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सत्शिष्य के लक्षण


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

सत्शिष्य के लक्षण बताते हुए कहा है किः

अमानमत्सरो दक्षो निर्ममो दृढ़सौहृदः।

असत्वरोर्थजिज्ञासुः अनसूयुः अमोघवाक्।।

ʹसत्शिष्य मान और मत्सर से रहित, अपने कार्य में दक्ष, ममतारहित, गुरु में दृढ़ प्रीति करने वाला, निश्चल चित्त वाला, परमार्थ का जिज्ञासु और ईर्ष्यारहित एवं सत्यवादी होता है।ʹ

इस प्रकार के नवगुणों से जो सुसज्जित होता है ऐसा सत्शिष्य सदगुरु के थोड़े से उपदेश मात्र से आत्म-साक्षात्कार करके जीवन्मुक्त पद में आरूढ़ हो जाता है।

ऐसे पद को पाये हुए ब्रह्मवेत्ता महापुरुष का सान्निध्य साधक के लिए नितांत आवश्यक। साधक को ब्रह्मवेत्ता महापुरुष का सान्निध्य मिल भी जाये, लेकिन उसमें यदि इन नवगुणों का अभाव है तो उसे ऐहिक लाभ जरूर होता है, किन्तु आत्म-साक्षात्कार के लाभ से वह वंचित रह जाता है।

अमानित्व, ईर्ष्या का अभाव तथा मत्सर का अभाव-इन सदगुणों के समावेश से साधक तमाम दोषों से बच जाता है एवं साधक का तन और मन आत्म-विश्रांति पाने के काबिल हो जाता है।

सत्शिष्यों का यह स्वभाव होता हैः वे आप अमानी रहते हैं और दूसरों को मान देते हैं। जैसे भगवान राम स्वयं अमानी रहकर दूसरों को मान देते थे।

साधक को क्या करना चाहिए ? वह अपनी बराबरी के लोगों को देखकर न ईर्ष्या करे, न अपने से छोटों को देखकर अहंकार करे और न ही अपने से बड़ों के सामने कुंठित हो, वरन् सबको गुरु का कृपापात्र समझकर, सबसे आदरपूर्ण व्यवहार करे, प्रेमपूर्ण व्यवहार करे। ऐसा करने से साधक धीरे-धीरे मान, मत्सर एवं ईर्ष्यारहित होने लगता है। खुद को मान मिले ऐसी इच्छा रखने पर मान नहीं मिलता है तो सुखाभास होता है एवं नश्वर मान की इच्छा और बढ़ती है। इस प्रकार मान की इच्छा मनुष्य को गुलाम बनाती है जबकि मान की इच्छा से रहित होने से मनुष्य स्वतंत्र बनता है। इसलिए साधक को हमेशा मानरहित बनने की कोशिश करनी चाहिए। जैसे मछली जाल में फँसती है तो छटपटाती है, ऐसे ही जब साधक प्रशंसकों के बीच में आये तब उसका मन छटपटाना चाहिए। जैसे, लुटेरों के बीच आ जाने पर सज्जन आदमी जल्दी से वहाँ से खिसकने की कोशिश करता है ऐसे ही साधक की प्रशंसकों, प्रलोभनों एवं विषयों से बचने की कोशिश करनी चाहिए।

जो तमोगुणी व्यक्ति होता है वह चाहता है कि ʹमुझे सब मान दें और मेरे पैरों तले सारी दुनिया रहे।ʹ जो रजोगुणी व्यक्ति होता है वह कहता है कि ʹहम दूसरों को मान देंगे तो वे भी हमें मान देंगे।ʹ ये दोनों प्रकार के लोग प्रत्यक्ष या परोक्षरूप से कोशिश करते हैं अपना मान बढ़ाने की ही। मान पाने के लिए वे संबंधों के तंतु जोड़ते ही रहते हैं और इससे इतना बहिर्मुख हो जाते हैं कि जिससे संबंध जोड़ना चाहिए उस अंतर्यामी परमेश्वर के लिए उनको फुरसत ही नहीं मिलती और आखिर में अपमानित होकर जगत से चले जाते हैं। ऐसा न हो इसलिए साधक को हमेशा याद रखना चाहिए कि चाहे कितना भी मान मिल जाये लेकिन मिलता तो है इस नश्वर शरीर को ही और शरीर को अंत में जलाना ही है तो फिर उसके लिए क्यों परेशान होना ?

