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अपने भक्त के कारणे राम तजउ निज रूप


(पूज्य बापू जी की मधुमय अमृतवाणी)

मैं तो उन लोगों को धनभागी मानता हूँ जो भगवान के भक्त की सेवा करते हैं, संत का सत्संग सुनते हैं । महाराष्ट्र में परली बैजनाथ है । वहाँ एक भक्त रहते थे, जिनका नाम था जगन्मित्र । गाँव वालों ने उन्हें थोड़ी जमीन दी थी । उसी में वे अपना छोटा सा मकान बना कर रहते और भगवान का भजन करते थे ।

एक बदमाश दरोगा (थानेदार) संत-स्वभाव जगन्मित्र के परिवार को सताता था । दरोगा ने देखा कि ‘यह मेरे रास्ते का काँटा है । मेरी बेटी की शादी होने वाली है । बाराती आयेंगे और यह छोटे से झौंपड़े वाला…. मैं इसका झौंपड़ा नीलाम करा दूँगा । मैं इसको बरबाद कर दूँगा ।’

गाँव वालों ने कहाः “दरोगा साहब ! हम आपको हाथ जोड़ते हैं । यह भगवान का भक्त है । आप इसे न सतायें तो अच्छा है ।”

दरोगा बोलाः “अरे, भगवान का भक्त है तो हम भी देवी के भक्त हैं ! हम नास्तिक नहीं हैं । अगर यह सच्चा भक्त है तो देवी के शेर को बुलाकर दिखाये । शेर इसको काटे नहीं, मारे नहीं तो मैं मानूँगा । नहीं तो मैं इसका यह झौंपड़ा हटवा दूँगा, नीलाम करा दूँगा ।”

जगन्मित्र को लोगों ने बतायाः “यह पुलिस के बल से, सरकारी नौकरी के बल से आपको तबाह करना चाहता है । इसके पास आधिभौतिक बल है ।”

जगन्मित्र ने कहाः “इसका आधिभौतिक बल इसके पास रहे । मेरे पास आधिदैविक बल है, अध्यात्म बल है, भगवान की कृपा है । यह मुझे कुचल डाले, कारागार में भेजे, मेरा झौंपड़ा नीलाम करा दे इसके पहले मैं जाता हूँ और मेरे ठाकुर जी को बुला लाता हूँ ।”

जगन्मित्र जंगल में गये और कातर भाव से पुकारने लगेः ‘भक्त की लाज रखने के लिए तू नरसिंह अवतार भी ले सकता है । निराकार साकार भी हो सकता है । प्रभु ! प्रभु !! प्रभु !!!

दहाड़ता हुआ एक शेर प्रकट हुआ । कहाँ से प्रकट हुआ कोई सोच नहीं सकता । शेर जगन्मित्र के पास आया । जगन्मित्र ने कहाः “प्रभु ! शेर के रूप में पधारे हो ।” अपना दुपट्टा शेर के गले में बाँध दिया और कहाः “प्रभु ! चलो मेरे साथ ।” जैसे पाली हुई बकरी को कोई खींचकर ले आये, ऐसे ही जगन्मित्र शेर को खींच के ला रहे हैं ।

उस समय गाँव के चारों ओर दीवार (पक्का परकोटा) होती थी और एक मुख्य द्वार होता था । संध्या का समय था । शेर को  देखकर द्वारपाल घबराया और दरवाजा बंद कर दिया । वैसे तो दरवाजा रात्रि को 9 बजे बंद होता था लेकिन आज संध्या को साढ़े सात ही दरवाजा बंद कर दिया ।

जगन्मित्र ने कहाः “प्रभु जी ! दरवाजा तो बंद कर दिया है । उस दरोगा से कैसे मिलोगे आप ?” प्रभु जी ने दहाड़ मारी, दरवाजा गिर पड़ा । जगन्मित्र और शेर नगर में प्रविष्ट हुए ।

लोगों ने आश्चर्य से कहाः “अरे ! शेर और जगन्मित्र के हाथ में पाली हुई बकरी जैसा ! अरे शेर, शेर…. शेर आया, शेर आया !” लोग घरों में छुप गये और छतों से देखने लगे कि भक्त जगन्मित्र शेर को ले जा रहे हैं । वे दरोगा के घर के पास पहुँचे । दरोगा ने देखा कि ‘यह तो शेर को ऐसे ला रहा है ! अब मैं क्या मुँह दिखाऊँ ?’ अंदर कमरे में छुप गया । उसके बाल-बच्चे भी छुप गये । दरवाजा बंद कर लिया ।

जगन्मित्र बोलेः “प्रभु जी ! इसने तो आपका दर्शन ही नहीं किया ।”

शेर रूपी प्रभु जी ने पंजा मारा तो दरवाजा टूट गया । अब तो जगन्मित्र शेर को अंदर ले गये । बोलेः “दरोगा साहब ! तुम बोलते थे कि शेर दिखा दे । यह देख लो ।”

