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अर्जुनदेव जी का वह अनोखा शिष्य (भाग-1)


जो कोई मनुष्य दुखों से पार होकर सुख एवम् आंनद प्राप्त करना चाहता हो उसे सच्चे अंतः कर्ण से गुरुभक्ति योग का अभ्यास करना चाहिए । आपके लिए केवल इतना ही आवश्यक है कि गुरुभक्तियोग के मार्ग में अंतः कर्ण पूर्वक प्रमाणिक प्रयत्न करना है । मोटी बुद्धि का विद्यार्थी गुरुभक्तियोग के अभ्यास में किसी भी प्रकार की ठोस प्रगति नहीं कर सकता । पंचम बादशाह श्री गुरु अर्जुनदेव महाराज जी के समय की बात है, स्वर्ण मंदिर के अमृत सरोवर का कार्य प्रगति पर था । संगत के लश्करों के लश्कर सेवा का खजाना लूटने में मस्त थे । हर कोई अपनी हैसियत से बढ़ कर तन-धन और मन से योगदान दे रहा था । संगत पूरा-2 दिन सेवा करती और शाम को दरबार में बैठ कर कीर्तन का आंनद उठाती, यही नित्य का क्रम था । एक दिन ऐसे ही शाम को गुरु दरबार सजा हुआ था । कीर्तन की झूम-झनन में सब मस्त थे, दिन भर जो मजदूरी करके जो हाथ छलनी हो चुके थे वे ही अब ढोलक के ताल पर, भगवान के नाम पर तालियां बजा रहे थे परन्तु कहीं कोई दर्द का अहसास ना था, ना कोई थकान थी लेकिन जैसे किसी विवाह समारोह में भले ही शहनाइयों की संगत लहरियां बजा रही होती हैं । सभी एक दूसरे से मिलकर प्रसन्न हो रहे होते हैं परन्तु फिर भी सभी की नज़रें बार-2 मुख्य द्वार पर किसी को ढूंढ़ती हैं किसे ? दूल्हे राजा को ! उसी तरह हालांकि कीर्तन में अमृत रस झर रहा था, भगवान की धुन में सब मस्त हो रहे थे परन्तु फिर भी संगत की नज़रें गुरु महाराज जी के दर्शन के लिए बेचैन थी । तभी गुरु महाराज जी का सभा में आगमन हुआ । सभी अपने-2 स्थानों पर हाथ जोड़कर खड़े हो गए । सबके चेहरों पर खुशी का आलम छा गया । जयकारों की ध्वनि से पूरा दरबार ध्वनित हो उठा । गुरु महाराज जी का नूरानी मुखड़ा, सुंदर पोशाक और तेजस्वी नयन बस रूप देखते ही बनता था । सभी शिष्य गदगद हो उठे, गुरु महाराज जी ने दोनों हाथ उठाकर के आशीर्वाद दिया और आसन पर विराजमान हो गए । अब कुछ सज्जन खड़े हुए और अपनी-2 भेंट गुरुदेव के चरणों में अर्पित करने लगे लेकिन उन सबमें एक नव-आगंतुक और अज्ञानी भी था । उसके रेशमी वस्त्र बता रहे थे कि वह अवश्य ही कोई बड़ा सेठ है । सिर पर कीमती टोपी, गले से सच्चे मोतियों की माला और दोनों हाथों की अंगुलियों में चार-2 रत्न जड़ित अंगूठियां । उसके हाथ में एक चांदी का थाल था, उस थाल का चमकीले कपड़े से ढका होना, अवश्य उसमें कुछ खास होने का संकेत दे रहा था । सेठ जैसे ही गुरु महाराज जी के समीप पहुंचा, उन्होंने नज़रें उठाकर उसकी तरफ देखा, फिर मुस्कुरा कर पूछे कहां से आए हैं आप ? सेठ को जैसी उम्मीद थी वैसा ही हुआ । सोचा महाराज जी भी मेरी चौधराहट से प्रभावित हैं । क्यूंकि पंक्ति में उससे पहले आये किसी व्यक्ति से महाराज जी ने नहीं पूछा था कि आप कहां से आए हैं । सेठ खुद को मिले इस विशेष सम्मान से अभिभूत हो उठा, झट सिर झुकाया और स्वपुराण वाचने लगा । महाराज शायद आपने पहचाना नहीं मैं लाहौर का सबसे बड़ा पूंजीपति सेठ हूं । लाहौर में मेरा नाम चलता है, कोई भी पीर-फकीर मेरे दर से बिना खैरात पाए नहीं जाता । वहां कौन सी बड़ी महफ़िल है जिसमें मैं चांद ना बनूं । महाराज हर जुबान पर बस मेरी हस्ती के ही किस्से हैं । सेठ का सिर तो बेशक झुका था लेकिन भीतर अहंकार किसी सर्प के फन की भांति सीधा अकड़ा-2 था । सेठ चुप हुआ तो गुरु महाराज जी मुस्कुराते हुए बोले सेठ जी यह सब तो ठीक है, परन्तु आप बताइए हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं ? सेठ बोला महाराज यह क्या कह रहे हैं सेवा और आप नहीं-2, क्यूं मुझे पाप का भागीदार बना रहे हैं । दास सेवा कराने नहीं बल्कि करने आया है । जबसे मैंने सुना कि आपने अमृत-सरोवर का निर्माण आरम्भ किया है, मैं तो तभी से इंतजार कर रहा हूं कि कब आप इस दास को याद करेंगे लेकिन आपने तो हमारी ओर नज़रें ही नहीं की । गुरु महाराज जी सेठ की अहंकार पूर्ण भाषा को भली-भांति समझ रहे थे परन्तु फिर भी बड़े भोले बन कर बोले कि सेठ जी हम भी क्या करते । संगत की ही भेंटों से निर्माण इतना अच्छा चल रहा था कि हमने आपको कष्ट देने की जरूरत नहीं समझी । सेठ अब जरा स्वर ऊंचा करके बोला क्या ! निर्माण कार्य अच्छा चल रहा है । रब दी कसम अगर मैं होता तो अब तक तो सरोवर में मंदिर भी खड़ा हो गया होता । कहां अभी तक खुदाई भी पूरी नहीं हुई, आप ही बताइए क्या कभी चींटियां तैरकर सागर पार हुई हैं ? क्या कभी चिड़िया चील की तरह ऊंचे आसमान में उड़ सकी है ? नहीं ना फिर आप भला इन दीन-दुखियों से महल जैसा मंदिर कैसे खड़ा करवा लेंगे । इन बेचारों के पास तो स्वयं भी पूरी-सूरी झोंपडियां नहीं हैं । गुरु महाराज जी सेठ के यह शब्द सुनकर हंस दिए, मन ही मन क्या सोचने लगे कि अरे नादान तू क्या जाने कि गुरु का घर कभी सेठों के खनकते सिक्कों से नहीं बल्कि गरीबों की भाव भरी ठीकरियों से ही बनता है । सेठ फिर बोला महाराज लेकिन आप चिंता ना करें मैं हूं ना अब आप देखिए काम कितनी जल्दी पूरा होगा । जैसे एक चीचड़ भैंस के थनों से खून चूसने वाला छोटा सा जंतु, उसका नाम चीचड़ होता है । जैसे एक चीचड़ पूरा जीवन लगाकर भी भैंस का सारा खून नहीं चूस पाता और वहीं शेर यह काम एक झटके में कर दिखाता है, वैसे ही यह सारा कार्य बस मेरे एक झटके की मार है । आपकी सौगंध हुजूर अगर ऐसा ना हो तो कहना । गुरु महाराज जी ने फिर लीला की, चेहरे पर बनावटी हैरानी लाते हुए बोले अच्छा सेठजी लेकिन यह होगा कैसे । हाथों में लिए थाल की तरफ इशारा करते हुए सेठ बोला हुजूर पूरे 250 सिक्के हैं और वह भी चांदी के । और जी जहां पैसे हैं वहां क्या नहीं हो सकता । ईंट से गारा और गारे से ईंट जो मर्ज़ी बनवा लो । गुरुदेव फिर मुस्कुरा दिए, वे इस अनाड़ी सेठ को कैसे समझाते कि पगले क्या पैसे से श्रद्धा, प्रेम और समर्पण खरीदा जा सकता है ? कभी नहीं । चांदी का थाल गुरुदेव की ओर बढ़ाते हुए सेठ बोला हुजूर कृपया दास की इस छोटी-सी भेंट को दोनों हाथों से कुबूल करें । गुरु महाराज जी के थाल पकड़ते ही सेठ के अहम को तो और रंग चढ़ गया । मद के नशे में वह कुछ ऐसे वाक्य बोल पड़ा, जिन्हें सुनकर सारी संगत की देह में मानों कांच पिघल कर बह गया हो । उतावले होकर उसने कहा महाराज जरा थाली से कपड़ा तो हटवाईये । 250 सिक्के एक साथ तो यहां शायद किसी ने पहले देखा तक नहीं होगा क्यूंकि मुझे पता है जैसे अंधों के देश में चश्मा, बहरों के आंगन में वाद्ययंत्र और ठेठ दोपहरी में उल्लू नहीं मिला करते वैसे ही इतना दाम देने वाला यहां कौन हो सकता है । इतना कहकर सेठ खिसियानी सी हंसी हंसा और संगत की तरफ देखने लगा । गुरु महाराज जी अब गंभीर हो गए । अगर सेठ ने केवल उन्हें भला-बुरा कहा होता तो कोई बात नहीं थी लेकिन यहां तो सेठ ने उनके शिष्यों के स्वाभिमान को ललकारा था और गुरु के लिए तो उनके शिष्य उनकी मुकुट मणि होते हैं, किसी विवाहिता के श्रृंगार तुल्य होते हैं, चांद की चांदनी और सूर्य का प्रकाश होते हैं फिर भला उनकी तरफ उठी उंगली उन्हें कैसे बर्दाश्त हो सकती थी इसलिए गुरु महाराज जी ने निर्णय किया अब