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समाज निर्माण में ब्रह्मवेत्ताओं का योगदान


हम इतिहास देखेंगे तो पायेंगे कि वे ही आत्मोन्नति, राष्ट्रोन्नति व राष्ट्रसेवा में सफल हुए जो ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों के मार्गदर्शन मं चले हैं। उन्होंने ही सुन्दर ढंग से अपना एवं समाज का जीवन-निर्माण किया है जिन्होंने जागृत, हयात संतों-महापुरुषों का महत्व समझा है, उनके सत्संग-सान्निध्य का लाभ स्वयं लिया है एवं अपने सम्पर्क में आने वालों को दिलाया है। अवतारों, राजा-महाराजाओं, स्वतंत्रता सेनानियों, उद्योगपतियों, राजनेताओं – सभी क्षेत्रों की विभूतियों एवं हस्तियों का जीवन इसकी गवाही देता है।

ब्रह्मवेत्ता सदगुरुओं का प्रसाद था राम राज्य

भगवान श्रीराम जब 16 साल के हुए तब संसार की नश्वरता देख बहुत ही चिंतित रहने लगे। उनका शरीर सूखकर दुर्बल हो गया। इससे राजा दशरथ जी सहित सभी प्रजाजन अत्यंत चिंतित हुए। और ऐसे समय में ही ऋषि विश्वामित्र जी ने आकर दशरथ जी से राक्षसों के विनाश हेतु राम जी की माँग की। दशरथ जी और चिंता में पड़ गये। ऐसे गम्भीर समय में गुरु महर्षि वसिष्ठ जी ने परिस्थिति को सम्भाला और कहाः “आप चिन्तित न हों। महर्षि विश्वामित्र के निर्देश का आदरपूर्वक पालन करो। उनके साथ श्रीरामचन्द्र को भेजो।”

फिर वसिष्ठजी ने ब्रह्मोपदेश देकर राम जी को ऐसा अडिग बनाया कि वे 14 साल के वनवास जैसी विकट से विकट परिस्थिति में भी कभी खिन्न या दोलायमान नहीं हुए। रावण, कुम्भकर्ण जैसे आततायियों का समाज से सफाया कर सुन्दर राज्य व्यवस्था की। इस प्रकार रामराज्य ब्रह्मवेत्ता सद्गुरुओं का ही प्रसाद था।

देश के ‘भारत’ नाम के पीछे छुपी तपस्या

क्या आप जानते हैं कि हमारा देश ‘भारत’ कैसे कहलाया ? भागवत (5.4.7) व महाभारत (आदि पर्व अः 72.74) पढ़ लीजिये। ऋषभदेव जी के पुत्र राजा भरत अथवा शकुंतला के पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत के सुशासन के कारण इस भूमंडल का नाम ‘भारत’ प्रचलित हुआ। यह इसलिए हुआ क्योंकि दोनों राजा भरत गुरुकृपा से सद्ज्ञान में रत थे – ‘भा’ याने सद्ज्ञान और ‘रत’ याने तल्लीन रहना।

शकुंतला पुत्र राजकुमार भरत को वेद एवं समस्त शास्त्रों का ज्ञान दे के शुभ संस्कार कर जीवन-निर्माण करनेक वाले महर्षि कण्व के ही महान प्रयासों का फल था राजा भरत का सुशासन ! इस प्रकार हमारे देश का नाम भी ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों का ही कृपा-प्रसाद है।

महाभारत के युद्ध में जीत का रहस्य

भगवान श्रीकृष्ण ने हताश हुए अर्जुन को हिम्मत दी, सद्ज्ञान दिया और आत्मज्ञान में प्रतिष्ठित कर फिर युद्ध कराया। अर्जुन जब तक श्री कृष्ण जैसे ब्रह्मवेत्ता गुरु पास में होते हुए भी उनकी महिमा के प्रति अनजान थे और उन्हें मात्र एक सखा या युद्ध में रथचालक मानते थे, तब तक वे शोक एवं विषाद से बच नहीं पाये किंतु जब भगवान करुणाप्रेरित होकर सद्गुरु की भूमिका में खड़े हुए और अर्जुन शिष्यस्तेऽहम्….. ‘मैं आपका शिष्य हूँ।’ कहकर उऩकी शरण हुए तब उन्हें सर्वश्रेष्ठ ज्ञान – आत्मज्ञान प्राप्त हुआ, धर्मयुद्ध करने का बल मिला और जनता अत्याचार से मुक्त हुई व उसे धर्माधिष्ठित शासन मिला।

