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अक्षय फलदायी अक्षय तृतीया


वैशाख शुक्ल तृतिया की महिमा मत्स्य, स्कंद, भविष्य, नारद पुराणों व महाभारत आदि ग्रंथों में है। इस दिन किये गये पुण्यकर्म अक्षय (जिसका क्षय न हो) व अनंत फलदायी होते हैं, अतः इसे ʹअक्षय तृतीयाʹ कहते हैं। यह सर्व सौभाग्यप्रद है।

यह युगादि तिथि यानी सतयुग व त्रेता युग की प्रारम्भ तिथि है। श्रीविष्णु का नर-नारायण, हयग्रीव और परशुरामजी के रूप में अवतरण व महाभारत युद्ध का अंत इसी तिथि को हुआ था।

इस दिन बिना कोई शुभ मुहूर्त देखे कोई भी शुभ कार्य प्रारम्भ या सम्पन्न किया जा सकता है। जैसे – विवाह, गृह-प्रवेश या वस्त्र-आभूषण, घर, वाहन, भूखंड आदि की खरीददारी, कृषिकार्य का प्रारम्भ आदि सुख-समृद्धि प्रदायक है।

प्रातःस्नान, पूजन, हवन का महत्त्व

इस दिन गंगा-स्नान करने से सारे तीर्थ करने का फल मिलता है। गंगाजी का सुमिरन  एंव जल में आवाहन करके ब्राह्ममुहूर्त में पुण्यस्नान तो सभी कर सकते हैं। स्नान के पश्चात प्रार्थना करें-

माधवे मेषगे भानौ मुरारे मधुसूदन।

प्रातः स्नानेन मे नाथ फलदः पापहा भव।।

ʹहे मुरारे ! हे मधुसूदन ! वैशाख मास में मेष के सूर्य में हे नाथ ! इस प्रातः स्नान से मुझे फल देने वाले हो जाओ और पापों का नाश करो।ʹ

सप्तधान्य उबटन व गोझरण मिश्रित जल से स्नान पुण्यदायी है। पुष्प, धूप-दीप, चंदन, अक्षत (साबुत चावल) आदि से लक्ष्मी नारायण का पूजन व अक्षत से हवन अक्षय फलदायी है।

जप उपवास व दान का महत्त्व

इस दिन किया गया उपवास, जप, ध्यान, स्वाध्याय भी अक्षय फलदायी होता है। एक बार हलका भोजन करके भी उपवास कर सकते हैं। ʹभविष्य पुराणʹ में आता है कि इस दिन दिया गया दान अक्षय हो जाता है। इस दिन पानी के घड़े, पंखे, ओले (खाँड के लड्डू), पादत्राण (जूते-चप्पल), छाता, जौ, गेहूँ, चावल, गौ,  वस्त्र आदि का दान पुण्यदायी है। परंतु दान सुपात्र को ही देना चाहिए। पूज्य बापू जी के शिष्य पूज्यश्री के अवतरण दिवस से समाज सेवा के अभायानों में नये वर्ष का नया संकल्प लेते हैं। अक्षय तृतीया के दिन तक ये अभिय़ान बहार में आ जाते हैं, जिससे उन्हें अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

पितृ-तर्पण का महत्त्व व विधि

इस दिन पितृ तर्पण करना अक्षय फलदायी है। पितरों के तृप्त होने पर घर में सुख-शांति-समृद्धि व दिव्य संतानें आती हैं।

विधिः इस दिन तिल एवं अक्षत में श्रीविष्णु एवं ब्रह्माजी को तत्त्वरूप से पधारने की प्रार्थना करें। फिर पूर्वजों का मानसिक आवाहन करने की भावना करते हुए धीरे से सामग्री किसी पात्र में छोड़ दें तथा भगवान दत्तात्रेय, ब्रह्माजी व विष्णु जी से पूर्वजों की सदगति हेतु प्रार्थना करें।

