Yearly Archives: 2000

शिवजी का अनोखा वेशः देता है दिव्य संदेश


महाशिवरात्रि दिनांक 4 मार्च 2000

संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

यस्यांकि य विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके।

भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्।

सोयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदा।

शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्रीशंकरः पातु माम्।।

ʹजिनकी गोद में हिमाचलसुता पार्वतीजी, मस्तक पर गंगाजी, ललाट पर द्वितीया का चंद्रमा, कंठ में हलाहल विष और वक्षःस्थल पर सर्पराज शेषजी सुशोभित हैं, वे भस्म से विभूषित, देवताओं में श्रेष्ठ सर्वेश्वर, संहारकर्ता (या भक्तों के पापनाशक), सर्वव्यापक, कल्याणस्वरूप, चन्द्रमा के समान शुभ्रवर्ण श्रीशंकरजी सदा मेरी रक्षा करें।ʹ

ʹशिवʹ अर्थात् कल्याण-स्वरूप। भगवान शिव तो हैं ही प्राणिमात्र के परम हितैषी, परम कल्याणकारक लेकिन उनका बाह्य रूप भी मानवमात्र को एक मार्गदर्शन प्रदान करने वाला है।

शिवजी का निवास-स्थान है कैलास शिखर। ज्ञान हमेशा धवल शिखर पर रहता है अर्थात् ऊँचे केन्द्रों में रहता है जबकि अज्ञान नीचे के केन्द्रों में रहता है। काम, क्रोध, भय आदि के समय मन-प्राण नीचे के केन्द्र में, मूलाधार केन्द्र में रहते हैं। मन और प्राण अगर ऊपर के केन्द्रों में हो तो वहाँ काम टिक नहीं सकता।

शिवजी को काम ने बाण मारा लेकिन शिवजी की निगाहमात्र से ही काम जलकर भस्म हो गया। आपके चित्त में भी यदि कभी काम आ जाये तो आप भी ऊँचे केन्द्रों में आ जाओ ताकि वहाँ काम की दाल न गल सके।

कैलास शिखर धवल है, हिमशिखर धवल है और वहाँ शिवजी निवास करते हैं। ऐसे ही जहाँ सत्त्वगुण की प्रधानता होती है, वहीं आत्मशिव रहता है।

शिवजी की जटाओं से गंगा जी निकलती है अर्थात् ज्ञानी के मस्तिष्क में से ज्ञानगंगा बहती है। उनमें तमाम प्रकार की ऐसी योग्यताएँ होती हैं कि जिनसे जटिल-से-जटिल समस्याओं का समाधान भी अत्यंत सरलता से हँसते-हँसते हो जाता है।

शिवजी के मस्तक पर द्वितीया का चाँद सुशोभित होता है अर्थात् जो ज्ञानी हैं वे दूसरों का नन्हा सा प्रकाश, छोटा सा गुण भी शिरोधार्य करते हैं। शिवजी ज्ञान के निधि हैं, भण्डार हैं, इसीलिए तो किसी के भी ज्ञान का अनादर नहीं करते हैं वरन् आदर ही करते हैं।

शिवजी ने गले में मुण्डों की माला धारण की है। कुछ विद्वानों का मत है कि ये मुण्ड किसी साधारण व्यक्ति के मुण्ड नहीं, वरन् ज्ञानवानों के मुण्ड हैं।

जिनके मस्तिष्क में जीवनभर ज्ञान के विचार ही रहे हैं, ऐसे ज्ञानवानों की स्मृति ताजी करने के लिए उन्होंने मुण्डमाला धारण की है। कुछ अन्य विद्वानों के मतानुसार शिवजी ने गले में मुण्डों की माला धारण करके हमें बताया है कि गरीब हो चाहे धनवान्, पठित हो चाहे अपठित, माई हो या भाई लेकिन अंत समय में सब खोपड़ी छोड़कर जाते हैं। आप अपनी खोपड़ी में चाहे कुछ भी भरो, आखिर वह यहीं रह जाती है।

भगवान शंकर देह पर भभूत रमाये हुए हैं क्योंकि वे शिव हैं, कल्याणस्वरूप हैं। लोगों को याद दिलाते हैं कि चाहे तुमने कितना ही पद-प्रतिष्ठावाला, गर्व भरा जीवन बिताया हो, अंत में तुम्हारी देह का क्या होने वाला है, वह मेरी देह पर लगायी हुई भभूत बताती है। अतः इस चिताभस्म को याद करके आप भी मोह-ममता और गर्व को छोड़कर अंतर्मुख हो जाया करो।

