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कठिनाइयों, विरोधों को बना सकते हैं शक्ति का स्रोत !


एक सज्जन व्यक्ति थे । उनका एक नौकर था जो कोई काम सही तरीके से नहीं करता था । उसके काम करने का ढंग ऐसा था की धीर से धीर व्यक्ति भी उसे देखकर आपे से बाहर हो जाय परंतु उसका मालिक बड़ा साधु स्वभाव का था । वह न तो नौकर से खिन्न होता और न ही कभी क्रोधावेश में आता था बल्कि उसके साथ बड़ा मधुर व्यवहार करता था ।

एक बार उसके घर में एक मेहमान आया । वह नौकर के व्यवहार से बहुत अप्रसन्न हुआ । उसने मालिक से कहाः “आप इसको तुरन्त हटा दीजिये ।”

मालिकः “आपकी सलाह तो अच्छी है और मैं जानता हूँ कि आप मेरी भलाई चाहते हैं इसलिए यह सलाह दे रहे हैं । परंतु ऐसे व्यवहार के कारण ही मैं उसको रखे हुए हूँ ।”

अजीब उत्तर सुन के मेहमान अवाक् रह गया !

मालिकः “मेरे सम्पर्क में आने वाले अन्य सभी लोग बहुत अच्छे, नेक, सज्जन हैं । वे मेरा विरोध करने की सोचते भी नहीं, सिर्फ यही ऐसा व्यक्ति है जो मेरी आज्ञा नहीं मानता, ऐसी बातें ऐसे काम करता है जो मेरे लिए अप्रशंसनीय व अपमानजनक हैं । इससे मुझे एक विशेष प्रशिक्षण मिलता है – समता बढ़ाने का, अपने पर नियंत्रण रखने का, अविकम्प योग का प्रशिक्षण । जैसे लोग अपनी शारीरिक शक्ति बढ़ाने हेतु व्यायाम के लिए डम्बलों का प्रयोग करते हैं, उसी प्रकार यह मेरी आध्यात्मिकता बढ़ाने हेतु मानो एक डम्बल है, इसके माध्यम से मैं अपनी समता, शांति, उदारता, सहनशीलता, आत्मदृष्टि – इन शक्तियों को सुगठित करता हूँ ।”

यदि आपको लगता है कि आपके संबंधी या अन्य कोई व्यक्ति अथवा संसार की अन्य अप्रिय बातें आपके लिए बाधा बनती हैं तो आपको झल्लाने या घबराने की आवश्यकता नहीं । आप उक्त मालिक के उदाहरण का अनुकरण कीजिये और कठिनाइयों, मतभेदों, विरोधों को बल और शक्ति का अतिरिक्त स्रोत बना लीजिये ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2019, पृष्ठ संख्या 7 अंक 319

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‘यह’, ‘वह’ के द्रष्टा ‘मैं’ की असलियत जानो तो पार…. पूज्य बापू जी


दुनिया का व्यवहार तीन ढंग से देखा गया है । एक तो ‘यह’ – जो रू बरू है, यह वस्तु यह व्यक्ति…. दूसरा ‘वह’ – वह वस्तु, वह व्यक्ति, वह भगवान… तीसरा ‘मैं’ । ‘यह’, ‘वह’ और ‘मैं’ – इन तीन से ही सारा  व्यवहार सम्पन्न होता है । ‘यह’ को जानने में ‘मैं’ की जरूरत है, ‘वह’ को जानने में भी ‘मैं’ की जरूरत है लेकिन ‘मैं’ को जानने में न ‘यह’ की जरूरत है न ‘वह’ की जरूरत है, ‘मैं’ स्वयंप्रकाश है । ‘मैं’ सदा रहता है । ‘यह’ और ‘वह’ पहले नहीं थे, अभी दिख रहे हैं और बाद में नहीं रहेंगे ।

तो संसारी बोलते हैं, हमारे लिए उपनिषद् कहती है कि यह जो दुनिया है इसमें त्याग से जियो । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा….. ‘यह’ का ठीक उपयोग करो तो भगवान मिलेंगे । लोभ, लालच छोड़ो, काम विकार छोड़ो, यह छोड़ो, वह छोड़ो…..।