धर्म चेतना जागृति के सुवर्ण-अध्याय

विरक्त होने का विचार कर रहे वीर छत्रसाल को गुरु प्राणनाथ जी ने कर्मयोग द्वारा परमात्म प्राप्ति की प्रेरणा दी थी। छत्रसाल को मुगल शासकों से लड़ने हेतु सैन्यबल, धनबल आदि की कमी पड़ रही थी तब गुरु उनके मार्गदर्शक बने। गुरु ने अंतर्दृष्टि से देखकर पन्ना को राजधानी बनवाया, जहाँ छत्रसाल को असंख्य बहुमूल्य हीरे मिले। प्राणनाथ जी ने अपने अनेक शिष्यों को छत्रसाल के सैन्य में भर्ती होने की प्रेरणा दी और युद्धों में पहुँचकर धर्म की रक्षा हेतु सेना का प्राणबल बढ़ाया।

ऐसे ही छत्रपति शिवाजी महाराज ने जब गुरु समर्थ रामदास जी के चरणों में अपना राज्य अर्पण किया एवं विरक्त बनने की इच्छा व्यक्त की तब समर्थ जी ने उन्हें राज्य लौटाकर अपनी अमानत के रूप में राजकाज सँभालते हुए निष्काम कर्मयोग का अवलम्बन लेने के लिए कहा एवं बाद में ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति भी करा दी। गुरुदेव एवं माँ जीजाबाई के आशीर्वाद से महायोद्धा शिवाजी महाराज हिन्दवी स्वराज्य (हिन्दू साम्राज्य) की स्थापना करने में सफल हुए। गुरु गोविन्दसिंह जी ने माधोदास वैरागी में से एक महान धर्मयोद्धा का जन्म हुआ, नाम प़ड़ा वी बंदा बहादुर या बंदा वैरागी।

महापुरुषों ने राजा जनक, श्रीरामजी के भाई भरत, चन्द्रगुप्त मौर्य, राजा पीपाजी जैसे अनेकानेक उत्कृष्ट शासक देश को दिये।

प्रथम स्वदेशी स्टील  फैक्ट्री के प्रेरणास्रोत

स्वामी विवेकानंद जी से खेतड़ी के महाराजा व जमशेद जी टाटा लाभान्वित हुए। स्वामी जी ने जमशेद जी को प्रथम स्वदेशी स्टील कारखाना स्थापित करने की प्रेरणा दी और वह कारखाना अत्यंत सफल रहा व आज भी विश्वप्रसिद्ध है।

त्रिकालदर्शी दूरद्रष्टा की करुणामय सलाह ‘तीन की बददुआ से विशेष बचना चाहिए।’

ब्रह्मर्षि देवराहा बाबा जी के चरणों में देश की एक पूर्व प्रधानमंत्री हार का कारण जानने पहुँची तो बाबा जी ने इसे गौ-रक्षकों के ऊपर अत्याचार और संतों के अपमान का फल बताया। देशसेवा हेतु सत्ताप्राप्ति की याचना करने पर करुणामूर्ति बाबा जी ने उन्हें एक अन्य ब्रह्मज्ञानी संत आनंदमयी माँ के सान्निध्य में जाने की प्रेरणा दी तथा कहा कि “इससे तुझे पुनः राज्यप्राप्ति होगी।” और उन प्रधानमंत्री ने महापुरुष के वचनों का अक्षरशः पालन किया तो उनको सत्ताप्राप्ति भी हुई।

बाद में उन प्रधानमंत्री का दर्दनाक मृत्यु के बाद एक अन्य प्रधानमंत्री ने देवराहा बाबा जी से पूछा कि “उनकी मृत्यु ऐसे क्यों हुई ?” तो बाबी जी ने बतायाः “गौरक्षा आन्दोलन में संतों के ऊपर लाठीचार्ज से सैंकड़ों महात्माओं की हड्डियाँ टूट गयीं। उसको साधुओं की बददुआएँ लगीं। तुम लोग जो प्रधानमंत्री बनते हो यह तुम्हारे पूर्वपुण्यों का फल है किंतु वर्तमान में अधिक पाप करने से यह राजभोग का सुख नष्ट हो जाता है। बच्चा ! वैसे सभी की बददुआ से बचना चाहिए किंतु विशेषकर विधवा स्त्री, अनाथ बच्चा व महात्मा दुःखी होकर यदि बददुआ देते हैं तो उसको परमात्मा भी नहीं टालते।”

