Yearly Archives: 2013

आत्मविकास के 15 साधन – पूज्य बापू जी


आत्मविकास करना हो, आत्मबल बढ़ाना हो और अपना कल्याण करना हो तो विद्यार्थियों को 15 बातों पर ध्यान देना चाहिए।

संकल्पः संकल्प में अथाह सामर्थ्य है। दृढ़ संकल्पवान मनुष्य हर क्षेत्र में सफल और हर किसी का प्यारा हो सकता है। आत्मबल बढ़ाने के लिए कोई भी छोटा-मोटा जो जरूरी है, वह संकल्प करें।

दृढ़ताः अपनी योग्यता, आवश्यकता और बलबूते अनुसार संकल्प करें और फिर छोड़ें नहीं, उसको पूरा करें। मैं हिमालय में एक ऐसी जगह पर पहुँचा कि जहाँ 15-20 कदम चलो तो श्वास फूले। ऑक्सीजन कम थी और मेरे पास सामान भी था। मैं बार-बार थोड़ा रूक जाऊँ, सामान रखकर थोड़ा आराम करूँ फिर चलूँ। मुझे जाना था बस पकड़ने के लिए। मैंने सोचा ऐसे रुकते-रुकते जाऊँगा तो बस भी चली जायेगी, रात को ठंड में कहाँ भटकना !ʹ संकल्प किया कि ʹजब तक बस स्टैंड नहीं आयेगा तब तक हाथ में से सामान नीचे नहीं रखूँगा।ʹ शक्ति (बलबूते) के अनुसार थोड़ा दम तो मारना पड़ा लेकिन कैसे भी करके वहाँ पहुँच गये। दृढ़ता से कार्य सम्पादन करने पर संतोष होता है। जो भी अच्छा काम ठान लें, बस उसमें दृढ़ रहें। इससे आत्मबल बढ़ता है और आत्मबल बढ़ने से संकल्प फलित होता है।

निर्भयताः भय मृत्यु है, निर्भयता ही जीवन है। दुर्बलता को अपने जीवन में स्थान मत दो। जो डरता है उसे दुनिया डराती है। भय आते ही ʹभय मन में है, मैं निर्भय हूँ।ʹ – ऐसे शुद्ध ज्ञान के विचार करो। छोटी सी पुस्तक ʹजीवन रसायनʹ जेब में रखो और बार-बार पढ़ो। यह तुम्हें निर्भिक व निर्दुःख बना देगी। जो भी डरपोक हैं, उनको भी ʹजीवन रसायनʹ पुस्तक भेज दो। यह बड़ी सेवा है। जिनके स्वभाव और घर में झगड़ा हो उऩ्हें ʹमधुर व्यवहारʹ पुस्तक, जहाँ मृत्यु और शोक है वहाँ ʹमंगलमय जीवन मृत्युʹ जिनको ईश्वर की ओर बढ़ना है उनको ʹईश्वर की ओरʹ और जिनको जीवन में विकास करना है उनको ʹजीवन विकासʹ पुस्तक पहुँचायें।

ज्ञानः आत्मा-परमात्मा और प्रकृति का ज्ञान पाने से भी आत्मबल बढ़ता है। जब सदगुरु सत्संग से आंतरिक ज्ञान की ज्योति प्रज्जवलित कर देते हैं तो वह पापों को जलाकर जीवन में प्रकाश, शांति और माधुर्य ले आती है।

सत्यस्वरूप परमात्मा का चिंतनः ʹजो साक्षी है, सत् है, चेतन है, जो कभी मरता नहीं, बिछुड़ता नहीं और बेवफाई नहीं कर सकता, उस परमात्मा के साथ मेरा नित्य योग है और मरने, बिछुड़ने, बेवफाई करने वाले संसार और शरीर के साथ नित्य वियोग है।ʹ – ऐसे चिंतन भी आत्मबल विकसित होता है।

श्रद्धाः भगवान, भगव्तप्राप्त महापुरुष, शास्त्र, गुरुमंत्र और अपने-आप पर श्रद्धा आत्मविकास व परम सुख की अमोघ कुंजी है।

