Yearly Archives: 2019

श्रद्धा का बल, हर समस्या का हल-पूज्य बापू जी


मंत्रे तीर्थे द्विजे देवे दैवज्ञे भेषजे गुरौ ।

यादृशी भावना यस्य सिद्धिभवति तादृशी ।।

स्कन्द पुराण, प्रभास खंडः 278.39

मंत्र, तीर्थ, ब्राह्मण, देवता, ज्योतिषी, औषध और गुरु में जैसी भावना होती है वैसा ही फल मिलता है ।

संत नामदेव जी के पूर्व जीवन की एक कहानी है । युवक नामदेव का मन विठ्ठल में लगा तो उसके पिता को डर लगा कि ‘यह लड़का भगत बन जायेगा, साधु बन जायेगा तो फिर कैसे गुजारा होगा ?’ बाप ने थोड़ा टोका और धंधा करने, रोजी-रोटी कमाने के लिए बाध्य किया । एक दिन पिताश्री ने नामदेव को कुछ पैसे देकर कपड़ा खरीदवाया और कपड़े का गठ्ठर दे के दूसरे बेचने वालों के साथ बाजार में भेजा ।

नामदेव बाजार में अपना गठ्ठर रख के कपड़े के नमूने खोलकर बैठा लेकिन अब उसकी पिछले जन्म की की हुई सात्त्विक भक्ति उसे बार-बार अँतर्मुख करती है । नामदेव आँखें मूँदकर ‘विठ्ठल-विठ्ठल ‘ करते हुए सात्त्विक सुख में मग्न है । शाम हुई, और लोगों का कपड़ा तो बिका लेकिन नामदेव वही गठ्ठर वापस उठाकर आ रहा है । सोचा कि पिता जी डाँटेंगेः ‘कुछ धंधा नहीं किया…’ अब क्या होगा ? घर लौट रहा था तो उसे खेत में एक वृक्ष के नीचे पड़े हुए सुंदर-सुहावने, गोलमटोल ठाकुर जी जैसे दिखे । उसका हृदय पसीजा, देखा कि ठंड में ठिठुर रहे हैं भगवान !

निर्दोष, भोले-हृदय नामदेव ने अपनी गठरी खोली और उन गोलमटोल ठाकुर जी को कपड़ा लपेट दिया और बोलता हैः “अच्छा, तुम ठिठुर रहे थे, अब तो तुमको आराम मिल गया ? अब मेरे पैसे दो, नहीं तो मेरे पिता दामा सेठ मेरे को डाँटेंगे ।”

अब पत्थर की मूर्ति पैसे कहाँ से लाती ? नामदेव गिड़गिड़ाया, आखिर कहा कि “अच्छा, अभी नहीं हैं तो अगले सप्ताह मैं आऊँगा न बाजार में, तब पैसे तैयार रखना ।”

पिता ने पूछाः “कितने का बिका कपड़ा ?”

बोलाः “कपड़ा तो बिक गया पर पैसे नहीं आये । पैसे अगले सप्ताह मिलेंगे ।” पिता ने इंतजार किया कि अगले सप्ताह बेटा पैसा लायेगा ।

नामदेव अगले सप्ताह आता है मूर्ति का पास, कहता हैः “लाओ पैसा, लाओ पैसा ।” अब मूर्ति पैसा कहाँ से दे !

आखिर पिता को क्या बतायें ?… उठायी वह गोलमटोल प्रतिमा और पिता के पास आकर कहाः “ये ठंड में ठिठुर रहे थे तो इनको कपड़ा दिया था । कपड़ा भी गायब कर दिया और पैसे भी नहीं देते ।”

पिता ने नामदेव को डाँटते हुए उस पत्थर को पटक दिया । नामदेव घबराया कि ‘विठ्ठलदेव ! तुमको भी चोट लगी है और मेरे पिता जी मुझे भी मारेंगे !’ अंतरात्मा ने आवाज दी कि ‘नामदेव ! घबरा मत, तेरा कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकेगा । तू मेरा है, मैं तेरा हूँ ।’

देखते ही देखते वह पत्थर सोने का हो गया । पिता जी दंग रह गये, नगर में बिजली की तरह यह बात फैल गयी ।

जिसके खेत से वह पत्थर उठा के लाये थे व जमींदार आकर बोलाः “यह तो मेरे खेत का पत्थर था । वही सोना बना है तो यह मेरा है ।”

नामदेव ने कहाः “तुम्हारा है तो ले जाओ पर तुम्हारे इस भगवान ने मेरे कपड़े पहने थे, तुम मेरे कपड़ों के पैसे चुकाओ । मेरे पिता को मैं बोलता हूँ, तुम्हें सोने के भगवान दे देंगे ।”

जमींदार से पैसे दिलवा दिये पिता को और जमींदार वह सुवर्ण के भगवान ले गया और घर पहुँचा तो देखा कि सोने की जगह पत्थर ! ‘कर्तुं शक्यं अकर्तुं शक्यं अन्यथा कर्तुं शक्यम् ।’ करने में, न करने में और अन्यथा करने में भगवान समर्थ हैं – इस बात को याद रखना चाहिए ।

वह जमींदार वापस आकर बोलाः “तुम्हारे सोने के भगवान पत्थर के बन गये !”