दरोगा फूट-फूट कर रोने लगा और चरणों पर गिर पड़ा । बोलाः “महाराज ! मैंने आधिदैविक शक्ति और आध्यात्मिक शक्ति का अपमान किया है । मुझे पता नहीं था कि आप जैसे भक्त को सताने से भगवान नाराज होते हैं । महाराज ! मुझे माफ कर दो ।”

जगन्मित्र ने शेर के गले का प्रेम बंधन खोला और शेर अदृश्य हो गया ।

संत सताये तीनों जायें, तेज बल और वंश ।

ऐसे ऐसे कई गये, रावण कौरव और कंस ।।

संत को सताने से तबाही होती है तो उनका दर्शन, सत्संग, सेवा आबादी भी तो देते हैं, बेड़ा पार भी तो करते हैं । मैंने मेरे संतों को रिझाया तो मेरा बेड़ा पार हुआ । जिन्होंने भी संतों का दर्शन किया, संतों को रिझाया उन्हें आधिदैविक शांति मिली, आध्यात्मिक शांति मिली, आत्मशांति मिली । आधिभौतिक जगत भी उनके लिए सुखदायी हुआ । जो आध्यात्मिकता का तिरस्कार करके आधिभौतिक जगत में  प्रगति करना चाहते हैं, आधिभौतिक जगत उनको दबोच लेता है, दुःखी करता है । हृदयाघात करा के, कुचल-कुचल के मार देता है लेकिन जो आधिदैविक शक्ति, आध्यात्मिक शक्ति का आश्रय लेते हैं, उनके आधिभौतिक जगत सुखरूप हो जाता है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 6,7 अंक 228

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सुख और यश में विशेष सावधान ! पूज्य बापू जी


सुख और दुःख, अनुकूलता और प्रतिकूलता प्रकृति व प्रारब्धवेग से आते है । फिर अंदर सुखाकार-दुःखाकार वृत्ति पैदा होती है । अनजान लोग उस  वृत्ति से जुड़कर ‘मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ’ ऐसा मान लेते हैं । अपने द्रष्टा स्वभाव को नहीं जानते । सुख आये तो बहुतों के हित में लगाना चाहिए, इससे आपको परम आनंद जगेगा । दुःख आये तो विवेक-वैराग्य जगाना चाहिए । इससे आप संसार के फँसाव से निकलोगे लेकिन अज्ञानी, निगुरे  लोग सुख के भोगी हो जाते हैं । सुख उन्हें खोखला बना देता है । सुख और यश में विशेष सावधान रहो ।

मान पुड़ी है जहर की, खाये सो मर जाये ।

चाह उसी की राखता, सो भी अति दुःख पाये ।।

बड़े के सम्पर्क में रहो जो आपको टोक सके । जब भी यश और पद मिले तो जो आपको टोकने वाले हैं, उनका प्रयत्नपूर्वक सम्पर्क करो । इससे आपका यश और सुशोभनीय होगा । अगर चमचों के बीच रहोगे तो सत्ता पाकर किसको मद नहीं आया ? और मद में गलती किसने नहीं की ? बड़े-बड़े लोग भी गलती करते हैं । रावण ने भी तो वही गलती की थी । सुधार-सुधार, विकास-विकास…. रावण और हिरण्यकश्यपु ने भी तो विकास किया था ! ऐसा विकास आज का कोई नेता सोच भी नहीं सकता । फिर भी रावण और हिरण्यकश्यपु का वह वह अहंकार वाला विकास विनाश की तरफ गया । इसलिए जिनके पास पद और सत्ता हो वे उच्चकोटि के संतों-महापुरुषों के सम्पर्क में रहें तो उनका पद और सत्ता सुशोभनीय होंगे । जैसे – राजा जनक, राजा अश्वपति, ध्रुव, प्रह्लाद, राजा राम ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 17 अंक 228

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भारतीय संस्कृति का स्वाभिमान


(पं. मदनमोहन मालवीय जयंतीः 25 दिसम्बर 2011)

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से संस्थापक पंडित मदनमोहन मालवीय जी हिन्दू धर्म व संस्कृति के अनन्य पुजारी थे । उन्होंने अपना सारा जीवन भारत माता की सेवा में अर्पित कर दिया था । वे जितने उदार, विनम्र, निभिमानी, परदुःखकातर एवं मृदु थे उतने ही संयमी, दृढ़, स्वाभिमानी व अविचल योद्धा भी थे । मालवीय जी के जीवन में हिन्दू धर्म व संस्कृति का स्वाभिमान कूट-कूटकर भरा था ।

एक बार कलकत्ता विश्वविद्यालय के उपकुलपति ने मालवीय जी के कार्यकाल से प्रसन्न होकर उनको एक पत्र भेजा । उसे पढ़कर मालवीय जी असमंजस में पड़ते हुए धीमी आवाज में बोलेः “उन्होंने यह तो अजीब प्रस्ताव रखा है । क्या कहूँ, क्या लिखूँ ?”

