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स्वधर्मे निधनं श्रेयः


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

प्रत्येक मनुष्य को अपने धर्म के प्रति श्रद्धा एवं आदर होना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण ने भी कहा हैः

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुतिष्ठात्।

स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।

ʹअच्छी प्रकार आचरण किये हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है।ʹ (गीताः 3.35)

जब भारत पर मुगलों का शासन था, तब की यह घटित घटना हैः

चौदह वर्षीय हकीकत राय विद्यालय में पढ़ने वाला सिंधी बालक था। एक दिन कुछ बच्चों ने मिलकर हकीकत राय को गालियाँ दीं। पहले तो वह चुप रहा। वैसे भी सहनशीलता तो हिन्दुओं का गुण है ही…. किन्तु जब उन उद्दण्ड बच्चों ने गुरुओं के नाम की और झूलेलाल व गुरु नानक के नाम को गालियाँ देना शुरु किया तब उस वीर बालक से अपने गुरु और धर्म का अपमान सहा नहीं गया।

हकीकत राय ने कहाः “अब हद हो गयी ! अपने लिये तो मैंने सहनशक्ति का उपयोग किया लेकिन मेरे धर्म, गुरु और भगवान के लिए एक भी शब्द बोलेंगे तो यह मेरी सहनशक्ति से बाहर की बात है। मेरे पास भी जुबान है। मैं भी तुम्हें बोल सकता हूँ।”

उद्दण्ड बच्चों ने कहाः “बोलकर तो दिखा ! हम तेरी खबर ले लेंगे।”

हकीकत राय ने भी उनको दो चार कटु शब्द सुना दिये। बस, उन्हीं दो चार शब्दों को सुनकर मुल्ला-मौलवियों का खून उबल पड़ा। वे हकीकत राय को ठीक करने का मौका ढूँढने लगे। सब लोग एक तरफ और हकीकत राय अकेला दूसरी तरफ।

उस समय मुगलों का शासन था इसलिए हकीकत राय को जेल में बन्द कर दिया गया।

मुगल शासकों की ओर से हकीकत राय को यह फरमान भेजा गया किः “अगर तुम कलमा पढ़ लो और मुसलमान बन जाओ तो तुम्हें अभी माफ कर दिया जायेगा और यदि तुम मुसलमान नहीं बनोगे तो तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर दिया जायेगा।”

हकीकत राय के माता-पिता जेल के बाहर आँसू बहा रहे थे किः “बेटा ! तू मुसलमान बन जा। कम से कम हम तुम्हें जीवित देख सकेंगे !” ….. लेकिन उस बुद्धिमान सिंधी बालक ने कहाः

“क्या मुसलमान बन जाने के बाद मेरी मृत्यु नहीं होगी ?”

माता-पिताः “मृत्यु तो होगी।”

हकीकत रायः “…तो फिर मैं अपने धर्म में ही मरना पसंद करूँगा। मैं जीते-जी दूसरों के धर्म में नहीं जाऊँगा।”

क्रूर शासकों ने हकीकत राय की दृढ़ता देखकर अनेको धमकियाँ दीं लेकिन उस बहादुर किशोर पर उनकी धमकियों का जोर न चल सका। उसके दृढ़ निश्चय को पूरा राज्य-शासन भी न डिगा सका।

अंत में मुगल शासक ने उसे प्रलोभन देकर अपनी और खींचना चाहा लेकिन वह बुद्धिमान व वीर किशोर प्रलोभनों में भी नहीं फँसा।

आखिर क्रूर मुसलमान शासकों ने आदेश दिया किः “अमुक दिन बीच मैदान में हकीकत राय का शिरोच्छेद किया जायेगा।”

