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वर्तमान युग में शिक्षा-प्रणाली और शिक्षकों की भूमिका


(शिक्षक दिवसः 5 सितम्बर 2014)

शिक्षक साधारण नहीं होता है, सृजन और प्रलय उसकी गोद में खेलता है। आचार्य चाणक्य ने एक नन्हें से बच्चे को ऐसी शिक्षा, ऐसे संस्कार दिये कि आगे चलकर वह चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य बना और उसने अखंड भारत के निर्माण का कार्य किया। ऐसे असंख्य उदाहरण हैं इतिहास में। तात्पर्य यह है कि शिक्षक के जीवन एवं शिक्षाओं का विद्यार्थियों पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। शिक्षक ऐसा न समझें कि केवल पुस्तकों में लिखी आजीविका चलाने की शिक्षा देकर हमने अपना कर्तव्य पूरा कर लिया। लौकिक विद्या के साथ-साथ उऩ्हें चरित्र निर्माण की, आदर्श मानव बनने की शिक्षा भी दीजिये। आपकी इस सेवा से भारत का भविष्य उज्जवल बनेगा तो आपके द्वारा सुसंस्कारी बालक बनाने की राष्ट्रसेवा, मानवसेवा हो जायेगी।

मुंडकोपनिषद के अनुसार विद्या दो प्रकार की होती हैः अपरा विद्या और परा विद्या। संसार के बारे में हम जो कुछ भी जानते हैं, वह अपरा विद्या है। जैसे भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, इतिहास आदि। दूसरी विद्या है आत्मा-परमात्मा का ज्ञान, जो कि देश-काल-कारण से परे है, इसे परा विद्या कहते हैं।

प्राचीनकाल में हमारे शिक्षा-संस्थानों में जिन्हें हम ‘गुरुकुल’ कहते थे, ये दोनों प्रकार की विद्याएँ शिष्य को दी जाती थीं। किंतु आजकल के अधिकांश शिक्षा-संस्थानों में केवल अपरा (लौकिक) विद्या ही दी जाती है, परा (अलौकिक) विद्या को कोई स्थान ही नहीं दिया जाता। आत्माभिव्यक्ति एवं आत्मानुभूति की पूर्णतः उपेक्षा की गयी है। यही कारण है कि केवल आधुनिक शिक्षा को ही केन्द्र बनाने वाले समृद्ध राष्ट्रों की अति दयनीय स्थिति है और उनके विद्यार्थियों में अशांति, ईर्ष्या, तनाव, चिंता, अस्वस्थता आदि कई दुर्गुण-समस्याएँ बाल्यकाल से ही पनप रही हैं।

विकसित राष्ट्रों की दयनीय स्थिति

आज आध्यात्मिकता से दूर रहने वाले सभी देशों में मानसिक अशांति व्याप्त है। युनस्को (संयुक्त राष्ट्र की विशेष संस्था) इस विषय में सर्वाधिक चिंतित है क्योंकि नयी पीढ़ी ने ‘जानने’ के बदले ‘करने’ की शिक्षा अपनायी है। इसलिए नयी पीढ़ी नशा, आत्महत्या आदि समस्याओं और एडस जैसी  बीमारियों की चपेट में आ रही है।

सोचा जाता है कि ‘अधिक सम्पत्ति अर्थात् अधिक सुख’ किंतु सांख्यिकी आँकड़ों से स्पष्ट होता है कि सच्चाई इसके ठीक विपरीत है। अमेरिका, जापान, स्वीडन आदि विकसित देशों में प्रति व्यक्ति आय बहुत अधिक है किंतु वे सुख में नहीं बल्कि तनाव और आत्महत्या में सबसे आगे हैं।

युनेस्को के अनुसार ‘अमेरिक, जापान और स्वीडन में युवावर्ग में 54 प्रतिशत आत्महत्या से होती है।’

जापान के स्वास्थ्य मंत्रायलय के अनुसार 42 और इससे अधिक आयु के 44 प्रतिशत जापानी मानसिक विक्षिप्तता के शिकार हैं।’

