Yearly Archives: 2019

यह मेरे तारणहार का तिलक है – पूज्य बापू जी


एक सेठ अपने रसोइये को डाँटते कि “तू मेरे घर का खाता है, मेरी नौकरी करता है तो जैसा मैं तिलक करता हूँ, मेरा परिवार तिलक करता है ऐसा तू भी किया कर ।”

रसोइया ‘हाँ’, ‘हाँ’ कहता रहा लेकिन अपना तिलक नहीं बदला । आखिर सेठ परेशान हो गये । सेठ ने कहाः “अगर कल हमारे सम्प्रदाय का तिलक तूने नहीं किया तो नौकरी से छुट्टी समझना ।”

इस प्रकार डाँटते हुए सेठ ने नौकर से दूसरे ढंग से तिलक करने का वचन ले लिया ।

दूसरे दिन नौकर आया, सेठ चकित हो गये कि नौकर के ललाट पर वही अपना तिलक ! सेठ ने दुत्कारते हुए, फटकारते हुए कहाः “पागल ! कल वचन दे गया था फिर भी तिलक तू अपने ढंग का करता है, हमारे ढंग का क्यों नहीं किया ?”

रसोइये ने कमीज उठाकर पेट दिखाया तो वहाँ पर सेठ के कुल का तिलक था ।

रसोइये ने कहाः “सेठ जी ! आपने आग्रह किया इसलिए आपका तिलक मैंने लगाया है । मैं आपके पास पेट के लिए आता हूँ इसलिए पेट पर आपके कुल का तिलक लगाया है । ललाट पर तो मुझे मेरे गुरुदेव के श्रद्धा-विश्वास का तिलक ही लगाने दो, औरों के तिलक की जरूरत नहीं है । यह मेरे तारणहार का तिलक है । सेठ जी ! मैं मजबूर हूँ इसलिए पेट पर तुम्हारा तिलक लगा दिया है ।”

भारत का रसोइया भी अपना विश्वास नहीं छोड़ता है, अपनी श्रद्धा नहीं छोड़ता है, अपनी दृढ़ता नहीं छोड़ता है तो तुम क्यों छोड़ो ? तुम क्यों भक्ति छोड़ो ? तुम क्यों नियम छोड़ो ? तुम क्यों संयम छोड़ो ? तुम क्यों अपने मनरूपी घोड़े को एकदम बेलगाम करो ?

कोई व्रत, कोई नियम, कुछ नियम-निष्ठा अपने जीवन में लाओ । अगर तुम उसमें थोड़े से सफल हुए तो तुम्हारा बल, तुम्हारी शक्ति विकसित होगी, मन अधीन होता जायेगा । छोटा सा ही नियम लो लेकिन उसको कड़ाई से पूरा करो । 10 प्राणायाम, 10-15 मिनट ध्यान, नीलवर्ण कमल (तीसरा केन्द्र – मणिपुर चक्र) विकसित करने का नियम (अग्निसार क्रिया) अवश्य करो, जिससे शरीर निरोग व फेफड़े बलवान बनेंगे, रोगप्रतिकारक शक्ति का विकास होगा, चित्त की प्रसन्नता, गुरुकृपा पाने की योग्यता, सद्ग्रुरु के ज्ञान को पचाने की क्षमता और मति की दृढ़ता में बढ़ोतरी हो जायेगी ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2019, पृष्ठ संख्या 24, अंक 319

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प्रवृत्ति को बदलें सत्प्रवृत्ति में


स्वामी विवेकानंद जी कहते हैं- “अपने ‘मैं’ (अहं) को धन-सम्पत्ति, प्रभुत्व, नाम-यश द्वारा सर्वदा बढ़ाने का यत्न करना, जो कुछ मिले उसी को पकड़े रखना, सारे समय सभी वस्तुओं को इस ‘मैं’ रूपी केन्द्र में ही संग्रहित करना – इसी का नाम है ‘प्रवृत्ति’ ।”

यह बंधनकारक है किंतु इसके बदले अगर कोई अपनी धन-सम्पत्ति, सुविधाओं, साधनों और समय-शक्ति को सबकी हितभावना से सदुपयोग में, परहित में लगाये तो सत्प्रवृत्ति हो जायेगी ।

हर कर्म के मूल में विचार, संकल्प या भाव होता है । यदि हमारे भाव ‘सत्’ के रस में डूबे हुए हों तो उन सद्भावों से जो कर्म होंगे वे निश्चय ही सत्कर्म होंगे । अतः जीवन में सद्भाव की अत्यंत आवश्यकता है ।

