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वास्तविक सुख किस में ?


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

मच्चित्ता गद् गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।

कथयन्तश्च मां नित्यं तुषयन्ति च रमन्ति च।।

ʹनिरन्तर मुझमें मन लगाने वाले और मुझमें ही प्राणों को अर्पण करने वाले भक्तजन, सदा ही मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा, आपस में मेरे प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए संतुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं।ʹ (भगवद् गीताः 10.9)

भोगी को विषय-भोगों में वह सुख नहीं मिलता जो भक्त को भगवद् प्रभाव के चिंतन एवं परस्पर कथन में मिलता है।

वस्तु-व्यक्तियों से क्रिया करके जो सुख मिलता है उसे क्रियाजन्य सुख कहते हैं। सूँघने, चखने, स्पर्श करने आदि क्रियाजन्य सुख में ही मनुष्य अटका रहा तो मनुष्य रूपेण मृगाश्चरन्ति। वह मनुष्य के रूप में पशु माना गया है। क्रियाजन्य सुख तो कुत्ते-कुत्ती भी भोगते हैं, जिसमें क्रिया, परिश्रम तो ज्यादा होते हैं और सुख घड़ीभर का मिलता है। ऐसे ही खाने पीने, सूँघने-सुनने आदि से मिलने वाला सुख क्रियाजन्य सुख है।

दूसरा सुख है भावजन्य सुख। क्रियाजन्य सुख की अपेक्षा भावजन्य सुख में मेहनत कम है और सुख ज्यादा है। भगवान या गुरु की मूर्ति को निहारने से या मन में भावना करने से हृदय में सुख मिलता है। भावजन्य सुख में परिश्रम कम है और सुख क्रियाजन्य सुख से ज्यादा है।

भावजन्य सुख हृदय को शुद्ध करता है स्वतंत्रता की ओर ले जाता है। क्रियाजन्य सुख में बल-बुद्धि तेज-तन्दुरुस्ती का नाश होता है और भावजन्य सुख हृदय को भगवदभाव से भरता है।

भावजन्य सुख से भी बढ़कर है ध्यानजन्य सुख। भाव ज्यादा देर नहीं टिकता लेकिन ध्यान उससे ज्यादा देर टिकता है। हालाँकि ध्यान भी निरन्तर नहीं होता है और समाधि भी सतत नहीं होती है। अतः उससे भी आगे है विचारजन्य सुख।

विचारजन्य सुख अर्थात् भगवदविचार करना, भगवदज्ञान की, आत्मज्ञान की बातें करना। जब दो दीवानें मिल जाते हैं तो वहाँ ईश्वर विषयक चर्चा की मेहफिल शुरु हो जाती है जिससे मन भगवदाकार, ब्रह्माकार होने लगता है। ऐसा करते-करते मनुष्य तात्त्विक सुख का अधिकारी होने लगता है। आत्म-साक्षात्कारी महापुरुष तात्त्विक सुख को पाते हैं।

सदा समाधि संत की आठों प्रहर आनंद।

अकलमता कोई ऊपजा गिने इन्द्र को रंक।।

ऐसा माधुर्य, संतोष और ऐसा रस उन महापुरुष को मिलने लगता है जहाँ इन्द्र का सुख भी तुच्छ हो जाता है।

मनुष्य जन्म का लक्ष्य उसी रस को, उसी तात्त्विक सुख को पाना है। क्रियाजन्य सुख तो पशु भी ले रहे हैं, मूर्ख भी ले रहे हैं। भावजन्य सुख भक्त लेते हैं और विचारजन्य सुख भक्त और ज्ञानी लेते हैं। तत्त्व का सुख पाने के लिए परस्पर परमात्मतत्त्व का कथन-चिंतन-मनन करना चाहिए।

बुद्धिमान मनुष्य तो वह है जो भगवदचिंतन, भगवदस्वरूप का श्रवण करे कि ʹभगवान क्या हैं ? जीवात्मा क्या है ? परमात्मा क्या है ? सुख-दुःख आते हैं, चले जाते हैं लेकिन उनको भी जो देखने वाला है उस साक्षीस्वरूप में मैं कैसे टिकूँ ? इससे भी आगे चलकर साक्षी और साक्ष्य के पार परमात्मपद में पूर्णता कैसे पाऊँ ?ʹ ऐसा विचार करने वाला व्यक्ति उस परम सुख को पाता है, तात्त्विक सुख को पाता है।

छः व्यक्तियों से हमें कभी हानि नहीं होती, लाभ ही लाभ होता हैः

सात्त्विक एवं बुद्धिमान मित्र, विद्वान पुत्र, पतिव्रता स्त्री, दयालु मालिक, सोच-समझकर बोलने वाला, सोच-समझकर काम करने वाला। इनसे कभी हानि नहीं होती है।

श्रीकृष्ण अथवा श्रीकृष्णतत्त्व को पाये हुए महापुरुषों को हम ʹसाधुʹ कहते हैं। गुरुवाणी में आता हैः

साधु ते होवहि न कारज हानि।

ब्रह्मज्ञानी ते कछु बुरा न भया।।

जिन्होंने तात्त्विक सुख पा लिया है, परम सुख पा लिया है, आत्मा का सुख पा लिया है उनसे कभी हमारा बुरा नहीं होता है। ऐसे तत्त्ववेत्ता होने के लिए जो दीवाने चल पड़ते हैं, उनकी ही बात भगवान यहाँ कर रहे हैः मच्चिता मद् गतप्राणाः।

