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गुरुमन्त्रपरित्यागी….


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से
महाराष्ट्र में समर्थ रामदासजी महाराज प्रसिद्ध संत हो गये। वे छत्रपति शिवाजी के गुरु थे। उनके पास भीतर-बाहर दोनों प्रकार का वैभव था। जबकि तुकाराम जी सीधे-सादे, सरल संत थे। उनका नियम था कि कहीं भी कीर्तन करने जाते तो कीर्तन कराने वालों के घर का भी हलवा पूरी आदि कुछ भी नहीं लेते थे। जाने के लिए रथ आदि का उपयोग नहीं करते वरन् पैदल ही जाते थे। वे बड़ा संयमी और तपस्वी जीवन जीते थे।
संत तुकाराम जी की मण्डली के एक शिष्य ने देखा की समर्थ रामदास जी महाराज की मण्डली के लोग बड़े मजे से जीते हैं। वे अच्छे कपड़े पहनते हैं, हलवा-पूरी खाते हैं। समर्थ शिवाजी जैसे राजा के गुरु हैं, अतः उनके पास खूब अमन-चमन है और उनके शिष्यों को भी खूब मान मिलता है। जबकि हमारे गुरुदेव तुकाराम जी के पास तो कुछ भी नहीं है। न हलवा-पूरी, न गादी-तकिये…
संतों के पास सब प्रकार के लोग होते हैं क्योंकि सब संसार से ही तो आते हैं। आश्रम में आने वाले सब अच्छे ही होते हैं क्या ? इसका मतलब सब खराब हैं – ऐसी बात नहीं है और सब दूध के धोये हुए हैं – ऐसी बात भी नहीं है, फिर भी उन लोगों को धन्यवाद है कि वे संत के पास तो आ गये।
कभी-कभी राजसी-तामसी भक्तों को देखकर सात्त्विक भक्तों की श्रद्धा भी डगमगाने लगती है लेकिन उन्हें चाहिए के वे डगमगायें नहीं, वरन् अपने को समझायें-
वैरी भयंकर हैं विषय, कीड़ा न बन तू भोग का।
चंचलपना मन का मिटा, अभ्यास करके योग का।।
यह चित्त होता मुक्त है, सब ब्रह्म है यह जानकर।
कर दरश सबमें ब्रह्म का, सर्वात्म अनुसंधान कर।।
अपने भक्त का विवेक दृढ़ करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता में कहते हैं-
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्।।
‘इस लोक और परलोक के संपूर्ण भोगों में आसक्ति का अभाव और अहंकार का भी अभाव, जन्म-मृत्यु, जरा और रोग आदि में दुःख और दोषों का बार-बार विचार करना चाहिए।’ (गीताः 13.8)
‘तुकाराम जी के पास तो कोई सुविधा नहीं है’ –
ऐसा फरियादात्मक चिंतन करते-करते उस शिष्य को समर्थ रामदास की मण्डली के प्रति आकर्षण हुआ और तुकाराम जी का वह शिष्य समर्थ के पास गया और समर्थ को प्रणाम करके उसने कहाः
“महाराज ! हमें अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लीजिये। हम आपकी मण्डली में रहेंगे, कीर्तन आदि करेंगे, सेवा करेंगे।”
समर्थः “तू पहले किसका शिष्य था ?”
“तुकाराम जी महाराज का।”
श्री समर्थ ने सोचा कि ‘जिनकी सत्य में प्रीति है, ऐसे तुकाराम जी जैसे गुरु का त्याग ! आत्म-साक्षात्कारी पुरुष जहाँ हैं वहाँ तो वैकुण्ठ है। ऐसे महापुरुष का त्याग करने की बात इसको कैसे सूझी ?’
