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सत्संग से जागे विवेक


पूज्यपाद संत श्री आशाराम जी बापू

सत्संग से वंचित होना महान पापों का फल है। किसी भी कीमत पर सत्संग का त्याग नहीं करना चाहिए। वशिष्ठजी कहते हैं कि चांडाल के घर की भिक्षा एक ही बार मिले, वह भी ठीकरे में लेकर खाना पड़े पर जहाँ ज्ञान का सत्संग मिलता हो वहीं पड़े रहना चाहिए।

कोई बड़ा धनवान हो चाहे बड़ा सम्राट हो, अंत में तो वह धन को, साम्राज्य को यहीं छोड़कर चला जायेगा और ब्रह्मविद्या नहीं होगी तो किसी न किसी माँ के गर्भ में जाकर लटकने का, फिर जन्म लेने का और मरने का दुर्भाग्य चालू रहेगा। जिसको सत्संग में रूचि है, प्रीति है, श्रद्धा है, वह देर सबेर ज्ञान पाकर मुक्त हो जायेगा।

जैसे आपको कोई चीज अच्छी लगती है तो आप उसका त्याग नहीं करते हैं, फेंक नहीं देते हैं, संभालकर घर में रख लेते हैं। चाहे घर छोटा भी हो, कमरे में जगह नहीं हो तो छत पर भी रख देते हो। ऐसे ही जो लोग सत्संग में जाते हैं, उन्हें सत्संग की कोई न कोई बात तो अच्छी लगती ही है। जो बात अच्छी लगे उसे अगर दिलरूपी घर में जगह नहीं है तो दिमाग रूपी छत में भी रख लेंगे तो कभी-न-कभी काम आएगी।

सत्संग की आधी घड़ी, सुमिरन बरस पचास।

बरखा बरसे एक घड़ी अरहट फिरे बारह मास।।

जैसे अरहट बारहों मास फिरता रहे फिर भी उतना पानी नहीं दे पाता लेकिन एक घड़ी की वर्षा बहुत सारा पानी बरसा देती है। ऐसे ही सत्संग से भी अमाप लाभ मिलता है।

सत्संग ही साधना को पुष्ट करता है। साधक ऐसे ही जप करता रहेगा तो कभी भी ऊब जायेगा पर सत्संग सुनता रहेगा तो कभी जप की महिमा सुनेगा, कभी ध्यान की महिमा सुनेगा, कभी ज्ञान की बातें सुनेगा तो जप में, ध्यान में, ज्ञान में रूचि होगी। काम करते-करते सत्संग में सुनी हुई बातों को याद रखेगा तो भी बहुत लाभ होगा।

सत्संग ऐसी बढ़िया चीज है कि सत्संग सुनते रहने से आदमी के चित्त में विवेक जगता है। एक होता है सामान्य विवेक, दूसरा होता है मुख्य विवेक। सामान्य  विवेक याने शिष्टाचार। कैसे उठना, कैसे बैठना, कैसे बोलना, बड़ों के साथ कैसा व्यवहार करना, महापुरुष है तो उनसे दो कदम पीछे चलना, कुछ पूछे तो विनम्रता से उत्तर देना, उनके सामने अपने चित्त की दशा का वर्णन करना, यह सामान्य विवेक सत्संग में मिलता है। सत्संग सुनते-सुनते जब आदमी के चित्त की पहली भूमिका बन जाती है तो सामान्य विवेक या शिष्टाचार अपने-आप में पैदा होने लगता है।

दूसरा विवेक है मुख्य विवेक। वह है आत्मा-अनात्मा का विवेक। सत्संग में सुनी हुई बातें याद रखकर उसका मनन करने से मुख्य विवेक जगता है। एक होती ही है रहने वाली चीज, वह है आत्मा। दूसरी होती है छूटने वाली, नष्ट होने वाली चीज, वह है अनात्मा, मायारूपी जगत के पदार्थ। जो अनात्म पदार्थ हैं वे चाहे कितने भी कीमती हों, कितने भी सुंदर हों, कितने भी सुखद लगें किन्तु कभी तो उनका वियोग होगा ही। या तो वह चीज नहीं रहेगी या तो उसे ʹमेरीʹ कहने वाला  शरीर नहीं रहेगा। संसार की कोई भी चीज हो वह केवल देखऩे भर को है, कहने भर को हमारी है। आखिर तो छूटेगी ही। जब चीज छूट जाये तब रोना पड़े, उसके वियोग का दुःख सहना पड़े उसके पहले समझकर उसमें से ममता छोड़ दें। जो छूटने  वाली चीज है उसे छूटने वाली समझ लें और जो नहीं छूटने वाला है, सदा साथ देने वाला है उस आत्मा में प्रीति कर लें तो काम बन जायेगा।

हम लोग क्या करते हैं कि जो छूटने वाली चीजें हैं उनसे प्रीति करते हैं और जो सदा साथ रहने वाला है उनकी ओर ध्यान नहीं देते हैं। जो प्रीति अपने आत्मा में करता है और छूटने वाली चीजों का उपयोग करता है उसका जीवन सुखमय हो जाता है।

