Yearly Archives: 2018

संस्कृतिप्रेमी व साधक क्या करें ?


अपने अनुभव का आदर करें। आपके अंदर सत्यस्वरूप अंतर्यामी चैतन्य जगमगा रहा है। अपने उस सद्ज्ञानस्वरूप के अनुभव की निर्मल आँख से सच्चाई को जानें। धर्म, संस्कृति व समाज के हित में पूरा जीवन लगाने वाले करूणासिंधु संतों-महापुरुषों के प्रति किसी अन्य की मान्यता या दृष्टि के आधार पर कोई धारणा न बनायें। अपना जीवन कीमती है, उसे मात्र किसी की मान्यता के आधार पर व्यर्थ करना बुद्धिमानी नहीं है।

अफवाहों में न उलझें। भ्रामक खबरों व उनको फैलाने वाले माध्यमों से बचें। आश्रम से संबंधित किसी भई तथ्य की जानकारी हेतु अहमदाबाद आश्रम से सम्पर्क करें।

आसपास के साधकों, संस्कृतिप्रेमियों से मिल के एकता बढ़ायें। आपस में चर्चा करें व समूह बनायें। साधकों के लिए हर सप्ताह सामूहिक संध्या, बैठक करना, सेवा-साधना हेतु उत्साहवर्धक सत्संग चलाना, सुप्रचार सेवा-संबंधी विचार-विमर्श करना विशेष हितकारी है।

संस्कृतिरक्षक प्राणायाम करें। (पढ़ें ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2017, पृष्ठ 4 या देखें )

साधक पूज्य बापू जी की शीघ्र रिहाई हेतु प्रतिदिन ‘पवन तनय बल पवन समाना। बुधि विवेक विग्यान निधाना।।’ मंत्र की 2 माला व ‘ॐॐॐ बापू जल्दी बाहर आयें’ मंत्र की एक माला अवश्य करें।

जप, त्राटक, ध्यान आदि जो भी साधना तथा सेवा करें, पूज्य गुरुदेव की शीघ्र ससम्मान रिहाई के संकल्प के साथ करें।

घर-घर तक ऋषि प्रसाद, लोक कल्याण सेतु, ऋषि दर्शन आदि पहुँचाने, बाल संस्कार केन्द्र चलाने, युवा सेवा संघ एवं महिला उत्थान मंडल की संस्कार सभाएँ चलाने आदि की सेवा में तत्परता से लगे रहें। याद रखें वे हमारे प्यारे गुरुदेव द्वारा हमें दी गयी मंगलमय धरोहरें हैं, जिन्हें हमें भली प्रकार सँजोये रखना है एवं और भी बढ़ाना है।

साधक अकेले, 2-2 या 4-4 का समूह बनाकर ‘साधक सम्पर्क अभियान’ चलायें। अपने आस-पास पड़ोस एवं क्षेत्र के साधकों से मिलने जायें और बापू जी का संदेश उन्हें सुनायें। उनकी साधना में प्रीति एवं गुरुदेव के दैवी सेवाकार्य में सहभागिता का उत्साह बढ़े ऐसी चर्चा, ऐसा वार्तालाप उनके साथ करें। पूज्य बापू जी के विश्व-मांगल्य के कार्यों को सुसम्पन करने के लिए सुसंवादिता अत्यंत आवश्यक है।

सप्ताह में 1-2 दिन जैसे – गुरुवार, रविवार को तथा पर्व त्यौहारों पर अपने नजदीकी आश्रम में जाने का निश्चय करें व उसका दृढ़ता से पालन करें। आश्रम के नजदीक रहने वाले साधक अगर प्रतिदिन आश्रम जा सकें तो प्रयत्नपूर्वक जायें, वहाँ के पवित्र वातावरण में साधन-भजन करें तथा गौ-सेवा व आश्रम द्वारा संचालित अन्य दैवी सेवाकार्यों का लाभ लें।