आशीर्वाद पाने का दिन

इस दिन माता-पिता, गुरुजनों की सेवा कर उनकी विशेष प्रसन्नता, संतुष्टि व आशीर्वाद प्राप्त करें। इसका फल भी अक्षय होता है।

अक्षय तृतीया का तात्त्विक संदेश

ʹअक्षयʹ यानी जिसका कभी नाश न हो। शरीर एवं संसार की समस्त वस्तुएँ नाशवान हैं, अविनाशी तो केवल परमात्मा ही है। यह दिन हमें आत्मविवेचन की प्रेरणा देता है। अक्षय आत्मतत्त्व पर दृष्टि रखने का दृष्टिकोण देता है। महापुरुषों व धर्म के प्रति हमारी श्रद्धा और परमात्मप्राप्ति का हमारा संकल्प अटूट व अक्षय हो – यही अक्षय तृतीया का संदेश मान सकते हो।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2013, पृष्ठ संख्या 23, अंक 244

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तीर्थ में पालने योग्य 12 नियम – पूज्य बापू जी


अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च।

लक्षं प्रदक्षिणा भूमेः कुम्भस्नानेतत्फलम्।।

ʹहजारों अश्वमेध यज्ञ, सैंकड़ों वाजपेय यज्ञ और लाखों बार पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो फल होता है, वही फल एक बार कुम्भ स्नान करने से प्राप्त हो जाता है।ʹ

तीर्थ में 12 नियम अगर कोई पालता है तो उसे तीर्थ का पूरा फायदा होता हैः

हाथों का संयमः गंगा में गोता भी मारा और अनधिकार किसी की वस्तु ले ली या ऐसी-वैसी कोई चीज उठाकर मुँह में डाल ली तो पुण्य प्राप्ति का आनंद नहीं होगा।

पैरों का संयमः कहीं भी चले गये मौज-मजा मारने के लिए…. नहीं, अनिचत जगह पर न जायें।

मन को दूषित विचारों व चिंतन करने से बचाकर भगवच्चिंतन करना।

सत्संग व वेदांत शास्त्र का आश्रय लेनाः ऐसा नहीं कि शरीर में बुखार है और दे मारा गोता। पुण्यलाभ करें और फिर हो गया बुखार या न्यूमोनिया और आदमी मर गया, ऐसा नहीं करना चाहिए। देश काल और शरीर की अवस्था देखनी चाहिए।

तपस्या।

भगवान की कीर्ति, भगवान के गुणों का गान कुम्भ-स्थान पर करना चाहिए।

परिग्रह का त्यागः कोई कुछ चीज दे तो तीर्थ में दान नहीं लेना चाहिए। तीर्थ में दूसरों की सुविधाओं का उपयोग करके अपने ऊपर बोझा न चढ़ायें। दान का खाना, अशुद्ध खाना, प्रसाद में धोखेबाजी करके बार-बार लेना…. अशुद्ध व्यवहार पुण्य क्षीण और हृदय को मलिन करता है। एक तरफ पुण्य कमा रहे हैं, दूसरी तरफ बोझा चढ़ा रहे हैं। यह न करें।

जैसी भी परिस्थिति हो, आत्मसंतोष होना चाहिए। हाय रे ! धक्का-धक्की है, बस नहीं मिली…. ऐसा करके चित्त नहीं बिगाड़ना। ʹहरे-हरे ! वाह ! यार की मौज ! तेरी मर्जी पूरण हो ! – इस प्रकार अपने चित्त को संतुष्ट रखें।

किसी प्रकार के अहंकार को न पोसें- ʹमैं तो तीन बजे उठा था, तो मैं इतने मील पैदल गया और मैंने तो 10 डुबकियाँ लगायीं…ʹ ऐसा अहंकार पुण्य को क्षीण कर देता है। भगवान की कृपा है जो पुण्यकर्म हुआ, उसको छुपाकर रखो।