ईश्वरीय विकासः सत्संग, भगवन्नाम जप, ध्यान एवं व्रत-उपवास से ईश्वरीय विकास होता है। ईश्वरीय अंश विकसित होने पर समता, नम्रता, प्रसन्नता, उदारता, परोपकार, आत्मबल आदि दैवी गुण स्वाभाविक ही आ जाते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2013, पृष्ठ संख्या 13, अंक 244

ૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐ

सदाचारः जैसा व्यवहार आप दूसरों से अपने प्रति नहीं चाहते हो, वही ʹदुराचारʹ है। जैसा व्यवहार आप दूसरों से अपने प्रति चाहते हो, वही ʹसदाचारʹ है। दूसरों को मान देना, आप अमानी रहना – यह सफलता की कुंजी है। झूठ-कपट, बेईमानी, दुराचार से नहीं, सदाचार से आत्मविकास होता है। बस, आप सत्कर्म करते रहो, सदाचारयुक्त जीवन जियो और अपने आत्मस्वभाव, ʹसोઽहंʹ स्वभाव में स्थित होने का प्रयत्न करते जाओ, इसी से आपका कल्याण होगा।

सच्चाई का आचरणः सत्य, मधुर एवं हितकर वाणी से सदगुणों का पोषण होता है, मन पवित्र व बुद्धि निर्मल बनती है। तुम्हारी वाणी में जितनी सच्चाई होगी उतनी ही तुम्हारी और तुम जिससे बात करते हो उसकी आध्यात्मिक उन्नति होगी।

संयमः जीवन के विकास का मूल संयम है। जिसके जीवन में संयम नहीं है, वह न तो स्वयं की ठीक से उन्नति कर पाता है और न ही समाज में कोई महान कार्य कर पाता है। हाथों-पैरों का संयम, वाणी का संयम, संकल्प-विकल्पों का संयम और ब्रह्मचर्य का पालन-इनसे आत्मविकास होता है। मौन है, नहीं बोलना है तो नहीं बोलना है। एकादशी है, अऩ्न नहीं खाना है तो नहीं खाना है। संकल्प-विकल्प रोकने के लिए बार-बार दीर्घ प्रणव का जप करना चाहिए। आश्रम की पुस्तक ʹदिव्य प्रेरणा प्रकाशʹ में ब्रह्मचर्य के लिए निर्दिष्ट उपायों का अवलम्बन लेकर ब्रह्म परमात्मा में पहुँचना चाहिए। सुबह जल्दी उठें, ध्यान भजन करें, दीर्घ प्रणव का जप करें तो सत्त्वगुण बढ़ जाता है। इससे आत्मविकास होता है।

अहिंसाः किसी को मन से, शरीर से, वचन से दुःख न पहुँचाना अहिंसा है।

दयाः जो दूसरों का दुःख मिटाकर आनंद पाता है, उसको अपना दुःख मिटाने हेतु अलग से मेहनत नहीं करनी पड़ती। यदि तुम्हारा दिल परोपकार की भावना से ओतप्रोत हो, निर्भयता और निष्कामता से भरा हो तो प्रकृति तुम्हारे अनुकूल होने को तत्पर रहती है। इसीलिए सबके मंगल के लिए दयाभाव रखो।

सेवाः महापुरुषों, गुरुओं या किसी की भी निःस्वार्थ सेवा से आत्मबल बढ़ता है। सेवा का अपना आनंद, औदार्य, पुण्य व प्रभाव है। ईमानदारी की सेवा से अंतःकरण शुद्ध होता है। सेवा में दिखावा न हो। आप लौकिक दुनिया में चाहे आध्यात्मिक जगत में, सेवा के बिना प्रगति सम्भव ही नहीं है।

न्यायः न्याय के पक्ष में रहने से भी आत्मबल बढ़ता है। स्वार्थरहित, कामना रहित होकर, दूसरों का हित हो यह ध्यान रख के न्याय करो तो आपको आत्मसंतोष मिलेगा। अपने लिए न्याय, औरों के लिए उदारता की नीति जो बर्तता है, उसका बड़प्पन खूब मिलता है।

