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‘मैं क्या करूँ ?’


(पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)

कुछ लोग मेरे से पूछते हैं- ‘मैं क्या करूँ ? मैं क्या करूँ ?’ तो मुझे लगता है कि वे कितने भोले लोग हैं, अनजान हैं । जब दिन-रात स्पष्ट बोल रहा हूँ कि ऐसा चिंतन करो, ऐसा ध्यान करो फिर भी आकर पूछते हैं कि ‘मैं क्या करूँ ? मैं क्या करूँ ?’

मैं बोलता हूँ- “सुख-दुःख में सम रहो । जगत को सपना मानो, आत्मा को अपना मानो । प्रसन्न रहो । निष्काम भाव से सेवा करो । गहरा श्वास भरके फूँक मारकर छोड़ दो – ऐसे पाँच-सात बात करो । मूलबंध करो, उड्डियान बंध करो, जालंधर बंध करो और जीभ को तालू में लगाओ । दस प्राणायाम करो । ॐकार का गुँजन करो, दस बीस मिनट भगवान या गुरु की तस्वीर की ओर एकटक देखो । श्वासोच्छ्वास की गितनी किया करो । ‘ईश्वर की नारायण स्तुति, जीवन विकास, श्री योगवासिष्ठ महारामायण’ आदि सद्ग्रंथ पढ़ा करो । कमरा बंद करके पाँच मिनट भगवान के लिए रोओ, नाचो, हँसो, गाओ । रूपया पैसा है तो कमाई का 10 प्रतिशत (दसवाँ हिस्सा) दान-पुण्य करो । समय का दस प्रतिशत ध्यान-भजन, सेवा में लगाओ और अब ‘मैं क्या करूँ’ जो पूछता है उसको खोजकर मेरे पास ले आओ । अब ‘क्या करूँ’ वाले आयें तो इस सत्संग की ‘मैं क्या करूँ’ कैसेट दिखा दो बस ।”

बोलेः “बाबा ! यह सब तो बहुत अच्छा है लेकिन एक बात बताओ, मेरे लिए मैं क्या करूँ ?”

“तुम्हारे लिए तुम क्या करो…. तो तुम क्या चाहते हो ?”

“बाबा ! मैं आपसे आपको ही चाहता हूँ ।”

“मुझसे मुझको ही चाहते हो तो भक्ति हो गयी पूरी !”

“हम बिछुड़ते ही नहीं हैं लालू ! केवल यही नहीं हैं हम । जो दिख रहे हैं उतने ही हम नहीं हैं । अभी जो बताया न ‘क्या करूँ’ का उत्तर, उसमें से करोगे तो पता चलेगा । फिर स्वप्न में भी मुलाकात होगी । कभी जाग्रत में भी दर्शन-वर्शन होगा । कभी तुम्हारे मन में जो भी प्रश्न उठेगा, सत्संग में उसका उत्तर मिल जायेगा ।”

“बापू जी ! ऐसा करो कि मैं जब चाहूँ आपसे मिल सकूँ, बस इतना कर दो न !”

“ये छोटी-छोटी बातें क्यों करते हो ? तुम ऐसे मिलो कि बिछुड़ो ही नहीं ।”

“तो बाबा ! क्या करूँ ?”

“बस, क्या करूँ को ही छोड़ दो ।”

“फिर क्या करूँ ?”

“क्या करूँ कौन पूछ रहा है, उसको खोजो और सद्गुरु के चित्र को एकटक देखो । फिर चित्र से क्या प्रकट होता है, कैसा प्रकाश होता है, अंदर क्या अनुभूति होती है उसे देखते रहो ।”

“बापू जी ! यहाँ भी पहुँच गये, फिर क्या करूँ ?”

“फिर श्री योगवासिष्ठ का ‘वैराग्य प्रकरण’ पढ़ो । कभी-कभी ‘उत्पत्ति प्रकरण’ पढ़ो, कभी ‘स्थिति प्रकरण’ पढ़ो और शांत होते जाओ ।”

बोलेः “यहाँ भी पहुँच गये, फिर क्या करूँ ?”