शिवजी के अन्य आभूषण हैं बड़े विकराल सर्प। अकेला सर्प होता है तो मारा जाता है लेकिन यदि वह सर्प शिवजी के गले में, उनके हाथ पर होता है तो पूजा जाता है। ऐसे ही आप संसार का व्यवहार केवल अकेले करोगे तो मारे जाओगे लेकिन शिवतत्त्व में डुबकी मारकर संसार का व्यवहार करोगे तो आपका व्यवहार भी आदर्श व्यवहार बन जायेगा।

शिवजी के हाथों में त्रिशूल एवं डमरू सुशोभित हैं। इसका तात्पर्य यह है कि वे सत्त्व, रज एवं तम – इन तीन गुणों के आधीन नहीं होते, वरन् उन्हें अपने आधीन रखते हैं और जब प्रसन्न होते हैं तब डमरू लेकर नाचते हैं।

कई लोग कहते हैं कि शिवजी को भाँग का व्यसन है। वास्तव में तो उऩ्हें भुवन भंग करने का यानी सृष्टि का संहार करने का व्यसन है, भाँग पीने का नहीं। किन्तु भंगेड़ियों ने ʹभुवन भंगʹ में से अकेले ʹभंगʹ शब्द का अर्थ ʹभाँगʹ लगा लिया और भाँग पीने की छूट ले ली।

उत्तम माली वही है जो आवश्यकता के अनुसार बगीचे के काँट-छाँट करता रहता है, तभी बगीचा सजा-धजा रहता है। अगर वह बगीचे में काट-छाँट न करे तो बगीचा जंगल में बदल जाये। ऐसे ही भगवान शिव इस संसार के उत्तम माली हैं, जिन्हें भुवनों को भंग करने का व्यसन है।

शिवजी के यहाँ बैल-सिंह, मोर-साँप-चूहा आदि परस्पर विपरीत स्वभाव के प्राणी भी मजे एक साथ निर्विघ्न रह लेते हैं। क्यों ? शिवजी की समता के प्रभाव से। ऐसे ही जिसके जीवन में समता है वह विरोधी वातावरण में, विरोधी विचारों मे भी बड़े मजे से जी लेता है।

जैसे, आपने देखा होगा की गुलाब के फूल को देखकर बुद्धिमान व्यक्ति प्रसन्न होता है किः ʹकाँटों के बीच भी वह कैसे महक रहा है ! जबकि फरियादी व्यक्ति बोलता है किः ʹएक फूल और इतने सारे काँटे ! क्या यही है संसार, कि जिसमें जरा सा सुख और कितने सारे दुःख !ʹ

जो बुद्धिमान है, शिवतत्त्व का जानकार है, जिसके जीवन में समता है, वह सोचता है कि जिस सत्ता से फूल खिला है, उसी सत्ता ने काँटों को भी जन्म दिया है। जिस सत्ता ने सुख दिया है, उसी सत्ता ने दुःख को भी जन्म दिया है। सुख-दुःख को देखकर जो उसके मूल में पहुँचता है, वह मूलों के मूल महादेव को भी पा लेता है।

इस प्रकार शिवतत्त्व में जो जगे हुए हैं उन महापुरुषों की तो बात ही निराली है लेकिन जो शिवजी के बाह्य रूप को ही निहारते हैं वे भी अपने जीवन में उपरोक्त दृष्टि ले आयें तो उनकी भी असली शिवरात्रि, कल्याणमयी रात्रि हो जाये….