शिक्षा-प्रणाली की भूमिका

तनाव व अशांति भरे वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए समय की माँग है ‘गुरुकुल शिक्षा-पद्धति की पुनर्स्थापना’, जिससे आजीविका चलाने में उपयोगी विद्या के साथ-साथ विद्यार्थियों को संयम सदाचार, सच्चाई, परदुःखकातरता आदि सदगुण पानी की एवं ईश्वरप्राप्ति की विद्या भी मिले, उनके जीवन में उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति, पराक्रम जैसे गुणों का सहज में विकास हो और किसी भी प्रकार के छल-कपट तथा मानसिक तनाव के बिना उन्हें हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त हो।

पूज्य बापू जी कहते हैं कि “लौकिक विद्या तो पा ली लेकिन योगविद्या और आत्मविद्या नहीं पायी तो लौकिक चीजें बहुत मिलेंगी लेकिन भीतर अशांति होगी, दुराचार होगा। लौकिक विद्या को पाकर थोड़ा कुछ सीख लिया, यहाँ तक कि बम बनाना भी सीख गये फिर भी हृदय में अशांति की आग जलती रहेगी।

जो लोग योगविद्या और आत्मविद्या का अभ्यास करते हैं, सुबह के समय थोड़ा योग व ध्यान का अभ्यास करते हैं वे लौकिक विद्या में भी शीघ्रता से सफल होते हैं, लौकिक विद्या के भी अच्छे-अच्छे रहस्य वे खोज सकते हैं।

स्वामी विवेकानन्द लौकिक विद्या तो पढ़े थे, साथ ही उन्होंने आत्मविद्या का ज्ञान भी प्राप्त किया था। अतः ऐहिक विद्या को अगर योग और आत्म विद्या का सम्पुट दिया जाय तो विद्यार्थी ओजस्वी-तेजस्वी बनता है। योगविद्या और आत्मविद्या को भूलकर सिर्फ ऐहिक विद्या में ही पूरी तरह से गर्क हो जाना मानो अपने जीवन का अनादर करना है।”

इन्हीं उद्देश्यों से पूज्य बापू जी ने गुरुकुल शिक्षा प्रणाली पुनः आरम्भ की। इन गुरुकुलों में विद्यार्थी ऐहिक सफलता की बुलंदियाँ तो छूते ही हैं, साथ ही योग और आत्मविद्या का भी ज्ञान पाकर अपना इहलोक और परलोक सँवार रहे हैं।

शिक्षकों की भूमिका

डॉ. राधाकृष्णन् ने स्पष्ट शब्दों में कहा हैः “आप केवल ईँटों से राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकते। आपको युवकों के मन-मस्तिष्क को सुदृढ़ करना होगा। केवल तभी राष्ट्र का  निर्माण हो सकता है।”

चरित्र-निर्माण आध्यात्मिकता के बिना असम्भव है। आध्यात्मिक गुरु सम्पूर्ण विश्व को परिवर्तित कर सकते हैं। उनके मार्गदर्शन से समाज का चहुँमुखी विकास होता है।

अतः राष्ट्र-निर्माण के लिए शिक्षकों का कर्तव्य है कि वे विद्यार्थियों को ऐहिक शिक्षा के साथ यौगिक व आध्यात्मिक शिक्षा से भी सुसम्पन्न करें। इससे बच्चों में तीव्र बुद्धि के साथ चारित्रिक व नैतिक गुणों का विकास होगा और तभी विश्वशांति एवं संगठित, समृद्ध राष्ट्र-निर्माण के द्वार खुल पायेंगे। इसके लिए शिक्षकों को भी इन विद्याओं से सुसम्पन्न होना होगा, तभी वे बच्चों को सही शिक्षा दे पायेंगे। अतः शिक्षकों को किन्हीं हयात आत्मानुभवनिष्ठ आध्यात्मिक गुरु से मार्गदर्शन लेना चाहिए और बच्चों को भी इसके लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2014, पृष्ठ संख्या 25,26 अंक 260

