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भारतवासियो ! अब जागो


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

शास्त्रों में आता हैः

पूर्वे जनुषि या नारी गर्भघातकारी ह्यभूत्।

गर्भपातेन दुःखार्ता सात्र जन्मनि जायते।।

ʹजो स्त्री पूर्वजन्म में गर्भ का घात करती है, वह इस जन्म में भी गर्भपात का दुःख भोगने वाली होती है अर्थात् उसके कोई संतान नहीं होती।ʹ

अपने पेट में दवाएँ डलवाकर अथवा कातिल साधनों द्वारा बालक के टुकड़े-टुकड़े करके गर्भपात करवाना क्या पवित्र कार्य कहा जायेगा ? गर्भपात को पाप ही नहीं, महापाप माना गया है। जिस महिला ने गर्भपात करवाया हो, उस महिला के हाथ का भोजन करने से साधु-संतों की भी तपस्या नष्ट होती है तो उसके घर के लोगों के कितने पुण्य बचते होंगे ?

सोनोग्राफी करायी…. कन्या है तो करवा दो गर्भपात… कई बार तो कन्या होती ही नहीं है, पुत्र होता है, परन्तु पैसों की लालच में सोनोग्राफीवाले कन्या बता देते हैं।

उल्हासनगर, नंबर-3 में एक परिवार में प्रथम एक कन्या आयी। दूसरी सन्तान पुत्र हो, इस कामना से वे दम्पत्ति सत्संग में आये। पाँचवे महीने सोनोग्राफी करायी गयी तो डॉक्टर ने कहाः “कन्या है।” वे लोग घबरा गये। फिर वे अमदावाद आश्रम आये एवं बड़ बादशाह की प्रदक्षिणा करके उन्होंने पुत्र प्राप्ति के लिए मनौती मानी।

जब नौवाँ महीना शुरु हुआ तो उन्होंने पुनः सोनोग्राफी करवायी। रिपोर्यो में आया किः ʹलड़की है।ʹ यह सुनकर पति-पत्नी खूब रोये। रात्रि में स्वप्न में उनके गुरुदेव ने कहाः ʹघबराओ नहीं, बेटा होगा।

अतः गर्भपात के महापाप से तो वे बच गये लेकिन उनका रोना जारी रहा। जब प्रसूति हुई और बेटा आया तो बोल पड़ेः “पूज्य बापू जी ने लड़की में से लड़का बना दिया है।”

मैं व्यासपीठ पर बैठा हूँ, सत्य कहता हूँ कि मैंने लड़की में से लड़का नहीं बनाया, वह सचमुच में लड़का ही था। केवल स्वप्न में उन्हें प्रेरणा मिली कि ʹलड़का है, घबराओ नहीं।ʹ

अगर कन्या भी आ जाये तो क्या है ? आऩे वाले 5-7 वर्षों के बाद आप देखेंगे कि अभी जिन कन्याओं के माँ बाप को लड़के के माँ-बाप को हाथ जोड़ने पड़ते हैं उन्हीं को लड़के के माँ-बाप हाथ जोड़ेंगे किः ʹहमारा बेटा कुँवारा है, कुछ कर दीजिये।ʹ

आज से 52-53 वर्ष पूर्व मेरे भाई की जो शादी हुई थी वह हाथा जोड़ी करके ही हुई थी क्योंकि उस जमाने में लड़के ज्यादा थे, कन्याएँ कम। मेरे नगरसेठ पिता ने अपने आदमी के द्वारा एक हलवाई के यहाँ हाथ जोड़कर यह संदेश भिजवाया किः ʹआपके यहाँ कन्या है, हमारे जेठानंद की कुछ व्यवस्था करवा दें।ʹ चौदह वर्षीय जेठानंद कहीं शादी के बिना न रह जाये अतः 12-13 वर्ष की कन्या एवं चौदह वर्षीय जेठानंद का मंगलम् भगवान….ʹ हुआ अर्थात् विवाह हुआ।

विभाजन के बाद भारत आये फिर भी वर्षों तक दोनों को पता ही नहीं था कि वे पति-पत्नी हैं। वे लोग साथ में खेलते थे, मैं भी उनके साथ खेलता था। जब कबड्डी के खेल में मेरा भाई भाभी को हराने के लिए हाथ मारता तो वह कहतीः “परायी कन्या को मारता है ? आज एकादशी है, तुझे शरम नहीं आती है ? मुए !”