समाज के जिन लोगों को अपने महापुरुषों व धर्मबंधुओं के सर्वहितकारी कार्यों में सहभागी होना सम्भव नहीं हो, वे लोग उन्हें अपने शुभ संकल्पों से पोषित कर मानसिक सेवा का लाभ अवश्य ले सकते हैं, यह उन्हें बतायें। यह उन्हें कुछ-न-कुछ पुण्य प्रदान कर ही देगा।

इतना भी न कर सकें तो महापुरुषों एवं उनके सेवाभावी शिष्यों की निंदा करके अपने स्वास्थ्य, आयु, आनंद, शांति व सौभाग्य का तो नाश न करें। अपने पूर्वकृत पुण्यों की रक्षा करना यह भी एक प्रकार की सेवा ही मानी जा सकती है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2018, पृष्ठ संख्या 14 अंक 305

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

सौंदर्य, शक्ति और कर्मण्यता के पीछे कौन है ?


यह सौंदर्य या शोभा, चेष्टा, सजीवता और उत्साह क्या वस्तु है ? क्या वह आँख, कान या नाक के कारण है ? नहीं, नेत्र-कान इत्यादि में तो वह प्रकट होती ह। सुंदरता, शोभा आपके भीतर के परमेश्वर से मिलती है, और किसी दूसरी चीज से नहीं। वह चेतनता है। चेतनता, उद्योगशक्ति या गति जिसके कारण है ? देखिये, आप मार्ग चल सकते हो, ढालू पहाड़ों पर चढ़ सकते हो, जहाँ चाहो जा सकते हो किंतु देहपात होने पर क्या हो जाता है ? प्राणांत होने पर चेतनना और उद्योगशक्ति, आपके भीतर का वह ईश्वर, जो आपको ऐसी-ऐसी ऊँचाइयों पर उठा ले जा सकता था, जो पहले आपकी सहायता किया करता था वैसी अब नहीं करता। तो फिर इस शरीर के अंदर कौन है जिसके कारण नसें डोलती हैं, बाल बढ़ते हैं, नाड़ियों में रक्त का संचार होता है ? शरीर के अंगों को यह सब चाल, शक्ति, फुर्ति देने वाला कौन है ? वह एक विश्वव्यापी शक्ति है, एक ‘विश्वेश्वर’ है जो वस्तुतः आप ही हो, वह ‘आत्मा’ है।

जब कोई मनुष्य मर जाता है तब कुछ आदमियों को उसे उठाकर श्मशान ले जाना पड़ता है। और जब वह जीवित था तब वह कौन चीज थी जो उसका मनों भारी बोझ बड़ी-बड़ी ऊँचाइयों पर, ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों पर उठा ले जाती थी ? वह कोई अदृश्य, अवर्णनीय वस्तु है परंतु है अवश्य। वह आपके अंदर आत्मदेव है, वही हर एक शरीर में परमात्मा है और वही परमेश्वर हर एक वस्तु को शक्ति और कर्मण्यता प्रदान करता है। प्रत्येक व्यक्ति की गति और चेष्टा में शोभा का कारण भी वही परमेश्वर। जब कोई मनुष्य सोया होता है तब उसके नेत्र नहीं देखते, कान नहीं सुनते। जब मनुष्य मर जाता है तब भी उसके नेत्र जहाँ-के-तहाँ रहते हैं पर वह देखता नहीं, उसके कान ज्यों-के-त्यों रहते हैं पर वह सुनता नहीं। क्यों ? क्योंकि भीतर का वह ईश्वर या वह आत्मदेव अब उसी तरह सहायता नहीं करता जैसे पहले करता था। वह भीतर का ईश्वर ही है जो नेत्रों द्वारा देखता है, कानों को सुनवाता है, नाक को सूँघने की शक्ति देता है और सब रगों का शक्तिदाता भी वह भीतरी ईश्वर-परमात्मा ही है। अंतर्गत (अंदर छिपा हुआ) ईश्वर ही समस्त बाह्य शोभा एवं सौंदर्य का सारांश तत्त्व है, इसे याद रखो। आपके सामने कौन है ? जब आप किसी व्यक्ति की ओर देखते हैं तब आपसे नज़र कौन मिलाता है ? वही भीतर का ईश्वर ! बाहरी नेत्र, त्वचा, कान इत्यादि साधनमात्र हैं। वे केवल बाहरी वस्त्र हैं, और कुछ नहीं।

