यातनाएँ सहकर भी जिन्होंने किया समाज का मंगलः संत तुकाराम जी

यातनाएँ सहकर भी जिन्होंने किया समाज का मंगलः संत तुकाराम जी


महाराष्ट्र के प्रसिद्ध संत तुकारामजी शरीर की सुधबुध भूलकर भगवान विट्ठल के भजन-कीर्तन में डूबे रहते। भगवान की भक्ति में प्रगाढ़ता आयी और उनके श्रीमुख से अभंगों के रूप में शास्त्रों का गूढ़ ज्ञान प्रकट होने लगा। तुकाराम जी भगवद् रस से सम्पन्न वाणी से लोगों के रोग-शोक दूर होने लगे, समाज उन्नत होने लगा पर तुकाराम जी की फैलती हुई यश-कीर्ति कुछ लोगों को खटकने लगी। उन्होंने अनेक प्रकार के तर्क-कुतर्क करके शंका-कुशंका उठाकर उन्हें तंग करना तथा समाज में बदनाम करना शुरु कर दिया। तब तुकाराम जी अपने एक अभंग के माध्यम से कहते हैं-

कलियुगीं बहु कुशल हे जन।

छळितील गुण तुझे गाता।।

मज हा संदेह झाला दोहींसवा।

भजन करूँ देवा किंवा नको।।

“कलियुग में लोग बड़े कुशल हैं। तुम्हारे गुण जो गायेगा उसे ये सतायेंगे। इसलिए मुझे यह संदेह हो गया है कि अब तुम्हारा भजन करूँ या न करूँ ?’ हे नारायण ! अब यह बाकी रह गया है कि इन लोगों को छोड़ दूँ या मर जाऊँ !

दुष्टों के अत्याचार से तंग आकर वे कहते हैं- किसी के घर मैं तो भीख माँगने नहीं जाता, फिर भी ये काँटे जबरदस्ती मुझे देने आ ही जाते हैं। मैं न किसी का कुछ खाता हूँ, न किसी का कुछ लगता हूँ। जैसा समझ पड़ता है भगवन् ! तुम्हारी सेवा करता हूँ।”

नाना प्रकार के शुष्कवाद करने वाले अहमन्य विद्वान और भगवद भजन का विरोध करने वाले मानो हाथ धोकर तुकाराम जी के पीछे पड़े थे। अनेक प्रयास करने पर भी जब लोगों ने तुकाराम जी के कीर्तन में जाना बंद नहीं किया तो उन्होंने तुकाराम जी को देहू गाँव से निकालने का षड्यंत्र रचा। ‘तुका ने हरि-कीर्तन करके भोले-भाले श्रद्धालु लोगों पर जादू कर दिया, वह भक्ति नहीं पाखंड करता है।’ इस प्रकार की और भी कई बेबुनियाद बातों से हाकिम (गाँव के मुखिया) के कान भरने शुरु कर दिये।

उधर दूसरी ओर वाघोली में रहने वाले एक विद्वान रामेश्वर भट्ट को भी तुकारामजी के विरुद्ध भड़काया गया। ग्रामाधिकारी को रामेश्वर भट्ट ने चिट्ठी लिखी कि ‘तुकाराम को देहू से निकाल दो।’ ग्रामाधिकारी ने यह चिट्ठी तुकारामजी के पढ़ सुनायी तब वे बड़ी मुसीबत में पड़ गये। उस समय के उनके उदगार हैं-

“अब कहाँ जाऊँ ? गाँव में रहूँ किसके बल-भरोसे ? पाटील नाराज, गाँव के लोग भी नाराज ! कहते हैं अब यह उच्छृंखल हो गया है, मनमानी करता है। हाकिम ने भी फैसला कर डाला। भले आदमी ने जाकर शिकायत की, आखिर मुझ दुर्बल को ही मार डाला। तुका कहता है ऐसों का संग अच्छा नहीं, अब विट्ठल को ढूँढते चल चलें।”

इसे कलियुग का ही प्रभाव कहना चाहिए कि राजसत्ता भी संतों द्वारा हो रही समाज की उन्नति को दरकिनार करके धर्म के भक्षक ऐसे दुष्टों की हाँ-में-हाँ मिला देती है।

तुकारामजी को इतना मजबूर किया गया कि भगवान के विरह और प्रेम में निकले अभंगों की बही उऩ्हें दह नदी में डालनी पड़ी। आखिर तुकाराम जी पर देशनिकाले की नौबत आ गयी, अपने श्री विट्ठल मूर्ति से बिछुड़ने का समय आ गया। भक्तजनों को इससे बड़ा दुःख हुआ और कुटिल-खल-निंदक इससे बड़े सुखी हुए, मानो उन्हें कोई बड़ी सम्पत्ति मिल गयी हो। दूसरों का कुछ भी हीनत्व देखकर जिनकी जीभ निंदा करने के जोश में आ जाती है। ऐसे लोग तुकारामजी के पास आकर उनका तरह-तरह से उपहास करने लगे।

