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आत्मज्ञान पाये बिना दुःखों से छुटकारा नहीं !


श्री भर्तृहरि महाराज लिखते हैं-

धन्यानां गिरिकन्दरेषु वसतां ज्योतिः परं ध्यायता-

मानन्दाश्रुकणान्पिबन्ति शकुना निःशंकमंकेशयाः।

अस्माकं तु मनोरथोपरचितप्रासादवापीतट-

क्रीडाकाननकेलकौतुकजुषामायुः परं क्षीयते।।

‘पर्वत कन्दरा में निवास करने वाले और परब्रह्म परमात्मा का ध्यान करने वाले जिन महानुभावों के आनंद के अश्रुओं को उनकी गोद में बैठे हुए पक्षीगण निर्भय होकर पान करते हैं, वास्तव में उन्हीं पुण्यात्माओं का जन्म इस संसार में सफल है क्योंकि मनमाने भवन, बावड़ी और उपवन में क्रीड़ा करने की अभिलाषा करने वाले हमारे जैसे सभी मनुष्यों की आयु तो वृथा ही क्षीण होती चली जाती है।’ (वैराग्य शतकः14)

मनुष्य कितना नासमझ है ! यह निरंतर अनावश्यक, व्यर्थ की चीजों के पीछे पड़ा रहता है। अपने मन को समझना चाहिए कि ‘ऐ मन ! शांत हो, निर्विकार हो। बीते हुए की चिंता न कर। भविष्य के संबंध में विचित्र-विचित्र कल्पनाएँ और विषय भोग की अभिलाषा न कर। भ्रम को दूर कर। भाग्य की अस्थिरता का विचार कर, आत्मज्ञानरूपी रत्न प्राप्त करने के उद्योग में लग जा।’

जब संसार एवं काम-वासना से अनासक्ति हो, चित्तवृत्तियाँ सहज में एक परमात्मा में ही शांत हों, ऐसे आध्यात्मिक माहौल में रहने का सौभाग्य प्राप्त हो तो जीवन कितना धन्य है ! इससे बढ़कर कौन सा जीवन चाहिए। अविनाशी, निर्विकारी, महत् ब्रह्म का ध्यान करना चाहिए तथा आत्मज्ञआन और आत्मसुख प्राप्त करना चाहिए। ध्यान की मुद्रा में रम्य नदी-तट पर, शांत एकांत स्थान में बैठे हुए विचार करे कि ‘इस नश्वर संसार की असारता पर विचारते हुए मैं कब उस आत्मानंद की दशा को प्राप्त कर सकूँगा ? कब मेरे नेत्रों से आनंदाश्रु छलक पड़ेंगे ?’

हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि हमारी सभी मान्यताओं का अद्वैत आत्मा में शांत होना, चित्त के संकल्प-विकल्पों का कम होते-होते आत्मा में शांत हो जाना यही वास्तविक एकांत है। यह वन में अकेले रहकर मनमुख साधना से नहीं होता, यह तो किन्हीं महापुरुष की छत्रछाया में गुरुमुख रहकर ही साध्य होता है।

दूसरा, कालानुरूप भी देखें तो यातायात के साधनों का अत्यधिक विकास होने से बाहरी एकांत भी आज कठिन हो गया है इसलिए पूज्य बापू जी के आश्रमों में मौन-मंदिरों का निर्माण किया गया है।

‘श्री नारद पुराण’ (पूर्व भाग-द्वितीय पाद 61वाँ अध्याय) में आता है कि शुकदेव जी सनत्कुमारजी से कहते हैं- “मनुष्य धन का संग्रह करते-करते पहले की अपेक्षा ऊँची स्थिति को प्राप्त करके भी कभी तृप्त नहीं होते, वे और अधिक धन कमाने की आशा लिए हुए ही मर जाते हैं। इसलिए विद्वान पुरुष सदा संतुष्ट रहते हैं (वे धन की तृष्णा में नहीं पड़ते)। संग्रह का अंत है विनाश, सांसारिक ऐश्वर्य की उन्नति का अंत है उस ऐश्वर्य की अवनति। संयोग का अंत है वियोग और जीवन का अंत है मरण। तृष्णा का कभी अंत नहीं होता। संतोष ही परम सुख है। अतः पंडितजन इस लोक में संतोष को ही उत्तम धन कहते हैं। आयु निरंतर बीती जा रही है। वह पलभर भी विश्राम नहीं लेती। जब अपना शरीर ही अनित्य है, तब इस संसार की दूसरी किस वस्तु को नित्य समझा जाय। जो मनुष्य सब प्राणियों के भीतर मन से परे परमात्मा की स्थिति जानकर उन्हीं का चिंतन करते हैं वे परम पद का साक्षात्कार करते हुए शोक के पार हो जाते हैं।”