तो इसका अहंकार तोड़ना ही पड़ेगा । इसे बताना पड़ेगा कि सेठ तू स्वयं अदना-सा होकर मेरे महिमाशाली भक्तों से अपनी तुलना करने की गलती कर बैठा है । अब गुरुदेव वाणी में थोड़ा तीखापन चढ़ा कर बोले सेठ जी ! आप सत्य कह रहे हैं । मेरे दरबार में 250 चांदी के सिक्के देने वाले नहीं हैं मगर हां 500 सिक्के देने वाले जरूर हैं । यह सुनना था कि सेठ को मानो काठ मार गया । काफी देर मूक, चित्रलिखित-सा खड़ा रहा फिर सशंकित होकर बोला महाराज आप क्या कह रहे हैं ! पता है ना आपके मुख से मस्करी अच्छी नहीं लगती । 500 सिक्के इकट्ठे करने में तो पांच जन्म लगेंगे आपके शिष्यों को, शायद तब भी इकट्ठे ना हो पाएं और आपने यह दावा करने में पांच पल भी नहीं लगाए । अगर सच में ऐसा कोई धनाढ्य शिष्य है आपका तो क्या जरा मिलवाने का कष्ट करेंगे । महाराज जी सेठ की उत्कंठा बढ़ाते हुए तुरंत बोले हां-हां सेठ जी क्यूं नहीं आप चाहें तो उसके गांव जाकर उससे मिल सकते हैं । चाहें तो उससे 500 चांदी के सिक्के भी ले आएं आते-2, बस आप इतना कह देना कि मैंने मांगा है तत्काल इसके लिए आपको किसी शिनाख्त की भी जरूरत नहीं । बस हमारा नाम लेना ही काफी है। सेठ तो आवाक खड़ा रह गया, सोचता हुआ बोला क्या कोई बड़ा सेठ है गुरुवर रहस्यमय और गर्व भरी मुस्कान के साथ बोले हां वह भी बहुत बड़ा सेठ है । फर्क बस इतना है कि आप लाहौर के सेठ हैं और वह गुरु का सेठ है । सेठ के मन में बार-2 किंतु-परंतु उठ रहा था । गुरु महाराज जी की बातों पर विश्वास उसे हो ही नहीं रहा था और झुठलाने की पूरे दरबार में उसकी ताकत नहीं थी । अंततः उसने यही फैंसला किया, मैं खुद जा कर उस सेठ से मिलूंगा । अपने आप दूध-का-दूध और पानी-का-पानी हो जाएगा । सेठ उस शिष्य का पता लेकर तुरंत अपनी शाही बग्गी पर तैयार होकर चल पड़ा । रास्ते में सेठ सोचने लगा यदि गुरु महाराज जी झूठ नहीं बोल रहे तो यह शिष्य अवश्य ही कोई बहुत बड़ा सेठ होगा । परंतु इसका नाम तो मैंने सुना नहीं, पता नहीं कितनी बड़ी हवेली होगी उसकी, नौकर-चाकर, जमीन-जायदाद का तो कोई हिसाब ही नहीं होगा । पूरे इलाके में उसकी चौधराहट होगी । उसी के इशारे पर वहां दिन और रात होते होंगे, अभी सेठ इन्हीं ख्यालों में खोया हुआ था कि उसकी शाही बग्गी उस शिष्य के गांव पहुंच गई । सूर्य पश्चिम में डूबने की कगार पर था, बग्गी का सारथी इधर-उधर देखता हुआ बोला जनाब गांव तो आ गया । अब किसके यहां जाना है, सेठ ने लंबी सी करते हुए गांव को निहारा । मुख्य मार्ग टूटा सा, ऊबड-खाबड़, सड़क के दोनों ओर गंदगी के ढेर, उसके मन में खटका हुआ कि कहीं महाराज जी ने मजाक तो नहीं कर दिया क्यूंकि जिस गांव में 500 चांदी के सिक्के दान में देने वाला व्यक्ति रहता हो, उस गांव की यह दशा । दूसरे ही पल उसने सोचा कि जब इतनी दूर आया हूं तो पूरी छान-बीन करके ही जाऊंगा । सारथी से बोला भाई पूछो किसी से कि गुरु का सेठ कहां रहता है, किस तरफ उसकी हवेली है । इतने में ही एक घोड़ा बग्गी वाला सामने से गुजरा । उसे रोक कर सेठ ने पूछा ओ बग्गी वाले यहां गुरु के सेठ की हवेली कहां है । बग्गी वाला बोला साहब गुरु का सेठ, गुरु का सेठ नामक व्यक्ति इस गांव में तो क्या, पास के दस गांव में भी नहीं है । सेठ को खीज आ गई, अरे सारथी छोड़ो इसे गांव में रहकर अगर गांव के नामी सेठ को यह नहीं जानता तो क्या खाक गांव में रहता है, चलो गांव के अंदर । हम कल पढ़ेंगे कि लाहौर के सेठ से, गुरु के सेठ की मुलाकात किस प्रकार होती है।==================================आगे की कहानी कल के पोस्ट में दिया जायेगा …।

