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क्या आपने ईश्वर को देखा है?(सन्यासी का आध्यात्मिक सफर) भाग – १


गुरु प्रेम और करुणा की मूर्ति है, गुरु के प्रति भक्ति मे शिष्य के हृदय मे स्वार्थ की एक बूंद भी नही होनी चाहिए। गुरु के प्रति भक्ति अखुट और स्थायी होनी चाहिए, शरीर या चमड़ी का प्रेम वासना कहलाती हैं। जबकि गुरु के प्रति प्रेम भक्ति कहलाता है।ऐसा प्रेम.. प्रेम के खातिर होता है स्वामी विवेकानंद जी के उत्कृष्ट गुरु भक्ति विषयक उनके जीवन पर संक्षिप्त प्रकाश हम डालेंगे। हमारे देश मे गुरु शिष्य की लाजवाब जोड़ी रही हैं। जिसकी मिसाल आज पूरी दुनिया मे दी जाती है।

उन लाजवाब गुरु शिष्य की जोड़ियों मे से एक जोड़ी श्री राम कृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद की है। स्वामी विवेकानंद भारतीय चेतना के मंदिर के शिखर है तो उनकी नींव का पत्थर है उनके गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस। वह पत्थर जो दिखाई तो नहीं देता लेकिन जिसके बिना महल के टिके रहने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसलिए जब जब स्वामी विवेकानंद को याद किया जाता है तो श्री रामकृष्ण परमहंस भी याद आते हैं, या रामकृष्ण परमहंस को हम याद करते हैं तब स्वामी विवेकानंद याद आते है, दोनों का रिश्ता गुरु शिष्य संबंध की आदर्श मिसाल है।

श्री रामकृष्ण परमहंस स्वामी विवेकानंद जी के जीवन का एक ऐसा हिस्सा है जिसे उनसे कभी अलग करके नहीं देखा जा सकता। श्री रामकृष्ण परमहंस के पास आकर विवेकानंद की सत्य की खोज पूरी हुई फिर उन्होंने अपने गुरु की शिक्षाओं को पूरे विश्व मे फैलाया। इस महान भारतीय सन्यासी ने पूरी दुनिया को अपनी कर्म भूमि बनाया और अपने गुरु की प्रेरणा से विश्व भर मे भारतीय सभ्यता और धर्म का प्रचार किया। उन्होंने अपने ज्ञान व प्रतिभा से अनेक बुद्धि जिवियो को प्रभावित किया और अपने शुरुआती दौर मे विदेशो मे *द इंडियन मौंक* से मशहूर हुए। स्वामी विवेकानंद के जीवन की कुछ घटनाओं के बारे मे जानकर हम उनके चरित्र बल से परिचित हो सकते हैं, कठिन से कठिन परिस्थतियों मे भी उनका चरित्र हमेशा बेदाग ही रहा जैसे कि एक सत्त शिष्य का रहता है, वे हमेशा सूरज की भांति चमकते रहे और विश्व भर मे अपने गुरु का ज्ञान प्रकाश फैलाते रहे।

विवेक यानि नरेंद्र दत्त का जन्म आज से १५३ वर्ष पहले १२ जनवरी १८६३ को हुआ था। इसी दिन युवा दिवस मनाया जाता है और भक्त नरेंद्र का जन्म १२८ साल पहले हुआ था, जब एक ही इंसान के दो अलग अलग जन्मदिन बताए जाते है तो इसका अर्थ है कि एक जन्मदिन शरीर का है और दूसरा जन्मदिन है वह दिन जब उस शरीर की मान्यताएं समाप्त हुई और उसके अंदर का अनुभव प्रकट हुआ। कोलकाता मे जन्मे नरेंद्र दत्त की मां का नाम भुवनेश्वरी और पिता का नाम विश्वनाथ दत्त था। उनके पिता एक संपन्न इंसान थे और पेशे से वकील थे, नरेंद्र के अलावा उनके दो और बेटे भी थे। उनके दादाजी श्री दुर्गाचरण ने ईश्वर प्राप्ति की अभिलाषा से ग्रह त्याग कर दिया था।

जब नरेंद्र मां के गर्भ मे थे तो उनकी मां उन्हें गर्भ संस्कार देने के लिए भगवान शिव की खूब आराधना करती थी लेकिन उस समय उसे अंदाजा भी न था कि उनके बच्चो मे वास्तव मे कौन से संस्कार पड़ रहे हैं, नरेंद्र एक मधुर, प्रफुल्ल एवं चंचल बालक के रूप मे बड़े होने लगे। नरेंद्र इतने चंचल थे कि उनकी अदम्य शक्ति को वश मे लाने के लिए दो नौकरानियों की आवश्यकता होती थी, उन्हें शांत करने का अन्य कोई उपाय न देख उनकी मां शिव शिव कहते हुए उनके सिर पर जल डालने लगती थी इसे व हर बार शांत हो खड़े हो जाते थे ।

