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मोक्षप्राप्ति कैसे होगी ?


दर्पण भले ही साफ-शुद्ध हो लेकिन यदि वह हिलता रहेगा तो उसमें अपना मुँह कैसे देख सकेंगे ? हमारा दर्पण है शुद्ध हृदय (अंतःकरण) परंतु यदि स्थिर मन न होगा तो अपने स्वरूप अर्थात् आत्मा को कैसे देख (अनुभव कर) सकेंगे ? अतः काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि  विकारों तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस आदि विषयों के समूह से जब अपने को बचायेंगे, तब मोक्ष को प्राप्त करेंगे।

हृदयरूपी लकड़ी और भगवन्नामरूपी लकड़ी को आपस में रगड़ने से ज्ञानरूपी अग्नि निकलती है। भाग्यवान मनुष्य वह है जो ईश्वर में प्रेम रखता है।

साँईं श्री लीला शाह जी की अमृतवाणी।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2018, पृष्ठ संख्या 12 अंक 303

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बंधन बनाओ या मोक्ष, तुम स्वतंत्र हो


-स्वामी अखंडानंद जी सरस्वती

यह संसार क्या है ? स्वर्ग कि नरक ? सुख कि दुःख ? अरे, यह न नरक है न स्वर्ग। यह तो साक्षात् ब्रह्म है। तुम अपनी दृष्टि से इसे नरक बना के रो सकते हो और अपनी दृष्टि से इसे स्वर्ग बनाकर हँस सकते हो। दोनों से उदासीन होकर तुम आनंद में, मौज में रह सकते हो। यह मन ही सुख-दुःख का कारण हैः

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।

बन्धाय विषयासक्तं मुक्तयै निर्विषयं स्मृतम्।। (शाट्यायनीयोपनिषद् 1)

बंधन का कारण मन है, मोक्ष का कारण भी मन है। जिसका मन विषयों में आसक्त है उसके लिए यह मन बंधन का हेतु है और तुम विषयों से आसक्ति नहीं करो तो मुक्त हो। मुक्ति कोई अपने दिल में रखने की चीज़ नहीं है। यह मुक्ति अपने स्वरूप में नहीं है, न बंधन अपने स्वरूप में है। बंधन और मोक्ष मन में ही हैं।

क्या तुम बंधन को निमंत्रण देते हो कि ‘हे बंधन ! तुम आओ, हमारे दिल में रहो ‘? मोक्ष को न्योता देते हो कि ‘हे मोक्ष ! तुम आओ, हमारे घर में रहो’ ?

तुम अपने घर में गाय पालो कि कुत्ता पालो, इसमें स्वतंत्र हो। ऐसी ही कुत्ते की जगह पर बंधन को समझो और गाय की जगह पर मोक्ष को समझो। ये दोनों पाले हुए हैं। इसमें भी स्वतंत्र हो और दोनों को न पालें तो ? उसमें भी तुम स्वंतंत्र हो।

तुम्हारा स्वरूप न गाय है न कुत्ता है। दोनों के बिना तुम रह सकते हो। यह मनुष्य अविवेक के कारण ही सुखी-दुःखी हो रहा है। अरे ! 20 वर्ष की जिंदगी हो तो भी वह जिंदगी होती है। उसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। 20 वर्ष में भी अनुभव होते हैं। आप यह नहीं समझना कि नहीं होते हैं।

सांसारिक प्रेम ऐसा ही होता है

मैं 9  वर्ष का था तब रिश्तेदार के मित्र के घर ब्याह में गया था। वहाँ एक सज्जन मिले। दो तीन घंटे में ऐसा प्रेम किया, ऐसा उन्होंने खिलाया-पिलाया, ऐसा फुसलाया कि हम तो समझने लगे कि ‘इनसे बढ़कर हमारा कोई प्रेमी नहीं है।’ घर के लोग तो डाँटते थे कि ‘यह तुमने क्या किया, यह नहीं किया, स्कूल में नहीं गया….’ तो हमको लगने लगा कि ‘घर के लोगों को हमसे प्रेम नहीं है। प्रेम है तो हमसे इन्हीं का है।’

मैं 16 वर्ष का हो गया। इन 7 वर्षों में मिलने का मौका नहीं मिला। मन में यह था कि ‘ये हमारे बहुत प्रेमी हैं।’ फिर गया उनके पास, उन्होंने तो मुझे पहचाना ही नहीं।

ये प्रेमी लोग तो ऐसे बदलते हैं  जैसे छाया दिनभर में आगे-पीछे होती है न ! सवेरे पश्चिम की ओर हैं तो शाम को पूर्व की ओर हो जाती है, दुनिया के प्रेमी लोग भी ऐसे ही बदलते हैं। किसी के मन में स्थिरता कहाँ है ?