बोलेः “अब हम क्या करें ?”

“लो यह पत्थर, रखो पास ।” वह पत्थर समझकर फेंक के चला गया लेकिन नामदेव जी को पत्थऱ में छुपा हुआ अपना प्रियतम दिखता था । नामदेव की दृष्टि में जड़-चेतन में परमेश्वर है । संत नामदेव जी के मंदिर में आज भी भक्त लोग उनके उस ठाकुर जी को पूजते हैं ।

हम मूर्ति में श्रद्धा करते हैं तो उसमें से भगवान प्रकट हो जाते हैं तो जिनके दिल में भगवान प्रकट हुए हैं उन विद्यमान महापुरुषों में यदि दृढ़ श्रद्धा हो जाय तो हमारे तरने में कोई शंका ही नहीं । शरीरों में श्रद्धा कर-करके तो खप जायेंगे । सारा संसार इसी में खपा जा रहा है । अतएव शरीर जिससे दिखते हैं, उस आत्मा में श्रद्धा हो जाय, परमात्मा में श्रद्धा हो जाय, परमात्मा का अनुभव कराने वाले सद्गुरु में श्रद्धा हो जाय तो बेड़ा पार हो जाय ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2019, पृष्ठ संख्या 24,25 अंक 314

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

आत्मजागृति व कल्याणस्वरूप आत्मा में आत्मविश्रांति पाने का पर्व


महाशिवरात्रिः 4 मार्च 2019

महाशिवरात्रि धार्मिक दृष्टि से देखा जाय तो पुण्य अर्जित करने का दिन है लेकिन भौगोलिक दृष्टि से भी देखा जाय तो इस दिन आकाशमण्डल से कुछ ऐसी किरणें आती हैं, जो व्यक्ति के तन-मन को प्रभावित करती हैं । इस दिन व्यक्ति जितना अधिक जप, ध्यान व मौन परायण रहेगा, उतना उसको अधिक लाभ होता है ।

महाशिवरात्रि भाँग पीने का दिन नहीं है । शिवजी को व्यसन है भुवन भंग करने का अर्थात् भुवनों की सत्यता को भंग करने का लेकिन भँगेड़ियों ने ‘भुवनभंग’ भाँग बनाकर घोटनी से घोंट-घोंट के भाँग पीना चालू कर दिया । शिवजी यह भाँग नहीं पीते हैं जो ज्ञानतंतुओं को मूर्च्छित कर दे । शिवजी तो ब्रह्मज्ञान की भाँग पीते हैं, ध्यान की भाँग पीते हैं । शिवजी पार्वती जी को लेकर कभी-कभी अगस्त्य ऋषि के आश्रम में जाते हैं और ब्रह्म विद्या की भाँग पीते हैं ।

आप कौन सी भाँग पियोगे ?

तो आप भी महाशिवरात्रि को सुबह भाँग पीना । लेकिन कौन सी भाँग पियोगे ? ब्रह्मविद्या, ब्रह्मज्ञान की भाँग । सुबह उठकर बिस्तर पर ही बैठ के थोड़ी देर ‘हे प्रभु ! आहा… मेरे को बस, रामरस मीठा लगे, प्रभुरस मीठा लगे…. शिव शिव…. चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ।’ ऐसा भाव करके ब्रह्मविद्या की भाँग पीना और संकल्प करना कि ‘आज के दिन मैं खुश रहूँगा ।’ और ‘ॐ नमः शिवाय ।… नमः शम्भवाय च मयोभवाय  नमः शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ।’ बोल के भगवान शिव की आराधना करते-करते शिवजी को प्यार करना, पार्वती जी को भी प्रणाम करना । फिर मन-ही-मन तुम गंगा किनारे नहाकर आ जाना । इस प्रकार की मानसिक पूजा से बड़ी उन्नति, शुद्धि होती है । यह बड़ी महत्त्वपूर्ण पूजा होती है और आसान भी है, सब लोग कर सकते हैं ।