संतों ने ठीक ही कहा हैः

मान पुड़ी है जहर की, खाये सो मर जाये।

चाह उसी की राखता, वह भी अति दुःख पाये।।

एक बार बुद्ध के चरणों में एक अपरिचित युवक आ गिरा और दंडवत प्रणाम करने लगा।

बुद्धः “अरे, अरे, यह क्या कर रहे हो ? तुम क्या चाहते हो ? मैं तो तुम्हें जानता तक नहीं।”

युवकः “भन्ते ! खड़े रहकर तो बहुत देख चुका। आज तक अपने पैरों पर खड़ा होता रहा इसलिए अहंकार भी साथ में खड़ा ही रहा और सिवाय दुःख के कुछ नहीं मिला। अतः आज मैं आपके श्रीचरणों में लेटकर विश्रांति पाना चाहता हूँ।”

अपने भिक्षुकों की ओर देखकर बुद्ध बोलेः “तुम सब रोज मुझे गुरु मानकर प्रणाम करते हो लेकिन कोई अपना अहं न मिटा पाया और यह अनजान युवक आज पहली बार में ही एक संत-फकीर के नाते मेरे सामने झुकते-झुकते अपने अहं को मिटाते हुए, बाहर की आकृति का अवलंबन करते हुए अंदर निराकार की शांति में डूब रहा है।”

इस घटना का यही आशय समझना है कि सच्चे संतों की शरण में जाकर साधक को अपना अहंकार विसर्जित कर देना चाहिए। ऐसा नहीं कि रास्ते जाते जहाँ-तहाँ आप लम्बे लेट जाएँ।

अमानमत्सरो दक्षो…..

साधक को चाहिए कि वह अपने कार्य में दक्ष हो। अपना कार्य क्या है ? अपना कार्य है कि प्रकृति के गुण-दोष से बचकर आत्मा में जगना और इस कार्य में दक्ष रहना  अर्थात् डटे रहना, लगे रहना। उस निमित्त जो भी सेवाकार्य करना पड़े उसमें दक्ष रहो। लापरवाही, उपेक्षा या बेवकूफी से कार्य से विफल नहीं होना चाहिए, दक्ष रहना चाहिए। जैसे, ग्राहक कितना भी दाम म करवाने को कहे, फिर भी लोभी व्यापारी दलील करते हुए अधिक-से-अधिक मुनाफा कमाने की कोशिश करता है, ऐसे ही ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग में अपने चित्त को चलित करने के लिए कितनी ही प्रतिकूल परिस्थितियाँ आ जायें, फिर भी साधक को अपने परम लक्ष्य में डटे रहना चाहिए। सुख आये या दुःख, मान हो या अपमान, सबको देखते जाओ…. मन के विचारों को, प्राणों की गति को देखने की कला में दक्ष हो जाओ।

नौकरी कर रहे हो तो उसमें पूरे उत्साह से लग जाओ, विद्यार्थी हो तो उमंग के साथ पढ़ो, लेकिन व्यावहारिक दक्षता के साथ-साथ आध्यात्मिक दक्षता भी जीवन में होनी चाहिए। साधक को सदैव आत्मज्ञान की ओर आगे बढ़ना चाहिए। कार्यों को इतना नहीं बढ़ाना चाहिए कि आत्मचिंतन का समय ही न मिले। संबंधों को इतना नहीं बढ़ाना चाहिए कि, जिससे संबंध जोड़े जाते हैं उसी का पता न चले।

एकनाथ जी महाराज ने कहा है कि रात्रि के पहले प्रहर और आखिरी प्रहर में आत्म चिंतन करना चाहिए। कार्य के प्रारम्भ में और अंत में आत्मविचार करना चाहिए। दक्ष वह है जो जीवन में इच्छा उठे और पूरी हो जाये तब अपने आप से ही प्रश्न करे किः “आखिर इच्छापूर्ति से क्या मिलता है ?” ऐसा करने से इच्छानिवृत्ति के उच्च सिंहासन पर आसीन होने वाले दक्ष महापुरुष की नाई निर्वासनिक नारायण में प्रतिष्ठित हो जायेगा।

अगला सदगुण है ममतारहित होना। देह में अहंता और देह के संबंधियों में ममता होती है। जो मनुष्य अपने संबंधों के पीछे जितनी ममता रखता है, उतना ही उसके परिवार वाले उसको दुःख के दिन दिखा देते हैं। अतः साधक को देह एवं देह के संबंधों से ममतारहित बनना चाहिए।

आगे बात आती है-गुरु में दृढ़ प्रीति करने की। मनुष्य क्या करता है ? वास्तविक प्रेमरस को समझे बिना संसार के नश्वर पदार्थों में प्रेम का रस चखने जाता हूँ और अंत में हताशा, निराशा एवं पश्चाताप की खाई में गिर पड़ता है। इतने से भी छुटकारा नहीं मिलता। चौरासी लाख जन्मों की यातनाएँ सहने के लिए उसे बाध्य होना पड़ता है। शुद्ध प्रेम तो उसे कहते हैं जो भगवान और गुरु से किया जाता है। उनमें दृढ़ प्रीति करने वाला साधक आध्यात्मिकता के शिखर पर शीघ्र ही पहुँच जाता है। जितना अधिक प्रेम, उतना अधिक समर्पण और जितना अधिक समर्पण, उतना ही अधिक लाभ।

