Monthly Archives: March 2019

यह भी अपने-आप में बड़ी सिद्धि है


कार्य की सफलता उद्यम से होती है । जो प्रयत्नशील एवं उद्यमशील रहता है उसी के कार्य सिद्ध होते हैं, आलसी के नहीं । जंगल का राजा होने के बाद भी सोये हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं प्रवेश नहीं करते, उसे भी उद्यम करना पड़ता है ।

जर्मनी में जोजफ बर्नडार्ड नामक एक युवक था, जो बचपन में इतना भोंदू था कि उसे पढ़ाने के लिए माता-पिता ने उसको कई स्कूलों में भर्ती कराया, कई योग्य शिक्षक नियुक्त किये पर वह बुद्धु ही रहा ।

एक दिन दुःखी माता-पिता ने क्रोध में आकर उससे कहाः “अरे मूर्ख ! तेरे जैसे निकम्मे के स्थान पर हम लोग कोई पिल्ला पाल लेते तो अच्छा था ।”

ये शब्द बर्नडार्ड को चुभ गये । उसने उसी क्षण निश्चय कर लिया कि ‘अब मैं निकम्मेपन के इस दाग को धोकर ही रहूँगा !’

उसने अपनी सारी शक्ति अध्ययन में केन्द्रित कर दी । उसकी लगन, जोश व निश्चय-बल का परिणाम यह हुआ कि वह मूर्ख बालक नौ-नौ भाषाओं का ज्ञाता बन गया ।

उसने ऐसी विलक्षण क्षमता अपने भीतर पैदा कर ली कि जब वह पार्लियामेंट में आया तो 9-9 भाषाओं में बोलता और लिखता था । उसकी क्षमता 9 व्यक्तियों के बराबर हो गयी, जिसे देखकर लोग दंग रह जाते थे ।

यह तो कुछ भी नहीं, हमारे देश में ऐसे अगणित उदाहरण इतिहास प्रसिद्ध हैं । महामूर्ख किशोर को सत्संग मिला और लग गया उसके अनुसार पुरुषार्थ करने तो वही आगे चलकर महान संत श्रीधर स्वामी के नाम से सुविख्यात हो गये । जिस डाली पर बैठा है उसे ही काट रहा है – ऐसा युवक पुरुषार्थ में लग गया और वही समय पाकर महान विद्वान एवं महाकवि कालिदास जी के नाम से प्रसिद्ध हो गये । जगतपति को प्रकट करने व अटल पद पाने के पीछे ध्रुव का पुरुषार्थ ही तो था !

मनुष्य जब तक स्वयं उठने की चेष्टा नहीं करता तब तक वह निकम्मा ही रहता है । यदि उसका सोया हुआ आत्मबल जाग जाय तो ऐसी कौन-सी मंजिल है जो वह नहीं पा सकता !

उद्यमी को देखकर भाग्यहीनता डर के भाग जाती है । उद्यमी चट्टान में भी राह बना लेता है । उद्यम करने पर भी कभी ध्येय सिद्ध न हो तो भी उदा नहीं होना चाहिए क्योंकि पुरुषार्थ अथवा प्रयत्न स्वयं ही एक बड़ी सिद्धि है । अतः जीवन में पुरुषार्थ होना चाहिए । और हमारा पुरुषार्थ सुफलित हो इसके लिए जरूरी है कि वह संत व शास्त्र सम्मत हो ।

पूज्य बापू जी के सत्संग में आता हैः “जो उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम का अवलम्बन लेता है उसको अंतर्यामी परमेश्वर पद-पद पर सहायता करते हैं । उद्यमी और श्रमशील लोगों को ही श्री और सुख प्राप्त होते हैं । देवता भी आलस्यरहित, उत्साही, श्रमशील लोगों की ही सहायता करते हैं । जो चलचित्र देखता है है, अपने समय शक्ति खोता है या आलसी होकर बैठा रहता है उसका भाग्य भी बैठा रहता है । जो उठ खड़ा होता है उसका भाग्य भी उठ खड़ा होता है । जो सोया पड़ा रहता है उसका भाग्य भी सोया पड़ा रहता है । जो आगे बढ़ता है उसका भाग्य भी आगे बढ़ता है । अतः सुयोग्य संग, सुयोग्य पुरुषार्थ और ऊँचा उद्देश्य (परमात्मप्राप्ति), ऊँचा संग-सत्संग सर्वांगीण विकास की कुंजी है ।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2019, पृष्ठ संख्या 8 अंक 315

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ईश्वर का दर्शन कैसे हो ?