बच्चो का पशु पक्षियों के प्रति स्वाभाविक प्रेम होता है। नरेंद्र का भी पशु पक्षियों के प्रति गहरा लगाव था जो इनके जीवन के अंतिम पर्व मे पुनः व्यक्त हो उठा था, नरेंद्र के निहित गुणों की अभिव्यक्ति मे उनकी मां भी सहायिका बनी। एक दिन जब नरेंद्र ने घर लौटकर बताया कि विद्यालय मे उनके साथ अन्याय पूर्ण व्यवहार हुआ है तो उन्होंने बालक को दिलासा देते हुए कहा था – बेटा ! तेरी गलती नहीं थी तो भी कोई परवाह नहीं। फल की ओर ध्यान दिए बिना तू सदा सत्य का ही पालन किए जाना। सत्यनिष्ठा के फल स्वरूप संभव है कि तुझे कभी कभी अन्याय तथा कटूक परिणाम सहन करना पड़े परन्तु किसी भी परिस्थिति मे तुम सत्य को ना छोड़ना।

मां का यह उपदेश नरेंद्र ने सिर्फ ध्यान मे रखा बल्कि उसे तभी से अपने जीवन मे भी स्थान दे दिया, नरेंद्र के बचपन के कई प्रसंग है जिन मे से एक उनके साहस का वर्णन करती हैं। नरेंद्र के पड़ोसी के घर के आंगन मे पीपल का एक वृक्ष था, जिस पर चढ़कर खेलना नरेंद्र को बहुत पसंद था। वह पड़ोसी चिंतित रहता था कि कहीं किस दिन नरेंद्र गिरकर अपने हाथ पांव ना तुड़वा बैठे।

नरेंद्र के स्वभाव से परिचित होने की वजह से वह पड़ोसी जानता था कि पेड़ पर चढ़ने से मना करने भर से तो नरेंद्र मानने वाला नहीं। इसलिए उसे एक ऐसा उपाय सूझा जिसका असर किसी भी सामान्य बच्चे पर होना तय था उसने नरेंद्र से कहा नरेंद्र इस पेड़ पर एक ब्रह्म राक्षस रहता है और उसे पसंद नहीं कि कोई बच्चा पेड़ पर चढ़े इसलिए यदि सुरक्षित रहना है तो इस पेड़ से दूर ही रहना। पड़ोसी को लगा कि ब्रह्म राक्षस की बात सुनकर नरेंद्र पेड़ से दूर हो चोट चपेट से सुरक्षित रहने लगेगा लेकिन नरेंद्र तो नरेंद्र ही था।

पड़ोसी जैसे ही किसी काम से बाहर गया नरेंद्र फौरन पेड़ पर चढ़ गया और एक टहनी पर बैठ कर ब्रह्म राक्षस की प्रतीक्षा करने लगा। एक घंटा बीता और दो घंटे बीते और होते होते शाम होने को आई परन्तु ब्रह्म राक्षस को न आना था और ना ही वह आया लेकिन पड़ोसी जरूर घर लौट आया दरवाजा धकेले जाने की आवाज सुनकर नरेंद्र ने पेड़ से ही आवाज लगाई। काका ब्रह्म राक्षस मेरा गला दबाने कब आएगा?

मैं तो सुबह से उसका इंतजार करते करते थक गया हूं। बेचारे पड़ोसी ने नरेंद्र को नीचे उतारा और कहा जा बेटा जिसमें इतना साहस हो उसे कोई क्या सताएगा? तुझे कोई ब्रह्म राक्षस नहीं खाएगा लेकिन तू अंदर जाकर खाना जरूर खा ले सुबह से शाम हो गई है तु भूखा है । वास्तविकता यह है कि स्वामी विवेकानन्द शुरू से ही बड़े बुद्धिमान और बहादुर थे हर नियम परंपरा रोक कर मान्यता का अर्थ पूछा करते थे अगर उन्हें संदर्भ मे दिया गया उत्तर पसंद नहीं आता तो वे उसे अपनी कसौटी पर कसते थे और सिद्ध न होने पर उस नियम को तोड दिया करते थे उनकी बुद्धि इतनी तेज थी कि वे जो भी सबक पड़ते थे वह उन्हें फौरन याद हो जाता था और फिर वे उन्हें अपने दोस्तो के पास गप्पे लड़ाने चले जाते थे, उनकी इस क्षमता से उनके दोस्त धोखे मे पड़ जाते थे और उन्ही की नकल करते हुए कम समय तक पढ़ते। जिसके कारण उन्हें बाद मे पछताना पड़ता क्यों कि नरेंद्र भले ही कम समय मे ही सब कुछ याद कर लेते थे लेकिन उनके दोस्तो मे यह क्षमता न थी नरेंद्र के जीवन मे उनके माता पिता का गुरु समान स्थान था, माता पिता से संस्कारो के रूप मे मिली शिक्षा ने ही उन्हें श्री रामकृष्ण परमहंस का शिष्य बनने योग्य बनाया।

