Yearly Archives: 2016

Rishi Prasad 270 Jun 2015

सावधान व संगठित रहें, हौसला बुलंद रखें


भारत के हिन्दू संत-महापुरुषों को बदनाम करने की साजिश चल पड़ी है। संत कबीर जी, गुरु नानक जी, महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी, स्वामी विवेकानंद आदि संतों का कुप्रचार हुआ तो अब हमारा हो रहा है। मेरे को कोई फरियाद नहीं लेकिन ऐसा करने वालो ! आपको क्या मिलेगा ? जरा भविष्य सोचो। कोई चोर नहीं और आप उसको चोर कहते हैं तो आपको बड़ा भारी पाप लगता है। भइया ! तू भगवान को प्रार्थना कर तेरी बुद्धि में भगवान द्वेष नहीं, सच्चा ज्ञान दे दें। फिर तू सत्य की कमाई का उपयोग करेगा और तेरे बच्चों का भविष्य जहरी नहीं उज्ज्वल बनायेगा।
कुप्रचार के शिकार न हों
महात्मा बुद्ध को बदनाम करने वालों ने तो अपनी तरफ से पूरी साजिश की लेकिन वे कौन से नरकों में होंगे मुझे पता नहीं है, बुद्ध तो आपके, हमारे और करोड़ों दिलों में अभी भी हैं। ऐसे ही गाँधी जी के लिए अंग्रेजों के पिट्ठू कितना-कितना बोलते और कितना-कितना लिखते थे लेकिन गांधी बापू डटे रहे तो बेटे जी हार गये व भाग गये और बापू जी अब भी जिंदाबाद हैं।
जब साबरमती के बापू के लिए लोगों ने ऐसा-ऐसा बोला और वे अडिग रहे तो हम भी साबरमती के बापू जी हैं। हमारी तो किसी के प्रति नफरत नहीं है, द्वेष नहीं है और विदेशी ताकतों को भी हम कभी बुरे शब्द नहीं कहते हैं। अगर ये किसी दूसरे धर्म के गुरुओं के पीछे ऐसा पड़ते तो आज देश की क्या हालत हो जाती ! हम सहिष्णु व उदार होते-होते अपनी संस्कृति पर कुठाराघात करने दे रहे हैं। अब हम सावधान रहेंगे, सहिष्णु तो रहेंगे लेकिन सूझबूझ से और आपस में संगठित रहेंगे। हमारे भारत में अशांति फैला दें ऐसे तत्वों के चक्कर में हम नहीं आयेंगे, कुप्रचार के शिकार नहीं बनेंगे।
अपने अनुभव का आदर करें
किसी पर लांछन लगाना तो आसान है लेकिन संत-महापुरुषों का प्रसाद लेकर पना बेड़ा पार करना तो पुण्यात्माओं का काम है। इतने-इतने लांछन लगते हैं फिर भी मुझे दुःख होता नहीं और सुख मिटता नहीं। संतों के संग से दूर करने वाला वातावरण भी खूब बन रहा है। न जाने कितने-कितने रूपये देकर चैनलों के द्वारा फिल्में, कहानियाँ, आरोप ऐसी-ऐसी कल्पना करके बनाया जाता है कि लगता है कि संत ही बेकार हैं, करोड़ों रुपये लेकर जो दिखाते हैं, कुप्रचार करते हैं वे तो सती-सावित्री के हैं, उनके पास तो दूध का धोया हुआ सब कुछ है और गड़बड़ी है तो सत्संगियों में और संतों में है, ऐसा कुप्रचार भी खूब होता है। लेकिन भाई ! जिनकी बीमारियाँ मिट जाती हैं, जिनके रोग-शोक मिट जाते हैं, वे कुप्रचार के शिकार नहीं होते।
सलूका-मलूका संत कबीर जी के शिष्य थे। उन्हें कबीर जी ने कहाः “भई ! वह वेश्या बोलती है कि मैं उसके बिस्तर पर था, दारूवाला बोलता है कि मैंने दारू पिया… ये सब बोलते हैं, सब लोग जा रहे हैं, तुम क्यों नहीं जाते ?”
