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काँवरियों की सेवा हो जाय तो मुझे बहुत आनंद होगा


पूज्य बापू जी

(श्रावण मासः 20 जुलाई 2016 से 18 अगस्त 2016 तक)

अहंकार लेने की भाषा जानता है और प्रेम देने की भाषा जानता है। अहंकार को कितना भी हो, और चाहिए, और चाहिए…. और प्रेमी के पास कुछ भी नहीं हो फिर भी दिये बिना दिल नहीं मानता। शिवजी की जटाओं से गंगा निकलती है फिर भी प्रेमी भक्त काँवर में पानी लेकर यात्रा करते हैं और शिवजी को जल चढ़ाते हैं।

पुष्कर में एक बार मैं सुबह अजमेर के रास्ते थोड़ा सा पैदल घूमने गया तो कई काँवरिये मिले। उनको देखकर मेरा हृदय बहुत प्रसन्न हुआ कि 15-17-20 साल के बच्चे जा रहे थे पुष्कर से जल ले के। मैं खड़ा हुआ तो पहचान गये, “अरे ! बापू जी हैं।”

मैंने कहाः “कब आये थे।”

बोलेः “रात को आये थे।”

“कहाँ सोये थे ?”

“वहाँ पुष्करराज में सो गये थे ऐसे ही। सुबह जल भर कर जा रहे हैं।”

“कहाँ चढ़ाओगे ?”

“अजमेर में भगवान को चढ़ायेंगे।”

उन बच्चों को पता नहीं है कि वे काँवर से जल उठाकर जा के देव को चढ़ाते हैं, देव को तो पानी की जरूरत नहीं है लेकिन इससे उनका छुपा हुआ देवत्व कितना जागृत होता है ! बहुत सारा फायदा होता है। अगर वे युवक को पुष्करराज में नहीं आते तो रात को सोते और कुछ गपशप लगाते। जो शिवजी को जल चढ़ा रहे हैं कि ‘चलो पुष्कर अथवा चलो गंगा जी’ तो भाव कितना ऊँचा हो रहा है ! पहले काँवरिये इतने नहीं थे जितने मैं देख रहा हूँ। मुझे तो लगता है भारत का भविष्य उज्जवल होने के दिन बड़ी तेजी से आयेंगे। तो यह संतों का संकल्प है कि भारत विश्वगुरु बनेगा। जिस देश में काँवरिये बच्चे या भाई लोग नहीं दिखाई देते उस देश के लेडी-लेडे (युवक-युवतियाँ) तो चिपके रहते हैं, सुबह देर तक सोये रहते हैं, परेशान रहते हैं फिर नींद की गोलियाँ खाते हैं, न जाने क्या-क्या करते हैं ! इससे तो हमारे काँवरियों को शाबाश है ! मैं सोचता हूँ हमारे युवा सेवा संघ के युवक ऐसा कुछ करें कि जहाँ भी काँवरिये जाते हों, रोक के उनको आश्रम की टॉफियाँ, आश्रम का काई प्रसाद दे दें, कोई पुस्तक दे दें। सावन महीने में काँवरियों की सेवा हो जाय तो मुझे तो बहुत आनंद होगा। बड़े प्यारे लगते हैं, ‘नमः शिवाय, नमः शिवाय…..’ करके जाते हैं न, तो लगता है कि उन्हें गले लगा लूँ ऐसे प्यारे लगते हैं मेरे को।

‘बं बं बं…… ॐ नमः शिवाय…..’ इस  प्रकार कीर्तन करने से कितना भाव शुद्ध, पैदल चलने से क्रिया शुद्ध होती है। और उनमें कोई व्यसनी हो तो उसे समझाना कि ‘काँवर ली तो पान-मसाला नहीं खाना बेटे ! सुपारी नहीं खाना। गाली सुनाना नहीं, सुनना नहीं। इससे और मंगल होगा।’