नित्य-ज्ञान में आओ!


            आप नित्य ज्ञान का आदर करने की गाँठ बाँध लो, अपने जीवन में व्रत ले लो । मृत्यु जिसकी होती हैं वो हम नहीं हैं। जो मरनेवाला है, वह शरीर है। मरने के बाद भी जो रहनेवाला है- ‘हम’, अपने ‘आप’, हर परिस्थिति के ‘बाप’। बचपन आया, बचपन की जरा-जरा गोली-बिस्किट, लॉलीपॉप, चॉकलेट, चीज-वस्तू, खिलौनों में ओ…हो…हो…हो…बड़ी राजी-नाराजी हो जाती थी लेकिन अब ये राजी-नाराजी अनित्य है, उसको जाननेवाला नित्य है। है कि नहीं? कितना सरल है? बहुत ऊँची बात सुन रहे हैं और सरल है। फिर जवानी आई, पढना है, यह पेपर कठिन है, ऐसा है.. फलाना है, फलाना टेंशन है… पेपर अच्छे गए, हा..हा.. ये मेरे को आ गया, इसका ज्ञान हो गया, उसका ज्ञान हो गया… वो भी भूल गये।  पेपर आए, नहीं आए.. ये सब आ-आकर चला गया लेकिन उसको जानने वाला नित्य, ज्ञान-स्वरूप वो सत-चेतन मेरा आत्मा अभी भी जैसा का तैसा हैं। …तो वह है सत्-स्‍वरूप। जो सत्-स्‍वरूप है वह चेतन-स्वरूप है और जो चेतन-स्वरूप है वह आनंदरूप है, ज्ञान-स्वरूप हैं। भगवान का एक नाम हैं सच्चिदानंद, भागवत में आता है–

सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे।

तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयम नुमः।।  

जो सत्-स्‍वरूप हैं, चेतन-स्वरूप हैं, आनंद-स्वरूप हैं उस परमेश्वर को हम प्रणाम करते हैं!

बोले-क्यों प्रणाम करते हो?क्या चाहते हो?