उनकी मां उन्हें हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए प्रोत्साहित करती थी और इसी भावना के वशीभूत होकर नरेंद्र ने विवेकानंद के रूप मे विश्व बंधुत्व और विश्व मानवता का सिद्धांत दिया। उनकी मां खुद भी एक निडर स्त्री थी और अन्याय व असत्य के विरूद्ध पूरी वीरता से खड़ी होती थी। एक ओर नरेंद्र की मां भुवनेश्वरी देवी ने उन्हें स्नेह पूर्ण संस्कार दिए तो दूसरी ओर पिता विश्वनाथ दत्त ने अनुशासन द्वारा नरेंद्र को संयम का पाठ पढ़ाया, विश्वनाथ दत्त का स्वभाव था कि वे अपने पास आने वाले हर व्यक्ति को सहारा देने के लिए हमेशा तैयार रहा करते थे।

इससे पता चलता है कि वे स्वभाव से बड़े दयालु और बड़े दिलवाले भी थे, कई लोग उनके घर पर महीनों तक ठहरते और उनका सारा खर्च विश्वनाथ दत्त ही उठाया करते थे। इन सब कारणों से कभी परिवार मे पैसे की बचत नहीं हो पाई। यह देखकर एक बार नरेंद्र ने अपने पिता से आवेश मे पूछा आप हमारे लिए क्या छोड़कर जाएंगे तो विश्वनाथ दत्त बालक नरेंद्र से कहे कि जरा उठकर दीवार पर टंगे आइने पर देखो कि मैं तुम्हारे लिए क्या छोड़कर जाऊंगा? नरेंद्र ने आइने में अपना प्रतिबिंब देखा और कहा अरे हा मेरे लिए तो मैं खुद ही हूं, मेरे पिता ने मुझे इस लायक बनाया है कि मैं स्वयं ही जिम्मेदारी खुद ले सकता हूं। वे पिता का आशय समझ गए और फिर उन्होंने दुबारा फिर कभी यह सवाल नहीं पूछा। नरेंद्र के पिता नहीं चाहते थे कि वे अपने पीछे इतनी सम्पत्ति छोड़कर जाए कि उनके पुत्र तमोगुणी हो जाए, विश्वनाथ दत्त व्यर्थ धन उड़ाने वाले व्यसनी, विलासी इंसान नही थे, उनका हृदय बहुत बड़ा था इसलिए वह खुलकर खर्च करते थे अपने समाज मे वे दाता के रूप मे जाने जाते थे।