स्वतंत्रता सेनानियों व समाजसेवियों के प्रेरणास्रोत

संत देवराहा बाबा अपने पास आने वाले क्रांतिकारियों से कहा करतेः “बच्चा ! मैं तुम्हारी बैटरी चार्ज करता हूँ, जिससे स्वतन्त्रता के कार्य में तुम लोग अपनी संघर्षमय आहुति डाल सको।”

साँईं श्री लीलाशाह जी महाराज स्वतंत्रता-सेनानियों के हित में भक्तों द्वारा सामूहिक संकल्प कराके एवं अपनी संकल्पशक्ति का भी प्रयोग करके उन्हें सशक्त बनाते थे। अंग्रेजों के अत्याचारों को रोकने हेतु जहाँ देवराहा बाबा आदि का आशीर्वाद पाकर सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज का गठन किया, वहीं अहिंसक आंदोलन के नेता गांधी जी को स्वामी विवेकानंद जी से देशभक्ति की प्रेरणा एवं श्रीमद् राजचन्द्र जी से मार्गदर्शन मिला था। गांधी जी कहते हैं – “स्वामी विवेकानन्द के साहित्य को पढ़ने के बाद मेरा राष्ट्रप्रेम हजार गुना हुआ।”

विवेकानंद जी के साहित्य से प्रेरणा लेकर सुभाषचन्द्र बोस, ज्योतिन्द्रनाथ मुखर्जी जैसे अनेक क्रांतिकारी स्वतंत्रता-सेनानी योगी अरविंद जी के योग-मार्गदर्शक थे योगी विष्णु भास्कर लेले।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक गोलवलकर गुरु जी यौवनकाल से ही विरक्त थे और उनके मन में हिमालय के एकांतवास में जाने के लिए प्रबल भावना थी। उनको समाज सेवा की सत्प्रेरणा देने वाले महापुरुष थे स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी के सत्शिष्य स्वामी अखंडानंद जी।

जब समाज में अस्पृश्यता जैसी कुप्रथाएँ चल पड़ीं तो उनका निवारण करने वाले भी सबमें ईश्वर की सत्ता का प्रतिपादन करने वाले स्वामी रामानंद जी, रैदास जी, विवेकानंद जी, संत आशाराम जी बापू जैसे अद्वैत वेदांतनिष्ठ एवं भक्तिमार्ग के ज्ञाता महापुरुष ही थे। जहाँ भी समाज में आमूल-चूल, व्यापक मंगलकारी परिवर्तन हुए हैं, उनके मूल में संतपुरुष ही थे। ऐसे महापुरुषों ने राष्ट्र और विश्व को केवल वैचारिक ज्ञान ही नहीं दिया बल्कि समाज के हर अंग को कर्मयोग के प्रत्यक्ष अवलम्बन द्वारा परिपुष्ट करने का कार्य भी किया। ऐसे ब्रह्मवेत्ता महापुरुष आज भी विद्यमान हैं।

ब्रह्मनिष्ठ संत श्री आशारामजी बापू ने पिछले 5 दशकों में देश, धर्म व संस्कृति के हित में जो अभूतपूर्व कार्य किये, उनकी श्रृंखला भी बड़ी विशाल है। आपने केवल देश के अनेक प्रधानमंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, अधिकारियों, संगठन-प्रमुखों को सत्प्रेरणा व मार्गदर्शन दिया है। पूज्य श्री ने धर्मांतरण से रक्षा एवं सांस्कृतिक विकृतियों का निवारण किया। 25 दिसम्बर से 1 जनवरी के बीच विश्वगुरु भारत कार्यक्रम शुरु किया। मातृ-पितृ पूजन दिवस, तुलसी पूजन दिवस जैसे संस्कृतिरक्षक पर्व शुरु किये।

पूज्य बापू जी ने अपने सत्संगों में मात्र आत्मा-परमात्मा का ही उपदेश नहीं दिया अपितु पारिवारिक सौहार्द, सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता व अखंडता, परोपकार, ‘परस्परदेवो भव’ – इस प्रकार के संदेशों और सेवाकार्यों की एक सरिता ही बहा दी, जिससे ज्ञानयोग के साथ कर्मयोग के समन्वय से धर्म एवं संस्कृति रक्षा तथा राष्ट्रसेवा के अनेक कार्य सम्पन्न हुए। संत श्री की अन्य सत्प्रवृत्तियों का वर्णन स्थानाभाव के कारण यहाँ नहीं कर पा रहे हैं। देखें लिंक https://goo.gl/J6qVdy

