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हृदयकोष की रक्षा करो – पूज्य बापू जी


काम, क्रोध, लोभ, मोह के जो आवेग आते हैं, उनसे बचने के लिए सोचो कि ‘इन आवेगों के अनुसार कौन-सा काम करें, कौन सा न करें ?’ इसमें तुम्हारी पुण्याई चाहिए। पहले जानो। जानाति, इच्छति, करोति। जानो, फिर शास्त्र अनुरूप इच्छा करो, फिर कर्म करो। आप क्या करते हैं कि पहल कर्म करते हैं। इन्द्रियाँ कर्म में लगती हैं, मन उसके पीछे लगता है और बुद्धि को घसीट के ले जाता है तो धीरे-धीरे बुद्धि राग-द्वेषमयी हो जाती है।

इच्छा हुई तो सोचो कि ‘इच्छा के अनुसार कर्म करें या बुद्धि से सोच के कर्म करें ?’ इच्छा हुई, फिर मन से उसको सहमति दी और इच्छा के अनुरूप मन करना चाहता है तो धीरे-धीरे बुद्धि दब जायेगी। बुद्धि का राग-द्वेष का भाग उभरता जायेगा, समता मिटती जायेगी। अगर शास्त्र, गुरु और धर्म का विचार करके बुद्धि को बलवान बनायेंगे और समता बढ़ाने वाला, मुक्तिदायी जो काम है वह करेंगे तो बुद्धि और समता बढ़ेगी लेकिन मन का चाहा हुआ काम करेंगे तो बुद्धि और समता का नाश होता जायेगा। कुत्ते, गधे, घोड़े, बिल्ले, पेट से रेंगने वाले तुच्छ प्राणी और मनुष्य में क्या फर्क है ?

वसिष्ठजी कहते हैं- हे रामजी ! कभी ये मनुष्य थे लेकिन जैसी इच्छा हुई ऐसा मन को घसीटा और बुद्धि उसी तरफ चली गयी तो धीरे धीरे दुर्बुद्धि होकर केँचुए, साँप और पेट से रेंगने वाले प्राणियों की योनियों में पड़े हैं।

जो बहुत द्वेषी होता है वह साँप की योनि में जाता है। इसी प्रकार की और भी कई योनियाँ हैं। यह चार दिन की जिंदगी है, अगर इसको सँभाला नहीं तो चौरासी लाख जन्में की पीड़ाएँ सहनी पड़ती हें।

रक्षत रक्षत कोषानामपि कोषें हृदयम्।

यस्मिन सुरक्षिते सर्वं सुरक्षितं स्यात्।।

‘जिसके सुरक्षित होने से सब सुरक्षित हो जाता है, वह कोषों का कोष है हृदय। उसकी रक्षा करो, रक्षा करो।’

खरीदारी करके कमीशन खाना, चोरी करना, बेईमानी करना…. ले क्या जायेंगे, कहाँ ले जायेंगे ! प्रारब्ध में जो होगा वह नहीं माँगने पर भी मिलेगा और कितनी भी बेईमानी करो, देर-सवेर उसका फल बेईमान को दुःखद योनियों में ले जायेगा। यदि तुम दगाखोर और कपटी हुए तो उसका फल तुमको भी दुःखद योनियों में ले जायेगा। ऐसे कपटी, बगला भगत को फिर बगुले, बिलार वाली, कपट करके पेट भरने वाली योनियों में जाना पड़ता है। तो बुद्धि में लोभ का आवेग आया, काम का आवेग आया, क्रोध का आवेग आया इंद्रियों में शरीर में तो शास्त्र के अनुरूप परिणाम का ख्याल करके बुद्धि को बलवान बनायें और आवेग को सहन करें। लोभ के आवेग को सहन करें। सोचें, ‘अनीति का धन क्या करना, अनीति का भोग क्या करना ?’ पहले शास्त्र के ढंग से बुद्धि में औचित्य-अनौचित्य समझ लो। वासना कहती है यह कर्म करो, इच्छा बोलती है करो लेकिन बुद्धि बोलती है उचित तो नहीं है, तो धीरे-धीरे थोड़ा समय निकाल दो और मन को थोड़ा समझाओ अथवा दूसरे काम में लगाओ तो वासना और द्वेष की लहर शांत हो जायेगी। अगर करने का आवेगा है, मन भी कहता है करो, बुद्धि भी कहती है करो और करने का औचित्य भी है तो उसे कर डालो।