किसी रास्ते से गुजर कर आप कहीं जाना चाहते हो तो सड़क बढ़िया हो चाहे घटिया हो, चाहे चढ़ाव आये चाहे उतार आये, आप वहाँ से गुजर कर अपने गन्तव्य स्थान को पहुँच ही जाओगे। चढ़ाव देखकर आप रुक नहीं जाओगे और उतार देखकर बैठ नहीं जाओगे । ऐसे ही जीवन के चाहे किसी भी क्षेत्र में जाओ, चढ़ाव उतार आयेंगी ही, अनुकूलता-प्रतिकूलता आयेगी ही। संयोग-वियोग भी होता रहेगा। इन सबको गुजरने दो और अपने लक्ष्य की स्मृति बनाये रखो। जिस पत्नी का संयोग हुआ है एक दिन उसका वियोग भी होगा, पुत्र परिवार का भी वियोग होगा। धन-पद-प्रतिष्ठा, दुःख-सुख सब संयोगजन्य हैं। उनका वियोग अवश्य होगा। इसमें कोई सन्देह नहीं है क्योंकि ये सब नश्वर हैं। फिर भी उनके लिए आदमी तड़पता रहता है तो मनुष्य जन्म में जो आत्मज्ञान का अधिकार है वह गँवा देता है।

व्यवहार में आप कुशल रहो। व्यवहार चलाने के लिए रूपये पैसे की जरूरत पड़ती है। ठीक है, किन्तु अंदर समझ बनाये रखो कि इसमें कोई सार नहीं है। बहुत धन मिल गया तो भी क्या ? पद-प्रतिष्ठा मिल गई फिर क्या ? ये सब अनात्म पदार्थ हैं, उनका संयोग हुआ है तो वियोग भी होगा। इन छूटने वाले पदार्थों का साथ कब तक टिकेगा ?

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।

असत् कभी टिकता नहीं है और सत् का कभी नाश नहीं होता है। उस सत् के साथ मन से भी संबंध बनाये रखना है।

रेलवे में मुसाफिरी करते वक्त हमने देखा है कि यात्री जब मिलते हैं तो आपस में बातचीत करते हैं- ʹआप कहाँ से आये हो ? कहाँ जाना है ?ʹ फिर एक दूसरे का स्वभाव मेल खाता है तो दोस्ती जम जाती है। वे साथ में खाते हैं, कुछ खरीदते हैं तो एक एक दूसरे को देते हैं। एक-दूसरे का एड्रेस भी लेते हैं और उतरते समय तो बहुत लम्बी-चौड़ी बातचीत करते हैं- ʹअच्छा फिर मिलेंगे, खत लिखेंगे… आयेंगे… जायेंगे…ʹ वह सब स्टेशन से बाहर निकलकर घर पहुँचते ही हवा हो जाता है। रेलवे की दोस्ती वहीं तक सीमित रह जाती है।

तुम्हारे ये जो श्वासोच्छ्वास चल रहे हैं तो समझो यह आयुष्यरूपी गाड़ी चल रही है। रेलगाड़ी तो कहीं दो मिनट, कहीं पाँच मिनट, कहीं आधा घंटा भी रूकती है पर यह गाड़ी तो चौबीस घंटों चलती ही रहती है। रेलगाड़ी छुक-छुक करती चलती है, यह गाड़ी ʹसोઽहं सोઽहंʹ करती है। रेलगाड़ी में तो आप चाहो तो बीच के स्टेशन में उतरो चाहे अंतिम स्टेशन पर उतरो मरजी आपकी। इस गाड़ी को तो जहाँ रूके, छोड़ना ही पड़ेगा। ऐसी गाड़ी में साथ में जो स्नेही, सगे-संबंधीरूपी पैसेंजर मिल गये उनके साथ ठीक से संबंध निभा लो लेकिन अंदर से समझ लो कि गाड़ी छूटने तक का खेल है, चाहे उनकी गाड़ी पहले छूटे, चाहे अपनी गाड़ी पहले छूटे। गाड़ी से उतरे कि सब भूल जाना है। केवल अपने घर को याद रखना है।

आप बस में बैठकर कहीं जा रहे हो। रास्ते में बहुत बढ़िया बंगला दिखे, वह चाहे कितना भी सुंदर हो पर बस में से उतरकर उसमें रहने चले जाते हो क्या ? नहीं। अपना मकान भले किराये का हो, पुराना हो पर उसमें ही जाकर रहोगे क्योंकि वह अपना है जबकि सुंदर दिखऩे वाला वह बंगला तो पराया है, देखने भर को है। उसमें निवास नहीं हो सकता। ठीक ऐसे ही शरीररूपी घर कितना भी सुंदर लगे, सुखदायी लगे पर यह देखने भर को है, पराया है। इसमें सदा निवास नहीं हो सकता। अपना आत्मारूपी घर ही अपना है, शाश्वत है।