“फिर मेरे ध्यानयोग शिविर में कभी आया करो ।”

“लेकिन बच्चे कहना नहीं मानते हैं, क्या करूँ ? पति कहना नहीं मानता है, क्या करूँ ? पत्नी कहना नहीं मानती है, क्या करूँ ? आदमी शराब पीता है, क्या करूँ ?”

“आदमी शराब पीता है तो उसके मस्तक के पीछे नज़र डाल और ‘शराब छोड़ दो, शराब छोड़ दो….’ उसका नाम लेकर बोला कर तो वह शराब छोड़ देगा । बेटे कहना नहीं मानते हैं तो न मानें, तू चिंता छोड़ फिर अपने-आप मानेंगे । और मानें तो क्या, नहीं मानें तो क्या ! ज्ञान का आश्रय ले ।”

“मेरी पड़ोसन मेरे को देखकर जलती है तो क्या करूँ ? मेरी ननद, मेरे रिश्तेदार मेरे साथ ऐसा व्यवहार करते हैं, ऐसा जलते हैं तो मैं क्या करूँ ?”

“जो किसी को देखकर जलते हैं न, वे अपने लिए ही दुःख बनाते हैं । वे अपने लिए दुःख न बनायें इसलिए तुम उनसे प्रेमभरा व्यवहार करो ।”

“मैं तो प्रेमभरा व्यवहार करती हूँ लेकिन वे हैं ही ऐसे ।”

“वे हैं ऐसे लेकिन ‘उनकी गहराई में बैठकर मेरा प्रभु देख रहा है कि मैं कितनी उदार हूँ – ऐसा विचार करके अपनी उदारता को बरसाया कर ।”

“लेकिन वे मुझे उल्लू बनाते हैं ।”

“उल्लू बनाते हैं यह पता है न, तो बस उल्लू बनो मत और उनको उल्लू बनाओ मत ।”

“तो मैं क्या करूँ ?”

“थोड़ा धैर्य रख, समय की धारा में सब ठीक हो जायेगा ।”

“मेरे को देखके बहुत जलते हैं ।”

“वे सदा रहने वाले नहीं हैं । वे कभी बीमार हो जायेंगे, कभी मन बदल जायेगा अभी तू चिंता काहे को करता है ! अभी तो कुछ नहीं कर रहे हैं ?”

“नहीं, अभी कुछ नहीं कर रहे हैं लेकिन कभी भी कुछ भी कर सकते हैं ।”

“जब करेंगे तब देखा जायेगा । ‘ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनं….’ मंत्र जप के निकला कर, तेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा ।”

“यह बात ठीक है लेकिन कभी एकाएक कोई मुसीबत आ जाये तो क्या करूँ ?”

“मुसीबत सहने की तैयारी रख और फिर भी कोई बड़ी मुसीबत है तो ‘ॐ ह्रीं ॐ, ॐ ह्रीं ॐ, ॐ ह्रीं ॐ….’ का जप करके दे आहूतियाँ, तो मुसीबत को रोकने वाला वातावरण पैदा हो जायेगा और वह विघ्न-बाधाओं को दूर कर देगा ।”

“हाँ, यह बात ठीक है । अब बताओ, डॉक्टर ने बच्ची का, बच्चे का ऑपरेशन करवाने का बोला है, करूँ कि नहीं करूँ ?”

“मेरे वैद्य की सलाह ले ले । जितना हो सके बिना ऑपरेशन के ठीक हो जायें । वैद्य बोले कि कराओ तो ऑपरेशन करा लो ।”

“लेकिन आँखों में ऐसा है… अभी क्या करूँ ?”

“आँखों में तकलीफ है तो हथेलियों को आपस में रगड़ के बंद आँखों पर लगाया कर । नेत्रबिंदु डाल ।”

“शरीर के किसी भी अंग में तकलीफ हो तो उस अंग पर हथेलियों वाला प्रयोग करूँ क्या ?”