महाशिवरात्रि का पूजन

फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी अर्थात् महाशिवरात्रि। पृथ्वी पर शिवलिंग के स्थापन का जो दिवस है, भगवान शिव के विवाह का जो दिवस है और प्राकृतिक नियम के अनुसार जीव शिव के एकत्व में मदद करने वाले ग्रह-नक्षत्रों के योग का जो दिवस है – वही है महाशिवरात्रि का पावन दिवस। यह रात्रि-जागरण करने की रात्रि, आराधना-उपासना करने की रात्रि है।

शिवजी की आराधना निष्काम भाव से कहीं भी की जा सकती है किन्तु सकाम भाव से आराधना विधि-विधानपूर्वक की जाती है। जिन्हें संसार से सुख-वैभव लेने की इच्छा होती है वे भी शिवजी की आराधना करते हैं और जिन्हें सदगति प्राप्त करनी होती है, वे भी शिवजी की आराधना करते हैं।

शिवजी की पूजा का विधान यह है कि पहले जहाँ शिवजी की स्थापना की जाती है वहाँ से फिर उनका स्थानांतर नहीं होता, उनकी जगह नहीं  बदली जाती। शिवजी की पूजा के निर्माल्य (पत्र-पुष्प, पंचामृतादि) का उल्लंघन नहीं किया जाता। इसीलिए शिवजी के मंदिर की पूरी प्रदक्षिणा नहीं होती क्योंकि पूरी  प्रदक्षिणा करने से निर्माल्य उल्लंघित हो जाता है।

शिवलिंग विविध द्रव्यों से बनाये जाते हैं। अलग-अलग द्रव्यों से बने शिवलिंगों के पूजन के फल भी अलग-अलग प्रकार के होते हैं। जैसे, ताँबे के शिवलिंग के पूजन से आरोग्य-प्राप्ति होती है। पीतल के शिवलिंग के पूजन से यश, आरोग्य-प्राप्ति एवं शत्रुनाश होता है। चाँदी के शिवजी बनाकर पूजा करने से पितरों का कल्याण होता है। सुवर्ण के शिवजी बनाकर पूजा करने से तीन पीढ़ियों तक घर में धन-धान्य बना रहता है। मणि-माणेक का शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा करने से बुद्धि, आयुष्य, धन, ओज-तेज बढ़ता है लेकिन ब्रह्मचिंतन करने से ये चीजें स्वाभाविक ही प्रगट होने लगती हैं। परमात्मतत्त्व में, शिवतत्त्व में डुबकी मारने से बुद्धि का प्रकाश बढ़ने लगता है, पितरों का उद्धार होने लगता है, चित्त की चंचलता मिटने लगती है, दिल की दरिद्रता दूर होने लगती है एवं मन में शांति आने लगती है। शिवपूजन का महाफल यही है कि मनुष्य शिवतत्त्व को प्राप्त हो जाये।

शिवरात्रि को भक्ति भाव से रात्रि-जागरण किया जाता है। जल, पंचामृत, फल-फूल एवं बिल्वपत्र से शिवजी का पूजन करते हैं। बिल्वपत्र में तीन पत्ते होते हैं जो सत्त्व, रज एवं तमोगुण के प्रतीक हैं। हम अपने ये तीनों गुण शिवार्पण करके गुणों से पार हो जायें, यही इसका हेतु है। पंचामृत पूजा क्या है ? पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश इन पंचमहाभूतों का ही सारा भौतिक विलास  है। इन पंचमहाभूतों का विलास जिस चैतन्य की सत्ता से हो रहा है उस चैतन्यस्वरूप शिव में अपने अहं को अर्पित कर देना, यही पंचामृत-पूजा है। धूप और दीप द्वारा पूजा माने क्या ? धूप का तात्पर्य है अपने ʹशिवोઽहमʹ की सुवास, ʹआनन्दोઽहम्ʹ की सुवास और दीप का तात्पर्य है आत्मज्ञान का प्रकाश।

चाहे जंगल या मरुभूमि में क्यों न हो, रेती या मिट्टी के शिवजी बना लिये, पानी के छींटे मार दिये, जंगली फूल तोड़कर धर दिय और मुँह से ही नाद बजा दिया तो शिवजी प्रसन्न हो जाते हैं एवं भावना शुद्ध होने लगती है।

आशुतोष जो ठहरे ! जंगली फूल भी शुद्ध भाव से तोड़कर शिवलिंग पर चढ़ाओगे तो शिवजी प्रसन्न हो जाते हैं और यही फूल कामदेव ने शिवजी को मारे तो शिवजी नाराज हो गये। क्यों ? क्योंकि फूल फेंकने के पीछे कामदेव का भाव शुद्ध नहीं था, इसीलिए शिवजी ने तीसरा नेत्र खोलकर उसे भस्म कर दिया। शिवपूजा में वस्तु का मूल्य नहीं, भाव का मूल्य है।

भावो हि विद्यते देवा….