समर्थः “तुकाराम जी का शिष्य होते हुए मैं तुझे मंत्र कैसे दे सकता हूँ ? अगर मुझसे मंत्र लेना है, मेरा शिष्य बनना है तो तुकाराम जी की कंठी तुकाराम जी को वापस कर दे और उनका दिया मंत्र भी उन्हें लौटा कर आ।”
समर्थ ने सत्य समझाने के लिए ऐसा कहा था। वह तो खुश हो गया कि ‘मैं अभी तुकाराम जी का त्याग करके आता हूँ और उनका दिया मंत्र और कंठी उनको लौटा देता हूँ।’
‘गुरुभक्तियोग’ में लिखा है कि ‘एक बार सदगुरु करने के बाद उनका कभी भी त्याग नहीं करना चाहिए। ऐसा करे, इससे तो अच्छा है कि पहले से ही गुरु न करे, चौरासी का चक्कर खाता रहे। जन्म-मृत्यु में भटकता रहे।’
‘श्रीगुरुगीता’ में भगवान शिवजी कहते हैं-
गुरुत्यागाद् भवेन्मृत्युर्मन्त्रत्यागाद्दरिद्रता।
गुरुमन्त्रपरित्यागी रौरवं नरकं व्रजेत्।।
गुरु का त्याग करने से आध्यात्मिक मृत्यु होती है। मंत्र को छोड़ने से दरिद्रता आती है और गुरु तथा मंत्र दोनों का त्याग करने से रौरव नरक मिलता है।
वह शिष्य तुकाराम जी के पास जाकर बोलाः “महाराज ! अब मुझे आपका शिष्य नहीं रहना है।”
तुकाराम जी ने कहाः “मैंने तुझे शिष्य बनाया ही कब था ? तू अपने-आप बना था, भाई ! मैंने कहाँ तुझे चिट्ठी लिखी थी की आ जा। मैंने कहाँ तुझे जबरदस्ती कंठी पहनायी थी। कंठी तो तूने स्वयं अपने हाथों से बाँधी थी और मेरे गुरु ने जो मंत्र दिया है, वही मैंने तुझे सुना दिया था। इसमें मेरा तो कुछ भी नहीं है।”
कैसी निरभिमानिता ! कैसी करुणा !
“महाराज ! मुझे आपकी कंठी नहीं चाहिए।”
तुकाराम जीः “नहीं चाहिए तो तोड़ दे।”
उसने तुरंत कंठी तोड़ दी और बोलाः
“महाराज ! अब अपना मंत्र भी ले लो।”
तुकाराम जी “मंत्र मेरा नहीं है, मेरे गुरुदेव का मंत्र है। ‘आपा जी चैतन्य’ का प्रसाद है। मेरा तो कुछ नहीं है।”
“मुझे नहीं चाहिए आपका मंत्र, मुझे तो दूसरे गुरु करने हैं।”
तुकाराम जीः “मेरे सामने मंत्र बोलकर पत्थर पर थूक दे। मंत्र का त्याग हो जायेगा।”
उस अभागे ने गुरुमंत्र त्यागने के लिए मंत्र बोलकर पत्थर पर थूक दिया। इतने में क्या देखता है वह मंत्र पत्थर पर अंकित हो गया !
शिष्य के कल्याण हेतु तुकाराम जी के संकल्प ने काम किया तभी मंत्र पत्थर पर अंकित हुआ। कैसी होती है महापुरुषों की करुणा-कृपा ! शिष्य के कल्याण के लिए वे कैसी-कैसी युक्तियाँ आजमाते हैं ! फिर भी अभागे शिष्य समझ नहीं पाते।
वह समर्थ के पास गया और बोलाः “महाराज ! मैं मंत्र का त्याग करके आया और कंठी भी तोड़ दी। अब आप मुझे अपना शिष्य बना लीजिये।”
समर्थ ने पूछाः “मंत्र का त्याग किया उस समय क्या हुआ था ?”
“मंत्र पत्थर पर अंकित हो गया था।”