उस वीर हकीकत राय ने गुरु का मंत्र ले रखा था। गुरुमंत्र जपते-जपते उसकी बुद्धि सूक्ष्म हो गयी थी। वह चौदह वर्षीय किशोर जल्लाद के हाथ में चमचमाती हुई तलवार देखकर जरा भी भयभीत न हुआ वरन् वह अपने गुरु के दिये हुए ज्ञान को याद करने लगा किः “यह तलवार किसको मारेगी ? मार-मारकर इस पंचभौतिक शरीर को ही तो मारेगी और ऐसे पंचभौतिक शरीर तो कई बार मिले और कई बार मर गये। ….तो क्या यह तलवार मुझे मारेगी ? नहीं। मैं तो अमर आत्मा हूँ… परमात्मा का सनातन अंश हूँ। मुझे यह कैसे मार सकती है ? ૐ…ૐ….ૐ…

हकीकत राय गुरु के इस ज्ञान का चिंतक कर रहा था, तभी क्रूर काजियों ने जल्लाद को तलवार चलाने का आदेश दिया। जल्लाद ने तलवार उठायी लेकिन उस निर्दोष बालक को देखकर उसकी अंतरात्मा थरथरा उठी। उसके हाथों से तलवार गिर पड़ी और हाथ काँपने लगे।

काज़ी बोलेः “तुझे नौकरी करनी है कि नहीं ? यह तू क्या कर रहा है ?”

तब हकीकत राय ने अपने हाथों से तलवार उठायी और जल्लाद के हाथ में थमा दी। फिर वह किशोर हकीकत राय आँखें बंद करके परमात्मा का चिंतन करने लगाः ʹहे अकाल पुरुष ! जैसे साँप केंचुली का त्याग करता है वैसे ही मैं यह नश्वर देह छोड़ रहा हूँ। मुझे तेरे चरणों की प्रीति देना ताकि मैं तेरे चरणों में पहुँच जाऊँ… फिर से मुझे वासना का पुतला बनाकर इधर-उधर न भटकना पड़े… अब तू मुझे अपनी ही शरण में रखना…..

मैं तेरा हूँ…तू मेरा है… हे मेरे अकाल पुरुष !ʹ

इतने में जल्लाद ने तलवार चलायी और हकीकत राय का सिर धड़ से अलग हो गया।

हकीकत राय ने 14 वर्ष की नन्हीं सी उम्र में धर्म के लिए अपनी कुर्बानी दे दी। उसने शरीर छोड़ दिया लेकिन धर्म न छोड़ा।

गुरुतेगबहादुर बोलिया, सुनो सिखों ! बड़भागिया, धड़ दीजै धरम न छोडिये…

हकीकत राय ने अपने जीवन में यह चरितार्थ करके दिखा दिया।

हकीकत राय तो धर्म के लिए बलिवेदी पर चढ़ गया लेकिन उसकी कुर्बानी ने सिंधी समाज के हजारों-लाखों जवानों में एक जोश भर दिया किः

ʹधर्म की खातिर प्राण देना पड़े तो देंगे लेकिन विधर्मियों के आगे कभी नहीं झुकेंगे। भले अपने धर्म में भूखे मरना पड़े तो स्वीकार है लेकिन परधर्म को कभी स्वीकार नहीं करेंगे।ʹ

ऐसे वीरों के बलिदान के फलस्वरूप ही हमें आजादी प्राप्त हुई है और ऐसे लाखों-लाखों प्राणों की आहूति द्वारा प्राप्त की गयी इस आजादी को हम कहीं व्यसन, फैशन एवं चलचित्रों से प्रभावित होकर गँवा न दें ! अब देशवासियों को सावधान रहना होगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2000, पृष्ठ संख्याः 25,26 अंक 88

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द्रव्यशक्ति एवं भावशक्ति


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग प्रवचन से

दो प्रकार की शक्तियाँ होती हैं- द्रव्यशक्ति और भावशक्ति। द्रव्यशक्ति और भावशक्ति से ही संस्कार बनते हैं… द्रव्य संस्कार और भावसंस्कार। इन दो शक्तियों के आधार पर ही सबका जीवन चलता है।