उस भाभी को पता नहीं था कि वह जिसे ʹमुआʹ कह रही है वही उसका पति है। वर्षों के बाद उन्हें पति-पत्नी के जगत का ख्याल आया।

कहने का तात्पर्य यह है कि ʹगर्भ में कन्या हैʹ यह मानकर गर्भपात न करवायें। गर्भपात महापाप है। संयम से जियें।

कई लोग ऐसा प्रचार करते हैं किः ʹखुदा की खेती है, बढ़ने दो… बस्ती बढ़ेगी तो ʹवोट बैंकʹ बढ़ेगा, अपने वाले आयेंगे और अपने वालों का यहाँ झण्डा भी लगेगा।ʹ तो कई लोग कहते हैं किः ʹGift of the God.ʹ अर्थात् बच्चा भगवान का दिया हुआ उपहार है। बढ़ाये जाओ… ऐसा होगा तो भारत में हमारा साम्राज्य पुनः स्थापित होने की सम्भावना बढ़ जायेगी….ʹ जबकि गीता-रामायण एवं उपनिषदों में, भगवन्नाम में, परोपकार एवं सहिष्णुता में विश्वास रखने वाली जनता को सिखाया जाता है किः ʹगुलशन में बस एक ही फूल, दूसरी कभी न होवे भूल…. दूसरा अभी नहीं, तीसरा कभी नहीं।ʹ किन्तु दूसरे लोगों के 8-8 और 12-12 हैं, उसका क्या ?

कोई कहे किः ʹउन्हें भले हैं हमें तो सिंह जैसा एक ही बेटा हो तो बहुत है।ʹ परन्तु भैया ! वोटिंग का जमाना है। आपका सिंह पिंजरे में भूखा रहेगा और बकरेवालों का राज्य हो जायेगा। थोड़े समझदार बनो। एक का एक बेटा है…. बेटी तो ससुराल गयी और न करे नारायण.. बेटा पत्नी के संग में आकर घरजमाई बन जाये तो आपका कौन ? विदेश में कमाने गया अथवा देश की सीमा पर गया तो आपका कौन ? न करे नारायण… फिर भी बीमार पड़े या दुर्घटनाग्रस्त हो जाये तो आपका कौन ? थोड़ा समझ जाओ, भैया !

कम-से-कम देश को ऐसे 2-4 बेटे देते जाना जो भारतीय संस्कृति के संस्कारों से सम्पन्न हों। यह भी देश की सेवा है। एकाध परदेश से पैसे खींच लाये, एकाध देश की सेवा के लिए सेना में जाये, एकाध यहीं रहकर समाज एवं धर्म की सेवा में लगे और एकाध माता पिता की सेवा करे।

जल्दबाजी में ऑपरेशन मत करवा लेना। जो शराबी-कबाबी हैं और जिन्हें राष्ट्र से प्रेम नहीं है ऐसे लोग शादी से पहले ही ऑपरेशन करवा दें तो राष्ट्र का भला होगा। लेकिन जिनमें भगवान की भक्ति है, परोपकारिता है, दिव्य ज्ञान है वे कभी ऑपरेशन न करायें, गर्भपात की तो बात भी न करें।

कोई कहेः “बापू ! बस्ती बढ़ जायेगी तो लोग खायेंगे क्या ?”

