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Rishi Prasad 269 May 2015

अमिट पुण्य अर्जित करने का अवसर-पुरुषोत्तम मास


पुरुषोत्तम/अधिक मास- 
अधिक मास में सूर्य की सक्रांति (सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश) न होने से इसे ‘मल मास’ (मलिन मास) कहा गया है। स्वामीरहित होने से यह मास देव-पितर आदि की पूजा तथा मंगल कर्मों के लिए त्याज्य माना गया। इससे लोग इसकी घोर निंदा करने लगे।
मल मास ने भगवान को प्रार्थना की, भगवान बोले- “मल मास नहीं, अब से इसका नाम पुरुषोत्तम मास होगा। इस महीने जो जप, सत्संग, ध्यान, पुण्य आदि करेंगे, उन्हें विशेष फायदा होगा। अंतर्यामी आत्मा के लिए जो भी कर्म करेंगे, तेरे मास में वह विशेष फलदायी हो जायेगा। तब से मल मास का नाम पड़ गया ‘पुरुषोत्तम मास’।”
विशेष लाभकारी
अधिक मास में आँवला और तिल के उबटन से स्नान पुण्यदायी है और स्वास्थ्य प्रसन्नता में बढ़ोतरी करने वाला है अथवा तो आँवला, जौ तिल का मिश्रण बनाकर रखो और स्नान करते समय थोड़ा मिश्रण बाल्टी में डाल दिया। इससे भी स्वास्थ्य और प्रसन्नता पाने में मदद मिलती है। इस मास में आँवले के पेड़ के नीचे बैठकर भोजन करना अधिक प्रसन्नता और स्वास्थ्य देता है।
आँवले व पीपल के पेड़ को स्पर्श करने से स्नान करने का पुण्य होता है, सात्त्विकता और प्रसन्नता की बढ़ोतरी होती है। इन्हें स्नान करने के बाद स्पर्श करने से दुगुना पुण्य होता है। पीपल और आँवला सात्विकता के धनी हैं।
इस मास में धरती पर (बिस्तर बिछाकर) शयन व पलाश की पत्तल पर भोजन करे और ब्रह्मचर्य व्रत पाले तो पापनाशिनी ऊर्जा बढ़ती है और व्यक्तित्व में निखार आता है। इस पुरुषोत्तम मास को कई वरदान प्राप्त हैं और शुभ कर्म करने हेतु इसकी महिमा अपरम्पार है।
अधिक मास में वर्जित
पुरुषोत्तम मास व चतुर्मास में नीच कर्मों का त्याग करना चाहिए। वैसे तो सदा के लिए करना चाहिए लेकिन आरम्भ वाला भक्त इन्हीं महीनों में त्याग करे तो उसका नीच कर्मों के त्याग का सामर्थ्य बढ़ जायेगा। इस मास में शादी-विवाह अथवा सकाम कर्म एवं सकाम व्रत वर्जित हैं। जैसे कुएँ, बावली, तालाब और बाग़ आदि का आरम्भ तथा प्रतिष्ठा, नवविवाहिता वधू का प्रवेश, देवताओं का स्थापन (देव-प्रतिष्ठा), यज्ञोपवीत संस्कार, नामकरण, मकान बनाना, नये वस्त्र एवं अलंकार पहनना आदि। इस मास में किये गये निष्काम कर्म कई गुना विशेष फल देते हैं।
अधिक मास में करने योग्य
जप, कीर्तन, स्मरण, ध्यान, दान, स्नान आदि तथा पुत्रजन्म के कृत्य, पितृस्मरण के श्राद्ध आदि एवं गर्भाधान, पुंसवन जैसे संस्कार किये जा सकते हैं।
देवी भागवत के अनुसार यदि आदि की सामर्थ्य न हो तो संतों-महापुरुषों की सेवा (उनके दैवी कार्य में सहभागी होना) सर्वोत्तम है। इससे तीर्थ, तप आदि के समान फल प्राप्त होता है। इस माह में दीपकों का दान करने से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। दुःख-शोकों का नाश होता है। वंशदीप बढ़ता है, ऊँचा सान्निध्य मिलता है, आयु बढ़ती है। इस मास में गीता के 15वें अध्याय का अर्थसहित प्रेमपूर्वक पाठ करना चाहिए। भक्तिपूर्वक सदगुरु से अध्यात्म विद्या का श्रवण करने से ब्रह्महत्याजनित पाप नष्ट हो जाते हैं तथा दिन प्रतिदिन अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। निष्काम भाव से यदि श्रवण किया जाय तो जीव मुक्त हो जाता है।
व्रत विधि