समर्थः “ऐसे महान गुरुदेव ! जिनका दिया हुआ मंत्र पत्थर पर अंकित हो गया ! पत्थर पर भी उनके दिये मंत्र का प्रभाव पड़ा किन्तु कमबख़्त ! तुझ पर कुछ असर नहीं हुआ तो मेरे मंत्र का भी क्या असर होगा ? तू तो पत्थर से भी गया-बीता है तो इधर क्या करेगा ? हलवा-पूरी खाने के लिए साधु बना है क्या ?”
“मैंने अपने गुरु का त्याग कर दिया और आपने भी मुझे लटकता रखा ?”
समर्थः “तेरे जैसे तो लटकते ही रहेंगे। तेरे लक्षण ही ऐसे हैं। तेरे जैसे गुरुद्रोही को मैं शिष्य बनाऊँगा क्या ? मुझे कहाँ अपराधी बनना है ?”
आत्मज्ञानी सदगुरु का दिया हुआ मंत्र त्यागने से मनुष्य दरिद्र हो जाता है। मंत्र त्यागने से मनुष्य हृदय का अंधा हो जाता है।
कहते हैं- ‘गुरु ने तुमको जो मार्ग बताया, उस मार्ग पर तुम बीसों साल चले, साधना की, फिर गुरु में अश्रद्धा और दोषदर्शन होने लगा तो वहीं पहुँच जाओगे, जहाँ से चलना शुरु किया था। बीसों साल की कमाई का नाश हो जायेगा।’
“महाराज ! मुझे स्वीकार करने की कृपा करें।”
समर्थः “नहीं, यह संभव नहीं है।”
वह शिष्य बहुत रोया-गिड़गिड़ाया। तब करुणा करके समर्थ ने कहाः “तुकाराम जी उदारात्मा हैं। उनसे जाकर मेरी तरफ से प्रार्थना करना कि ‘समर्थ ने प्रणाम कहा है’ और मुझे क्षमा करें।”
वह गया तुकाराम जी के पास और प्रार्थना करने लगा। तुकाराम जी ने सोचा कि समर्थ का भेजा हुआ है तो मैं कैसे इनकार करूँ ? बोलेः
“अच्छा, भाई ! तू आया था, तूने कंठी तोड़ दी। अब फिर से तू ही आया है तो फिर से दे देते हैं। समर्थ ने भेजा है तो चलो ठीक है। समर्थ की जय हो।”
संत-महापुरुष उदारात्मा होते हैं। ऐसे भटके हुए लोगों को थोड़ा सबक सिखाकर ठिकाने लगा देते है। साधक को गिरने से बचा लेते हैं। समर्थ ने समझाया तो समझ गया क्योंकि थोड़ी बहुत भक्ति की हुई थी। आखिर तो तुकाराम जी का शिष्य था, उसमें कुछ सत्त्व तो था ही।
जिसने जीवन में सत्त्व नहीं होता, गुरु का आदर नहीं होता वह कितना भी संसार की चीजों से बचा हुआ दिखे, फिर भी उसका कोई बचाव नहीं होता। उसको यमदूत घसीटकर ले जाते हैं फिर कभी बैल बनता है, कभी पेड़ बनता है, कभी शूकर-कूकर बनता है… बेचारा जीव न जाने कितने-कितने धक्के खाता है और जिसके जीवन में सत्त्व होता है, जो गुरुआज्ञा में चलता है वह फिसलते-फिसलते भी बच जाता है।
जिसे सदगुरु मिल जाते हैं और जो सदगुरु के चरणों में अपना जीवन न्योछावर कर देता है, वह चौरासी के चक्कर से अवश्य बच जाता है।
अनेक कष्ट सहकर भी यदि सदगुरु की प्राप्ति होती है तो सौदा सस्ता है। कबीर जी ने कहा भी हैः
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
सिर दीजे सदगुरु मिले, तो भी सस्ता जाना।।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2002, अंक 115, पृष्ठ संख्या 20-22
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गीता-ज्ञान से विमुखता