एक पिता के रूप मे वे नरेंद्र के आदर्श बने। एक बार किसी कारण वश नरेंद्र ने अपनी मां से कुछ बाल सुलभ अपशब्द कह दिए, ऐसे मे कोई आम पिता अपने बेटे को दण्ड देता या जमकर फटकरता है लेकिन विश्वनाथ बाबू ने ऐसा कुछ नहीं किया, उस दिन जब नरेंद्र के कुछ मित्र घर खेलने के लिए आए तो विश्वनाथ बाबू ने कोयले से उनके कमरे के दरवाजे पर लिख दिया आज नरेंद्र ने अपनी मां से ऐसे ऐसे अपशब्द कहे। इस बात से नरेंद्र को जो आत्म ग्लानि महसूस हुई उसने अपने पश्चाताप और सोच समझकर बोलने का गुण विकसित किया इन्हीं कारणों से नरेंद्र के मन मे अपने माता पिता के लिए बहुत श्रद्धा थी, दोस्तो के सामने उसने अपने माता पिता को लेकर गर्व महसूस करते थे, इसी से उनमें आत्मगौरव की भावना जगी। तीव्र बुद्धि होने के कारण वह हमेशा तार्किक ढंग से सोचते थे जीवन की यात्रा मे ईश्वर की तलाश करते हुए वे समय के साथ सैलानी बन गए। सैलानी का अर्थ है टूरिस्ट। वे किसी भी सत्संग कार्यक्रम मे जाते तो एक जानकारी लेने के हिसाब से जाते। जैसे पर्यटक जाया करते थे फिर खोजी बने फिर उसके बाद सच्चे शिष्य बने और फिर पक्के शिष्य बनने के बाद नरेंद्र भक्त बन गए। भक्त बनकर उन्होंने अभिव्यक्ति की सत्य की इस यात्रा मे जब वे सैलानी थे खोज किया करते थे तो उस वक़्त उनका विद्यार्थी जीवन चल रहा था उस समय उनके शहर मे जब भी कोई धर्म प्रचारक आता तो उसे मिलने पहुंच जाते। वे इतने जिज्ञासु थे कि जाकर सीधे सवाल पूछते कि क्या आपने ईश्वर को देखा है? वो जिनसे भी यह सवाल पूछते वे लोग आश्चर्य चकित हो जाते थे क्यों कि इससे पहले किसी ने भी ऐसा सवाल नहीं किया, कोलकाता मे अलग अलग धर्मो मे बहुत से प्रचारकर्ता और ज्ञानी आया करते थे मगर उन सब मे से कोई भी नरेंद्र के इस सवाल का जवाब हां मे नहीं दे सका। इसके बावजूद नरेंद्र ने धर्म प्रचारकों से मिलना जुलना और यह सवाल पूछना जारी ही रखा। नरेंद्र के मन मे उठा यह दूसरा सवाल आखरी सवाल था कुछ दिनो बाद वे ईश्वर की खोज मे ब्रह्म समाज नामक आध्यात्मिक संस्था से जुड़े नरेंद्र इस संस्था के सदस्य बन गए, वहा वे संगीत का अभ्यास भी किया करते थे, भजन भी गाते थे और जब भी वहा कोई धर्म प्रचारक आता तो उससे यह सवाल जरूर पूछते कि क्या आपने ईश्वर को देखा है? जवाब मे वे लोग चुप हो जाते थे ऐसा नहीं कि ब्रह्म समाज से जुड़कर वे संतुष्ट थे लेकिन जब तक मन चाही चीज हासिल नहीं होती तब तक इंसान कुछ ना कुछ तो करता ही है नरेंद्र के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ वे ईश्वर की तलाश मे निकले ऐसे सैलानी थे जो अपने सवाल का जवाब पाने के लिए हर जगह जाता है लेकिन फिर भी उसे कोई जवाब नहीं मिलता चुकीं किसी भी धर्म का कोई उपासक इनके इस सवाल का जवाब नहीं दे पा रहा था इसलिए नरेंद्र बेचैन थे सोचते थे कि पृथ्वी पर कम से कम एक इंसान तो ऐसा होना चाहिए जिसने ईश्वर को देखा हो। वे ऐसे इंसान से मिलना चाहते थे एक दिन उनकी मुलाक़ात महर्षि देवेन्द्र ठाकुर से हुई, उन दिनों वे नदी किनारे नाव मे घर बनाकर रहा करते थे और वही पर साधना व ध्यान वगेरह करते रहते जब नरेंद्र को पता चला तो वे जिज्ञासा वश वहा पहुंच गए और तुरंत अपने सवाल दागने शुरू कर दिए, देवेन्द्र नाथ ने उन्हें कई अलग अलग सवालों के जवाब भी दिए मगर देवेन्द्र ने कहा मुझे बस इसी सवाल का जवाब चाहिए कि क्या आपने ईश्वर को देखा है? यह सुन देवेन्द्र ठाकुर ने कहा तुम्हारी आंखों मे योगियों की चमक है और तुम्हारे शरीर पर योगियों के चिन्ह भी है तुम अगर सच्चे मन से प्रार्थना करोगे, ईश्वर को चाहोगे, उनकी साधना करोगे तो उन्हें जरूर पा लोगे उनकी इस बात का नरेंद्र पर ऐसा असर हुआ कि वे सैलानी से खोजी बन गए, सैलानी तो हर जगह जाता है लेकिन खोजी एक ही जगह टिककर काम करना चाहता है, गुरु की तलाश खोजी बनने के बाद ही पूरी होती है।

खोजी बनने के बाद नरेंद्र का रहन सहन बदलकर योगियों जैसा हो गया वे सफेद धोती पहनने लगे और अलग से किराए का मकान लेकर रहने लगे घरवालों को लगा कि नरेंद्र इसलिए अलग रहना चाहता है ताकि उनकी पढ़ाई लिखाई मे बाधा ना आए उन्हें उनके पिताजी से हमेशा छूट मिलती ही थी इसलिए किसी ने उन्हें ऐसा करने से रोका नहीं, वे योगियों की तरह जमीन पर सोने लगे और धीरे धीरे सारी सुविधाओं का त्याग करने लगे पढ़ाई लिखाई और संगीत का अभ्यास करने के बाद उनके पास जो भी समय बचता था उसमें वे धार्मिक पुस्तकें पढा करते थे उनके मित्र उनसे मिलने आते तो उनके साथ भी धर्म चर्चा ही करते। इस तरह देवेन्द्र ठाकुर से मिलकर उनका जीवन बदल गया अपने अंदर ईश्वर को पाने के लिए पात्रता तैयार कर रहे थे अब बस उन्हें एक योग्य सदगुरु की आवश्यकता थीं

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आगे की कहानी कल के पोस्ट में दिया जायेगा ।

गुरु रक्षा सूत्र हर शिष्य के लिए वरदान (वह जो आपकी हरपल रक्षा करेगा)