अन्न, जल, फल आदि जो द्रव्य हम खाते हैं, उनसे हमारे शरीर को पुष्टि मिलती है। ऋतु के अनुसार हम कोई चीज खाते हैं तो स्वस्थ रहते हैं और ऋतु के विपरीत कुछ खाते हैं तो बीमार होते हैं। स्वास्थ्य के अनुकूल हम कोई चीज खाते हैं तो स्वस्थ रहते हैं, स्वास्थ्य के प्रतिकूल कुछ खाते हैं तो बीमार पड़ते हैं। इसी प्रकार समय के अनुकूल हम कोई चीज खाते हैं तो स्वस्थ रहते हैं किन्तु समय के प्रतिकूल, देर रात्रि से या प्रदोषकाल में कुछ खाते हैं तो बीमार होते हैं। इस द्रव्य शक्ति का प्राकृतिक संबंध हमारे शरीर के साथ है। द्रव्य-शक्ति का सदुपयोग करने से हमारा स्वास्थ्य अच्छा रहता है।

द्रव्य शक्ति से ऊँची है भाव शक्ति। भाव के द्वारा जो अपने को जैसा मानता है वैसा ही बन जाता है। भावशक्ति बड़ी गजब की है। भावशक्ति से ही स्त्री-पुरुष बनते हैं, भावशक्ति से ही पापी-पुण्यात्मा बनते हैं। इसी शक्ति से हम अपने को सुखी-दुःखी मानते हैं। भावशक्ति से ही हम अपने को तुच्छ या महान मानते हैं। इसीलिए भावशक्ति का ठीक-ठीक विकास करना चाहिए। सदैव उत्तम भाव करें, मन में कभी हीन या दुःखद भाव न आने दें।

द्रव्यशक्ति की तो कहीं कमी नहीं, खान-पान की चीजें तो सभी देशों में उपलब्ध हैं लेकिन आज विश्व में भावशक्ति की बहुत कमी पड़ रही है। एक आदमी दूसरे आदमी का शोषण करके सुखी होना चाहता है, एक गाँव दूसरे गाँव का गला घोंटकर सुखी होना चाहता है, एक प्रांत दूसरे प्रांत का शोषण करके सुखी होना चाहता है, एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र को गुलाम बनाकर सुखी होना चाहता है। यह सब आत्मीयतापूर्ण भावशक्ति के अभाव का ही परिणाम है।

शेर ने हाथी के मस्तक का खून पिया है फिर भी जब जंगल में जाता है तो पीछे मुड़-मुड़ कर देखता है कि ʹकोई मुझे खा न जाये ! कोई मुझे मार न डाले !ʹ अरे कमबख्त ! तूने तो हाथियों को मारा है, तुझे कौन मारने को आ सकता है ? ….लेकिन उसकी हिंसा-प्रवृत्ति ही उसको डराती है। ऐसे ही शोषण करने वाले व्यक्ति अपने-आपको ही शोषित करते रहते हैं।

हराम की कमाई करने वालों के बेटे-बेटियाँ एवं परिवारवालों की मति भी वैसी ही हो जाती है। नाहक का धन बहुत-बहुत तो दस साल तक टिकता है, फिर तो उसी प्रकार स्वाहा हो जाता है जैसे रुई के गोदाम में आग लगने पर पूरी रूई स्वाहा हो जाती है। इसीलिए शोषण करके, दगाबाजी-धोखाधड़ी करके धन का ढेर करने वाले लोग जीवन में दुःखी पाये जाते हैं और जीवन के अंत में देखो तो ठनठनपाल… जबकि हक की कमाई करने वालों के बेटे बेटियाँ और परिवारवाले भी सुखी रहते हैं। सबकी भलाई सोचकर आजीविका कमाने वाले एवं आत्मा-परमात्मा की ओर चलनेवाले आप भी सुखी होते हैं और उनके सम्पर्क में आने वाले भी खुशहाल होने लगते हैं।

भोग-वासना और बाह्य आडम्बर इन्सान को भीतर से खोखला कर देते हैं। आप मन-इन्द्रियों को जैसा पोषण देंगे वैसे ही वे बन जायेंगे। आप इन्द्रियों को जैसा बनाना चाहते हैं, वैसा ही उन्हें पोषण दीजिये। यह है द्रव्यसंस्कार।