गंगा-किनारा नहीं देखा हो तो मन-ही-मन ‘गंगे मात की जय !’ कह के गंगा जी में नहा लिया । फिर एक लोटा पानी का भरकर धीरे-धीरे शिवजी को चढ़ाया, ऐसा नहीं कि उँडेल दिया । और ‘नमः शिवाय च मयस्कराय च…..’ बोलना नहीं आये तो ‘जय भोलानाथ ! मेरे शिवजी ! नमः शिवाय, नमः शिवाय….’ मन में ऐसा बोलते-बोलते फानी का लोटा चढ़ा दिया, मन-ही-मन हार, बिल्वपत्र चढ़ा दिये । फिर पार्वती जी को तिलक कर दिया और प्रार्थना कीः ‘आज की महाशिवरात्रि मझे आत्मशिव से मिला दे ।’ यह प्रारम्भिक भक्ति का तरीका अपना सकते हैं ।

व्रत की 3 महत्त्वपूर्ण बातें

महाशिवरात्रि वस्त्र-अलंकार से इस देह को सजाने का, मेवा-मिठाई खाकर जीभ को मजा दिलाने का पर्व नहीं है । यह देह से परे देहातीत आत्मा में आत्मविश्रांति पाने का  पर्व है, संयम और तप बढ़ाने का पर्व है । महाशिवरात्रि का व्रत ठीक से किया जाये तो अश्वमेध यज्ञ का फल होता है । इस व्रत में 3 बातें होती हैं ।

  1. उपवासः ‘उप’ माने समीप । आप शिव के समीप, कल्याणस्वरूप अंतर्यामी परमात्मा के समीप आने की कोशिश कीजिए, ध्यान कीजिए । महाशिवरात्रि के दिन अन्न-जल या अन्न नहीं लेते हैं । इससे अन्न पचाने में जो जीवनशक्ति खर्च होती है वह बच जाती है । उसको ध्यान में लगा दें । इससे शरीर भी तंदुरुस्त रहेगा ।
  2. पूजनः आपका जो व्यवहार है वह भगवान के लिए करिये, अपने अहं या विकार को पोसने के लिए नहीं । शरीर को तन्दुरुस्त रखने हेतु खाइये और उसकी करने की शक्ति का सदुपयोग करने के लिए व्यवहार कीजिए, भोग भोगने के लिए नहीं । योगेश्वर से मिलने के लिए आप व्यवहार करेंगे तो आपका व्यवहार पूजन हो जायेगा ।

पूजन क्या है ? जो भगवान के हेतु कार्य किया जाता है वह पूजा है । जैसे – बाजार में जो महिला झाड़ू लगा ही है, वह रूपयों के लिए लगा रही है । वह नौकरी कर रही है, नौकरानी है । और घर में जो झाड़ू लगा रही है माँ, वह नौकरानी नहीं है, वह सेवा कर रही है । लेकिन हम भगवान के द्वार पर झाड़ू लगा रहे हैं तो वह पूजा हो गयी, भगवान के लिए लगा रहे हैं । महाशिवरात्रि हमें सावधान करती है कि आप जो भी कार्य करें वह भगवत् हेतु करेंगे तो भगवान की पूजा हो जायेगी ।

  1. जागरणः आप जागते रहें । जब ‘मैं’ और ‘मेरे’ का भाव आये तो सोच लेना कि ‘यह मन का खेल है ।’ मन के विचारों को देखना । क्रोध आये तो जागना कि ‘क्रोध आया है ।’ तो क्रोध आपका खून या खाना खराब नहीं करेगा । काम आया और जग गये कि ‘यह काम विकार आया है ।’ तुरंत आपने हाथ पैर धो लिये, राम जी का चिंतन किया, कभी नाभि तक पानी में बैठ गये तो कामविकार में इतना सत्यानाश नहीं होगा । आप प्रेमी हैं, भक्त हैं और कोई आपकी श्रद्धा का दुरुपयोग करता है तो आप सावधान हो के सोचना कि ‘यह मेरे को उल्लू तो नहीं बना रहा है ?’

आप जगेंगे तो उसका भी भला होगा, आपका भी भला होगा । तो जीवन में जागृति की जरूरत है । जो काम करते हैं उसे उत्साह, ध्यान व प्रेम से करिये, बुद्धु, मूर्ख, बेवकूफ होकर मत करिये ।

‘जागरण’ माने जो भी कुछ जीवन में आप लेते देते, खाते-पीते या अपने को मानते हैं, जरा जगकर देखिये कि क्या आप सचमुच में वह हैं ? नहीं, आप तो आत्मा हैं, परब्रह्म के अभिन्न अंग है । आप जरा अपने जीवन में जाग के तो देखिये !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2019, पृष्ठ संख्या 11,12,13 अंक 314

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

आखिर क्या है उनके त्याग का रहस्य !