जनसंख्या-नियंत्रण का काम परमात्मा का है, किसी नेता या व्यक्ति का नहीं। जब भारत की जनसंख्या 40 करोड़ थी तब गेहूँ, खाद्य तेल वगैरह बाहर से आता था। आज 100 करोड़ से भी ऊपर का आँकड़ा है और भारत से चावल एवं अन्य खाद्य सामग्रियाँ विदेशों में जा रही हैं। आवश्यकता आविष्कार की जननी है। जनसंख्या बढ़ेगी तो आवश्यकताएँ भी बढ़ेंगी और आवश्यकताएँ बढ़ेंगी तो नये-नये आविष्कार भी होंगे।

ʹक्या खायेंगे ?ʹ यह सोचकर अपने ही बच्चों को मार देना कहाँ तक उचित है ? जो जीव 84 लाख योनियों में भटकते-भटकते आप जैसे पवित्र कुलों में दिव्य ज्ञान पाने, भक्ति, साधना-सेवा करके मुक्ति के मार्ग पर जाने के लिए आया, उसी को आप पैसे देकर, जहरीले दवाओं-इन्जैक्शनों के द्वारा अथवा कातिल औजारों के द्वारा टुकड़े-टुकड़े करवाकर फिंकवा दोगे ?

डॉक्टरों की एक गुप्त बात हैः ʹWork number on finished or not ?ʹ  अर्थात् पहले नंबर का काम पूरा हुआ कि नहीं ? पहले नंबर का काम क्या है ? गर्भ के अंदर जो बालक है उसके सिर के टुकड़े-टुकड़े हुए कि नहीं ?

आपके यहाँ जो निर्दोष नन्हा-मुन्ना आऩे वाला था, जिसने आपका कुछ भी नहीं बिगाड़ा था, गर्भ में जिसके आपने मात्र से आपको (गर्भ धारण करने वाली पत्नी को) आनंद मिला था, ऐसे निर्दोष ऋषि के आप टुकड़े-टुकड़े करवाकर कचरे में फिंकवा दो, यह कहाँ तक उचित है ?

यह कर्मभूमि है। जो जैसे कर्म करता है, वैसे ही फल पायेगा।

करम प्रधान बिस्व करि राखा।

जो जस करई सो तस फलु चाखा।।

(श्रीरामचरित. अयोध्याकाण्डः 218-2)

गर्भपात ʹभ्रूणहत्याʹ कहलाती है। इन्सान की हत्या से धारा ʹ302ʹ की कलम लगती है, परन्तु भ्रूणहत्या ऋषि हत्या के तुल्य है। परलोक में उसकी सजा अवश्य भुगतनी पड़ती है।

शास्त्रकारों ने तो ऐसा भी कहा है कि जो महिला गर्भपात कराती है, उसे फिर 10-10 जन्मों तक सन्तान नहीं होती। अतः आज तक जो भूल हो गयी उसका प्रायश्चित करके फिर वह भूल न दोहरायी जाये-इसकी सावधानी रखो।

ʹजनसंख्या बढ़ जायेगी….ʹ ऐसी चिन्ता करवाने वालों को ही इसकी चिन्ता करने दो। वे तो रोज संख्या बता देंगे। थोड़ा विवेक का उपयोग करो, संयम एवं समझ का उपयोग करो।

जो जीव पवित्र कुल, पवित्र वातावरण में आने की इच्छा रखता है उसे टुकड़े-टुकड़े करवाकर नाली में फेंक दोगे और वही जीव फिर आपके देश में ʹबम ब्लास्टिंगʹ करे ऐसे परिवार में जायेगा तो ? आपके देश के टुकड़े करवाने वाली संस्कृति में जाकर जन्म लेगा तो ? आपके देश में हर साल डेढ़ करोड़ बालकों को सात्त्विक लोगों के यहाँ आने से रोककर नाली में फेंक दिया गया, वे ही फिर विधर्मियों के यहाँ जन्म लें तो आपको वर्ष में 3 करोड़ जनसंख्या की हानि होगी। फिर आप कहाँ जाकर रहोगे ?