भाव शुद्ध व क्रिया शुद्ध होने का फल है कि हृदय मंदिर में ले जाने वाले कोई ब्रह्मज्ञानी महापुरुष मिल जायें, उनका सत्संग मिल जाय। जो मंदिर मस्जिद में नहीं जाते, तीर्थाटन नहीं करते उनकी अपेक्षा वहाँ जाने वाले श्रेष्ठ हैं किंतु उनकी अपेक्षा हृदय-मंदिर में पहुँचने वाले साधक प्रभु को अत्यंत प्रिय हैं। जिसको हृदय-मंदिर में पहुँचाने वाले कोई महापुरुष मिल जाते हैं, उसका बाहर के मंदिर में जाना सार्थक हो जाता है।

घरमां छे काशी ने घरमां मथुरा,

घरमां छे गोकुळियुं गाम रे।

मारे नथी जावुं तीरथ धाम रे।।

घर का मतलब तुम्हारा चार दीवारों वाला घर नहीं बल्कि हृदयरूपी घर। उसमें यदि तुम जा सकते हो तो फिर तीर्थों में जाओ-न-जाओ, कोई हरकत नहीं। यदि तुम भीतर जा सके, पहुँच गये, किसी बुद्ध (आत्मबोध को उपलब्ध) पुरुष के वचन लग गये तुम्हारे दिल में तो फिर तीर्थों से तुम्हें पुण्य न होगा, तुमसे तीर्थों को पवित्रता मिलेगी। तीर्थ तीर्थत्व को उपलब्ध हो जायेंगे।

तीर्थयात्रा से थोड़ा फल होता है लेकिन उससे ज्यादा फल भगवान के नाम में है। उससे ज्यादा गुरुमंत्र में है और उससे ज्यादा गुरुमंत्र का अर्थ समझकर जप करने में है। भगवान को अपना और अपने को भगवान का, गुरु को अपना और अपने को गुरु का मानने वाले को…… मदभक्तिं लभते पराम्। (गीताः 18.54) पराभक्ति व तत्तव ज्ञान का सर्वोपरि लाभ होता है।

आत्मलाभात् परं लाभं न विद्यते।

आत्मसुखात परं सुखं न विद्यते।

आत्मज्ञानात् परं ज्ञानं न विद्यते।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2016,  पृष्ठ संख्या 22,23 अंक 282

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साधना में चार चाँद लगाती मानस-पूजा


 

(गुरु पूर्णिमाः 31 जुलाई पर विशेष)

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एक ऐतिहासिक घटित घटना हैः जगन्नाथ मंदिर के दर्शन करके चैतन्य महाप्रभु कुछ दिन जगन्नाथपुरी में ही रहे थे। उस समय उत्कल (ओड़िशा) के बुद्धिमान राजा प्रतापरूद्र उनके दर्शन करना चाहते थे लेकिन चैतन्य महाप्रभु ने उनकी बात ठुकरा दी। राजा ने खूब प्रयत्न किये परंतु चैतन्य महाप्रभु नहीं माने। आखिर राजा ने ठान लिया कि ‘कुछ भी हो, मैं इन महापुरुष की कृपा को पाकर ही रहूँगा।’

राजा की तीव्र इच्छा और दृढ़ता देखकर चैतन्य महाप्रभु के एक शिष्य ने कहाः “राजन् ! परसों जगन्नाथ जी की रथयात्रा है। चैतन्य महाप्रभु रथ को खींचेंगे तब यात्रा शुरु होगी। फिर दोपहर में वे अमुक बगीचे में विश्राम करेंगे। आप सेवक के वेश में जाकर वहाँ सेवा-टहल करना। यदि आपकी सेवा स्वीकार हो जायेगी तो आपका काम बन जायेगा। जिसकी जिह्वा पर भगवान का निर्मल यशोगान होगा, चैतन्य महाप्रभु निश्चय ही उसे अपने हृदय से लगा लेंगे।”

प्रतापरुद्र ने वैसा ही किया। बगीचे में जमीन पर लेटे चैतन्य महाप्रभु के चरण सहलाने लगे। चरण सहलाते-सहलाते ‘श्रीमद्भागवत’ का ‘गोपीगीत’ मधुर स्वर से गुनगुनाने लगे। जिसे सुनकर चैतन्य महाप्रभु पुलकित हो उठे। उन्होंने कहाः “फिर-फिर, आगे कहो…..।

तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम्।

श्रवणमंङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः।।

‘हे प्रभु ! तुम्हारी कथा अमृतस्वरूप है। विरह से सताये हुए लोगों के लिए तो यह जीवन-संजीवनी है, जीवन सर्वस्व ही है। बड़े-बड़े ज्ञानी, महात्माओं, भक्त-कवियों ने उसका गान किया है। यह सारे पापों को तो मिटाती ही है, साथ ही श्रवणमात्र से परम मंगल, परम कल्याण का दान भी करती है। यह परम सुंदर, परम मधुर और बहुत विस्तृत भी है। जो तुम्हारी इस लीला, कथा का गान करते हैं, वास्तव में भूलोक में वे ही सबसे बड़े दाता हैं।’ (10.31.9)

यह श्लोक सुन चैतन्य महाप्रभु का हृदय छलका और उठकर राजा को गले लगा लियाः “तू कौन है ? कहाँ से आया है ?”

राजाः “यहीं का हूँ, उत्कल प्रांत का, आपके दासों का दास हूँ।”

“अरे भैया ! तुमने तो आज मुझे ऋणी बना दिया ! कितनी शांति दी ! भगवान की याद दिलाने वाला गोपीगीत तुमने कितना सुंदर गाया ! तुम क्या चाहते हो ?”

“महाराज ! आपकी कृपा चाहता हूँ।”

ऐसे करते-करते सदगुरु की कृपा पायी राजा प्रतापरुद्र ने।

कितने वर्षों की मेहनत के बाद आत्मा में विश्रांति पाये व्यासरूप गुरु मिलते हैं ! ऐसे गुरुओं का आदर-पूजन यह अपने आत्मा का ही आदर-पूजन है।

व्यास जी की स्मृति में आषाढ़ी पूनम मनाने वाले साधकों को देवताओं ने अमिट पुण्य की प्राप्ति का वरदान दिया। इस दिन सुबह संकल्प करना चाहिए कि ‘आज व्यासपूर्णिमा को मैं अपने गुरुदेव का आदर-सत्कार, पूजन करूँगा। गुरु के सिद्धान्त, मार्गदर्शन और कृपा का आवाहन करूँगा।’

इस प्रकार गुरुभाव करते-करते अपने हृदय को पावन करना चाहिए। शिवाजी महाराज जैसे गुरु को स्नान कराते थे, ऐसे हम लोग गुरु को स्नान नहीं करा पाते थे लेकिन मन  ही मन गुरुदेव को हम स्नान कराते थे। मानस-पूजा का महत्व और विशेष होता है। जैसे भक्त षोडशोपचार से देवी-देवता या भगवान की पूजा करते हैं, ऐसे ही गुरुभक्त गुरु की पूजा करते हैं। अब गुरु जी को जल से, पंचामृत से स्नान कराना – यह तो सम्भव नहीं है लेकिन मानस-पूजा करने से गुरु भी नहीं रोक सकते और भगवान भी नहीं रोक सकते। जो प्रतिदिन गुरु का मानसिक पूजन करके फिर जप-ध्यान करते हैं, उनका जप-ध्यान दस गुना प्रभावशाली हो जाता है और अधिक एकाग्रता से करते हैं तो और दस गुना, मतलब सौ गुना लाभ हो जाता है। गुरुपूनम के दिन अगर गुरुदेव का मानसिक पूजन कर लिया तो गुरुपूनम का पर्व और चार चाँद ले आयेगा। दो गुरु जी को नहला दिया। गुरु जी को वस्त्र  पहना दिये। फिर गुरु जी को तिलक किया, पुष्पों की माला पहनायी। गुरु जी को आदर से हाथ जोड़कर स्तुति करके कह रहे हैं- ‘हे गुरुदेव ! आप साक्षात् परब्रह्म हो, सच्चिदानंदस्वरूप हो, अंतरात्मस्वरूप हो। ब्रह्मा-विष्णु-महेश, सर्वव्यापक चैतन्य और आप एक ही हैं।

