Yearly Archives: 2017

भगवत्प्राप्ति का मूल


संत एकनाथ जी

हे ॐकारस्वरूप, सहज आत्मस्वरूप देव ! तुम्हें नमस्कार है ! तुम विश्वात्मा होते हुए चतुर्भुज हो। अष्टभुज भी तुम्हीं हो और विश्वभुज अर्थात् अनंतभुज भी तुम्हीं हो। तुम्हारा मैं गुरुत्व से ही गौरव (आदर-सम्मान) करता हूँ। अपने शिष्यों के भाव-अर्थ गुरु के नाम से अभय देने वाले तुम्हीं हो। अभय देकर संसार-दुःख का निवारण करने वाले तुम्हीं हो। जन्म-मरण का निवारण करने वाले तुम्हीं हो। जन्म-मरण का निवारण कर तुम स्वयं, स्वयं से ही मिलन करते हो। अतः गुरु और शिष्य इन नामों से तुम्हारा ऐक्य (एकता) मालूम होने लगता है। यह एकता दृष्टि को दिखाई पड़ते ही एकनाथ और जनार्दन (संत एकनाथ जी के सदगुरु) – ये एकरूप ही हो जाते हैं। सारी सृष्टि गुरुत्व से भरकर सारा संसार ‘स्व’ आनंद से विचरने लगता है। ऐसा वह स्वानंद-ऐक्य चिद्घनस्वरूप जगदगुरु जनार्दन है। उन जनार्दन की शरण जाकर एकनाथ ने अपनी एकता दृढ़ की। यह दृढ़ हुआ ऐक्य भी सदगुरु ही बन गया। तब एकनाथ और जनार्दन एक हो जाने के कारण ‘मैं’ पन – ‘तू’ पन समाप्त हो गया। इस प्रकार अकेले एक होते हुए भी एकनाथ को जनार्दन ने कवि  बना दिया। तब उसे एकादश (श्रीमद्भागवत के 11वें स्कंध) के गहरे एकत्व का सहज ही बोध हो गया। उसी एकता की सच्ची राजा पुरुरवा को भी प्राप्त हो गयी थी और सत्संग से उसका यह अनुताप (भगवद्-विरह से तपन), विरक्ति और भगवद्भक्ति दृढ़ हो गयी। यह बात 26वें अध्याय में श्रीकृष्ण ने अपने ही मुख से बतायी।

श्रीकृष्ण ने कहाः ‘सत्संग से भगवद्भक्ति होती है और उससे साधकों को पूर्ण वैराग्य प्राप्त होता है (सत्संग से भगवत्स्वरूप महापुरुष एवं भगवद्भक्तों की संगति तथा साधन-भजन सेवा में रूचि प्राप्त होती है। और भगवद्-रस के प्रभाव से संसार रस फीका होकर सहज में पूर्ण वैराग्य प्राप्त होता है।) भगवद्भक्ति किये बिना विरक्ति कभी उत्पन्न नहीं होगी और विरक्ति के बिना भगवद्भक्ति कल्पांत ( कल्प का अंत। 1 कल्प=ब्रह्मा जी का 1 दिन = 4 अरब 32 करोड़ मानवीय वर्ष) में भी नहीं होगी।’ श्रीमद् एकनाथी भागवत, अध्याय 27 से

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2017, पृष्ठ संख्या 15 अंक 292

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लोक कल्याण की मूर्तिः देवर्षि नारद जी


देवर्षि नारद जयंती 11 मई 2017

पूज्य बापू जी

कोई झगड़ालू होता है तो कुछ लोग नासमझी से कह देते हैं कि ‘यह तो नारद है।’ अरे, नारद ऋषि को तुम ऐसी नीची नज़र से क्यों देखते हो ? इससे नारदजी का अपमान करने का पाप लगता है।

नारदजी भक्ति के आचार्य हैं। वेद, उपनिषद के मर्मज्ञ, मेधावी, सत्यभाषी, त्रिकालदर्शी और नीतिज्ञ हैं। इतिहास तथा पुराणों में विशेष गति-प्रीतिवाले हैं। कठोर तपस्वी, मंत्रवेत्ता हैं। ‘नारदभक्तिसूत्र’ के रचयिता तथा प्रभावशाली वक्ता हैं। व्याकरण, आयुर्वेद और ज्योतिष के प्रकांड विद्वान, कवि हैं। देवता तो पूज्य हैं, प्रभावशाली हैं पर नारदजी देवताओं के भी पूजनीय हैं। इन्द्र भी उनका आदर करते हैं। गुरु बृहस्पति का भी शंका-समाधान करने वाले तथा योगबल से लोक-लोकांतर का समाचार जानने में सक्षम हैं। पाँचों विकारों और छठे मन को दोषों पर विजय पाने की प्रेरणा देने वाले हैं।