संत तुकाराम जी ने देखा कि अपने ईश्वरीय समाधि सुख का त्याग करके जिस समाज की भलाई के लिए अभंगों को लिपिबद्ध किया गया, उस समाज को ज्ञान के उस खजाने की जरा भी कद्र नहीं है। इस बात से तुकाराम जी समाज से उपराम हो गये। वे श्री विट्ठल-मंदिल के सामने तुलसी के पौधे के समीप एक शिला पर तेरह दिन अन्न जल त्याग के भगवत्-चिंतन में पड़े रहे। अंत में भगवत्कृपा से उनकी बहियाँ उन्हें पुनः प्राप्त हुईं, जो आज भी समाज को सही दिशा देने का कार्य कर रही हैं। उन निंदकों का क्या हाल हुआ होगा जिन्होंने ऐसे संत को 13-13 दिनों तक अन्न-जल त्यागने पर मजबूर कर दिया !

वास्तव में समाज की उन्नति या अवनति से नीच बुद्धि के संस्कृतिद्रोहियों को कोई लेना-देना नहीं होता। वे तो अपने स्वभाववश द्वेषबुद्धि से प्रेरित होकर स्वार्थसिद्धि के लिए उचित-अनुचित कुछ भी कर डालते हैं।

नीच लोगों की टोली में मम्बाजी नाम का एक व्यक्ति था। जिसने अपने शिष्यों द्वारा तुकारामजी के विरोध में बहुत कुप्रचार करवाया परंतु उसका कोई भी परिणाम नहीं हुआ। तब उसने तुकारामजी के आँगन और विट्ठल-मंदिर के परिसर में काँटें बिखेरना प्रारम्भ कर दिया ताकि तुकारामजी को कष्ट हो और उनके कीर्तन में आने वाले भक्तों को भी पीड़ा का सामना करना पड़े। जब इस पर भी उनके भक्तों की संख्या कम नहीं हुई तो मम्बाजी और बौखला गया। खूब सताकर भी उस दुष्ट का मन नहीं भरा तो एक दिन उसने मौका पाकर मंदिर परिसर में खूब गाली गलौज करना शुरु कर दिया। हद तो तब हो गयी जब उस क्रूर ने काँटें लगी बबूल की टहनी से तुकाराम जी को पीट-पीटकर कपड़े फाड़ दिये और शरीर लहू-लुहान कर दिया।  वहाँ खड़े लोग चुपचाप सब देखते रहे।

आश्चर्य की बात यह है कि जिस समाज को भक्ति, ज्ञान, कीर्तन, ध्यान के द्वारा सुखी बनाने के लिए संत समाजद्रोहियों के निशाने पर आ जाते हैं, वही समाज संत पर हो रहे अत्याचारों का मूक दर्शक बनकर रह जाता है। तुकारामजी के साथ भी यही हुआ।

मम्बाजी तुकारामजी के शिष्यों को भी उनके विरुद्ध भड़काने का कार्य करता था। वह बहिणाबाई (तुकारामजी का अनन्य भक्त) को तुकारामजी के कीर्तन में जाने से मना करता। जब बहिणाबाई ने तुकाराम जी की निंदा का विरोध किया तो मम्बाजी के क्रोध की आग भड़क उठी। उसने बहिणाबाई की गाय को बाँधकर बड़ी क्रूरता से उस पर डंडे चलाये। जब सीधी लड़ाई से मम्बाजी और उनके दुष्ट साथी अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हुए तो उन्होंने कूटनीति का सहारा लिया। हर संत के खिलाफ ऐसे ही हथकंडे अपनाये जाते हैं। साजिश-पर-साजिश, षड्यंत्र-पर-षड्यंत्र…. संतों को सताने की यह परम्परा कब समाप्त होगी ?

एक वेश्या को तैयार करके तुकाराम जी को बदनाम कर लोगों की श्रद्धा तोड़ने की साजिश रची गयी पर मम्बाजी का यह वार भी खाली गया। इस प्रकार दुष्टों ने अनेक प्रकार से पवित्र, निष्कलंक संत तुकाराम जी को सताया। समता के धनी तुकाराम जी तो सब सहते गये परंतु सबसे बड़ा नुकसान तो समाज का ही हुआ जिसे उनके सुखप्रद ज्ञान से, भक्ति के अमृत से वंचित होना पड़ा।

आज लोग भारत के इन महान संत की महिमा गाते हैं, उनके अभंगों पर पी.एच.डी. करते हैं, उनकी तस्वीरें लगाकर दीप-अगरबत्ती करते हैं लेकिन हयातीकाल में उनके कितना सताया गया ! संतों के साथ ऐसा आखिर कब तक होता रहेगा ?

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2014, पृष्ठ  संख्या 22,23 अंक 257

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