परमेश्वर की ही बातों के परस्पर कथन से ज्ञान पुष्ट होता है, तात्त्विक सुख दृढ़ होता है। जिज्ञासु द्वारा ईश्वर विषयक ज्ञान सुनने से जिज्ञासा की पूर्ति तो होती है, आत्मज्ञान सुनकर कुछ संतोष तो होता है किन्तु उससे सब दुःख नहीं मिटते। सत्संग से कुछ दुःखों की निवृति अवश्य होती है किन्तु बाकी के दुःख मिटाने के लिए उस सत्संग से जो ज्ञान मिला, उस ज्ञान का परस्पर कथन करके उस ज्ञान में टिकने का प्रयास करना चाहिए।

जब तक गुरु का ज्ञान नहीं मिला था, गुरूदीक्षा नहीं मिली थी तब तक संसार की छोटी-छोटी बातें भी बड़ा प्रभाव डालती थीं लेकिन गुरुदीक्षा मिलने के बाद, सत्संग सुनने के बाद उनका पहले जैसा प्रभाव तो नहीं पड़ता किन्तु दुःख बना रहता है, विक्षेप बना रहता है। निगुरे को ज्यादा तो सगुरे को कम। ….और यह विक्षेप तब तक बना रहता है जब तक आत्मनिष्ठा दृढ़ नहीं हुई। इसलिए निष्ठा को दृढ़ करने के लिए भी आत्मा की बातें, सत्संग की बातें करनी चाहिए और उसी में संतुष्ट होना चाहिए। इधर उधर की बातें करके अपने चित्त से सत्संग की बातों का प्रभाव घटने नहीं देना चाहिए अपितु सत्संग की बातों से इधर-उधर की बातों के प्रभाव को हटा देना चाहिए।

अगर चारों तरफ से मुसीबतें आ जायें, चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा दिखने लगे, तब भी यह चिंतन करना चाहिए किः ʹदुःख आये हैं तो जाएँगे, सदा नहीं रहेंगे। जब सृष्टि पहले नहीं थी, बाद में भी नहीं रहेगी और अभी भी ʹनहींʹ की ओर ही जा रही है तो दुःख भी पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा और अभी भी ʹनहींʹ की ओर ही जा रही है तो दुःख भी पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा और अभी भी नहीं की ओर ही जा रहा है। परमात्मा  तो पहले भी था, अब भी है और बाद में भी रहेगा। वही परमात्मा मेरा आत्मा है, वही श्रीराम है, वही यशोदानन्दन श्रीकृष्ण है और वही गुरु है।ʹ ऐसा चिंतन करके दुःख के बीच भी आप दो मिनट के लिए पूरे सुख में आ सकते हैं।

बाहर से तो दुःख, दुःख ही दिखता है लेकिन दुःख दिखता है दुःखाकार वृत्ति से। उस दुःखाकार वृत्ति को यदि दो मिनट के लिए भी भगवदाकार वृत्ति बना दें तो आप दो मिनट के लिए निर्दुःख हो सकते हैं तो दस मिनट भी हो सकते हैं। हृदय में जब दुःखाकार वृत्ति होती है तब दुःख होता है। अनुकूलवेदनीयं सुखं प्रतिकूलवेदनीयं दुःखं। जो अनुकूल लगता है उसे हम सुख मानते हैं और प्रतिकूल लगता है उसे दुःख मानते हैं। जैसे बेटे की शादी में माँ को गालियाँ मिलती हैं तो उसे दुःख नहीं होता है। दुश्मन का आशीर्वाद भी खटकता है और सज्जन की गाली भी अच्छी लगती है। गाली तो गाली होती है लेकिन वहाँ दुःखाकार वृत्ति उत्पन्न नहीं होती वरन् ʹमित्र की गाली हैʹ ऐसा सोचकर सुखाकार वृत्ति बनने के कारण सुख होता है।

धन चले जाने से सबको दुःख होता है लेकिन वही धन जब सत्कर्म में लगाते हैं तो अंदर से औदार्य की वृत्ति उत्पन्न होती है। अतः धन देते समय भी सुख होता है। नहीं तो धन देना अच्छा लगता है क्या ? कुछ भी न मिले और धन देना पड़े तो…..? फिर भी सत्कर्म में धन देने पर सुख होता है क्योंकि वहाँ धन का महत्त्व नहीं है वरन् आपकी वृत्ति सुखाकार होती है इसीलिए आप मठ-मंदिर, आश्रम आदि में धन अर्पण करते हो। वही पचास रूपये हैं – यदि सत्कर्म में लगाते हो तो सुख होता है और दण्ड के रूप में भरना पड़े तो दुःख होता है।

मदालसा जब अपने बेटों को दूध पिलाती, तब ब्रह्मज्ञान की बातें करती थी। मच्चित्ता मद् गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्। मानो, गीता का यह वचन चरिथार्थ कर रही हो। इस प्रकार शैशव से ही भगवदभाव के विचारों से ओतप्रोत बातें करके उसने अपने बच्चों को ब्रह्मज्ञानी बना दिया।