दुबई में मंदिर बनाने की सख्त मनाई है। एक जगह पर कुछ लोग गुप्त रूप से मंदिर बना रहे थे तो उन पर डंडे पड़े और उन्हें कहा गया किः ʹयहाँ नहीं बनाना है।ʹ अमुक पर्व-त्यौहार पर आप एयरपोर्ट पर उतरो एवं आपके हाथ में कोई अच्छी पुस्तक हो जिसमें किसी देवी-देवता का फोटो हो तो आपको वापस भेज दिया जायेगा। फिर आप कहाँ रहने जाओगे ? जो राष्ट्र धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं वहाँ तो दूसरे धर्म के लोग पूजा-स्थल नहीं बना सकते लेकिन जो राष्ट्र धर्मनिरपेक्ष कहलाते हैं वे भी व्यवहार में अपने धर्म को बढ़ावा देने वाली नीति ही अपनाते हैं। जैसे कि स्विटजरलैण्ड में दूसरे धर्म के लोग अपना पूजा-स्थल नहीं बना सकते। जबकि आपके देश में बीच रास्ते में भी लोग अपना पूजा-स्थल बना लेते हैं। अतः आपके ही देश में आपको सौतेली माँ की संतान के रूप में न चलना पड़े, इसके लिए जरा सावधान हो जाओ।

अपने मन के साथ, अपने शरीर के साथ, अपनी संतानों एवं राष्ट्र के साथ जुल्म न करो। अपने शरीर को स्वस्थ रखो, संयमी बनो एवं राष्ट्र के लिए अपनी संतति को भई स्वस्थ एवं संयमी बनाओ। स्वयं भी महानता के पथ पर चलो और अपनी संतति को भी उसी पर अग्रसर करो। इसके लिए सत्शास्त्रों का अध्ययन, संतों का संग, सत्संग का श्रवण, जप-ध्यान, साधन-भजन करो ताकि आपकी बुद्धि में बुद्धिदाता का प्रकाश आये…. आपकी बुद्धि, बुद्धि न रहे, ऋतंभरा प्रज्ञा बन जाये… तभी आपका मानव जीवन सार्थक होगा, धन्य-धन्य होगा। आप भी तरोगे, अपने सात कुल के भी तारणहार बनोगे।

ૐ आनंद… ૐ….ૐ….

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2001, पृष्ठ संख्या 22-24, अंक 98

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अपनी योग्यता बढ़ाओ


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

जीवन जीने के दो मार्ग हैं। श्रेय मार्ग और प्रेय मार्ग। श्रेयस बोलता हैः ʹदे दो…. दे दो…. अपने पास जो कुछ भी उसे दूसरों की सेवा में लगा दो, दूसरों की आवश्यकतापूर्ति में लगा दो।ʹ प्रेयस बोलता हैः ʹले लो… ले लो…. अपने पास बहुत कम है, जितना मिले उतना ले लो। उसे सँभालकर रखो।ʹ

प्रेय मार्ग पर चलने से लेते-लेते आप इतने दब जाते हो कि जड़ी भाव को प्राप्त होते हो और श्रेय मार्ग पर चलने से देते-देते आप इतने विशाल हो जाते हो कि आखिर में सिर्फ आप ही रहते हो, और कुछ नहीं रहता।

सदगुरु हमेशा श्रेयस् देते हैं। वे हम पर अपना आध्यात्मिक खजाना लुटा देते हैं लेकिन कोई-कोई ही विरले होते हैं जो इस अमूल्य रत्न को झेल पाते हैं। जिसकी जितनी योग्यता, उतना ही लाभ वह उठा सकता है। सदगुरुओं का जीवन कृत्कृत्यता से भरा होता है, कल्याणपूर्ण होता है। जब कोई योग्य अधिकारी ही न मिले तो वे क्या करें ?

संत ज्ञानेश्वर महाराज से किसी एक भोली माई ने पूछाः “जब भगवान सबके हैं, तो वे सबको आत्मप्रसाद क्यों नहीं देते ?”