उपासक बोलते हैं कि जब वह (भगवान) राज़ी होगा तब मिलेगा ।

सोई जानइ जेहि देहु जनाई ।

जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई ।। (श्री रामचरित. अयो.कां. 126.2)

वह अपने को जतायेगा तब मिलेगा ।

कर्मी बोलता है कि ‘यह’ का  उपयोग करो । कर्मयोग करो, सेवा करो, यह करो, वह करो… लेकिन वेदांत को जानने वाले बोलते हैं कि ‘यह’ और ‘वह’ की सिद्धि ‘मैं’ के बिना हो सकती है क्या ? नहीं हो सकती ।

तो जो ‘वह’ में ईश्वर खोजता है अथवा ‘यह’ में ईश्वर खोजता है उसको बहुत श्रम पड़ता है । कुछ चमत्कार दिखते हैं और उसमें उलझ भी जाता है । ‘मैं सिद्ध हूँ, मैं लंकापति रावण…. मैं हिरण्यकशिपु….’ हिरण्यकशिपु ने ‘यह’ में और ‘वह’ में 11500 वर्ष तपस्या की और आधिदैविक जगत की शक्तियाँ हस्तगत कीं । फिर भी हिरण्यकशिपु और उसकी प्रजा सुखी नहीं रही भगवान के रस के बिना, मैं की खोज के बिना ।

‘यह’ में, ‘वह’ में खोज-खोजकर कुछ चमत्कार देखते हैं, कुछ संतुष्टि रहती है, कुछ असंतुष्टि रहती है लेकिन ‘मैं’ में आते ही जैसे तरंग अपने असली स्वरूप पानी को खोजे तो तरंग सागर है, ऐसे ही यह ‘मैं’ अपनी असलियत को खोजे तो परमात्मा की सत्ता से ही यह स्फुरित होता है ।

संत ज्ञानेश्वर जी ने कहा कि ‘उपासक अपनी भावना के  बल से भगवान को प्रकट कर लेता है लेकिन द्वैत बना रहता है कि यह भगवान है अथवा वह भगवान है ।’ तो ‘यह’ और ‘वह’ जिससे सिद्ध होता है उस मैं को भगवानरूप में जानो । ‘यह’ को देखना हो तो ‘मैं’ चाहिए, ‘वह’ को देखना हो तो ‘मैं’ चाहिए, लेकिन ‘मैं’ की असलियत को जानो तो भगवान तुम्हारा आत्मा ! विश्रांति योग हो जायेगा । विभुर्व्याप्य सर्वत्र….. सर्वगत, सर्वव्यापक मैं चैतन्यस्वरूप…. जैसे घड़ा अपने को घड़ा न जानकर घटाकाश, महाकाश जाने ऐसे ही जीव अपने को परमेश्वर का, परमेश्वर को अपना जाने तो उसके बंधन छूट जाते हैं ।

कर्मी ‘यह’ को शुद्ध करके भगवान को खोज रहा है । उपासक ‘वह’ में भावना, कल्पना करके उसको खोज रहा है लेकिन सच्चे संत का शिष्य ‘मैं’ में आकर ‘मैं’ की शुद्धरूपता जान लेता है । मैं शरीर हूँ ? नहीं । मैं इन्द्रियाँ हूँ ? नहीं । मैं मन हूँ ? नहीं, मन को जानता हूँ । बुद्धि को भी जानता हूँ । अहं को भी जानता हूँ । सबको जो जानता है वह कौन है ? उसमें विश्रांति पाकर ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर लेता है ।

भगवान प्रेमस्वरूप हैं, ज्ञानस्वरूप हैं…. अपने ‘मैं’ में छुपे हैं भगवान ! शरीर में नहीं, मन में नहीं, इन्द्रियों में नहीं, जहाँ से ‘मैं’ उठता है…. अहंकार में नहीं, अहंकार की गहराई में परमात्मा छुपे हैं । ‘यह’ में भगवान मिलना कठिन है । ‘वह’ में भगवान खोजना कल्पना है लेकिन ‘मैं’ में भगवान हाजरा-हुजूर है ।

