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अनोखी युक्ति, डायबिटीज से मुक्ति


मैंने पूज्य बापू जी से सन् 2006 में रीवा (म.प्र.) में मंत्रदीक्षा ली थी। कुछ समय से मुझे डायबिटीज (मधुमेह) की बीमारी थी। शुगर 250 युनिट हो गयी थी। पूज्य बापू जी ने डायबिटीजवालों के लिए एक प्रयोग बताया था कि 500 ग्राम करेले (सस्ते वाले, 2 रूपये किलोवाले भी चलेंगे) काटकर किसी चौड़े बर्तन में रख लें और 45 से 60 मिनट तक उन्हें पैरों से कुचलें। यह प्रयोग सात से दस दिन करें। उन दिनों मेथी की सब्जी खायें तो और अच्छा। इससे डायबिटीज की तकलीफ ठीक हो जायेगी। मैंने श्रद्धापूर्वक यह प्रयोग किया और फिर जब टेस्ट कराया तो रिपोर्ट में शुगर एकदम सामान्य थी। मुझे ऐसा लगा कि बापूजी ने मुझे नया जीवन दिया है।

तब से मैं मेरे सम्पर्क में आने वाले सभी डायबिटीज वालों को अपनी आपबीती बताता हूँ और यह प्रयोग करने को कहता हूँ। यहाँ तक कि डायबिटीज से पीड़ित एक डॉक्टर को भी यह प्रयोग बताया और उन्हें लाभ हुआ। इस प्रयोग से अनेक लोगों को लाभ हुआ है।

जाति-पाँति, सम्प्रदाय और मत-पंथ की सीमारेखाओं से दूर सबका मंगल चाहने वाले, सबका हित करने वाले ऐसे सदगुरुदेव पूज्य बापूजी के श्रीचरणों में मेरे कोटि-कोटि प्रणाम !

घनश्यामदास अग्रवाल, सतना (म.प्र.)

मो. 09406724984

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2010, पृष्ठ संख्या 30, अंक 207.

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ऐसी हो गुरु में निष्ठा


पुराणों में एक कथा आती है कि-

भगवान शिवजी ने पार्वती से कहा हैः

आकल्पजन्मकोटीनां यज्ञव्रततपः क्रियाः।

ताः सर्वाः सफला देवि गुरुसंतोषमात्रतः।।

‘हे देवी ! कल्पपर्यन्त के, करोड़ों जन्मों के यज्ञ, व्रत, तप और शास्त्रोक्त क्रियाएँ – ये सब गुरुदेव के संतोषमात्र से सफल हो जाते हैं।’

शिष्य को गुरु की ऐसी सेवा करनी चाहिए कि गुरु प्रसन्न हो जाएँ, उनका संतोष प्राप्त हो जाये। कोई भी कार्य ऐसा न हो जिससे गुरु नाराज हों। हमें हमारा सेवाकार्य इतने सुंदर ढंग से करना चाहिए कि कहीं कोई कमी न रह जाये और गुरुदेव की प्रसन्नता भी स्वाभाविक ही प्राप्त कर लें। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि गुरु अपने शिष्यों की गुरुभक्ति की, निष्ठा की परीक्षा भी लिया करते है, जैसे संदीपक और उसके गुरुभाइयों की परीक्षा उनके गुरु ने ली थी।

प्राचीन काल में गोदावरी नदी के किनारे वेदधर्म मुनि के आश्रम में उनके शिष्य वेद-शास्त्रादि का अध्ययन करते थे। एक दिन गुरु ने अपने शिष्यों की गुरुभक्ति की परीक्षा लेने का विचार किया। सत्शिष्यों में गुरु के प्रति इतनी अटूट श्रद्धा होती है कि उस श्रद्धा को नापने के लिए गुरुओं को कभी-कभी योगबल का भी उपयोग करना पड़ता है।

वेदधर्म मुनि ने अपने शिष्यों को एकत्र करके कहाः ” हे शिष्यों ! पूर्वजन्म में मैंने कुछ पापकर्म किये हैं। उनमें से कुछ तो जप-तप, अनुष्ठान करके मैंने काट लिये, अभी थोड़ा प्रारब्ध बाकी है। उसका फल इसी जन्म में भोग लेना जरूरी है। उस कर्म का फल भोगने के लिए मुझे भयानक बीमारी आ घेरेगी, इसलिए मैं काशी जाकर रहूँगा। वहाँ मुझे कोढ़ निकलेगा, अँधा हो जाऊँगा। उस समय मेरे साथ काशी आकर मेरी सेवा कौन करेगा ? है कोई हरि का लाल, जो मेरे साथ रहने के लिए तैयार हो ?”