“हाँ ।”

“देखो ‘क्या करूँ, क्या करूँ’ पूछने वालों ने  सबके लिए अच्छी नयी कैसेट बना दी ।”

“हाँ, कैसेट तो अच्छी बनायी लेकिन मैं क्या करूँ ?”

“इसे घर के लिए और पड़ोस के लिए भी ले जा, काम में आयेगी ।” अब ‘क्या करूँ’ वाले आयें तो यह ‘मैं क्या करूँ’ कैसेट दे दो बस ।”

“बापू जी ! आप बहुत अच्छे लगते हो ।”

“तो तेरा जी करता है कि तू पकड़कर घर में ले जायेगा ?”

बोलेः “बापू जी ! मैं क्या करूँ, आप आने वाले नहीं हैं न !”

“अरे ! हम जाने वाले भी तो नहीं हैं । यह ‘मैं क्या करूँ’ सी.डी. देखा-सुना कर और सद्गुरु की तस्वीर एकटक देखा कर, फिर देख मैं मिलता भी नहीं, बिछुड़ता भी नहीं ।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2009, पृष्ठ संख्या 13,14,17 अंक 203

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दिव्य औषधिः पंचगव्य


गोमूत्र, गोबर का रस, गोदुग्ध, गोदधि व गोघृत का निश्चित अनुपास में मिश्रण ‘पंचगव्य’ कहलाता है । जैसे पृथ्वी, जल, तेज आदि पंचमहाभूत सृष्टि का आधार हैं, वैसे ही स्वस्थ, सुखी व सुसम्पन्न जीवन का आधार गौ प्रदत्त ये पाँच अनमोल द्रव्य हैं । पंचगव्य मनुष्य के शरीर को शुद्ध कर स्वस्थ, सात्त्विक व बलवान बनाता है । इसके सेवन से तन-मन-बुद्धि के विकार दूर होकर आयुष्य बल और तेज की वृद्धि होती है ।

गव्यं पवित्रं च रसायनं च पथ्यं च हृद्यं बलबुद्धिदंस्यात् ।

आयुं प्रदं रक्तविकारहारि त्रिदोष हृद्रोगविषापहं स्यात् ।।

अर्थात् पंचगव्य परम पवित्र रसायन है, पथ्यकर है । हृदय को आनंद देने वाला तथा आयु-बल-बुद्धि प्रदान करने वाला । यह त्रिदोषों का शमन करने वाला, रक्त के समस्त विकारों को दूर करने वाला, हृदयरोग एवं विष के प्रभाव को दूर करने वाला है ।

इसके द्वारा कायिक, वाचिक, मानसिक आदि पाप संताप दूर हो जाते हैं ।

पंचगव्यं प्राशनं महापातकनाशनम् । (महाभारत)

सभी प्रकार के प्रायश्चितों में, धार्मिक कृत्यों व यज्ञों में पंचगव्य-प्राशन का विधान है । वेदों, पुराणों एवं धर्मशास्त्रों में पंचगव्य की निर्माण-विधि एवं सेवन-विधि का वर्णन आता है । पंचगव्य शास्त्रोक्त रीति से अत्यंत शुचिता, पवित्रता व मंत्रोच्चारण के साथ बनाया जाता है ।

पंचगव्य निर्माण विधिः

धर्मशास्त्रों में प्रसिद्ध ग्रंथ ‘धर्मसिंधु‘ के अनुसार पंचगव्य के पाँचों द्रव्यों का अनुपात इस प्रकार हैः-

गोघृत – 8 भाग, गोदुग्ध 1 भाग, गोदधि – 10 भाग, गोमूत्र – 8 भाग, गोबर का रस – 1 भाग और कुशोदक – 4 भाग ।

बोधायन स्मृति‘ में इन पाँच द्रव्यों का अनुपात इस प्रकार हैः-

गोघृत – 1 भाग, गोदधि 2 भाग, गोबर का रस – आधा भाग, गोमूत्र – 1 भाग, दूध – 3 भाग और कुशोदक – 1 भाग ।