यह करूँगा, यह भोगूँगा, इधर जाऊँगा, उधर जाऊँगा…ʹ इसका चिंतन न करें। ʹमैं कौन हूँ ? जन्म के पहले मैं कौन था, अभी कौन हूँ और बाद में कौन रहूँगा ? तो मैं वही चैतन्य आत्मा हूँ। मैं जन्म के पहले था, अभी हूँ और बाद में भी रहूँगा।ʹ – इस प्रकार अपने स्वभाव में आने का प्रयत्न करें।

दम्भ, दिखावा न करें।

इन्द्रिय लोलुपता नहीं। कुछ भी खा लिया कि मजा आता है, कहीं भी चले गये… तो मौज-मजा मारने के लिए कुम्भ-स्नान नहीं है। सच्चाई, सत्कर्म और प्रभु स्नेह से तपस्या करके अंतरात्मा का माधुर्य जगाने के लिए और हृदय को प्रसन्नता दिलाने के लिए तथा सत्संग के रहस्य का प्रसाद पाने के लिए कुम्भ-स्नान है।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2013, पृष्ठ संख्या 26, अंक 242

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सब धर्मों की एक ही पुकार, माता-पिता का करें सत्कार – पूज्य बापू जी


मातृ-पितृ पूजन दिवस – 14 फरवरी

ऐसा कोई माँ-बाप नहीं चाहते कि हमारा बेटा लोफर हो, किसी कुँवारी लड़की के चक्कर में आये। हमारी बेटी किसी लड़के के चक्कर में आये, शादी के पहले ही ओज-तेजहीन हो जाये। ऐसा ईसाई नहीं चाहते, मुसलमान भाई भी नहीं चाहते हैं, पारसी, यहूदी भी नहीं चाहते हैं और हिन्दू तो कभी नहीं चाहेंगे। सभी के माता-पिता चाहते हैं कि ʹहमारी संतान ओजस्वी-तेजस्वी हो, बलवान-बुद्धिमान हो, स्वयं के पैरों पर खड़ी रहे और बुढ़ापे में हमारा ख्याल रखे। छोटी उम्र में लड़के-लड़कियाँ बॉयफ्रैंड-गर्लफ्रैंड होकर तबाही की खाई में न गिरें।ʹ ऐसा सब चाहते हैं। भगवान को, अल्लाह को तो सब नहीं चाहते हैं लेकिन बच्चे हमारा आदर करें ऐसा सभी चाहते हैं और मैं वही कर रहा हूँ। विश्वमानव को ʹमातृ-पितृ पूजन दिवसʹ का फायदा मिले, ऐसा हमने अभियान शुरु किया है।

मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाने का आह्वान

14 फरवरी को छोरा-छोरी एक दूसरे को फूल देते हैं। एक-दूसरे को फूल देना, ʹमैं तुमसे प्रेम करता हूँ/करती हूँ…ʹ कहना बड़ी बेशर्मी की बात है। इससे लोफर-लोफरियाँ पैदा हो रहे हैं। यह गंदगी विदेश से आयी है। इस विदेशी गंदगी से बचाकर हमें भारत की सुगंध से बच्चे-बच्चियों को सुसज्ज करना है।

रावण की बहन शूर्पणखा ने लक्ष्मणजी को कह दिया थाः “मैं तुम्हें प्रेम करती हूँ।”

लक्ष्मणजी ने कहाः “तू इतनी बेशर्म, नकटी है !” किसी परपुरुष को स्त्री कहे, ʹमैं तुम्हें प्रेम करती हूँ।ʹ तो लानत है उसको ! लक्ष्मण जी ने उसके नाक-कान काटकर हाथ में पकड़ा दिये, बोलेः “जा, अपने भाइयों को दिखा कि तू कैसी नकटी है।”