बाल्यकाल में ही एक के बाद एक बालक ब्रह्मज्ञानी होकर विरक्त होने लगा। तब मदालसा के पति ने कहाः “यदि सभी बच्चों को तुम इस प्रकार विरक्त बना दोगी तो मेरी गादी कौन संभालेगा ? राजगादी संभालने के लिए कुछ तो आसक्ति चाहिए, कुछ तो अज्ञान चाहिए… तभी वह संभाली जा सकेगी। विरक्त क्या संभालेगा ? अतः एक बालक को तो अज्ञानी रखो।

अलर्क नामक छोटे बेटे को ब्रह्मज्ञान देने से राजा ने मदालसा को इन्कार कर दिया। मदालसा ने सोचा किः ʹचलो, भले यह अलर्क राज्य संभाले लेकिन मेरा बेटा राज्य करके अंत में मरे और फिर दुबारा जन्म ले तो मेरा जन्म देना व्यर्थ है।ʹ अतः उसे ब्रह्मज्ञान के थोड़े संस्कार तो दिये ही, जाते-जाते एक ताबीज भी दे गयी और बोलीः

“बेटा ! यह ताबीज कभी खोलना मत। जब चारों तरफ से अंधेरा नजर आने लगे, चारों ओर से मुसीबतों के पहाड़ टूटने लगें, तभी इस ताबीज को खोलना।”

समय पाकर मदालसा और उसके पति का देहान्त हो गया और अलर्क राज-काज संभालने लगा। ऐसा कोई राजा नहीं, जिसके जीवन में कभी कोई दुःख न आया हो। ज्यों ही राज्य को ʹमेराʹ माना, आसक्ति हुई त्यों ही दुःख आना शुरु हो जाता है। यह ईश्वर की नियति है।

जहाँ तुमने वस्तुओं में, व्यक्ति में, परिस्थिति में आसक्ति की कि ʹहाश ! अब मजे से जियेंगेʹ तभी कोई-न-कोई दुःख आना शुरु हो जायेगा क्योंकि परमात्मा तुम्हें सदैव इस मिथ्या मजे में ही नहीं रखना चाहते हैं। इसीलिए दुःखहारी श्रीहरि दुःख देकर भी तुम्हें परिपक्व करना चाहते हैं। यदि आप ʹवेलसेटʹ हो गये हो तो समझ लो कि ʹअपसेटʹ होने का सामान भी तैयार हो रहा है और यह कहानी केवल एक-दो की ही हो ऐसी बात नहीं है, सबकी यही कहानी है।

अलर्क भी राज-काज संभालते-संभालते उसमें ही गरकाव होने लगा तब उसके भाइयो को हुआ कि ʹहमारा भाई अज्ञानी क्यों रह जाए ? अब वह राज्य में आसक्त होता जा रहा है अतः उसकी आसक्ति छुड़ाने का उपाय भी करना होगा।ʹ

वे जीवन्मुक्त भाई गये अलर्क के पास और बोलेः “हमें हमारे राज्य का हिस्सा दे दो।”

अलर्कः “राज्य मुझे मिला है, आप लोगों को कैसे दे दूँ ?”

भाईः “हम तुम्हारे भाई लगते हैं, अपना हक क्यों छोड़ें ?”

जितना संसार से सुख मिलता है उतनी ही उससे आसक्ति भी होती है। अलर्क ने राज्य देने से इन्कार कर दिया। तब उसके भाइयों ने काशीनरेश से विचारविमर्श किया कि ʹहमें अपने भाई को जगाना है, उसे मुसीबत में डालकर सदा के लिए जन्म-मरणरूपी मुसीबत से छुटकारा दिलवाना है। अतः आप हमारी सहायता करें।ʹ काशीनरेश ने अपना सैन्य भेज दिया।

अलर्क का राज्य तो छोटा-सा था और काशीनरेश की विशाल सेना। अलर्क को हुआ कि ʹइतनी बड़ी सेना लेकर आये हुए अपने संत भाइयों से मैं कैसे लड़ूँगा ? वह बड़ा दुःखी और चिंतित हो उठा और ऐसी मुसीबत के समय में उसने माँ का दिया हुआ ताबीज खोला जिसमें एक छोटी चिट्ठी थी। उस चिट्ठी में लिखा थाः

दुःख पड़े तो संतशरण जाइये।

उस समय नगर के बाहर जोगी गोरखनाथ ठहरे हुए थे। अलर्क पहुँचा जोगी गोरखना के श्रीचरणों में और बोलाः “महाराज ! मैं बड़ा दुःखी हूँ।”

गोरखनाथः “तू मदालसा का बेटा होकर दुःखी है ? मैं अभी तेरा दुःख निकाल देता हूँ। बता, कहाँ है दुःख ?”

अलर्कः “महाराज ! हृदय में बड़ा दुःख है।”

जोगी गोरखनाथ ने तपाया चिमटा और बोलेः “बता, कहाँ है दुःख ? अभी उसे यह चिमटा लगाता हूँ।”

अलर्कः “महाराज ! आप चिमटा मेरे दुःख को कैसे लगाओगे ?”

गोरखनाथः “दुःख है कहाँ ?

अलर्कः “भीतर है।”

गोरखनाथः “चल, अभी लगाता हूँ।”

अलर्कः “महाराज ! यह क्या ? चिमटे से दुःख दूर कैसे होगा ?”

गोरखनाथः “तू केवल बता कि दुःख भीतर कहाँ पर है और कैसे है ? दुःख है कि दुःख का भाव है ?”