परमात्म-प्रेम का विकासः प्रेम में अपनत्व होता है, विश्वास होता है, परमात्मा प्रेम से प्रकट होते हैं। बुद्धि में परमात्म-प्रेम की जागृति ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। परमात्मा में, गुरु में प्रीति करने से आत्मबल, आत्मसुख बहुत बढ़ता है। जितना हम निष्काम, निःस्वार्थ, गुरुप्रेमी, प्रभुप्रेमी होते हैं, उतना ही हमारी बुद्धि में गुरु का, प्रभु का प्रसाद विकसित होता है।

तुम अगर चाहो तो अपने जीवन को उत्साह एवं तत्परता से भरकर भारत माता के महान सुपूत बन सकते हो। तुम ठान लो, प्रतिभा विकसित करो। ईश्वर का असीम बल तुममें छुपा है। ૐ…ૐ..ૐ…ૐ

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2013, पृष्ठ संख्या 11, अंक 245

ૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐ

 

होटलों में और शराब बनाने में बरबाद हो जाता है लाखों लीटर पानी


संत आशारामजी बापू का दो दिवसीय सत्संगः ट्रेन में सवार हो खेली होली

दैनिक भास्कर, जयपुर, 22 मार्च।

संत आशारामजी बापू ने कहा कि फाइव स्टार होटलों में और शराब बनाने में लाखों लीटर पानी बरबाद हो जाता है। हम साल में एक बार पलाश के फूलों की होली खेलते हैं तो हिन्दू विरोधी शक्तियाँ इसे गलत बताती हैं।

रामबाग के एसएमएस इन्वेस्टमेंट ग्राउंड में दो दिवसीय सत्संग व पलाश फूलों के रंग से होली उत्सव में गुरुवार को बापू जी ने कहा कि “हमने पानी का उपयोग मुंबईवासियों के लिए किया है, घर में तो ले नहीं गये। क्रिश्चियन पर्व पर कितनी ही गायें कटती हैं। वेलेन्टाइन डे से कितने ही बच्चे संस्कृति से दूर होते हैं ! होली के त्यौहार का गला घोंटना, दीपावली के पर्व पर प्रदूषण का आकलन करना, हिन्दू पर्वों के साथ कहाँ का न्याय है ? ऐसा करने वाले हिन्दुओं के पर्व को ठेस पहुँचाते हैं।”

फँसाने वाले अब तक आरोपों से बरी नहीं

“बापू को झूठे आरोपों में फँसाने की कोशिश करने वाले अभी तक बरी नहीं हो पा रहे हैं। चाहे वह सुखाराम ठग हो या कोई और। साँच को आँच नहीं। रामसुखदासजी कितने ऊँचे संत थे ! उन पर भी आरोप लगाये गये तो उन पवित्र संत ने अऩ्न-त्याग कर दिया था।”

यदि मेरे पास अरबों की जमीन है तो खरीद लो

पिछले दिनों अरबों की जमीन के मामले में संत आशारामजी बापू ने कहा कि “यदि मेरे पास अरबों की जमीन है तो 1 करोड़ 10 लाख रूपये दे दें और जमीन ले जाओ। दूसरा, गैंग-रेप के मामले में यदि मैंने पीड़िता को दोषी बताया है तो उसे सिद्ध कर दो और पचास लाख रूपये इनाम के ले जाओ। हम तो बार-बार कह चुके हैं लेकिन इन अफवाहों को फैलाने वाले लोग अभी तक सामने ही नहीं आये।”

हिन्दू पर्वों का विरोध हुआ तो वोट बैंक बिगड़ जायेगा

“बापू और बापू के प्यारों को ऐरे-गैरे मर समझना। चंदन से भी आग निकलती है। विदेशी ताकतें हिन्दुस्तान को तोड़ना चाहती हैं। एक भक्त से 20 आदमी जुड़े हैं। यदि ऐसे ही चलता रहा को वोट बैंक बिगड़ जायेगा। हिन्दू धर्म यूरोप, रोम या मिश्र का नहीं है, यह साक्षात् परब्रह्म है, सनातन है। इसको मिटाने वाले खुद मिट जाते हैं।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2013, पृष्ठ संख्या 8, अंक 244

ૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐ

हे युवान ! गुलाम नहीं स्वामी बनो


मैकाले कहा करता थाः “यदि इस देश को हमेशा के लिए गुलाम बनाना चाहते हो तो हिन्दुस्तान की स्वदेशी शिक्षा पद्धति को समाप्त कर उसके स्थान पर अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति लाओ।

