Yearly Archives: 2010

ग्रीष्म विशेष


(ग्रीष्म ऋतुः 20 अप्रैल से 20 जून तक)

ग्रीष्म में बढ़ने वाली गर्मी, रूक्षता व दुर्बलता को दूर करने के लिए कुछ सरल व अनुभूत प्रयोगः

गर्मीनाशक शरबतः जीरा, सौंफ, धनिया, काली द्राक्ष अथवा किशमिश व मिश्री समभाग लेके कूटकर मिला रखें। एक चम्मच मिश्रण एक ग्लास ठंडे पानी में भिगो दें। 2 घंटे बाद हाथ से मसलकर, छानकर पीयें। पीते ही शीतलता, स्फूर्ति व ताजगी आयेगी।

गर्मी से होने वाली तकलीफों में- दूध में समभाग पानी मिलाकर एक चम्मच घी (हो सके तो गाय का) व मिश्री मिला दें। चुसकी लेते हुए पीयें। इससे शरीर में बल वह स्निग्धता बढ़ेगी। यह प्रयोग गर्मी से भी रक्षा करता है। होनहार माँ अगर पीती है तो बालक व माँ के बल और बुद्धि में इजाफा होगा।

गर्मी एवं पित्तजन्य तकलीफों में- रात को दूध में एक चम्मच त्रिफला घृत (त्रिफला घृत आयुर्वेदिक विश्वसनीय जगह से लेना चाहिए) मिलाकर पीयें। पित्तजन्य दाह, सिरदर्द, आँखों की जलन में आराम मिलेगा।

दोपहर को चार बजे एक चम्मच गुलकंद धीरे धीरे चूसकर खाने से भी लाभ होता है।

लू से बचने हेतुः गुड़ (पुराना गुड़ मिले तो उत्तम) पानी में भिगोकर रखें। एक दो घंटे बाद छान कर पीयें। इससे लू से रक्षा होती है।

प्याज और पुदीना मिलाकर बनायी हुई चटनी भी लू से रक्षा करती है।

ग्रीष्म में शक्तिवर्धकः ठंडे पानी में जौ अथवा चने का सत्तू, मिश्री व घी मिलाकर पीयें। सम्पूर्ण ग्रीष्म में शक्ति बनी रहेगी।

मुँह के छाले व आँखों की जलन में- एक चम्मच (लगभग 5 ग्राम) त्रिफला चूर्ण सुबह मिट्टी के बर्तन में पानी में भिगो दें, शाम को छानकर पीयें। शाम को उसी त्रिफला चूर्ण में पानी मिलाकर रखें, सुबह पी लें। इसी पानी से आँखें धोयें। छाले व जलन कुछ ही समय में गायब हो जायेंगे।

घमौरियाँ दूर करने हेतुः 10 ग्राम नीम के फूल व थोड़ी मिश्री पीसकर, पानी में मिला के पीने से घमौरियाँ दूर हो जायेंगी।

बिन जरूरी प्यास मिटाने हेतुः बार-बार प्यास लगकर बिनजरूरी पानी पीना पड़ता हो तो मिट्टी की पुरानी ईंट को धोकर साफ करके आग में डाल दें। खूब लाल होने पर गाय के दूध से बने दही से बुझा दें। यह दही थोड़ा थोड़ा करके दिन में खा लें। अत्यधिक प्यास लगने की तकलीफ मिट जायेगी।

ग्रीष्म ऋतु में विहारः सुबह 3 बजे से 4 बजे शीतली व चंद्रभेदी प्राणायाम करें। ब्राह्ममुहूर्त में उठकर शीतल हवा में घूमने जायें। बगीचे की घास पर नंगे पैर घूम लें। व्यायाम व परिश्रम कम करें। सिर, आँख व कान की धूप से रक्षा करें। ग्रीष्म में सर्वाधिक बलक्षय होता है, अतः पति पत्नी सहवास से बचें। बल की रक्षा के लिए ब्रह्मचर्य नितांत आवश्यक है।