पूज्य बापू जी की अमृतवाणी में आता है- “आत्मज्ञान पाने में जो मजा है, ऐसा मजा किसी में नहीं। हवाई जहाज में, हेलिकॉप्टर में, प्रधानमंत्री बनने में, देवता बनने में कोई मजा नहीं है। जो ब्रह्मज्ञानी को विशुद्ध आनंद आता है, ऐसा आनंद किसी के पास नहीं होता है।

ब्रह्मज्ञानी सदा प्रसन्न होते हैं लेकिन जिन अर्थों में आप प्रसन्नता मानते हो, उन अर्थों में उनकी प्रसन्नता नहीं है। वे शांत होने की भी इच्छा नहीं करते और खुश रहने की भी इच्छा नहीं करते। क्यों ? क्योंकि इच्छा उस चीज की होती है जो नहीं है। अशांत व्यक्ति शांत होने की इच्छा करेगा, नाखुश व्यक्ति खुश होने की इच्छा करेगा, दुःखी व्यक्ति सुखी होने की इच्छा करेगा। ब्रह्मज्ञानी महापुरुष को कोई इच्छा नहीं होती क्योंकि वे समझते हैं कि ‘इच्छामात्र नासमझी से उठती है और मन की कल्पना है, मनोमय शरीर का खेल है। अन्नमय शरीर का अपना खेल है, मनोमय शरीर का अपना खेल है। इन दोनों खेलों को जो देख रहा है, दोनों खेलों को जो सत्ता दे रहा है वह खिलाड़ी मैं स्वयं हूँ।’ इसीलिए वे सदैव प्रसन्न रहते हैं। आत्मिक सूझबूझ के धनी होने से आत्मधन से तृप्त रहते हैं।

वसिष्ठ जी कहते हैं- “हे राम जी ! ब्रह्मज्ञान से जो आनंद होता है ऐसा और किसी से नहीं होता। ज्ञानवान निरावरण होकर स्थित होते हैं और ऐसे स्थित होने से वे जिस शांति, सुख, ज्ञान व ऊँचाई से तृप्त रहते हैं वह अन्य किसी साधन से नहीं मिलती।” काम किया, सेवा की…. यह सब किया तब किया पर जब सत्संग की बात को पकड़ के अपनी बना लें। ऐसा नहीं कि सुन के छोड़ दें। जो वचन सुनें उनको अपना बना लें। उनके ऊपर अमल करें।

बिना अपने आत्मा को पहचाने दुःखों का अंत नहीं होता। पूछो भरत जी को….. इसलिए तो 14 साल बैठ गये राम जी की खड़ाऊँ ले के आत्मज्ञान के लिए। आत्मज्ञान के बिना दुःख नहीं मिटता।

कभी न छूटे पिंड दुःखों से जिसे ब्रह्म का ज्ञान नहीं।

वे बड़े अभागे हैं जो संसारी चीजों में आसक्त होते हैं। थोड़ी देर के लिए लगा कि ‘हाश ! मैं सुखी हूँ।’ फिर भी उनसे विमुख हुए बिना आत्ममपद नहीं मिलता। राजाओं को राज्य मिल गया, ‘हाश !’ किया फिर यदि उनसे विमुख हुए तभी आत्मपद मिला।

इस आत्मपद में कोई ताप नहीं, कोई संताप नहीं। ताप-संताप तो मन में होता है, शरीर में होता है। पित्त प्रकोप शरीर में होता है, अशांति मन में होती है, उनको देखने वाले तुममें पाप-ताप-संताप नहीं होता। हे द्रष्टा-साक्षीस्वरूप ! भूल्या जभी आपनूँ तभी हुआ खराब। अपने साक्षीस्वरूप में स्थित हो जाओ।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2017, पृष्ठ संख्या 24,25 अंक 291

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दिव्यता की ओर ले जाने वाला पर्व अवतरण दिवस


पूज्य बापू जी का अवतरण दिवसः 17 अप्रैल 2017

यह वर्षगाँठ नहीं है…..