भगवत्पाद साँईं श्री लीलाशाहजी महाराज प्राकट्य दिवसः 28 मार्च 2019

किसी जिज्ञासु ने साँईं श्री लीलाशाहजी महाराज से निवेदन कियाः “स्वामी जी ! ईश्वर का दर्शन कैसे हो सकेगा ?”

स्वामी जी ने कहाः “ईश्वर का दर्शन करने से पहले मुझे यह बताओ कि तुम कौन हो ? क्या होंठ हो, कान हो, मांस हो, दाँत हो या प्राण हो ? आखिर तुम कौन हो ? तुम्हें अपने बारे में ही जानकारी नहीं है तो फिर ईश्वर का दर्शन कैसा ?

जन नानक बिनु आपा चीनै मिटै न भ्रम की काई ।।

जब तक अपने-आपको नहीं जाना तब तक मन से भ्रम नहीं जायेगा, राग-द्वेष का पर्दा नहीं हटेगा और जब तक यह नहीं होगा तब तक ईश्वर के वास्तविक सर्वव्यापक स्वरूप का दर्शन यानी परमात्मा-अनुभव कतई नहीं हो सकेगा ।

अबके बिछड़े कब मिलेंगे, जाय पड़ेंगे दूर ।

दुनिया के दूसरे कायों की कितनी फिक्र करते हो – ‘पिता जी नाराज होंगे… भाई, 7 बज गये हैं, स्कूल जाने में देरी हो रही है, जल्दी जाऊँ… बैंक बंद न हो जाय, जल्दी चलो… फिल्म शुरू न हो जाय… रेल न छूट जाय…. खाने का समय हो गया है….’ आप इन कार्यों को आवश्यक मानते हो परंतु इन सबसे मुख्य कार्य है स्वयं को पहचानना । जब हम स्वयं को को पहचानेंगे तब यह मालूम होगा कि हम हड्डियों, मांस के पुतले नहीं हैं तथा यह जो सामान हमें मिला है वह हमारा नहीं है । हम सब मुसाफिर हैं, हम सबके साक्षी सत्-चित्-आनंदस्वरूप, न बुझने वाली ज्योति हैं । हम सब स्वयं को ऐसा समझेंगे तब फिर और दर्शन कैसा ? फिर तो शाह साहब ने कहा हैः प्रियतम मैं खुद ही हूँ, प्रेमिका होने में सहस्रों कष्ट थे अर्थात् मैं स्वयं आत्मा-ब्रह्म था, खुद को जीव मानने के कारण मुझे इतने कष्ट झेलने पड़े ।

खुदी मिटी तब सुख भय मन तन भए अरोग ।

नानक द्रिसटी आइआ उसतति करनै जोगु ।।

‘जब अहं-भावना दूर हुई तब सच्चा सुख, आत्मिक आनंद मिला, जिसके प्रभाव से तन मन स्वस्थ हो गये और उस परमात्मा का अनुभव हुआ, जो सचमुच गुण-स्तुति का अधिकारी है ।’

रूहल कहते हैं कि ‘अपने-आपमें बैठकर जब खुद को देखा तब देखा कि न तो कोई स्थान है, न लोग हैं और न हम ही हैं । हम जिनको खोज रहे थे वे तो हम स्वयं ही हैं । प्रियतम से एकत्व के बाद द्वैत दूर हो गया ।’

यह शरीर जिस भूमि पर पैदा हुआ है उस भूमि को हम अपना वतन समझ बैठे हैं । यह कितनी बड़ी भूल है । हमारा असली वतन तो वह है जो हमसे बिछड़ न सके । जो हमसे बिछड़ जायेगा वह हमारा वतन कैसे हुआ ?

हम यहाँ इसलिए आयें हैं कि भलाई के कार्य करें, बुरे कार्यों से दूर रहें, इन्द्रियों के गुलाम न बनें, बुद्धि से काम लें, अंतर को प्रकाशमान करें । हम यहाँ स्वयं करें । हम यहाँ स्वयं को पहचानने के लिए आये हैं ।

अगर कोई कहे कि हम यदि शरीर नहीं हैं तो भला क्या हैं ? क्या अज्ञन हैं ? अज्ञान को भी किसी जानकारी द्वारा जाना जा सकता है । (जब हम कहते हैं, ‘मैं इस बात को नहीं जानता’ तो हमें अज्ञान का भी ज्ञान है ।) तो फिर क्या हम शून्य हैं ? शून्य को भी किसी शक्ति के द्वारा पहचाना जा सकता है ।

गुरुमुखदास ने अपने बेटे जयराम को कहाः “बेटे ! कमरे से सारा सामान निकाल कर कमरा खाली कर दो ।”

जयराम ने कमरा एकदम खाली करके पिता से कहाः “पिता जी ! मैंने कमरा खाली कर दिया है, भीतर कुछ नहीं है ।”

जयराम कमरे में ही खड़ा था । पिता ने बाहर से कुंडी लगा दी । तब जयराम ने चिल्लाकर कहाः “पिता जी ! यह क्या कर रहे हो ?”