सलूका-मलूका कहते हैं- “महाराज ! हमारे मन, बुद्धि और तन की सारी बीमारियाँ यहाँ मिटी हैं। हम आपके सत्संग का त्याग करके नहीं जाना चाहते। लोग चाहे आपके लिए कुछ भी बोलें, लल्लू-पंजू भक्त कुप्रचार सुनकर कुप्रचार के शिकार हो जायें तो हो जायें लेकिन महाराज ! हमें आप रवाना मत करिये।”
कबीर जी ने कहाः “इतनी समझ है तुम्हारी तो बैठो।” सत्संग सुनाते-सुनाते कबीर जी ने ऐसी कृपादृष्टि की कि सलूका-मलूका को भावसमाधि में प्रेमाश्रु आने लगे। भगेड़ू भागते रहे और कौन से गर्भों में कहाँ-कहाँ भगे भगवान जानें !
मैं सत्य का पक्षधर हूँ, कानून और व्यवस्था का पक्षधर हूँ। समाज की सुन्दर व्यवस्था रहे इससे मैं प्रसन्न होने वाला व्यक्ति हूँ फिर भी क्या-क्या कुप्रचार किये जा रहे हैं, कुछ-की-कुछ सामग्री जुटाये जा रहे हैं !
वे समाज के साथ बहुत जुल्म करते हैं…..
जिनके विचार प्रखर भगवद्-ज्ञान के भगवत्-प्रसाद के हैं, ऐसे लोग भी सावधान नहीं रहते और जिस किसी के हाथ का खाते हैं, जिस किसी से हाथ मिलाते हैं तो ऐसे भक्तों की भक्ति भी दब जाती है। इसलिए संग अच्छा करना चाहिए, नहीं तो निःसंग रहना चाहिए। निंदकों की बात सुनकर, कभी हलके वातावरण में रहकर कइयों की श्रद्धा हिल जाती है, शांति और भक्ति क्षीण हो जाती है। जब सत्संगियों के वातावरण में आते हैं तो लगता है कि ‘अरे, मैंने बहुत कुछ खो दिया !’ इसलिए कबीर जी सावधान करते हैं-
कबीरा निंदक न मिलो, पापी मिलो हजार।
एक निंदक के माथे पर, लाख पापिन को भार।।
निंदक ऐसे दावे से बोलते हैं कि लगेगा, ‘अरे यही सत्य जानता है, हम इतने दिन तक ठगे जा रहे थे।’ हजारों-हजारों जन्मों के कर्म-बंधन काटकर ईश्वर से मिलाने वाली श्रद्धा की डोर जो काटते हैं, वे समाज के साथ बहुत-बहुत जुल्म करते हैं। उनको हत्यारा कहो तो हत्यारे नाराज होंगे। हत्यारा तो एक-दो को मारता है इसी जन्म में लेकिन श्रद्धा तोड़ने वाला तो कई जन्मों की कमाई नाश कर देता है।
कैसे रखें हौसला बुलंद ?
विदेशी ताकतें तो वैसे ही साधु-संतों और हमारी संस्कृति को तोड़कर देश को तोड़ने के स्वप्न देख रही है और आप उस आग में घी डालने की गलती क्यों करते हो भाई साहब ? न लड़ो न लड़ाओ। हौसला बुलंद रखो ! हौसला बुलंद उसको कहा जाता है कि न दुःखी रहो न दूसरे को दुःखी करो, न टूटो न दूसरों को तोड़ो, न खुद डरो न दूसरों को भयभीत करो, न खुद बेवकूफ बनो न दूसरों को बेवकूफ बनाओ। यह वैदिक वाणी के आधार से मैं आपको बता रहा हूँ। मैं तो साँपों के बीच रहा हूँ, रीछों के साथ मुलाकात हुई और उनके प्रति भी मेरा सद्भाव रहा तो मनुष्य के प्रति, किसी पार्टी के प्रति मैं क्यों कुभाव करूँगा ? कुभाव करने से मेरा हृदय खराब होगा। मैं तो सद्भाव की जगह पर बैठा हूँ, सत्संग की जगह पर बैठा हूँ इसलिए मेरा सत्य बात कहने का कर्तव्य है, अधिकार है कि सबको मंगल की बात कह दूँ। हम नहीं चाहते कि कोई उसको उलटा समझकर परेशान हो। हमारी इस सूझबूझ का आप आदर करेंगे तो आपके जीवन में बहुत कुछ ऊँचाइयाँ आ सकती हैं।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2015, पृष्ठ संख्या 14,15 अंक 270
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