शिष्य के हृदय के तमाम दुर्गुनरूपी रोग पर गुरुकृपा सबसे अधिक असरकारक, प्रतिरोधक एवं सार्वात्रिक औषध है। जो गुरु भक्तियोग का अभ्यास करना चाहते हैं, उन्हें सब दिव्य गुणों का विकास करना चाहिए जैसे कि सत्य बोलना, न्याय परायणता, अहिंसा, इच्छा शक्ति, सहिष्णुता, सहानुभूति,स्वाश्रय, आत्मश्रद्धा, आत्म संयम, त्याग, आत्म निरक्षण, तत्परता, सहनशक्ति, विवेक, वैराग्य, हिम्मत, आनंदित स्वभाव, हर एक वस्तु मे मर्यादा रखना आदि।

गोस्वामी जी कहते है कि जीव जब गर्भ मे होता है तो ईश्वर से प्रार्थना करता है कि हे जगतपति ! मुझे इस नरक से मुक्त करो, इस बंधन से छुड़ाओ, मैं आपकी भक्ति करूंगा, आपकी ओर उन्मुख होऊंगा। परन्तु जीव जैसे ही उस दुखद अवस्था से बाहर आता है तो अपने दिए हुए वचनों पर ध्यान न केंद्रित कर पुनः गर्भावास की तैयारी मे खूब तत्परता से जुट जाता है परन्तु जब इस जीव को सदगुरु की शरण प्राप्त होती है तो वहीं जीव हसते खेलते, इठलाते बालकवत ईश्वर की ओर सहजता से अग्रसर होता जाता है।

गुरु और शिष्य मे जो सेतु जोड़ने का काम करती है वह है *गुरु के वाक्य*।

गुरु के श्री मुख से जो सूत्र निकलते हैं वही साधकों की वास्तविक रक्षा करती हैं और वही साधक के लिए रक्षा सूत्र है, इसी को वैदिक रक्षा सूत्र कहते है। गुरु के वाक्य ही वैदिक रक्षा सूत्र है, गुरु अपने साधकों को ये वैदिक रक्षा सूत्र बांधते हैं जिससे साधक सदैव रक्षित रहता है।

ये सतगुरु का रक्षा सूत्र यहां भी रक्षण करता है और वहां भी रक्षण करता है इसलिए गुरु के वाक्यों को ऋषियों ने मंत्रो का मूल बताया है।

*गुरुवर जो कहते है वो बात इलाही है इसमें नुक्ता चीनी की सख्त मनाही है।*

श्रेष्ठ शिष्य वही होता है जो गुरु के प्रत्येक वाक्य को उनके प्रत्येक वचन को मंत्र वत अपने जीवन मे धारण कर गुरु भक्ति के मार्ग पर चलता रहे, वे जानते है कि गुरु वह शक्ति, वह सत्ता है या कहे कि वह कृपा है जो शिष्य को अपनी शरण मे लेकर सब कुछ देने आती है। गुरु के देने व शिष्य के लेने के बीच जो सेतु है वह है गुरु का वाक्य। गुरु के वचन मुख से निकले शब्द मात्र नहीं होते, वे तो अथाह शक्ति के पूंज हुआ करते हैं।

जिसका पालन करने के लिए सम्पूर्ण सृष्टि भी आंदोलित हो जाती हैं, प्रकृति की समस्त शक्तियां बाध्य हो उठती है, जिस शिष्य ने गुरु वचनों पर विश्वास कर उन्हें जीवन मे धारण कर लिया उनके लिए दुख सिंधु यहां तक ही भवसागर सूख जाते है। जब शिष्य गुरुवचनो को सर्वोपरि मानता है तो उसका ऐसा श्रेष्ठ निर्माण होता है कि समस्त संसार उसकी श्रेष्ठता को श्रद्धा वत नमन करता है तभी तो सहजो बाई जी ने कहा कि

*गुण सब गुरु के वचन माही*

सर्वगुण अथवा सब प्रकार की उपलब्धियां गुरु के वचनों के पालन मे ही निहित हैं। घास का एक गठ्ठर उठाने के पीछे गुरु वचन ही तो थे जिनको शिरोधार्य कर भाई लहणा गुरु पद को प्राप्त हो गए, अर्थात गुरु अंगद देव बन गए। शबरी गुरुवचनो पर विश्वास करके सदा सदा के लिए मुक्त हो गई।

*मुनि के वचन समुझी जिय भाए*

चन्द्र गुप्त अपने गुरुदेव चाणक्य के प्रत्येक वाक्य को जीवन मे धारण करके एक साधारण गडरिया से चक्रवर्ती सम्राट बनने का सफर तय कर गया, गुरु के हर वचन पर विश्वास करके ही छत्रपति शिवाजी मुगलों के लिए काल साबित हुए, गुरु के वचन शिष्य के लिए वैदिक रक्षा सूत्र का काम करता है, शिष्य जानते है कि गुरु के मुख से निसृत होता एक एक शब्द ब्रह्मवाक्य होता है, वैदिक होता है, भगवान शिव भी माता पार्वती को समझाते हुए कहते है, गुरु वक्र स्थित ब्रह्म गुरुदेव के वचनों से साक्षात ब्रह्म की प्राप्ति संभव है उनका प्रत्येक वचन ब्रह्म वाक्य होता है इसलिए कहा गया है

*मंत्र मुलं गुरु वाक्यं*

इसलिए गुरु के वचन मंत्र है।

मंत्र किसे कहते हैं?