शरीर सदा टिकता नहीं है और आत्मा कभी मरता नहीं है। यह है मुख्य विवेक। ऐसा विवेक जिसका जागृत हो गया वह देर सवेर अमर आत्मा का ज्ञान पा लेगा।

अविनाशी आतम अमर जग ताते प्रतिकूल।

ऐसा ज्ञान  विवेक है, सब साधन का मूल।।

आत्मा अविनाशी है, शरीन नाशवान है। आत्मा सत्-चित्-आनंदस्वरूप है, शरीर असत्, जड़ और दुःखरूप है। आत्मा अजर-अमर है, शरीर परिवर्तनशील और मरणधर्मा है। ऐसा विवेक जिसका  पक्का हो गया उसने दुनिया में बहुत कुछ जान लिया। उसने बहुत पढ़ाई कर ली, उसने बहुत  परीक्षाएँ पास कर लीं। चाहे वह अनपढ़ हो, अंगूठाछाप हो पर सत्संग सुनते सुनते उसका विवेक जग जाता है। सुख-दुःख में वह इतना हिलता नहीं है। पढ़े हुए जिंदगी में जितने सुख-दुख के झोंके खाते हैं उतने झोंके खाने का दुर्भाग्य उसका नहीं होता है। संसार बमें ही रचा-पचा रहने वाला आदमी चाहे कितना भी पढ़ा लिखा हो  किन्तु उसके जीवन में सत्संग नहीं है विवेक नहीं है। आदमी को थोड़ा सा भी सुख मिलता है तो अभिमान आ जाता है और थोड़ा सा दुःख आता है तो परेशान हो जाता है। तो किसकी पढ़ाई सच्ची ? सत्संग में आदमी बिना परिश्रम के ऐसी पढ़ाई पढ़ लेता है कि अनपढ़ होते हुए भी वह पढ़े-लिखे को पढ़ा सकता है। तुलसीदास जी ने कहा हैः

बिनु सत्संग विवेक न होई।

राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।

भगवान की कृपा के बिना सत्संग सुलभ नहीं है। माया की कृपा हो तो आदमी को धन-धान्य मिलता है, प्रजापति की कृपा हो तो पुत्र परिवार मिलता है। जब प्रभु की कृपा होती है तब सत्संग मिलता है।

सत्संग में प्रीति होना बड़े भाग्य की बात है और सत्संग से वंचित होना, सत्संग का त्याग करना महान पापों का फल है। किसी आदमी में सामान्य विवेक भी नहीं है, वह यदि सत्संग सुनता रहेगा तो उसका सामान्य विवेक जगेगा और प्रीतिपूर्वक, आदरपूर्वक, श्रद्धा से सत्संग का मनन करेगा तो मुख्य विवेक में उसकी गति हो जायेगी। सामान्य विवेक जगने से आदमी के चित्त में धर्म की उत्पत्ति होती है। वह धर्मात्मा बन जाता है। मुख्य विवेक जगता है और वह दृढ़ हो जाता है तो आदमी महात्मा बन जाता है। महात्मा वह है जो अपने शरीर सहित संपूर्ण जगत के पदार्थों को नाशवान समझकर, अविनाशी आत्मा में प्रीतिपूर्वक स्थित हो जाता है। जो अपने-आपको जान लेता है, वही परम विवेकी है। उसने ही जगत में बड़ा काम कर लिया जिसने अपने-आपको जान लिया।

जहाँ में उसने बड़ी बात कर ली।

जिसने अपने आपसे मुलाकात कर ली।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 1997, पृष्ठ संख्या 5,6,7 अंक 53

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सत्संग सरिता


पूज्यपाद संत श्री आशारामजी बापू

जिसके जीवन में सत्त्वगुण नहीं है, दैवी लक्षण नहीं है वह सुख के पीछे भटक-भटककर जीवन खत्म कर देता है। सुख तो उसे जरा-सा मिला न मिला लेकिन दुःख, मुसीबत और चिंता उसके भाग्य में सदा ही बनी रहती है।

अगर मनुष्य अपने जीवन में सब दुःखों की निवृत्ति और परम सुख की प्राप्ति चाहता है तो उसे अपने जीवन में सत्त्वगुण की प्रधानता लानी चाहिए। निर्भयता, दान, इन्द्रिय दमन, संयम, सरलता आदि सदगुणों को पोषण दे और दुर्गुणों को निकाले। ज्यों ही सदगुणों में प्रीति बढ़ेगी त्यों दुर्गुण अपने-आप निकलते जाएँगे। अभी सदगुणों में प्रीति नहीं है इसलिए हम दुर्गुणों को पोसते हैं। थोड़ा जमा….. थोड़ा उधार….. ऐसा करते रहते हैं।