Rishi Prasad 270 Jun 2015

संत की महिमा


एक संत हजारों असंत को संत बना सकते हैं लेकिन हजारों संसारी मिलकर भी एक संत नहीं बना सकते। संत बनना कोई मजाक की बात नहीं है। एक संत कइयों के डूबते हुए बेड़े तार सकते हैं, कइयों के पापमय मन को पुण्यवान बना सकते हैं, कई अभागों का भाग्य बना सकते हैं, कई नास्तिकों को आस्तिक बना सकते हैं, कई अभक्तों को भक्त बना सकते हैं, दुःखी लोगों को शांत बना सकते हैं और शांत में शांतानंद (आत्मानंद) प्रकट कराके उसे मुक्त महात्मा बना सकते हैं। एक बार राजा सुषेण कहीं जा रहे थे। राजा के साथ उनका इकलौता बेटा, रानी और गुरु महाराज थे। यात्रा करते-करते एकाएक आँधी-तूफान आया। नाव खतरे में थी। सबके प्राण संकट में थे। सुषेण के कंठ में प्राण आ गये। राजा जोर-जोर से चिल्लाने लगेः “अरे बचाओ ! बाबा जी को बचाओ !! और कुछ भी ना करो, केवल इन बाबा जी को बचाओ !…” बस, इस बात की रट लगा दी। एक बार भी नहीं बोला कि ‘मुझे बचाओ, राजकुमार को बचाओ, रानी को बचाओ।’ बड़ी मुश्किल से दैवयोग से नाव किनारे लगी। सबके जी में जी आया।

मल्लाहों का जो आगेवान था, उसने पूछाः “राजा साहब ! आपने एक बार भी नहीं कहा कि मुझे बचाओ, रानी को बचाओ, मेरे बच्चे को बचाओ। बाबा जी को बचाओ, बाबा जी को बचाओ बोलते रहे !”

राजा बोलाः “मेरे जैसे दूसरे राजा मिल जायेंगे। मैं मर जाऊँगा तो गद्दी पर दूसरा आ जायेगा। रानी और उत्तराधिकारी भी दूसरे हो जायेंगे लेकिन हजारों के दिल की गद्दी पर दिलबर को बैठाने वाले ये ब्रह्मज्ञानी संत बड़ी मुश्किल से होते हैं। इसलिए ये बच गये तो सब बच गया।”

राजा संतों की महिमा को जानता था कि संतों की वाणी से लोगों को शांति मिलती है। संतों के दर्शन से समाज का पुण्य बढ़ता है। वे दिखते तो इन्सान हैं लेकिन वे रब से मिलाने वाले महापुरुष हैं। ब्रह्मवेत्ता संत का आदर मानवता का आदर है, ज्ञान का आदर है, वास्तविक विकास का आदर है। ऐसे ब्रह्मज्ञानी संत धरती पर कभी-कभार होते हैं। जितनी देर ब्रह्मवेत्ता संतों के चरणों में बैठते हैं और वचन सुनते हैं, वह समय अमूल्य होता है। संत के दर्शन-सत्संग से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-चारों फल फलित होने लगते हैं। उन्हीं संत से अगर हमको दीक्षा मिली तो वे हमारे सदगुरु बन गये। तब तो उनके द्वारा हमको वह फल मिलता है, जिसका अंत नहीं होता।