कबीर जी ने कहा हैः

प्रेम न खेतों उपजे, प्रेम न हाट बिकाय।

राजा चहो प्रजा चहो, शीश दिये ले जाय।।

शरीर की आसक्ति और अहंता जितनी मिट जाती है, उतना ही स्वभाव प्रेमपूर्ण बनता जाता है। इसीलिए छोटा-सा बच्चा, जो निर्दोष होता है, हमें बहुत प्यारा लगता है क्योंकि उसमें देहासक्ति नहीं होती। अतः शरीर की अहंता एवं आसक्ति छोड़कर गुरु में, प्रभु में दृढ़ प्रीति करने से अंतःकरण शुद्ध होता है। ʹविचारसागरʹ ग्रन्थ में भी आता है कि “गुरु में दृढ़ प्रीति करने से मन का मैल तो दूर होता ही है, साथ ही उनका उपदेश भी शीघ्र असर करने लगता है, जिससे मनुष्य की अविद्या और अज्ञान भी शीघ्र नष्ट हो जाता है।”

इस प्रकार गुरु में जितनी-जितनी निष्ठा बढ़ती जाती है, जितना-जितना सत्संग पचता जाता है उतना-उतना ही चित्त निर्मल व निश्चिंत होता जाता है।

इस प्रकार परमार्थ पाने की जिज्ञासा बढ़ती जाती है, जीवन में पवित्रता, सात्त्विकता, सच्चाई आदि गुण प्रगट होते जाते हैं और साधक ईर्ष्यारहित हो जाता है।

जिस साधक का जीवन  सत्य से युक्त, मान, मत्सर, ममता एवं ईर्ष्या से रहित होता है, जो गुरु में दृढ़ प्रीति वाला, कार्य में दक्ष एवं निश्चलचित्त होता है, परमार्थ का जिज्ञासु होता है – ऐसा नव गुणों से सुसज्ज साधक शीघ्र ही गुरुकृपा का अधिकारी होकर जीवन्मुक्ति के विलक्षण आनंद का अनुभव कर लेता है अर्थात् परमात्म-साक्षात्कार कर लेता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 1999, पृष्ठ संख्या 6-9, अंक 79

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गुरुद्वार पर कैसे रहें


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

श्री महाभारत में आता हैः

न विना ज्ञानविज्ञाने मोक्षस्याधिगमो भवेत्।

न विना गुरुसम्बन्धं ज्ञानस्याधिगमः स्मृतः।।

गुरु प्लावयिता तस्य ज्ञानं प्लव इहोत्यते।

विज्ञाय कृतकृत्यस्तु तीर्णस्तदुभयं त्यजेत्।।

“जैसे ज्ञान विज्ञान के बिना मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता, उसी प्रकार सदगुरु से संबंध हुए बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती। गुरु इस संसारसागर से पार उतारने वाले हैं और उनका दिया हुआ ज्ञान नौका के समान बताया गया है। मनुष्य उस ज्ञान को पाकर भवसागर से पार और कृतकृत्य हो जाता है। फिर उसे नौका और नाविक दोनों को ही अपेक्षा नहीं रहती।ʹʹ (महा. शांति. 326.22,23)

छल, कपट, धोखा-धड़ी पलायनवादिता आदि आसुरी वृत्तियों से बचाकर जो हमें सच्चाई, पवित्रता एवं तत्परता की ओर ले जायें, ऐसे सदगुरु मिलना-यह मानव जन्म की सबसे बड़ी उपलब्धि है। लेकिन ऐसे सदगुरु मिल जायें, फिर भी हम सुधरे नहीं तो मनुष्य जन्म का दुर्भाग्य भी तो पूरा है। अतः गुरुद्वार पर कैसे रहना चाहिए-यह सभी को ज्ञात होना चाहिए।

शिष्य को चाहिए कि गुरु-आश्रम में वह अपना सारा समय सेवा, साधना, जप-ध्यान आदि में ही लगाये और अपनी गलती हो तो गलती को गलती मानकर उसका प्रायश्चित करे।

हमारी जो भी गलत आदत है उसको सामने रखकर सुबह संकल्प करो किः “अब मैं ऐसा नहीं करूँगा।” फिर भी गलत आदत नहीं निकलती है तो सदगुरु से, भगवान से प्रार्थना करो, गुरुभाइयों से कहो किः “मुझमें यह गलती है।” अपनी गलती को चिल्लाकर भगाओ तो भागेगी, नहीं तो गलती को गलती के रूप में भी नहीं स्वीकार कर सकोगे।

मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन लाना बड़ा विकट है। कोई भी व्यक्ति अपनी प्रकृति का बदलाव सरलता से स्वीकार नहीं करता है। जो आदतें पड़ गयी हैं, जो पुराने संस्कार पड़ गये हैं, उनको यह छोड़ना नहीं चाहता। इसीलिए पत्थर को भगवान बनाना बड़ा आसान है लेकिन झूठ-कपट करने वाले इस मिट्टी के पुतले को ब्रह्म बनाना बड़ा कठिन है। किसी मठ-मंदिर या संस्था को चलाना भी सरल है लेकिन बेईमानों-कपटियों को ब्रह्मसुख देना असंभव है क्योंकि वे अपनी गलत आदतों को छोड़ने के लिए राजी नहीं होते। दुर्गुणों का त्याग किये बिना सब ऐच्छिक साधन एवं सुख गुरु से प्राप्त कर लेना चाहते हैं। वे तो मानो, डामर की सड़क पर खेती करना चाहते हैं। यदि ब्रह्मसुख पाना है, आत्मसुख पाना है तो साधक को आगे झूठ-कपट, बेईमानी, अपने बचाव की आदत आदि दुर्गुणों का त्याग करना ही पड़ेगा।

साधक को चाहिए कि वह जप-ध्यान, सेवा, साधना तत्परता से करता रहे और नियम में निष्ठा रखे। ऐसा करने से पुरानी गंदी आदतें दूर होंगी एवं मनसुखता मिटेगी। लेकिन यदि जप-ध्यान से, सेवा से वह कतरायेगा, नियम में नहीं रहेगा तो भ्रष्ट हो जायेगा, पतित हो जायेगा।

साधारण जगह पर किये गये किसी भी कार्य़ की अपेक्षा तीर्थ व गुरुद्वार पर किये गये कार्य का फल अनंतगुना होता है। साधारण जगह पर किये हुए जप-तप की अपेक्षा तीर्थ व गुरुद्वार पर किया गया जप-तप अनंतगुना फल देता है। इसी प्रकार साधारण जगह पर किये गये झूठ-कपट, बेईमानी की अपेक्षा तीर्थ व गुरुद्वार पर किये गये झूठ-कपट एवं बेईमानी से ज्यादा पाप लगता है।

मन में जैसा आता है, वैसा ही जो करने लग जाता है उसका पतन हो जाता है। कोई भी काम करो तब सोचो की गुरु देखेंगे तो उनको कैसा लगेगा ? उनके मन में क्या होगा ?

ईश्वन ने मनुष्य जन्म दिया है, स्वास्थ्य दिया है, मार्गदर्शक सदगुरु मिले हैं, खाने-पीने रहने की सुविधा मिली है, फिर भी जो अपनी बुरी आदतें निकालकर अपना कल्याण न करे, अपनी उन्नति न करे तो किसका दोष ?

कई लोग ऐसे होते हैं जो शत्रु को भी मित्र बना लेते हैं और कई ऐसे होते हैं कि मित्र को भी शत्रु बना लेते हैं। कई ऐसे होते हैं कि असंत के आगे भी संत जैसा व्यवहार करते हैं तो असंत के अंदर भी छुपा हुआ संतत्व जग जाता है और कई मूर्ख ऐसे होते हैं कि संत के आगे भी ऐसा व्यवहार करते हैं कि संत को भी असंत जैसा नाटक करना पड़ता है। उनको क्रोध होता नहीं है, फिर भी क्रोध लाना पड़ता है। अतः अपना व्यवहार ऐसा होना चाहिए कि जहाँ से न मिलता हो वहाँ से भी मिलना शुरु हो जाये। ऐसा व्यवहार न करो कि जहाँ से छलकता हो, वहाँ से भी छलकना बंद हो जाये। इन्सान अपने कर्मों से ही ईश्वर और सदगुरु के करीब या उनसे दूर होता है। संत कभी किसी को अपने से दूर नहीं करते।

करणी आपो आपनी के नेड़े के दूर।

आश्रम में आते हो तो ध्यान करने वाले व्यक्ति को मददरूप हो जाओ। यदि मददरूप नहीं हो सकते हो तो कम-से-कम उसे विघ्न मत डालो। यहाँ कई ऐसे नये-नये अटपटे लोग आ जाते हैं जो कि हम ध्यान में होते हैं, साधक लोग शांति से बैठे होते हैं फिर भी जोर से बड़बड़ाने लगते हैं किः “आश्रम अच्छा है…. महाराज कहाँ हैं ?ʹʹ ऐसा नहीं करना चाहिए। इतना बोलो, ऐसा बोलो और इसीलिए बोलो कि जिससे तुम्हारे भी पाप नष्ट हों, तुम्हारा मन भी शीतल हो, शांत हो और सुनने वाले का मन भी गहरी शांति में खो जाये। आश्रम की शांति बनी रहे।