80 वर्ष के एक अनुभवी वैद्य के अनुसार द्रव्यों का अनुपातः-

गोझरण – 20 भाग, गोघृत – ढाई भाग, गोदुग्ध – 10 भाग, गोबर का रस – डेढ़ भाग व गोदधि – 5 भाग ।

विशेष ध्यान देने योग्य बातें-

1. उपर्युक्त द्रव्य देशी नस्ल की स्वस्थ गाय के होने चाहिए ।

2. गोबर को ज्यों-का-त्यों मिश्रण में नहीं डालना चाहिए बल्कि उसकी जगह गोबर के रस का उपयोग करें ।

ताजे गोबर में सूती कपड़ा दबाकर रखें । कुछ समय बाद उसे निकालकर निचोड़ने से गोबर का रस अर्थात् गोमय रस प्राप्त होता है ।

3. कुश (डाभ) का पंचांग एक दिन तक गंगाजल में डुबोकर रखने से कुशोदक बन जाता है ।

गोमूत्र के अधिष्ठातृ देवता वरुण, गोबर के अग्नि, दूध के सोम, दही के वायु, घृत के सूर्य और कुशोदक के देवता विष्णु माने गये हैं । इन सभी द्रव्यों को एकत्र करने तथा पंचगव्य का पान करने आदि के भिन्न-भिन्न मंत्र शास्त्रों में बताये गये हैं । इन सभी द्रव्यों को एक ही पात्र में डालते समय निम्नलिखित श्लोकों का तीन बार उच्चारण करें-

गोमूत्र

गोमूत्रं सर्वशुद्ध्यर्थं पवित्रं पापशोधनम् ।

आपदो हरते नित्यं पात्रे तन्निक्षिपाम्यहम् ।।

गोमय

अग्रमग्रश्चरन्तीनां औषधीनां रसोद्भवम् ।

तासां वृषभपत्नीनां पात्रे तन्निक्षिपाम्यहम् ।।

गोदुग्ध

पयं पुण्यतमं प्रोक्तं धेनुभ्यश्च समुद्भवम् ।

सर्वशुद्धिकरं दिव्यं पात्रे तन्निक्षिपाम्यहम् ।।

गोदधि

चन्द्रकुन्दसमं शीतं स्वच्छं वारिविवर्जितम् ।

किंचिदाम्लरसालं च क्षिपेत् पात्रे च सुन्दरम् ।।

गोघृत

इदं घृतं महद्दिव्यं पवित्रं पापशोधनम् ।

सर्वपुष्टिकरं चैव पात्रे तन्निक्षिपाम्यहम् ।।

कुशोदक

कुशमूले स्थितो ब्रह्मा कुशमध्ये जनार्दनः ।

कुशाग्रे शंकरो देवस्तेन युक्तं करोम्यहम् ।।

सर्वप्रथम उपरोक्त द्रव्यों से संबंधित मंत्रों का उच्चारण करते हुए सभी को एकत्र करें । बाद में प्रणव (ॐ) के उच्चारण के साथ कुश से हिलाते हुए उनको मिश्रित करें ।

सेवन-विधिः पंचगव्य सुवर्ण अथवा चाँदी के पात्र में या पलाश-पत्र के दोने में लेकर निम्न मंत्र के तीन बार उच्चारण के पश्चात खाली पेट सेवन करना चाहिए ।

यत् त्वगस्थिगतं पापं देहे तिष्ठति मामके ।

प्राशनात् पंचगव्यस्य दहत्वग्निरिवेन्धनम् ।।

अर्थात् त्वचा, मज्जा, मेधा, रक्त और हड्डियों तक जो पाप मुझमें प्रविष्ट हो गये हैं, वे सब मेरे इस पंचगव्य-प्राशन से वैसे ही नष्ट हो जायें, जैसे प्रज्जवलित अग्नि में सूखी लकड़ी डालने पर भस्म हो जाती है । (महाभारत)