हृदय व मस्तिष्क की पुष्टि हेतुः भोजन के बीच में आँवले का 30-35 ग्राम रस पानी में मिलाकर 21 दिन पीने से हृदय और मस्तिष्क खूब मजबूत हो जाता है।

हृष्ट-पुष्ट व गोरी संतान पाने हेतुः गर्भिणी रोज प्रातःकाल थोड़ा नारियल और मिश्री चबाके खाये तो गर्भस्थ शिशु हृष्ट पुष्ट और गोरा होता है। (अष्टमी को नारिय खाना वर्जित है।)

सुंदर व तीव्रबुद्धि संतान प्राप्त करने हेतुः गर्भिणी गर्मियों में 100 ग्राम गाय के दूध में 100 ग्राम पानी मिलाकर एक चम्मच गाय का घी मिला के पीये तो पेट में जो शिशु बढ़ रहा है वह कोमल त्वचा वाला, सुंदर, तेजस्वी व बड़ा बुद्धिमान होगा। दूध पीने के 2 घंटे पहले और बाद में कुछ न खायें।

उपर्युक्त प्रयोगों के साथ यदि गर्भिणी स्त्री सत्संग की पुस्तकें पढ़ती है तो शिशु मेधावी व सुसंस्कारी होगा। ऐसे बालकों की विश्व को जरूरत है। गर्भिणी ‘नारायण, शिव-शिव, नारायण-नारायण, हरि, राम-राम, हरि ॐ’ आदि शब्दों का जितना अधिक स्मरण करे उतना ही शिशु होनहार होगा। ऐसे महात्माओं की आवश्यकता है।

पीलिया (कामला में)- नीम के पत्तों का रस 10 ग्राम, मिश्री 5 ग्राम व शहद 10 ग्राम तीनों मिलाकर दिन में तीन बार लेते रहने से पित्तदोष व यकृत (लीवर) की विकृति दूर हो जाती है। इससे पीलिया में यह रामबाण औषधि का काम करता है। (पूज्य बापू जी द्वारा दिया जाने वाला आशीर्वाद मंत्र भी पीलिया में परम लाभदायी है।)

पुराने बुखार में- तुलसी के ताजे पत्ते 6, काली मिर्च और मिश्री 10 ग्राम ये तीनों पानी के साथ पीस कर घोल बना के बीमार व्यक्ति को पिला दें। कितना भी पुराना बुखार हो, कुछ हो दिन यह प्रयोग करने से सदा के लिये मिट जायेगा।

गले में कफ जमा होने परः जरा सा सेंधा नमक धीरे धीरे चूसने से लाभ होता है। सुबह कोमल सूर्यकिरणों में बैठके दायें नाक से श्वास लेकर सवा मिनट रोकें और बायें से छोड़ें। ऐसा 3-4 बार करें। इससे कफ की शिकायतें दूर होंगी।

गर्मियों में वरदान स्वरूप

हरड़ रसायन योग

लाभः यह सरल योग ग्रीष्म ऋतु (20 अप्रैल से 20 जून तक) में स्वास्थ्य-रक्षा हेतु परम लाभदायी है। यह त्रिदोषशामक व शरीर को शुद्ध करने वाला उत्तम रसायन योग है। इसके सेवन से अजीर्ण, अम्लपित्त, संग्रहणी, उदरशूल, अफरा, कब्ज आदि पेट के विकार दूर होते हैं। छाती व पेट में संचित कफ नष्ट होता है, जिसमें श्वास, खाँसी व गले के विविध रोगों में भी लाभ होता है। इसके नियमित सेवन से बवासीर, आमवात, वातरक्त(), कमरदर्द, जीर्णज्वर, किडनी (गुर्दे) के रोग, पाण्डुरोग (पीलिया, रक्त की कमी) व यकृत के विकारों में लाभ होता है। यह हृदय के लिए बलदायक व श्रमहर है।