बोले- तापत्रय विनाशाय… ‘आदिदैविक’, ‘आदिभौतिक’ और ‘मानसिक’… ये ताप, दुःख मिटाने के लिये…। यह जो दुःख हैं वह आदिदैविक जगत में है, आदिभौतिक में है, मानसिक जगत तक है। सच्‍च‍िदानंद-स्वरूप में दुःख की दाल नहीं गलती। अपने जीवन में अगर व्रत नहीं है तो कच्चा घड़ा है, कच्ची समझ है। शास्त्र कहते हैं कि जिनकी कच्ची समझ हैं उनके सारे जीवन की जो भी उपलब्धि हैं, जैसे मिट्टी के कच्चे घड़े में सब-कुछ बह जाता है ऐसे ही जीवन में सब-कुछ पा-पाकर उनका बह जाता है।  ठनठनपाल हो जाते है क्योंकि अनित्य शरीर, अनित्य मन, अनित्य बुद्धि, अनित्य इन्द्रियाँ, अनित्य वस्तुएँ और उसके अनित्य ज्ञान में रमण कर-करके जिंदगी खत्म कर देते हैं लेकिन अनित्य को जानने वाला जो है, नित्य वह सत है। बचपन बदल गया, जवानी में क्या-क्या हुआ, बदल गया। स्वप्न में क्या-क्या आया, बदल गया लेकिन उसको जाननेवाला नहीं बदला, वह सत है, वह चेतन है, वह ज्ञानस्वरूप है और वह नित्य है। शरीर की अवस्था अनित्य, मन के संकल्प-विकल्प अनित्य, बुद्धि के निर्णय अनित्य और इंद्रियों का ज्ञान अनित्य लेकिन इन सबकी गहराई में नित्य, चैतन्य, परमात्मा। उस नित्य, ज्ञान-स्वरूप की हम उपासना करते है। कल्याण हो जायेगा। बेड़ा पार हो गया। बाहर के धूम-धड़ाके, मंदिर के देवी-देवता सब अपनी-अपनी जगह पर हैं लेकिन सारे मंदिरों का, सारी तपस्याओं का फल यह है कि हम नित्य-स्वरूप, अपने सच्च्दिानंद में आएँ।


तीन बातें पक्की कर लो- मृत्यु से डरें नही-डराएँ नहीं, दूसरे को बेवकूफ बनाएँ नहीं और खुद अनित्य वस्तुओं में, अनित्य ज्ञान में बेवकूफ बनें नहीं। मैं इतना पढ़ा हूँ, मैं उतना पढ़ा हूँ लेकिन ये तो बुद्धि में है और जरा-सा बुखार आ जाय तो भूल जाता है। मेरे पास इतना धन है, उतना धन है, जरा-सी हवा निकल गई बाहर तो धन पड़ा रह जायेगा।

पड़ा रहेगा माल खजाना, छोड़ त्रिया-सुत जाना है।

कर सतसंग अभी से प्यारे, नहीं तो फिर पछताना है।।

            उस सत्-स्‍वरूप का संग कर जो पहले था, अभी है, बाद में रहेगा। यह शरीर सौ वर्ष पहले नहीं था, तीस वर्ष के बाद नहीं रहेगा लेकिन मैं इसके बाद भी रहूँगा, इसके पहले भी था। आँखों की देखने की ताकत पहले जैसी बुढ़ापे में सबकी नहीं होती, मन की स्थिति भी पहले जैसी नहीं होती लेकिन उसको जाननेवाला तो वही का वही है न! वही सत्-स्‍वरूप है। ॐ… उसमें शांत होते जाओ, फिर मन इधर-उधर जाय… ॐ… । जितनी देर उच्चारण किया उतनी देर फिर शांत हो गये तो यह असत, जड़, दुःखरूप संसार में भटकने वाला मन, इन्द्रियाँ भी सत्-स्‍वरूप में विश्रांति पाकर शुद्ध हो जायेगी।  


            माया के तीन गुण है। तमस गुण से शरीर की वस्तुएँ बनती है, द्रव्य बनते है, रक्त-नस-नाडियाँ, यह-वह-सब। माया के रजस गुण से शरीर में चेतना आती है। माया के सत्वगुण से ज्ञान इंद्रियों में आता हैं लेकिन ये सब बदलने के बाद भी सच्च्दिानंद, ज्ञान-स्वरूप मेरा आत्मा ज्यौं का त्यौं। छोटी-छोटी आँखे थी, नन्ही-नन्ही नाक थी, नन्ही-नन्ही उँगलियाँ थी, वह सब बदल गई। बड़ी-बड़ी दाढ़ी, बड़ी बड़ी ऑंख… बड़े-बड़े हाथ…। यह सब माया का खेल बदलता है, दिन बदलता हैं, रात बदलती है, सुख बदलता है, दुःख बदलता है। यह सब जैसे गंगा के प्रवाह में सब बहता है ऐसे ही सब बदलने वाला है, अनित्य है। सुख भी आ-आकर चले गये, दुःख भी आ-आकर चले गये, चिंताएँ भी निगुरी आ-आकर चली गई, खुशियाँ भी आ-आकर चली गई लेकिन उन सबको जाननेवाला सच्च्दिानंद ज्यौं का त्यौं। दुःख, तब होता है जब असत शरीर में, असत व्यवहार में, असत कल्पनाओं में सत्-बुद्धि करते है और सद्चिदानंद के ज्ञान का पता नहीं अथवा अनादर करते हैं तभी आपको दुःख दबोचता है, तभी कर्म का बँधन दबोचता है, तभी ईश्वर से आप दूर फेंके जाते है।