पंचगव्य सेवन की मात्राः बच्चों के लिए 10 ग्राम और बड़ों के लिए 20 ग्राम । पंचगव्य सेवन के पश्चात कम-से-कम 3 घंटे तक कुछ भी न खायें ।

पंचगव्य के नियमित सेवन से मानसिक व्याधियाँ पूर्णतः नष्ट हो जाती हैं । विषैली औषधियों के सेवन से तथा लम्बी बीमारी से शरीर में संचित हुए विष का प्रभाव भी निश्चितरूप से नष्ट हो जाता है । गोमाता से प्राप्त होने वाला, अल्प प्रयास और अल्प खर्च में मानव-जीवन को सुरक्षित  बनाने वाला यह अद्भुत रसायन है ।

पंचगव्य घृत

गौ-प्रदत्त उपरोक्त पाँचों द्रव्यों को समान मात्रा में मिलाकर तत्पश्चात अग्नि पर पकाकर ‘पंचगव्य घृत’ बनाया जाता है । इसका उपयोग विशेषतः मानसिक विकारों में किया जाता है । इसके नियमित सेवन से मनोदैन्य, मनोविभ्रम, मानसिक अवसाद (डिप्रैशन) आदि लक्षण तथा उन्माद, अपस्मार आदि मानसिक व्याधियाँ धीरे-धीरे दूर होने लगती हैं ।

बनाने की विधिः गोमूत्र, गोबर का रस, दूध, दही तथा घी समान मात्रा में लें । कढ़ाई में पहले घी गर्म करें । गर्म घी में क्रमशः गोबर का रस, दही, गोमूत्र व अंत में दूध डालें । कलछी से मिश्रण को हिलाते हुए धीमी आँच पर घी पकायें । घृत सिद्ध होने पर छानकर काँच अथवा चीनी मिट्टी के बर्तन में भरकर रखें ।

सिद्ध घृत का परीक्षणः घी सिद्ध होने पर घृत में उत्पन्न बुलबुलों का आकार छोटा होने लगता है । ऊपर का झाग शांत होने लगता है । कल्क (गाढा अवशेष) नीचे जमा हो जाता है व ऊपर स्वच्छ घी मात्र शेष रहता है ।

कढ़ाई में नीचे जमा कल्क अग्नि में डालते ही बिना आवाज किये जलने लगे तो घृत सिद्ध हो चुका है, ऐसा समझना चाहिए ।

मात्राः 10 से 15 ग्राम घी सुबह खाली पेट गुनगुने पानी से लें ।

इसके स्निग्ध व शीत गुणों से मस्तिष्क के उपद्रव शांत हो जाते हैं । स्नायु व नाड़ियों में बल आने लगता है । यह क्षय, श्वास (दमा), खाँसी, धातुक्षीणता, पाण्डु, जीर्णज्वर, कामला आदि व्याधियों में भी उपयुक्त है । पेट, वृषण (अण्डकोश) तथा हाथ-पैरों की सूजन में यह बहुत ही लाभदायी है । रोगी तथा निरोगी, सभी इसका सेवन कर स्वास्थ्य व दीर्घायुष्य की प्राप्ति कर सकते हैं ।

विधिवत् पंचगव्य घृत बनाना सबके लिए सम्भव न हो पाने के कारण ‘साँईं श्री लीलाशाह जी उपचार केन्द्र, सरत’ के साधकों ने यह शरीरशोधक, बलवर्धक, पापनाशक सिद्ध गोघृत बनाना शुरु किया है ।

घर पर इसे बनाते समय विधिवत् बनाने की सावधानी बरतें । दीर्घ, निरोग और प्रसन्न जीवन के लिए गोघृत वरदानस्वरूप है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2009, पृष्ठ संख्या 27,28 अंक 202

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चमत्कार का रहस्य


(पूज्य बापू जी के सत्संग से)

संत एकनाथ जी महाराज के पास एक बड़े अद्भुत दण्डी संन्यासी आया करते थे । एकनाथ जी उन्हें बहुत प्यार करते थे । वे संन्यासी यह मंत्र जानते थेः

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।

ॐ शांतिः ! शांतिः !! शांतिः !!!