विधिः 100 ग्राम गुड़ में थोड़ा सा पानी मिलाकर गाढ़ी चाशनी बना लें। इसमें 100 ग्राम हरड़ का चूर्ण मिलाकर 1-1 ग्राम की गोलियाँ बना लें। प्रतिदिन 1 गोली चूसकर अथवा पानी से लें। यदि शरीर मोटा है तो 1 से 4 ग्राम दिन भर में चूस सकते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2010, पृष्ठ संख्या 20,21 अंक 208

अक्षय फलदायिनीः अक्षय तृतिया

16 मई 2010

अक्षय तृतिया को दिये गये दान, किये गये स्नान, जप, तप व हवन आदि शुभ कर्मों का अनंत फल मिलता है।

स्नात्वा हुत्वा च दत्वा च जप्त्वानन्तफलं लभेत्।

‘भविष्य पुराण’ के अनुसार इस तिथि को किये गये सभी कर्मों का फल अक्षय हो जाता है, इसलिए इसका नाम ‘अक्षय’ पड़ा है। ‘मत्स्य पुराण’ के अनुसार इस तिथि का उपवास भी अक्षय फल देता है। त्रेतायुग का प्रारम्भ इसी तिथि से हुआ है। इसलिए यह समस्त पापनाशक तथा सर्वसौभाग्य-प्रदायक है। वर्ष के साढ़े तीन मुहूर्तों में भी इसकी गणना होती है।

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

बहुरत्ना वसुंधरा


मानव के जीवन में संसारी चीजों की कीमत तब तक होती है, जब तक उसको अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य का पता नहीं होता। जब उसे किन्हीं ब्रह्मनिष्ठ सदगुरु से दीक्षा-शिक्षा मिल जाती है, जीवन के वास्तविक उद्देश्य का पता चल जाता है और गुरुमंत्ररूपी अमूल्य रत्न मि जाता है तो फिर उसके जीवन में और किसी चीज की कीमत नहीं रह जाती। मेवाड़ की महारानी मीराबाई के जीवन में धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, परंतु जब उन्हें गुरु से भगवन्नाम की दीक्षा मिली तब वे कहती हैं-

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।

वस्तु अमोलक दी मेरे सदगुरु

कृपा करी अपनायो,

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।।

ऐसे ही भक्त पुरंदरदासजी के जीवन में भी देखने को मिलता है।

एक बार राजा कृष्णदेव के निमंत्रण पर भक्त पुरंदरदासजी राजमहल में पधारे। जाते समय राजा ने दो मुट्ठी चावल उनकी झोली में डालते हुए कहाः “महाराज ! इस छोटी सी भेंट को स्वीकार कर मुझे अनुगृहीत करें।” राजा ने उन चावलों में कुछ हीरे मिला दिये थे।

पुरंदरदास जी की पत्नी ने घर पर चावल साफ करते समय देखा कि उनमें कुछ बहुमूल्य रत्न भी हैं तो उन्हें अलग कर कूड़ेदान में फेंक दिया।

पुरंदरदासजी प्रतिदिन दरबार में जाते थे। राजा सदैव ही उन्हें दो मुट्ठी चावल के साथ हीरे मिलाकर दे देता पर मन में सोचता कि ‘पुरंदरदास जी धन के लालच से मुक्त नहीं हैं। यदि वे मुक्त होते तो प्रतिदिन भिक्षा के लिए दरबार में क्यों आते !’

एक दिन राजा ने कहाः ”भक्तराज ! लालच मनुष्य को आध्यात्मिक उपलब्धियों से दूर कर देता है। अब आप स्वयं ही अपने विषय में विचार करें।”

राजा के मुख से यह बात सुनकर भक्त पुरंदरदास जी को बड़ा दुःख हुआ। वे अगले दिन राजा को अपना घर दिखाने ले गये। उस समय पुरंदरदासजी की पत्नी थाली में चावल फैलाकर साफ कर दी थी। राजा ने पूछाः “देवि ! आप क्या कर रही हो ?”

वह बोलीः “महाराज ! कोई व्यक्ति भिक्षा में चावल के साथ कुछ बहुमूल्य रत्न मिलाकर हमें देता है। मैं उन पत्थरों को निकालकर अलग कर रही हूँ।”

“फिर क्या करेंगी उनका ?”