इसी प्रकार आश्रम की स्वच्छता बनाये रखने में भी सावधान रहना चाहिए। ऐसा नहीं कि फल खाकर छिलके बगीचे में ही छोड़ दिये… आश्रम में कोई नौकर नहीं है। यहाँ साधक लोग रहते हैं। तुम जूठा पदार्थ छोड़कर जाओगे और साधक बुहारी करके उसे कचरापेटी में डालेंगे तो तुम्हारे पाप बढ़ेंगे और पुण्य नष्ट होंगे। हो सके तो तुम भी आश्रम में तिनका उठाकर किनारे लगाओ। हो सके तो जूठन उठाकर फेंक दो। तुम जूठा छोड़कर मत जाओ। पहले का काफी ʹजूठाʹ तुम्हारे सिर पर पड़ा है, और कब तक ढोते रहोगे ?

आश्रम में संत-दर्शन की भी कोई विधि होती है। जहाँ से हवा आती है उस तरफ संत हों, संत की हवा का हमें स्पर्श हो – ऐसी जगह पर खड़े रहना चाहिए। हमारा श्वास छूकर, हमारी हवा छूकर संत को लगे-यह ठीक नहीं है। नहीं तो हमारी खिन्नता और मूढ़ता वहाँ जाती हैं और वहाँ से जो छलकता है, उसमें 19-20 हो जाता है। फिर तुम्हारे विचार और तुम्हारी गंदगी का कुछ मिश्रण ही तुम्हें मिल जाता है। इसीलिए कुछ दुष्ट प्रकृति के लोग या तामसी लोग आ जाते हैं और ऐसे ढंग से खड़े होते हैं तो उनको प्रेम की जगह पर डाँट मिल जाती है क्योंकि उनके पास जो है वे ही आंदोलन मिश्रित हो जाते हैं।

संत यदि ध्यान में हों, किसी काम में हों या किसी से बात करते हों तो उनकी छाती पर ख़ड़े नहीं रहना चाहिए। संत जितना धीरे बोलेंगे उतना सारगर्भित होगा। जितनी भीड़ होगी उतना जोर से बोलना पड़ेगा। अतः ऐसे समय पर दूर खड़े रहो। अवसर पाकर ही बात करो।

इस प्रकार गुरुद्वार पर रहने की, गुरुदर्शन करने की युक्ति जानकर, उनका अमल करके तुम बहुत लाभ उठा सकते हो।

एक भगवान, भगवान के प्यारे संत सदगुरु एवं शास्त्र ही हमको परमात्मा के रास्ते पर चढ़ाते हैं, बाकी तो सब गिराने वाले ही मिलते हैं। बुद्धिमान वही है जो ससांररूपी ताप से बचने के लिए संतों का संग करता है, सत्शास्त्रों का विचार करता है एवं आत्मविद्या को पाकर संसार में तपाने वाली अविद्या को मिटा देता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 1999, पृष्ठ संख्या 10-12, अंक 79

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गीता में प्रपत्तियोग


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।

भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्।।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- “हे अर्जुन ! मेरे में आविष्ट चित्तवाले उन भक्तों का मैं मृत्युरूप संसार-समुद्र से शीघ्र ही उद्धार करने वाला बन जाता हूँ।” गीताः 12.7

संसार एक सागर है। जैसे सागर में जल-ही-जल है ऐसे ही संसार में मृत्यु ही मृत्यु है। जो पैदा होता है, मृत्यु की ओर उसकी यात्रा शुरु हो जाती है। जो संयोग है वह वियोग में बदल जाता है। जो संग्रह है वह विनाश में बदल जाता है।

ऐसा कोई शरीर नहीं जिसके साथ मृत्यु न जुड़ी हो। ऐसा कोई संयोग नहीं जिसके साथ वियोग न जुड़ा हो। ऐसा कोई संग्रह या भोग नहीं जिसका विनाश या वियोग न होता हो।

संसार मानेः संसरति इति संसारः। जो सरकता जाये उसे संसार कहते हैं। सिक्ख धर्म के आदिगुरु नानकदेव ने कहा हैः

राम गयो रावण गयो ताको बहु परिवार।

कह नानक कछु थिर नहीं सपने ज्यों संसार।।

शिवजी ने भी कहा हैः

उमा कहऊँ मैं अनुभव अपना।

सत्य हरि भजन जगत सब सपना।।

जहाँ खूब दूध होता है उसे दुग्धालय बोलते हैं। जहाँ पुस्तकें होती हैं उसे पुस्तकालय बोलते हैं। जहाँ औषधियाँ होती हैं उसे औषधालय बोलते हैं। ऐसे ही जहाँ दुःख-ही-दुःख है उस संसार को दुःखालय कहा गया है। यह दुःखालय तो है ही, साथ ही विनाशशील भी है।