            एक बात और याद रखो कि ईश्वर दूर है, ऐसी बेवकूफी कभी स्वीकार ना करो। पराये है, दूर है, देर से मिलेंगे, श्रम-साध्य है.. नहीं-नहीं, सो साहेब सदा हजूरे, अन्धा जानत ता को दूरे…। वह आनंद-स्वरूप सदा हाजरा-हजूर है लेकिन उधर को बुद्धि जाती नहीं न, विचार जाता नहीं। असत में रमण कर-करके थक जाते हैं, सो गये, फिर उसी में रमण किया, फिर सो गये, ऐसे ही जीवन पूरा हो जाता है। सत में रमण करने का, सत्य की तरफ आने का पक्का इरादा कर दो। सच्चिदानंद का स्मरण करो। नित्य-ज्ञान तो है लेकिन नित्य-ज्ञान की स्मृति नहीं है। नित्य-ज्ञान की अनुभूति दुःखों से पार कर देगी, कर्म-बँधनों से पार कर देगी, चिंताओं से पार कर देगी, शोक से पार कर देगी।


            तरति शोकं आत्मवित… उस आत्मा को जानने से आप शोक से पार हो जाएँगे, आकर्षणों से पार हो जाएँगे। आप संसारी वस्तुओं से आकर्षित नहीं होंगे लेकिन संसार आपसे आकर्षित होगा क्योंकि आप नित्य-सच्चिदानंद में रमण करने लग गये। कृष्ण, वस्तुओं पर आकर्षित नहीं होते लेकिन कृष्ण को देखकर लोग और प्रकृति आकर्षित रहती है। आत्मा सबका अनन्य-स्वरूप है, मूल-स्वरूप, चैतन्य।             मृत्यु से डरें नहीं-डराऍं नहीं, बेवकूफ बने नहीं-बनाऍं नहीं, दुःखी होवे नहीं और दूसरे को दुःखी करें नहीं। कौन चाहता हैं मैं ‘दुःखी’ होऊँ? कोई नहीं चाहता। कोई एक आदमी भी बोल दे कि मैनें फलाना काम ‘दुःखी’ होने के लिए किया था अथवा करूँगा.. नहीं! फिर भी असत् शरीर में, इंद्रियों में सुखी होने की भूल से बेचारे ‘दुःखी’ होते रहते हैं। सत में आ जाएँ तो फिर दुःख यूँ मिटता है, चिंता-बँधन यूँ मिटता हैं, नहीं तो कितनी डिग्रियाँ ले लो, कितनी नौकरियाँ कर लो, कितने प्रमोशन कर लो, दुःख नहीं मिटता। कभी न छूटे पिंड दुःखों से जिसे ब्रह्म का ज्ञान नहीं। सच्चिदानंद ब्रह्म-स्वरूप परमात्मा में आना ही पड़ेगा, हजार जन्म के बाद भी! जय-विजय वैकुंठ में थे, भगवान नारायण का बाहर से दर्शन करते थे लेकिन नारायण-तत्व जो नित्य-ज्ञान है, उसमें नही आए तो वैकुंठ से पतन हुआ। गोपियों को शरद-पूनम की रात को श्रीकृष्ण ने कृपा करके सान्निध्‍य दिया, आनंदित तो किया लेकिन बाद में फिर गोपियॉं इस नित्य-ज्ञान में न आई तो दुःख गया नहीं, गोपियाँ बिलख-बिलखकर रोती थी लेकिन गोपियों में खानदानी थी कि हमारे कारण श्रीकृष्ण को तकलीफ न पड़े, यह उनमें बड़ा भारी सदगुण था, नहीं तो बृज और मथुरा, क्या दूरी थी? लेकिन गोपियों ने मर्यादा तोड़ी नहीं, गयी नहीं तंग करने कृष्ण को। हम जैसा चाहें ऐसा कृष्ण करें, ऐसी गोपियों में नीच-वृत्ति नहीं थी, उनका बड़ा भारी सद्गुण था। फिर (श्रीकृष्ण ने) उद्धव को भेजा  कि नित्य का ज्ञान दे आओ। गोपियों ने प्रेमाभक्ति की बात से उद्धव को ही प्रभावित कर दिया, ऐसी पवित्र गोपियाँ थी।