एक तरफ इच्छा खींचती है और दूसरी तरफ बुद्धि और शास्त्र सहमति नहीं देते हैं तो वह कर्म अधर्म है। ऐसी स्थिति में थोड़ा समय गुजरने दो। जैसे समुद्र की लहर आयी और आप बैठ गये, समय गया तो लहर उतर गयी। ऐसे ही ये आवेग हैं। आवेग के समय थोड़ा शांत हो जायें, थोड़ा धैर्य रखें तो आवेग उतर जाता है। नहीं तो आवेग-आवेग में आदमी अंधा हो जाता है। आवेग-आवेग में अपनी खुशामद करने वाले चमचे अच्छे लगेंगे।

तो राग-द्वेष से बचें। आवेगों से बचें और भगवान में श्रद्धा करें। भगवान में सर्वसमर्थता, अंतर्यामीपना आदि दिव्य गुण हैं। आर्त्तभाव से प्रार्थना करे कि ‘प्रभु ! हमें अपने प्रसाद से पावन करो। हम तो आपके रस में नहीं आ रहे, आप ही हमें जबरदस्ती अपने रस में डुबा दो।’

आप चाहे कैसे भी हो, आर्त्तभाव से भगवान को प्रार्थना करते हो तो भगवान तुरंत आपको दोषों को झाड़ देते हैं और भगवदरस मिलता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2010, पृष्ठ संख्या 9,11 अंक 210

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हर परिस्थिति का सदुपयोग


(पूज्य बापू जी की सर्वहितकारी अमृतवाणी)

आपके जीवन का मुख्य कार्य प्रभुप्राप्ति ही है। शरीर से संसार में रहो किंतु मन को हमेशा भगवान में लगाये रखो। समय बड़ा कीमती है, फालतू गप्पे मारने में अथवा व्यर्थ कि चेष्टाओं में समय बर्बाद न करके उसका सदुपयोग करना चाहिए। भगवदस्मरण, भगवदगुणगान और भगवदचिंतन में समय व्यतीत करना ही समय का सदुपयोग है। आपका हर कार्य भगवदभाव  युक्त हो, भगवान की प्रसन्नता के लिए हो इसका ध्यान रखें।

आपके पास क्या है, क्या नहीं है इसका महत्त्व नहीं है, जो है, जितना है उसका उपयोग किसलिए कर रहे हो इसका महत्त्व है। धन है, मान है और धन की हेकड़ी दिखा रहे होः “मैं बड़ा हूँ अथवा मेरे कुटुम्बी ऐसे हैं, वैसे हैं….।” धन का दिखावा करके दूसरों को प्रभावित करते हो और ईश्वर को भूलते हो तो धन का यह दुरुपयोग आपको दुःख में गिरा देगा। धन है, भगवान के रास्ते जाने में उसका सदुपयोग करते हो, जिसका है उसी की प्रीति के लिए लगाते हो तो धन आपका कल्याण कर देगा।

गरीब हो, मजदूरी करते हो, कमियाँ हैं इसकी परवाह न करो। इनका सदुपयोग करने से आपका मंगल हो जायेगा। आपके पास कैसी भी परिस्थिति आये – बीमारी की हो या तंदरुस्ती की, निंदा की हो या वाहवाही की, सबका सदुपयोग करो। आपके पास क्या है इसका मूल्य नहीं है, आप उसका उपयोग सत् के लिए, प्रभु को पाने के लिए करो तो आपका कल्याण हो जायेगा। शबरी भीलन अनपढ़ थी, नासमझ थी लेकिन मैं भगवान की हूँ, गुरु की हूँ….. ऐसा सोचकर गुरुआज्ञा में चली तो महान हो गयी। राजा जनक विद्वान थे, धनवान थे, धन को, विद्या को समाज के हित में लगा दिया तो महान हो गये।

बीमारी आयी। किस कारण आयी यह समझकर सावधान हो गये कि दुबारा वह गलती नहीं करेंगे। बीमारी आयी तो तपस्या हो गयी, वाह प्रभु ! ऐसे प्रसन्न हुए तो यह बीमारी का सदुपयोग हुआ। जरा सी बीमारी आयी और परेशान हो गये… तुरंत इंजेक्शन ले लिया, बिना विचार किये ऑपरेशन करा लिया और असमय बूढ़े हो गये। पैसे भी लुटवाये और शरीर भी खराब करा लिया तो यह बीमारी का दुरुपयोग हुआ।

