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गुरू आज्ञा सम पथ्य नहीं


(पूज्य बापूजी के सत्संग प्रवचन से)

उज्जयिनी (वर्तमान में उज्जैन) के राजा भर्तृहरि से पास 360 पाकशास्त्री थे भोजन बनाने के लिए। वर्ष में केवल एक एक की बारी आती थी। 359 दिन वे ताकते रहते थे कि कब हमारी बारे आये और हम राजासाहब के लिए भोजन बनायें, इनाम पायें लेकिन भर्तृहरि जब गुरू गोरखनाथजी के चरणों में गये तो भिक्षा माँगकर खाते थे।

एक बार गुरू गोरखनाथजी ने अपने शिष्यों से कहाः “देखो, राजा होकर भी इसने काम, क्रोध, लोभ तथा अहंकार को जीत लिया है और दृढ़निश्चयी है।” शिष्यों ने कहाः “गुरूजी ! ये तो राजाधिराज हैं, इनके यहाँ 360 तो बावर्ची रहते थे। ऐसे भोग विलास के वातावरण में से आये हुए राजा और कैसे काम, क्रोध, लोभरहित हो गये !”

गुरू गोरखनाथ जी ने राजा भर्तृहरि से कहाः “भर्तृहरि ! जाओ, भंडारे के लिए जंगल से लकड़ियाँ ले आओ।” राजा भर्तृहरि नंगे पैर गये, जंगल से लकड़ियाँ एकत्रित करके सिर पर बोझ उठाकर ला रहे थे।

गोरखनाथ जी ने दूसरे शिष्यों से कहाः “जाओ, उसको ऐसा धक्का मारो कि बोझा गिर जाय।” चेले गये और ऐसा धक्का मारा कि बोझा गिर गया और भर्तृहरि भी गिर गये। भर्तृहरि ने बोझा उठाया लेकिन न चेहरे पर शिकन, न आँखों में आग के गोले, न होंठ फड़के।

गुरू जी ने चेलों से कहाः “देखा ! भर्तृहरि ने क्रोध को जीत लिया है।”

शिष्य बोलेः “गुरुजी ! अभी तो और भी परीक्षा लेनी चाहिए।”

थोड़ा सा आगे जाते ही गुरुजी ने योगशक्ति से एक महल रच दिया। गोरखनाथ जी भर्तृहरि को महल दिखा रहे थे। ललनाएँ नाना प्रकार के व्यंजन आदि लेकर आदर सत्कार करने लगीं। भर्तृहरि ललनाओं को देखकर कामी भी नहीं हुए और उनके नखरों पर क्रोधित भी नहीं हुए, चलते ही गये।

गोरखनाथजी ने शिष्यों को कहाः “अब तो तुम लोगों को विश्वास हो ही गया है कि भर्तृहरि ने काम, क्रोध, लोभ आदि को जीत लिया है।”

शिष्यों ने कहाः “गुरुदेव एक परीक्षा और लीजिये।”

गोरखनाथजी ने कहाः “अच्छा भर्तृहरि ! हमारा शिष्य बनने के लिए परीक्षा से गुजरना पड़ता है। जाओ, तुमको एक महीना मरूभूमि में नंगे पैर पैदल यात्रा करनी होगी।”

भर्तृहरिः “जो आज्ञा गुरूदेव !”

भर्तृहरि चल पड़े। पहाड़ी इलाका लाँघते-लाँघते मरूभूमि में पहुँचे। धधकती बालू, कड़ाके की धूप… मरुभूमि में पैर रखो तो बस सेंक जाय। एक दिन, दो दिन….. यात्रा करते-करते छः दिन बीत गये। सातवें दिन गुरु गोरखनाथजी अदृश्य शक्ति से चेलों को भी साथ लेकर वहाँ पहुँचे।

गोरखनाथ जी बोलेः “देखो, यह भर्तृहरि जा रहा है। मैं अभी योगबल से वृक्ष खड़ा कर देता हूँ। वृक्ष की छाया में भी नहीं बैठेगा।”

अचानक वृक्ष खड़ा कर दिया। चलते-चलते भर्तृहरि का पैर वृक्ष की छाया पर आ गया तो ऐसे उछल पड़े मानो अंगारों पर पैर पड़ गया हो !