वेदधर्म मुनि ने परीक्षा ली। शिष्य पहले तो कहा करते थेः “गुरुदेव ! आपके चरणों में हमारा जीवन न्योछावर हो जाये मेरे प्रभु !” अब सब चुप हो गये। गुरु का जयघोष होता है, माल-मिठाइयाँ आती हैं, फूल-फल के ढेर लगते हैं तब बहुत शिष्य होते हैं लेकिन आपत्तिकाल में उनमें से कितने टिकते हैं !

वेदधर्म मुनि के शिष्यों में संदीपक नाम का शिष्य खूब गुरु-सेवापरायण, गुरुभक्त एवं कुशाग्र बुद्धिवाला था। उसने कहाः “गुरुदेव ! यह दास आपकी सेवा में रहेगा।”

गुरुदेवः “इक्कीस वर्ष तक सेवा के लिए रहना होगा।”

संदीपकः “इक्कीस वर्ष तो क्या मेरा पूरा जीवन ही अर्पित है। गुरुसेवा में ही इस जीवन की सार्थकता है।”

वेदधर्म मुनि एवं संदीपक काशी नगर में मणिकर्णिका घाट से कुछ दूर रहने लगे। संदीपक सेवा में लग गया। प्रातः काल में गुरु की आवश्यकता के अनुसार दातुन-पानी, स्नान-पूजन, वस्त्र-परिधान इत्यादि की तैयारी पहले से ही करके रखता। समय होते ही भिक्षा माँगकर लाता और गुरुदेव को भोजन कराता। कुछ दिन बाद गुरु के पूरे शरीर में कोढ़ निकला और संदीपक की अग्निपरीक्षा शुरु हो गयी। गुरु कुछ समय बाद अंधे हो गये। शरीर कुरूप और स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया। संदीपक के मन में लेशमात्र भी क्षोभ नहीं हुआ। वह दिन-रात गुरुजी की सेवा में तत्पर रहने लगा। वह कोढ़ के घावों को धोता, साफ करता, दवाई लगाता, गुरु को नहलाता, कपड़े धोता, आँगन बुहारता, भिक्षा माँगकर लाता और गुरुजी को भोजन कराता।

गुरुजी को मिजाज और भी क्रोधी एवं चिड़चिड़ा हो गया। वे गाली देते, डाँटते, तमाचा मार देते, डंडे से मारपीट करते और विविध प्रकार से परीक्षा लेते। संदीपक खूब शांति से, धैर्य से यह सब सहते हुए दिन प्रतिदिन ज्यादा तत्परता से गुरु की सेवा में मग्न रहने लगा। धनभागी संदीपक के हृदय में गुरु के प्रति भक्तिभाव अधिकाधिक गहरा और प्रगाढ़ होता गया।

संदीपक की ऐसी अनन्य गुरुनिष्ठा देखकर काशी के अधिष्ठाता देव भगवान विश्वनाथ उसके समक्ष प्रकट हो गये और बोलेः “तेरी गुरुभक्ति एवं गुरुसेवा देखकर हम प्रसन्न हैं। जो गुरु की सेवा करता है वह मानो मेरी ही सेवा करता है। जो गुरु को संतुष्ट करता है वह मुझे ही संतुष्ट करता है। इसलिए बेटा ! कुछ वरदान माँग ले।” संदीपक ने अपने गुरु की आज्ञा के बिना कुछ भी माँगने से मना कर दिया। शिवजी ने फिर से आग्रह किया तो संदीपक गुरु से आज्ञा लेने गया और बोलाः “शिवजी वरदान देना चाहते है। आप आज्ञा दें तो मैं वरदान माँग लूँ कि आपका रोग एवं अंधेपन का प्रारब्ध समाप्त हो जाये।”

गुरु ने संदीपक को खूब डाँटते हुए कहाः “सेवा करते-करते थका है इसलिए वरदान माँगता है कि मैं अच्छा हो जाऊँ और सेवा से तेरी जान छूटे ! अरे मूर्ख ! जरा तो सोच कि मेरा कर्म कभी न कभी तो मुझे भोगना ही पड़ेगा।”