अगर आप इन्द्रियों को हल्का दृश्य दिखाओगे तो इन्द्रियाँ उऩ्हीं के अधीन हो जायेंगी। मन को अगर नशीली चीजों की आदत डालोगे तो उसी तरफ उसका झुकाव हो जायेगा। यह है द्रव्य संस्कार।

भावसंस्कार कैसे डालना ? इसका ज्ञान सत्संग और सत्शास्त्र से मिलता है। इसलिए रोटी नहीं मिले तो चिंता की बात नहीं लेकिन सत्संग रोज मिलना चाहिए। सत्यस्वरूप ईश्वर का जप और ध्यान रोज होना चाहिए। साधना के अनुकूल रोज पवित्र आहार लेना चाहिए। यह है भावसंस्कार।

आप जो द्रव्य खाते हैं एवं जो भाव करते हैं उनमें भी आत्मज्ञान के संस्कार भरे दें। द्रव्य संस्कार और भावसंस्कार दोनों में आत्मज्ञान का सिंचन, सत्य का सिंचन कर दें तो अंत में दोनों का फल सत्यस्वरूप ईश्वर की प्राप्ति हो जायेगी।

द्रव्य संस्कार और भावसंस्कार दोनों पवित्र होंगे तो पवित्र सुख मिलेगा। यह पवित्र सुख परम पवित्र परमात्मा से मिला देगा। यदि ऐसा नहीं करेंगे तो अपवित्र सुखाभास मिलेगा और देर-सबेर नरकों के स्वरूप में वह चैतन्य प्रगट होगा।

ʹʹबाबाजी ! सर्वत्र एवं सब में भगवान हैं तो फिर ʹयह पवित्र यह अपवित्र… यह करो यह न करो….ʹ ऐसा क्यों ?

जो आया सो खा लिया, जैसा मन में आया वैसा कर लिया तो फिर जैसा होगा वैसा ही परिणाम आयेगा। यदि आप वास्तविक सुख, पवित्र सुख चाहते हो तो सिद्धान्त के अनुसार वहीं चलना पड़ेगा जहाँ वास्तविक सुख होगा।

ʹजो आये सो करो….ʹ तो पाप करो, कोई बात नहीं। फिर भगवान नरक के रूप में, परेशानी के रूप में मिलेंगे। जब परेशानी आ जाये तो बोलना किः ʹभगवान परेशानी के रूप में आये हैं।ʹ संतोष मान लेना। पुण्य करोगे तो भगवान सुख के रूप में मिलेंगे, स्वर्ग के रूप में मिलेंगे। आप किसी को सतायेंगे तो भगवान दुश्मन के रूप में प्रगट होंगे और आप किसी को ईमानदारी से स्नेह करोगे तो भगवान मित्र के रूप में प्रगट होंगे। लेकिन अगर ऐसी  नजर बनी रही कि ʹदुश्मन के रूप में भी मेरा भगवान हैʹ तो दुश्मन हट जायेगा और भगवान रह जायेंगे। आपका भावसंस्कार बन जायेगा, कल्याण हो जायेगा। अन्यथा, दुश्मन के प्रति द्वेष होगा और मित्र के प्रति राग होगा तो फँसोगे।

करणी आपो आपनी के नेड़े के दूर।

अपनी ही करनी से इन्सान सुख के निकट या दूर होता है। अतः बुरे संस्कारों, बुरे कर्मों से बचो। भारत की दिव्य संस्कृति के दिव्य संस्कारों से आप भी सम्पन्न बनो और दूसरों को भी सम्पन्न करो। द्रव्यशक्ति के साथ-साथ अपनी भावशक्ति को इतना ऊँचा बना लो कि इस जगत के भोग तो क्या, स्वर्ग के सुखभोग भी आपको आकर्षित न कर सकें। स्वर्ग की अप्सरा का भोग भी भारत के अर्जुन के आगे तुच्छ था तो इस जगत की प्लास्टिक की पट्टियाँ (फिल्मों) का भोग क्या चीज है ?

इस लोक और परलोक के सुख से भी बढ़कर जो आत्मसुख है, उसको पाने में ही जो अपनी द्रव्यशक्ति एवं भावशक्ति का उपयोग करता है उसी का जीवन धन्य है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2000, पृष्ठ संख्या 17-19 अंक 88

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साधक सिद्ध कैसे बने ?