अलर्कः “महाराज ! भाई लोग काशीनरेश की सेना लेकर राज्य पर चढ़ाई करने आये हैं, इसलिए मन में दुःख का भाव है।”

गोरखनाथः “यह दुःख नहीं है, वरन् ʹयह राज्य जाये नहींʹ इस आसक्ति के कारण दुःखाकार वृत्ति है। इस दुःखाकार वृत्ति को तू बदलना चाहे तो बदल सकता है। यह केवल एक वृत्ति है और वृत्ति जहाँ से उत्पन्न होती है वह उत्पन्न करने वाला पूर्ण स्वतन्त्र है। उसे जान ले तो सब दुःखों से सदा के लिए मुक्त हो जायेगा।”

“महाराज ! उसे कैसे जानूँ ?”

“अलर्क ! संसार तू लाया नहीं था, राज्य तू लाया नहीं था, ले भी नहीं जायेगा और अभी भी नहीं के तरफ ही जा रहा है। उसमें आसक्ति मत कर।”

इस प्रकार परस्पर आत्मबोध की बात सुनते-सुनते अलर्क को अनुभव होने लगा।

मच्चित्ता मद् गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।

कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च।।

अलर्क को उस तात्त्विक सुख का अनुभव हुआ जो उसे राज्य-भोग में कभी नहीं मिला था। राज्य सुख तो क्रियाजन्य सुख था, कभी-कभार पूजा में भावजन्य सुख मिला था किन्तु यह सुख तात्त्विक सुख था। तात्त्विक सुख ही सब सुखों का मूल है।

कृतकृत्य होकर अलर्क ने गुरु गोरखनाथ के चरणों में प्रणाम करके विदा माँगी और राज्य में जाकर अपने भाइयों को संदेश भिजवायाः “आज तक मैंने यह राज्यरूपी बैलगाड़ी खूब खींची। आप लोग मेरे बड़े भाई हैं अतः इस झंझट को अब आप ही संभाल लें। अब मैं राज्य से निवृत्त हो जाना चाहता हूँ।”

तब भाइयों ने कहाः “पागल ! इस झंझट को झंझट समझकर निवृत्ति का सुख तुझे मिल जाये इसीलिए हमने यह आयोजन किया था। बस, अब तू ही इसे संभाल। हमें इसकी जरूरत नहीं है। राज्य के प्रति तेरी आसक्ति एवं तेरी नासमझी को मिटाने के लिए ही हमने यह सारा स्वांग रचा था।”

ऐसे ही परमात्मा तुम्हारे साथ स्वाँग रचता है। परमात्मा परम सुहृद है। वह जो भी करता है हमारे मंगल के लिए ही करता है। हम हार न जाएँ, घबरा न जाएँ, थक न जायें और तुच्छ सुख-दुःख में बह न जाएँ – केवल इतनी ही सावधानी रखें और यह सावधानी तब आयेगी जब भगवान के प्यारों के बीच जायेंगे, उनसे भगवदसंबंधी वार्तालाप सुनेंगे, भगवदविचार का मनन-चिंतन करेंगे एवं बार-बार भगवदाकार वृत्ति उत्पन्न करेंगे…. ऐसा करने से उन परम सुहृद परमात्मा में रमण करने की योग्यता अपने आप विकसित हो उठेगी। इसलिए भगवान ने कहा हैः मच्चित्ता मद् गतप्राणा….

ʹनिरन्तर मुझमें मन लगाने वाले और मुझमें ही प्राणों को अर्पण करने वाले भक्तजन, सदा ही मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा, आपस में मेरे प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए संतुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं।ʹ

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 1997, पृष्ठ संख्या 2,3,4,5,6 अंक 51

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कर खिजमत फकीरों की….


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

दो राजकुमार थे। बड़ा भाई राज्य के मोह में पड़ गया लेकिन छोटा भाई सच्ची आजादी पाने के लिए  सच्चे सदगुरु की खोज में निकल गया और उसने खोजते-खोजते ऐसे सत्यस्वरूप का साक्षात्कार किये हुए सच्चे सदगुरु को पा भी लिया। नानक और कबीर जैसे महापुरुष को पाकर, उनके बताये मार्ग अनुसार साधना करके उसने अपने शुद्ध बुद्ध स्वरूप का ज्ञान पा लिया। फिर वह घूमते घामते अपने भाई के नगर में पहुँचा और नगर के बाहर नदी के किनारे अपनी झोंपड़ी बाँधकर रहने लगा। उसका जगमगाता आनंद, हारे-थके को सांत्वना देने का स्वभाव, भगवद् प्रेम में पावन करने वाली उसकी शैली, दिल में मनुष्यमात्र के उद्धार का पवित्र भाव, परिस्थितियों में सम रहने की उसकी समर्थ मति, उस बहादुर को, संत बने भाई को अब छुपा कैसे रहने देती ?

सच्चा बहादुर वह नहीं जो किसी को पछाड़ देता है। सच्चा बहादुर तो वही है जिसने भीतर के विकारों पर विजय पाकर अपने निर्विकारी नारायणस्वरूप का साक्षात्कार किया है। उस ब्रह्म-परमात्मा को अपना स्वरूप जानने वाला सचमुच में बहादुर है, महावीर है। जैसे नानकजी महावीर हैं, महान् वीर हैं। बड़े-बड़े वीर भी जिनके चरणों में शीश झुकाकर अपना भाग्य बना लें, ब्रह्मज्ञानी ऐसे महान वीर होते हैं। वह महावीर भी प्रजा का प्रेमपात्र बन गया।

आत्मा में रमण करने वाले संत किसी मत, पंथ, मजहब का पोषण या विरोध नहीं करते वरन् वे  मानव के अंदर छुपे हुए रब को, आनंद को और माधुर्य को जगाने की कला जानते हैं।

मुझे वेद, पुराण, कुरान से क्या ?