*मनःत्रायते इति मंत्र* .

जो हमारे मन को त्राण दे वही मंत्र है,

हमारे महापुरुषों ने कहा

*सदगुरु वेद्य वचन विश्वास*

सतगुरु रूपी वैद्य के प्रत्येक वचन पर विश्वास करो, तभी यह भवरोग मिटेगा, उसीसे शिष्य का कल्याण है जिन लोगो ने गुरु के वचनों पर संशय किया उनका क्या हुआ?

*संशयात्मा विनश्यति*

अर्थात जिन लोगो ने शंका की उनका विनाश हो गया। याद रहे गुरु के दिव्य वचनों को आप अपने सांसारिक ज्ञान एवं अल्प बुद्धि की कसौटी पर कसने की भूल ना करे।

उनके रहस्य युक्त वचनों को समझ देने की शक्ति हमारी सीमित बुद्धि में नहीं होती इसलिए सदगुरु जो कहते है वहीं परम सत्य है।

*गुरु के वचन अटपटे झटपट लखे न कोय। जो इनको चटपट लखॆ तो झटपट दर्शन होय।।*

गुरु के वचन सहज नहीं रहस्यात्मक भी होते है उनको मन बुद्धि नहीं श्रद्धा व विश्वास के आधार पर ही समझा जा सकता है। इसलिए कहते है की

मन मुरीद संसार है।

गुरु मुरीद कोई साध।।

जो माने गुरु वचनों को।

ताका मन अगाध।।

अर्थात मन तो संसार का मुरीद है, गुरु का मुरीद तो शिष्य ही हो सकता है जो शिष्य गुरु के वचन मानता है उसकी मती ही सर्वोपरि होती है इसलिए गुरु का हर वाक्य शिष्य के कल्याण के लिए ही होता है, यह वैदिक रक्षा सूत्र हम सभी अपने जीवन मे लाएं। हर बंधन से कर देते गुरु के वचन स्वतंत्र। साधारण से लगने वाले भी होते है यह महामंत्र, कभी स्नेहिल शब्दों से उत्साह मनो मे भर देते, कभी डांट फटकार से निर्माण भी कर देते तो कुछ सहज भाव से भविष्य की गांठें खोलते है, चुप रहकर भी गुरुवर मौन वाणी मे बोलते है गुरु के वचनों पर होता जिन्हें श्रद्धा व विश्वास, कृपा सिंधु फिर बना देते उन शिष्यों को खास।

आज इतिहास लिखा जाना था घटने वाला था कुछ अद्भुत


शास्त्र एवं गुरु द्वारा निर्दिष्ट शुभ कर्म करो, ब्रह्मवेता महापुरुष ही सच्चे संस्थापक होते है विश्व शांति की नींव का। किसी भी समाज या राष्ट्र की महानता उसकी संपत्ति, वित या वैभव से निर्धारित नहीं होती, समाज या राष्ट्र की महानता धर्म से निहित है और धर्म का प्राकट्य सत्शिष्य और सतगुरुओं की कृपा से ही होता है।

भारत की महानता का गुणगान हो रहा है परन्तु यह सबसे बड़ा विचारणीय तत्व है कि भारत की महानता पर दृष्टिपात करे तो उसकी महानता के पीछे जाने अनजाने ब्रह्मवेता सतगुरुओं की ही अनुकंपा रही है, चाहे वो भगवान राम हो, चाहे वो कृष्ण हो, भक्ति मती शबरी हो, महर्षि वशिष्ठ हो, गंगा माता को इस भारत भूमि पर लाने वाले भगीरथ हो, महर्षि पाणिनि हो, चाहे स्वामी विवेकानंद हो या चाहे लीला शाह महाराज ही क्यों न हो। इन्हीं की अनुकंपा से आज भारत महान कहा जाता है, भारत की महानता या अन्य किसी भी समाज की महानता उसकी श्रद्धा, उसकी मानवीय संवेदना के उपर निर्भर है।

परन्तु आज इस यंत्र के युग में समाज की श्रद्धा व महापुरुषों के प्रति विश्वसनीयता को खंडित किया जा रहा है और पुरजोर प्रयास के साथ कहीं न कही हम भी उसमें पूर्ण रूप से सहभागी हो रहे है ऐसे ही इस राष्ट्र में यदि सदगुरुओं को प्रताड़ित किया जाता रहा या अत्याचार किया जाता रहा तो शायद आने वाली पीढ़ी यह कहेगी की भारत कभी महान था। जब कभी भी संसार, समाज या धर्म पर आंच आई है तो इसकी रक्षार्थ सदगुरुओं ने ही पहल की है।