पामरों और कपटियों को सुखी देखकर हमें लगता है कि ʹइसने किया तो हम भी ऐसा करें।ʹ नहीं नहीं….. ऐसा मत सोचो। वह भैसा, बैल या वृक्ष बनकर जो सहेगा वह तो बाद में दिखेगा। इसलिए अभी तुम नकल मत करो लेकिन ʹकबीर जी होते तो क्या करते ? श्रीराम होते तो क्या करते ? गार्गी होती तो क्या करती ? मदालसा होती तो क्या करती ? शबरी भीलनी होती तो क्या करती ?ʹ ऐसा सोचकर अपने जीवन को दिव्य बनाने का यत्न करो। दिव्य जीवन बनाने के लिए दृढ़ संकल्प होना चाहिए। दृढ़ संकल्प करने के लिए सुबह जल्दी उठो। प्रातःकाल स्नान करके अभ्यास करो। जप-ध्यान करो। थोड़े ही दिन में आपका अंतःकरण पावन होगा और आपमें सत्त्वगुण बढ़ेगा।

एक गुण दूसरे गुण को ले आता है ऐसे ही एक अवगुण दूसरे अवगुण को ले आता है। एक पाप दूसरे पाप को ले आता है, ऐसे ही एक  पुण्य दूसरे पुण्य को ले आता है। आप जिसे सहयोग दोगे वह बढ़ेगा। आप सदगुणों को सहयोग दोगे तो इससे सदगुण बढ़ेंगे, ज्ञान शोभा देगा।

अपने जीवन में जितना सदगुण आता है, उतना ही जीवन का महत्त्व समझ में आता है। यदि ठीक दृष्टि मिल जाये, जीवन जीने का ढंग आ जाये तो संसार नंदनवन हो जाता है।

दो दोस्त थे। वे बगीचे में घूमने गये। उऩ्होंने एक गिरगिट देखा। एक ने कहाः “यह गिरगिट पीला है।”

दूसरे ने कहाः “बेवकूफ कहीं का ! यह तो लाल है। तेरे को पीलिया हो गया है इसलिए तू पीला देखता है।”

पहलाः “तेरे को क्रोध है, इसलिए तू लाल देखता है।”

गिरगिट तो चला गया लेकिन दोनों दोस्त आपस में भिड़ गये। फिर उन्होंने सोचा कि हम माली से जाकर पूछें कि गिरगिट लाल है या पीला।

उन्होंने माली से पूछाः “गिरगिट लाल होता है कि पीला ?”

माली ने कहाः “तुम दोनों सही हो।”

दोनों बोल उठेः “दोनों सही कैसे ?”

मालीः “गिरगिट लाल भी होता है और पीला भी होता है।”

“एक ही गिरगिट लाल और पीला कैसे ?”

“वह बार-बार रंग बदलता रहता है। कभी लाल दिखता है कभी पीला दिखता है कभी हरा दिखता है।” दोनों दोस्तों का समाधान हो गया और उनको शांति मिली।

ऐसे ही परमात्मा के विषय में आपस में मतभेद होते हैं। कोई बोलता हैः “परमात्मा ऐसा है।” कोई बोलता हैः “परमात्मा वैसा है।” लेकिन जब सदगुरुरूपी माली से मिलते हैं तब पता चलता है कि परमात्मा कैसा है। ʹऐसा है…. ऐसा नहीं है…..ʹ इस प्रकार मानते रहते हो लेकिन तुम्हारे भीतर की स्थिति जैसी होगी वैसा ही दिखाई पड़ेगा। गुरू ही सही ज्ञान देते हैं जिससे सारे संशय मिट जाते हैं और जीव को अपने स्वरूप का दर्शन होता है।

गुरु बिन भवनिधि तरहिं न कोई।

चाहे बिरंचि संकर सम होई।।

चाहे शिवजी जैसा प्रलय करने का सामर्थ्य आ जाये, ब्रह्माजी जैसा सृष्टि करने का सामर्थ्य आ जाये फिर भी जब तक सदगुरु की कृपा नहीं होती, उनका ज्ञान नहीं मिलता तब तक आवरण भंग नहीं होता।

दिल में छुपा हुआ वह दिलबर करोड़ों युगों से था, बाद में भी रहेगा और अभी भी है लेकिन दिखता नहीं है। आदमी अपने को आँखवाला मानता है लेकिन हकीकत में शरीर की आँख तुम्हारी आँख नहीं है। यह बाहर की आँख है। सदगुरुकृपा से अगर तुम्हारी वास्तविक आँख एक बार खुल जाये तो वह सुख मिलता है जो सुख ब्रह्माजी को मिलता है, जिसमें भगवान शिवजी रमण करते हैं, जिस तत्त्व में कबीर जी डटे रहते थे, गुरु नानकजी जिस नामनशे में डूबे रहते थे, छके रहते थे। उसको तुम पाओ भैया ! उसी में तुम लग जाओ।