नारदजी सभी जातियों का भला करने से पीछे नहीं हटते, वे देवताओं और दैत्यों का भी मंगल करते हैं। वे अपने स्वार्थ का कभी सोचते भी नहीं। वे हमेशा सर्वजनसुखाय, सर्वजनहिताय और सारगर्भित बोलते हैं।

नारदजी धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के यथार्थ ज्ञाता हैं। समस्त शास्त्रों में प्रवीण, सर्विद्याओं में निपुण, सर्वहितकारी नजरिये के धनी है। सदगुणों का आधार, परम तेजस्वी, देवताओं और दैत्यों को उपदेश देने में समर्थ हैं।

न्याय-धर्म का तत्त्व न जानने वाले राजा-महाराजाओं, जति जोगियों को अपना सुहृद बनाकर उन्हें भी उपदेश दे के सजग करने वाले हैं।

नारद जी जहाँ देखते हैं कि संधि से या विग्रह के बिना काम नहीं होगा, वहीं झगड़ा कराते हैं। और कलह भी करेंगे-करवायेंगे तो उसके पीछे भी उनका उद्देश्य क्रांति से शांति होता है।

दोनों पक्षों का मंगल हो यह उनका नजरिया होता है। नर-नारी के अयन ‘नारायण’ से जो मिलने की प्रेरणा दें वे ‘नारद’ हैं।

वेदव्यास जी जैसे महापुरुष को श्रीमद्भागवत की रचना की प्रेरणा देने वाले और वाल्मीकि ऋषि को श्रीरामजी के चरित्र सुनाने वाले थे देवर्षि नारद। तीनों लोकों में, लोक-लोकांतर में भी जाने में समर्थ हैं और सब कुछ करते-कराते भी सर्व से असंग आत्मा को जानने-पाने में भी समर्थ रहे हैं।

ताना मारकर भई किसी का मंगल होता है तो भई कर देते थे। किसी को आशीर्वाद देकर उसका मंगल होता है तो वैसा करत देते हैं और किसी का संगठन, विद्रोह या विग्रह से मंगल होता है तो उनके द्वारा भी मंगल करते हैं मंगलमूर्ति नारदजी।

कंस को ऐसा भ्रमित किया कि ‘क्या पता देवकी की कौन-सी संतान आठवीं होगी !’ ऐसा करके जल्दी-जल्दी उसका पाप का घड़ा भरवाकर भी पृथ्वी पर शांति लाने वाले थे नारदजी ! और दैत्यों को भी अलग-अलग प्रेरणा देकर उनकी दैत्य-वृत्तियों से उन्हें उपराम कराने वाले भी थे।

देवर्षि नारद जी ने मीडियावालों का भी मंगल चाहा है। वे कहते हैं कि पत्रकारिता में इस प्रकार की मानसिकता होनी चाहिए कि समाज में सत्य, अहिंसा, संवेदनशीलता, परस्पर भाईचारा, विश्वास फैले। स्नेह और सौहार्द बढ़े, सदाचार तथा शिष्टाचार में लोगों की रुचि हो। नकारात्मक, द्वेषात्मक खबरों को नहीं फैलाना चाहिए। घृणात्मक विचारों को महत्त्व न दें न फैलायों। राग, द्वेष, ईर्ष्या, जलन से रहित, तटस्थ पत्रकारिता आदर्श मानी जाती है।

नारद जी कहते हैं- ‘अपने धर्म में मर जाना अच्छा है, परधर्म भयावह है।’ सैनिक का धर्म है सीमाओं की रक्षा करना और वहाँ से वह भागता है तो धर्मच्युत है, भीरू है, वह दंड का पात्र है लेकिन व्यापारी, हकीम, डॉक्टर आदि सभी लोग युद्ध करने चले जायें, जिससे देश पर और आपत्ति आये तो वे सभी अपने-अपने धर्म से च्युत हो जायेंगे। शिक्षक चले जायें तो आने वाली पीढ़ी विद्याशून्य हो जायेगी। किसान चले जायेंगे तो सैनिकों को अनाज कौन पहुँचायेगा ? तो किसान अपनी काश्तकारी (खेती-बाड़ी) का धर्म निभायें और वकील, डॉक्टर अपना धर्म निभायें, उपदेशक, विद्वान अपना धर्म निभायें और सभी के धर्मों के पीछे सार यह है कि परमात्मा में, समत्व में रहें और संसार के साधनों का ईश्वर की प्रीति के लिए सदुपयोग करें।