सन् १६९९ में वैसाखी का दिन था गुरु गोविंद साहिब जी ने एक खास जलसा आयोजित किया, गुरु का हुक्म पाकर हजारों शिष्य वहा पहुंचे, पंडाल खचाखच भरा था, बीचों बीच बड़ा दीवान लगा था, उसके चारों ओर एक पर्दा टंगा था, सभी की प्यासी आंखे एक टक इसी पर्दे पर टिकी थी, मानो इसे भेदकर विराजमान गुरु महाराज जी की एक झलक पाना चाहती हो, उनके ओजस्वी शांतमय रूप को निहारना चाहती हो और तभी अकस्मात पर्दा हटा गुरु महाराज जी समक्ष प्रकट हुए परन्तु यह क्या आज उनका मुख मंडल शांत नहीं था।

तेज जलाल उस पर दमक रहा था, एक अदभुत जोश था, एक बुलंद ललकार थी, वे दाएं हाथ मे एक चमचमाती नंगी तलवार लिए हुए थे इस तलवार ने अनुयायियों के माथे पर प्रश्न वाचक लकीरें खींच दी परन्तु तभी श्री गुरु गोबिंद सिंह जी सिंह गर्जना करते हुए नारा लगाया *बोले सो निहाल*

उसी उत्साह के साथ प्रतिध्वनि हुई *सत् श्री अकाल* .

फिर गुरु साहिब जी ने कड़कते स्वर मे ऐलान किया आज मेरी तेजधारी इंकलाबी तलवार एक शीश की प्यासी है, उठो गुरु के प्यारे सिखो आगे बढ़ो, खुशी खुशी से अपने सिर भेंट चढाओ। प्राणों का मोह त्यागो, बेमोल ही सिरो के सौदे करो मुझसे।

आज तुमसे तुम्हारा गुरु यही मांगता है, माहौल खौफजत हो गया, चेहरे बेरंग पड़कर सफेद हो गए, सब स्तब्ध रह गए, खामोशी का माहौल छा गया, पंडाल मे मानो सांप सूंघ गया सभी को, सभी कानों सुने ऐलान को समझने उस पर विश्वास करने की कोशिश कर रहे थे परन्तु तभी गुरु साहिब ने पुनः हुंकारा साहस करो बहादुर सिखो, आगे बढ़कर अपने सिर दो। ऐलान स्पष्ट था निसंदेह मांग अनोखी ही थी, गुरु की खड़क चमककर जैसे ललकार रही थी कि हे सिखो ! आज तक गुरु भक्त होने के बड़े दावे करते आए हो किन्तु केवल जुबान हिलाने से बात नहीं बनती, कह देना भर काफी नहीं, आज तुम सभी को अपने शिष्यत्व का प्रमाण देना होगा यदि प्रेम की डगर पर कदम रखने की हिम्मत की है तो फिर सिर की बाजी लगाने से क्यों डरते हो, तलवार के इस ललकार को एक सच्चे शिष्य ने स्वीकार किया और सीना ठोककर बोला मैं दूंगा अपना सिर सच्चे बातशाह ! मैं दूंगा।

अफसोस है कि मेरे धड़ पर एक सिर है हजार होते तो हजारों आपके श्री चरणों मे भेंट कर देता। यह था लाहौर का क्षत्रिय दयाराम। गुरु साहिब उसे पकड़कर बाजू से पर्दे के पीछे ले गए सट्टाक सिर कलम होने की आवाज़ आई, रक्त की मोटी धार पर्दे के नीचे से बह निकली, दो क्षणो के पश्चात गुरु साहिब फिर से बाहर आए उनके हाथ मे रक्त से सनी हुई तलवार थी, टपकते रक्त को देखकर लाखो दिल सिरह उठे, यह क्या, एसी निष्ठूर्ता.. गुरु साहिब ने अपने ही सिख की गर्दन पर कटार चला दी किन्तु आज तो परीक्षा की घड़ी थी, करुणा अवतार गुरु ने रौद्र रूप धारण किया हुआ था, उन्होंने एक बार फिर महाघोश की और कहा शिष्य वहीं जो शीश दे, इस हजारों के समूह मे में कोई ऐसा शिष्य चाहता हूं, है कोई और ऐसा शिष्य? शीश झुकाना इतना आसान है और शीश देना उतना कठिन। कृपा अनुदान के लिऐ शीश झुकाते आए है हम सतगुरुओं के आगे परन्तु आज बलिदान के लिए झुकाना था, आज झुकाना ओपचारिक नहीं था, प्रामाणिक था, जीवन मृत्यु का प्रश्न था, गुरु जीवन को संवारने की बात नहीं कर रहे थे, जीवन ही मांग रहे थे, तन मन नहीं प्राण चाह रहे रहे थे, अब जिन्होंने गुरु को प्राण पति बनाया ही नहीं था, जाहिर है कि उन्हें यह मांग नाजायज लगी, असंगत और अटपटी लगी परन्तु इस भीड़ मे एक और शिष्य ऐसा था जो पहले ही अपने प्राणों को गुरु चरणों मे विसर्जित कर चुका था यह था रोहतक का जाट धर्मदास। वह उठा और बोला यह नाचीज़ आपका ही बंदा हूं मालिक जो चाहे करो, हाज़िर हूं, गुरु साहिब उसे भी भीतर ले गए, वहीं प्रक्रिया दोहराई फिर कुछ क्षणों के बाद अकेले बाहर आए, हाथ मे वहीं रक्तिम तलवार थी सिलसिला आगे बढ़ता गया, तीसरी बार द्वारका का रंगरेज हुकुम चंद उठा, चौथी बार जगतनाथ पूरी का कहार हिम्मतराय दौड़कर आगे आया। अब गुरु गोविंद सिंह जी पांचवीं दफा बाहर आए, रक्त रंजित तलवार ऊंची करके फिर महानाद किया बस.. क्या कोई और नहीं?