“घर के बाहर कूड़ेदान में फेंक दूँगी। हमारे लिए इन पत्थरों का कोई मूल्य नहीं है।”

राजा ने उन सभी बहुमूल्य रत्नों को कूड़ेदान में पड़े देखा तो आश्चर्यचकित रह गया और भक्त-दम्पत्ति के चरणों में गिर पड़ा।

बहुरत्ना वसुंधरा…. यह वसुन्धरा, यह भारतभूमि ऐसे बहुविध मानव-रत्नों से सुशोभित है। धन संग्रह से अलिप्त, बहुमूल्य रत्नों से सुशोभित है। धनसंग्रह से अलिप्त, बहुमूल्य रत्नों में पत्थरबुद्धि रखने वाले भक्त पुरंदरदासजी व उनकी पत्नी जैसे भक्त भी यहाँ हुए हैं और लोक-मांगल्य के लिए धन का सदुपयोग कर सदज्ञान, सत्सेवा, सदाचार की विशाल पावन सरिता बहाने वाले संत एकनाथजी आदि महापुरुष भी इसी धरा पर हुए हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2010, पृष्ठ संख्या 9, अंक 208

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

अधिक मास का माहात्म्य


(अधिक मासः 15 अप्रैल 2010 से 15 मई 2010)

अधिक मास में सूर्य की संक्रान्ति (सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश) न होने के कारण इसे ‘मलमास (मलिन मास) कहा गया। स्वामीरहित होन से यह मास देव-पितर आदि की पूजा तथा मंगल कर्मों के लिए त्याज्य माना गया। इससे लोग इसकी घोर निंदा करने लगे।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहाः “मैं इसे सर्वोपरि – अपने तुल्य करता हूँ। सदगुण, कीर्ति, प्रभाव, षडैश्वर्य, पराक्रम, भक्तों को वरदान देने का सामर्थ्य आदि जितने गुण मुझमें हैं, उन सबको मैंने इस मास को सौंप दिया।

अहमेते यथा लोके प्रथितः पुरुषोत्तमः।

तथायमपि लोकेषु प्रथितः पुरुषोत्तमः।।

उन गुणों के कारण जिस प्रकार मैं वेदों, लोकें और शास्त्रों में ‘पुरुषोत्तम’ नाम से विख्यात हूँ, उसी प्रकार यह मलमास भी भूतल पर ‘पुरुषोत्तम’ नाम से प्रसिद्ध होगा और मैं स्वयं इसका स्वामी हो गया हूँ।”

इस प्रकार अधिक मास, मलमास, ‘पुरुषोत्तम मास’ के नाम से विख्यात हुआ।

भगवान कहते हैं- ‘इस मास में मेरे उद्देश्य से जो स्नान (ब्राह्ममुहूर्त में उठकर भगवत्स्मरण करते हुए किया गया स्नान), दान, जप, होम, स्वाध्याय, पितृतर्पण तथा देवार्चन किया जाता है, वह सब अक्षय हो जाता है। जो प्रमाद से इस बात को खाली बिता देते हैं, उनका जीवन मनुष्यलोक में दारिद्रय, पुत्रशोक तथा पाप के कीचड़ से निंदित हो जाता है इसमें संदेह नहीं है।

सुगंधित चंदन, अनेक प्रकार के फूल, मिष्टान्न, नैवेद्य, धूप, दीप आदि से लक्ष्मी सहित सनातन भगवान तथा पितामह भीष्म का पूजन करें। घंटा, मृदंग और शंख की ध्वनि के साथ कपूर और चंदन से आरती करें। ये न हों तो रूई की बत्ती से ही आरती कर लें। इससे अनंत फल की प्राप्ति होती है। चंदन, अक्षत और पुष्पों के साथ ताँबे के पात्र में पानी रखकर भक्ति से प्रातःपूजन के पहले या बाद में अर्घ्य दें। अर्घ्य देते समय भगवान ब्रह्माजी के साथ मेरा स्मरण करके इस मंत्र को बोलें-