जैसे वृक्ष अपने फलों को स्वयं कभी नहीं खाता, सरिता अपने पानी का स्वयं पान नहीं करती, वैसे ही संतों का जीवन भी अपने लिए नहीं, दूसरों के कल्याण के लिए ही होता है। ऐसे संतों पर झूठे आरोप लगवाये जाने पर तत्कालीन समाज जितना सजग रहा, उतना ही वह महापुरुषों का लाभ ले पाया। प्यारे भारतवासियो ! सजग रहना, सत्य को जानना व उससे अनभिज्ञ समाज तक उसे पहुँचाना। प्राणिमात्र के परम हितैषी महापुरुषों का उनके हयातीकाल में ही अवश्य लाभ लेना।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2017, पृष्ठ संख्या 4-6 अंक 300

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सनातन संस्कृति के पर्वों-उत्सवों का मुख्य उद्देश्य – पूज्य बापू जी


भारतीय संस्कृति के उत्सवों में 4 बातें आती हैं-

हमारे शरीर की तन्दुरुस्ती की रक्षा हो।

हमारे मन में उदारता हो।

हमारा सामाजिक सद्व्यवहार और आपकी सौहार्द बढ़े।  हमारे मन का किसी से बेमेल हो गया हो तो त्यौहारों के द्वारा एक दूसरे के नजदीक आ जायें, आपस में मिलें ताकि चार दिन की जिंदगी में एक-दूसरे से द्वेष न रहे। फिर होली खेलने की पिचकारी के बहाने या दीवाली की मिठाइयों के बहाने अथवा उत्तरायण के लड्डू देने-लेने के बहाने या और किसी पर्व के बहाने हम अपने मन कि विषमता मिटायें।

हम अपने भीतर के आनंद को जगायें। हर उत्सव में ज्ञान, भक्ति का वर्धन, वस्तुओं का सामाजीकरण, हृदय का एक दूसरे से मिलन और शरीर की तन्दुरुस्ती के साथ-साथ जीव का मूल लक्ष्य है अपने भीतर के आनंद को जगाना। तो ऐसे उत्सवों का आयोजन ऋषियों, महापुरुषों ने किया। भारतीय संस्कृति अभी भी जीवित है, इसका एक मुख्य कारण है कि इसमें इतने सारे उत्सवों की बड़ी सुन्दर व्यवस्था है।

अगर ठीक ढंग से सुख, प्रसन्नता और आनंद मिलता है तो जीव उन्नत होता है, नहीं तो गलत ढंग से सुख और आनंद की तरफ जाता है और अपना विनाश कर लेता है।

निर्विकारी प्रेम, प्रसन्नता, आनंद इंसान की जरूरत है क्योंकि उसकी उत्पत्ति आनंद से हुई है। आनंदस्वरूप परमात्मा से ही तुम्हारा संकल्प फुरा और जीने की इच्छा हुई तब नाम ‘जीव’ पड़ा। तुमने निर्णय किया तभी उस फुरने का नाम ‘बुद्धि’ पड़ा। तुमने संकल्प-विकल्प किया तब उसी फुरने का नाम ‘मन’ पड़ा और इन्द्रियों के द्वारा तुमने पदार्थों को पकड़ने तथा भोग के सुखी होने की इच्छा की, अपने को कर्ता-भोक्ता मान के सरकने वाली चीजों को सत्य मानकर उलझे तो नाम ‘संसारी’ पड़ा।

इन्सान की बदबख्ती अंदाज से बाहर है। कमबख्त खुदा होकर भी बंदा नजर आता है।

तुम शुद्ध-बुद्ध चैतन्य से स्फुरित होकर जीवभाव में आये, फिर बुद्धिभाव में आये, फिर मनःभाव में आये, इन्द्रिय भाव में आये फिर संसार की चीजों में आये तब हो गये संसारी !

अब उन संसारी जीवों को फिर मूल शिव (परमात्मा) की तरफ ले जाने के लिए सूक्ष्मता से विचार करके उत्सवों और सत्संगों का आयोजन अगर कहीं किया गया है तो वह इस सनातन संस्कृति में किया गया है।

तो जीव को शिवत्व में जगाने में एक मुख्य सहयोगी हैं अपनी संस्कृति के उत्सव और निमित्त बनते हैं भारत के ब्रह्मवेत्ता, आत्मज्ञानी, निर्दोष नारायण में जगे हुए, आत्मसाक्षात्कार किये हुए महापुरुष और उनके द्वारा रचित भारत के सद्ग्रंथ। ऐसे ब्रह्मवेत्ता महापुरुष इस संस्कृति को जीवित रखने में मुख्य कारण हैं और छोटे-मोटे बहुत कारण हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2017, पृष्ठ संख्या 10 अंक 300