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

साधारण से दिखनेवाले मनुष्य में इतनी शक्तियाँ छुपी हुई हैं कि वह हजारों जन्मों के कर्मबन्धनों और पाप-तापों को काटकर अपने अजन्मा, अमर आत्मा में प्रतिष्ठित हो सकता है। मनुष्य तो क्या, यक्ष, गंधर्व, किन्नर एवं देवता भी उसका दर्शन पाकर तथा यशोगान करके अपना भाग्य बनाने लगें – ऐसा खजाना मनुष्य के भीतर छुपा हुआ है। महान होने की इतनी सम्भावनाओं के रहते हुए भी मानव बहिर्मुख होने के कारण पशु की नाईं जीवन जीता है,  व्यर्थ के तुच्छ भोग विलास में ही अपना अमूल्य जीवन बिता देता है और अंत में अतृप्ति के कारण निराश होकर मर जाता है। व्यर्थ की चर्चा करने, बोलने, विचारने तथा मनोरथ गढ़ने में ही भोला मनुष्य अपनी आन्तरिक शक्तियों का ह्रास कर डालता है।

….किन्तु साधक का जीवन संसारियों के जीवन से भिन्न होता है। संसारी लोगों की बातों में लोभ-मोह-अहंकार का पुट होता है लेकिन साधक के चित्त में निर्मलता, निर्मोहिता, निर्भीकता एवं निरहंकारिता की सुवास होती है। संसारी मनुष्य नश्वर सुख-भोग की वस्तुओं का संग्रह करके इन्द्रियजन्य सुखों को भोगने को  उत्सुक होता है जबकि साधक संसार के नश्वर सुख-भोग की वस्तुओं की अपेक्षा न करके अंतर्मुख होकर, आत्मानंद को पाने के महान रास्ते पर चलता है। संसारी मनुष्य किसी की निन्दा-स्तुति करके तो किसी में राग-द्वेष करके अपने चित्त को मलिनता की खाई में डालता है, जबकि साधक निंदा-स्तुति, मान-अपमान और राग-द्वेष को चित्त की वृत्तियों का खिलवाड़ समझकर अपने भीतर ही आत्मा में गोता मारने का प्रयास करता है। अपने स्वरूप को स्नेह करते-करते साधक निजानंद-स्वभाव में तृप्त होने को उत्सुक होता है जबकि निगुरा मनुष्य निजानंद-स्वभाव से बेखबर होकर विकारों के जाल में फँसा रहता है।

इसीलिए उन्नति चाहने वाले संयमी साधक को विकारी जीवन बिताने वाले संसारी लोगों से मिलने में घाटा ही घाटा है जबकि परमात्मप्राप्त महापुरुषों का सान्निध्य उसके जीवन में उत्साह और आनंद भरने में बड़ा सहायक सिद्ध होता है। सत्यस्वरूप परमात्मा में रमण करने वाले उन आत्मारामी सत्पुरुषों के श्रीचरणों  में जाकर साधक आत्मधन की संपत्ति हासिल कर सकता है लेकिन जब वह असावधानी से संसारियों एंव विकारियों के बीच में पड़ जाता है, उनके संपर्क में आने लगता है तो वह अपनी ध्यान और धारणा की शक्ति का ह्रास कर लेता है, आध्यात्मिक ऊँचाइयों से फिसल पड़ता है। अगर कोई साधक इस शक्ति का संचय करते हुए अपनी आत्मा में  प्रतिष्ठित होने तक उसे सावधानी से सँभालकर रखे तो वह साधक देर-सेवर एक दिन सिद्ध हो जाता है।

साधक के लिए एकान्तवास, धारणा-ध्यान का अभ्यास, ईश्वरप्राप्ति, शास्त्रविचार एवं महापुरुषों की संगति – ये सभी अनिवार्य शर्तें हैं।