स्थूल शरीर व सूक्ष्म शरीर के मेल को जन्म बोलते हैं और इनके वियोग को मृत्यु बोलते हैं। तो स्थूल सूक्ष्म शरीरों का संयोग होकर जन्म ले के जीव इस पृथ्वी पर आया तो उसका है जन्मदिन। वह तिथि, तारीख, दिन, घड़ियाँ, मिनट, सेकंड देखकर कुंडली बनायी जाती है और उसके मुताबिक कहा जाता है कि आज 20वीं वर्षगाँठ है, 25वीं वर्षगाँठ है, 50वीं है…. फलाना आदमी 70 वर्ष का हो गया, 70 वर्ष जिया…. लेकिन हकीकत में उनका वह जीना जीना नहीं है, उनकी वह वर्षगाँठ वर्षगाँठ नहीं है जो देह के जन्म को मेरा जन्म मानते हैं। जो देह को मैं मानकर जी रहे हैं वे तो मर रहे हैं ! ऐसे लोगों के लिए संतों ने कहा कि उन्हें हर वर्षगाँठ को, हर जन्मदिन को रोना चाहिए कि ‘अरे, 22 साल मर गये, 23वाँ साल मरने को शुरु हुआ है। हर रोज एक-एक मिनट मर रहे हैं।’

‘मेरा जन्मदिवस है, मिठाई बाँटता हूँ…..’ नहीं, रोओ कि ‘अभी तक प्यारे को नहीं देखा। अभी तक ज्ञान नहीं हुआ कि मेरा कभी जन्म ही नहीं, मैं अजर-अमर आत्मा हूँ। अभी तक दिल में छुपे हुए दिलबर का ज्ञान नहीं हुआ, आत्मसाक्षात्कार नहीं हुआ।’ जिस दिन ज्ञान हो जाय उस दिन तुम्हें पता चलेगा कि

जन्म मृत्यु मेरा धर्म नहीं है,

पाप पुण्य कछु कर्म नहीं है।

मैं अज निर्लेपी रूप, कोई कोई जाने रे।।

तुम्हें जब परमात्मा का साक्षात्कार हो जायेगा तब लोग तुम्हारा नाम लेकर अथवा तुम्हारा जन्मदिन मना के आनंद ले लेंगे, मजा ले लेंगे, पुण्यकर्म करेंगे। तुमको रोना नहीं आयेगा, तुम भी मजा लोगे। उनका जन्म सार्थक हो गया जिन्होंने परमात्मा को जान लिया। उनको देह के जन्मों का फल मिल गया जिन्होंने अपने अजन्मा स्वरूप को जान लिया और जिन्होंने जान लिया, जिनका काम बन गया वे तो खुश रहते ही हैं। ऐसे मनुष्य जन्म का काम बन गया कि परमात्मा में विश्रांति मिल गयी तो फिर रोना बंद हो जाता है।

अपना जन्म दिव्यता की ओर ले चलो

जो जन्म दिवस मनाते हैं उन्हें यह श्लोक सुना दोः

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।। (गीताः 4.9)

हे अर्जुन ! मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं, इस प्रकार मेरे जन्म और कर्म को जो मनुष्य तत्त्व से जान लेता है, वह शरीर का त्याग करने के बाद पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता, भगवद तत्त्व को प्राप्त हो जाता है।

आप जिसका जन्मदिवस मनाने को जाते हैं अथवा जो अपना जन्मदिवस मनाते हैं, उन्हें इस बात का स्मरण रखना चाहिए कि वास्तव में उस दिन उनका जन्म नहीं हुआ, उनके साधन का जन्म हुआ है। उस साधन को 50 साल गुजर गये, उसका सदुपयोग कर  लो। बाकी के जो कुछ दिन बचे हैं उनमें ‘सत्’ के लिए उस साधन का उपयोग कर लो। करने की शक्ति का आप सदुपयोग कर लो, ‘सत्’ को रब, अकाल पुरुष को जानने के उद्देश्य से सत्कर्म करने में इसका उपयोग कर लो। आपमें मानने की शक्ति है तो आप अपनी अमरता को मान लो। जानने की शक्ति है तो आप अपने ज्योतिस्वरूप को जान लो। सूर्य और चन्द्र एक ज्योति है लेकिन उनको देखने के लिए नेत्रज्योति चाहिए। नेत्रज्योति ठीक देखती है कि नहीं इसको देखने के लिए मनःज्योति चाहिए। मन हमारा ठीक है कि नहीं इसे देखने के लिए मतिरूपी ज्योति चाहिए और हमारी मति गड़बड़ है कि ठीक है इसको देखने के लिए जीवरूपी ज्योति चाहिए। हमारे जीव को चैन है कि बेचैनी है, मेरी जी घबरा रहा है कि संतुष्ट है, इसको देखने के लिए आत्मज्योति, अकाल पुरुष की ज्योति चाहिए।