“बेटे ! तुमने ही तो कहा था कि कमरे में कुछ भी नहीं है ।”

“पिता जी ! मैं तो हूँ ।”

ठीक इसी प्रकार दूसरा कुछ नहीं है, एक तुम ही सबके साक्षी भीतर विराजमान हो । तुम ही ज्योतिस्वरूप हो ।

अपना रूप पछान, समझ मन दर्शन एही ।

आत्मा अपनी जान है ।

उपाधि1 के कारण कहा जाता है कि यह कमरा है, यह हॉल है, यह रसोई है आदि । एक ही स्थान को भिन्न-भिन्न नाम देकर भिन्न-भिन्न समझ बैठे हैं । वास्तव में सब एक पृथ्वी ही है । दीवारें आदि यदि ख्याल में न लायें तो फिर सिर्फ एक ब्रह्मांड ही ब्रह्मांड दिखाई देगा ।

काहे रे बन खोजन जाई ।

सरब निवासी सदा अलेपा तोहि संगी समाई ।।

हे भाई ! परमात्म को खोजने के लिए तू जंगलों में क्यों जाता है ? वह सर्व निवासी, सदा निर्लेप परमात्मा अंतर्यामीरूप से अभी तेरे संग है, तुझी में ओतप्रोत समाया हुआ है ।

1 उपाधि माने वह आरोपित वस्तु जो मूल वस्तु को छुपाकर उसको और की और या किसी विशेष रूप में दिखा दे । जैसे – आकाश असीम और निराकार है परंतु घट और मठ की उपाधियों से सीमित और भिन्न-भिन्न रूपों में प्रतीत होता है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2019, पृष्ठ संख्या 6,7 अंक 315

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विविध रोगनाशक एवं स्वास्थ्यरक्षक नीम


प्राकृतिक वनस्पतियाँ लोक-मांगल्य एवं व्याधिनिवारक गुणों से युक्त होने के कारण भारतीय संस्कृति में पूजनीय मानी जाती हैं । इनमें नीम भी एक है । इसकी जड़, फूल-पत्ते, फल, छाल – सभी अंग औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं ।

आयुर्वेद के अनुसार नीम शीतल, पचने में हलका, कफ, पित्तशामक व थकान, प्यास, खाँसी, बुखार, अरूचि, कृमि, घाव, उलटी, जी मिचलाना, प्रमेह (मूत्र-संबंधी रोगों) आदि को दूर करने वाला है ।

नीम के पत्ते नेत्रहितकर तथा विषनाशक होते हैं । इसके फल बवासीर में लाभदायी हैं । नीम के सभी अंगों की अपेक्षा इसका तेल अधिक प्रभावशाली होता है । यह जीवाणुरोधी कार्य करता है ।

औषधीय प्रयोग

नीम के पत्तेः 1. स्वप्नदोषः 10 मि.ली. नीम-पत्तों के रस या नीम अर्क में 2 ग्राम रसायन चूर्ण मिला के पियें ।

  1. रक्तशुद्धि व गर्मीशमन हेतुः सुबह खाली पेट 15-20 नीम-पत्तों का सेवन करें ।

फूल व फलः पेट को रोगों से सुरक्षाः नीम के फूल तथा पकी हुई निबौलियाँ खाने से पेट के रोग नहीं होते ।

नीम तेलः 1. चर्मरोग व पुराने घाव में- नीम का तेल लगायें व  इसकी 5-10 बूँदें गुनगुने पानी से दिन में दो बार लें ।

  1. गठिया व सिरदर्द में- प्रभावित अंगों पर नीम-तेल की मालिश करें ।
  2. जलने परः आग से जलने से हुए घाव पर नीम-तेल लगाने से शीघ्र भर जाता है ।

(नीम अर्क, नीम तेल, मुलतानी नीम तुलसी साबुन एवं रसायन चूर्ण सत्साहित्य सेवाकेन्द्रों व संत श्री आशाराम जी आश्रम की समितियों के सेवाकेन्द्रों पर उपलब्ध हैं ।)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2019, पृष्ठ संख्या 31 अंक 315

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