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ऋषि ऋण से मुक्त एवं ब्रह्मपरायण होने का अवसरः ऋषि पंचमी – पूज्य बापू जी


भारत ऋषि मुनियों का देश है। इस देश में ऋषियों की जीवन-प्रणाली का और ऋषियों के ज्ञान का अभी भी इतना प्रभाव है कि उनके ज्ञान के अऩुसार जीवन जीने वाले लोग शुद्ध, सात्त्विक, पवित्र व्यवहार में भी सफल हो जाते हैं और परमार्थ में भी पूर्ण हो जाते हैं।

ऋषि तो ऐसे कई हो गये जिन्होंने अपना जीवन केवल ‘बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय’ बिताया। हम उन ऋषियों का आदर-पूजन करते हैं। उनमें से भी वसिष्ठ, विश्वामित्र, जमदग्नि, भरद्वाज, अत्रि, गौतम और कश्यप – इन सप्तऋषियों का स्मरण पातक का नाश करने वाला, पुण्य अर्जन कराने वाला, हिम्मत देने वाला है।

कश्यपोsत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोsथ गौतमः।

जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषयः स्मृताः।।

ज्ञान प्राप्त करने के लिए जिन महापुरुषों ने एकांत अरण्य में निवास करके अपने प्रियतम परमात्मा में विश्रान्ति पायी, ऐसे ऋषियों, आर्षद्रष्टाओं को हमारे प्रणाम हैं।

ऋषि पंचमी के दिन ऋषियों का पूजन किया जाता है। इस दिन महिलाएँ विशेष रूप से व्रत रखती हैं। जिसने भी अपने-आपको (आत्मस्वरूप को) नहीं जाना है, यह पर्व उन सबके लिए। जिस अज्ञान के कारण यह जीव कितनी ही माताओं के गर्भ में लटकता आया है, कितनी ही यातनाएँ सहता आया है उस अज्ञान को निवृत्त करने के लिए उन ऋषि मुनियों को हम हृदयपूर्वक प्रणाम करते हैं, उनका पूजन करते हैं। ऋषि मुनियों का वास्तविक पूजन है उनकी आज्ञा शिरोधार्य करना। वे तो चाहते हैं-

देवो भूत्वा देवं यजेत्।

देवता होकर देवती की पूजा करो। ऋषि असंग, द्रष्टा, साक्षी स्वभाव में स्थित होते हैं। वे जगत के सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान, शुभ-अशुभ में अपने द्रष्टाभाव से विचलित नहीं होते। वेदांत को सुन-समझकर असली ‘मैं’ में, जाग्रत-विभू-व्यापक परमात्मस्वरूप में जाग जाना ही उऩके आदर-पूजन का परम फल है।

मम दरसन फल परम अनूपा।

जीव पाव निज सहज सरूपा।।

(श्रीरामचरित. अर.कांडः 35.5)

जीव अपने सहज सच्चिदानंदस्वरूप को पा ले। फिर न सुख सच्चा न दुःख सच्चा, न जन्म सच्चा न मृत्यु – सब सपना, चैतन्य, साक्षी, सच्चिदानंद अपना। ऋषियों ने हमारे सामाजिक व्यवहार में, त्यौहारों में, रीति रिवाजों में कुछ न कुछ ऐसे संस्कार डाल दिये कि अनंत काल से चली आ रही मान्यताओं के पर्दे हटें और सृष्टि को ज्यों का त्यों देखते हुए सृष्टिकर्ता परमात्मा को पाया जा सके। ऋषियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए उनका पूजन करना चाहिए, ऋषिगण से मुक्त होने का प्रयत्न करना चाहिए। योगवासिष्ठ, गीता, भागवत, ब्रह्मज्ञानी गुरुओं का सत्संग – सब ऋषि वाणी हैं। ब्रह्मज्ञानी संतों का सत्संग पाना एवं दूसरों तक पहुँचाना ऋषिऋण से मुक्त होने का सुंदर व सर्वहितकारी साधन है। धनभागी हैं, ‘ऋषि प्रसाद’ पढ़ने व ‘ऋषि दर्शन’ देखने वाले ! धनभागी हैं, इस दैवी कार्य में सहभागी होने की प्रेरणा देने वाले एवं समाज तक सत्संग-संदेश पहुँचाने वाले !