मन तू ज्योतिस्वरूप, अपना मूल पिछान।

साध जना मिल हर जस गाइये।

उन संतों के साथ मिलकर हरि का यश गाइये और अपने जन्म दिवस को जरा समझ पाइये तो आपका जन्म दिव्य हो जायेगा, आपका कर्म दिव्य हो जायेगा। जब शरीर को ‘मैं’ मानते हैं तो आपका जन्म और कर्म तुच्छ हो जाते हैं। जब आप अपने आत्मा को अमर व अपने इस ज्योतिस्वरूप को ‘मैं’ मानते हैं और ‘शरीर अपना साधन है और वस्तु तथा शरीर संसार का है। संसार की वस्तु और शरीर संसार के स्वामी की प्रसन्नता के लिए उपयोग करने भर को ही मिले हैं।’ ऐसा मानते हैं तो आपका कर्म दिव्य हो जाता है, आपका जन्म दिव्यता की तरफ यात्रा करने लगता है।

….तो ईश्वरप्राप्ति पक्की बात है !

श्रीकृष्ण का कैसा दिव्य जन्म है ! कैसे दिव्य कर्म हैं ! ऐसे ही राम जी का जन्म-कर्म, भगवत्पाद लीलाशाह जी बापू का, संत एकनाथ जी, संत तुकाराम महाराज, संत कबीर जी आदि और भी नामी-अनामी संतों के जन्म कर्म दिव्य हो गये श्रीकृष्ण की नाईं। तो जब वे महापुरुष जैसे आप पैदा हुए ऐसे ही पैदा हुए तो जो उन्होंने पाया वह आप क्यों नहीं पा सकते ? उधर नज़र नहीं जाती। नश्वर की तरफ इतना आकर्षण है कि शाश्वत में विश्रांति में जो खजाना है वह पता ही नहीं चलता। स्वार्थ में माहौल इतना अंधा हो गया कि निःस्वार्थ कर्म करने से बदले में भगवान मिलते हैं इस बात को मानने की भी योग्यता चली गयी। सचमुच, निष्काम कर्म करो तो ईश्वरप्राप्ति पक्की बात है। ईश्वर के लिए तड़प हो तो ईश्वरप्राप्ति पक्की बात है। ईश्वरप्राप्त महापुरुष को प्रसन्न कर लिया तो ईश्वरप्राप्ति पक्की बात है। जिनको परमात्मा मिले हैं उनको प्रसन्न कर लिया…. देखो बस ! मस्का मार के प्रसन्न करने से वह प्रसन्नता नहीं रहती। वे जिस ज्ञान से, जिस भाव से प्रसन्न रहें आचरण करो बस !

डूब जाओ, तड़पो तो प्रकट हो जायेगा !

एक होता है जाया, दूसरा होता है जनक। एक होता है पैदा हुआ और दूसरा होता है पैदा करने वाला। तो पैदा होने वाला पैदा करने वाले को जान नहीं सकता। मान सकते हैं कि ‘यह मेरी माँ है, यह मेरे पिता हैं।’

तो सृष्टि की चीजों से या मन-बुद्धि से हम ईश्वर को जान नहीं सकते, मान लेते हैं। और मानेंगे तो महाराज ! ईश्वर व ब्रह्मवेत्ता सद्गुरु की बात भी मानेंगे और उनकी बात मानेंगे तो वे प्रसन्न होकर स्वयं अपना अनुभव करा देंगे।

सोइ जानइ जेही देहु जनाई।

जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।। (श्री रामचरित. अयो.कां. 126.2)

बापू का 81वाँ जन्मदिवस है तो शरीर के जन्म के पहले हम (पूज्य श्री) नहीं थे क्या ?

तो मानना पड़ेगा कि ‘शरीर का जन्मदिवस है, मेरा नहीं है।’ ऐसा मान के फिर आप लोग अपना जन्मदिवस मनाते हो तो मेरी मना नहीं है लेकिन ‘शरीर का जन्म मेरा जन्म है।’ ऐसा मानने की गलती मत करना। ‘शरीर की बीमारी मेरी बीमारी है, शरीर का बुढ़ापा मेरा बुढ़ापा है, शरीर का गोरापन-कालापन मेरा गोरा-कालापन है…..’ यह मानने की गलती मत करना।

मनोबुद्धयहंकारीचित्तानी नाहं….