भगवान श्रीकृष्ण इस मास की व्रत विधि एवं महिमा बताते हुए कहते हैं- “इस मास में मेरे उद्देश्य से जो स्नान (ब्राह्ममुहूर्त में उठकर भगवत्स्मरण करते हुए किया गया स्नान), दान, जप, होम, गुरु-पूजन, स्वाध्याय, पितृतर्पण, देवार्चन तथा और जो भी शुभ कर्म किये जाते हैं, वे सब अक्षय हो जाते हैं। जो प्रमाद से इस मास को खाली बिता देते हैं, उनका जीवन मनुष्यलोक में दारिद्र्य पुत्रशोक तथा पाप के कीचड़ से निंदित हो जाता है, इसमें संदेह नहीं।
शंख की ध्वनि के साथ कपूर से आरती करें। ये न हों तो रूई की बाती से ही आरती कर लें। इससे अनंत फल की प्राप्ति होती है। चंदन, अक्षत और पुष्पों के साथ ताँबे के पात्र में पानी रखकर भक्ति से प्रातःपूजन के पहले या बाद में अर्घ्य दें।
पुरुषोत्तम मास का व्रत दारिद्र्य, पुत्रशोक और वैधव्य का नाशक है। इसके व्रत से ब्रह्महत्या आदि सब पाप नष्ट हो जाते हैं।
विधिवत सेवते यस्तु पुरुषोत्तममादरात्।
कुलं स्वकीयमुद्धृत्य मामेवैष्यत्यसंशयम्।।
पुरुषोत्तम मास के आगमन पर जो व्यक्ति श्रद्धा-भक्ति के साथ व्रत, उपवास, पूजा आदि शुभ कर्म करता है, वह निःसंदेह अपने समस्त परिवार के साथ मेरे लोक में पहुँचकर मेरा सान्निध्य प्राप्त कर लेता है।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2015, पृष्ठ संख्या 20,21 अंक 269
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Rishi Prasad 268 Apr 2015

ग्रीष्म ऋतु में सेहत की देखभाल – ग्रीष्म ऋतुः 20 अप्रैल से 20 जून


ग्रीष्म ऋतु में प्राकृतिक रूप से शरीर के पोषण की अपेक्षा शोषण अधिक होता है। गर्मी से शरीर का जलीय अंश कम होता है। जठराग्नि मंद हो जाती है, भूख कम लगती है, रूखापन बढ़ता है बल क्षीण होता है। इससे दस्त, कमजोरी, बेचैनी आदि परेशानियाँ पैदा हो सकती हैं। आहार व विहार में उचित परिवर्तन करके इनसे सुरक्षा की जा सकती है।
इन दिनों में भोजन में मधुर, हलके, चिकनाईयुक्त, शीतल व तरल पदार्थों का सेवन विशेष रूप से करना चाहिए। खरबूजा, तरबूज, मौसम्बी, संतरा, केला, मीठे आम, मीठे अंगूर, बेलफल, गन्ना, ताजा नारियल, परवल, पेठा (कुम्हड़ा), पुदीना, हरा धनिया, नींबू, गाय का दूध, घी, शिकंजी, पना, सत्तू आदि का सेवन हितकारी है। दही, छाछ, तले हुए अधिक नमकयुक्त, कड़वे व खट्टे पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। तेज व धूप में घूमने, देर रात तक जागने व अधिक भोजन से बचें। ग्रीष्म में शारीरिक शक्ति अत्यंत क्षीण हो जाने के कारण अधिक व्यायाम, अधिक परिश्रम एवं मैथुन त्याज्य है। एअर कंडीशन अथवा कूलर की हवा, फ्रिज का पानी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। चाँदनी में खुली हवा में सोना, मटके का पानी स्वास्थ्यप्रद है।
ग्रीष्मकालीन समस्याओं का समाधान
कमजोरीः सत्तू में घी पर मिश्री अथवा आम के रस में घी व इलायची मिलाकर पीने से कमजोरी नहीं आती। रात को दूध में घी मिलाकर पीना भी लाभदायी है। साठी के चावल का भात व दूध सुपाच्य व शीघ्र शक्तिदायी आहार है।
प्यास व बेचैनीः पिसा हुआ धनिया, सौंफ व मिश्री का मिश्रण बनाकर पानी में भिगो दें और कुछ देर बाद पियें। नारियल पानी, शिकंजी, गन्ने का रस, पना, बेल के शरबत आदि से शीघ्र लाभ होता है। इसने दाह व जलन भी शांत होती है। सॉफ्टड्रिंक्स प्यास, बेचैनी मिटाने का केवल क्षणिक एहसास दिलाते हैं। इनसे अंदरूनी गर्मी अत्यधिक बढ़ती है व अन्य कई गम्भीर दुष्परिणाम होते हैं।