लोग आपका मजाक उड़ाते हैं तो सावधान हो जाओ कि ‘मरने वाले शरीर का मजाक उड़ा रहे हैं, मसखरी कर रहे हैं। मैं इसको जानने वाला हूँ। ॐआनन्द… तो यह उस परिस्थिति का सदुपयोग हो गया।

कैसी भी परिस्थिति आये, उसका सदुपयोग करके अपने-आपको जानने की, भगवान को पाने की कला सीख लो।

बोलेः महाराज ! हमको भगवान पाने की इच्छा तो है लेकिन हमारे पतिदेव मर गये न, उनकी याद आ रही है। पति में बड़ा मोह था हमारा।

कोई बात नहीं, मोह को रहने दो, मोह को तोड़ो मत। पतिदेव चले गये तो चले गये, भगवान की तरफ गये। मेरे पति को भगवान ने अपने-आपमें समा लिया। अब पति की आकृति में ममता और विकार सब चला गया, भगवान रह गये। हम उस भगवान के रो रहे हैं- ‘हे प्रभु ! कब मिलेंगे….’ यह ममता का, रुदन का सदुपयोग हो गया।

“बाबा ! झूठ बोलने की आदत है। क्या करें?”

ठीक है, खूब झूठ बोलो किंतु उसका सदुपयोग करो, भगवान खुश हो जायेंगे। आप मन ही मन ठाकुरजी के लिए सिंहासन सजाओ और भगवान से झूठ बोलो कि ‘प्रभु ! आओ, आपके लिए सोने का सिंहासन बनाया है, बहुत नौकर-चाकर लगा रखे हैं, मक्खन मिश्री रखी है….’ इस प्रकार मन में जो भी भाव आये ठाकुर जी को प्रसन्न करने के लिए बंडल पर बंडल मारते जाओ। झूठ बोलने की आदत है, कोई बात नहीं, उसको दबाओ मत और कर्मों में फँसाने वाला झूठ कभी बोलो मत। ठाकुर जी को रिझाने वाला झूठ रोज बोलो, धीरे-धीरे झूठ चला जायेगा। ठाकुर जी की प्रीति, ठाकुर जी की निगाहें और ठाकुर जी का माधुर्य आपके हृदय  रति, प्रीति और तृप्ति के रूप में प्रगट होगा। कैसी है सनातन धर्म की व्यवस्था !

मिले हुए का आदर, जाने हुए में दृढ़ता और प्रभु में विकल्परहित विश्वास से आपका कर्मयोग हो जायेगा, भक्तियोग हो जायेगा, ज्ञानयोग हो जायेगा।

गरीबी से भी निर्दुःखता नहीं आती, अमीरी से भी निर्दुःखत नहीं आती बल्कि गरीबी व अमीरी का सदुपयोग करने से निर्दुःखता आती है और हृदय में परमात्मा का प्रागट्य हो जाता है। आपके पास गरीबी है तो डरो मत, उसका सदुपयोग करो, इससे आपके पास वह प्रगट होगा जिसके लिए दुनिया तरसती है। आप पठित हो या अनपढ़ हो, विद्वान हो या मूर्ख हो, बीमार हो या स्वस्थ हो, जैसे भी हो उसका सदुपयोग करे, भाई है तो भाईपने का सदुपयोग करे। मुख्य सम्पादक है तो सम्पादकपने का सदुपयोग करे। पत्रकार हो तो पत्रकारिता का सदुपयोग करे। सदुपयोग में इतनी शक्ति है कि उसके सहारे भगवान मिल जाते हैं।

‘बाबा ! दुर्घटना हो जाय, दुःख आये उसका सदुपयोग करें तो क्या भगवान मिल जायेंगे ?’ हाँ ! मर्खता का विद्वता का, धन-धान्य का सदुपयोग करें तो क्या भगवान मिल जायेंगे ?’ हाँ बिल्कुल मिल जायेंगे। कुछ भी नहीं है, निपट-निराले एकदम कंगाल हैं, इस परिस्थिति का भी सदुपयोग करें तो क्या भगवान मिल जायेंगे ?’ बोलेः हाँ !