माया से पार होने का उपायः प्रपत्तियोग

मैं और मोर तोर की माया।

बस कर दीन्हीं जीवन काया।।

ʹमैंʹ और ʹमेरेʹ की माया ने मनुष्य को वश कर लिया है। मनुष्य का मन माया के विभिन्न रूपों में भटकता रहता है। चाहते हुए भी मनुष्य इससे नहीं निकल पाता क्योंकि पुराने कई जन्मों के संस्कारों ने बुद्धि को, मन को, इऩ्द्रियों को बाँध कर माया में जकड़ रखा है। महापुरुष कहते हैं कि इस माया से निकलने के लिए परीश्रम नहीं, सच्ची समझ चाहिए, गुरुओं का सत्संग एवं सान्निध्य चाहिए। सच्ची समझ कहाँ से मिलती है ? सदगुरु के सत्संग एवं सान्निध्य से सच्ची समझ मिलती है। सच्ची समझ क्या है ? जो दिख रहा है वह माया है लेकिन जिससे देखा जा रहा है, जिसकी सत्ता विभिन्न रूपों में सर्वत्र विद्यमान है, वह परमात्मा है। भगवान की महान शक्तियाँ अलग-अलग जगह काम करती हैं। हम सब निमित्त मात्र हैं। हमारा कोई अलग अस्तित्त्व नहीं है। सब उस परमात्मा की अठखेलियाँ हैं। ʹमैंʹ और ʹमेराʹ यह अहं वास्तव में नहीं है। वह मिथ्या है। यह समझ में आ जाये तो मनुष्य का चौरासी का चक्कर ही मिट जाये।

यह समझ लाने के लिए क्या किया जाये ? महापुरुष कहते हैं कि बस, ईश्वर की शरण, भगवान और संत-सदगुरु की शरण चले जाओ। अपना अहं उनको अर्पित कर दो। दुःख, चिन्ता, हताशा, निराशा त्यागकर अपने आपको समर्पित कर दो। उन संतों की शरण में सच्चे मार्ग एवं सच्ची समझ का महाद्वार खुलने लगेगा। तुम प्रसन्नता और आऩंद का अनुभव करोगे। सिर्फ अपना बेईमानी का अहं मिटा दो। अपने संकीर्ण विचारों को विलीन होने दो।

एक बार एक साधु ने गुरु से दीक्षा ली। वह ईश्वर की शरण था। उसने सुना कि कामरूप देश में तांत्रिक विद्या का बड़ा बोलबाला है। वहाँ कि स्त्रियों ने तंत्रविद्या के बल से पुरुषों को तोता, बंदर बना रखा है। साधु ने सोचाः ʹस्त्रियाँ इतना बलशाली कैसे हो गयीं कि तंत्रविद्या से पुरुषों को जानवर की तरह नचाकर पिंजरे में बंद कर देती हैं ? मैं भी वहाँ जाता हूँ। मुझे किसी स्त्री ने देखा तो मैं गुरुमंत्र का जाप शुरु कर दूँगा।ʹ फिर सोचाः ʹजायें कि नहीं जायें ? एक तो स्त्रीचरित्र, दूसरा कामरूप देश और तीसरा तंत्रविद्या का बोलबाला।ʹ एक मन ने कहाः ʹजाओ।ʹ दूसरा मन बोलता हैः ʹनहीं जाओ।ʹ साधु ने दृढ़ता से मन को कहाः ʹचलो, कामरूप देश देख आएँ।ʹ

साधु गया कामरूप देश में। भिक्षा माँगते-माँगते एक पेड़ के नीचे बैठ गया। इतने में लुभावना श्रृंगार किये हुए एक महिला आई। उसके साथ एक युवक भी था। वे साधु के पास आकर बैठ गये। वह महिला साधु को निहारने लगी, मुस्कराने लगी। सोचने लगी किः ʹचलो, अब इसको भी तोता बनाया जाय।ʹ

साधु ने सोचाः ʹअब यह मुझे तोता बनाने की कोशिश कर रही है।ʹ उसने मन में गुरुमंत्र का जाप शुरु कर दिया। साथ ही ईश्वर से प्रार्थना कीः ʹहे मेरे प्रभु ! मैं तेरी शरण हूँ। मैं तेरा हूँ।ʹ तब अंदर से आवाज आयीः ʹतू घबरा मत। तू मेरा है तो चिंता क्यों ?ʹ उसका मन स्थिर हो गया।

स्त्री ने सोचाः ʹसाधु तो बड़ा ही अटल है ! उसने साधु को लुभाने के लिए दूसरा कटाक्ष फेंका और गाना गाने लगी। वह गीत गुनगुनाते हुए साधु को निहारती और मुस्कराती रही लेकिन साधु ने फिर से गुरुमंत्र का जप किया, प्रार्थना की। फिर साधु की अंतरात्मा ने कहाः ʹतू मेरी शरण है। चिंता मत कर।ʹ