आराधना का एक तरीका यह है कि पत्र, पुष्प, पंचामृत, बिल्वपत्रादि से चार प्रहर पूजा की जाये। दूसरा तरीका यह है कि मानसिक पूजा की जाये।

कभी-कभी योगी लोग इस रात्रि का सदुपयोग करने का आदेश देते हुए कहते हैः “आज की रात्रि तुम ऐसी जगह पसंद कर लो कि जहाँ तुम अकेले बैठ सको, अकेले टहल सको, अकेले घूम सको, अकेले जी सको। फिर तुम शिवजी की मानसिक पूजा करो और उसके बाद अपनी वृत्तियों को निहारो, अपने चित्त की दशा को निहारो। चित्त मे जो-जो आ रहा है और जो-जो जा रहा है उस आऩे जाने को निहारते-निहारते आने जाने की मध्यावस्था को जान लो।

दूसरा तरीका यह है कि चित्त का एक संकल्प उठा और दूसरा उठने को है, उस शिवस्वरूप व आत्मस्वरूप मध्यावस्था को तुम मैं रूप में स्वीकार कर लो, उसमें टिक जाओ।

तीसरा तरीक यह भी है कि किसी नदी या जलाशय के किनारे बैठकर जल की लहरों को एकटक देखते जाओ अथवा तारों को निहारते-निहारते अपनी दृष्टि को उन पर केन्द्रित कर दो। दृष्टि बाहर की लहरों पर केन्द्रित है औऱ वह दृष्टि केन्द्रित है कि नहीं, उसकी निगरानी मन करता है और मन निगरानी करता है कि नहीं करता है, उसको निहारने वाला मैं कौन हूँ ? गहराई से इसका चिंतन करते-करते आप परम शांति में भी विश्रांति कर सकते हो।

चौथा तरीका यह है कि जीभ न ऊपर हो न नीचे हो बल्कि तालू के मध्य में हो और जिह्वा पर ही आपकी चित्तवृत्ति स्थिर हो। इससे भी मन शांत हो जायेगा और शांत मन में शांत शिवतत्त्व का साक्षात्कार करने की क्षमता प्रगट होने लगेगी।

साधक चाहे तो कोई भी तरीका अपना कर शिवतत्त्व में जगने का यत्न कर सकता है। महाशिवरात्रि का यही उत्तम पूजन है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2000, पृष्ठ संख्या 15-18, अंक 86

ૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐ

मन एक कल्पवृक्ष


मन के साथ यदि मित्रता की जाये, विवेक से उसे उच्च लक्ष्य की ओर मोड़ा जाये तो वह बड़ा लाभ दे सकता है और यदि उसकी अधीनता स्वीकार करके, उसके कहे में आकर बह गये तो वह वह मन बड़ी हानि भी पहुँचा सकता है। इसीलिए शास्त्रों ने कहा हैः

मनः एव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयोः।

ʹमन ही मनुष्य के बंधन और मुक्ति का कारण है।ʹ

यदि मन अनात्म देह में, अनात्म भोगों में, अनात्म जगत में आकर स्थित होता है तो वह मनुष्य का शत्रु हो जाता है और वही मन अगर आत्मा-परमात्मा की ओर आकर्षित होता है, परमात्म-संबंधी बातों का श्रवण, मनन और निदिध्यासन करता है तो वह मन मित्र का काम करता है और सूक्ष्मता को पाकर परम सूक्ष्म परमात्मतत्त्व का साक्षात्कार भी कर लेता है।

मन जितना-जितना सूक्ष्म होता जायेगा, उतनी-उतनी विश्रांति अच्छी लगेगी और जितनी-जितनी विश्रांति लेंगे, उतना-उतना मन सूक्ष्म होगा।

मनुष्य का मन जितना स्थूल होगा, उसे जगत उतना सच्चा लगेगा, भोगों के प्रति आकर्षण होगा और वह तुच्छ होता जायेगा। जितना-जितना उसे जगत स्वप्न जैसा लगेगा, भोगों से उपरामता होगी और उसका मन सूक्ष्म होता जायेगा एवं विश्रांति लेता जायेगा, उतना-उतना वह व्यक्ति महान होता जायेगा।

चित्त की विश्रांति क्यों नहीं होती ? ध्यान क्यों नहीं लगता ?