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।

सुखं वा यदि वा दुखं स योगी परमो मतः।।

‘हे अर्जुन ! जो योगी अपनी भाँति सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है और सुख या दुःख को भी सबमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।’

(भगवदगीताः 6.32)

परिस्थिति कैसी भी आयें, उनमें डूबो मत। उनका उपयोग करो। समझदार लोग संतों से, सत्संग से सीख लेते हैं और सुख-दुःख का सदुपयोग करके बहुतों के लिए सुख, ज्ञान व प्रकाश फैलाने में भागीदार होते हैं और मूर्ख लोग सुख आता है तो अहंकार में तथा दुःख आता है तो विषाद में डूब के स्वयं का तो सुख, ज्ञान और शांति नष्ट कर लेते हैं, औरों को भी परेशान करके संसार से हारकर चले जाते हैं।

संसार से जाना तो सभी को है, हमको भी जाना है, आपको भी जाना है, यहाँ सब जाने वाले ही आते हैं। भगवान राम, भगवान श्रीकृष्ण, बुद्ध-महावीर सब आये और चले गये, हमारे दादे-परदादे सब चले गये तो हम कब तक ? यह शरीर तो जाने वाला है। जो जाने वाला है उसके जाने का सदुपयोग करो और जो रहने वाला है उसको सत्संग के द्वारा पहचान कर अभी आप निहाल हो जाओ, खुशहाल हो जाओ, पूर्ण हो जाओ।

पूर्ण गुरु किरपा मिली, पूर्ण गुरु का ज्ञान।…..

तो अब करना क्या है ? गरीब होना है ? अमीर होना है ? यहाँ रहना है ? परदेश जाना है ? क्या करना है ?

कुछ करना नहीं है, कोई परिवर्तन की इच्छा नहीं करनी है, जो कुछ हो रहा है उसका सदुपयोग करना है। ‘ऐसा हो जाय, वैसा हो जाय, ऐसा बन जाऊँ….’ इस चक्कर में मत पड़ो।

प्रारब्ध पहले रच्यो, पीछे भयो शरीर।

तुलसी चिंता क्या करे, भज ले श्री रघुवीर।।

पुरुषार्थ अपनी जगह पर है, प्रारब्ध अपनी जगह पर है, दोनों का सदुपयोग करने वाला धन्य हो जाता है।

परिस्थिति कैसी भी आये, अपने चित्त में दुःखाकार या सुखाकार वृत्ति पैदा होगी लेकिन उस वृत्ति को बदलकर भगवदाकार करना, यह है परिस्थिति का सदुपयोग। धन आया, सत्ता आयी, योग्यता आयी और अहंकार बढ़ाया तो आपने इनका दुरुपयोग किया। यदि धन से बहुजन हिताय-बहुजनसुखाय का नजरिया बना और मिली हुई योग्यता का सत्यस्वरूप ईश्वर के ज्ञान में, शांति में, ईश्वरप्रसादजा बुद्धि बनाने में सदुपयोग किया तो आप और ऊपर उठते जायेंगे, अनासक्त भाव से और ऊँचाइयों को छूते जायेंगे। बाहर की ऊँचाई दिखे चाहे न दिखे लेकिन अंतरात्मा की संतुष्टि, प्रीति और तृप्ति आपके हृदय में आयेगी।

ऋषि प्रसाद, जून 2010, पृष्ठ संख्या 18,19,20 अंक 210

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ज्ञान का अंजन मिला तो आँख खुल गयी


(पूज्य बापू जी के सत्संग प्रवचन से)

संत कबीर जयंतीः 26 जून 2010

कबीर दास जी के पुत्र का नाम कमाल और पुत्री का नाम कमाली था। कमाली जब सोलह सत्रह वर्ष की थी तब की एक घटना है। कमाली सदैव प्रसन्न रहती थी। उसका स्वभाव मधुर और हिलचाल इतनी पवित्र थी कि कोई ब्राह्मण सोच भी नहीं सकता था कि वह बुनकर है। उसकी निगाहें नासाग्र रहतीं. वह इधर उधर नहीं देखती थी। युवती तो थी, उम्रलायक थी लेकिन कबीर जी की मधुर छत्रछाया में रहने से उसका जीवन बड़ा आभा-सम्पन्न, प्रभाव सम्पन्न था।

एक बार कमाली पनघट पर पानी भरने गयी। कुएँ से गागर भरकर ज्यों ही बाहर निकली, इतने में एक ब्राह्मण आया और बोलाः “मैं बहुत प्यासा हूँ।” कमाली ने गागर दे दी। वह ब्राह्मण गागर का काफी पानी पी गया और लम्बी साँस ली। कमाली ने पूछाः “भाई ! इतना सारा पानी पी गये, क्या बात है ?”

ब्राह्मण ने कहाः “मैं कश्मीर गया था पढ़ने के लिए। अब पढ़ाई पूरी हो गयी तो अपने घर जा रहा था। रास्ते में कहीं पानी मिला नहीं, सुबह का प्यासा था। पानी नहीं मानो यह तो अमृत था, बहुत देर के बाद मिला है तो इसकी कद्र हो रही है। अच्छा तुम कौन सी जाति की हो ?”