ऋषि पंचमी के दिन माताएँ आमतौर पर व्रत रखती हैं। जिस किसी  महिला ने   मासिक धर्म के दिनों में शास्त्र-नियमों का पालन नहीं किया हो या अनजाने में ऋषि का दर्शन कर लिया हो या इन दिनों  में उनके आगे चली गयी हो तो उस गलती के कारण जो दोष लगता है, उस दोष का निवारण करने हेतु वह व्रत रखा जाता है।

ऋषि मुनियों को आर्षद्रष्टा कहते हैं। उन्होंने कितना अध्ययन करने के बाद सब बातें बतायी हैं ! ऐसे ही नहीं कह दिया है।

वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह बात सिद्ध हो चुकी है कि मासिक स्राव के दिनों में स्त्री के जो परमाणु (वायब्रेशन) होते हैं, वे अशुद्ध होते हैं। उसके मन-प्राण विशेषकर नीचे के केन्द्रों में होते हैं। इसलिए उन दिनों के लिए शास्त्रों में जो व्यवहार्य नियम बताये गये हैं, उनका पालन करने से हमारी उन्नति होती है।

मेरे गुरुदेव (साँईं श्री लीलाशाह जी महाराज) स्त्री के उत्थान में तो विश्वास रखते थे लेकिन आजकल के जैसे उत्थान में नहीं। स्त्री का वास्तविक उत्थान क्या है, यह तो ऋषियों की दृष्टि से जो देखें वे ही समझ सकते हैं। मदालसा रानी, जीजाबाई, चुड़ाला रानी, दीर्घतपा ऋषि की पत्नी जैसी आदर्श चरित्रवाली स्त्रियाँ हो गयीं। गार्गी और सुलभा जैसी स्त्रियाँ भरी सभा में शास्त्रार्थ करती थीं। कई स्त्रियों ने भी ऋषिपद पाया है, उपनिषदों में उऩका वर्णन आता है।

जिन घरों में शास्त्रोक्त नियमों का पालन होता है, लोग कुछ संयम से जीते हैं, उन घरों में तेजस्वी संतानें पैदा होती हैं।

व्रत-विधि

यह दिन त्यौहार का नहीं, व्रत का है। हो सके तो इस दिन अपामार्ग (लटजीरा) की दातुन करें। शरीर पर देशी गाय के गोबर का लेप करके नदी में 108 गोते  मारने का विधान भी है। ऐसा न कर सको तो घर में ही 108 बार  हरि का नाम लेकर स्नान कर लो। फिर मिट्टी या ताँबे के कलश की स्थापना करके उसके पास अष्टदल कमल बनाकर उन दलों में सप्तऋषियों व वसिष्ठप्तनी अरूंधती का आवाहन कर विधिपूर्वक उनका पूजन-अर्चन करें। फिर कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि व वसिष्ठ इन सप्तऋषियों को प्रणाम करके प्रार्थना करें कि ‘हे सप्तऋषियो ! हमने कायिक, वाचिक व मानसिक जो भी भूलें हो गयी हैं, उन्हें क्षमा करना। आज के बाद हमारा जीवन ईश्वर के मार्ग पर शीघ्रता से आगे बढ़े, ऐसी कृपा करना।’ फिर अपने गुरु का पूजन करें। तुम्हारी अहंता, ममता ऋषि चरणों में अर्पित हो जाय, यही इस व्रत का ध्येय है।

इस दिन हल से जुते हुए खेत का अन्न नहीं खाना चाहिए, खैर अब तो ट्रैक्टर हैं, मिर्च-मसाले, नमक घी, तेल, गुड़ वगैरह का सेवन भी त्याज्य है। दिन में केवल एक बार भोजन करें। इस दिन लाल वस्त्र दान करने का विधान है।