लक्ष्मण मल्लाह की अनोखी साधना व दुर्लभ सिद्धि का रहस्य


जो दैवीय गुरु के चरणों में आश्रय लेता है वह गुरु की कृपा से आध्यात्मिक मार्ग में आने वाले तमाम विघ्नों को पार कर जायेगा । योग के लिए श्रेष्ठ एकांत स्थान गुरु का निवास स्थान है । जिस शिष्य को अपने गुरु के प्रति भक्ति-भाव है उसके लिए तो आदि से अंत तक गुरु सेवा मीठे शहद जैसी बन जाती है । गुरु माने सच्चिदानंद परमात्मा जिसने गुरुकृपा प्राप्त की है वही साधना का रहस्य जानता है । जो अपने गुरु की सेवा करता है वही परम सत्य के संपर्क में आने की कला जानता है । गुरुदेव की निरंतर सेवा करनी चाहिए क्यूंकि इससे सहज ही आत्मलाभ हो जाता है । अपने गुरुदेव के स्वरूप का थोड़ा सा चिंतन भी ईश्वर चिंतन के समान है । उनके नाम का थोड़ा सा कीर्तन भी ईश्वर के कीर्तन के बराबर है । सतगुरु का स्मरण और उन्हें ही समर्पण शिष्यों के जीवन का सार है । इस सरल किन्तु समर्थ साधना से शिष्य को सब कुछ अनायास ही मिल जाता है । भगवान कहते हैं कि *यत पादरेण उकानि का काअपी संसार वार्धे सेतू बध्यायते नाथम देशिकम तमोपास महे यस्मात नुग्रहदा लब्द्धवा महद ज्ञान मत्सृजेत तस्मय श्रीदेश केंद्राय नमश्चा भिश्ट सिद्धये* अर्थात गुरुदेव की चरण धूलि का एक छोटा सा कण सेतू बंध की भांति है, जिसके सहारे इस भव सागर को सरलता से पार किया जा सकता है और गुरुदेव की उपासना मैं करूंगा ऐसा भाव प्रत्येक शिष्य को रखना चाहिए, जिनके अनुग्रह मात्र से महान अज्ञान का नाश होता है । वे गुरुदेव सभी अभीष्ट की सिद्धि ही देने वाले हैं, उन्हें नमन करना शिष्य का कर्तव्य है । इन महामंत्रों के अर्थ शिष्यों के जीवन में प्रत्येक युग में, प्रत्येक काल में प्रकट होते रहे हैं । प्रत्येक समय में शिष्यों ने गुरु कृपा को अपने अस्तित्व में फलित हुए देखा है ऐसा ही एक उदाहरण लक्ष्मण मल्लाह का है, जो अपने युग के सिद्ध संत स्वामी भास्करानंद का शिष्य था । काशी निवासी संतों में स्वामी भास्करानंद का नाम बड़ी श्रद्धा से लिया जाता है । संत साहित्य से जिनका परिचय है वे जानते हैं कि अंग्रेजी के सुविख्यात साहित्यकार मार्क टवेन ने उनके बारे में कई लेख लिखे हैं । जर्मनी के सम्राट कैसर विलियम द्वितीय तत्कालीन प्रिंस ऑफ विल्हेम, स्वामी जी के भक्तों में से थे । भारत के तत्कालीन अंग्रेज सेनापति जनरल लोकार्ट तो उन्हें अपना गुरु मानते थे । इन सभी विशिष्ट महानुभावों के बीच भी स्वामी भास्करानंद जी का शिष्य था लक्ष्मण, जो मल्लाह जाति का था जो ना तो पढ़ा लिखा था और ना ही उसमें कोई विशेष योग्यता थी,लेकिन उसका ह्रदय सदा ही अपने गुरुदेव के प्रति विभल रहता था । भारतभर के प्राय सभी राजा, महाराजा स्वामी जी की चरण धूलि लेने में अपना सौभाग्य मानते थे । स्वयं मार्क टवेन ने उनके बारे में अपनी पुस्तक में लिखा था कि भारत का ताजमहल अवश्य ही एक विस्मय जनक वस्तु है जिसका महानिय दृश्य मनुष्य को आंनद से अभिभूत कर देता है, नूतन चेतना से उत्बुद्ध कर देता है । किन्तु मेरे गुरुदेव स्वामी भास्करानंद जी के सामने महान एवम् विस्मय कार्य जीवंत वस्तु के साथ, उसकी क्या तुलना