मुझे प्रेम का पाठ पढ़ा दे कोई।।

मुझे मंदिर मस्जिद जाना नहीं।

मुझे दिल के मंदिर में पहुँचा दे कोई।।

जहाँ ऊँच और नीच का भेद नहीं।

जहाँ जात और पाँत की बात नहीं।।

न हो मंदिर, मस्जिद, चर्च जहाँ।

न हो पूजा नमाज में फर्क जहाँ।।

बस प्रेम ही प्रेम की सृष्टि मिले।

अब नाव को ले चलो खेके वहाँ।।

ऐसे कुछ पवित्र जिज्ञासु उस फकीर के पास पहुँच जाते थे, जो भूतपूर्व युवराज था।

धीरे-धीरे राज-दरबार तक उस फकीर की प्रशंसा पहुँची। जासूसों ने जाँच करके राजा को खबर दीः “ये महाराज कोई और नहीं किंतु आपके ही सगे भाई हैं।” राजा के अहंकार को ठेस लगीः “मेरा भाई ! और झोंपड़े में रहे ? भिक्षा माँगकर खाये ?”

एक दिन राजा सुबह-सुबह छिपे वेश में आकर अपने भाई को समझाने लगाः “मैं इतनी आजाद जिंदगी जी रहा हूँ और एक तू है कि रोटी का टुकड़ा माँगने लगता है ? मैं महलों में रहता हूँ और तू झोंपड़े में गुजारा कर रहा है ? तू क्यों बर्बादी की आग में जल रहा है ? चल मेरे साथ। मैं तुझे मंत्रीपद दे दूँगा। मेरी आज्ञा में रहेगा  मैं तुझे खुश रखूँगा। देख ! मैं कितना आजाद हूँ। सब लोग मेरी बात मानते हैं।”

बुद्धिमान छोटे भाई ने कहाः “भैया ! अहंकार को पोसना आजादी नहीं है। कुर्सी को पाकर, गद्दी को पाकर अपने को बड़ा माना तो तुमने अपने असली बड़प्पन को दबा दिया। यह बड़प्पन तुम्हारा नहीं, कुर्सी का हुआ। यदि धन को पाकर अपने को बड़ा माना तो तुमने अपने बड़प्पन को दबाकर धन को बड़प्पन दिया। सत्ता, धन, रूप-लावण्य अथवा शरीर का बड़प्पन मानना यह तो असली बड़प्पन का घात करना है। तुमने इन चीजों को बड़ा कर दिया और अपने को दबा दिया, फिर अपने को आजाद मानते हो ?”

लेकिन राजगद्दी के नशे में चूर भाई ने कहाः “छोड़ ये बातें। आखिर तू मेरा छोटा भाई है।”

ऐसे ही मेरा भाई भी मुझे कहता था किः “सुधर जा। मैं तुझे हिस्सा देता हूँ। तू आराम से, मौज से रह। दो भाई तो हैं – एक ही पिता के दो बेटे हैं और तू एक कमरे में रात तो बारह-बारह बजे तक बैठा रहता है ! दुकान पर पैर नहीं रखता ! अब तो सुधर जा।” गुरु प्रसाद पाकर सात साल  तपस्या के बाद जब हम अहमदाबाद पहुँचे, तब भी भाई ने पहला वचन यही कहाः “सात साल तू चला गया, फिर भी जो कमाई हुई है उसका आधा हिस्सा मैं तेरे को देता हूँ। अभी भी तू सुधर जा। मेरे साथ चल दुकान पर।”

मैंने कहाः “हम तो बिगड़ गये।”

सुनो मेरे भाइयो ! सुनो मेरे मितवा !

कबीरो बिगड़ गयो रे…

दही संग दूध बिगड़यो, मक्खन रूप भयो रे….

पारस संग भाई ! लोहा बिगड़यो, कंचर रूप भयो रे…..

संतन संग दास कबीरो बिगड़यो

संत कबीर भयो रे, कबीरो बिगड़ गयो रे….

दुनियादार जिस भक्त को बिगड़ा समझते हैं, वास्तव में वह ऐहिक सृष्टि में तो बिगड़ा दिखता है परंतु यदि उसका दिव्य सृष्टि में प्रवेश हुआ है और वह दिव्य सृष्टि में भी न रुके तो उस ब्रह्म-परमात्मा में शांति पा लेता है। बुद्धिमत्ता यही है कि सच्ची आजादी पाये हुए ऐसे महापुरुषों की चरणरज सिर पर लगाकर अपना भाग्य बना लें। यही आजादी का सच्चा स्वरूप है। लेकिन वह राजा अपने राजसी नशे में था।

बड़े भाई ने छोटे भाई से कहाः “मैं इतना आजाद हूँ…. मेरी बात सब लोग मानते हैं और तू झोंपड़ी में जिंदगी बसर कर रहा है ! तू मेरी बात क्यों नहीं मानता है ?”