हम बदलने वाले संसार को, बदलने वाली परिस्थितियों को हृदय में इतनी जगह दे बैठे हैं कि चित्त की विश्रांति नहीं हो पाती है। अगर अपने स्वरूप को पाने की इच्छा उत्पन्न हो जाये और तत्संबंधी प्रयास करें तो विश्रांति पाना आसान हो जाये। तेरह निमेष तक परब्रह्म परमात्मा में विश्रांति पाने से जगतदान करने का फल प्राप्त होता है। सत्रह निमेष तक उस सच्चिदानंद परमात्मा में डूबने से अश्वमेध यज्ञ करने का फल मिलता है और यदि कोई आधा घण्टा तक उस परमात्मस्वरूप में विश्रांति पा ले तो वह यक्ष, गंधर्व, किन्नरों और देवताओं से भी पूजे जाने योग्य हो जाता है।

यदि कोई प्रारंभिक जिज्ञासु है, ईश्वर की ओर चल रहा है, उसके सामने दो-चार कर्त्तव्य एक साथ आ जाते हैं और वह व्यावहारिक कर्त्तव्यों को मूल्य देता है, स्थूल जगत को सत्य मानकर जीनेवालों की बातों को मूल्य देता है तो बेचारा उलझ जाता है और उसका समय उसी में नष्ट हो जाता है। अगर वह विवेकशील है तो कर्त्तव्य उसे व्यवहार में तो खींचेंगे जैसे, पत्नी के प्रति कर्त्तव्य, पति के प्रति कर्त्तव्य, समाज के प्रति कर्त्तव्य और देह के प्रति कर्त्तव्य… फिर भी वह इन कर्त्तव्यों में उलझेगा नहीं और उसका अपना जो वास्तविक कर्त्तव्य है – अपने आत्मस्वरूप को जानने का,  उसी को महत्त्व देगा।

व्यक्ति की जैसी मति और जैसा उसका संग होगा वैसे ही कर्त्तव्यों को वह मूल्य देगा। अगर उसकी मति श्रेष्ठ है, उसका संग ऊँचा है तो वह ऊँचे कर्त्तव्यों को मूल्य देगा। यदि उसकी मति मध्यम है तो वह मध्यम कर्त्तव्यों को मूल्य देगा और यदि उसकी मति हल्की है तथा उसका संग भी हल्का है तो फिर वह निम्न कर्त्तव्यों को मूल्य देगा।

स्वामी रामतीर्थ कहा करते थेः “कर्ज लेकर, उधार लेकर बेटे बेटियों की शादी की खुशी मनाना-हाय रे तेरा फर्ज ! … घूस लेकर, रिश्वत लेकर भी ठाठ-बाट करना – हाय रे तेरा फर्ज !…. छल-कपट करके भी देह-वस्त्र-घर को सजाना-हाय रे तेरा फर्ज !…. हे मानव ! क्या तेरा यही फर्ज है ? जिंदगी भर चिन्ताओं की गठरियाँ उठाते रहना, अन्तःकरण को मलिन करते रहना-क्या यही तेरा फर्ज है ? नहीं, तेरा मुख्य फर्ज है आत्मसिंहासन पर आने का, अपने आत्मराज्य में आने का, अपने असंग स्वभाव में नहीं आयेगा और प्रकृति के स्वभाव में बहता रहेगा तो फिर कौन से शरीर में तू अपना वास्तविक फर्ज निभायेगा ?”

जब मानव का विवेक सजाग हो उठता है तब उसे ये विचार सहज ही आने लगते हैं किः ʹमैं कब तक सामान्यजों की नाईं राग-द्वेष, अस्मिता और अभिनिवेश में आकर अपना जीवन बरबाद करता रहूँगा ? एक दिन…. दो दिन… सप्ताह… मास… वर्ष…. ऐसा करते-करते समय बीतता चला जा रहा है और जो करने जैसा कार्य है – आत्मस्वरूप में विश्रांति पाने का – उसकी मुझे सुधि तक नहीं है ! मैं कब तक ऐसी माया में फँसा रहूँगा ?…ʹ इस प्रकार का जगा हुआ विवेक मनुष्य को सहज ही में परमात्मप्राप्ति के लक्ष्य की ओर प्रेरित करने लगता है, संसार के भोगों से वैराग्य बढ़ाने लगता है और वह पहुँच जाता है किसी संत-महापुरुष के सान्निध्य में।