संत ज्ञानेश्वरः “भगवान तो सबके लिए एक सरीखे दाता हैं लेकिन सबको एक सरीखा लेने की अटकल नहीं है तो उसमें भगवान या संत या गुरु क्या करें ? योग्यता के अनुरूप व्यवहार होता है।”

उस नासमझ माई ने इतना सुनने पर भी फिर से कहाः “योग्यता, अधिकार यह सब संतों को क्या देखना ? उन्हें तो आत्मरस सबको दे देना चाहिए।”

संत ज्ञानेश्वर महाराज ने सोचा किः “यह माई ऐसे समझने वाली नहीं है। इसको तो प्रत्यक्ष प्रमाणित करके समझाना पड़ेगा।ʹ वे पहुँचे हुए संत थे। उन्होंने अपने संकल्प से एक लीला रची।

जहाँ ज्ञानेश्वर महाराज और वह माई बातचीत कर रहे थे वहाँ एक भिखारी आया और भिखारी ने उस माई से एक रूपया माँगा।

माई ने क्रोधित होकर कहाः “चल भाग यहाँ से। बड़ा आया एक रूपया माँगने !”

इस प्रकार भिखारी को उस माई ने भगा दिया।

अब संत ज्ञानेश्वर ने अपनी ओर से लीला शुरु की। उन्होंने माई को उसके हाथ के सोने के कंगन की ओर इशारा करके कहाः “माई ! इसमें से एक कंगन मुझे दे दो न ! पास के गाँव में भण्डारा करना है।”

माई ने तुरंत अपने सारे के सारे कंगन उतारकर कहाः “एक दो क्यों ? आप इन चारों कंगनों को रख लीजिये, काम आयेंगे।”

संत ज्ञानेश्वरः “आश्चर्य है ! अभी-अभी तुमने ही उस भिखारी को एक रूपया तक देने से इन्कार कर दिया और मेरे एक कंगन माँगने पर अपने चारों कंगन देने को राजी हो गई !

माईः “भिखारी को मैं एक रूपया भी कैसे देती ? वह तो एकदम गिरा हुआ इन्सान था फिर आप तो संत हैं, महापुरुष हैं। आपको देकर मेरा दिल खुश होता है।”

तब संत ज्ञानेश्वर महाराज ने कहाः

“देखो, नश्वर चीज देने में भी योग्यता देखनी पड़ती है तो संतजन, गुरुजन जब आध्यात्मिक खजाना बाँट रहे हों तब उन्हें भी अधिकारी तो चुनने ही पड़ते हैं। फिर भी वे इतने दयालु हृदय होते हैं कि योग्यता से ज्यादा ही सबको देते आये हैं। इसके बावजूद सबको उनकी कद्र नहीं होती।”

भगवान के प्यारे संतों में, सदगुरुओं में हम सबकी अटूट श्रद्धा बन जाये, आत्मरस पाने की तत्परता अंत तक बनी रहे तो बेशक हम पर बरसी कृपा पचेगी।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2001, पृष्ठ संख्या 20, अंक 98

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अगर है शौक मिलने का तो कर खिदमत फकीरों की


संत श्री रैदास जी महाराज जयंतीः 8 फरवरी 2001

काशीनरेश अपने मंत्री से कहते हैं-

“बाहर से तो मैं बड़ा सुखी हूँ क्योंकि मेरे पास यौवन, आरोग्यता और संपत्ति है, लेकिन भीतर से दुःखी भी बहुत हूँ क्योंकि हृदय में शांति नहीं है। अभी मैंने परम शांति नहीं पाई है, अपनी अंतरात्मा के सुख का स्वाद नहीं पाया है।

काशीनरेश का मंत्री बुद्धिमान था। उसने कहाः “अगर परम शांति चाहिए तो जिन्होंने परम शांति पाई, उनकी संगति में जाना पड़ेगा। जिन्होंने परम शांति पायी है ऐसे ब्रह्मवेत्ता महापुरुष की निगाहें आप पर पड़ें, उनके हाथ का प्रसाद मिल जाये, उनकी करुणा-कृपा से हृदय की ज्योति जग जाये तभी शांति मिल सकती है, राजन् !”

काशीनरेशः “मैं कथा तो रोज सुनता हूँ।”

मंत्रीः “राजन् ! कथा तो आप पंडियों से सुनते हैं, कथाकारों से सुनते हैं। किन्हीं आत्मारामी संत का सत्संग सुनिये तो शांति मिलेगी। यदि ऐसे महापुरुष के बारे में आप मुझसे पूछें तो इस वक्त काशी में ब्राह्मण, पंडित, साधु तो बहुत हैं लेकिन आत्मपद को पाये हुए जिन महापुरुष को मैं जानता हूँ वे हैं संत श्री रैदासजी महाराज।”

काशीनरेशः “जूते सीने वाले रैदास ! एक उच्च कोटि के संत !!”