शरीर भी मैं नहीं हूँ और मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त भी मैं नहीं हूँ। तो फिर क्या हूँ ? बस डूब जाओ, तड़पो तो प्रकट हो जायेगा ! असली जन्मदिवस तो तब है जब –

देखा अपने आपको मेरा दिल दीवाना हो गया।

न छेड़ो मुझे यारों मैं खुद पे मस्ताना हो गया।।

तभी तो जन्मदिवस का फल है। मरने वाले शरीर का जन्मदिवस…. जन्मदिवस तो मनाओ पर उसी निमित्त मनाओ जिससे सत्कर्म हो जायें, सद्बुद्धि का विकास हो जाय, अपने सतस्वभाव को जानने की ललक जग जाय….

ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः। अपने आत्मदेव को जानने वाले शोक, भय, जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि – सब बंधनों से मुक्त होता है।

मुझ चिदाकाश को ये सब छू नहीं सकते, प्रतीतिमात्र है, वास्तव में हैं नहीं। जैसे स्वप्न व उसकी वस्तुएँ, दुःख, शोक प्रतीतिमात्र हैं। प्रभु जी = साधक जी ! आप भी वही हैं। ये सब गड़बड़ें मरने मिटने वाले तन-मन में प्रतीत होती हैं। आप न मरते हैं न जन्मते हैं, न सुखी-दुःखी होते हैं। आप इन सबको जानने वाले हैं, नित्य शुद्ध बुद्ध, विभु-व्यापक चिदानंद चैतन्य हैं।

चांदणा कुल जहान का तू

तेरे आसरे होय व्यवहार सारा।

तू सब दी आँख में चमकदा है,

हाय चांदणा तुझे सूझता अँधियारा।।

जागना सोना नित ख्वाब तीनों,

होवे तेरे आगे कई बारह।

बुल्लाशाह प्रकाशस्वरूप है,

इक तेरा घट वध न होवे यारा।।

तुम ज्योतियों की ज्योति हो, प्रकाशकों के प्रकाशक हो। द्रष्टा हो मन-बुद्धि के और ब्रह्माँडों के अधिष्ठान हो। ॐ आनंद… ॐ अद्वैतं ब्रह्मास्मि। द्वितयाद्वै भयं भवति। द्वैत की प्रतीति है, लीला है। अद्वैत ब्रह्म सत्य….।

ऋषि प्रसाद, मार्च 2017, पृष्ठ संख्या 5-7, अंक 291

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आपके जीवन में शिव-ही-शिव हो


आपके जीवन में शिव-ही-शिव हो
(आत्मनिष्ठ पूज्य बापूजी की कल्याणमयी मधुमय वाणी)
महाशिवरात्रि पर विशेष

चार महारात्रियाँ हैं – जन्माष्टमी, होली, दिवाली और शिवरात्रि। शिवरात्रि को ‘अहोरात्रि’ भी बोलते हैं। इस दिन ग्रह-नक्षत्रों आदि का ऐसा मेल होता है कि हमारा मन नीचे के केन्द्रों से ऊपर आये। देखना, सुनना, चखना, सूँघना व स्पर्श करना- इस विकारी जीवन में तो जीव-जंतु
भी होशियार हैं। यह विकार भोगने के लिए तो बकरा, सुअर, खरगोश और कई नीच योनियाँ हैं। विकार भोगने के लिए तुम्हारा जन्म नहीं हुआ है।

विकारी शरीरों की परम्परा में आते हुए भी निर्विकार नारायण का आनंद-माधुर्य पाकर अपने शिवस्वरूप को जगाने के लिए शिवरात्रि आ जाती है कि ‘लो भाई ! तुम उठाओ इस मौके का फायदा…।’