‘मरुभूमि में वृक्ष कैसे आ गया ? छायावाले वृक्ष के नीचे पैर कैसे आ गया ? गुरु जी की आज्ञा थी मरुभूमि में यात्रा करने की।’ – कूदकर दूर हट गये।

गुरु जी प्रसन्न हो गये कि देखो ! कैसे गुरु की आज्ञा मानता है। जिसने कभी पैर गलीचे से नीचे नहीं रखा, वह मरुभूमि में चलते-चलते पेड़ की छाया का स्पर्श होने से अंगारे जैसा एहसास करता है।’ गोरखनाथ जी दिल में चेले की दृढ़ता पर बड़े खुश हुए लेकिन और शिष्यों की मान्यता ईर्ष्यावाली थी।

शिष्य बोलेः “गुरुजी ! यह तो ठीक है लेकिन अभी तो परीक्षा पूरी नहीं हुई।”

गोरखनाथ जी (रूप बदल कर) आगे मिले, बोलेः “जरा छाया का उपयोग कर लो।”

भर्तृहरिः “नहीं, गुरु जी की आज्ञा है नंगे पैर मरुभूमि में चलने की।”

गोरखनाथ जी ने सोचा, ‘अच्छा ! कितना चलते हो देखते हैं।’ थोड़ा आगे गये तो गोरखनाथ जी ने योगबल से कंटक-कंटक पैदा कर दिये। ऐसी कँटीली झाड़ी कि कंथा (फटे पुराने कपड़ों को जोड़कर बनाया हुआ वस्त्र) फट गया। पैरों में शूल चुभने लगे, फिर भी भर्तृहरि ने ‘आह’ तक नहीं की।

तैसा अंम्रित1 तैसी बिखु2 खाटी।

तैसा मानु तैसा अभिमानु।

हरख सोग3 जा कैं नहीं बैरी मीत समान।

कहु नानक सुनि रे मना मुकति ताहि तै जान।।

1.अमृत 2. विष 3 हर्ष-शोक

भर्तृहरि तो और अंतर्मुख हो गये, ‘यह सब सपना है और गुरुतत्त्व अपना है। गुरु जी ने जो आज्ञा  की है वही तपस्या है। यह भी गुरुजी की कृपा है’।

गुरुकृपा ही केवलं शिष्यस्य परं मंगलम्।

अंतिम परीक्षा के लिए गुरुगोरखनाथ जी ने अपने योगबल से प्रबल ताप पैदा किया। प्यास के मारे भर्तृहरि के प्राण कंठ तक आ गये। तभी गोरखनाथ जी ने उनके अत्यन्त समीप एक हरा-भरा वृक्ष खड़ा कर दिया, जिसके नीचे पानी से भरी सुराही और सोने की प्याली रखी थी। एक बार तो भर्तृहरि ने उसकी ओर देखा पर तुरंत ख्याल आया कि कहीं गुरुआज्ञा का भंग तो नहीं हो रहा है ?

उनका इतना सोचना ही हुआ कि सामने से गोरखनाथ आते दिखाई दिये। भर्तृहरि ने दंडवत प्रणाम किया। गुरुजी बोलेः “शाबाश भर्तृहरि ! वर माँग लो। अष्टसिद्धि दे दूँ, नवनिधि दे दूँ। तुमने सुंदर-सुंदर व्यंजन ठुकरा दिये, ललनाएँ चरण-चम्पी करने को, चँवर डुलाने को तैयार थी, उनके चक्कर में भी नहीं आये। तुम्हें जो माँगना हो माँग लो।”

भर्तृहरिः “गुरूजी ! बस आप प्रसन्न हैं, मुझे सब कुछ मिल गया। शिष्य के लिए गुरु की प्रसन्नता सब कुछ है।”