“सब तुम्हारी बात मानते हैं ?”

“हाँ, मानते हैं। मैं चाहे जो मँगा सकता हूँ। मेरी हुकूमत सब पर चलती है।”

उस वक्त छोटा भाई गुदड़ी सी रहा था। उसने सिलाई करते-करते सुई-धागा उठाकर नदीं में फेंक दिया और बोलाः “सब लोग तुम्हारी बात मानते हैं तो जरा सुई धागा नदी से निकलवा दो।”

राजाः “यह तो नहीं हो सकता।”

“जब तुम्हारे हुक्म से एक छोटी सी सुई भी नदीं में से नहीं निकल सकती तो तुम किस बात के सम्राट हो ? किस बात के राजा हो ?”

बड़े भाई ने कहाः “तो क्या तुम्हारी बात सब मानते हैं ?”

तब छोटे भाई ने योगशक्ति का उपयोग किया। थोड़ी ही देर में एक मछली मुँह में सुई-धागा लटकाते हुए वहाँ तैरने लगी। छोटे भाई ने धागा पकड़कर सुई दिखाई और बोलाः “देख, अब तू आजाद है कि मैं आजाद हूँ ? तू ही सोच। फिर भी तू अपने को आजाद समझता है और मुझे बर्बाद समझता है तो…..

तेरी आजादियाँ सदके सदके।

मेरी बर्बादियाँ सदके सदके।।

मैं बर्बादे तमन्ना हूँ।

मुझे बर्बाद रहने दो।।

मेरी वासनाएँ बर्बाद हो गयीं, मेरा अहंकार बर्बाद हो गया, मेरी चिंता बर्बाद हो गयी, मेरा बँधन बर्बाद हो गया। सचमुच में मेरी जो बर्बादी है उसे मैं प्यार करता हूँ और तेरी जो आजादी है, उसे मैं दुआ करता हूँ। तू वहाँ भला है और मुझे यहीं रहने दो, अपनी मौज में।”

जिसने तीन मिनट के लिए भी, एक बार अपने आत्मा-परमात्मा का सुख पा लिया, उसके आगे इन्द्रदेव तक हाथ जोड़कर अपना भाग्य बनाने को उत्सुक होते हैं तो एक सामान्य मछली की तो बात ही क्या है ? अगर पाना हो उस आत्मा-परमात्मा के सुख को तो पहुँच जाओ किसी ब्रह्मवेत्ता के द्वार पर… और उनके दैवी कार्य व सेवा-सत्संग से बना लो अपना भाग्य। किसी ने ठीक ही कहा हैः

अगर है शौक मिलने का,

 तो कर खिजमत फकीरों की।

यह जौहर नहीं मिलता,

अमीरों के खजाने में।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 1997, पृष्ठ संख्या 21,22,23 अंक 51

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पूर्ण जीवन के तीन सूत्र


प्रशान्ति-निर्भयता-ब्रह्मचर्यव्रत

पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

नानक जी ने कहा हैः

पूरा प्रभु आराधिया पूरा जा का नाँव।

नानक पूरा पाइया, पूरे के गुन गाँव।।

जब तक पूरे प्रभु का ज्ञान नहीं मिलता, पूरे प्रभु की आराधना नहीं होती, ʹपूरे प्रभु के साथ अपना नित्य संबंध हैʹ ऐसा अनुभव नहीं होता तब तक अपूर्ण प्रकृति में, अपूर्ण परिस्थिति में, अपूर्ण वस्तुओं में, अपूर्ण देश में, अपूर्ण काल में जीव बेचारा अपूर्ण-सा ही रह जाता है।

कितनी ऊँची बात कह दी है नानक जी ने !

पूरा प्रभु आराधिया……

कोई मुहल्ले का नेता होता है तो कोई गाँव का होता है, कोई तहसील का नेता होता है तो कोई जिले का नेता होता है, कोई प्रांत का नेता होता है तो कोई देश भर का नेता होता है लेकिन जो अनंत ब्रह्माण्डों का आधार है उसको आराधें तो अनंत ब्रह्माण्डनायक का सुख मिल जायेगा, कल्याण हो जायेगा। यह सत्य है कि आप यदि पूरे के गुण गायेंगे तो पूरे का ज्ञान पायेंगे। पूरे का चिन्तन करेंगे तो हमारा मन भी पूर्ण सुखी, आनंदित होगा और पूर्ण उपलब्धि करेगा।

आप ध्यान रखें कि जब प्रकृति पूर्ण नहीं है तो प्रकृति की चीजें पूर्ण सुख कैसे दे सकती हैं ? प्रकृति में जो प्राप्त किया है वह पूर्ण कैसे हो सकता है ? प्रधानमंत्री का पद मिल जाये चाहे राष्ट्रपति हो जायें फिर भी भय तो बना ही रहता है। अरे ! चाहे इन्द्र का पद मिल जाये फिर भी खटका तो बना ही रहेगा क्योंकि ये सब छूटने वाले हैं, अपूर्ण हैं।

पूरे की आराधना करनी हो तो क्या करना चाहिए ? किस तरीके से आम आदमी उस पूरे प्रभु की आराधना करे ? इसके लिए भगवान कहते हैं-

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।

मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः।।

ʹजिसका अन्तःकरण शांत है, जो भयरहित है और जो ब्रह्मचर्यव्रत में स्थित है, ऐसा सावधान योगी मन का संयम करके, मुझमें चित्त लगाता हुआ, मेरे परायण होकर स्थित होवे।ʹ (गीताः 6.14)