कमाली बोलीः “कमाल है ! पानी पीने के बाद जाति पूछते हो ? ब्राह्मण ! पहले जाति पूछते।”

ब्राह्मणः “मैं तो समझा तुम ब्राह्मण की कन्या होगी और फिर जल्दबाजी में मैंने पूछा नहीं, प्यास बहुत जोरों की लगी थी। बताओ, जाति की कौन हो तुम ?”

कमालीः “हमारे पिता संत कबीर जी ताना-बुनी करते हैं। हम जाति के बुनकर हैं।”

उस विद्वान का नाम था हरदेव पंडित। ‘बुनकर’ सुनते ही वह आगबबूला हो गया, बोलाः “कबीर तो ब्राह्मणों को धर्मभ्रष्ट करते हैं और तुम भी उसमें सहयोगी हो ! मुझे तो तू ब्राह्मण कन्या लगती थी। तूने मुझे पानी देने के पहले क्यों  नहीं बताया कि हम बुनकर हैं ?”

कमालीः “ब्राह्मण ! तुमने पूछा ही नहीं और मैंने धर्मभ्रष्ट करने के लिए तुमको पानी नहीं पिलाया है। मैंने तो देखा कोई प्यासा पथिक जा रहा है और पानी माँगता है इसलिए पानी पिलाया है। तुमने पानी जैसी चीज माँगी तो मैं ना कैसे करती ? क्यों तुम्हें जाति-पाँति के चक्कर में डालूँ ? मैंने तो देखा, पथिक प्यासा है, वैसे तो करोड़ों-करोड़ों लोग प्यासे ही हैं, उनकी प्यास तो मेरे पिता जी ही बुझा सकते हैं लेकिन तुम्हारे जैसे पथिक, जिसकी प्यास पानी से बुझती है उसकी प्यास तो मैं भी बुझा सकती हूँ। जिसकी प्यास आत्मा-परमात्मानुसंधान से बुझती है उसकी प्यास तो मेरे पिता जी बुझा सकते हैं।”

हरदेव पंडितः “वाह ! जैसा तेरा बाप चतुर है बात करने में वैसी तू भी चतुर है। अपनी जाति नहीं बतायी और लगी है ज्ञान छाँटने।”

कमालीः “पंडित जी ! ज्ञान के बिना तो जीवन खोखला है। ज्ञान तो पानी भरते समय भी चाहिए, रोटी बनाते समय और चलते समय भी चाहिए। कश्मीर के विद्वानों के पास उचित विद्या है, यह ज्ञान था तभी तो तुम पढ़ने गये। पढ़ाई पूरी हुई, यह ज्ञान हुआ तभी अपने वतन में आये हो। प्यास का ज्ञान हुआ तभी तुमने पानी माँगा। ज्ञान तो सतत चाहिए लेकिन वह ज्ञान अज्ञानसंयुक्त शरीर को पोसने में लगता है इसलिए दुःखकारी हो जाता है। यदि वह ज्ञानस्वरूप आत्मा के अनुसंधान में आकर फिर संसार का व्यवहार करता है तो पूजनीय हो जाता है, वंदनीय हो जाता है।”

हरदेव पंडित ने सोचा कि मैं कश्मीर से पढ़कर आया और यह जुलाहे की लड़की मुझे ज्ञान दे रही है। वह बोलाः “चुप रह, ब्राह्मणों को ज्ञान छाँटती है !”

कमालीः “पंडित जी ! ब्राह्मण कौन और बुनकर कौन ?”

हरदेवः “जो जुलाहे लोग हैं वे बुनकर होते हैं और जो ब्राह्मण के कुल में जन्म लेते हैं वे ब्राह्मण होते हैं।”

कमालीः “नहीं पंडित जी ! जो ब्रह्म को जानता है वह ब्राह्मण होता है और जो राग-द्वेष में झूलता रहता है वह जुलाहा होता है।”

हरदेवः “तुम्हारे पिता जी भी ब्राह्मणों के विरुद्ध बोलते हैं, पंडित बदे सो झूठा और तुमने हमारे साथ ऐसा किया ! लेकिन लड़कियों से मुँह लगना ठीक नहीं। चलो तुम्हारे पिता के पास, वहीं खुलासा होगा।”

कमालीः “हाँ, चलिये पिता जी के पास।”

