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23 वर्ष की उम्र में बना डिप्टी मेयर !


मैंने 2010 में पूज्य बापू जी से सारस्वत्य मंत्र की दीक्षा ली थी, उसके बाद आश्रम में शिविर भी भरा। दीक्षा लेने से मेरे जीवन में काफी सुधार आया। आध्यात्मिकता व सदगुणों का विकास हुआ। पूज्य बापू जी से मिले मंत्र का जप करने से मनोबल, प्राणबल बढ़ा तथा निर्णयशक्ति भी अच्छी हुई। संयम और शांति का धन बढ़ा।

अगस्त 2013 में मैं डिप्टी मेयर के चुनाव में खड़ा हुआ और 23 वर्ष की उम्र में ही नगर निगम, हिसार का डिप्टी मेयर बन गया।

दीक्षा से पहले मेरा मन इधर-उधर की कल्पनाओं में भटकता रहता था पर अब जीवन में संतोष है। पहले खुद के जीवन में अशांति रहती थी लेकिन अब दीक्षाप्राप्ति के बाद दूसरों को शांति, सांत्वना देने की सेवा करके अपना जीवन भी शांतिमय अनुभव कर रहा हूँ।

मेरी ये सभी उपलब्धियाँ पूज्य बापू जी के बताये मार्ग पर चलने तथा माता पिता व गौसेवा से प्राप्त हुई हैं। मेरे जीवन निर्माण में पूज्य बापू जी की कृपा का मुख्य हाथ है। मैं परम पूज्य गुरुदेव का सदैव ऋणी रहूँगा। – श्री भीम महाजन

डिप्टी मेयर, नगर निगम, हिसार (हरि.) सचल दूरभाष 9215611112

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2017, पृष्ठ संख्या 33 अंक 294

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गुरुदेव की शरण रहना परम आत्मधर्म है – स्वामी मुक्तानंद जी


परम दैवत (देवता) रूप श्री गुरुदेव की शरण हो जाना, सब धर्मों को छोड़कर, सब देवी-देवता, सब मत-मतांतर, सर्व-सम्प्रदाय, सर्वमिथ्या कर्मकांड को त्याग के ईश्वररूप श्री गुरुदेव का ध्यान करना, उनके चरणों में प्रीति करना परम आत्मधर्म है। यही मनुष्य की अपनी अंतरात्मा-स्थिति है।

गुरु बारम्बार शिष्य के अंदर अपने को उसके भाव के अनुरूप प्रकट करते हैं। बाहर से दूर होने पर भी गुरु अंदर बहुत नजदीक हैं। इसीलिए मैं बार-बार बोलता हूँ कि ‘गुरु, मंत्र, ईश्वर और अपने को अभेदरूप जानकर मंत्र जपो, तब मंत्र फलीभूत होगा।’

एक ही जीवन में मनुष्य का 2 बार जन्म होने के कारण उसके जन्मदाता भी 2 होते हैं-

एक होता है वीर्यशक्ति सम्पन्न पिता, जो अपने वीर्यदान से बच्चे को जन्म देता है। दूसरा मंत्रवीर्य शक्ति सम्पन्न पिता, जो मंत्रशक्ति अथवा निज आत्मशक्ति को शिष्य के अंदर प्रतिष्ठित करके उसे नया जन्म देता है।

स गुरुर्मत्समः प्रोक्तो मन्त्रवीर्यप्रकाशकः।

जैसे वीर्यरूप में पिता ही आप पुत्र बनकर जन्मता है, वैसे ही गुरु मंत्र साधनरूप से शिष्य में बढ़ते हैं। गुरु आपका अंतरात्मा हैं – घट-घटवासी। मुझको ‘एक’ समझो नहीं, एक होकर भी मैं अनेक हूँ। इसीलिए गुरु का सबका समानरूप से समाधान करना कोई चमत्कार नहीं, सहज स्वाभाविक है।

गुरु आज्ञा पालन से सर्व काम हो जाते हैं

जिसने गुरु के कहे हुए वचनो में पूरी तरह अपना मन धो डाला हो, जो सदगुरु के शब्दों को पूरा पालता हो, उनका काटता नहीं, तोड़ता नहीं, उनको भंग नहीं करता, आज्ञापालक शिष्य है। ‘जो आपने कहा, वही करूँगा।’, यह इस वाक्य का अर्थ है और यही सर्व धर्म का शिखर धर्म भी है।

बाबा (मुक्तानंद जी के सदगुरुदेव स्वामी नित्यानंद जी) हमको जो बोलते थे, वही हम करते थे। हमको कहाः “इधर बैठ जाओ।” तो आज तक हम उधर ही हैं। मुझे रूद्रस्तोत्र में बहुत रूचि थी। कही भी नदी किनारे बालू एकत्र करता, लिंग बनाता था, कमंडल से पानी डालकर रूद्रस्तोत्र बोलता ही रहता था। एक दिन ऐसे ही लिंग बनाकर अभिषेक करत हुआ रूद्रस्तोत्र बोल रहा था।