भगवान जब ʹमेरे परायण होʹ या ʹमुझे पा लेʹ – ऐसा बोलते हैं तब यह नहीं समझना चाहिए कि अर्जन के रथ पर बैठे हुए श्रीकृष्ण को पा लें। उन श्रीकृष्ण को तो शकुनि और दुर्योधन ने कई बार देखा था  लेकिन इससे क्या ? ʹमुझको पा लेʹ का तात्पर्य यह समझना चाहिए कि जहाँ से तुम्हारा ʹमैंʹ उठता है उसमें विश्रान्ति पाने का, उसको अपना स्वरूप जानने का इशारा भगवान कर रहे हैं। वही पूर्ण है।

जैसे घटाकाश महाकाश से अभिन्न है, बिन्दु सिन्धु से अभिन्न है, लहर सागर से अभिन्न है ऐसे ही जीवात्मा परब्रह्म परमात्मा से अभिन्न है। उस परब्रह्म परमात्मा की जो आराधना करता है, ज्ञान पाकर चिंतन मनन करता है, वह उसीमय हो जाता है। उसी पूर्ण में पूर्णाकार हो जाता है।

यहाँ पर तीन बातें आयी हैं- प्रशान्तात्मा। विगत भीः। ब्रह्मचारिव्रते स्थितः। अर्थात् प्रशान्ति, निर्भयता और ब्रह्मचर्यव्रत। इस प्रकार बुद्धि, मन और शरीर को ध्यान के योग्य, पूरे प्रभु को पाने के योग्य बनाने की व्यवस्था का वर्णन किया है भगवान ने।

अशान्ति क्यों होती है ? राग-द्वेष से। राग-द्वेष मिटने पर शांति स्वतः प्रगट होने लगती है। अरे ! प्रकट क्या होगी ? आपका मूल स्वरूप शांति ही तो है। राग-द्वेष होता क्यों है ? जगत की वस्तुओं से सुख लेने की बेवकूफी से। राग-द्वेष से अन्तःकरण मलिन होता है और मलिन अन्तःकरण में अशान्ति होती है। राग-द्वेष जितना कम होता जायेगा, उतना अंतःकरण शुद्ध होता जायेगा और जितनी राग-द्वेष कम, जितना अंतःकरण शुद्ध, उतना वह प्रशान्तचित्त होता जायेगा और जितनी शांति उतना सामर्थ्य, उतनी योग्यताएँ निखरती जायेंगी।

दूसरी बात है ब्रह्मचर्यव्रत में स्थिति। ब्रह्मचारी का अर्थ यह नहीं कि जो लंगोटी लगाकर बैठा है या जिसने शादी नहीं की है। ऐसे अविवाहित तो कई होते हैं किन्तु सच्चा ब्रह्मचारी तो कोई विरला ही होता है। ब्रह्मचारी का व्रत क्या है ? पाँच विषयों से आकर्षित न होकर, अपने गुरुकुल में विद्याध्ययन करने के लिए तीन गुण और भी ले आता है, मान, बड़ाई और शरीर के आराम से अपने को बचाना।

ब्रह्मचारी देखता तो है लेकिन फिल्म आदि देखकर विषयों का मजा नहीं लेता बल्कि अपनी पुस्तकों को पढ़ता है, अपने सेवाकार्य को देखता है। सुनता है तो ज्ञान पाने के विषयों को ही सुनता है, फालतू का नहीं सुनता। खाता है तो शरीर को क्रियाशील रखने के लिए, ऐश करने के लिए गुरुकुल में नहीं खाता। सूँघता है तो भगवान का प्रसाद-फूल सूँघता है, परफ्यूम आदि के चक्कर में नहीं पड़ता।

शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध – ये पाँच विषय हैं। इनमें ब्रह्मचारी फँसता नहीं है अपितु पाँचों इन्द्रियों को संयत करके अपने को विद्याध्ययन के योग्य बनाता है। गुरुकुल में वह मान की इच्छा भी नहीं रखता, बड़ाई की इच्छा भी नहीं रखता और आराम-पसंदगी भी नहीं रखता तभी वह ब्रह्मचारी कहलाता है। जो पूरे प्रभु को पाना चाहता है उसे भी ब्रह्मचर्य के व्रत में स्थित होना चाहिए।

ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित होने वाले व्यक्ति को पूरे प्रभु को पाने में सुगमता होती है और पूरे प्रभु को पाने के बाद अपूर्ण वस्तु का कोई आकर्षण या कोई भय नहीं रहता है।

कभी न छूटे पिण्ड दुःखों से।

जिसे ब्रह्म का ज्ञान नहीं।।

जब तक पूरे की आराधना नहीं की तब तक चाहे कैसा भी शरीर बन जाये लेकिन कोई-न-कोई दुःख, मुसीबत और मौत तो पीछे लगी ही रहेगी। साधक को चाहिए कि प्रभु की आराधना करते वक्त, ध्यान, भजन करते मन इधर-उधर चला जाये, भूतकाल की घटना या भविष्य की कल्पना में चला जाये तो उस समय ऊँचे स्वर से भगवान का नामोच्चारण शुरु कर दे अथवा गहरे श्वासोच्छवास ले और मन से कहेः “ऐ मेरे मन ! भूतकाल तो बीत गया, अब वह वापस आने वाला नहीं है। उसका क्या चिंतन करता है ? भविष्य भी अपने सामने नहीं है तो भविष्य की कल्पना क्या करना ? अभी तो वर्त्तमान में अपना काम कर। जैसे –विद्यार्थी वर्त्तमान की (जिसकी परीक्षा देनी है उसकी) पुस्तकें पढ़ता है ऐसे ही अभी तो हमें परमात्मा को पाने के लिए ध्यान करना है, परमात्मशांति में शांत होना है। परमात्मा के माधुर्य में मधुर होना है। क्यों तू इधर-उधर जाता है ? रे मन !”