भोगी पुरुष की अधिक सेवा करने से बुद्धि मंद हो जाती है, नीच प्रकृति के व्यक्तियों की सेवा करने से लाभ नहीं, वरन् हानि ज्यादा होती है जबकि उच्च प्रकृति के व्यक्तियों की सेवा करने और उनके सान्निध्य़ से परम लाभ होता है। इसीलिए तुलसीदास जी ने कहा हैः

एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।

तुलसी संगत साध की, हरे कोटि अपराध।

साधु कौन है ? साध्यते परम कार्यं येन सः साधुः।

जिसने अपना परम कार्य साध लिया है, उसे ʹसाधुʹ कहते हैं। मनुष्य को चाहिए कि वह प्रयत्नपूर्वक साधु पुरुषों की संगति करे एवं उनके मार्गदर्शन के अनुसार साधना करके लक्ष्य-प्राप्ति के पथ पर अग्रसर होता रहे।

तुलसीदास जी ने कहा हैः

यह तन करू फल विषय न भाई।

इस शरीर का फल यह नहीं है कि विषय-भोग मिलें। इस मानवशरीर का फल तो है अपने स्वामी को, परम प्यारे को, परम हितैषी परमात्मा को जानना। गीता में भगवान ने कहा भी हैः

सुहृदं सर्वभूतानां….. ʹमैं प्राणिमात्र का सुहृद हूँ।ʹ वास्तव में केवल वही परमात्मा सबका सुहृद है। संसार के जो लोग बाहर से सुहृद दिखते हैं वे तो चार छः दिन के या केवल शमशान तक के सुहृद हैं, जबकि वह परम सुहृद परमात्मा तो सदियों से हमारे साथ था, है और रहेगा। हम उस परम सुहृद से जुड़ जायें तो हमारा बेड़ा पार हो जाये।

यह हम जानते हैं फिर भी उससे जुड़ नहीं पाते। क्यों ? क्योंकि हम मन-इन्द्रियों से जुड़ जाते हैं, जगत को सच्चा मानकर उससे जुड़ जाते हैं और उसी में इतने उलझे जाते हैं कि उस परम सुहृद से, उस अपने आत्मस्वरूप से जुड़ने का समय ही नहीं मिलता। हालाँकि हम सभी यह जानते हैं कि जगत के ये संबंध सदैव रहने वाले नहीं हैं फिर भी हम उसी के पीछे लगे रहते हैं।

भोले बाबा ने बड़ी सुंदर बात कही हैः

मानव ! तुझे नहीं याद क्या, तू ब्रह्म का ही अंश है ?

कुलगोत्र तेरा ब्रह्म है, सदब्रह्म का तू वंश है।।

संसार तेरा घर नहीं, दो चार दिन रहना यहाँ।

कर याद अपने राज्य की, स्वराज्य निष्कंटक जहाँ।।

जो बदलती हुई चीजों को ʹमेराʹ मान लेता है और साधन को ʹमैंʹ मान लेता है तथा वास्तविक साध्य का जिसको पता नहीं है, जिसके लिए साधन मिला है उस उद्देश्य का जिसको पता नहीं है – वह संसारी है। आँख देखने का साधन है, कान सुनने का साधन है, मन सोचने का साधन है, बुद्धि निर्णय करने का साधन है। इन साधनों का उपयोग करके  हम चाहें तो अपने परम लक्ष्य परमात्मतत्त्व को पा सकते हैं लेकिन इन साधनों को ही ʹमैंʹ मानने की गलती कर बैठते हैं इसीलिए बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं।

यह जरूरी नहीं कि हर जन्म में ये ही साधन और ऐसी ही बुद्धि मिले। यदि पशु-योनि मिलती है तो बुद्धि बहुत घट जाती है, मन की योग्यताएँ कम हो जाती हैं, शरीर की योग्यताएँ भी बदल जाती हैं। अरे, मनुष्य जन्म में ही बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में मन-बुद्धि-इन्द्रियों की क्षमता में अंतर आ जाता है, इतर योनियों की तो बात ही क्या ? बचपन का मन बेवकूफी से भरा हुआ होता है, जवानी का मन विषय-विकारों से भरा हुआ होता है और बुढ़ापे का मन फरियाद से भरा हुआ होता है। लेकिन बचपन, जवानी और बुढ़ापा तो देह की अवस्थाएँ हैं, आपकी नहीं। आप न बालक हो न जवान हो  न बूढ़े हो। वास्तव में जो आप हो उसमें न फरियाद है, न  विकार है और न ही बेवकूफी है। आप तो सबमें व्याप्त, सदा एकरस आत्मा हो। अपने उस वास्तविक स्वरूप को जान लो तो हो जाये बेड़ा पार…