मौन, एकांत में रहकर, सात्तविक आहार पर रह के ध्यान व जप करें तो आत्म-ईश्वर तो हैं ही । जहाँ बैठे हों वहाँ पानी है लेकिन कंकड़-पत्थर हटाओ, कुआँ खोदो, बोरिंग करो तो पानी ही पानी है । ऐसे ही अपने अंतरात्मा म  आओ तो ईश्वर ही ईश्वर है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2019, पृष्ठ संख्या 5,6 अंक 319

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खर्चा एक कौड़ी का नहीं और पुण्य हो ढेर सारा ! पूज्य बापू जी


कलियुग का एक विशेष प्रताप है कि मानसिक पुण्य करो तो फलदायी हो जायेगा लेकिन मन से पाप करो तो कलियुग में उस पाप का फल अपने को नहीं मिलेगा । मन में आयाः ‘यह ऐसा है- वैसा है… यह करूँ…. वह करूँ….’ तो पाप नहीं लगेगा, जब तक वह कर्म नहीं किया । और मन में आया कि ‘आश्रम में जाऊँ… मंदिर में जाऊँ…. पूजा करूँ….’ मन ही मन भगवान को नहला दिया, गुरु को मत्था टेक लिया, मन ही मन गुरु को तिलकर कर दिया । मन ही मन भगवान को, गुरु को भोग लगा दिया तो मानस पुण्य हो जायेगा । खर्चा एक कौड़ी का नहीं और पुण्य हो ढेर सारा !

मानस पाप कलियुग में नहीं होता, मानस पुण्य हो जाता है ।

कलि कर एक पुनीत प्रतापा ।

मानस पुन्य होहिं नहीं पापा ।। (श्री रामचरित. उ.कां. 102.4)

इस शास्त्रवचन का लाभ उठाते हुए आप गुरुपूर्णिमा को मानसिक पूजन कर लेना या ऐसे ही रोज भगवान को, गुरु को मानसिक भोग लगा देना ।

गुरुदेव को मानसिक स्नान कराके पूजन, तिलक आदि करके फिर जप करने से जप का प्रभाव दस गुना हो जाता है और व्यासपूनम को तो खास ! यह बात हम जानते थे ।

हम गुरुपूर्णिमा को गुरु जी को मन से ही पूजन करते थे । वैसे तो रोज गुरुजी से बात करते थे, रोज गुरु जी की पूजा करते । पहले तो नजदीक से हो जाता था पर कभी-कभी नजदीकी नहीं मिलती तो मन ही मन गुरु जी को स्नान कराते, फिर पोंछते… गुरु जी बोलते हैं- “यह क्या ढीला-ढीला पोंछता है, जरा जोर से पोंछो, रोमकूप खुल जायें ।”

“हाँ साईं ! यह लो । यह लो साँईं !”

“हाँ, शाबाश है !”

मन ही मन हम गुरुदेव की शाबाशी भी ले लेते थे । फिर वस्त्र पहनाते, मन ही मन मोगरे के फूलों की 2 मालाएँ पहनाते, तिलक करते और मत्था टेकते । और देखते कि गुरु जी की कृपा बरस रही हैः ‘बस हो गया बेटे ! हो गया, हो गया !’

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम् ।

मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ।।

हजारों जन्मों के पिताओं ने, माताओं ने जो नहीं दिया, गुरु ने वह हँसते-खेलते दे डाला । कितने भी देवी देवताओं का पूजन करो फिर भी किसी का पूजन रह जाता है, कितना भी व्रत और तप करो फिर भी कुछ व्रत व तप रह जाता है लेकिन जिसने व्यासस्वरूप ब्रह्मज्ञानी गुरुदेव का आदर पूजन कर लिया और प्रसन्नता पा ली उसके लिए फिर किसी का पूजन बाकी नहीं रहता, कोई भी व्रत और तप बाकी नहीं रहता ।

सुपात्र मिला तो कुपात्र को दान दिया न दिया,

सत्शिष्य मिला तो कुशिष्य को ज्ञान दिया न दिया,

कहे कवि गंग सुन शाह अकबर !

पूर्ण गुरु मिले तो और को नमस्कार किया न किया ।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2019, पृष्ठ संख्या 4, अंक 319

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