और इसको ठीक से पचा चुके थे । वे पूर्ण का दर्शन करते थे सबमें । कोई भी मिल जाय तो मानसिक प्रणाम कर लेते थे । कभी बाहर से भी दण्डवत् कर लेते थे ।

एक बार वे दण्डी संन्यासी बाजार से गुजर रहे थे । रास्ते में कोई गधा मरा हुआ पड़ा था । ‘अरे, क्या हुआ ? कैसे मर गया ?’ – इस प्रकार की कानाफूसी करते हुए लोग इकट्ठे हो गये । दण्डी संन्यासी की नज़र भी मरे हुए गधे पर पड़ी । वे आ गये अपने संन्यासीपने में । ‘हे चेतन ! तू सर्वव्यापक है । हे परमात्मा ! तू  सब में बस रहा है ।’ – इस भाव में आकर संन्यासी ने उस गधे को दण्डवत प्रणाम किये । गधा जिंदा हो गया ! अब इस चमत्कार की बात चारों ओर फैल गयी तो लोग दण्डी संन्यासी के दर्शन हेतु पीछे लग गये । दण्डी संन्यासी एकनाथ जी के पास पहुँचे । उनके दिल में एकनाथ जी के लिए बड़ा आदर था । उन्होंने एकनाथ जी को प्रार्थना कीः “…..अब लोग मुझे तंग कर रहे हैं ।”

एकनाथ जी बोलेः “फिर आपने गधे को जिंदा क्यों किया ? करामात करके क्यों दिखायी ?”

संन्यासी ने कहाः “मैंने करामात दिखाने का सोचा भी नहीं था । मैंने तो सबमें एक और एक में सब – इस भाव से दण्डवत किया था । मैंने तो बस मंत्र दोहरा लिया कि ‘हे सर्वव्यापक चैतन्य परमात्मा ! तुझे प्रणाम है ।’ मुझे भी पता नहीं कि गधा कैसे जिंदा हो गया !”

जब पता होता है तो कुछ नहीं होता, जब तुम खो जाते हो तभी कुछ होता है । किसी मरे हुए गधे को जिंदा करना, किसी के मृत बेटे को जिंदा करना – यह सब किया नहीं जाता, हो जाता है । जब अनजाने में चैतन्य-तत्त्व के साथ एक हो जाते हैं तो वह कार्य फिर परमात्मा करते हैं । इसी प्रकार संन्यासी अपने चैतन्य के साथ एकाकार हो गये तो वह चमत्कार परमात्मा ने कर दिया, संन्यासी ने वह कार्य नहीं किया ।

लोग कहते हैं- ‘आसाराम बापू जी ने ऐसा-ऐसा चमत्कार कर दिया ।’ अरे, आसाराम बापू नहीं करते, जब हम इस वैदिक मंत्र के साथ एकाकार होकर उसके अर्थ में खो जाते हैं तो परमात्मा हमारा कार्य कर देते हैं और तुमको लगता है कि बापू जी ने किया । यदि कोई व्यक्ति या साधु-संत ऐसा कहे कि यह मैंने किया है तो समझना कि या तो वह देहलोलुप है या अज्ञानी है । सच्चे संत कभी कुछ नहीं करते ।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- ‘ज्ञानी की दृष्टि उस तत्त्व पर है इसलिए वे तत्त्व को सार और सत्य समझते हैं । तत्त्व की सत्ता से जो हो रहा है उसे वे खेल समझते हैं ।

हर मनुष्य अपनी-अपनी दृष्टि से जीता है । संन्यासी की दृष्टि ऐसी परिपक्व हो गयी थी कि गधे में चैतन्य आत्मा देखा तो वास्तव में उसके शरीर में चैतन्य आत्मा आ गया और वह जिंदा हो गया । तुम अपनी दृष्टि को ऐसी ज्ञानमयी होने दो तो फिर सारा जगत तुम्हारे लिए आत्ममय हो जायेगा ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2009, पृष्ठ संख्या 26 अंक 202

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