ब्रह्मज्ञानरूपी फल की प्राप्ति

हमारी क्रियाओं में जब ब्रह्मसत्ता आती है, हमारे रजोगुणी कार्य में ब्रह्मचिंतन आता है, तब हमारा व्यवहार भी तेजस्वी, देदीप्यमान हो उठता है। खान-पान-स्नानादि तो हररोज करते हैं पर व्रत के निमित्त उन ब्रह्मर्षियों को याद करके सब क्रिया करें तो हमारी लौकिक चेष्टाओं में भी उन ब्रह्मर्षियों का ज्ञान छलकने लगेगा। उनके अनुभव को अपना अनुभव बनाने की ओर कदम आगे रखें तो ब्रह्मज्ञानरूपी अति अदभुत फल की प्राप्ति में सहायता होती है।

ऋषि पंचमी का यह व्रत हमें ऋषिऋण से मुक्त होने के अवसर की याद दिलाता है। लौकिक दृष्टि से तो यह अपराध के लिए क्षमा माँगने का और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है पर सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो यह अपने जीवन को ब्रह्मपरायण बनाने का संदेश देता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2014, पृष्ठ संख्या 12,13 अंक 260

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पाचन की तकलीफों में परम हितकारी


अदरक

आजकल लोग बीमारियों के शिकार अधिक क्यों हैं ? अधिकांश लोग खाना न पचना, भूख न लगना, पेट में वायु बनना, कब्ज आदि पाचन सम्बंधी तकलीफों से ग्रस्त हैं और इसी से अधिकांश अन्य रोग उत्पन्न होते हैं। पेट की अनेक तकलीफों में रामबाण एवं प्रकृति का वरदान है अदरक। स्वस्थ लोगों के लिए यह स्वास्थ्यरक्षक है। बारिश के दिनों में यह स्वास्थ्य का प्रहरी है।

सरल है आँतों की सफाई व पाचनतंत्र की मजबूती

शरीर में जब कच्चा रस (आम) बढ़ता है या लम्बे समय तक रहता है, तब अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। अदरक का रस आशामय़ के छिद्रों मे जम कच्चे रस एवं कफ को तथा बड़ी आँतों में जमें आँव को पिघलाकर बाहर निकाल देता है तथा छिद्रों को स्वच्छ कर देता है। इससे जठराग्नि प्रदीप्त होती है और पाचन तंत्र स्वस्थ बनता है। यह लार एवं आमाशय का रस दोनों की उत्पत्ति बढ़ाता है, जिससे भोजन का पाचन बढ़िया होता है एवं अरूचि दूर होता है।

आसान घरेलु प्रयोग

स्वास्थ्य व भूख वर्धक, वायुनाशक प्रयोग

रोज भोजन से पहले अदरक को बारीक टुकड़े-टुकड़े करके सेंधा नमक के साथ लेने से पाचक रस बढ़कर अरूचि मिटती है। भूख खुलती है, वायु नहीं बनती व स्वास्थ्य अच्छा रहता है।

रूचिकर, भूखवर्धक उदररोगनाशक प्रयोग

100 ग्राम अदरक की चटनी बनायें एवं 100 ग्राम घी में सेंक लें। लाल होने पर उसमें 200 ग्राम गुड़ डालें एवं हलवे की तरह गाढ़ा बना लें। (घी न हो तो 200 ग्राम अदरक को कद्दूकश करके 200 ग्राम चीनी मिलाकर पाक बना लें।) इसमें लौंग, इलायची, जायपत्री का चूर्ण मिलायें तो और भी लाभ होगा। वर्षा ऋतु में 5 से 10 ग्राम एवं शीत ऋतु में 10-10 ग्राम मिश्रण सुबह-शाम खाने से अरुचि, मंदाग्नि, आमवृद्धि, गले व पेट के रोग, खाँसी, जुकाम, दमा आदि अनेक तकलीफों में लाभ होता है। भूख खुलकर लगती है। बारिश के कारण उत्पन्न बीमारियों में यह अति लाभदायी है।