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से
किसी का भगवान सातवें अर्श पर रहता है तो किसी का भगवान कहीं और बसता है, लेकिन गीता का भगवान तो जीव को रथ पर बैठाता है और खुद सारथी होकर रथ चलाता है। वह खुद छोटा होकर, सारथी होकर भी जीव को शिव का साक्षात्कार कराने में संकोच नहीं करता है। कैसा अनूठा है गीता का भगवान !
उस गीताकार श्रीकृष्ण का जन्म भी कैसी विषम परिस्थितियों में हुआ है ! माता-पिता कारागार में बंद हैं… जन्मते ही मथुरा से गोकुल ले जाये गये…. छठे दिन ही पूतना विषपान कराने आ गयी…. फिर कभी अघासुर तो कभी बकासुर… कभी धेनुकासुर तो कभी कोई और…. यहाँ तक कि किशोरावस्था में ही मामा कंस को स्वधाम पहुँचाना पड़ा ! फिर भी जब देखो, गीता का भगवान सदा मुस्कराता ही मिला….. युद्ध के मैदान में भी हँसते-हँसते अर्जुन को गीता का ज्ञान दे दिया !
गीताकार श्रीकृष्ण ने ऐसा नहीं कहा क ‘इतने व्रत करो, इतने तप करो, इतने नियम करो फिर मैं मिलूँगा।’ उन्होंने तो कहा हैः
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि।।
‘यदि तू अन्य सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है, तो भी तू ज्ञानरूप नौका द्वारा निःसंदेह संपूर्ण पाप-समुद्र से भलीभाँति तर जायेगा।’ (गीताः 4.36)
ऐसा दिव्य ज्ञान देने वाली श्रीमद्भगवद्गीता का प्राकट्य जहाँ हुआ है, उसी देश के लोग अगर आलसी-प्रमादी, निस्तेज और भयभीत हो जायें तो उसके लिए जिम्मेदार है – लोगों की गीता के ज्ञान से विमुखता।
गीता का ज्ञान इतना अदभुत है कि उसमें जीवन की हर समस्या का समाधान मिल सकता है। फिर भी आज के मनुष्य के जीवन में देखो तो उसका जरा-जरा-सी बात में चिढ़ जाना, दुःखी-भयभीत हो जाना, ईर्ष्या-द्वेष और अशांति की अग्नि में जलना ही नज़र आता है।
उसे कोई अपमान के दो वचन सुना देता है तो वह आगबबूला हो जाता है और कोई प्रशंसा के दो शब्द सुना देता है तो वह प्रशंसक का पिट्ठू बन जाता है। अब इतना तो लालिया और कालिया (कुत्ते) भी जानते हैं। कुत्ते भी जलेबी देखकर पूँछ हिलाने लग जाते हैं और डंडा देखकर पूँछ दबाकर भाग जाते हैं। अगर हममें भी केवल इतनी ही अक्ल है तो मनुष्य-जन्म पाने से क्या लाभ ? पढ़ाई-लिखाई करने से हमें क्या लाभ ? हम भी द्विपाद पशु ही हो गये…
यह सब गीता के ज्ञान से विमुखता का ही परिणाम है। अगर हम गीता के ज्ञान के सम्मुख हो जायें, गीता के ज्ञान को समझकर आचरण में लायें तो फिर हमारा द्विपाद पशु कहलाने का दुर्भाग्य न रहेगा।
भगवान कहते हैं चाहे तुमने कैसी भी कर्म किये हों या तुम किसी से ठगे गये हो अथवा तुम चिंतित और परेशान हो किंतु यदि तुम गीता की शरण में आ जाओ तो गीता का ज्ञान तुम्हें परम सुख का राजमार्ग दिखा देगा।
जैसे, तुम भारत से अमेरिका जाना चाहो, लेकिन जाओ बैलगाड़ी से तो कब पहुँचोगे ? इसी प्रकार तुम पाना तो चाहते हो परम सुख और पकड़ते हो नश्वर संसार के बैलगाड़ी रूपी साधन, तो कब पहुँचोगे ? किंतु एक बार ब्रह्मज्ञानरूपी हवाई जहाज में बैठ जाओ तो वह तुम्हें परम सुख के द्वार तक अवश्य पहुँचा देगा।
गीता का ज्ञान ऐसा ही हवाई जहाज है और भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के द्वारा उस ब्रह्मज्ञान को अत्यंत सहज-सरल रूप से समझा भी दिया है। फिर भी उसे पाने में कोई विघ्न आये तो उसके निवारण का तरीका भी भगवान बताते हैं। भगवान कहते हैं।
“केवल तुम्हें गाँठ बाँधनी है कि अब हमें संसार में पच-पचकर मरना नहीं है। हमें ईश्वर के मार्ग पर ही चलना है और आत्मज्ञान पाकर ही रहना है। अब हमें शहंशाह होकर जीना है। शहंशाह होकर परम शहंशाह से मिलना है।”
कोई राजा से मिलने जाता है तो भिखमंगे के कपड़े पहन कर नहीं जाता, अच्छे कपड़े पहन कर ही जाता है। तुम भी किसी विशेष व्यक्ति से मिलने जाते हो तो कपड़े ठीक-ठाक करके ही जाते हो, मूँछों पर ताव देते हो और जाते-जाते भी दर्पण में मुख देख लेते हो।
जब किसी विशेष व्यक्ति से मिलने जाते हो तब भी सज-धजकर जाते हो तो उन शहंशाहों-के-शहंशाह, अखिल ब्रह्मांडनायक के पास वासना से दीन-हीन होकर, चिंता मुसीबतों से लाचार और भयभीत होकर क्या जाना ? शहंशाह होकर जाओ, भैया ! और शहंशाह होकर जाने का उपाय मिलता है – गीता के ज्ञान से।
जब तक गीता के ज्ञान से विमुखता है, तब तक तुम संसार के कामों में उलझते रहते हो, भटकते रहते हो। किंतु जब गीता का अमृतमय ज्ञान मिल जाता है, तब सारी भटकान मिटाने की दिशा मिल जाती है, ब्रह्मज्ञान को पाने की युक्ति मिल जाती है और वह युक्ति मुक्ति के मंगलमय द्वारा खोल देती है।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2002, पृष्ठ संख्या 6,7 अंक 115
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श्रद्धा और अश्रद्धा