फिर भी ऐसे दुःखालय और विनाशील संसार में भी एक सुखस्वरूप भगवान का अनुभव किया जा सकता है। मरणधर्मा शरीर में अमर ईश्वर का एहसास हो सकता है। नश्वर में शाश्वत की मुलाकात करने की संभावनाएँ छुपी हैं। इसलिए मनुष्य जीवन सबसे श्रेष्ठ और दुर्लभ माना जाता है।

संसार की ऐसी कोई वस्तु नहीं, ऐसी कोई परिस्थिति नहीं, ऐसी घटना नहीं, ऐसा कोई संयोग नहीं, ऐसा कोई संबंध नहीं, जो सदा रहे। सब नाश की तरफ जा रहे हैं।

खून पसीना बहाता जा तान के चादर सोता जा।

यह किश्ती तो हिलती जायेगी, तू हँसता जा या रोता जा।।

कितना भी इसको थामने का प्रयास करो किन्तु संसार की चीजें और संसार कभी थमा नहीं है। वह बदलता रहता है।

चाँद सफर में, सितारे सफर में।

दरिया सफर में, दरिया के किनारे सफर में।।

जहाँ बस्तियाँ थीं, वे बस्तियाँ सागर में कहाँ खो गयीं ? पता तक नहीं है। जहाँ समुद्र लहराता था वहाँ सड़कें बन गयीं और गाड़ियाँ दौड़ रही हैं। जहाँ पानी उछलकूद करता था, वहाँ तो दस-दस मंजिली इमारतें दिखाई देती हैं और जहाँ मकान थे वे पूरे के पूरे गायब हो गये दरिया में। मोहन-जो-दड़ो केवल एक ही नहीं है, सारी दुनिया मोहन-जो-दड़ो की तरह हो जाती है समय पाकर।

देखत नैन चल्यो जग जाई। का माँगू कछु थिर न रहाई।।

देखते-देखते इस संसार की परिस्थितियाँ चली जा रही हैं, क्या माँगूं ?

अनित्यानि शरीराणि वैभवो नैव शाश्वतः।

नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंग्रहः।।

शरीर अनित्य है। वैभव शाश्वत नहीं है और हम रोज मृत्यु की तरफ जा रहे हैं। अतः हमारा कर्तव्य यह है कि धर्म का संग्रह कर लें और धर्म का संग्रह करने वाले पुरुष के लिए भगवान वचन देते हैं-

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।

भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्।।

हे अर्जुन ! जैसे धनवान व्यक्ति की पत्नी अगर भीख माँगे तो उस धनवान व्यक्ति की इज्जत का सवाल है। ऐसे ही मेरा भक्त संसार के सागर में बार-बार गोते खाये और जन्मे मरे तो मेरी इज्जत का सवाल है। जो मेरा होकर मेरा भजन करता है, उसे पार होने की चिंता नहीं करनी चाहिए। जो मेरा होकर मेरा भजन करता है उसे  भोजन, छाजन, नीर की भी चिंता नहीं करनी चाहिए। उसे कभी उदास या चिंतित नहीं होना चाहिए और कभी संदेह नहीं करना चाहिए। जैसे पतिव्रता स्त्री कभी यह नहीं सोचती कि ʹपति मेरा भरण पोषण करेगा कि नहीं ? मुझे सुख देगा कि नहीं ?ʹ ऐसे ही दृढ़ भक्त जब मेरे होकर भजन करते हैं तो फिर वे कोई संशय या संदेह नहीं करते।

संशय सबको खात है संशय सबका पीर।

संशय की फाकी करे उसका नाम फकीर।।

भिखमंगे का नाम फकीर नहीं है  वरन् जिसने संशय की फाँकी कर ली उसका नाम फकीर है। भगवान हमारा भजन सुनते होंगे कि नहीं, भजन फलता होगा कि नहीं, यह संशय मत आने दो। ʹहमारा क्या होगा ?ʹ अरे !

भोजन छाजन नीर की चिंता करे सो मूढ़।

भक्त चिंता ना करे निज पद में आरूढ़।।

निज पद में आरूढ़ चिंता करे सो कैसी ?