वैराग्य शतक के 80वें श्लोक का अर्थ हैः ‘क्या रहने के लिए स्वर्ग के तुल्य रमणीय भव्य भवन नहीं थे ? क्या सुनने के लिए गाने योग्य मधुर संगीत नहीं थे ? अथवा प्राणप्रिय प्रेयसी के साथ समागम का सुख अत्यधिक प्रीतिजनक नहीं था क्या ? इन सब सुख-साधनों के विद्यमान होने पर भी संतजन सब विषय-भोगों को इधर-उधर घूमने वाले पतंगों के पंखों से निकलने वाले पवन से कम्पित दीपक की लौ के समान अत्यंत चंचल अर्थात् नश्वर समझकर (इन सबको त्याग के अपने कल्याण के लिए) वनों के भीतर चले गये ।

यहाँ भर्तृहरि जी ने जिस ओर संकेत किया है, उसका उदाहरण वे स्वयं तथा राजा भगीरथ, राजा गोपीचंद जैसे अनेक महापुरुष हैं जिनके पास खजानों के अखूट भंडार थे, कितना धन वैभव, राज्यसुख था, पाँचों इन्द्रियों को सुख देने वाली वस्तुएँ थीं, कितना जयजयकार होता था फिर भी उन्होंने इन सबको स्वेच्छापूर्वक त्याग दिया ।

राजा भर्तृहरि योगी गोरखनाथ जी की आज्ञा में रहे । राजा भगीरथ त्रितल मुनि की शरण में गये, उनके उपदेश सुनकर अपना राज्य शत्रुओं को दे दिया और स्वयं एकमात्र कौपीन धारण कर वन में ब्रह्माभ्यास करने लगे । राजा गोपीचंद अपने गुरुदेव की आज्ञा में रहे । राजा गोपीचंद अपने गुरुदेव की आज्ञा में रहे । वर्तमान समय में भी किन्हीं हयात महापुरुष का इसी प्रकार का आदर्शरूप जीवन देखना हो तो पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू का जीवन है । आपके पिता नगरसेठ थे । बौद्धिक कुशाग्रता, कार्य-व्यापार में कुशलता, संस्कृत और दर्शनशास्त्र के ज्ञान में पटुता व उत्तम गति, सुडौल रूपवान शरीर, लक्ष्मीदेवी जैसी सुशील एवं धर्मपरायणा पत्नी ये सब होते हुए भी आप श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु भगवत्पाद साँईं श्री लीलाशाह जी महाराज की शरण में गये, कसौटियाँ सहीं । आपने पूर्ण गुरुकृपा पायी अर्थात् परमात्मप्राप्ति की और फिर गुरुआज्ञा शिरोधार्य कर 7 साल डीसा में ऐसे प्रतिकूलतापूर्ण एकांत स्थान में रहे जहाँ सामान्य तौर पर अन्य किसी साधक का रहना कठिन है ।

जो लोग भव्य भवन, सुख-सुविधा, घर-परिवार – इन्हीं को सब कुछ समझ बैठते हैं, ये मिले तो अपने को सौभाग्यशाली और छूटे तो दुर्भाग्यशाली मानते हैं – ऐसे अविवेकियों का विवेक जगाने के लिए भर्तृहरि जी वैराग्यवान और परम विवेकी संतजनों के जीवन की ओर संकेत करते हैं कि वास्तव में तुच्छ संसारी सुखाभासों से ऊँचा भी कोई वास्तविक सुख है जिसे पाने के लिए सब सुविधाएँ होते हुए भी उनको त्यागकर संतजन उस परम सुख अर्थात् परमात्मा को पाने के रास्ते निकल पड़े ।

यह वह परमोच्च लाभ है जिसके आगे संसार के सारे लाभ इतने तुच्छ साबित होते हैं कि उनकी तुलना या गिनती ही नहीं हो सकती । नश्वर लाभ न पहले था, न बाद में रहेगा और अब भी केवल सुखाभास देता है जो तृष्णा, इच्छा-वासना के रूप में कष्टप्रद, दुःखरूप ही बन जाता है । इसलिए कहा गया हैः

आत्मलाभात् परं लाभं न विद्यते ।

आत्मज्ञानात् परं ज्ञानं न विद्यते ।

आत्मसुखात् परं सुखं न विद्यते ।

‘आत्मलाभ से बढ़कर कोई लाभ नहीं है ।

आत्मज्ञान से बढ़कर कोई ज्ञान नहीं है ।

आत्मसुख से बढ़कर कोई सुख नहीं है ।’

इस ऊँचे आत्मलाभ की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए भगवान कहते हैं-

न हि ज्ञाने सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।

‘इस संसार में ज्ञान (आत्मज्ञान) के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है ।’

(गीताः 4.38)

यं लब्धवा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।

‘परमात्मा की प्राप्तिरूप जिस लाभ को प्राप्त होकर (योगी) उससे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता (उसको जानना चाहिए ) ।’ (गीताः 6.22)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2019, पृष्ठ संख्या 22, 23 अंक 314

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