भगवान शिव पार्वतीजी से कहते हैं-

आकल्पजन्मकोटीनां यज्ञव्रततपः क्रियाः।

ताः सर्वाः सफला देवि गुरुसंतोषमात्रतः।।

‘हे देवी ! कल्पपर्यन्त के, करोड़ों जन्मों के यज्ञ, व्रत, तप और शास्त्रोक्त क्रियाएँ – ये सब गुरुदेव के संतोषमात्र से सफल हो जाते हैं।’

“गुरुजी ! आप मुझसे संतुष्ट हुए, मेरे करोड़ों पुण्यकर्म और यज्ञ, तप सब सफल हो गये।”

“नहीं भर्तृहरि ! अनादर मत करो। तुमने कुछ-न-कुछ तो लेना ही पड़ेगा, कुछ-न-कुछ माँगना ही पड़ेगा।”

इतने में रेती में एक चमचमाती हुई सुई दिखाई दी। उसे उठाकर भर्तृहरि बोलेः “गुरूजी ! कंथा फट गया है, सुई में यह धागा पिरो दीजिए ताकि मैं अपना कंथा सी लूँ।”

गोरखनाथजी और खुश हुए कि ‘हद हो गयी ! कितना निरपेज्ञ है, अष्टसिद्धि-नवनिधियाँ कुछ नहीं चाहिए। मैंने कहा कुछ तो माँगो तो बोलता है कि सुई में जरा धागा डाल दो। गुरु का वचन रख लिया।’

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।

सर्वारम्भपरित्यागी यो मद् भक्तः स मे प्रियः।।

‘जो पुरुष आकांक्षा से रहित, बाहर भीतर से शुद्ध, दक्ष, पक्षपात से रहित और दुःखों से छूटा हुआ है – वह सब आरम्भों का त्यागी मेरा भक्त मुझको प्रिय है।’

(गीताः 12.16)

‘कोई अपेक्षा नहीं ! भर्तृहरि तुम धन्य हो गये ! कहाँ तो उज्जयिनी का सम्राट और कहाँ नंगे पैर मरुभूमि में ! एक महीना भी नहीं होने दिया, सात-आठ दिन में ही परीक्षा से उत्तीर्ण हो गये।’

अभी भर्तृहरि की गुफा और गोपीचंद की गुफा प्रसिद्ध है।

कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य-जीवन में बहुत सारी ऊँचाइयों को छू सकते हैं।

एक बार नैनीताल में मेरे गुरुदेव ने मुझसे कहाः “जाओ, इन लोगों को ‘चाइना पीक’ (वर्तमान नाम – नैना पीक, यह हिमालय पर्वत का एक प्रसिद्ध शिखर है) दिखा के आओ।”

चलने वाले आनाकानी कर रहे थे, बार-बार इनकार कर रहे थे। हम हाथा-जोड़ी करके उनको ‘चाइना पीक’ ले गये। वहाँ मौसम साफ हो गया। सूर्य उदय नहीं हुआ था हम लोग तब चले थे पैदल और शाम को सूर्य ढल गया तब आश्रम में पहुँचे।

गुरुजी ने पूछाः “ऐसा खराब मौसम था, ओले पड़ रहे थे, कैसे पहुँचे ?”

हमारे साथ जो लोग गये थे, वे बोलेः “आसाराम ने कहा कि ‘बापूजी ने आज्ञा दी है तो मैं आज्ञा का पालन करूँगा, आप चलो।’ हम नहीं जाना चाहते थे तो हमको हाथा-जोड़ी करे, कभी हमको समझाये, कभी सत्संग सुनाये। कैसे भी करके दो बजे हमको ‘चाइना पीक’ पहुँचा दिया, जहाँ कोई सैलानी नहीं थे, सब वापस भाग गये थे।”

गुरुजी खुश हुए, बोलेः “पीऊऽऽऽ ! जो गुरु की आज्ञा मानता है, प्रकृति उसकी आज्ञा मानेगी।” हमको तो वरदान मिल गया !