एकान्त में विचरण करना, कुछ दिनों के लिए एक कमरे में अकेले ही मौन रहकर धारणा-ध्यान का अभ्यास करना साधना में सफलता पाने के लिए परम लाभकारी है। वेदान्त की बातें सुनकर भी जो एकान्तवास तथा ध्यान-धारणा की अवहेलना करता है उसके पास केवल कोरी बातें ही रह जाती हैं लेकिन जिन्होंने वेदान्त के वचनों को सुनकर एकान्त में उसका मनन करते हुए निदिध्यासन की भूमिका हासिल की है वे साधक सिद्धि को प्राप्त हो जाते हैं।

व्यर्थ का बोलना, सुनना एवं देखना साधक पसंद नहीं करता क्योंकि व्यर्थ का बोलने एवं जोर से बोलने से प्राणशक्ति, मनःशक्ति तथा एकाग्रता की शक्ति क्षीण होती है। व्यर्थ का देखने से चित्त में कुसंस्कार घुस जाते हैं और व्यर्थ का सुनने से चित्त मलिन हो जाता है। अतः उन्नति के चाहक को चाहिए कि वह व्यर्थ का देख-सुनकर अपनी शक्ति को क्षीण होने से बचाये।

साधक उचित आहार-विहार से अपना सत्त्वगुण संजोये रखता है। सत्त्वगुण की रक्षा करना उसका परम कर्त्तव्य बन जाता है। उसे फिर ज्ञान बढ़ाने के लिए किसी शास्त्र की आवश्यकता नहीं पड़ती वरन् सत्त्वगुण बढ़ते ही साधक में ज्ञान अपने-आप प्रगट होने लगता है।

सत्त्वात्संजायते ज्ञानम्…..

जैसे लोभी धन को सँभालता है, मोही कुटुम्बियों को सँभालता है ठीक ऐसे ही साधक अपने चित्त को चंचल, क्षीण एवं उग्र होने से बचाता है। जिन कारणों से चित्त में क्षोभ पैदा होता है, जिन कारणों से चिन्ता और भय बढ़ते हैं ऐसे क्रिया कलापों से साधक सदैव सावधान रहता है। अगर इस प्रकार की परिस्थिति बलात् आ भी जाये तो साधक शांति से जप-ध्यान, शास्त्राध्ययन आदि का आश्रय लेकर विक्षेप उत्पन्न करने वाले उऩ क्रिया-कलापों एवं विचारों से अपने को मुक्त कर लेता है।

साधक को चाहिए कि वह अपने-आपका मित्र बन जाये। अगर साधक परमात्मप्राप्ति के लिए सजग रहकर आध्यात्मिक यात्रा करता रहता है तो वह अपने-आपका मित्र है और अगर वह अनात्म पदार्थ में, संसार के क्षणभंगुर भोगों में ही अपना समय बरबाद कर देता है तो वह अपने-आपका शत्रु हो जाता है।

उच्च कोटि का साधक जानता है किः

चातक मीन पतंग, जब बिन ना रह पाय।

साध्य को पाये बिना, साधक क्यों रह जाय ?

बुद्धिमान साधक समझता है कि उसका लक्ष्य आत्मज्ञान पाना है और इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए जीवन में थोड़ी-बहुत दृढ़ता जरूरी है। जो लोग दूसरों को खुश करने में, मित्रों को रिझाने में या वाहवाही में अपने लक्ष्य को ठोकर मार देते हैं, अपने परम कर्त्तव्य को भूल जाते हैं वे फिर कहीं के नहीं रहते। मित्र या कुटुम्बीजन हमारा जितना समय खराब करते हैं, उतना श6 भी नहीं करते। अतः बुद्धिमान साधक इस विषय में बड़ा सावधान रहता है ताकि उसका अमूल्य समय कहीं व्यर्थ की बातों में ही नष्ट न हो जाये।

इसलिए वह कभी-कभी मौनव्रत का अवलंबन ले लेता है जिससे उसकी जीवनशक्ति बिखरने से बच जायें। साधक मौन एवं एकांत-सेवन का जितना अधिक अवलंबन होता है, उती ही उसकी दृढ़ता में बढ़ोतरी होती जाती है।