दस्तः दही के ऊपर का पानी 2 चम्मच पीने से तुरंत राहत मिलती है।
लू लगने पर- प्याज का रस शरीर पर मलें, पना पिलायें।
चक्कर- सिर तथा चेहरे पर तुरंत ही ठंडे पानी के छींटें मारें। शीतल, तरल पदार्थ पीने के लिए दें।
दाह- दूध में गुलकंद मिलाकर पियें। आँवले का मुरब्बा, सत्तू, मक्खन-मिश्री, मिश्रीयुक्त पेठे का रस लाभदायी है।
पेशाब में जलन- गर्मी के कारण पेशाब में जलन या रूकावट होने पर कटी ककड़ी में मिश्री का चूर्ण मिला के ऊपर नींबू निचोड़कर खायें।
ककड़ी के 150 ग्राम रस में 1 नींबू का रस और जीरे का चूर्ण मिलाकर पीने से मूत्र की रूकावट दूर होती है।
मंदाग्नि- ककड़ी पर संतकृपा चूर्ण लगा के खाने से मंदाग्नि दूर होती है तथा भोजन में रूचि पैदा होती है। यह चूर्ण सभी संत श्री आशाराम जी आश्रमों वे सेवाकेन्द्रों पर उपलब्ध है।
सब्जियों में सर्वश्रेष्ठ-परवल
आयुर्वेद में परवल को सब्जियों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इसे सभी ऋतुओं में सदा पथ्य के रूप में स्वीकार किया गया है। परवल की सब्जी रोगग्रस्त लोगों के लिए भी अत्यंत गुणकारी है। घी में भूनकर बनायी गयी परवल की सब्जी स्वादिष्ट व पौष्टिक होती है।
परवल की सब्जी के लाभ
पचने में सुलभ, पाचक, जठराग्निवर्धक एवं त्रिदोषनाशक।
पौष्टिक तथा वीर्य व शक्ति वर्धक।
हृदय तथा आँखों के लिए हितकर।
पेट की विभिन्न बीमारियों – आँतों में सूजन, कृमि, जिगर व तिल्ली की बीमारियों आदि में विशेष लाभकारी।
सूजन तथा रक्तदोषजन्य रोग जैसे खुजली, कोढ़ आदि में उपयुक्त।
पित्तज ज्वर व पुराने बुखार में विशेष लाभदायक।
कफजन्य सर्दी, खाँसी, दमा आदि में विकृत कफ को बाहर निकालने में सहायक।
विशेष- सब्जी के लिए कोमल बीज व सफेद गूदेवाले मीठे परवल का उपयोग करें। कड़वे परवल का उपयोग औषधियों में होता है।
कीटाणुरहित व पवित्र वातावरण के लिए गौ-सेवा फिनायल
आयुर्वेद में धर्मशास्त्रों में वर्णित, पुरातन काल से आरोग्यता, पवित्रता, निर्मलता, स्वच्छता हेतु प्रयुक्त होने वाला गोमूत्र अब एक विशेष अंदाज में ! गोमूत्र, नीम-सत्त्व, देवदार तेल, वानस्पतिक सुगंधित एवं अन्य सुरक्षित कीटाणुनाशकों से निर्मित।
सफाई के साथ रोगाणुनाशक एवं सात्त्विक वातावरण के निर्माण में सहयोगी।
गौ-सेवा के साथ-साथ आध्यात्मिक वातावरण का लाभ देने में मददगार।
प्रयोग विधि- 1 लीटर पानी में 10 मि.ली. गौ-सेवा फिनायल घोलकर पोंछा लगायें, स्प्रे करें या सुविधानुसार प्रयोग करें।
ग्रीष्म ऋतु में जलीय अंश के रक्षक पेय
पाचक व रूचिवर्धक नींबू शरबत
नींबू का रस 1 भाग व शक्कर 6 भाग लेकर चाशनी बनायें तथा थोड़ी मात्रा में लौंग व काली मिर्च का चूर्ण डाल दें। थोड़ा मिश्रण लेकर आवश्यकतानुसार पानी मिला के पियें। यह वातरोग को भी नियंत्रित करता है।
पित्तशामक धनिये का पना
5 से 10 ग्राम बारीक पिये सूखे धनिये में आवश्यकतानुसार मिश्री मिलाकर मिट्टी के पात्र में 2-4 घंटे रखें, थोड़ी पिसी हुई इलायची भी डाल दें। इसके सेवन से शरीर की गर्मी और जलन कम होती है। पित्त का शमन होता है।
शीतल व स्मृतिवर्धक ब्राह्मी शरबत
बुद्धिवर्धक तथा स्फूर्तिदायक इस शरबत के सेवन से ज्ञानतंतु व मस्तिष्क पुष्ट होते हैं, दिमाग शांत व ठंडा होता है। बौद्धिक थकावट, स्मरणशक्ति की कमी, मानसिक रोग, क्रोध, चिड़चिड़ापन दूर होकर मन-बुद्धि को विश्रांति मिलती है। ब्राह्मी का एसेंस नहीं, शुद्ध ब्राह्मी का शरबत हो तब ये लाभ मिलते हैं।