फिर स्त्री ने गीत के साथ नृत्य करना शुरु किया। साधु ने कानों में उँगलियाँ डाल लीं और आँखें बंद कर लीं। मन-ही-मन ईश्वर से प्रार्थना कीः ʹहे प्रभु ! मैं तुम्हारी शरण हूँ।ʹ तब अंदर से आवाज आयीः ʹजब तू मेरी शरण है तो फिक्र छोड़ दे।ʹ साधु मन-ही-मन हँसाः ʹहे प्रभु ! मेरी छोटी बुद्धि तुझे बार-बार पुकारती है, जबकि तू मेरे नजदीक है, मेरे हृदय में ही है, फिर भी मैं चिंतित हूँ।ʹ

उस साधु को अपनी क्षुद्र बुद्धि पर हँसी आ रही थी। परन्तु उस स्त्री को लगा कि साधु उसके नृत्य और गान का मजाक उड़ा रहा है और हँस रहा है। स्त्री का मन दुर्बल हो गया। उसने अपने साथी युवक से कहाः “जाओ, साधु को अपनी बातचीत से वश में करो। उस साधु को मुझसे बातचीत करने को कहो।” वह युवक जो उसके तोते के समान था, स्त्री-लम्पट था, साधु के पास आया। उसके श्वासोच्छ्वास के संपर्क में आने से साधु का मन भयाक्रान्त हुआ। उसने फिर से ईश्वर का स्मरण किया। फिर अंदर से आवाज आयीः

ʹवत्स ! ईश्वर की शरण होकर भी भयभीत क्यों है ? जिसमें लाखों लाखों स्त्रियाँ पैदा होकर भी भयभीत क्यों है ? जिसमें लाखों स्त्रियाँ पैदा होकर लीन हो गई, ऐसा वह परमात्मा तेरे साथ है और तू घबरा रहा है ?ʹ फिर साधु ने स्थिरचित्त होकर उस युवक को दृढ़ मनोबल से देखा। तब उस युवक ने कहाः “मैं भी पहले ऐसा ही था लेकिन इस देश में आऩे पर तोता बना दिया गया।”

साधु ने कहाः “लेकिन तू तोता कहाँ है ? तू तो इन्सान है !”

युवक बोलाः “नहीं, मैं कभी बन्दर हूँ कभी तोता हूँ क्योंकि वह स्त्री जैसा बोलती है वैसा ही मैं करता हूँ।”

तब साधु को पता चला कि पुरुष को सचमुच में बंदर-तोता नहीं बनाया जाता, लुभावनी बातें करके अहंकार का कचरा ऐसा भर दिया जाता है कि पुरुष स्वयं ही सम्मोहित हो जाता है। सच में पंखवाला तोता या पूँछवाला बंदर नहीं बनाते किन्तु संस्कार-विचार ऐसे भर दिये जाते हैं कि पुरुष अपना पौरूष खोकर स्त्रियों की आज्ञा का पालन करने लगते हैं।

भगवान कहते हैं- “तुम इन्सान या मनुष्य नहीं, तुम हो तो ब्रह्मस्वरूप, परमात्मस्वरूप लेकिन माया के, मन के इन्द्रियों के संस्कारों ने तुम्हें अपना ब्रह्मस्वरूप भुलाकर माया के इशारों पर विलास में नाचने वाला बना दिया।ʹ

तुम्हारे ऊपर सिंधी, गुजराती, मराठी होने का अहंकार थोप दिया है और तुम ईश्वर की शरण न होकर माया की शरण होने के कारण अपने अहंकार का पोषण करके चौरासी के चक्कर खा रहे हो। इससे छूटने का उपाय बतलाते हुए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामी मा शुचः।।

ʹसम्पूर्ण धर्मों का आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा। तू शोक मत कर।ʹ (गीताः 18.66)

प्रत्येक मनुष्य को दुःख, चिंता, निराशा को त्यागकर, माया के बंधनों को तोड़कर उस चिदघन सच्चिदानंद, आनंदघन परमात्मा के ध्यान में गोता लगाना चाहिए। अपने-आपको गुरुकृपा के द्वारा मुक्ति के रास्ते ले जाना चाहिए। ʹमैंʹ और ʹमेराʹ मिटाकर उस चिदघन नारायण का ध्यान करना चाहिए। उसकी स्मृति से ही अपने-आपको सराबोर रखना चाहिए। ૐૐૐ

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 1997, पृष्ठ संख्या 23,24,25,13 अंक 53

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परम शांति


पूज्यपाद संत श्री आशारामजी

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं-

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।

तत्प्रसादात्परां शांतिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।

ʹहे भारत ! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में जा। उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शांति को तथा शाश्वत परमधाम को प्राप्त होगा।ʹ श्रीमद् भगवद् गीता 18.62)

शांति तीन प्रकार की होती है।

आधिभौतिक शांति।

आधिदैविक शांति।

आध्यात्मिक शांति।

उपरोक्त तीनों प्रकार की शांति हमारे व्यवहार में दिखती है।

किसी भी प्रकार का उपद्रव होवे और वह दूर हो जाये  कहेंगे किः ʹहाशઽઽઽ…..! शांति……!ʹ यह है आधिभौतिक शांति।