हे साधक ! तू अपनी दृढ़ता बढ़ा, धारणा शक्ति बढ़ा। तुझमें ईश्वर का असीम बल छुपा है। परमात्मा तुझमें ज्ञानरूप से प्रकट होने की प्रतीक्षा कर रहा है। तेरे भीतर विश्वनियंता अपने  पूर्ण बल, तेज, ओज, आनंद और प्रेमसहित प्रकट होना चाहता है। अतः हे साधक ! तू सावधान रहना। कहीं संसार के कँटीले मार्गों में उलझ न जाना। जीवनदाता से मुलाकात किये बिना ही कहीं जीवन की शाम न ढल जाये। अतः सावधान रहना, भैया !

जब संसार स्वप्न जैसा लगे, तब आंतरिक सुख की शुरुआत होती है। जब संसार मिथ्या भासित होने लगे, उसका चिंतन न हो, तब अंतःकरण में शांति व आराम प्रगट होने लगते हैं। जब चित्त अपने चैतन्य स्वरूप परम स्वभाव में तल्लीन होने लगे, तब आंतरिक आनंद प्रगट होने लगता है।

सारी मुसीबतें संसार को सत्य मानने एवं बहिर्मुख होने से ही आती है। अगर साधक अन्तर्मुख हो जाये तो उसे संसार स्वप्नवत् लगने लगे। अतः साधक को सदैव अन्तर्मुख होने का अभ्यास करना चाहिए। ऐसा करने से उसकी सारी व्याकुलताएँ, दुःख, शोक एवं चिन्ताएँ अपने आप गायब हो जायेंगी।

जो समय हमें परमात्मा को जानने में लगाना चाहिए, ज्ञान पाने में लगाना चाहिए, अंतर्मुख होने में लगाना चाहिए वही समय हम संसार की तुच्छ वस्तुओं, भोगों एवं बहिर्मुखता में लगा देते हैं, इसीलिए ईश्वरप्राप्ति में विफल हो जाते हैं।

संसार के प्रति आकर्षण का कारण है ईश्वर में श्रद्धा का अभाव एवं अंतर्मुख होने में लापरवाही। अगर साधक अंतर्मुख होता जाये तो उसका आत्मबल उत्तरोत्तर बढ़ता जाये और एक दिन उसके सारे दुःखों का अंत हो जाये। चाहे कैसा भी आत्मज्ञान की कुंजी मिल जाये, अंतर्मुख होने की कला आ जाये तो पाप में इतनी ताकत ही नहीं कि उसके आगे टिक सके।

मौन, जप, उचित आहार-विहार, एकांत सेवन एवं आत्मविचार अंतर्मुखता लाने में अत्यंत सहायक सिद्ध होते हैं। जिन्होंने भी लोकसम्पर्क से दूर रहकर अज्ञात स्थान में एकांतसेवन किया तथा अल्पाहार का आश्रय लिया, एकान्त में रहकर ध्यान और योग के बल से अपनी जीवनशक्ति को विकसित करके जीवनदाता को, नित्यज्ञान, नित्यप्रेम और नित्य आत्मसुख को पाने का प्रयत्न किया, वे ही महापुरुष हो गये। लेकिन जिन्होंने लोकसंपर्क का सतत सेवन किया और लोकेश्वर के लिए अंतर्मुख होना स्वीकार नहीं किया, उनके पास केवल कोरी बातें ही रह गयीं। जिन्होंने भी मन की वृत्तियों को बहिर्मुख करके उन्हें कल्पनाओं की धारा में बहाया, उन्होंने वास्तव में अपनी जीवनशक्ति को क्षीण करने में ही समय गँवाया, अतः उनके जीवन में अँधेरा ही छाया रहा।

मदालसा, गार्गी, याज्ञवल्क्य आदि विभूतियाँ एकान्तसेवन तथा मौन का अवलंबन लेकर ही महान बनीं। भगवान बुद्ध ने लगातार छः वर्षों तक जंगलों में अज्ञात रहकर कठोर साधना की और ध्यान समाधि में तल्लीन रहे। आद्यशंकराचार्य के गुरु गोविन्दाचार्यजी भी नर्मदा तट पर स्थित ओंकारेश्वर में एक गुफा में सैंकड़ों वर्षों तक समाधिस्थ रहे। आज तक जितने भी महापुरुष एवं महान विभूतियाँ हुई हैं, उन्होंने अपने जीवन में मौन, एकांतसेवन, जप-ध्यान-धारणा एवं समाधि को ही महत्त्व दिया था। वे अपने निजस्वरूप में स्थित रहकर आत्ममस्ती में विचरते रहे।