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

जैसे लोहे और अग्नि के संयोग से तमाम प्रकार के औजार बन जाते हैं, ऐसे ही श्रद्धा और एकाग्रता से मानसिक योग्यताएँ विकसित होती हैं, आध्यात्मिक अनुभूतियाँ होती हैं तथा सभी प्रकार की सफलताएँ और सिद्धियाँ मिलती हैं।

श्रद्धा सही होती है तो सही परिणाम आता है और गलत हो तो गलत परिणाम आता है। किसी को रोग तो थोड़ा-सा होता है लेकिन ‘हाय ! मैं रोगी हूँ…. मैं बीमार हूँ….’ करके गलत श्रद्धा करता है तो उसका रोग बढ़ जाता है। थोड़ी सी मुसीबत होती है और उस पर श्रद्धा करता है तो उसकी श्रद्धा के प्रभाव से मुसीबत बढ़ जाती है।

अगर रोग तथा मुसीबत के वक्त भी सही श्रद्धा करे कि ‘रोग शरीर को होता है और मुसीबत मन की कल्पना है, मैं तो परमात्मा का सनातन सपूत हूँ। रोग-बीमारी मुझे छू नहीं सकती है, मैं इनको देखने वाला, साक्षी अमर द्रष्टा हूँ ॐ… ॐ…ॐ… ‘ तो रोग का प्रभाव भी कम होता है और रोग जल्दी ठीक हो जाता है।

श्रद्धालु, संयमी जितना स्वस्थ जीवन गुजार सकता है, उतना अश्रद्धालु-असंयमी नहीं गुजार सकता। भक्त जितना सुख-दुःख में सम रह सकता है, उतना अभक्त नहीं रह सकता। श्रद्धालु थोड़ा सा पत्रं-पुष्प-फलं-तोयं देकर भ जो लाभ पा सकता है वह श्रद्धाहीन व्यक्ति नहीं पा सकता।

जितने व्यक्ति कथा-सत्संग में आये हैं उतने यदि क्लबों में जायें तो सुखी होने के लिए तरह-तरह के सामान-सुविधा की जरूरत होगी। फिर भी देखो तो सत्यानाश ही हाथ लगता है और यहाँ सत्संग में कोई भी ऐहिक सुविधा नहीं है फिर भी कितना लाभ हो रहा है !

क्लबों में जाकर तामसी आहार, डिस्को आदि करके भी लोग तलाक ले लेते हैं और तलाक की नौबत तक आ जाने वाले भी अगर भगवद्कथा में पहुँच जाते हैं तो वे भी भगवान के रास्ते चल पड़ते हैं।

पति-पत्नी में झगड़ा हो गया। पत्नी ने कहाः “मैं मायके चली जाऊँगी, तब तुम्हें पता चलेगा कि पत्नी का क्या महत्व है ? खाना तैयार मिलता है तभी इतना रुआब मार रहे हो। मैं चली जाऊँगी तो फिर कभी वापस नहीं आऊँगी।”

पतिः “कभी नहीं आयेगी तो दूसरा करेगी क्या ?”

पत्नीः “दूसरा क्यों करूँगी ? मैं तो वृंदावन चली जाऊँगी। मीरा बनूँगी।”

पतिः “जा, जा। तू क्या मीरा बनेगी ? ये मुँह और मसूर की दाल ? मैं ही चला जाऊँगा।”

पत्नीः “तुम चले जाओगे तो क्या करोगे ? दूसरी शादी करोगे ?”

पतिः “शादी क्यों करूँगा ? शादी करके तो देख लिया। एक मुसीबत कम पड़ी क्या, जो फिर दूसरी मुसीबत में पड़ूँगा ? मैं तो साधु बन जाऊँगा।”

पास से एक महात्मा गुजर रहे थे। महात्मा ने देखा कि दोनों लड़ तो रहे हैं किन्तु पति कह रहा है कि मैं साधु बन जाऊँगा और पत्नी कह रही है कि मैं मीरा बन जाऊँगी। दोनों श्रद्धालु हैं। इनमें श्रद्धा का सदगुण है तो क्यों न इनका घर स्वर्ग बना दिया जाय ?