जब मन-ही-मन नहलाना तो सादे जल से क्यों नहलाना ? गंगोत्री का पावन जल है, तीर्थों का जल है। मन-ही-मन पहनाना तो सादे कपड़े क्यों पहनाना ? नये कोरे वस्त्र पहना दिये। चंदन लगा दिया, तिलक कर दिया। गुलाब व मोगरे की माला पहना दी। आरती कर दी, धूप कर दिया। अब बैठे हैं कि ‘गुरुदेव ! हजारों जन्मों में पिता-माता मिले, उन्होंने जो दिया वह नश्वर लेकिन आपने जो दिया है वह काल का बाप भी नहीं छीन सकता। हे अकालपुरुष मेरे गुरुदेव ! आपके दिये हुए संस्कारों से दुःखों के माथे पर पैर रखने का सामर्थ्य आता है।’

संकल्पों का बड़ा बल होता है। शुभ संकल्प बड़ा प्रभाव दिखाते हैं। सदगुरु शिष्य के लिए शुभ संकल्प करें तो शिष्य का भी फिर यह भाव हो जाता हैः ‘गुरुदेव ! हम बाहर की चीजें तो आपको क्या दें ! फिर भी कुछ भी नहीं देंगे तो उऋण नहीं होंगे, कृतघ्न, गुणचोर हो जायेंगे इसलिए गुरुपूनम के निमित्त मत्था टेकते हैं और शुभ संकल्प करते हैं कि आपका स्वास्थ्य बढ़िया रहे, आपका आरोग्य धन बढ़ता रहे, आपका ज्ञानधन बढ़ता रहे, आपका प्रेमधन बढ़ता रहे, आपका परोपकार का यह महाभगीरथ कार्य और बढ़ता रहे तथा हमारे जैसे करोड़ों लोगों का कल्याण होता रहे। गुरुदेव ! आपका आनंद और छलकता रहे। आपकी कृपा हम जैसे करोड़ों पर बरसती रहे। हम जैसे तैसे हैं, आपके !

प्रभु मेरे अवगुन चित्त न धरो।

समदरशी प्रभु नाम तिहारो, चाहो तो पार करो।।

यह शिष्य का शुभ भाव, शुभ संकल्प उसके हृदय को तो विशाल बनाता ही है, साथ ही गुरु के विशाल दैवी कार्य में भी सहायक बन जाता है।

शिष्य कहता हैः ‘एक लोहा कसाई के घर का और दूसरा ब्राह्मण के घर का है लेकिन पारस तो दोनों को सोना बनाता है, ऐसे ही हे गुरुवर ! हमारे गुण-अवगुण न देखिये। हम जैसे-तैसे हैं, आपके हैं। आपके वचनों में हमारी प्रीति बनी रहे। आप हमें परम उन्नत देखना चाहते हैं तो आपका शुभ संकल्प जल्दी फले। मेरे गुरुदेव ! सुख-दुःख में सम, मान-अपमान में सम, गरीबी-अमीरी में सम-ऐसा जो सच्चिदानंदस्वरूप का स्वभाव है, वैसा मेरा स्वभाव पुष्ट होता रहे।’

आत्मतीर्थ में जाने के लिए व्यासजी की आवश्यकता है। हमारी बिखरी हुई चेतना, वृत्तियों, जीवनशैली को, बिखरे हुए सर्वस्व को सुव्यवस्थित करके सुख-दुःख के सिर पर पैर रखकर परमात्मा तक पहुँचाने की व्यवस्था करने में जो सक्षम हैं और अकारण दयालु हैं, ऐसे सदगुरुरूपी भगवान व्यास की आवश्यकता समाज को बहुत है। ऐसे व्यास अगर एकांत में चले जायें तो फिर गड़रिया-प्रवाह (विचारहीन, दिशाहीन होकर देखा-देखी एक एक-दूसरे का अनुसरण करते जाना) चलता रहेगा। श्रद्धालु तो लाखों-करोड़ों हैं लेकिन गुरुज्ञान के अभाव में श्रद्धा के फलस्वरूप जीवन में जो जगमगाहट, हृदय की प्रसन्नता, शांति माधुर्य चाहिए, वह पूरा नहीं मिलता है। अन्य देवी-देवताओं की पूजा के बाद भी किसी की पूजा रह जाती है लेकिन जो व्यासस्वरूप ब्रह्मज्ञानी गुरु हैं, उनकी पूजा के बाद किसी देव की पूजा बाकी नहीं रह जाती।