इसके लिए श्रवण, मनन और निदिध्यासन का सहयोग लो। जिसका अंतःकरण अत्यंत शुद्ध है वह तो श्रवणमात्र से ज्ञान पा सकता है। जिसके कुछ कल्मष शेष हैं वह पहले जप-ध्यानादि करके अंतःकरण को शुद्ध करे, यत्नपूर्वक श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन करे, तब उसे बोध होगा जो उससे भी ज्यादा बहिर्मुख है उसका मन तो जप-ध्यानादि में भी शीघ्र नहीं लगेगा। अतः वह पहले निष्काम सेवा के द्वारा अंतःकरण को शुद्ध करे। ज्यों-ज्यों अंतःकरण शुद्ध होता जायेगा, त्यों-त्यों जप ध्यान में मन लगता जायेगा। फिर वह सत्शास्त्र एवं सदगुरु के वचनों का श्रवण करे, मनन एवं निदिध्यासन करे तो ज्ञान को पा लेगा।

साधक को चाहिए कि वह सजातीय वृत्तियों का आदर करे और विजातीय वृत्तियों का त्याग कर दे। सजातीय वृत्ति क्या है ? जो आत्मज्ञान के मार्ग पर हैं उनसे आत्मज्ञान संबंधी शास्त्रों का श्रवण, मनन एवं आत्मवेत्ता महापुरुषों के सान्निध्य में रहने का भाव ʹसजातीय वृत्तिʹ है।

आत्मज्ञान के पथिक को संसारी सुख के प्रसंगों से तो बचना ही चाहिए, संसारी सुख में जो उलझे हुए हैं ऐसे संसारियों से भी बचना चाहिए।

इस प्रकार सावधानी, सतर्कता, विवेक एवं वैराग्य को अपनाकर आप भी उसी तत्त्व को पा सकते हो, जिसमें भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण, ब्रह्माजी, भगवान शिव एवं अन्य अनेकों नामी अनामी महापुरुष रमण कर रहे हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2000, पृष्ठ संख्या 19-22, अंक 86

ૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐ

गाजर


गाजर को उसके प्राकृतिक रूप में ही अर्थात् कच्चा खाने से ज्यादा लाभ होता है। उसके भीतर का पीला भाग निकालकर खाना चाहिए क्योंकि वह अत्यधिक गरम होता है अतः पित्त दोष, वीर्यदोष एवं छाती में दाह उत्पन्न करता है।

गाजर स्वाद में मधुर-कसैली-कड़वी, तीक्ष्ण, स्निग्ध, उष्णवीर्य, गरम, दस्त को बाँधने वाली, मूत्रल, हृदय के लिए हितकर, रक्त शुद्ध करने वाली, कफ निकालने वाली, वातदोषनाशक, पुष्टिवर्धक तथा दिमाग एवं नस नाड़ियों के लिए बलप्रद है। यह अफारा, संग्रहणी, बवासीर, पेट के रोगों, सूजन, खाँसी, पथरी, मूत्रदाह, मूत्राल्पता तथा दुर्बलता का नाश करने वाली है।

गाजर के बीज गरम होते हैं अतः गर्भवती महिलाओं को उनका उपयोग कभी नहीं करना चाहिए। बीज पचने में भारी होते हैं। गाजर में आलू से छः गुणा ज्यादा कैल्शियम होता है। कैल्शियम एवं कैरोटीन की प्रचुर मात्रा होने के कारण छोटे बच्चों के लिए यह एक उत्तम आहार है। रूसी डॉक्टर मेकनिकोफ के अनुसार गाजर में आँतों के हानिकारक जन्तुओं को नष्ट करने का अदभुत गुण पाया जाता है। इसमें विटामिन ʹएʹ भी काफी मात्रा में पाया जाता है अतः यह नेत्ररोगों में लाभदायक है।