महात्मा अनजान होकर आये और बोलेः

“नारायण हरि…। किस बात की लड़ाई हो रही है ?”

दोनों चुप हो गये। पति ने कहाः

“महाराज ! इस घर में रोज-रोज खटपट होती है इसलिए लगता है संसार में कोई सार नहीं है। मैं अकेला था, तब बड़े मजे में था परन्तु जबसे शादी हुई तबसे सब गड़बड़ हो गयी है। मैं तो अब गंगा-किनारे जाकर साधु बन जाऊँगा।”

पत्नी ने कहाः “महाराज ! मैं भी पहले तो बड़े मजे से रहती थी। जबसे शादी हुई है तबसे सारी खटपट शुरु हो गयी है। मैं तो अब मीरा बन जाऊँगी।”

महात्मा ने कहाः “देख, तुझमें भी श्रद्धा है और इसमें भी है। कोई वृंदावन जाकर मीरा बने, ऐसा आजकल का जमाना नहीं है। अभी तो घर में ही गिरधर गोपाल की मूर्ति बसा ले। अपने पति में ही गिरधर गोपाल की भावना कर। श्रद्धा से उसके लिए भोजन बना और सेवा कर। जो मीरा को वृंदावन में मिला वही तुझे घर बैठे मिल जायेगा।

अरे भैया ! तू गंगा किनारे जाकर साधु बनेगा तो किस सेठ का बढ़िया भंडारा होता है और कौन-सा सेठ बढ़िया दान करता है ? इस झमेले में पड़ेगा। इससे अच्छा है कि तू घर में ही संन्यासी हो जा। आसक्तिरहित होकर सत्कर्म कर और उन सत्कर्मों का फल भी भगवान को अर्पित कर दे। इससे तेरे हृदय में ज्ञान की प्यास जगेगी। ज्ञान की प्यास होगी तो तू ज्ञानी गुरु को खोज लेगा और सदगुरु से सत्संग सुनकर कभी-कभार एकांत अन्तर्मुखता की यात्रा करके परमात्मा को पा लेगा।

दोनों में श्रद्धा का सदगुण तो है ही। फिर क्यों ऐसा सोचते हो कि मैं वृंदावन चली जाऊँगी या मैं गंगा किनारे चला जाऊँगा ? तुम तो अपने घर को ही नंदनवन बना सकते हो।”

महात्मा की बात का दोनों पर बड़ा प्रभाव पड़ा। उनका झगड़ा भक्ति में बदल गया और दोनों महात्मा को प्रणाम करते हुए बोलेः

“महाराज ! हमने ऐसा कौन-सा पुण्य किया है कि आप जैसे ज्ञानवान महापुरुष के घर बैठे ही दर्शन हो गये ? महाराज ! आइये, विराजिये। कुछ प्रसाद पाकर जाइये।”

अगर किसी में श्रद्धा है और श्रद्धा सही जगह पर है तो वह देर-सवेर परमात्म-ज्ञान तक  पहुँचा ही देती है। श्रद्धापूर्वक किया गया थोड़ा सा भी सत्कार्य बड़ा फल देता है और अश्रद्धापूर्वक किया गया हवन, तप और दान भी व्यर्थ हो जाता है।

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।

असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह।।

‘हे अर्जुन ! बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान तथा तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ शुभ कर्म है – वह समस्त ‘असत्’ कहा जाता है। इसलिए वह न तो इस लोक में लाभदायक है और न मरने के बाद ही।’ (गीताः 12.27)

तप क्या है ? पीडोत् भवति सिद्धयः।

केवल जंगल में जाकर देह को सुखाना ही तप नहीं है वरन् अच्छे काम के लिए कष्ट सहना भी तप है। घर में तो एयरकंडीशनर है लेकिन सत्संग में गये तो की छोटी-मोटी असुविधाएँ सहनी पड़ती हैं, जमीन पर बैठना पड़ता है, गर्मी सहनी पड़ती है… ये सारे कष्ट सहने पड़ते हैं किन्तु किसके नाते ? ईश्वर के नाते सहन करते हैं तो तप का फल मिल जाता है। उपवास किया, भूख सहन की तो हो गया तप।