इस जगह पर कोई आधुनिक शिष्य होता तो गुरु को आखिरी नमस्कार करके चल देता। संदीपक वापस शिवजी के पास गया और वरदान के लिए मना कर दिया। शिवजी आश्चर्यचकित हो कि कैसा निष्ठावान शिष्य है ! शिवजी गये विष्णुलोक में और भगवान विष्णु से सारा वृत्तान्त कहा। भगवान विष्णु भी संतुष्ट हो संदीपक के पास वरदान देने के लिए प्रकटे।

गुरुभक्त संदीपक ने कहाः “प्रभु ! मुझे कुछ नहीं चाहिए।” भगवान ने फिर से आग्रह किया तो संदीपक ने कहाः “आप मुझे यही वरदान दें कि गुरु में मेरी अटल श्रद्धा बनी रहे। गुरुदेव की सेवा में निरंतर प्रीति रहे, गुरुचरणों में दिन-प्रतिदिन भक्ति दृढ़ होती रहे। इसके अलावा मुझे और कुछ नहीं चाहिए।” ऐसा सुनकर भगवान विष्णु ने संदीपक को गले लगा लिया।

जब तक गुरू का हृदय शिष्य पर संतुष्ट नहीं होता, तब तक शिष्य में ज्ञान प्रकट नहीं होता। उसके हृदय में गुरु का ज्ञानोपदेश पचता नहीं है। गुरु का संतोष ही शिष्य की परम उपासना है, परम साधना है। गुरु को जो संतुष्य करता है, प्रसन्न करता है उस पर सब संतुष्ट हो जाते हैं। गुरुद्रोही पर विश्वात्मा हरि रूष्ट होते हैं। आज संदीपक जैसे सत्शिष्यों की गाथा का वर्णन सत्शास्त्र कर रहे हैं। धन्य हैं ऐसे सत्शिष्य !

संदीपक ने जाकर देखा तो वेदधर्म मुनि स्वस्थ बैठे थे। न कोढ़, न कोई अंधापन, न अस्वस्थता ! शिवस्वरूप सदगुरु श्री वेदधर्म ने संदीपक को अपनी तात्त्विक दृष्टि एवं उपदेश से पूर्णत्व में प्रतिष्ठित कर दिया। वे बोलेः “वत्स ! धन्य है तेरी निष्ठा और सेवा ! जो इस प्रसंग को पढ़ेंगे, सुनेंगे अथवा सुनायेंगे, वे महाभाग मोक्ष-पथ में अडिग हो जायेंगे। पुत्र संदीपक ! तुम धन्य हो ! तुम सच्चिदानन्दस्वरूप हो।”

गुरु के संतोष से संदीपक गुरुतत्त्व में जग गया, गुरुस्वरूप हो गया।

अपनी श्रद्धा को कभी भी, कैसी भी परिस्थिति में गुरु पर से तनिक भी कम नहीं करना चाहिए। गुरु परीक्षा लेने के लिए कैसी भी लीला कर सकते हैं। निजामुद्दीन औलिया ने भी अपने चेलों की परीक्षा ली थी। खास-खास 24 चेलों में से भी 2-2 करके फिसलते गये। आखिरी ऊँचाई तक अमीर खुसरो ही डटे रहे। संदीपक की तरह वे अपने सदगुरु की पूर्ण कृपा को पचाने में सफल हुए।

गुरू आत्मा में अचल होते हैं, स्वरूप में अचल होते हैं। जो हमको संसार-सागर से तारकर परमात्मा में मिला दें, जिनका एक हाथ परमात्मा में हो और दूसरा हाथ जीव की परिस्थितियों में हो, उन महापुरुषों का नाम सदगुरु है।

सदगुरु मेरा सूरमा, करे शब्द की चोट।

मारे गोला प्रेम का, हरे भरम की कोट।।

गुरु गोबिन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय।

बलिहारी गुरु आपने, गोबिन्द दियो बताय।।

(प्रेषकः आर.सी. मिश्र)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2010, पृष्ठ संख्या 13,14. अंक 207.