पुण्य-पाप, सुख-दुःख दे नष्ट हो जाते हैं परंतु संत के, सदगुरु के दर्शन-सत्संग का फल अनंत से मिलाकर मुक्तात्मा बना देता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2015, पृष्ठ संख्या 19, अंक 270
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

स्वास्थ्य व सत्त्व वर्धक बिल्वपत्र


 

बिल्वपत्र (बेल के पत्ते) उत्तम वायुशामक, कफ-निस्सारक व जठराग्निवर्धक हैं। ये कृमि व शरीर की दुर्गंध का नाश करते हैं। (बिल्वपत्र ज्वरनाशक, वेदनाहर, संग्राही (मल को बाँधकर लाने वाले) व सूजन उतारने वाले हैं। ये मूत्रगत शर्करा को कम करते हैं, अतः मधुमेह में लाभदायी हैं। बिल्वपत्र हृदय व मस्तिष्क को बल प्रदान करते हैं। शरीर को पुष्ट व सुडौल बनाते हैं। इनके सेवन से मन में सात्त्विकता आती है।

कोई रोग न भी हो तो भी नित्य बिल्वपत्र या इनके रस का सेवन करें तो बहुत लाभ होगा। बेल के पत्ते काली मिर्च के साथ घोंट के लेना स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हितकर है। इनके रस में शहद मिलाकर लेना भी लाभकारी है।

औषधीय प्रयोग

मधुमेह (डायबिटीज)- बिल्वपत्र के 10-15 मि.ली. रस में 1 चुटकी गिलोय का सत्त्व एवं 1 चम्मच आँवले का चूर्ण मिला के लें।

स्वप्नदोषः बेलपत्र, धनिया व सौंफ समभाग लेकर कूट लें। यह 10 ग्राम मिश्रण शाम को 125 मि.ली. पानी में भिगो दें। सुबह खाली पेट लें। इसी प्रकार सुबह भिगोये चूर्ण को शाम को लें। स्वप्नदोष में शीघ्र लाभ होता है। प्रमेह एवं श्वेतप्रदर रोग में भी यह लाभकारी है।

धातुक्षीणता- बेलपत्र के 3 ग्राम चूर्ण में थोड़ा शहद मिला के सुबह शाम लेने से धातु पुष्ट होती है।

मस्तिष्क की गर्मी– बेल की पत्तियों को पानी के साथ मोटा पीस लें। इसका माथे पर लेप करने से मस्तिष्क की गर्मी शांत होगी और नींद अच्छी आयेगी।

छोटी पर निरोगता की लिए जरूरी बातें

शक्कर की बनी मिठाईयाँ, चाय, कॉफी अति खट्टे फल, अति तीखे, अति नमकयुक्त तथा उष्ण-तीक्ष्ण व नशीले पदार्थों के सेवन से वीर्य में दोष आ जाते हैं।

प्रातः उठते ही 6 अंजलि जल पियो। सूर्यास्त तक 2 से ढाई लीटर जल अवश्य पी जाओ। गर्मियों में जब शरीर से श्रम करो, तब इससे अधिक जल की आवश्यकता होती है।

जिन सब्जियों का छिलका बहुत कड़ा न हो, जैसे गिल्की, परवल, टिंडा आदि, उन्हें छिलके सहित खाना अत्यंत लाभकारी है। जिन फलों के छिलके खा सकते हैं जैसे सेवफल, चीकू आदि, उन्हें खूब अच्छी तरह धो के छिलकों के साथ खाना चाहिए। दाल भी छिलके सहित खानी चाहिए। चोकर अथवा छिलके में पोषकतत्त्व होते हैं और इनसे पेट साफ रहता है। सब्जी, फल आदि धोने के बाद कीटनाशक आदि रसायनों का अंश छिलकों पर न बचा हो इसका ध्यान रखें, अन्यथा नुक्सान होगा। सेवफल को चाकू से हलका-सा रगड़कर उस पर लगी मोम उतार लेनी चाहिए।