देवदेव महादेव प्रलयोत्पत्तिकारक।

गृहाणार्घ्यमिमं देव कृपां कृत्वा ममोपरि।।

स्वयम्भुवे नमस्तुभ्यं ब्रह्मणेऽमिततेजसे।

नमोऽस्तुते श्रियानन्त दयां कुरु ममोपरि।।

‘हे देवदेव ! हे महादेव ! हे प्रलय और उत्पत्ति करने वाले ! हे देव ! मुझ पर कृपा करके इस अर्घ्य को ग्रहण कीजिए। तुझ स्वयंभू के लिए नमस्कार तथा तुझ अमिततेज ब्रह्मा के लिए नमस्कार। हे अनंत ! लक्ष्मी जी के साथ आप मुझ पर कृपा करें।’

पुरुषोत्तम मास का व्रत दारिद्रय, पुत्रशोक और वैधव्य का नाशक है। इसके व्रत से ब्रह्महत्या आदि सब पाप नष्ट हो जाते हैं।

विधिवत् सेवते यस्तु पुरुषोत्तममादरात्।

फुलं स्वकीयमुदधृत्य मामेवैष्यत्यसंशयम्।।

प्रति तीसरे वर्ष में पुरुषोत्तम मास के आगमन पर जो व्यक्ति श्रद्धा-भक्ति के साथ व्रत, उपवास, पूजा आदि शुभकर्म करता है, वह निःसन्देह अपने समस्त परिवार के साथ मेरे लोक में पहुँचकर मेरा सान्निध्य प्राप्त करता है।”

इस महीने में केवल ईश्वर के उद्देश्य से जो जप, सत्संग व सत्कथा – श्रवण, हरिकीर्तन, व्रत, उपवास, स्नान, दान या पूजनादि किये जाते हैं, उनका अक्षय फल होता है और व्रती के सम्पूर्ण अनिष्ट हो जाते हैं। निष्काम भाव से किये जाने वाले अनुष्ठानों के लिए यह अत्यंत श्रेष्ठ समय है। ‘देवी भागवत’ के  अनुसार यदि दान आदि का सामर्थ्य न हो तो संतों-महापुरुषों की सेवा सर्वोत्तम है, इससे तीर्थस्नानादि के समान फल प्राप्त होता है।

इस मास में प्रातःस्नान, दान, तप नियम, धर्म, पुण्यकर्म, व्रत-उपासना तथा निःस्वार्थ नाम जप – गुरुमंत्र का जप अधिक महत्त्व है।

इस महीने में दीपकों का दान करने से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। दुःख – शोकों का नाश होता है। वंशदीप बढ़ता है, ऊँचा सान्निध्य मिलता है, आयु बढ़ती है। इस मास में आँवले और तिल का उबटन शरीर पर मलकर स्नान करना और आँवले के वृक्ष के नीचे भोजन करना यह भगवान श्री पुरुषोत्तम को अतिशय प्रिय है, साथ ही स्वास्थ्यप्रद और प्रसन्नताप्रद भी है। यह व्रत करने वाले लोग बहुत पुण्यवान हो जाते है।

अधिक मास में वर्जित

इस मास में सभी सकाम कर्म एवं व्रत वर्जित हैं। जैसे – कुएँ, बावली, तालाब और बाग आदि का आरम्भ तथा प्रतिष्ठा, नवविवाहिता वधू का प्रवेश, देवताओं का स्थापन (देवप्रतिष्ठा), यज्ञोपवीत संस्कार, विवाह, नामकर्म, मकान बनाना, नये वस्त्र एवं अलंकार पहनना आदि।

अधिक मास में करने योग्य

प्राणघातक रोग आदि की निवृत्ति के लिए रूद्रजप आदि अनुष्ठान, दान व जप-कीर्तन आदि, पुत्रजन्म के कृत्य, पितृमरण के श्राद्धादि तथा गर्भाधान, पुंसवन जैसे संस्कार किये जा सकते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2010, पृष्ठ संख्या 13, अंक 208

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