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शरीर के साथ दिल को भी रंग लो


(होलीः 28 फरवरी)

पूज्य बापू जी

‘होली’ भारतीय संस्कृति की पहचान कराने वाला एक पुनीत पर्व है। यह पारस्परिक भेदभाव मिटाकर प्रेम व सदभाव प्रकट करने का एक सुंदर अवसर है, अपने दुर्गुणों तथा कुसंस्कारों की आहुति देने का एक यज्ञ है तथा अंतर में छुपे हुए प्रभुत्व को, आनंद को, निरहंकारिता, सरलता और सहजता के सुख को उभारने का उत्सव है।

होली का यह उत्सव हम प्राचीनकाल से मनाते आ रहे हैं। भगवान शिवजी ने इस दिन कामदहन किया था और होलिका, जिसको वरदान था न जलने का, प्रह्लाद को लेकर अग्नि की ज्वालाओं के बीच बैठी थी। वह होलिका जल गयी तथा भक्तिसम्पन्न प्रह्लाद अमरता के गीत गुँजाने में सफल हुए अर्थात् निर्दोष भक्ति के बल से वे धधकती अग्नि में भी सुरक्षित रहे। तो यह उत्सव खबर देता है कि तामसी व्यक्ति के पास कितना भी बल हो, कितना भी सामर्थ्य हो सज्जनों को डरना चाहिए। भले सज्जन नन्हें-मुन्ने दिखते हो, प्रह्लाद की नाईं छोटे दिखते हों फिर भी वे बड़े में बड़े ईश्वर का आश्रय लेकर कदम आगे बढ़ायें।

विघ्न-बाधा हमें दबोच सके,

यह उसमें दम नहीं।

हमें दबा सके यह जमाने में दम नहीं।

हमसे जमाना है जमाने से हम नहीं।।

ये पंक्तियाँ प्रह्लाद, मीरा, शबरी, तुकारामजी आदि-आदि सत्संगनिष्ठों के जीवन में साकार पायी गयीं।

हो….ली…. जो बीत गयी उस कमजोरी को याद न कर। आने वाले भविष्य का भय मत कर। चरैवति…..चरैवति……आगे बढ़ो…..आगे बढ़ो…..

यह होली का उत्सव तुम्हारे छुपे हुए आत्मिक रस को जगाने वाला है। लोग कुत्ते और बिल्लियों से रस लेने के लिए उन्हें पालते है और न जाने टी-गौंडी आदि कितने जीवाणुओं की हानियाँ अपने जीवन में ले आते हैं। बिल्ली के पेट में पाये जाने वाले टी-गौंडी जीवाणु कमजोर मानसिकता वाले को, गर्भवती महिला को और शिशु को नुकसान पहुँचाते हैं। मानव रस खोजने के लिए बिल्ली की शरण को जाता है, कुत्ते की शरण जाता है, पान-मसाला, शराब-कबाब की शरण जाता है, क्लबों की शरण जाता है, और भी न जाने किस-किस की शरण जाता है। होलिकोत्सव बोलता हैः नहीं !

तमेश शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।

तुम सर्वभाव से अपने आत्मसुख की शरण आओ, आत्मप्रकाश की शरण आओ। घबराओ मत लाला-लालियाँ ! होली – हो… ली….।

मुस्कराके गम का जहर जिनको पीना आ गया।

यह हकीकत है कि जहाँ में उनको जीना आ गया।।

हर इन्सान चाहता है जीवन रसमय हो, जीवन प्रेममय हो, जीवन निरोगता से छलके तो आपसी राग-द्वेष भूलकर-

तुझमें राम मुझमें राम सबमें राम समाया है।

कर लो सभी से स्नेह जगत में कोई नहीं पराया है।।

भारतीय संस्कृति के ये पावन त्यौहार एवं मनाने के तरीके केवल मन की प्रसन्नता ही नहीं बढ़ाते, तन की तंदरूस्ती एवं बुद्धि में बुद्धिदाता की खबर भी देते हैं।

गर्मी के दिनों में सूर्य की किरणें हमारी त्वचा पर सीधी पड़ती हैं, जिससे शरीर में गर्मी बढ़ती है। हो सकती है कि शरीर में गर्मी बढ़ने से गुस्सा बढ़ जाय, स्वभाव में खिन्नता आ जाय। इसीलिए होली के दिन प्राकृतिक पुष्पों का रंग एकत्र करके एक दूसरे पर डाला जाता है, ताकि हमारे शरीर की गर्मी सहन करने की क्षमता बढ़ जाये और सूर्य की तीक्ष्ण किरणों का उस पर विकृत असर न पड़े।

हम पर्वों को तो मनाते हैं परंतु पर्वों के जो सिद्धान्त हैं उनसे हम मीलों दूर रह जाते हैं। हमारे ऋषियों ने जिस उद्देश्य से त्यौहारों की नीति बनायी, उसका यथार्थ लाभ न लेकर हम उन्हें अपनी वासना के अनुसार मना लेते हैं।