हो सकती है । स्वामीजी के योग ऐश्वर्य से सभी चमत्कृत थे । प्रायः सभी को स्वामी जी संकट, आपदाओं से उबारते रहते थे लेकिन लक्ष्मण मल्लाह के लिए तो अपनी गुरु भक्ति ही पर्याप्त थी । गुरु के चमत्कारों से उसे कुछ विशेष प्रयोजन ना था गुरु को ही अपना इष्ट मानता और उनको ही अपना सर्वस्व मानता । गुरु चरणों की सेवा, गुरु नाम का जप यही उसके लिए सब कुछ था । श्रद्धा से विभोर होकर उसने स्वामी भास्करानंद जी की चरण धूलि इकट्ठा कर एक डिबिया में रख ली थी । स्वामी जी के खड़ाऊं उसकी पूजा बेदी में थे, इनकी पूजा करना, गुरु चरणों का ध्यान करना और गुरु चरणों की रज अपने माथे पर लगाना, उसका नित्य नियम था । इसके अलावा उसे किसी और योग विद्या का पता ना था । कठिन आसन, प्राणायाम की प्रक्रिया यें उसे कुछ नहीं पता था, मुद्राओं एवम् बंध के बारे में भी उसे बिल्कुल पता ना था । किसी मंत्र का उसे कोई ज्ञान ना था, अपने गुरुदेव का नाम ही उसके लिए महामंत्र था । इसी का वह जप करता, यदा-कदा इसी नाम धुन का वह कीर्तन करने लगता । एक दिन प्राय जब वह रोज की भांति गुरुदेव की चरण रज माथे पर धारण करके गुरुदेव का नाम जप करता हुआ, उनके चरणों का चिंतन कर रहा था तो उसके अस्तित्व में कुछ आश्चर्यकारी एवम् विस्मय जनक दृष्यावली प्रकट हो गई । उसने अनुभव किया कि दोनों भौहों के बीच गोल आकार का श्वेत प्रकाश बहुत ही सघन हो रहा है । यूं तो यह प्रकाश पहले भी कभी-2 झलकता था । यदा कदा सम्पूर्ण साधना अवधि में भी यह प्रकाश बना रहता था परन्तु आज उसकी सघनता कुछ ज्यादा ही थी । उसका आश्चर्य तो और भी ज्यादा तब हुआ जब उसने देखा कि गोल आकार के श्वेत प्रकाश में एक हल्का-सा विस्फोट सा हो गया है और उसमें श्वेत कमल की दो पंखुड़ियां खिल रही हैं । गुरु नाम की धुन के साथ ही यह दोनों पंखुड़ियां खुल गई और उसके अंदर से प्रकाश की सघन रेखा उभरी । इसी के पश्चात उसे अनायास ही अपने आश्रम में स्वामी भास्करानंद जी ध्यानस्थ बैठे हुए दिखाई देने लगे । योगविद्या से अनविघ लक्ष्मण मल्लाह को यह सब अचरज भरा लगा । दिन में जब वह गुरुदेव को प्रणाम करने गया तो उसने सुबह की सारी कथा कह सुनाई । लक्ष्मण की सारी बातें सुनकर स्वामीजी मुस्कुराए और बोले बेटा इसे आज्ञा चक्र का जागरण कहते हैं । अब से तुम जब भी भौहों के बीच में मन को एकाग्र करके जिस किसी स्थान, वस्तु या व्यक्ति का संकल्प करोगे वही तुम्हें दिखने लगेगा । स्वामी जी के इस कथन के उत्तर में लक्ष्मण मल्लाह ने कहा कि हे गुरुदेव मैं तो सदा-2 आपको ही देखते रहना चाहता हूं । मुझे तो इतना मालूम है कि मैं आपके चरणों की धूलि को भौहों के बीच में लगाया करता था । यह जो कुछ भी है आपकी चरण धूलि का ही कमाल है, अब तो यह नई बात जानकर मुझे विश्वास हो गया है कि गुरु चरणों की धूलि से शिष्य आसानी से भव-सागर पार कर सकता है । पहले तो सुना था लेकिन अब मैंने स्वयं अनुभव किया है । लक्ष्मण मल्लाह की यह अनुभूति हम सभी गुरु भक्तों की अनुभूति भी बन सकती है । बस उतना ही सघन प्रेम एवम् उत्कट भक्ति चाहिए, असंभव को संभव करने वाली गुरुवर की चेतना की महिमा अनंत ही है ।