मंत्रीः “हाँ, राजन् ! उनका व्यवसाय भले मोची का है लेकिन वे परमपद को पाये हुए महापुरुष हैं। यदि वे आप पर कृपा कर दें तो आपको हृदय की शांति मिल सकती है।”

काशीनरेशः “मैं उन रैदासजी के पास कैसे जा सकता हूँ ? मैं काशी का राजा और वे जूते सीने वाले एक मोची…”

मंत्रीः “राजन् ! उन महापुरुष का व्यवसाय न देखिये। मैं उनके दर्शन करके आया हूँ, उनके श्रीचरणों में बैठकर आया हूँ। आप भी एक बार अवश्य उनके दर्शन करें।”

मंत्री की बात सुनकर राजा को थोड़ा भरोसा हुआ किन्तु अभी-भी मन में थोड़ी खटक थी कि ʹराजा होकर एक मोची के पास जाना !ʹ उन्होंने मंत्री से कहाः “मैं उन रैदासजी महाराज के पास कैसे जाऊँ ? लोग कहेंगे कि राजा होकर मोची के पास गये थे….”

उस जमाने में नात-जात का बड़ा बोलबाला था।

मंत्रीः “राजन् ! फिर भी आपको उन महापुरुष के पास अवश्य जाना चाहिए। जिन मीराबाई के श्रीचरणों में भारत के बादशाह अकबर ने सिजदा करके अपना भाग्य बनाया, उन मीराबाई ने भी रैदासजी महाराज का मार्गदर्शन पाया है। रैदास जी के कृपा-प्रसाद को विकसित करके मीराबाई ने मेवाड़ को पावन कर दिया।”

काशीनरेशः “ठीक है…. मैं भी मौका देखकर उनके पास जाऊँगा लेकिन ऐसे ढंग से जाऊँगा कि किसी को पता न चले।”

अवसर पाकर राजा सेठ के वेष में रैदासजी के पास पहुँचे।

उस वक्त रैदास जी महाराज जूते सी रहे थे। जूते सीने के ले चमड़े को भिगोना पड़ता है। जिस लकड़ी के बर्तन में पानी रखा जाता है उसे कठौती बोलते हैं। कठौती में चमड़ा भिगोने से पानी रंगीन हो जाता है। रैदासजी महाराज अपने काम में लगे हुए थे। राजा ने कहाः “महाराज ! मैं काशीनरेश हूँ। आपके यहाँ वेष बदलकर आया हूँ। मुझे पता चला है कि आप कृपा करते हैं। मुझे भी शांति का प्रसाद दीजिये।”

संत रैदासजी ने सोचा किः “राजा बनकर आया है, वह भी ईमानदारी से नहीं। बेईमानी से सेठ जैसा कोट पहनकर आया है। इसका अहं भी तो थोड़ा पिघलना चाहिए।ʹ अगर इसमें योग्यता है, अधिकारिता है और थोड़ा मिटेगा तो कुछ पा लेगा।ʹ रैदासजी ने युक्ति की। उन्होंने कठौती में से आधी कटोरी पानी राजा को दिया एवं कहाः “यह पानी पी लो। इससे शांति मिल जायेगी।”

राजा अहं लेकर आया है लेकिन कैसे होते हैं वे करुणामय संत ! कठौती के पानी के रूप में कृपा बरसाने को तैयार हो जाते हैं कि ʹअगर थोड़ा अहं पिघलेगा तो शांति पा लेगा।ʹ लेकिन राजा तो राजा था ! एक तो राजा… फिर मुश्किल से वेष बदलकर आया…. ऊपर से प्रसाद में चमड़े का पानी ! राजा ने सोचाः “अररर… नहीं पीते हैं तो देने वाले का अपमान होता है और पीते हैं तो कै (उल्टी) होती है। अब क्या करें ?ʹ