हरि हर आदिक जगत में पूज्य देव जो कोय।

सदगुरु की पूजा किये सब की पूजा होय।।

(विचारसागर वेदांत ग्रंथ)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2015, पृष्ठ संख्या 12-14 अंक 271

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Rishi Prasad 269 May 2015

यह केस भी उसी षड्यंत्र की कड़ी है – श्री उदय संगाणी


जोधपुर सत्र न्यायालय में 13, 15, 16 व 17 अप्रैल 2015 को श्री उदय संगाणी के बयान हुए। इन्होंने पूज्य बापू जी के ऊपर हो रहे षड्यंत्र की सच्चाई न्यायालय के सामने रखी और समाज व देश के कल्याण के लिए बापू जी द्वारा दिये गये योगदान के बारे में बताया। बयान के मुख्य अंशः

पिछले 50 वर्षों से पूज्य बापू जी के द्वारा समाजोत्थान हेतु अनेकानेक कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। जगह-जगह पर सत्संग होते हैं और उनमें बापू जी लोगों से नशा छुड़वाते हैं। पूज्य बापू जी से प्रेरित होकर लाखों लोगों ने बीड़ी, तम्बाकू, सिगरेट, शराब आदि छोड़ दिये। यहाँ तक कि बापू जी सत्संग में चाय एवं कोल्ड ड्रिंक्स से होने वाले नुक्सान भी बताते हैं, जिससे लोगों ने चाय व कोल्ड ड्रिंक्स भी पीना छोड़ दिया है।
आदिवासी क्षेत्रों में समय-समय पर भंडारे होते हैं। उनको अन्न, वस्त्र तथा अन्य जीवनोपयोगी चीजें दी जाती हैं। कइयों को मकान भी बनवा के दिये गये हैं।
पिछड़े क्षेत्रों में जहाँ धर्मांतरण होता था, वहाँ जाकर बापू जी ने लोगों को जागृत किया और बापू जी की प्रेरणा से हजारों लोगों ने फिर से हिन्दू धर्म अपनाया है, इसीलिए धर्मांतरण वाले लोग बापू जी से ईर्ष्या करते हैं।

आश्रम द्वारा देशभर में अनेक गौशालाएँ चलायी जा रही हैं। इनमें कत्लखाने ले जाने से बचायी गयी हजारों गायों का भी पालन-पोषण व रक्षण किया जा रहा है। यहाँ हजारों दूध न देने वाली और बीमार गायें भी पोषित होती हैं।

पूज्य बापू जी हमेशा से अपने सत्संगों में कन्या भ्रूणहत्या एवं समस्त भ्रूणहत्या को रोकने के बारे में जोर देते रहे हैं। बापू जी द्वारा नारी सशक्तिकरण के लिए ‘महिला उत्थान मंडलों’ की स्थापना की गयी है, जिनके माध्यम से महिलाओं की जागृति व उत्थान के विभिन्न प्रकल्प सतत चलाये जाते हैं।

14 फरवरी को वेलेंटाईन डे की जगह ‘मातृ-पितृ पूजन दिवस’ मनाने की प्रेरणा बापू जी ने दी, जिसे हर जगह पर मनाया जा रहा है और राष्ट्रपति, केन्द्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, राज्यपालों इत्यादि ने इसी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री रमन सिंह जी ने अपने राज्य के हर शासकीय विद्यालय में इसे अनिवार्य घोषित कर दिया है।

अनेक प्रधानमंत्री (पूर्व प्रधानमंत्री स्व. श्री गुलजारी लाल नंदा, श्री चंद्रशेखर, श्री अटल बिहारी वाजपेयी, श्री एच.डी.देवगौड़ा तथा वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी) पूज्य बापू जी के सत्संग से लाभान्वित हुए हैं। पूर्व राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा पाटील एवं डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने आश्रम के सेवाकार्यों की प्रशंसा की है।