थोड़ी देर मन शांत हो न हो, फिर इधर-उधर भटकेगा। पुनः उसे नाम जप में लगाने का प्रयास करें। जैसे विद्यार्थी का मन इधर-उधर जाता है फिर भी वह उसे प्रयत्नपूर्वक पाठ्य-पुस्तकों में लगाता है वैसे ही भगवद्-ध्यान, भगवद्-भजन के समय मन इधर-उधर जाये तो उसे भी प्रयत्नपूर्वक परमात्मा में लगाना चाहिए। बार-बार अनात्मा से हटाकर मन को आत्मा में लगाना चाहिए। यदि मन भूत-भविष्य में जाता हो तो ध्यान-योग का अभ्यास करने वाले साधकों को सावधान रहना चाहिए।

मन पर निगरानी रखने के साथ ही साथ व्यवहार पर नियंत्रण होना भी अति आवश्यक है। कई लोग ध्यान-भजन तो करते हैं किन्तु जो आया सो खा लिया, जो आया सो बोल दिया, जैसा जी में आया वैसा कर लिया…. नहीं, अपने ध्यान-भजन क समय का ख्याल करके व्यवहार करके व्यवहार करना चाहिए और व्यवहार काल में भी चित्त अशुद्ध न हो इसका ध्यान रखना चाहिए। जो इस प्रकार व्यवहार काल में भी अपने चित्त की शुद्धि का ख्याल रखता है उसका चित्त भगवान में जल्दी लगता है। शरीर एवं वस्तुओं को ʹमैं-मेराʹ मानने से भय होता है कि ʹवस्तुएँ चली न जाये….ʹ लेकिन ये शरीररूपी बुलबुले तो हजारों-लाखों बार मिले और मिट गये। इनका भय न रखें। ʹजो हो गया देख लिया, जो हो रहा है देख रहे हैं और जो होगा देखा जायेगा…. ऐ मेरे मन ! अभी तो तू भगवान के चिंतन में लग।ʹ इस प्रकार भगवान के चिंतन में लगने से अंतःकरण चैतन्य के आनंद से, चैतन्य के माधुर्य से, चैतन्य के ज्ञान से और चैतन्य की शांति से सराबोर हो उठेगा।

दो प्रकार की माताएँ होती हैं- एक निषेधायुक्ति से समझाती हैं और दूसरी विधियुक्ति से समझाती है। बालक खिलौने का आम चूसता है तो एक माँ उस खिलौने का आम छुड़ाने के लिए डाँटती है। डाँट से डरकर बालक आम तो छोड़ देता है लेकिन मन से आम का आकर्षण नहीं छूटता। जैसे ही माँ चली जाती है, बालक धीरे-से खिलौने का आम चूसने लग जाता है। दूसरी माँ असली आम को धोकर उसका थोड़ा सा रस उसे चटा देती है, आम चूसने के लिए दे देती है। जब बालक को असली आम का स्वाद आ जाता है तो वह खिलौने का आम अपने-आप छोड़ देता है।

ʹयह नहीं करो… वह नहीं करो…. ऐसा करोगे तो पाप होगा… नरकों में जाओगे…ʹ ऐसा करके समझाने… की रीति है निषेध युक्ति। कोई महापुरुष मिल जायें और ध्यान-भजन कराते-कराते, भगवदरस का स्वाद चखा दें तो हमारा मनरूपी बच्चा भगवान के स्वाद में लग जाता है। यह है विधि युक्ति। जब असली आम का स्वाद आ जाये तो खिलौने के आम को कोई कब तक चाटेगा ? ऐसे ही जब ध्यान-भजन करके असली भक्ति का सुख मिल गया तो फिर विकारी सुखों में मन जायेगा नहीं…. और कभी –कभार पुरानी आदत से गया भी तो सावधान हो जायेगा।

सुन्दर सदगुरु है सही, सुंदर शिक्षा दीन्ह।

सुंदर वचन सुनाय के, सुंदर सुंदर कीन्ह।।

सदगुरु का जो अनुभव है वह सुन्दर है। सत्य स्वरूप ईश्वर का अनुभव करने वाले जो महापुरुष हैं, उनके वचन सुन्दर हैं।

अतः अपने परम सौंदर्य परमात्मस्वरूप को पाने के लिए शांत बनो। ब्रह्मचर्य का आश्रय लेकर परम निर्भय बनो परमात्म-प्राप्ति की बाजी तुम्हारे हाथ में है।

दृढ़ता से चलो। लड़खड़ाते दीन-हीन होकर मजदूर की नाईं संसार का बोझा नहीं उठाओ वरन् अपने आत्मवैभव को पाओ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2012, पृष्ठ संख्या 11,12,13 अंक 48

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