किसी देवी देवता का कोप हुआ हो, नौकरी नहीं मिलती हो, लड़के लड़की की शादी की चिंता सताती हो, आदि। जब ये विघ्न हट जाते हैं तो कहेंगे किः ʹहाशઽઽઽ…. ! शांति….!ʹ यह है आधिदैविक शांति।

ये शांतियाँ तो बेचारी दिन में कितनी ही बार आएँ और फिर चली जायें लेकिन एक बार परम शांति मिल जाय तो मौत भी तुमको अशांत नहीं कर सकेगी, इन्द्र का वैभव भी तुमको प्रलोभन में नहीं डाल सकेगा और शुकदेवजी जैसी कौपीनधारी अवस्था भी तुमको अपने में दीनभाव उत्पन्न नहीं करने देगी।

धन से जो गरीब है वह गरीब नहीं है, सत्ता से जो गरीब है वह गरीब नहीं है लेकिन विचारों से जो गरीब है, वह महादरिद्र है और विचारों से जो सेठ है वो सेठों का भी सेठ है।

राजा परीक्षित कोई साधारण राजा न थे। उनके पास सात द्वीपों का स्थायी राज्य था और अनेक राजाओं पर उन्होंने विजय प्राप्त की थी। इतना विशाल राज्य और सैन्यबल होते हुए भी परीक्षित कहते हैं कि कोई महापुरुष मिले और ईश्वर-तत्त्व का प्रसाद दे तभी मुझे परम शांति मिलेगी, बाकी सब तो मैंने देख लिया।

जब शुकदेवजी महाराज मिले तब परीक्षित पहला प्रश्न करते हैं- “जब मृत्यु निकट हो तब जीव को क्या करना चाहिए ?”

शुकदेवजी कहते हैं- “इन्द्रियों के भोगों में रत जीवों के लिए सात दिन तो क्या सात जन्म भी कम हैं लेकिन तुझ जैसे बुद्धिमान के लिए  सात दिन भी अधिक हैं। जो नश्वर पदार्थों को नश्वर जानते हुए शाश्वत में प्रीति रखें, ऐसों के लिए तो सात दिन भी अधिक हैं। हे परीक्षित ! तू  भगवान की शऱण जा।”

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।

गाँधी जी के जीवन में भी जब चमत्कार होते तब गाँधी जी वे अनुभव लोगों को सुनाते थे। गोलमेज कार्यक्रम में भाग लेने आईऩ्स्टीन जर्मनी से आये थे और गाँधी जी भारत से गये थे। उसमें गाँधीजी ने इतना सुन्दर व्याख्यान किया कि उनका उपहास करने वाले लोग भी उऩसे प्रभावित हो गये तथा उऩकी हँसी उड़ाने वाले अंग्रेजों ने भी तालियाँ बजाईं और उऩका अनुमोदन किया।

लोगों ने गाँधी जी से पूछाः “आप ऐसा प्रवचन कहाँ से पढ़कर आये ? यह सब तैयारी कैसे की ?”

गाँधी जी कहते हैं- “मैं जब बोलता हूँ तब मैं नहीं रहता, भगवान की शरण चला जाता हूँ। मेरे बोलने के पीछे मेरे राम का हाथ होता है इसलिए मेरी बोली प्रभावयुक्त होती है।”

हम भी शिष्टाचार में कह देते हैं कि मेरे काम के पीछे ईश्वर का हाथ है लेकिन यदि सफल हुए तो भीतर ʹमैंʹ बैठा ही होता है कि ʹयह तो मैंने कियाʹ और यदि विफल हुए तो कहेंगे कि ʹइसकी गलती…. उसकी गलती….ʹ या ʹजो भगवान की मर्जी….ʹ मानो भगवान ही काम बिगाड़ते को बैठे हैं।

वस्तुतः जीव के प्रत्येक कार्य के पीछे ईश्वर की सत्ता है। ईश्वर की सत्ता जब तक महसूस नहीं होती तब तक मनुष्य अहं में, जीवभाव में बैठा होता है। जब तक मनुष्य सत्संग नहीं करता तब तक उसे ईश्वर के रस की अनुभूति नहीं होती। जब तक ईश्वरीय रस की अनुभूति नहीं होती तब तक बाहर के रस का आकर्षण-विकर्षण एवं अशांति नहीं मिटती एवं दुःख निर्मूल नहीं होते। दुनिया की सब चीजें एक व्यक्ति को दे दो। खुशियों का उसे सरताज पहना दो, सारा सौन्दर्य, सारा धन एक व्यक्ति को दे दो लेकिन जब तक उसके जीवन में गीता रूपी ज्ञान नहीं होगा, उपनिषदों का अमृत नहीं होगा तब तक उसका दुर्भाग्य तो उसके साथ ही रहेगा। मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है बार-बार जन्मना और बार-बार मरना। बड़े में बड़ा सौभाग्य हैः