फिर इस देश में शरीर से तो हिन्दुस्तानी लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे। जब वे लोग इस इस देश के विश्वविद्यालय से निकल कर शासन करेंगे तो वह शासन हमारे हित में होगा।ʹ यह मैकाले का सपना था। आश्चर्य है कि मैकाले शिक्षा पद्धति से प्रभावित भारतीय युवान आज खुद ही अपने को गुलामी, अनैतिकता, अशांति देने वाले के सपनों को साकार करने में लगा है।

अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के बढ़ते कुप्रभावों से गांधी जी की यह बात प्रत्यक्ष हो रही है कि “विदेशी भाषा ने बच्चों को रट्टू और नकलची बना दिया है तथा मौलिक कार्यों और विचारों के लिए सर्वथा अयोग्य बना दिया है।” अंग्रेजी भाषा और मैकाले शिक्षा-पद्धति की गुलामी का ही परिणाम है कि आज के विद्यार्थियों में उच्छृंखलता, अधीरता व मानसिक तनाव जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं।

ऐसी अंग्रेजी शिक्षा से प्रभावित श्री अरविंदजी के विद्यार्थी राजाराम पाटकर को अपनी स्वतंत्र भाषा छोड़कर अंग्रेजी भाषा पर प्रभुत्व पाने का शौक हुआ। एक दिन मौका देखकर उसने श्री अरविंद जी से पूछाः “सर ! मुझे अपनी अंग्रेजी सुधारनी है, अतः मैं मैकाले पढूँ ?”

श्री अरविंदजी देशभक्त तो थे ही, साथ ही भारत की सांस्कृतिक ज्ञान धरोहर की महिमा का अनुभव किये हुए योगी भी थे। भारत में रहकर जिस थाली में खाया उसी में छेद करने वाले अंग्रेजों की कूटनीति को वो जानते थे। जिनका एकमात्र उद्देश्य भारतीय जनता को प्रलोभन देकर बंदर की तरह जिंदगीभर अपने इशारों पर नचाना था, ऐसे अंग्रेजों की नकल करके विद्यार्थी करें यह श्री अरविंद को बिल्कुल पसंद नहीं था। उन्होंने स्वयं भी अंग्रेजों की अफसरशाही नौकरी से बचने के लिए आई.सी.एस. जैसी पदवी के लिए लैटिन और ग्रीक भाषा में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने पर भी घुड़सवारी की परीक्षा तक नहीं दी थी।

श्री अरविंद का मानना था कि हर व्यक्ति को अपनी सुषुप्त शक्तियों को जगाना ही चाहिए। उन्होंने कड़क शब्दों में कहाः”किसी के गुलाम मत बनो। तुम स्वयं अपने स्वामी बनो।

उसकी सोयी चेतना जाग उठी। अपने सच्चे हितैषी के मार्गदर्शन को शिरोधार्य कर राजाराम ने मैकाले का अनुसरण नहीं किया। यही कारण था कि वह अपनी मौलिक प्रतिभा को विकसित कर पाया। यदि मैकाले का अनुसरण करता तो शायद वह मात्र एक नकलची रह जाता।

मैकाले पद्धति से ऊँची शिक्षा प्राप्त करके भी अपने जीवन को संतृप्त न जानकर गांधी जी ने भारतीय शास्त्रों व विवेकानंद जी ने सदगुरु की शरण लेकर अंग्रेजों की इस पद्धति को निरर्थक साबित कर दिया।

भारत के युवानों को गर्व होना चाहिए कि वे ऐसी भारत माँ की सौभाग्यशाली संतान हैं, जहाँ शास्त्रों एवं सदगुरुओं का मार्गदर्शन सहज-सुलभ है। आज ही प्रण कर लो कि हम अंग्रेजों की गुलामी नहीं करेंगे, भारतीय शिक्षा पद्धति ही अपनायेंगे। अपने ऋषियों-महापुरुषों द्वारा चलायी गयी सर्वोत्कृष्ट गुरुकुल शिक्षा-पद्धति अपनाकर जीवन को महान और तेजस्वी बनायेंगे, समग्र विश्व में अपनी संस्कृति की सुवास फैलायेंगे।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2013, पृष्ठ संख्या 14, अंक 244

ૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