ऐसे ही केवल अग्नि में आहूति देना ही यज्ञ नहीं है वरन् भूखे को रोटी देना, प्यासे को पानी पिलाना, हारे को हिम्मत देना, निगुरे को गुरु के पास ले जाना, अभक्त को भक्ति के रास्ते ले चलना भी यज्ञ है।

‘क्या करें, माँ के पैर दबाने पड़ते हैं।’ इस भाव से माँ की सेवा की तो यह यज्ञ नहीं है। ‘माँ के अन्दर मेरे भगवान हैं’ – इस भाव से माँ की सेवा की तो यह यज्ञ हो जायेगा।

अगर कोई सकाम भाव से दान, तप और यज्ञ करता है तो उसे इहलोक और परलोक में सुख, सफलता और वैभव मिलता है परन्तु कोई अश्रद्धा से कर्म करता है तो उसे न यहाँ फल मिलता है और न ही परलोक में फल मिलता है। किंतु यदि कोई निष्काम भाव से श्रद्धापूर्वक कर्ण करता है तो उसका अंतःकरण शुद्ध होता है और परमात्मा को पाने की प्यास बढ़ती है। परमात्म-प्राप्ति की प्यास सत्संग में ले जाती है और वह देर-सवेर परमात्मा को पाने में भी कामयाबी दिला देती है।

सनत्कुमार जी कहते हैं-

श्रद्धापूर्वाः सर्वधर्मा मनोरथफलप्रदाः।

श्रद्धया साध्यते सर्वं श्रद्धया तुष्यते हरिः।।

‘श्रद्धापूर्वक आचरण में लाये हुए ही सब धर्म मनोवांछित फल देने वाले होते हैं। श्रद्धा से सब कुछ सिद्ध होता है और श्रद्धा से ही भगवान श्रीहरि संतुष्ट होते हैं।

श्रद्धा एक ऐसा सदगुण है कि वह जिसके हृदय में रहती है वह रसमय हो जाता है। उसकी निराशा-हताशा, पलायनवादिता नष्ट हो जाती है। श्रद्धा अंतःकरण में रस पैदा कर देती है और हारे हुए को हिम्मत दे देती है।

मरीज में भी अगर अपने चिकित्सक के प्रति श्रद्धा होती है कि ‘इनके द्वारा मैं ठीक हो जाऊँगा’ तभी वह ठीक हो पाता है। अगर मरीज के मन में होता है कि ‘मैं ठीक नहीं हो सकता’ तब चिकित्सक भी उसे ठीक नहीं कर पाता है। इसी प्रकार जिनका लक्ष्य पैसा लूटना है, आडंबर से रोगों की लंबी-चौड़ी फाईल बनाकर प्रभावित करना है – ऐसे मरीजों के शोषक और आडंबर करने वाले चिकित्सक उतने सफल नहीं होते, जितने मरीजों का हित चाहने वाले मरीजों में श्रद्धा संपादन करके उन्हें ठीक करने में सफल होते हैं।

भगवान पर, भगवत्प्राप्त महापुरुषों पर, शास्त्र पर, गुरुमंत्र पर अपने-आप पर श्रद्धा परम सुख पाने की अमोघ कुंजियाँ हैं।

अगर अपने-आप पर श्रद्धा नहीं है कि ‘मैं ठीक नहीं हो सकता… मैं कुछ नहीं कर सकता… मेरा कोई नहीं है….’ तो योग्यता होते हुए भी, मददगार होते हुए भी वह कुछ नहीं कर पायेगा। संशयात्मा विनश्यति….. जिसको संशय बना रहता है समझो वह गया काम से।

नेपोलियन बोनापार्ट सेना में भर्ती होने के लिए गया। भर्ती करने वाले अधिकारी ने कहाः

“फलानी जगह पर शत्रुओं की छावनी में जाना है और वहाँ के गुप्त रहस्य लेकर आना है। आधी रात का समय है, बरसात और आँधी भी चल रही है। पगडंडी पानी से भर गयी होगी। क्या तुम यह काम कर सकते हो ?”

नेपोलियनः “क्यों नहीं?”

अधिकारीः “रास्ता नहीं मिला तो ?”