शिवजी कहते हैं कि ‘मैं बड़े-बड़े तपों से, बड़े-बड़े यज्ञों से, बड़े-बड़े दानों से, बड़े-बड़े व्रतों से इतना संतुष्ट नहीं होता हूँ जितना शिवरात्रि के दिन उपवास करने से होता हूँ।’ अब शिवजी का संतोष क्या है ? तुम भूखे मरो और शिवजी खुश हों, क्या शिव ऐसे हैं ? नहीं, भूखे नहीं मरोगे, भूखे रहोगे तो शरीर में जो रोगों के कण पड़े हैं, वे स्वाहा हो जायेंगे और जो आलस्य, तन्द्रा बढ़ानेवाले विपरीत आहार के कण हैं वे भी स्वाहा हो जायेंगे और तुम्हारा जो छुपा हुआ सत् स्वभाव, चित् स्वभाव, आनंद स्वभाव है, वह प्रकट होगा। शिवरात्रि का उपवास करके, जागरण करके देख लो। शरीर में जो जन्म से लेकर विजातीय द्रव्य हैं, पाप-संस्कार हैं, वासनाएँ हैं उन्हें मिटाने में शिवरात्रि की रात बहुत काम करती है।

शिवरात्रि का जागरण करो और ‘बं’ बीजमंत्र का सवा लाख जप करो। संधिवात (गठिया) की तकलीफ दूर हो जायेगी। बिल्कुल पक्की बात है ! एक दिन में ही फायदा ! ऐसा बीजमंत्र है शिवजी का। वायु मुद्रा करके बैठो और ‘बं बं बं बं बं’ जप करो, उपवास करो फिर देखो अगला दिन कैसा स्फूर्तिवाला होता है।

शिवरात्रि की रात का आप खूब फायदा उठाना। विद्युत के कुचालक आसन का उपयोग करना। भीड़भाड़ में, मंदिर में नहीं गये तो ऐसे ही ‘ॐ नमः शिवाय’ जप करना। मानसिक मंदिर में जा सको तो जाना। मन से ही की हुई पूजा षोडशोपचार की पूजा से दस गुना ज्यादा हितकारी होती है और अंतर्मुखता ले आती है।

अगर आप शिव की पूजा-स्तुति करते हैं और आपके अंदर में परम शिव को पाने का संकल्प हो जाता है तो इससे बढ़कर कोई उपहार नहीं और इससे बढ़कर कोई पद नहीं है। भगवान शिव से प्रार्थना करें : ‘इस संसार के क्लेशों से बचने के लिए, जन्म-मृत्यु के शूलों से बचने के लिए हे भगवान शिव ! हे साम्बसदाशिव ! हे शंकर! मैं आपकी शरण हूँ, मैं नित्य आनेवाली संसार की यातनाओं से हारा हुआ हूँ, इसलिए आपके मंत्र का आश्रय ले रहा हूँ। आज के शिवरात्रि के इस व्रत से और मंत्रजप से तुम मुझ पर प्रसन्न रहो क्योंकि तुम अंतर्यामी साक्षी-चैतन्य हो। हे प्रभु ! तुम संतुष्ट होकर मुझे ज्ञानदृष्टि प्राप्त कराओ। सुख और दुःख में मैं सम रहूँ। लाभ और हानि को सपना समझूँ। इस संसार के प्रभाव से पार होकर इस शिवरात्रि के वेदोत्सव में मैं पूर्णतया अपने पाप-ताप को मिटाकर आपके पुण्यस्वभाव को प्राप्त करूँ।’

शिवधर्म पाँच प्रकार का कहा गया हैः एक तो तप (सात्त्वि आहार, उपवास, ब्रह्मचर्य) शरीर से, मन से, पति-पत्नी, स्त्री-पुरुष की तरफ के आकर्षण का अभाव। आकर्षण मिटाने में सफल होना हो तो ‘ॐ अर्यमायै नमः… ॐ अर्यमायै नमः…’ यह जप शिवरात्रि के दिन कर लेना, क्योंकि शिवरात्रि का जप कई गुना अधिक फलदायी कहा गया है । दूसरा है भगवान की प्रसन्नता के लिए सत्कर्म, पूजन-अर्चन आदि (मानसिक अथवा शारीरिक), तीसरा शिवमंत्र का जप, चौथा शिवस्वरूप का ध्यान और पाँचवाँ शिवस्वरूप का ज्ञान। शिवस्वरूप का ज्ञान – यह आत्मशिव की उपासना है। चिता में भी शिवतत्त्व की सत्ता है, मुर्दे में भी शिवतत्त्व की सत्ता है तभी तो मुर्दा फूलता है। हर जीवाणु में शिवतत्त्व है। तो इस प्रकार अशिव में भी शिव देखने के नजरियेवाला ज्ञान, दुःख में भी सुख को ढूँढ़ निकालनेवाला ज्ञान, मरुभूमि में भी वसंत और गंगा लहरानेवाला श्रद्धामय नजरिया, दृष्टि यह आपके जीवन में शिव-ही-शिव लायेगी ।