वर्ष 2008 में अहमदाबाद गुरुकुल के दो बच्चों के पानी में डूबने से आकस्मिक मृत्यु हुई थी। उस समय ऐसी अफवाह फैलायी गयी थी कि उन बच्चों की तांत्रिक विधि से हत्या की गयी है। मीडिया में भी इस केस को बहुत उछाला गया था। उस समय से ही आश्रम एवं बापू जी के विरूद्ध षड्यंत्र किये जा रहे हैं। अमृत प्रजापति, महेन्द्र चावला, राजू चांडक आदि ने मीडिया में ऐसे झूठे बयान दिये कि ‘आश्रम में तांत्रिक विधि होती है।’

उस समय सी.आई.डी. क्राइम के डिटेक्टिव पुलिस इन्स्पैक्टर ने अखबारों में यह सूचना छपवायी थी कि ‘जिस-किसी को आश्रम की कोई भी अनैतिक गतिविधियों के बारे में कुछ भी पता हो तो वे आकर हमें बतायें। उनके नाम गुप्त रखे जायेंगे और उन्हें इनाम भी दिया जायेगा।’ पर कोई भी बयान देने नहीं आया। यह बात जाँच अधिकारी ने गुजरात उच्च न्यायालय के समक्ष दिये शपथपत्र में कही है। साथ में यह भी कहा है कि वे और उनके उच्च अधिकारी श्री जी.एस. मलिक (डी.आई.जी. क्राइम) एफ.एस.एल. के अधिकारी, फोटोग्राफर, विडियोग्राफर ने जाकर पूरे आश्रम के एक-एक कमरे एवं चप्पे की जाँच की पर तांत्रिक विधि के संदर्भ में कोई भी सबूत प्राप्त नहीं हुए। सर्वोच्च न्यायालय में इस मुद्दे पर कहा गया था कि ‘आश्रम में किसी प्रकार के कोई भी तांत्रिक विधि के सबूत प्राप्त नहीं हुए।’ इन्हीं षड्यंत्रकारियों ने उस समय इस मुद्दे को जोर-शोर से उछाला था, जो अंततः झूठा साबित हुआ।

8 अगस्त 2008 को अमृत प्रजापति, महेन्द्र चावला, राजू चांडक आदि ने मिल के आश्रम में बापू जी के नाम से फैक्स किया कि ‘एक सप्ताह के अंदर हमें 50 करोड़ रूपये दे दो अन्यथा तुम और तुम्हारा परिवार जेल की हवा खाने को तैयार हो जाओ। बनावटी मुद्दे तैयार हैं, तुम्हें पैसों की हेराफेरी में, जमीनी एवं लड़कियों के झूठे केसों में फँसायेंगे।’

उसके बाद अब तक कई बार ऐसे प्रयास किये गये, कई लड़कियों को भी भेजा गया पर उनके प्रयास असफल रहे। यह केस भी उसी षड्यंत्र की एक कड़ी है। यह उनकी कार्यप्रणाली है। दिल्ली का एक व्यक्ति इन षड्यंत्रकारियों के बीच घुस गया था एवं उनके द्वारा किस प्रकार से लड़कियों को तैयार किया जाता है और क्या-क्या षड्यंत्र चल रहे हैं, उनका स्टिंग ऑपरेशन किया था। उसके बाद इनके षड्यंत्र की पोल खुल गयी थी।

इन सभी षड्यंत्रकारियों के लिए बापू जी ने कई बार जाहिर सत्संग में कहा है और लोगों को सावधान किया है। न्यायालय में वर्ष 2010 में हुए बापू जी के सत्संग की सी.डी. भी चलायी गयी थी, जिसमें बापू जी ने जाहिर में यह बात कही है कि किस तरह से उन्हें फँसाने के लिए लड़कियों को उनके पास भेजा जाता था एवं पैसों के बारे में भी फँसाने का प्रयास किया गया था।

महेन्द्र चावला को वीणा चौहान नामक महिला ने आश्रम में रेकी (मुआयना) करने एवं आश्रम के बारे में जानकारी प्राप्त करने हेतु भेजा था और इसी साजिश के तहत उसने झूठे बयान दिये हैं।

राजू चांडक को गौशाला के पैसों में गबन करने के कारण आश्रम से निकाला गया था।
इसलिए इन लोगों तथा धर्मांतरण वालों ने एकजुट होकर आश्रम के विरुद्ध षड्यंत्र किया।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2015, पृष्ठ संख्या 7,8 अंक 269
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