नेपोलियनः “सर ! आप चिंता न करें। अगर रास्ता नहीं मिला तो मैं अपना रास्ता स्वयं बनाऊँगा। मैं अपना काम करके ही आऊँगा।”

नेपोलियन की अपने-आप पर श्रद्धा थी तो वह ऐहिक जगत में प्रसिद्ध हो गया।

ऐसे ही लिप्टन नामक लड़के को कोई काम धंधा नहीं मिल रहा था। वह एक होटल में नौकरी खोजने गया।

होटलवाले ने कहाः “मेरी होटल चलती ही नहीं है, तुझे नौकरी पर क्या रखूँ। फिर भी तू गरीब है। नाश्ता वगैरह कर ले और कोई ग्राहक हो तो यहाँ बुला ला।”

लिप्टनः “मैं पहले ग्राहक लेकर आता हूँ। वह जहाज आया है।”

होटलवालाः “पास में भी एक होटल है। सब उसी होटल में चले जायेंगे, यहाँ कोई नहीं आयेगा।”

लिप्टनः “आप चिन्ता न करें। मैं ग्राहकों को लेकर आता हूँ, बाद में नाश्ता करूँगा।”

लिप्टन गया और कई ग्राहकों को लेकर आ गया। फिर उसी होटल में नौकरी करने लगा और धीरे-धीरे उस होटल का मैनेजर बन गया। बाद में उसने चाय का व्यापार शुरु किया और केवल अपने देश में ही नहीं, वरन् विदेशों में भी उसके नाम की चाय बिकने लगी। भारत में भी ‘लिप्टन चाय’ का नाम लोग जानते हैं।

कहाँ तो एक छोटा-सा गरीब लड़का, जो नौकरी के लिए भटक रहा था और कहाँ लिप्टन या कम्पनी का मालिक बन गया।

उसको तो पता भी नहीं होगा कि बापू जी मेरी बात कथा में करेंगे परन्तु उसे अपने-आप पर श्रद्धा थी। इसलिए वह सफल व्यापारी बन पाया। अगर उसकी भगवान पर श्रद्धा होती और भक्ति के रास्ते पर तत्परतापूर्वक चलता तो भगवान को पाने में भी सफल हो जाता।

श्रद्धा के बल पर ही मीरा, शबरी, ध्रुव, प्रह्लाद, धन्ना जाट, नामदेव आदि ने परमेश्वर को पा लिया था। एकलव्य की श्रद्धा दृढ़ थी तो गुरु द्रोण की मूर्ति के आगे धनुर्विद्या सीखते-सीखते इतना निपुण हो गया कि अर्जुन तक को उसकी धनुर्विद्या देखकर दाँतों तले उँगली दबानी पड़ी ! जहाँ चाह वहाँ  राह…

श्रद्धा यदि भगवान में होगी तो बुद्धि राग-द्वेष से तपेगी नहीं, जलेगी नहीं, ‘चलो, भगवान की मर्जी !’ – ऐसा सोचकर श्रद्धालु आदमी शांति पा लेता है किन्तु श्रद्धाहीन व्यक्ति ‘उसने ऐसा क्यों कहा ? इसने ऐसा क्यों किया ?’ ऐसा करके बात-बात में अशांत हो जाता है।

किसी ने कहा-तो-कहा परन्तु तुम क्यों उस बात को सोचकर पच मरते हो ? ‘उसने ऐसा क्यों कहा ? मौका मिलेगा तो बदला लूँगा।’ बदला लेने गये और हो गयी पिटाई तो बदला…. और अगर बदला लेकर आया, किसी का सिर फोड़कर आया तो फिर खुद ही  भागता फिरेगा।

जहाँ प्रेम होता है, वहाँ मन लगता है। जिस वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति को प्रेम करते हो तो वहाँ मन बार-बार जाता है। प्रेमास्पद में मन जाता है और श्रद्धेय में बुद्धि जाती है।

भगवान में, भगवत्प्राप्त महापुरुषों में श्रद्धा करोगे तो बुद्धि वहाँ जायेगी। आपका ज्ञान बढ़ेगा, बुद्धि विकसित होगी। बुद्धि के विकास से भगवान का ज्ञान पाने में मदद मिलेगी। भगवान का पूर्ण ज्ञान होगा तो निर्भय हो जाओगे, सारे दुःखों का अंत हो जायेगा और आप परम सुखी सच्चिदानंद-स्वरूप हो जाओगे, जो आप वास्तव में हो।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2002, पृष्ठ संख्या 10-13, अंक 114

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