रमण महर्षि 53 वर्ष तक अरुणाचलम में रहे। इस बीच उन्होंने अनेकों वर्ष एकान्त में एवं योगाभ्यास में व्यतीत किये तथा समाधि में वे निमग्न रहे।

उत्तरकाशी में कृष्णबोधआश्रम नामक महापुरुष ने अज्ञात व एकान्तसेवन कर साधनामय जीवन बिताया और बड़े प्रसिद्ध हो गये।

गंगोत्री में तपोवन स्वामी नामक एक विरक्त महात्मा ने गौमुख की बर्फीली पहाड़ियों पर जाकर एकान्तसेवन करते हुए अपनी धारणाशक्ति को विकसित किया और आत्मचिंतन की धारा में मन की वृत्तियों को प्रवाहित कर ब्रह्माकार वृत्ति प्रगट की।

श्रीरंग अवधूत महाराज ने लम्बे समय तक नर्मदा के किनारे अज्ञात रहकर एकांतसेवन किया तथा घास-फूस की कुटिया बनाकर वे ब्रह्माभ्यास को बढ़ाते रहे।

श्री अरविन्द घोष जैसे प्रसिद्ध व्यक्ति भी वर्षों तक एक कमरे में बंद रहे, अपने निवास से बाहर नहीं निकले। वे भी भारत के एक बड़े योगी के रूप में प्रसिद्ध हुए।

निलेश स्वामी ने नेपाल के जंगलों में एकांतसेवन कर आत्ममस्ती का लाभ लिया।

उत्तरकाशी और नैनीताल के भयानक अरण्यों में पूज्यपाद स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज भी वर्षों तक अज्ञात एकान्त में आत्मयात्रा करते हुए, निजानंद की मस्ती लूटते हुए विचरते रहे। आत्ममस्ती से सराबोर वे दिव्य महापुरुष हजारों-लाखों लोगों के बिखरे हुए जीवन को सँवारने तथा साधकों के जीवन को जीवनदाता की ओर अग्रसर करने में समर्थ हुए।

सभी संत महापुरुष एकान्त के बड़े प्रेमी होते हैं। जिनको एकान्त में परमात्मा का ध्यान करने की कला आ गयी, जिन्होंने एकाकी जीवन का मूल्य जाना है, वे व्यर्थ के सांसारिक झमेलों में पड़कर अपना आयुष्य बरबाद करना पसंद नहीं करते। ऐसे लोग व्यवहार में रहते हुए भी एकान्त में जाने को उत्सुक रहते हैं। और तो सब देव हैं लेकिन शिवजी महादेव हैं। उन्हें भी जब देखो तब एकान्त में समाधिस्थ रहते हैं।

हम आये थे अकेले, जायेंगे अकेले। रात को भी तो अकेले ही रहते हैं। जब इन्द्रियाँ और मन शांत होकर निद्राधीन होते हैं तभी शरीर की थकान मिटती है। इसी प्रकार अगर समय रहते हुए आत्मध्यान में तल्लीन होना सीख लें तो सदियों की थकान मिट सकती है।

उठो…. कमर कसो। समय पल-पल करके बीता जा रहा है… मृत्यु नजदीक आ रही है। पुरुषार्थ करो। एकान्तवास करो। धारणा-ध्यान का अभ्यास तथा शास्त्रविचार एवं महापुरुषों की संगति करो और उस परम सुखरूप परमात्मा को पाकर मुक्त हो जाओ। अतः सत्संग-कार्यक्रम माँगने का दुराग्रह न करो। हम भी अब एकान्त का समय बढ़ा रहे हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2000, पृष्ठ संख्या 7-10, अंक 87

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