गाजर रक्त शुद्ध करने वाली है। 10-15 दिन केवल गाजर के रस पर रहने से रक्त विकार, गाँठ, सूजन एवं पाण्डुरोग जैसे त्वचा के रोगों में लाभ होता है। इसमें लौह तत्त्व भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। खूब चबाकर गाजर खाने से दाँत मजबूत, स्वच्छ एवं चमकदार होते हैं तथा मसूढ़े मजबूत होते हैं।

विशेषः गाजर के भीतर का पीला भाग खाने से अथवा गाजर खाने के बाद 30 मिनट के अंदर पानी पीने से खाँसी होती है। अत्यधिक मात्रा में गाजर खाने से पेट में दर्द होता है। ऐसे समय में थोड़ा गुड़ खायें। अधिक गाजर वीर्य का क्षय करती है। पित्तप्रकृति के लोगों को गाजर का कम एवं सावधानीपूर्वक उपयोग करना चाहिए।

औषधि-प्रयोग

दिमागी कमजोरीः गाजर के रस का नित्य सेवन करने से कमजोरी दूर होती है।

दस्तः गाजर का सूप लाभदायक है।

सूजनः मरीज को सब आहार त्याग कर केवल गाजर के रस अथवा उबली हुई गाजर पर रहने से लाभ होता है।

मासिक न दिखने पर या कष्टार्तवः मासिक कम आने पर या समय होने पर भी न आने पर गाजर के 5 ग्राम बीजों का 20 ग्राम गुड़ के साथ काढ़ा बनाकर लेने से लाभ होता है। एलौपैथिक गोलियाँ जो मासिक को नियमित करने के लिए ली जाती हैं वे हानिकारक होती हैं।

पुराने घावः गाजर को उबालकर उसकी पुलटिस बनाकर घाव पर बाँधने से लाभ होता है।

खाजः गाजर को कद्दूकस करके अथवा बारीक पीसकर उसमें थोड़ा नमक मिला लें और पानी डाले बिना उसे गर्म करके खाज पर रोज बाँधने से लाभ होता है।

आधासीसीः गाजर के पत्तों पर दोनों ओर घी लगाकर उन्हें गर्म करें। फिर उनका रस निकालकर 2-3 बूँदें कान एवं नाक में डालें। इससे आधासीसी का दर्द मिटता है।

श्वास हिचकीः गाजर के रस की 4-5 बूँदें दोनों नथुनों में डालने से लाभ होता है।

नेत्ररोगः दृष्टिमंदता, रतौंधी, पढ़ते समय आँखों में तकलीफ होना आदि रोगों में कच्ची गाजर या उसके रस का सेवन लाभप्रद है। यह प्रयोग चश्मे का नंबर घटा सकता है।

पाचन संबंधी गड़बड़ीः अरूचि, मंदाग्नि, अपच आदि रोगों में गाजर के रस में नमक, धनिया, जीरा ,काली मिर्च, नींबू का रस डालकर पियें अथवा गाजर का सप बनाकर पियें।

पेशाब की तकलीफः गाजर का रस पीने से खुलकर पेशाब आता है, रक्तशर्करा भी कम होती है। गाजर का हलवा खाने से पेशाब में कैल्शियम, फास्फोरस का आना बंद हो जाता है।

नकसीर फूटनाः ताजी गाजर का रस अथवा उसकी लुगदी सिर एवं ललाट पर लगाने से लाभ होता है।

जलने परः जलने से होने वाली दाह में प्रभावित अंग पर बार-बार गाजर का रस लगाने से लाभ होता है।

हृदय रोगः हृदय की कमजोरी अथवा धड़कनें बढ़ जाने पर गाजर को भून लें या उबाल लें। फिर उसे रात भर के लिए खुले आकाश में रख दें। सुबह उसमें मिश्री तथा केवड़े या गुलाब का अर्क मिलाकर रोगी को देने से लाभ होता है अथवा उसे रोज 2-3 बार कच्ची गाजर का रस पिलायें।

प्रसवपीड़ाः यदि प्रसव के समय स्त्री को अत्यंत कष्ट हो रहा हो तो गाजर के बीजों के काढ़े में एक वर्ष का पुराना गुड़ डालकर गरम-गरम पिलाने से प्रसव जल्दी होता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2000, पृष्ठ संख्या 30, अंक 86

ૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