पास बैठे एक मित्र ने पूछाः “पंडित जी ! ऐसी क्या अजीब बात लिखी है ?”

“कलकत्ता विश्वविद्यालय के उपकुलपति महोदय मेरी सनातन उपाधि छीनकर एक नयी उपाधि देना चाहते हैं । इस पत्र में लिखा है कि ‘कलकत्ता विश्वविद्यालय’ आपको ‘डॉक्टरेट’ की उपाधि से अलंकृत करके आपको गौरवान्वित करना चाहता है ।”

तभी एक अन्य सज्जन ने हाथ जोड़कर कहाः “प्रस्ताव तो उचित ही है । आप ना मत कर दीजियेगा । यह तो हम वाराणसीवासियों के लिए विशेष गर्व की बात होगी ।”

मालवीय जी बोलेः “अरे ! तुम तो बहुत ही भोले हो भैया ! इसमें वाराणसी के गौरव में वृद्धि नहीं होगी । यह तो वाराणसी के पांडित्य को जलील करने का प्रस्ताव है ।” और तुरन्त ही उन्होंने उस पत्र का उत्तर लिखाः ‘मान्य महोदय ! आपके प्रस्ताव के लिए धन्यवाद । मेरे उत्तर को अपने प्रस्ताव का अनादर न मानते हुए आप उस पर पुनर्विचार कीजियेगा । मुझे आपका यह प्रस्ताव अर्थहीन लग रहा है । मैं जन्म और कर्म दोनों से ही ब्राह्मण हूँ । जो भी ब्राह्मण धर्म की मर्यादाओं के अनुरूप जीवन बिताता है, उसके लिए ‘पंडित’ से बढ़कर अन्य कोई भी उपाधि नहीं हो सकती । मैं ‘डॉक्टर मदनमोहन मालवीय’ कहलाने की अपेक्षा ‘पंडित मदनमोहन मालवीय कहलवाना अधिक पसंद करूँगा । आशा है आप इस ब्राह्मण के मन की भावना का आदर करते हुए इसे ‘पंडित’ ही बना रहने देंगे ।’

मालवीय जी की कार्य करने की शैली बड़ी मधुर और सरल थी । सहयोगी स्वभाव एवं अन्य सदगुणों के कारण आलोचक भी उनके कायल हो जाते थे । वृद्धावस्था में जब मालवीय जी तत्कालीन वायसराय की परिषद (काउंसिल) के वरिष्ठ पार्षद (काउंसलर) थे, तब उनकी गहन और तथ्यपूर्ण आलोचनाओं के बावजूद वाइसराय ने एक दिन कहाः “पंडित मालवीय ! हिज मेजेस्टी की सरकार आपको ‘सर’ की उपाधि से अलंकृत करना चाहती है ।”

मालवीय जी मुस्कराते हुए बोलेः “आपका बहुत-बहुत धन्यवाद कि आप मुझे इस योग्य मानते हैं, किंतु वंश-परम्परा से प्राप्त अपनी सनातन उपाधि नहीं त्यागना चाहता । मुझे ‘पंडित’ की उपाधि ईश्वर ने प्रदान की है । मैं इसे त्यागकर उसके बंदे की दी गयी उपाधि को क्यों स्वीकार करूँ !”

वाइसराय यह सुनकर हक्का-बक्का रह गया । थोड़ी देर बाद बोलाः “आपका निर्णय सुनकर हमें आपके पांडित्य पर जो मान था वह दुगना हो गया । आप वाकई सच्चे पंडित हैं जो उस उपाधि की गौरव-गरिमा की रक्षा के लिए कोई भी प्रलोभन त्याग सकते हैं ।”

इसी प्रकार एक बार काशी के पंडितों की एक सभा ने मालवीय जी का नागरिक अभिनंदन कर उन्हें ‘पंडितराज’ की उपाधि दिये जाने का प्रस्ताव रखा । यह सुनकर वे बोलेः “अरे पंडितो ! पांडित्य का मखौल क्यों बना रहे हो ? पंडित की उपाधि तो स्वतः ही विशेषणातीत है । इसलिए आप मुझको पंडित ही बना रहने दीजिये ।”

सभी का सिर नीचे झुक गया । इस प्रकार उनके जीवन में कई बार ऐसी घटनाएँ घटीं  परंतु वे न तो डॉक्टर बने, न सर हुए और न ही पंडितराज, बल्कि इन सबसे ऊपर स्वाभिमान के साथ जीवन भर अपनी संस्कृति से विरासत में मिले ‘पांडित्य’ का गौरव बढ़ाते रहे ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2011,  पृष्ठ संख्या 16,17 अंक 228

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