सर्प विषैले प्यार से वश में बाबा तेरे आगे।

बादल भी बरसात से पहले तेरी ही आज्ञा माँगें।।

हमने गुरु की आज्ञा मानी तो हमारी तो हजारों लोग आज्ञा मानते हैं। गुरु की आज्ञा मानने से मुझे तो बहुत फायदा हुआ। गुरु की आज्ञा मानने में जो दृढ़ रहता है, बस उसने तो काम कर लिया अपना।

स्रोतः ऋषि प्रसाद जुलाई 2010, पृष्ठ संख्या 11, 12, 13 अंक 211

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आरम्भ सँवारा तो सँवरता है जीवन


जीवन का आरम्भिक समय बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। जीवन का पतन और उत्थान बाल्यावस्था के संस्कारों पर ही निर्भर है। बाल्यावस्था व युवावस्था से ही जो व्यक्ति सदगुणों का संग्राहक है, दयालु है, उदार है, कष्टसहिष्णु है, कर्तव्यपरायण तथा प्रेमी है, आगे चलकर वही समाज में एक अच्छा मानव हो सकता है। युवावस्था में ही जो नशीले पदार्थों का व्यसनी हो जाता है तथा जिसमें क्रोध, अभिमान, इन्द्रिय-लोलुपता की प्रधानता है एवं जो काम, क्रोध और रसना के स्वाद के वेग को नहीं रोक पाता, वही आगे चलकर समाज में मानवता को कलंकित करता है। सौभाग्यशाली युवक उसी को समझना चाहिए जो अपने जीवन में आरम्भ से ही सज्जन एवं साधु-महात्माओं के सुसंग से दैवी सम्पत्ति को बढ़ाता है और कुसंग से बचता है।

अपने कर्तव्यकर्मों में सावधान रहना, प्रसन्न रहना, उन्हें विधि के साथ पूर्ण करने का दृढ़ संकल्प लेना – यह सब सफलता का शुभ मुहूर्त है। इसके विपरीत अपने कर्तव्य में आरम्भ से आलस्य करना, खिन्न उदास रहकर बिना मन के कार्य आरम्भ करना – ये सफलता के पथ में अशुभ संकेत हैं, अपशकुन हैं।

सभी का यह अनुभव है कि जिस दिन प्रातः उठने में आलस्यवश देरी हो जाती है, उस दिन शौच, स्नान आदि नित्यकर्म समयानुसार नहीं होते, उस दिन सभी कार्यों में गड़बड़ी, अस्त-व्यस्तता रहती है और जिस दिन समय पर उठने में एवं नित्यनियम पूर्ण करने में आलस्य नहीं रहता, उस दिन सभी कार्य व्यवस्थित ढंग से पूरे होते हैं। वह दिन हँसता हुआ सा प्रतीत होता है।

जिसका आरम्भ सुन्दर, धर्म, नीति और मर्यादा से सुसंबद्ध होकर विधिवत चलता है, उसका भविष्य भला क्यों न सुंदर, पवित्र, सुखमय और मंगलमय होगा ? अवश्य होगा !

जिन व्यक्तियों के हृदय में आरम्भ से केवल शरीर की सुंदरता का तथा शरीर को सुंदर बनाने के लिए वस्त्राभूषणों का और वस्त्राभूषणों के लिए धन का महत्त्व प्रतीत होता है, वे जीवन को सुंदर नहीं बना पाते। ऐसे लोग वस्तुओं एवं व्यक्तियों की दासत में बँधे रहते हैं। यदि बाल्यावस्था एवं युवावस्था के आरम्भ में आलस्य, विलासित, दुर्व्यसन अथवा भोग-कामनाओं को स्थान मिल जाता है, तब उस जीवन का मध्य और अंत भी प्रायः अशुभ एवं असुंदर ही सिद्ध होता है।