शीतल व स्वास्थ्यवर्धक पलाश शरबत
इसके सेवन से पित्तजन्य रोग (दाह, तृष्णा, जलन आदि। शांत हो जाते हैं। गर्मी सहन करने की ताकत मिलती है तथा कई प्रकार के चर्मरोग में लाभ होता है। यह प्रमेह (मूत्र संबंधी विकारों) में भी लाभदायी है। पलाश रसायन वार्धक्य एवं पित्तजन्य रोगों को दूर रखने वाला, नेत्रज्योति बढ़ाने वाला व बुद्धिवर्धक भी है।
(प्राप्ति स्थान- सभी संत श्री आशाराम जी आश्रम व समितियों के सेवाकेन्द्र।)
स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2015, पृष्ठ संख्या 32,33 अंक 268
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Rishi Prasad 268 Apr 2015

सावधान ! समय बीत रहा है


हमारे जीवन का आधा हिस्सा सोने में बीतता है। कुछ भाग बीमारियों में चला जाता है। जो कुछ शेष है उसको भी लोग टी.वी., इंटरनेट, मखौल, इधर-उधर की बातों में बिता देते हैं। वे नहीं जानते कि उन्होंने अपना अत्यंत कीमती समय नष्ट कर दिया और कर रहे हैं। ऐसे वे ही लोग होते हैं जिनके जीवन का न कोई उद्देश्य होता है न कोई सिद्धान्त। वे लोग कितने अनजान हैं कि उनको अपनी इस अवनति का भान भी नहीं है। वे लोग धन को नष्ट करने में तनिक भी हिचकते नहीं, साथ-साथ चरित्र और समय की बलि भी देते हैं।
मनुष्य का जन्म किसी कार्य-विशेष के लिए हुआ है। जीवन खाने-पीने, पहनने और परिवार में परेशान होने के लिए नहीं है अपितु जीवन के पीछे परमात्मा का पवित्र विधान है। इस अनित्य शरीर में नित्य सच्चिदानंद स्वभाव को पाना व जानना ही वास्तविक जीवन है। इसलिए जीवन का प्रत्येक क्षण साक्षी सुखस्वरूप की स्मृति में, ध्यान में प्रतिष्ठित होने के लिए लगाना चाहिए। समय बेशकीमती है। एक बार हाथ से निकल गया तो निकल गया। जब-जब समय की सूचना देने वाली घंटी बजती है, तब-तब समझो कि तुम्हारे जीवन में मृत्यु एक घंटे को पार कर चुकी है। सोचो तो सही कि आज तुम कुछ नहीं करोगे तो और कब कर पाओगे। दूसरे क्षण क्या होगा, कौन जानता है ? किसी भी क्षण, इस समय भी दम निकल सकता है, इसमें संदेह ही क्या है ?
कब ऐसा काम करोगे जिससे जीवन का मतलब सिद्ध हो, मनुष्य-जीवन और पशु-जीवन में अंतर पड़े। कभी विचार करो कि ‘हम क्या हैं और क्या कर रहे हैं ?’ शरीर नश्वर है, अनिश्चित है तो इसका अर्थ यह नहीं कि हम पलायनवादी बनें। एक-एक क्षण का सत्स्वरूप की प्रीति में उपयोग करना चाहिए। समय अनमोल है, इसको अनमोल परमात्मा को पाने में ही लगाना चाहिए।
जिसको सफलता पानी हो और अपना मनुष्य जीवन धन्य करना हो, उसे अपना समय सत्संग, स्वाध्याय, सेवा, परोपकार आदि में ही बिताना चाहिए। बेकार की बातें एक क्षण के लिए भी की जायें तो मन पर बड़ा बुरा प्रभाव डालती हैं। यदि किन्हीं महापुरुष के दो वचन लग जाते हैं तो जीवन ही बदल जाता है। समय भाग ही नहीं रहा है, सीमित भी है। समय देने से भी बीता समय नहीं लौटता। धन तिजोरी में संग्रहीत कर सकते हैं परंतु समय तिजोरी में नहीं संजोया जा सकता। ऐसे अमूल्य समय को श्रेष्ठ कार्यों में, श्रेष्ठ चिंतन में, परम श्रेष्ठ ‘सोऽहम्’ स्वभाव में लगाकर जीवन सार्थक करें। सबसे श्रेष्ठ कार्य है ब्रह्मवेत्ता महापुरुष के मार्गदर्शन में परमात्मप्राप्ति करना।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2015, पृष्ठ संख्या 30, अंक 268
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