‘सत्’ की स्वीकृति से सद्भाव का प्राकट्य अपने-आप, बड़ी सहजता से हो जाता है । ‘सत्’ की स्वीकृति के बारे में पूज्य बापू जी के सत्संग में आता हैः “ईश्वर की दृष्टि में अपनी दृष्टि मिला दें । ईश्वर को जैसा जगत दिखता है और ‘स्व’ दिखता है ऐसा तू अपने को, ‘स्व’ को देख और जगत को देख । स्वीकृति दे दे, हो गया काम ! तो साधना का मतलब है आपकी स्वीकृति देने की तैयारी । ईश्वर की ‘हाँ’ में ‘हाँ’, सदगुरु की ‘हाँ’ में  ‘हाँ’ । साधन श्रमसाध्य नहीं है, स्वीकृति-साध्य है और ज्यों स्वीकृति दी त्यों ईश्वर और गुरु के अनुभव में एक होने में आसानी हो जायेगी ।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2019, पृष्ठ संख्या 17, अंक 319

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सनातन धर्म ही राष्ट्रीयता है


योगी अरविन्द जयन्तीः 15 अगस्त 2019

हिन्दू धर्म क्या है ?

दुनिया के सामने हिन्दू धर्म का संरक्षण और उत्थान – यही कार्य हमारे सामने हैं । परन्तु हिंदू धर्म क्या है ? वह धर्म क्या है जिसे हम सनातन धर्म कहते हैं ? वह धर्म हिन्दू धर्म इसी नाते है कि हिन्दू जाति ने इसको रखा (संरक्षित किया) है । समुद्र और हिमालय से घिरे हुए इस प्रायद्वीप (स्थल का वह भाग जो तीनों ओर से जल से घिरा हो) के एकांतवास में यह फला फूला है । युगों तक इसकी रक्षा करने का भार आर्य जाति को सौंपा गया था । परंतु यह धर्म किसी एक देश की सीमा से घिरा नहीं है । जिसे हम हिन्दू धर्म कहते हैं, वह वास्तव में सनातन धर्म है क्योंकि यही वह विश्वव्यापी धर्म है जो दूसरे सभी धर्मों का आलिंगन करता है । यदि कोई धर्म विश्वव्यापी न हो तो वह सनातन भी नहीं हो सकता । कोई संकुचित धर्म, साम्प्रदायिक धर्म, अनुदार धर्म कुछ काल और किसी मर्यादित हेतु के लिए ही रह सकता है । यह हिन्दू धर्म ही एक ऐसा धर्म है जो अपने अंदर विज्ञान के आविष्कारों और दर्शनशास्त्र के चिंतनों का पूर्वाभास (पूर्वज्ञान) देकर और उन्हें अपने अंदर मिला के जड़वाद (चेतन आत्मा का अस्तित्व न मानने वाला दार्शनिक मत) पर विजय प्राप्त कर सकता है । यही एक धर्म है जो मानव-जाति के दिल में यह बात बैठा देता है कि ‘भगवान हमारे निकट हैं’ । यह उन सभी साधनों को अपने अंदर ले लेता है जिनके द्वारा मनुष्य भगवान के पास पहुँच सकते हैं । यही एक धर्म है जो संसार को दिखा देता है कि संसार क्या है – वासुदेव की लीला । यही बताता है कि इस लीला में हम अपनी भूमिका अच्छी से अच्छी तरह कैसे निभा सकते हैं और यह दिखाता है कि इसके सूक्ष्म से सूक्ष्म नियम क्या हैं, इसके महान से महान विधान कौन से हैं ।

सच्ची राष्ट्रीयता

राष्ट्रीयता राजनीति नहीं बल्कि एक धर्म है, एक विश्वास है, एक निष्ठा है । सनातन धर्म ही हमारे लिए राष्ट्रीयता है । यह हिन्दू जाति सनातन धर्म को लेकर पैदा हुई है, उसी को ले के चलती है और पनपती है । जब सनातन धर्म की हानि होती है तब इस जाति की भी अवनति होती है और यदि सनातन धर्म का विनाश सम्भव होता तो सनातन धर्म के साथ-साथ इस जाति का विनाश हो जाता । सनातन धर्म ही राष्ट्रीयता है । यही वह (दैवी) संदेश है जो मैंने आपको सुनाया है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2019, पृष्ठ संख्या 10, अंक 319

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