ऋतु-परिवर्तनकाल के इस त्यौहार पर प्रकृति की मादकता छायी रहती है। वैदिक काल में शरीर को झकझोरने वाली सूर्य की तीक्ष्ण किरणों से टक्कर लेने के लिए पलाश के फूलों का रस लिया जाता था। यह रोगप्रतिकारक शक्ति, सप्तधातु और सप्तरंगों को संतुलित रखने की व्यवस्था थी। पलाश के फूल हमारे तन, मन, मति और पाचन-तंत्र को पुष्ट करते हैं। पलाश वृक्ष के पत्तों पर भोजन करने वाले को भी स्वास्थ्य लाभ के साथ पुण्य लाभ व सत्त्वगुण बढ़ाने में मदद मिलती है।

ऋतु परिवर्तन के इन 10-20 दिनों में नीम के 15-20 कोमल पत्तों के साथ 2 काली मिर्च चबाकर खाने से भी वर्ष भर आरोग्य दृढ़ होता है। बिना नमक का भोजन 15 दिन लेने वाले की आयु और प्रसन्नता में बढ़ोतरी होती है। होली के बाद खजूर खाना मना है।

होली की रात्री चार पुण्यप्रद महारात्रियों में आती है। होली की रात्रि का जागरण और जप बहुत ही फलदायी होता है। इसलिए इस रात्रि में जागरण और जप कर सभी पुण्य लाभ लें। यह उत्सव रंग के साथ अंतर चेतना, आंतर-आराम और अंतरात्मा की प्रीति देने वाला है।

हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को आग में न जलने का वरदान मिला था। चिता में बैठी हुई उस होलिका की गोद में प्रह्लाद को बिठा दिया गया और चिता को आग लगा दी गयी। परंतु यह क्या ! जिसे न जलने का वरदान प्राप्त था वह होलिका जल गयी और प्रह्लाद जीवित रह गये ! बिल्कुल उलटा हो गया क्योंकि प्रह्लाद सत्य की शरण थे, ईश्वर की शरण थे।

संत कहते हैं कि यह जीव प्रह्लाद है। हिरण्यकशिपु यानी अंधी महत्वाकांक्षा, वासना जो संसार में रत रहने के लिए उकसाती रहती है। होलिका यानी अज्ञान, अविद्या जो जीव को अपनी गोद में बिठाकर रखती है तथा उसे संसार की त्रिविध तापरूपी अग्नि में जलाना चाहती है। यदि यह जीवरूपी प्रह्लाद ईश्वर और सदगुरु की शरण में जाता है तो उनकी कृपा से प्रकृति का नियम बदल जाता है। त्रिविध तापरूपी अग्नि ज्ञानाग्नि के रूप में परिवर्तित हो जाती है। उस ज्ञान की आग से अज्ञानरूपी होलिका भस्म हो जाती है तथा जीवरूपी प्रह्लाद मुक्त हो जाता है। यही होली का तत्त्व है।

होली रंग का त्यौहार है। रंग जरूर खेलो, मगर गुरूज्ञान का रंग खेलो। रासायनिक रंगों से तो हर साल होली खेलते हो, इस बार गुरूज्ञान के रंग से अपने हृदय को रँग लो तो तुम भी कह उठोगेः

भोला ! भली होली हुई,

भ्रम भेद कूड़ा बह गया।

नहिं तू रहा नहिं मैं रहा,

था आप सो ही रह गया।।

होली यानी जो हो… ली…. कल तक जो होना था, वह हो लिया। आओ, आज एक नयी जिंदगी की शुरुआत करें। जो दीन-हीन हैं, शोषित है, उपेक्षित है, पीड़ित है, अशिक्षित है, समाज के उस अंतिम व्यक्ति को भी सहारा दें। जिंदगी का क्या भरोसा ! कुछ काम ऐसे कर चलो कि हजारों दिल दुआएँ देते रहें… चल पड़ो उस पथ पर, जिस पर चलकर कुछ दीवाने प्रह्लाद बन गये। करोगे न हिम्मत ! तो उठो और चल पड़ो प्रभुप्राप्ति, प्रभुसुख, प्रभुज्ञान, प्रभुआनंद प्राप्ति के पुनीत पथ पर…..

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2010, पृष्ठ संख्या 10,11,16, अंक 206

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