शूर्पणखा की नाक कटवा दी ʹआई लव यूʹ जैसे शब्दों ने। लेकिन अपने बच्चे बच्चियों को बेचारों को पता नहीं है। पाश्चात्य कल्चरवाले हमारी हिन्दू संस्कृति पर आघात करके बच्चों को गुमराह कर देते हैं। ʹवेलेन्टाइन डेʹ मनाकर विदेश के बच्चे-बच्चियाँ तबाह हो गये गये। उनके देशों में हर वर्ष 13 से 19 साल की 12 लाख 50 हजार किशोरियाँ गर्भवती हो जाती हैं। उनमें से 5 लाख गर्भपात करा लेती हैं, बाकी 7 लाख कुछ हजार कुँवारी माता बनकर नर्सिंग होम, सरकार एवं माँ-बाप पर बोझा बन जाती हैं अथवा वेश्यावृत्ति धारण कर लेती हैं। बड़ी घृणित जिंदगी हो जाती है उन बच्चियों की ! तो ऐसी गंदगी हमारे देश में न आये इसलिए मैंने ʹवेलेन्टाइन डेʹ मनाने के बदले ʹमातृ-पितृ पूजन दिवस मनाने का आह्वान किया है।

मातृ-पितृ पूजन दिवस कैसे मनायें ?

14 फरवरी को बच्चे-बच्चियाँ मा-बाप का सत्कार करें। माँ-बाप को तिलक करें, उनकी प्रदक्षिणा करें। माँ-बाप को ʹमातृदेवो भव। पितृदेवो भव।ʹ करके नवाजें और माँ-बाप बच्चों के ललाट पर तिलक करें – ʹत्रिलोचन भव।ʹ इन दो आँखों से जो दुनिया दिखती है, वह तो सपना है। ज्ञान की आँख से दुनिया को देखो तो परमात्मा ही सत्य है। शरीर मरने वाला है, आत्मा अमर है।

माँ-बाप तो वैसे ही बच्चों पर मेहरबान होते हैं, वैसे ही बच्चों का भला चाहते हैं और जब बच्चों से पूजित होंगे तो उनके अंतरात्मा का भी आशीर्वाद बच्चों को मिलेगा। बच्चों का भी भला, माँ-बाप का भी भला !

बापूजी का मातृ-पितृ पूजन दिवस पर उपहार

मैं देशभर में यह प्रयोग चालू करवाना चाहता हूँ ताकि 14 फरवरी आये उसके पहले ही बच्चे ʹमातृ-पितृ पूजन दिवसʹ के लिए सुसंस्कारी बन जायें और उन बेचारे निर्दोष बच्चों के जीवन से चिड़चिड़ापन चला जाय। ʹआई लव यूʹ – यह गंदी आदत चली जाय।

आपको मैं ૐकार का जप करने की रीति बताता हूँ, वह अपने बच्चे-बच्चियों को सिखाओ। उन्हें इकट्ठा करके बोलो कि ʹૐकार के जप से परीक्षा में अच्छे अंक आयेंगे, यादशक्ति बढ़ेगी तथा तुमको भगवान भी प्रेम करेंगे और लोग भी प्रेम करेंगे।ʹ

बड़ी उम्रवाले भी इसे करेंगे तो लाभ होगा। यह प्रयोग सभी के लिए लाभदायी है।

लम्बा श्वास लो। उसमें ʹૐʹ का भाव भरो, ʹमैं भगवान का हूँ, भगवान मेरे हैं। मैं किसी से राग-द्वेष न करूँ, किसी का बुरा न सोचूँ और बुरा न करूँ।ʹ आज से मैं संकल्प करता हूँ, ʹमैं प्रभु का हूँ। प्रभु के नाते सबका मंगल, ૐ शांति….ʹ- यह मन में विचार करो। श्वास भीतर रोककर होंठ बंद रखें और कंठ से ૐकार का जप करते हुए गर्दन को ऊपर नीचे करें – ऐसा रोज दो बार करें। इससे कंठ तो साफ-सुथरा व पवित्र होगा, हृदय भी पवित्र होगा। जो ध्यान-भजन, सेवा पूजा करते हैं वह भी दस गुना प्रभावशाली बन जायेगा। समझते हो मोहन ?…. इस प्रकार समझाकर बच्चों को प्रोत्साहित करें।