मैं जब लगभग 17 वर्ष का था तो घर से भागकर एक महात्मा के पास चला गया। एक महीना उनके पास रहा। जब मैं माला लेकर भजन करने बैठता तो ध्यान में मेरी माता जी आँखों से टपाटप आँसू गिराती हुई सामने आ जातीं। बोलतीं- “बेटा ! हम तुम्हारे लिए बड़े दुःखी हैं। जल्दी घर आ जाओ।”

पत्नी भी सामने आती। हमको लगता, ‘अरे ! बड़ा प्रेम होगा, लोग हमारे लिए रोते हैं।’

मैं महात्मा जी से आज्ञा लेकर चलने लगा तो उन्होंने कहाः “देखो, वहाँ तुम्हारे लिए कोई दुःखी नहीं है। यह विघ्न ही है जो तुम्हें भजन से अलग कर रहा है।”

लेकिन मैं लौट गया घर। गया तो घर के लोग खूब खुश थे। मालूम हुआ कि माता जी भी नहीं रोती थीं, पत्नी भी नहीं रोती थी। घर में किसी को किसी से प्रेम नहीं है। अपने मन में ही यह कल्पना होती है कि ‘ये हमारे बड़े प्रेमी हैं।’

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2018, पृष्ठ संख्या 22,23 अंक 303

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अपने से नाराज हुए बिना दूसरे से नाराजगी सम्भव नहीं


एक परिवार में तीन बहुएँ थीं। बड़ी बहू की कोई कितनी ही सेवा करे पर वह  हमेशा मुँह फुलाये रहती थी। मँझली बहू किसी आत्मवेत्ता गुरु की शिष्या थी और सत्संग प्रेमी, विवेकी, सेवा भक्तिवाली, उदार एवं शांतिप्रिय थी। छोटी बहू साधारण श्रेणी की थी। राज़ी करके उससे चाहे जितना काम करा लो परंतु बकवास, निंदा-चुगली करने वालों के काम में हाथ नहीं लगाती थी, अतः अपनी बड़ी जेठानी की सेवा तो वह कर ही कैसे सकती थी ! लेकिन छोटी जेठानी की खूब सेवा करती थी। और मँझली बहू का तो कहना ही क्या ! वह सबसे  प्रेमभरा, आत्मीयतापूर्ण व्यवहार करते हुए सबकी सेवा करती थी।

आखिर एक दिन छोटी बहू ने मँझली से पूछ ही लियाः “दीदी ! बड़ी दीदी आप पर सदा नाराज रहती हैं। कभी अपशब्द भी बोल देती हैं, फिर भी आप उनकी सेवा करती हैं। उनके प्रति मैंने कभी आपसे कोई शिकायत नहीं सुनी, बात क्या है ?”

मँझली बहू ने कहाः “बहन ! बड़ी दीदी की गाली मुझ तक पहुँचती ही नहीं। वाणी की पहुँच कानों तक ही तो है। मुझ तक तो मेरी बुद्धि की भी पहुँच नहीं है, जो इस सृष्टि का सबसे बड़ा औजार है। और वे सदा नाराज रहती हैं तो अपने से रहती हैं। क्या कोई अपने से नाराज हुए बिना दूसरे से नाराज हो सकता है? स्वयं बुरा बनकर ही कोई दूसरों का बुरा कर सकता है। उनकी नाराजगी मुझ तक पहुँचती ही नहीं है क्योंकि जहाँ नित्य, अविनाशी आनंद-ही-आनंद है, वहाँ उत्पत्ति-विनाशशील नाराजगी कैसे पहुँच सकती है, क्या कर सकती है ? मेरे गुरुदेव ने बताया है कि ‘दूसरों के अधिकार की रक्षा  और अपने अधिकार का त्याग करने वाला कभी दुःखी नहीं हो सकता।’ इस प्रकार नाराजगी को हर पहलू से समझने पर नाराजगी का महत्त्व ही नहीं रहता। संसार अपना, चिद्घन चैतन्यस्वरूप आत्मा अपना…. जहाँ राज़ी-नाराजगी हो-होकर मिट जाती है उस अपने आत्मदेव में जगना ही सार है, बाकी सब बेकार है।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2018, पृष्ठ संख्या 21 अंक 303

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