बाबा (निषेधात्मक स्वर में) बोलेः “क्या पूजता है रे, क्या पूजता है ?” मैं आधे में ही अभिषेक छोड़ दिया। पाठ भी पूरा नहीं किया। मुझे पुस्तक पढ़ने का भी बहुत व्यसन था। बाबा के पास जाते समय भी बगल में एकाध पुस्तक दबाकर ले जाता था। एक बार बाबा बोलेः “पुस्तक का ज्ञान क्या ? मिट्टी ! मस्तक का ज्ञान श्रेष्ठ।” तब से सब पुस्तकें पुस्तकालय को दे दीं।

मनुष्य वचनभ्रष्ट होकर सदा कष्टी है। 100 में से 19 लोग वचनभ्रष्ट हो जाते है। वे तपस्या को जल्दी सिद्ध नहीं कर सकते। ‘करिष्ये वचनं तव।’ का अर्थ है ‘पूर्ण गुरुआज्ञा पालन।’ गुरु का कहना नहीं मानना ही पाप है। गुरुवचनों में बहुत शक्ति होती है, इन्हीं के अनुरूप आचरण से सर्व सिद्धियों की प्राप्ति होती है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2017, पृष्ठ संख्या 27 अंक 294

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ऋषियों की वाणी है ‘ऋषि प्रसाद’


कर्म किये बिना कर्ता रह नहीं सकता और कर्म में पराधीनता है। बिना पराश्रय के कर्म होता ही नहीं, पर का आश्रय लेना ही पड़ता है और किये बिना रहा नहीं जाता है। ….. तो पर का आश्रय लेने वाला कर्म अगर कर्म को परोपकार में बदल दे तो कर्ता ‘स्व’ के सुख में, स्व की शांति  में, स्व के ज्ञान में स्थिर होने के काबिल हो जाता है और कर्ता का करने का राग मिट जाता है। निःस्वार्थ भाव से सदगुरु का, ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों का देवी कार्य करने का अकसर मिलता है तो धीरे-धीरे कर्ता की आसक्ति, वासना क्षीण होने लगती है। जैसे पति की इच्छा में पतिव्रता की इच्छा मिल जाती है तो उसे इच्छा रहित होन से पातिव्रत्य का सामर्थ्य मिलता है, ऐसे ही कर्म करने वाला फल की इच्छा से रहित होकर कर्म करता है तो उसको नेष्कर्म्य सिद्धि का सामर्थ्य मिलता है। यह सेवा करना अपने-आप में एक कर्मयोग है।

कई प्रकार के कर्म होते हैं, सेवाएँ होती हैं लेकिन भगवान और संतों से लोगों को जोड़ना यह बहुत ऊँची सेवा है। मेरे गुरुदेव का प्रसाद, महापुरुषों का प्रसाद ही अभी ‘ऋषि प्रसाद’ के रूप में ऋषि प्रसाद के सेवकों द्वारा इस युग के साधनों के सदुपयोग से लोगों के घर-घर तक पहुँचाया जा रहा है।

गुरु का दैवी कार्य ब्रह्म बना देगा !

मैं तो यह बात भी स्वीकारने को तैयार हूँ कि अगर सेवा का मौका मिले और अपने पास कोई साधन नहीं हो तो जैसे हमारे गुरुदेव ने सिर पर गठरी उठाकर भी लोगों तक सत्साहित्य पहुँचाया, ऐसे ही आप लोग भी इस दैवी सेवा का महत्त्व समझें।

महापुरुष का संदेशा देकर कई पतित आत्माओं को पुण्यात्मा बनाते-बनाते आपकी निंदा भी हो गयी हो तो क्या है ! वैसे भी एक दिन सब कुछ चले जाना वाला है। जिसका कर्मयोग सफल हो गया, भक्ति तो उसके घर की ही चीज है ! ज्ञान तो उसका स्वाभाविक हो गया ! देह का अभिमान तो चला ही गया !

जिसका भी साधुस्वभाव होगा वह गुरुसेवा से कतरायेगा नहीं, सेवा खोज लेगा। जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति – इन तीनों अवस्थाओं को सपना मान के जिससे ये दिखती हैं उस चौथे पद में गुरु का सेवक टिक जाता है। तोटकाचार्य टिक गये, शबरी भीलन टिक गयी, भगवत्पाद साँईं श्री लीलाशाह जी महाराज, तुकाराम जी महाराज, रैदास जी और हम भी टिक गये – ऐसे और भी कई महापुरुष टिक गये। कोई बड़ा तप नहीं होता उन महापुरुषों का, गुरुसेवा बस ! गुरुसेवा सब तपों का तप है, सब जपों का जप है, सब ज्ञानों का ज्ञान है !

एक तरफ सम्राट बनने का आमंत्रण हो और दूसरी तरफ ब्रह्मज्ञानी गुरु का सेवाकार्य हो तो सम्राट पद को ठोकर मारो क्योंकि वह भोगी बनाकर नरकों में भेजेगा और सदगुरु के द्वार का कोई भी दैवी कार्य हो, वह योगी बना के ब्रह्म-परमात्म स्वभाव में जाग देगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2017, पृष्ठ संख्या 2,9 अंक 294

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