इतनी संगत मे सिर्फ चार गुरुभक्त, आगे आओ मुझे एक और शीश चाहिए अब तक आनंदपुर मे हा-हा कार मच चुका था काफी सिख तो पंडाल छोड़कर बाहर निकल गए जो बैठे हुए थे, उनमें संशयो के तूफान उठ गए, यह गुरु महाराजजी को क्या हो गया है ? निसंदेह अब उनकी तबियत ठीक नहीं है, नहीं तो क्या यू अपने सिखो के सिर कलम करते। कानाफूसी शुरू हो गई लेकिन इन तूफानों हाहाकारों को पीछे धकेलता हुआ एक और सिख आगे बढ़ा, यह था साहब चंद। आंखो मे प्रेम का दरिया मस्तक समर्पण भाव से झुका हुआ हाथ प्रार्थना मे जुड़े हुए साहब चंद मंच पर पहुंचकर गुरु चरणों मे लौट गया, मेरे साहिब सिर देने वाले भी आप सिर लेने वाले भी आप। सच्चे पातशाह ! सिर तो क्या इस तन का अंग अंग, बोटी बोटी काट डालो, दास चरणों मे अर्पित है, एक और सिख बलि हुआ।

गुरु महाराज जी पुनः बाहर आए किन्तु इस बार उनके हाथ मे तलवार नही थी मुख मंडल पर आक्रोश नही था आंखो मे नमी थी, मंद मंद मुस्करा रहे थे फिर एकाएक निर्णायक स्वर मे बोले यह पर्दा हटा दो संसार को प्रत्यक्ष देख लेने दो कि जो गुरु के लिए मर मिटने से नहीं चूकते वे सदा सदा के लिए जीवित रहते हैं,अमरत्व के अधिकारी होते हैं।

आज्ञानुसार पर्दा हटा पांचों गुरुभक्त सिर झुकाए हुए आगे खड़े थे उन्हें देखकर गुरु साहिब के मुखारविंद से आशीर्वचन बरसने लगे, ये मेरे पांच प्यारे है, इन्हे वहीं लिबास पहनाओ , जो मैं धारण करता हूं वही शस्त्र थमाओ जो मैंने थामा हुआ है, आज से इनके वचन मेरे वचन ही मानना क्यों कि ये जो भी कहेंगे या करेंगे उसका आधार मेरी ही प्रेरणा होगी, मैं ही इनके भीतर निवास करके सब कुछ करूंगा और कहूंगा।

खालसा मेरो रूप है खास खालसा महि हउ करहूं निवास।

श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने इन पंच प्यारो को साक्षात अपना ही रूप बना लिया, इसका तात्पर्य यह नहीं कि उन्हें केवल अपने समान वेश प्रदान किया, खालसा होना केवल मात्र वेश या वस्त्र परिवर्तन नहीं था, खालसा आंतरिक अवस्था है, सतगुरु से पूर्ण एकात्मता है, ब्रह्म ज्योति से जुड़कर खालिस अर्थात परम शुद्ध हो जाना है स्वयं दशम पातशाही ही खालसा पंथ के संस्थापक ने यही उदघोष किया था जो आज स्वर्णिम इतिहास मे वर्णन है,

जाग्रत ज्योत जपे नित बासुर

एक बिना मन नेक न आने

पूर्ण ज्योत जगे घट मे

तब खालस ताहि ना खलास जानू।

अर्थात वही खालसा है जो हृदयान्चल मे नित्य प्रज्वलित ईश्वरीय ज्योति के ध्यान से निरंतर जुड़ा है, इस पूर्ण ज्योति के ध्यान से परम शुभ्रता को पा चुका है, सतगुरु से एकिक्रत हो गया है, ऐसे ही खलसो को संगठित कर श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ का गठन किया था, वह पंथ जो भावी समय मे ऐसा जुझारू तूफान बना जिसने असत्य की ईट से ईट बजा दी अन्याय और अत्याचार के पैर उखाड़ दिए तो सच मे भारत की महानता के पीछे ऐसे सतगुरुओं की बहुत बड़ी कृपा है उनकी अनुकंपा है।