मनुष्य का भविष्य प्रकाशपूर्ण होगा या अंधकारपूर्ण, इसका परिचय आरम्भ की गतिविधियों से ही मिल जाता है। आरम्भ में साथ लगा हुआ थोड़ा सा दोष, थोड़ा सा कोई दुर्व्यन, थोड़ी सी चोरी की आदत, थोड़ा झूठ बोलने का स्वभाव, थोड़ी सी कुटेव अथवा कोई भी अनुचित कुचेष्टा आगे चलकर थोड़ी न रह जायेगी। वह उसी प्रकार अपना बड़ा आकार धारण करेगी, जिस प्रकार आरम्भ में थोड़ी सी अग्नि की चिनगारी ईंधन का संयोग पाकर भयानक रूप धारण करती है।

यह समझने की बात है कि आरम्भ में जो कुछ थोड़ा दिखता है, वह आगे कभी थोड़ा नहीं रह जाता। वह चाहे थोड़ा सा दोष हो या साथ चलने वाली कोई थोड़ी सी भूल हो अथवा कोई थोड़ा गुण हो या सुंदर भाव अथवा सदविचार हो या दुर्विचार।

बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए की सावधान होकर जो कुछ भी अशुभ, असुंदर, अपवित्र, अनावश्यक एवं अहितकर हो, उसे थोड़े से ही त्याग कर दे। जो थोड़े का त्याग नहीं कर सकता, वह अधिक का त्याग किस प्रकार करेगा ! अतः अधिक होने पर जिसका त्याग अति कष्टकर है उसका थोड़े से ही त्याग करना सुगम है।

जो प्रत्येक कार्य के आरम्भ में आवश्यक एवं हितकर का स्वीकार करना और अहितकर का त्याग करना जानता है, उसी का जीवन आगे चलकर सुंदर और पुण्यशाली होता है।

वैसे तो बाल्यावस्था और युवावस्था का आरम्भ अपने संरक्षकों अर्थात् माता-पिता, भाई, गुरुजनों के अधिकार में रहता है, फिर भी कुछ सयाने बालक अथवा युवक आरम्भ से ही अच्छी बुद्धि से युक्त होते हैं कि जिन्हें स्वयं ही अशुभ, असुंदर, अपवित्र बातों से घृणा होती है और शुभ, सुंदर, पवित्र बातों में अनायास ही प्रीति होती है।

माता-पिता, बड़े भ्राता तथा गुरु का कर्तव्य है कि वे अपनी संतान का आरम्भ से ही किसी प्रकार की अशुद्ध, असुंदर, अपवित्र बातों से संसर्ग न होने दें। बालकों के हृदय एवं मस्तिष्क में आरम्भ से विद्याध्ययन तथा बड़ों के प्रति शिष्टाचार, सदाचार, धर्म एवं ईश्वर का महत्त्व भरना चाहिए।

आरम्भ को सुंदर बनाना, कुसंग तथा कुसंस्कार से दूषित न होने देना, शुभ कर्मों में ही शक्ति का सदुपयोग करना, धर्मतत्त्व, ईश्वरतत्त्व को जानने की अभिलाषा को प्रबल बनाना – ये सौभाग्यवानों में ही देख जाते हैं।

मनुष्य की जीवनगति प्रकाश की ओर है या अंधकार की ओर – इसका ज्ञान दूरदर्शी एवं बुद्धिमान को आरम्भ के दर्शन से ही हो जाता है।

किसी प्रकार के आरम्भ को आलस्य और प्रमाद से बचाकर सुंदर संग से विधिवत् सँभालना ही भविष्य को सुंदर बनाना है।

प्रातःकाल नींद खुलते ही आरम्भ में ही उस परमात्मा का स्मरण कर लो, जिसकी सत्ता से तुम जी रहे हो और सब प्रकार की इच्छाओं की पूर्ति का रस ले रहे हो।

दिन में कार्य आरम्भ करने की विधि को, उसकी मर्यादित गति को और दिन भर के कार्यक्रम को समझ लो। स्मरण न रहे तो आरम्भ में ही सब कार्य लिख लो।