खुशी है ता में प्राप्त अवस्था जैसी।।

किसी ने कहा हैः

गम की अँधेरी रात में, दिल को न बेकरार कर।

सुबह जरूर आयेगी, सुबह का इंतजार कर।।

…..और तेरा परमेश्वर ही तो तेरी सुबह है भैया ! उस परमेश्वर की प्रेरणा ही तो तेरी सुबह है। शरीर की सुबह तो रोज आती है फिर अँधकारमयी रात्रि आ जाती है लेकिन परमेश्वररूपी सुबह, परमेश्वररूपी प्रकाश यदि एक बार भी हृदय में आ जाता है तो फिर रात्रि का सवाल ही नहीं रहता।

भगवान कहते हैं- ʹजो मेरे को अपना निकटवर्ती और नित्य शुद्ध-बुद्ध-चैतन्यस्वरूप जानते-मानते हैं और मेरा भजन करते हैं, अपना चित्त मुझ चैतन्य में लगाते हैं, उन्हें संसार-सागर से तरने की चिंता नहीं करनी चाहिए।

मृत्यु के समय तो शरीर रोग के प्रभाव से पीड़ित हो जाता है। मृत्यु के समय जीव मेरा चिंतन करे और मैं उसे तार दूँ ऐसी बात नहीं है, अर्जुन ! फिर उनकी जीवनभर की भक्ति का क्या होगा ? केवल मृत्यु के समय मेरा भजन करे और तभी मैं उन्हें तारूँ तो फिर मेरे में और दुकानदार में क्या फर्क ? जो सचमुच में एक बार भी मेरी शरण आ जाता है, मैं उसे नहीं छोड़ता।

सचमुच में हम ईश्वर की शरण हैं लेकिन मानते नहीं हैं और राग-द्वेष की शरण में चले जाते हैं। लोभ-लालच की शरण में चले जाते हैं। हाड़-मांस के शरीर की शरण में चले जाते हैं। किन्तु इन चीजों की कितनी भी शरण लो, वे शरण देती नहीं कम्बख्त ! वरन् थप्पड़ें ही मारती हैं जबकि एक बार सच्चे हृदय से परमात्मा की ली गयी शरण भवसागर से तारती है।

कुछ समय पहले वैज्ञानिकों ने एक प्रयोग कियाः एक मुर्गी ने अण्डा सेया। सेते-सेते जब दिन पूरे हो गये तब एक अण्डे को चोंच मारी तो ज्यों ही चूजे का मुँह बाहर आये उससे पहले मुर्गी को उठाकर बतख को रख दिया । चूजे की पहली नजर बत्तख पर पड़ी तो वह बत्तख को ही अपनी माँ समझने लगा और उसके पीछे-पीछे जाने लगा। बत्तख चोंचे मार रही थी और उसकी असली माँ (मुर्गी) चिल्ला भी रही थी अपने पास बुलाने के लिए किन्तु चूजा बत्तख के पीछे ही लगा रहा।

ऐसे ही वास्तव में हम परमात्मा के बच्चे हैं।

परमात्मा ज्ञानस्वरूप हैं तो हमारी आत्मा भी ज्ञानस्वरूप है। परमात्मा सुखस्वरूप है तो हमारी आत्मा भी सुखस्वरूप है। परमात्मा नित्य है तो हमारी आत्मा भी नित्य है, किन्तु हम मायारूपी बत्तख के प्रभाव में आ गये हैं। उसकी कई चोंचे भी लगती हैं। कभी काम की चोंच तो कभी क्रोध की, कभी लोभ की तो कभी मोह की, कभी अहंकार की भी चोंच लगती है और अतं में तो बड़ी चोंच लगती है मृत्यु की। ऐसे ही सदियों से चोंचे खाता आया है यह जीव किन्तु अगर इस मनुष्य जन्म में उसे सत्संग मिल जाये और असली माँ रूपी परमात्मा ही हमारा सच्चा विश्रांति स्थल है यह समझ में आ जाये तो उद्धार हो जाये।

वास्तव में तो आपका और ईश्वर का ऐसा पक्का संबंध है कि आप तोड़ना चाहें तो भी नहीं तोड़ सकते और अगर ईश्वर खुद भी तुम्हारे साथ संबंध तोड़ना चाहे तो भी नहीं तोड़ सकता। इतना हमारा और ईश्वर का अविभाज्य संबंध है, शाश्वत संबंध है लेकिन अज्ञानता के कारण हम कल्पित संबंधों को सच्चा मानते हैं और सच्चे संबंध को पीठ दिये हुए हैं।

आपका और इस शरीर का संबंध 60-70 पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा और अभी-भी नहीं की तरफ ही जा रहा है। सेठ का और रुपयों का संबंध पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा। पिता और पुत्र का संबंध भी पुत्र के जन्म से पहले नहीं था और मरने के बाद भी नहीं रहेगा। लेकिन परमात्मा के साथ इस जीवात्मा का संबंध तो जन्म के पहले भी था, जन्म ले रहा था तब भी उस चैतन्य के साथ संबंध था, बाल्यावस्था में भी था, किशारावस्था में भी था। किशोरावस्था चली गयी फिर भी ईश्वर  साथ तुम्हारा संबंध नहीं गया। यौवन चला गया फिर भी परमात्मा के साथ का संबंध नहीं गया। बुढ़ापा चला जाये और मौत आ जाये फिर भी परमात्मा के साथ जीवात्मा का संबंध नहीं टूट सकता है। अरे ! जीवात्मा और परमात्मा का संबंध तो मृत्यु के बाद भी नहीं टूट सकता।