लभ्ध्वा ज्ञानं परां शांतिमचिरेणाधिगच्छति।

उस आत्मज्ञान की उपलब्धि होवे तो परम शांति। शुकदेव जी उस परम शांति को प्राप्त हुए महापुरुष थे। परीक्षित के सभामंडप में पहुँचने से पहले कुछ अज्ञानी लोगों ने उनका अपमान किया, पत्थर उछाले लेकिन उनके चित्त में अशांति नहीं हुई और सोने के सिंहासन पर बिठाकर परीक्षित उनका अर्घ्य-पाद्य से पूजन करते हैं तब भी शुकदेव जी को हर्ष नहीं होता।

जैसे सूर्य के निकट रात्रि नहीं जा सकती, सूर्य को दीमक नहीं लग सकती,  ऐसे ही जिसको परम शांति हो गई हो, आत्मा-परमात्मा का जिसको अनुभव हो चुका हो, ज्ञान का दीपक जिसमें एक बार प्रकाशित हो चुका हो उसे कोई आँधी नहीं बुझा सकती। उसी की प्राप्ति के लिए मनुष्य को बुद्धि मिली है। सच में सुखी भी वही रह सकता है जिसने परम शांति का अनुभव कर लिया है।

लभ्ध्वा ज्ञानं परां शांतिम्…..

अधिकांश लोग कहते हैं- “बाबा जी ! समय नहीं मिलता…. समय का अभाव है।ʹʹ अरे भाई ! आपके पास जो काम है, उससे भी अधिक काम पुराने समय के राजाओं के पास रहता था और आप लोगों के पास जितनी सुविधाएँ हैं, पुराने व्यक्तियों के पास उतनी न थीं। अभी हम बस में, रेल में, हवाई जहाज में सफर कर कार्य शीघ्रता से पूरा कर सकते हैं। पुराने समय में तो बैलगाड़ी जोतनी पड़ती थी। कहीं दूर जाना हो तो हफ्ताभर पहले से तैयारियाँ करनी पड़ती थीं।

गाड़ा जोतते-जोतते पटेल शहर जाय।

गाम का लाय और घर का भूल आय।।

ऐसा करते हुए भी लोग समय बचाते थे। गलाडूब व्यवहार में रहते हुए भी राजा-महाराजा लोग समय बचाकर गुरुओं के द्वार पर जाते थे और आत्मज्ञान पाते थे। आत्मतेज से वे तेजस्वी रहते थे और परम शांति पाते थे।

साधुओं का नाम लेवें तो शुकदेव जी महाराज का नंबर पहले आता है। ऐसे शुकदेव जी महाराज के गुरु राजा जनक योगशक्ति से सम्पन्न अठारह वर्षीय युवती सुलभा का पूजन करते हैं।

सुलभा जब राजा जनक के दरबार में पहुँची  उसके निर्दोष, संयमी व प्रभावशाली व्यक्तित्व एवं ज्ञाननिष्ठा को देखकर राजा जनक की दृष्टि स्थिर हो गई। उन्होंने पूछाः “तुम क्या चाहती हो ?”

सुलभा ने कहाः “राजन् ! में आपसे शास्त्रार्थ करना चाहती हूँ। आपको राजकाज के गलाडूब व्यवहार में परमशांति कैसे हुई ? अगर मेरा परिचय पूछो तो ʹसुलभाʹ मेरा नाम है। क्षत्रिय कुल में मेरा जन्म हुआ है।”

संतशिरोमणी शुकदेव जी के गुरु आनंदित होकर योगिनी सुलभा का पूजन करते हैं। यह आत्मविद्या कैसी है ! जनक जैसे राजा बारह वर्षीय अष्टावक्र का पूजन करते हैं। यह आत्मविद्या की ही महिमा है।

बारह वर्षीय अष्टावक्र के शरीर में आठ चक्र हैं। ठिगना कद, काला रंग व टेढ़े मेढ़े अंग….. एकदम कुरुप…. और चलें  तो ऐसा लगे कोई विचित्र प्राणी आया। फिर भी उऩमें आत्मविद्या चमकती है और उऩकी पूजा होती है।

हम सब भी अपने ʹमैंʹ रूपी अहंकार का विसर्जन करते हुए उस परमेश्वर की, परमेश्वर के अनुभव का रसपान कराने वाले आत्मविद्या के समर्थ आचार्य किसी सदगुरु की शऱण लेकर उस परम शांति व परमानंद को प्राप्त करने का यत्न करें जिसकी प्राप्ति के बाद और कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रहता तथा जिससे बढ़कर अन्य कोई लाभ नहीं होता, हम उसी की प्राप्ति का दृढ़ संकल्प करें…..

ૐ आनंद… ૐ शांति….. ૐ…..ૐ…..ૐ…..

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 1997, पृष्ठ संख्या 2,3,4 अंक 53

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