आखिर राजा था… राजवी आदमी को किस समय क्या करना चाहिए उसकी थोड़ी बहुत सूझ-बूझ तो होती ही है। रैदासजी को बुरा भी न लगे और पानी भी न पीना पड़े, इसलिए राजा ने मुँह घुमा लिया और पीने की अदा करके कटोरी का पानी कोट के अंदर कमीज पर गिरा दिया ताकि बाहर भी न ढुले। राजा ने वहाँ से विदा ली।

महल में आकर काशीनरेश ने अपने खास धोबी को बुलवाया और कहाः “इस कमीज को चुपचाव धुलवा देना। किसी को पता न चले।”

धोबीः “क्या हुआ, राजन् !”

राजाः “यह मत पूछो। बस, इसको जल्दी से धुलवाकर भिजवा देना।”

धोबी ने अपनी बेटी सुजलु को वह कमीज धोने के लिए दे दी। राजा साहब की कमीज धोते समय उस रंग का उसे स्पर्श हुआ। स्पर्श होते ही सुजलु भीतर से ईश्वरीय रंग में रंगती गयी। कमीज का बाहर का रंग धुलता गया और सुजलु के हृदय में प्रेमरस उभरने लगा, ईश्वरीय मस्ती उभरने लगी।

प्रेम न खेतों ऊपजे, प्रेम न हाट बिकाय।

राजा चहो प्रजा चहो, शीश दिये ले जाय।।

रैदासजी ने उस चमड़े के पानी के रूप में आत्मशांति का, भक्ति का प्रेम-प्रसाद दिया था। राजा को तो अपने राजापने का अहं था अतः उसने तो पानी गिरा दिया लेकिन धोबी की वह बच्ची निर्दोष थी, अहंकाररहित थी अतः उस पानी के स्पर्श से ही उसे भक्ति का, ईश्वरीय मस्ती का प्रसाद मिल गया।

संत-महापुरुष कब, कैसे, किस पर कृपा कर दें कहना कठिन है लेकिन उनकी कृपा पचाने का अधिकारी वही होता है जो छल-कपट एवं अहंकार रहित होता है। ʹश्रीरामचरितमानसʹ में भी आता हैः

निर्मल मन जन सो मोहि पावा।

मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।

रैदास जी के उस कृपा-प्रसाद युक्त जल के स्पर्श से धोबी की बच्ची सुजलु की सुषुप्त शक्ति जाग्रत हो उठी। वह शांत भाव से बैठती तो उसे अंदर से आनंद आने लगता। कभी हँसने लगती तो कभी आँसू बहने लगते, कभी-कभी प्रेमविभोर होकर नृत्य करने लगती…. ऐसा करते-करते उसकी आंतरिक योग्यता विकसित होती गयी। उसकी निष्कामता एवं ईश्वरीय मस्ती बढ़ती गयी। उसकी वाणी सुनकर लोग प्रभावित होने लगे। दो, पाँच, पंद्रह, पचीस…. करते-करते कई लोग उसके दर्शन-सत्संग के लिए आने लगे।

धीरे-धीरे उसकी ख्याति उस पुण्यात्मा मंत्री तक पहुँची जिसने काशीनरेश को संत रैदास जी से मिलवाया था। सुजलु का दर्शन-सत्संग करने वह उसके घर गया। वह स्वयं भी रँगा  हुआ तो था ही, समझदार भी था। सुजलु के वचन सुनकर बड़ा प्रभावित हुआ एवं राजा से कहाः

“राजन् ! आप रैदासजी के पास गये तो सही लेकिन वे मोची हैंʹ ऐसा सोचकर उनके सत्संग का लाभ नहीं ले पाये। खैर, सुजलु तो आपके धोबी की पुत्री है। अपने धोबी की पुत्री के पास जाने में क्या हर्ज है ? राजन् ! आप उससे तो सत्संग-लाभ उठा ही सकते हैं।”