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सनातन धर्म ही राष्ट्रीयता है


योगी अरविन्द जी को षड्यंत्र के तहत वर्षभर जेल में रखा गया। जेल के एकांतवास में उन्हें  भगवान के दर्शन हुए और भगवत्प्रेरणा से सनातन धर्म से सम्बंधित कई रहस्यों की अनुभूति हुई। जेल से रिहा होने के बाद 30 मई 1909 को उत्तरपाड़ा (प. बंगाल) में हुई एक सभा में उस अनुभूति को उन्होंने देशवासियों के सामने रखाः

जेल के एकांतवास में दिन प्रतिदिन भगवान ने अपने चमत्कार दिखाये और मुझे हिन्दू धर्म के वास्तविक सत्य का साक्षात्कार कराया। पहले मेरे अंदर अनेक प्रकार के संदेह थे। मेरा लालन-पालन इंग्लैंड में विदेशी भावों और सर्वथा विदेशी वातावरण में हुआ था। एक समय मैं हिन्दू धर्म की बहुत सी बातों को मात्र कल्पना समझता था, यह समझता था कि इसमें बहुत कुछ केवल स्वप्न, भ्रम या माया है परंतु अब दिन-प्रतिदिन मैंने हिन्दू धर्म के सत्य को अपने मन में, अपने प्राणों में और अपने शरीर में अनुभव किया। मेरे सामने ऐसी सब बातें प्रकट होने लगीं जिनके बारे में भौतिक विज्ञान कोई व्याख्या नहीं दे सकता। जब मैं पहले पहल भगवान के पास (शरण) गया तो पूरी तरह भक्तिभाव के साथ नहीं गया था।

मैं भगवान की ओर बढ़ा तो मुझे उन पर जीवंत श्रद्धा न थी। उस समय मैं नास्तिक था, संदेहवादी था और मुझे पूरी तरह विश्वास न था कि भगवान हैं भी। मैं उनकी उपस्थिति का अनुभव नहीं करता था, फिर भी कोई चीज थी जिसने मुझे वेद के सत्य की ओर, हिन्दू धर्म के सत्य की ओर आकर्षित किया। मुझे लगा कि वेदांत पर आधारित इस धर्म में कोई परम बलशाली सत्य अवश्य है। मैंने यह जानने का संकल्प किया कि ‘मेरी बात सच्ची है या नहीं ?’ तो मैंने भगवान से प्रार्थना कीः ‘हे भगवान ! यदि तुम हो तो तुम मेरे हृदय की हर बात जानते हो। मैं नहीं जानता कि कौन-सा काम करूँ और कैसे करूँ ! मुझे एक संदेश दो।’

मुझे संदेश आया (भगवद वाणी सुनाई दी)। वह इस प्रकार थाः ‘इस एक वर्ष के एकांतवास में तुम्हें वह चीज दिखायी गयी है जिसके बारे में तुम्हें संदेह था, वह है हिन्दू धर्म का सत्य। यही वह धर्म है जिसे मैंने ऋषि-मुनियों और अवतारों द्वारा विकसित किया और पूर्ण बनाया है। तुम्हारे अंदर जो नास्तिकता थी, जो संदेह था, उसका उत्तर दे दिया गया है क्योंकि मैंने अंदर और बाहर स्थूल और सूक्ष्म – सभी प्रमाण दे दिये हैं और उनसे तुम्हें संतोष हो गया है।

जब तुम बाहर निकलो तो सदा अपनी (सनातन हिन्दू धर्म की) जाति को यही वाणी सुनाना कि वे सनातन धर्म के लिए उठ रहे हैं, वे अपने लिए नहींह बल्कि संसार के लिए उठ रहे हैं। अतएव जब यह कहा जाता है कि भारतवर्ष ऊपर उठेगा तो उसका अर्थ होता है सनातन धर्म ऊपर उठेगा। जब कहा जाता है कि भारतवर्ष महान होगा तो उसका अर्थ होता है सनातन धर्म बढ़ेगा और संसार पर छा जायेगा। धर्म के लिए और धर्म के द्वारा ही भारत का अस्तित्व  है। धर्म की महिमा बढ़ाने का अर्थ है देश की महिमा बढ़ाना।’

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2017, पृष्ठ संख्या 9 अंक 300

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