जैसे महाकाश के साथ घटाकाश का संबंध नहीं टूट सकता है। महाकाश संबंध तोड़ना चाहे फिर नहीं तोड़ सकता और घड़ा संबंध तोड़ना चाहे फिर भी महाकाश से संबंध नहीं तोड़ सकता। जैसे लहर पानी से संबंध तोड़ना चाहे तो नहीं तोड़ सकती और पानी लहर से संबंध तोड़ना चाहे तो नहीं तोड़ सकता है ऐसे ही ईश्वर और जीव का संबंध नहीं टूट सकता है क्योंकि वह सनातन संबंध है।

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।

मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।

ʹहम ईश्वर के हैं, इस बात में तो जरा भी संदेह नहीं करना चाहिए। फिर वह जो भी करे।ʹ मान दिलाता है तो तेरी मौज… अपमान दिलाता है तो तेरी मौज… अगर नरक में भेजे तो हम तेरे होकर ही नरक में भी जायेंगे।ʹ अगर ईश्वर के होकर नरक में गये तो नरक के बाप की भी ताकत नहीं कि दुःख दे सके। किन्तु अगर भोगों के स्वर्ग में भी गये तो स्वर्ग सुखदायी नहीं वरन् दुःखदायी ही होगा।

ईशावास्य उपनिषद में आता हैः तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः। यह सारा जगत ईश्वररूप है, इसे त्याग से भोगो, पकड़ो मत। जगत की बातों को, जगत की परिस्थिति को अपने भीतर गहरा मत उतारो। अपने में अगर उतारना ही है तो अपना-आपा है, उसके ही प्रेम को अपने में उतारो तो वही रूप हो जाओगे।

सच पूछो तो केवल परमात्मा ही अपना है। नानक जी ने कहा हैः

संगी साथी चल गये सारे कोई न निभियो साथ।

कह नानक इह बिपत में टेक एक रघुनाथ।।

इस शरीर को ʹमैंʹ मानकर और वस्तुओं को ʹमेरीʹ मानकर जो सुखी होना चाहता है उसके भाग्य में दुःख ही दुःख है। इस शरीर को ʹमैंʹ मानकर, वस्तुओं को और संबंधों को सँभाल-सँभालकर जो सुख ढूँढता है उसे V.I.P. Quota का मूर्ख माना जाता है। श्रीकृष्ण ने ऐसे लोगों को गिनकर 108 गालियाँ दी हैं। वह भी कृपा करके दीं हैं।

जैसे बेटा अंगारे के पास चला जाता है तो माँ उसे डाँटती है, मारती है। इसमें माँ काच द्वेष नहीं है वरन् यह भी माँ की कृपा ही है। ऐसे ही माताओं की माता और पिताओं के पिता जो भगवान श्रीकृष्ण हैं उन्होंने गीता में 108 गालियाँ दी हैं ताकि लोग मूर्खता छोड़ें।

विमूढ़ा नानुपश्यन्ति। नराधमाः। आसुरंभावमाश्रिताः।

इस प्रकार की 108 गालियाँ उन्हें दी हैं जो आसक्त होकर मिथ्या संसार में सच्चा सुख ढूँढना चाहते हैं ताकि वे सावधान हो जायें।

अपनी निष्ठा उस परमेश्वर में रखो और परमेश्वर को अपना मानकर तथा अपने को परमेश्वर का मानकर कार्य करो। भजन करो, जो भी निर्णय लो, परमेश्वर के होकर लोगे तो वह अंतर्यामी परमेश्वर जरूर तुम्हारे हृदय में शुभ प्रेरणा करेगा और तुम सफल हो सकोगे।

जिसने उस परमेश्वर को तत्त्व से जान लिया उसके लिए कर्त्तव्य शेष नहीं रह जाता। तस्य कार्यं न विद्यते। वह वही रूप हो जाता है और वास्तव में देखा जाय तो तुम भी वही हो। जैसे पानी में छोटे-बड़े बुलबुले होते हैं किन्तु तत्त्व से तो सारे बुलबुले पानी हैं, वैसे ही तत्त्व से हम सब भगवान के हैं और भगवान हमारे हैं। इस बात को अगर एक बार भी ठीक से समझ लिया तो फिर संसार-सागर से पार होना आसान हो जायेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 1997, पृष्ठ संख्या 4-9, अंक 58

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