किसी से मिलो तो आरम्भ में सरल भाव से, प्रसन्नचित्त से, गम्भीरतापूर्वक, सुंदर शब्दों में बात करो अधिक बनावटीपन न आने दो और भद्दापन भी मिश्रित न होने दो। किसी से प्रीति का संबंध जोड़ो तो आरम्भ में ही अपनी चाह, अपना स्वभाव या त्रुटि उसके सामने रख दो, उसे आरम्भ में ही तैयार कर लो कि वह तुमसे यदि प्रेम करता है तो तुम्हारी त्रुटियों के साथ, भूलों के साथ, दोषों के साथ किस प्रकार निर्वाह करना होगा। उसे धोखा न दो ताकि विश्वासघात न हो।

जो कार्य आरम्भ करो, प्रारम्भ में ही उसकी पूर्ति के साधन जुटा लो, जो कुछ प्रतिकूलताएँ आ सकती हों, उनका सामना करने के लिए, अपने को सावधान करने के लिए जिन-जिन बातों की आवश्यकता पड़ती हो, उनको साथ लिये रहो। इससे साधन के सिद्ध होने में चूक नहीं होगी। यह तो हुई व्यवहार-जगत की बात, साधना-जगत में तो इससे भी अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2010, पृष्ठ संख्या 25,26 अंक 211

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बच्चों को क्या दें ?


(पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)

हमारे भारत के बच्चे-बच्चियों के साथ बड़ा अन्याय हो रहा है। अश्लील चलचित्रों, उपन्यास द्वारा उनके साथ बड़ा अन्याय किया जा रहा है। फिर भी हमारे बच्चे-बच्चियाँ अन्य देशों के युवक-युवतियों की अपेक्षा बहुत अच्छे हैं, परिश्रमी हैं, कष्ट सहते हैं, देश विदेश में जाकर बेचारे रोजी-रोटी कमा लेते हैं, दूसरे देशों के युवक-युवतियों की तरह विलासी नहीं हैं। यह सब उनके माँ-बाप की तपस्या है। माँ-बाप जिनका सान्निध्य सेवन करते हैं उन संतों की तपस्या और हमारी भारतीय संस्कृति के प्रसाद की महिमा है। यह ऐसा प्रसाद है कि सब दुःखों को सदा के लिए मिटाने की ताकत रखता है। यह कहीं जा के, किसी को हटा के, किसी को पा के दुःख नहीं मिटाता। कुछ मिल जाये तब दुःख मिटे, कुछ हट जाय तब दुःख मिटे…..नहीं। भारतीय संस्कृति का ज्ञान प्रसाद तो इतना निराला है कि आप चाहे जैसी परिस्थिति में हैं, वह आपको सुखी बना देता है। मगर दुर्भाग्य है कि हमारे देशवासी पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में आकर अपने साथ, अपने बच्चों के साथ अन्याय कर बैठते हैं।

दिल्ली मे मेरे सत्संग में एक पुलिस अफसर आया था। उसके दोनों बच्चों को देखकर मुझे तरस आया। मैंने कहा कि “इनका विकास नहीं होगा, इनके पेट में तकलीफ है।”

बोलाः “चॉकलेट खाते हैं।”

मैंने कहाः “इतनी चॉकलेट क्यों खिलाते हो ? चॉकलेट से, फास्टफूड से कितनी-कितनी हानि होती है, पेट की खराबी होती है।”

बस, पैसे मिल गये, अधिकार मिल गया तो खिलाओ, बच्चे हैं….। बच्चों से पूछते हैं- “क्या चाहिए बेटे ?” बच्चे टी.वी. में देखते रहते हैं तो बोल देते हैं- यह चाहिए, वह चाहिए…..। इससे बच्चों का स्वास्थ्य और हमारे भारत की गरिमा बिगड़ रही है। बच्चों का माँ-बाप के प्रति सदभाव नहीं रहा। यह कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ाई का परिणाम है। अगर माँ-बाप के जीवन में सत्संग नहीं है तो जो सूझबूझ चाहिए उससे माँ-बाप भी वंचित हो जाते हैं। अज्ञानता बढ़ाने में, विषय विकार बढ़ाने में अथवा अधिकारलोलुप होकर संघर्ष करने में सुख का, ज्ञान का निवास नहीं है। एकत्व के ज्ञान से ही सारी समस्याओं का समाधान है। यह ज्ञान गुरुकुलों में मिलता है।

कॉन्वेंट स्कूलों में बच्चों को हिन्दू साधुओं के प्रति नफरत करना सिखाया जाता है। हिन्दू देवी देवताओं को नीचा दिखाते हैं, हनुमानजी को बंदर साबित कर देते हैं। पूँछवाले किसी जानवर का चित्र बनाते हैं और बच्चों से पूछते हैं कि ‘यह क्या है?’ बच्चे कहते हैं- ‘जानवर’।

‘कैसे?’

