि कृत्स्नशः।।

ʹउद्धव ! जैसे धधकती हुई आग लकड़ियों के बड़े ढेर को जलाकर खाक कर देती है, वैसे ही मेरी भक्ति भी समस्त पाप-राशि को पूर्णतया जला डालती है।ʹ (श्रीमद् भागवतः 11.14.19)

भक्ति फलरूपा भी है, रसरूपा भी है। भक्ति रस भी देती है और मुक्ति का फल भी देती है। भक्ति करते समय भी रस आता है और अंत में फल भी भगवत्प्राप्ति का मिलता है।

कर्म में प्रतिवाद आये तो प्रायश्चित करना पड़ता है लेकिन भक्ति में प्रतिवाद का प्रायश्चित नहीं करना पड़ता है क्योंकि भगवान समझते हैं किः ʹबच्चा है, कोई बात नहीं। मुझे प्रेम करता है न !ʹ प्रेम में कोई नियम नहीं होता। बच्चे की नाक बहती है, वह गंदगी कर देता है फिर भी माँ समझती है कि ʹबच्चा है, अपना है।ʹ उसे प्रेम से उठाकर उसकी गंदगी साफ कर देती है। ऐसे ही भगवान के होकर जीते हैं तो भगवान भी कहते हैं- ʹचलो जाने दो अपना ही बालक है।ʹ

जिसके जीवन में क्रूरता नहीं है, हिंसा नहीं है, असहिष्णुता नहीं है, द्वेष नहीं है एवं भगवान के लिए प्रीति है, जो भगवान के प्रभाव को, दयालुता को, सर्वव्यापकता को जानता है और भगवान के अटल-अविनाशी नियम को मानता है उसके हृदय में स्वाभाविक ही प्रसन्नता, निःस्वार्थता, नम्रता, सरलता, परदुःखकातरता आदि सदगुण आ जाते हैं।

फलरूपा और रसरूपा भक्ति भगवदर ले आती है और जब भगवदरस आता है तब भगवान के गुण भी स्वाभाविक ही आ जाते हैं। जैसे, सूर्योदय से पहले आकाश में लालिमा छा जाती है फिर सूर्य उदय होता है, ऐसे ही भगवददर्शन के पहले हृदय में भक्ति आती है और भगवान के गुण भी आ जाते हैं। भक्त के जीवन में अमानीत्व आ जाता है। ऑफिस में चाहे कोई कितना भी बड़ा साहब होकर, कुर्सी पर बैठकर कार्य करे लेकिन संतों की सभा में जाकर वह भी सरलता से जमीन पर बैठता है। अमानीत्व, अदांभित्व, सरलता, विनम्रता, परदुःखकातरता आदि सदगुण सहज ही भक्त के जीवन में आ जाते हैं और इन सदगुणों का रस भी उसके जीवन में आ जाता है।

कबीरा आप ठगाइये, और न ठगिये कोई।

ʹआप ठगे सुख उपजे, और ठगे दुःख होई।।

भक्त को बाहर से भले थोड़ा घाटा पड़े, फिर भी वह भीतर से दूसरे का हित करता है। ऐसा करने से बाहर की वस्तु भले थोड़ी कम हो जाये लेकिन भीतर की जो खुशी मिलती है, भीतर का जो बल बढ़ता है और भीतर का जो आनंद आता है उसे भक्त ही जानता है।

जो भक्ति के रास्ते चलते हैं उऩकी कुटिलता हटती जाती है, सरलता बढ़ती जाती है, हिंसात्मक वृत्ति मिटती जाती है। अहिंसात्मक वृत्ति बढ़ती जाती है। हिंसा करना तमोगुण है, प्रतिहिंसा करना रजोगुण है, अहिंसा सत्त्वगुण है। भक्ति करने से सत्त्व गुण बढ़ता है।

भक्त कभी कभार जरूरत पड़ने पर प्रतिक्रिया करता भी है लेकिन हिंसा की वृत्ति से नहीं, वरन् सामने वाले की भलाई के लिए करता है ताकि उसकी गलती दूर हो और वह सत्य की ओर चल पड़े।

भक्ति में यह ताकत है कि वह जीव को संसारी विषय-विकारों के सुख में नहीं, वरन् आत्मा परमात्मा के सुख में पहुँचा देती है, परम सुखस्वरूप, परम रसस्वरूप परमात्मा के अनुभव में जगा देती है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2000, पृष्ठ संख्या 5,6 अंक 95

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