घी-तेल में तले हुए पकवानों का कभी-कभी ही सेवन करना चाहिए। नित्य या प्रायः तली हुई पूड़ी पकवान, पकौड़े, नमकीन खाने से कुछ दिनों में पेट में कब्ज रहने लगेगा, अनेक बीमारियाँ बढ़ेंगी।

खटाई में नींबू व आँवले का सेवन उत्तम है। कोकम व अनारदाने का उपयोग अल्पमात्रा में कर सकते हैं। अमचूर हानिकारक है।

भोजन इतना चबाना चाहिए कि गले के नीचे पानी की तरह पतला हो के उतरे। ऐसा करने से दाँतों का काम आँतों को नहीं करना पड़ता। इसके लिए बार-बार सावधान रहकर खूब चबा के खाने की आदत बनानी पड़ती है।

अच्छी तरह भूख लगने पर ही भोजन करें, बिना भूख का भोजन विकार पैदा करता है।

भोजन के बाद स्नान नहीं करना चाहिए। अधिक यात्रा के बाद तुरंत स्नान करने से शरीर अस्वस्थ हो जाता है। थोड़ी देर आराम करके स्नान कर सकते हैं।

बदन दर्द के सचोट उपाय

25-30 मि.ली. सरसों के तेल में लहसुन की छिली हुई चार कलियाँ व आधा चम्मच अजवायन डाल के धीमी आँच पर पकायें। लहसुन और काली पड़ जाने पर तेल उतार लें, थोड़ा ठण्डा होने पर छान लें। इस गुनगुने तेल की मालिश करने से वायु प्रकोप से होने वाले बदन दर्द में राहत मिलती है।

100 ग्राम सरसों के तेल में 5 ग्राम कपूर डालें और शीशी को बंद करके धूप में रख दें। तेल में कपूर अच्छी तरह से घुलने पर इसका उपयोग कर सकते हैं। इसकी मालिश से वातविकार तथा नसों, पीठ, कमर, कूल्हे व मांसपेशियों के दर्द आदि में लाभ होता है। मातायें छाती पर यह तेल न लगायें, इससे दूध आना बंद हो जाता है।

सिर व बालों की समस्या से बचने हेतु

सर्वांगासन ठीक ढंग से करते रहने से बालों की जड़ें मजबूत होती हैं, झड़ना बंद हो जाता है और बाल जल्दी सफेद नहीं होते, काले, चमकीले और सुंदर बन जाते हैं। आँवले का रस कभी-कभी बालों की जड़ों में लगाने से उनका झड़ना बंद हो जाता है। (सर्वांगासन की विधि आदि पढ़ें आश्रम से प्रकाशित पुस्तक ‘योगासन’ के पृष्ठ 15 पर।)

युवावस्था से ही दोनों समय भोजन करने के बाद वज्रासन में बैठकर दो-तीन मिनट तक लकड़ी की कंघी सिर में घुमाने से बाल जल्दी सफेद नहीं होते तथा वात और मस्तिष्क की पीड़ा संबंधी रोग नहीं होते। सिरदर्द दूर होकर मस्तिष्क बलवान बनता है। बालों का जल्दी गिरना, सिर की खुजली व गर्मी आदि रोग दूर होने में सहायता मिलती है। गोझरण अर्क में पानी मिलाकर बालों को मलने से वे मुलायम, पवित्र, रेशम जैसे हो जाते हैं। घरेलू उपाय सात्त्विक सचोट और सस्ते हैं बाजारू चीजों से।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2016, पृष्ठ संख्या 32,33 अंक 282

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