कबीर जी तो अपने सततस्वरूप में रमण करने वाले थे। उन्होंने देखा कि कमाली के साथ कोई पंडित चेहरे पर रोष लिये आ रहा है। कबीर जी ने अपने स्वरूप आत्मदेव में गोता मारा और पूरी बात जान ली।

पंडित बोलाः “तुम्हारी लड़की ने मेरा ब्राह्मणत्व नाश कर दिया। मुझे अशुद्ध पानी पिलाकर अशुद्ध कर दिया।”

जिनको अपने सततस्वरूप का स्मरण होता है, वे छोटी-मोटी बातों में उलझते नहीं। भले बाहर से कभी आँख दिखाके भी बात करें लेकिन भीतर से उलझते नही। वे समझते है कि संसार एक नाटक है।

कबीर जी हँसने लगे, बोलेः “पंडित ! पानी इसके घड़े में आने से अशुद्ध हो गया ! लेकिन कुएँ के अंदर क्या-क्या होता है ? उसमें जो मछलियाँ रहती हैं उनका मलमूत्र आदि उसी में होता है। कछुए आदि और भी जीव-जंतु रहते हैं, उनका पसीना, लार, थूक, मैला, उनके जन्म और मृत्यु के वक्त की सारी क्रियाएँ सब पानी में ही होती है। घड़ा जिस मिट्टी से बना है उसमें भी कई मुर्दों की मिट्टी मिली होती है, कई जीव-जंतु मरते हैं तो उसी मिट्टी में मिल जाते हैं। उसी मिट्टी से घड़े बनते हैं, फिर चाहे वह घड़ा ब्राह्मण के घर पहुँच जाय, चाहे बुनकर के घर। पृथ्वी पर अनंत बार जीव आये और मरे। ऐसी कौन सी मिट्टी होगी, ऐसा कौन सा एक कण होगा जिसमे मुर्दे का अंश न हो। पंडित ! कुआँ तो गाँव का है, उसमें से तो सभी लोग पानी भरते है, कई बुनकरों के घड़े, मटके, सुराहियाँ उसमें पड़ती होंगी। बुनकर के हाथ की रस्सियाँ भी पड़ती होंगी, उसी कुएँ से गाँव के सभी ब्राह्मण पानी भरते हैं और तुम पवित्रता-अपवित्रता कि विचार करते हो, तो अपवित्र विचार यही है कि यह बुनकर है। शूद्र वह है जो हाड़-मांस की देह को ‘मैं’ मानता है और ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म को जानता है अथवा जानने के रास्ते चलता है।”

कबीर जी की युक्तियुक्त बात से पंडित बड़ा प्रभावित हुआ। कबीर जी के दिल में सततस्वरूप का अनुसंधान था। वे घृणा, अहंकार से नहीं, नीचा दिखाने के लिए नहीं बल्कि उसका अज्ञान, अशांति मिटाकर उसको शांति का दान देने के लिए बोल रहे थे। पंडित का गुस्सा शांत हुआ। कमाली को पंडित ने साधुवाद दिया और कहाः “हे देवी ! मैं कृतार्थ हो गया। आज मेरी विद्या सफल हुई कि मैं ऐसे ब्रह्मवेत्ता के चरणों में पहुँचा। तुम्हारे पवित्र हाथों से पानी पीकर मेरा अहंकार भी शांत हो गया, मेरी बेवकूफी भी दूर हो गयी। अब मैं भी आप लोगों के रास्ते चलूँगा।”

जो देह को में मानते हैं वे भगवान के मंदिर में रहते हुए भी भगवान से दूर हैं और जो भगवान के स्वरूप का चिंतन करते है व बाजार में रहते हुए भी मंदिर में हैं। इसलिए सतत चिंतन किया जाय कि जहाँ से मन फुरता है, बुद्धि को सत्ता मिलती है, चित्त को चेतना मिलती है, जहाँ से मन भूख-प्यास का पता लगाता है और मन को पता लगाने का जहाँ से सामर्थ्य मिलता है, उस चैतन्य आत्मा की स्मृति ही परमात्मा की सतत् स्मृति है। उस चैतन्य को ‘मैं’ मानना समझो सारे दुःख, क्लेश, पाप से परे हो जाना है और उस चैतन्य की विस्मृति, करके देह को ‘मैं’ मानना मानो सारे दुःख, क्लेश और पापों को आमेंत्रित करना है।

ऋषि प्रसाद, जून 2010, पृष्ठ संख्या 25,26,27 अंक 210

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