मंत्री के आग्रह से राजा सुजलु के पास गये और बोलेः “सुजलु मुझे शांति चाहिए।”

जिन्हें परमात्म-तत्त्व का साक्षात्कार हो गया है ऐसे महापुरुष जो वस्त्र पहनते हैं उसमें भी उनके आध्यात्मिक आन्दोलन (वायब्रेशन) होते हैं। वे जिस वस्तु को छू देते हैं वह भी प्रसाद हो जाती है। जिस पर उनकी निगाहें पड़ती हैं वह भी निहाल हो जाता है।

यद् यद् स्पृश्यति पाणिभ्यां यद् यद् पश्यति चक्षुषा।

स्थावरणापि मुच्यन्ते किं पुनः प्राकृताः जनाः।।

ʹब्रह्मज्ञानी महापुरुष ब्रह्मभाव से जिन जड़ पदार्थों को अपने हाथों से स्पर्श करते हैं, आँखों के द्वारा देखते हैं वे भी कालांतर में जीवत्व पाकर मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं, तो फिर उनकी दृष्टि में आये हुए व्यक्तियों के देर-सबेर होने वाले मोक्ष के बारे में तो शंका ही कैसी ?ʹ

भले ही वह कठौती का पानी था, चमड़े का रंग से रँगा हुआ पानी था लेकिन रैदासजी के करकमलों के स्पर्श को प्राप्त हुआ था, उनकी कृपादृष्टिवाला पानी था एवं उसमें उनका सत्य संकल्प भी था तो उसका प्रभाव पड़ा।

सुजलु ने कहाः “आप मेरे पास शांति लेने आये हैं ? आपकी कमीज धोकर तो मैं इतनी महान हुई हूँ और आप मुझसे शांति पाना चाहते हैं ?”

राजा की बुद्धि में प्रकाश हुआ किः ʹअरे ! मैंने मिला हुआ मौका खो दिया…. मैं रैदासजी को नहीं पहचान पाया….ʹ

अगर है शौक मिलने का, तो कर खिदमत फकीरों की।

ये जौहर नहीं मिलता, अमीरों के खजाने में।।

संत-महापुरुष का बाह्य वेष या व्यवहार देखकर ही उनके बारे में अनुमान लगा लेने वाले, निंदकों के चक्कर में आने वाले यूँ ही कोरे-के-कोरे रह जाते हैं। उनके कृपा-प्रसाद को तो वे ही पचा पाते हैं जो निरभिमानी होकर उनके श्रीचरणों में नतमस्तक होते हैं।

मीरा ने पहचाना था रैदासजी को। उन्होंने सच्ची श्रद्धा से रैदासजी के श्रीचरणों में सिर झुकाया था और उनकी कृपा-प्रसाद को पचायी थी। उनका मार्गदर्शन पाकर मीरा लाखों विघ्न-बाधाओं के बीच भी मेवाड़ में, प्रभु-प्रेम में मग्न होकर नाचती रहीं, गुनगुनाती रहीं, मुस्कराती रहीं।

छोटी जाति में जन्म लेकर भी रैदास जी ने उन ऊँचाइयों को छुआ था, जहाँ विरले ही पहुँचते हैं। वे स्वयं कहते हैं-

जाति भी ओछि, करम भी ओछा, ओछा किसब हमारा।

नीचे से प्रभु ऊँच कियो है, कह ʹरैदासʹ चमारा।।

उनके ईश्वर प्रेम से परिपूर्ण इस भजन को तो आज भी भारतवासी बड़े प्रेम से गाते हैं-

प्रभु जी ! तुम चंदन हम पानी। जाकी अँग अँग वास समानी।।

प्रभु जी ! तुम घन बन हम मोरा। जैसे चितवत चंद चकोरा।।

प्रभु जी ! तुम दीपक हम बाती। जाकि जोति बरै दिन राती।।

प्रभु जी ! तुम मोती हम धागा। जैसे सोनहिं मिलत सुहागा।।

प्रभु जी ! तुम स्वामी हम दासा। ऐसी भक्ति करै रैदासा।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2001, पृष्ठ संख्या 17-19, अंक 98

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