‘क्योंकि इसको पूँछ है।’

फिर हनुमान जी का चित्र बनाते हैं। बोलते हैं- ‘देखो, यह भी जानवर है।’ बच्चों में ऐसी जहरी संस्कार डाल देते हैं। वे ही बच्चे जब बड़े अधिकारी बनते हैं तो हिन्दू होते हुए भी हिन्दू साधुओं के लिए, हिन्दू धर्म के लिए और हिन्दू शास्त्रों के लिए उनके मन में नफरत पैदा हो जाती है, इसलिए बेचारे शराबी हो जाते हैं। शराब पीने से बुद्धि मारी जाती है, फिर न पत्नी का मन सँभाल सकते हैं, न माँ-बाप का मन सँभाल सकते है। ऐसे कई युवकों को मैं जानता हूँ। एक व्यक्ति मेरे पास आया और रोते हुए बोला कि ‘मेरी लड़की ने ग्रेजुएशन किया, तीस हजार की सर्विस थी और जिससे शादी की उस लड़के की भी पैंतीस हजार की सर्विस थी। बयालीस लाख रूपये शादी में खर्च किये लेकिन बाबा ! बेटी को चार महीने का गर्भ है और उसको लाकर घर पर छोड़ दिया।’

क्योंकि पढ़ाई ऐसी थी कि खाओ-पियो-मौज करो। और भी कइयों को देखा है। एक व्यक्ति, वह खुद दो किसी कम्पनी में मैनेजर है, पत्नी भी मैनेजर है, बारह-पन्द्रह लाख वह भी कमाती है। फिर भी दुःखी हैं क्योंकि उन्हें शिक्षा ही उलटी मिली है, संस्कार ही भोगें के मिले हैं। दूसरों का कुछ भी हो, खुद को मजा आना चाहिए। बाहर का मजा लेने के जो संस्कार हैं, वे अंदर के मजे से वंचित कर देते हैं और पाशवी वृत्तियाँ जगाते हैं। जिन बच्चों को बचपन से ही अच्छे संस्कार मिले हैं, ऐसे बच्चों के लिए बाहरी सुख-सुविधा के साधन उतना मायना नहीं रखते। वे जैसी भी परिस्थिति में रहते हैं, स्वयं तो संतुष्ट रहते हैं, प्रसन्न रहते हैं उनके संपर्क में आने वालों को भी उनसे कुछ-न-कुछ सीखने को मिल जाता है। हम अपने बच्चों को धन न दे सकें तो कोई बात नहीं, बड़े-बड़े बँगले, कोठियाँ, गाड़ियाँ, बैंक बैलेंस न दे सकें तो कोई बात नहीं परंतु अच्छे संस्कार जरूर दें। अगर आपने अपने बच्चों को अच्छे संस्कार जरूर दें। अगर आपने अपने बच्चों को अच्छे संस्कारों से सम्पन्न बना दिया तो समझो, आपने उन्हें बहुत बड़ी सम्पत्ति दे दी, बहुत बड़ी पूँजी का मालिक बना दिया। यह अच्छे संस्कारों की पूँजी आपके लाडलों को जीवन के हर क्षेत्र में सफल बनायेगी, यहाँ तक कि लक्ष्मीपति भगवान से भी मिलने के योग्य बना देगी। बच्चों के मन में अच्छे संस्कार डालना यह हम सबका कर्तव्य है, इसमें हमें प्रमाद नहीं करना चाहिए, लापरवाही नहीं करनी चाहिए।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2010, पृष्ठ संख्या 14,15 अंक 209

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