इस दुनिया में जब लोग पदार्थों को प्यार और उनकी इच्छा करने लगते हैं, तब सच्चिदानंद की अपेक्षा पोशाक को, वस्त्र को अधिक प्यार करने लगते हैं, जिस पोशाक के द्वारा वह सच्चिदानंद चमकता है। इस प्रकार वे सच्चिदानंद के सत्य, मूल और तत्त्व की अपेक्षा वस्त्रों, बाह्य रूपों व आकारों को अधिक प्यार और पूजा करते हैं। इसी से लोग दुःख उठाते हैं और इस गलती के कुफल भोगते हैं। यह तथ्य है। इससे ऊपर उठो। प्रत्येक पत्नी और पति को एक दूसरे में परमेश्वर को देखने का यत्न करना चाहिए। भीतरी ईश्वर को देखो, भीतर के ईश्वर की पूजा करो।

हर एक वस्तु आपके लिए ईश्वर बन जानी चाहिए। नरक का खुला द्वार होने के बदले स्त्री को पति के लिए दर्पण के समान होना चाहिए, जिसमें वह परमेश्वर के दर्शन कर सके। पति को भी नरक का खुला द्वार होने के बदले स्त्री के लिए दर्पण के समान होना चाहिए, जिसमें वह भी परमेश्वर को देख सके।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2018, पृष्ठ संख्या 20,22 अंक 304

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

भगवान से क्या माँगें ?


-भगवत्पाद साँईं श्री लीलाशाह जी महाराज

एक विद्यार्थी ने मेरे पास आकर कहाः “स्वामी जी ! आप कह रहे थे कि ‘ईश्वर हमसे अलग नहीं हैं।’ जब वे अलग नहीं हैं तो फिर माँगें किससे व क्या माँगें ?”

मैंने कहाः “अच्छा प्रश्न पूछा है।”

इस समय हमारे देश में रजोगुण बढ़ गया है। देश की दुर्गति हो रही है। विद्यार्थी व अन्य लोग संस्कारों से दूर होते जा रहे हैं। रिश्तेदार व अध्यापक भी धर्म से विमुख हो रहे हैं। ऐसे समय में विद्यार्थी ऐसा प्रश्न पूछे यह अच्छी बात है।

मैंने उससे कहा कि “यह बात समझ में आये तथा दिमाग में बैठे इसके लिए आवश्यक है कि सत्संग करो। अच्छे कर्म करो तथा कर्तव्य का पालन करो। हम क्या हैं वह समझें। हम ये स्थूल व सूक्ष्म शरीर नहीं हैं। जब स्वयं को ईश्वर का अविभाज्य स्वरूप मानते हैं, तब जीवन्मुक्ति माँगते हैं। जीवन्मुक्ति क्या है ? सदैव आनंद में रहना। अपना-अपना कर्तव्य निभा के स्वयं को पहचान कर जीवन्मुक्त बनें।

यह बात आम नहीं है। हममें जीवन्मुक्ति प्राप्त करने के लक्षण होने चाहिए। राजा वह जिसके पास सेना हो, खजाना हो। इनके बिना शाह होना नामुमकिन है। हममें भी विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति आदि गुण नहीं हैं तो जीवन्मुक्त कैसे होंगे ?”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2018, पृष्ठ संख्या 19 अंक 304

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