नारदजी सभी विषयों में, सभी क्षेत्रों में और सभी जातियों का भला करने में पीछे नहीं हटे। उन्होंने क्या-क्या कहा है इसका विचार करते ही हृदय द्रवीभूत हो जाता है, अहोभाव से भर जाता है। ऐसे मंगलमूर्ति महापुरुष नारदजी का भगवान भी आदर करते हैं।

नारद जी की जयंती के दिन नारद जी के चरणों में प्रणाम हैं, भगवान वेदव्यास जी, परम पूज्य लीलाशाह जी बापू जैसे ब्रह्मवेत्ता संतों के चरणों में प्रणाम हैं ! और भी महापुरुष, जिनके नाम हम नहीं जानते, जो हरि के प्यारे हैं, जगत, हरि और अपने स्वरूप को ब्रह्मरूप से जानकर अद्वैत स्वरूप में एकाकार हो गये हैं, उनको हम नमन करते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2017, पृष्ठ संख्या 24,25 अंक 292

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हे विद्यार्थियो तुम किस ओर जा रहे हो?


कोई भी मनुष्य पूर्ण रूप से पापी नहीं हो सकता। कुछ-न-कुछ पुण्य का अंश तो रहता ही है। उसी पुण्य के अंश से आप अपने हित के लिए आध्यात्मिक चर्चा सुनते हो, इस प्रकार की पुस्तकें पढ़ते हो और किसी पाप के प्रभाव से सुनते हुए, पढ़ते हुए भी आचरण में नहीं ला पाते हो। यदि आप दृढ़ संकल्प कर लो तब सदाचार के पालन में और दुराचार के त्याग में पको कोई दूसरा रोकने वाला नहीं है। आप अपने द्वारा बढ़ाये हुए (गलत) अभ्यास की दासता (गुलामी) से बँधे हो लेकिन इस प्रकार के (गलत) अभ्यास को विपरीत अच्छे अभ्यास से हटा सकते हो।

सुंदर देना सीखो

जब आप दूसरों से सम्मान चाहते हो, प्यार, प्रेमपूर्वक व्यवहार अथवा कोई प्रिय वस्तु चाहते हो तब आप दूसरों को उनके अनुकूल सम्मान तथा अधिकार, प्यार अथवा प्रिय वस्तु देने के अवसर पकड़ते रहो। जो आप दे सकते हो वह देते रहो तभी दूसरों से पा सकोगे।

कुछ ऐसे भी दीन, दरिद्र व्यक्ति होते हैं जिनके पास देने के लिए सुंदर वस्तु तथा मधुर वाणी द्वारा सुंदर प्यार के या सम्मान के शब्द होते ही नहीं। ऐसे व्यक्ति पुण्यहीन हैं। कुछ पुण्यवान आरम्भ से प्रेमभाव के धनी होते हैं। देने का जिनका सुंदर भाव या स्वभाव हता है उनके पास देने के लिए बहुत कुछ होता है और वे देते ही रहते हैं। कोई तो सदा शुभ, सुंदर, प्रिय के ही दानी होते हैं और कोई अशुभ, असुंदर को ही फेंकते हुए दूसरों को चोट पहुँचाते हैं।

एक संत को एक विरोधी व्यक्ति गालियाँ देने लगा पर संत कुछ न बोले, खड़े रहे। तब उसने थूक दिया। संत फिर भी न बोले। उस दुष्ट ने कहाः “तू खड़ा क्यों है ?” संत ने कहाः “मेरे हिस्से का और भी जो देना शेष है वह भी दे दो जिससे आगे देने को बाकी न रहे, इसी प्रतीक्षा में खड़ा हूँ।”

कोई संत कभी सह के दूसरे की बुराई खत्म करते हैं तो कभी डाँट के उसके दोषों को भगा देते हैं और उसे पवित्र बनाते हैं। कितने दयालु होते हैं संतजन ! अशुभ, अप्रिय, अपवित्र देना पाप है। शुभ, सुंदर, पवित्र को देना सुंदर पुण्य है।

पुण्य और पाप की पहचान

आप बालक हो या युवक हो, इतने पुण्यवान तो हो ही कि इस समय ये अपने हित की बातें पढ़ रहे हो या सुन रहे हो। अब यह भी समझ लो कि आप अपने पुण्यों को सुख का उपभोग करते हुए घटा रहे हो या दूसरों की सेवा करते हुए बढ़ा रहे हो। पुण्य के योग से जिनकी बुद्धि शुद्ध है वे नीच कार्य, ओछे काम करने वालों से अथवा श्रेष्ठ माननीय पुरुषों या किसी विद्वान से विरोध नहीं करते।