ૐकार मंत्र जपने से पहले प्रतिज्ञा करनी होती हैः ʹૐकार मंत्रः, गायत्री छंदः, भगवान नारायण ऋषिः, अंतर्यामी परमात्मा देवता, अंतर्यामी प्रीत्यर्थे, परमात्मप्राप्त अर्थे जपे विनियोगः।

कानों में उँगलियाँ डालकर लम्बा श्वास लो। जितना ज्यादा श्वास लोगे उतने फेफड़ों के बंद छिद्र खुलेंगे, रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ेगी। फिर श्वास रोककर कंठ में भगवान के पवित्र, सर्वकल्याणकारी ૐकार का जप करो। मन में ʹप्रभु मेरे, मैं प्रभु काʹ बोलो, फिर मुँह बंद रख के कंठ से ૐ…. ૐ…. ૐ… ओઽઽઽम्… का उच्चारण करते हुए श्वास छोड़ो। जप से बहुत फायदा होता है। और ʹૐʹ भगवान का नाम है। अंतर्यामी भी खुश होंगे। यह प्रयोग दस बार करवाओ। फिर कानों में से उँगलियाँ निकलवा दीं। इतना करने के बाद शाँत बैठ गये। होंठों से जपो – ʹૐ ૐ प्रभु जी ૐ, आनंद देवा ૐ, अंतर्यामी ૐ… तुम दूर नहीं हो, दुर्लभ नहीं हो, परे नहीं हो, पराये नहीं होʹ – दो मिनट करना है। फिर हृदय से जपो – ૐ शांति… ૐ आनंद…. ૐૐૐ…ʹ

सुमिरन ऐसा कीजिये खरे निशाने चोट।

मन ईश्वर में लीन हो हले न जिह्वा होठ।।

जीभ मत हिलाओ, होंठ मत हिलाओ, हृदय से ʹૐआनंद, ૐ शांति…. ૐૐૐ….ʹ, अब कंठ से जप करना है। श्रीकृष्ण ने यह चस्का यशोदाजी को लगाया था। दो मिनट करो, ʹૐૐૐ… मैं प्रभु का, प्रभु मेरे….ʹ आनंद आयेगा, रस आयेगा। शुरु में भले आपको थोड़ा कम आनंद आये लेकिन फिर बढ़ता जायेगा, सूझबूझ, स्वभाव सँवर जायेगा। और इसका चस्का जिनको भी लगेगा उनके सम्पर्क में आने वाले स्वाभाविक ही भारतीय संस्कृति के भक्त बन जायेंगे। इसको केवल व्यापक करना है, और क्या है ! हम भी करेंगे और आप भी करो तथा अपने पड़ोस में कराओ। जब ૐकार मंत्र के जप का प्रयोग करायें तब गौचंदन या गूगल धूप कर सकें तो ठीक है, नहीं तो ऐसे ही करायें। विद्युत का कुचालक कम्बल, कारपेट आदि का आसन हो।

तुम लोग बच्चों से यह प्रयोग करवाओ, फिर बच्चों के जीवन में चार चाँद न लगें तो मेरी जिम्मेदारी ! शुरु-शुरु में चस्का डालो, फिर बच्चे खुद ही चालू कर देंगे। अपने बेटे-बेटियों को, पड़ोस के बेटे-बेटियों को यह प्रयोग जरूर सिखाओ तो उऩके जीवन में नित्य उत्सव, नित्य श्री और नित्य मंगल होने लगेगा। बच्चे खुश रहेंगे, माँ-बाप की बात को टालकर बॉयफ्रैंड-गर्लफ्रैंड बनाने की गंदी आदत से बच जायेंगे, नेक बनेंगे और माँ-बाप का भी मंगल होगा।

(टिप्पणीः इस प्रयोग को आश्रम की विडियो मैगजीन ʹऋषि दर्शनʹ, नवम्बर 2012 में देख सकते हैं)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2013, पृष्ठ संख्या 4,5,7 अंक 242

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