अपचः भोजन से पहले ताजा अदरक रस, नींबू रस व सेंधा नमक मिलाकर लें एवं भोजन के बाद इसे गुनगुने पानी से लें। यह कब्ज व पेट की वायु में भी हितकारी है।

अदरक, सेंधा नमक व काली मिर्च को चटनी की तरह बनाकर भोजन से पहले लें।

खाँसी, जुकाम, दमाः अदरक रस व शहद 10-10 ग्राम दिन में 3 बार सेवन करें। नींबू का रस 2 बूँद डालें तो और भी गुणकारी होगा।

बुखारः तेज बुखार में अदरक का 5 ग्राम रस एवं उतना ही शहद मिलाकर चाटने से लाभ होता है। इन्फलूएंजा, जुकाम, खाँसी के साथ बुखार आने पर तुलसी के 10-15 पत्ते एवं काली मिर्च के 6-7 दाने 250 ग्राम पानी में  डालें। इसमें 2 ग्राम सोंठ मिलाकर उबालें। स्वादानुसार मिश्री मिला के सहने योग्य गर्म ही पियें।

वातदर्दः 10 मि.ली. अदरक के रस में 1 चम्मच घी मिलाकर पीने से पीठ, कमर, जाँघ आदि में उत्पन्न वात दर्द में राहत मिलती है।

जोड़ों का दर्दः 2 चम्मच अदरक रस में 1-1 चुटकी सेंधा नमक व हींग मिला के मालिश करें।

गठियाः 10 ग्राम अदरक छील के  100 ग्राम पानी में उबाल लें। ठंडा होने पर शहद मिलाकर पियें। कुछ दिन लगातार दिन में एक बार लें। यह प्रयोग वर्षा या शीत ऋतु में करें।

गला बैठनाः अदरक रस शहद में मिलाकर चाटने से बैठी आवाज खुलती है व सुरीली बनती है।

सावधानीः रक्तपित्त, उच्च रक्तचाप, अल्सर, रक्तस्राव व कोढ़ में अदरक न खायें। अदरक को फ्रिज में न रखें, रविवार को न खायें।

करेले के उत्तम गुणों का लाभ लेने हेतु

कैसे बनायें करेले की सब्जी ?

बरसात के दिनों में पाचनक्रिया मंद होने से आहार अच्छी तरह पच नहीं पाता। ऐसी दशा में पाचक औषधियाँ लेने के बजाय केवल निम्न विधि से बनायी गयी करेले की सब्जी खायें और इसके आशातीत फायदे स्वयं ही आजमायें।

लाभः यह भूख, रोगप्रतिकारक शक्ति एवं हीमोग्लोबिन बढ़ाती है। अजीर्ण, बुखार, दर्द, सूजन, आमवात, वातरक्त, यकृत (लीवर) व प्लीहा की वृद्धि, कफ एवं त्वचा के रोगों में लाभदायक है। बच्चों के हरे-पीले दस्त, पेट के कीड़े व मूत्र रोगों से रक्षा करती है। विशेषः यकृत की बीमारियों एवं मधुप्रमेह (डायबिटीज) से ग्रस्त लोगों के लिए यह रामबाण है।

विधिः प्रायः सब्जी बनाते समय करेले के हरे छिलके व कड़वा रस निकाल दिया जाता है। इससे करेले के गुण बहुत कम हो जाते हैं।

छिलके उतारे बिना अच्छे से करेलों को धोयें और काट लें। फिर उन्हें कूकर में डाल के थोड़ा पानी, नमक-मिर्च, मसाला और घी या तेल डालें। बंद करके धीमी आँच में पकायें। एक-आधी सीटी पर्याप्त है। हो गयी सब्जी तैयार !

सेवन की मात्राः 50 से 150 ग्राम।

इस तरीके से सब्जी बनाने से करेले के गुणकारी अंश अलग नहीं हो पाते और सेवनकर्ता को करेले के सभी गुण प्राप्त हो जाते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2014, पृष्ठ संख्या 30-31 अंक 260

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