जिनकी मति मंद है अथवा जिन्हें पुण्य का ज्ञान ही नहीं है, जिन पर पाप सवार रहता है वे व्यक्ति नीति नियम का विरोध करने में ही खपते रहते हैं। सीढ़ियों के कोनों में, दीवालों पर थूककर गंदा करते हैं। दल बनाकर टिकट लिए बिना ही रेलयात्रा करते हैं। जंजीर खींचकर जहाँ चाहते हैं वहीं उतर जाते हैं। सैंकड़ों यात्रियों को कष्ट होता है परंतु पाप का अभ्यासी अहंकार, आगे मिलने वाले प्रतिकूलता, दुःख की चिंता नहीं करता। पुण्यवान व्यक्ति आरम्भ से अर्थात् बाल्यकाल से ही वह कर्म नहीं करते जिससे दूसरों को कष्ट हो सकता है।

पुण्य के प्रताप से अच्छी मतिवाले व्यक्ति नीति नियम के विरूद्ध काम करने वालों को नम्रतापूर्वक रोकते हैं। यदि मूर्ख लोग नहीं मानते तब उनके द्वारा किये जा रहे अनुचित कर्म को स्वयं सँभालने (बिगड़ते हुए कार्य को बिगड़ने से बचाने व सुधारने) का प्रयत्न करते हैं। जिन बातों में समय व्यर्थ जाय, खर्च की अधिकता से खर्च देने वालों को कष्ट हो, साथ ही पढ़ाने के लिए धन की आय कम होने से रिश्वत लेनी पड़ती हो या कर्ज लेना पड़े तब तो विद्यार्थी के लिए पाप है।

अपनी आवश्यकताएँ बहुत कम रखना, कर्म खर्च में निर्वाह करना, सादे वस्त्र पहनना, वस्त्र तथा रहने का स्थान साफ रखना, शुद्ध, सतोगुणी भोजन करना, ईश्वर पर  विश्वास रखऩा पुण्यवान विद्यार्थी के सुलक्षण होते हैं।

पूर्व के जन्म में तन से सेवा करते हुए जितने अधिक पुण्य किये जाते हैं, अगले जन्म में उतना ही अधिक बलवान शरीर मिलता है। पूर्वजन्म में वाणी द्वारा विनम्रतासहित मान देते हुए जितने अधिक पुण्य बन जाते हैं, उतना ही अधिक इस जन्म में सद्गुण एवं शील की अधिकता के कारण आरम्भ से ही सम्मान मिलता है। पूर्वजन्म में जितना अधिक मानसहित दान करने से पुण्य बढ़ते हैं उसके फल से इस जन्म में धन और सुंदर रूप मिलता है।

सत्शिक्षा से विमुख और कुशिक्षा से प्रेरित हुए जो विद्यार्थी किसी वस्तु का मूल्य न देकर उसे छीन लेते हैं, जो टिकट न ले के यात्रा करते हैं वे पाप कमाते हैं। उन्हें कभी-न-कभी कई गुना बढ़कर हानि का दुःख भोगना पड़ता है। जो पुण्यहीन विद्यार्थी सत्शिक्षा न मानकर कुसंग के प्रभाव से दुर्व्यसनी, विलासी बन जाता है वह गलत सोचवाला, बुरी नजर से देखने वाला अपना पाप बढ़ाता है।

जो अपने संग के प्रभाव से दुराचारी, दुर्व्यसनी को सदाचारी, संयमी बना लेता है वह पुण्य का भागीदार होता है। किसी विद्यार्थी का अध्ययन छुड़ाकर उसे खेल तमाशों में, सिनेमा में ले जाना पाप है और व्यर्थ के खेल तमाशों तथा सिनेमा से रोक के अध्ययन में लगाना पुण्य है। किसी को पतन करने वाले कर्म के लिए प्रेरित करना पाप है। किसी शुभ कार्य के लिए प्रेरित करना पुण्य है। जब आपके मन में दूसरों के पास कोई भी वस्तु देखकर उसे लेने का लालच लग रहा हो या ईर्ष्या, डाह(जलन) पैदा हो रही हो, तब आपको याद आ जाना चाहिए कि ‘पाप की वृत्ति है, यही कुशिक्षा तथा कुसंगति का  प्रभाव है।’

जब कभी लोभ जागृत हो रहा हो या किसी के रूप को देखकर कामवासना जागृत हो रही हो अथवा किसी प्रकार की प्रतिकूलता में क्रोध उत्तेजित हो रहा हो, किसी के प्रति दुष्ट भाव जागृत हो रहा हो, किसी की निंदा होने लगी हो, उसी समय आपको स्मरण आ जाय कि ‘पाप का आक्रमण है’ और उसी क्षण आप उस पापवृत्ति को देखते हुए उसके पीछे समय तथा शक्ति का दुरुपयोग न होने दो तभी आप पाप-पोषण से बचकर उसी शक्ति से पुण्य का शोषण कर सकते हो।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2017, पृष्ठ संख्या 20,21 अंक 292

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