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तीर्थ कैसे बने ?


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

तीर्थ कैसे बने ? भगवान या भगवान के प्यारों के निवास के कारण ही तीर्थ बने हैं। जहाँ भगवान या भगवान के प्यारे संत निवास करते हैं वह भूमि तीर्थ हो जाती है।

राजा विक्रमादित्य से पूर्व अयोध्या के तीर्थ का पता नहीं था। राजा विक्रमादित्य युद्ध करके लौट रहे थे तब किसी योगी ने उन्हें बतायाः ‘यह इलाका भगवान श्रीराम के पदचिन्हों का है। विक्रमादित्य ! तुम धर्मात्मा हो, तनिक शांत होकर यहाँ बैठो। जहाँ-जहाँ तुम्हें स्फुरणा हो, वहीं-वहीं भगवान का प्रागट्य स्थल, भगवान का लीलास्थल, भगवान की पाठशाला आदि मिलेगी।’

तब विक्रमादित्य ने खोजा कि कौन सी जगह पर श्रीराम जी अवतरित हुए, किन स्थलों पर लीलाएँ की। उसके बाद अयोध्या के तीर्थ का निर्माण हुआ।

चैतन्य महाप्रभु के पहले वृन्दावन के तीर्थ का लोगों को विशेष पता नहीं था। गौरांग ने अपने शिष्यों सनातन एवं रूप गोसाईं को वहाँ भेजा। उनका हृदय शुद्ध था। उनके हृदय में जहाँ-जहाँ स्फुरण हुआ कि ‘यहाँ भगवान ने चीरहरण किया था, यहाँ मिट्टी खायी थी, यहाँ ऊखल-बंधन हुआ था, यहाँ रास हुआ था…।’ वहीं-वहीं उन तीर्थों की स्थापना हुई।

वल्लभाचार्य जी बताते हैं कि वृंदावन परसोली ग्राम के करीब था। उनका कहना भी सही है एवं चैतन्य महाप्रभु के शिष्यों का कहना भी सही है क्योंकि किसी युग में वृंदावन परसोली गाँव में था और इस युग का वृंदावन अभी जहाँ कहा गया है, वहाँ है।

आद्यशंकराचार्यजी से पहले बद्रीनाथ जी की मूर्ति का पता नहीं था। पंडितों ने उनसे प्रार्थना की तब शंकराचार्य जी ने नारद कुण्ड में गोता मारकर बद्रीनाथ जी की मूर्ति निकाली। तब बद्रीनाथजी के तीर्थ की स्थापना हुई।

जितने भी तीर्थ हैं वे सब उन्हीं महापुरुषों के तप से, प्रेरणा से बने हैं, जिन्होंने आत्मतीर्थ में गोता मारा है। इसीलिए जैनधर्म उन्हें तीर्थंकर कहता है।

आप भी अपने घर में एकाध कमरे को तीर्थ बना दें। जहाँ हरि का चिंतन होता है, जहाँ  परमात्मा का जप ध्यान होता है वह भूमि तीर्थ बन जाती है। जो हृदय हरि का चिंतन करता है वह हृदय तीर्थ हो जाता है। ऐसा तीर्थरूपी हृदय वाला साधक जिस घर में, जिस कमरे में ध्यान-भजन करता है, वह घर, वह कमरा भी तीर्थत्व को  प्राप्त हो जाता है। अतः मैं भी आपको यही शुभकामना एवं सत्प्रेरणा देना चाहता हूँ कि आप भी संतों की सीख मानकर अपने हृदयों तीर्थ बना दीजिये।

एक बार वैष्णवों और शैवों में झगड़ा हो गया। शैवों ने कहाः ‘भगवान शंकर कैलासपति हैं और यहाँ से कैलास जाया जाता है। इसीलिए इस जगह का नाम है – हरद्वार, हर+द्वार अर्थात् महादेव का द्वार।

वैष्णवों ने कहाः पागल हुए हो ? भगवान बद्रीनाथ के मंदिर में जाना हो तो यहाँ से जाया जाता है। इसलिए इस जगह का नाम है – हरिद्वार, हरि+द्वार अर्थात् विष्णु का द्वार।’

शैवः ‘चुप करो। हरिद्वार मत कहो, हरद्वार कहो।’

कभी-कभी भक्तों में अड़ियल दुनियादार भी घुस जाते हैं। किसी ने शैवों को भड़काया और किसी ने वैष्णवों को भड़काया। दोनों में झगड़ा हो गया। आखिर मुकद्दमा चला कि सरकार निर्णय करे कि ‘हरिद्वार’ है कि ‘हरद्वार’ है ?

लोगों को हुआ कि पता नहीं ब्रिटिश सरकार हिन्दू धर्म के तीर्थ के लिए क्या निर्णय करेगी ?

कई पेशियाँ पड़ीं। आखिर में अंग्रेज न्यायाधीश ने निर्णय दियाः ‘हरिद्वार भी नहीं और हरद्वार भी नहीं। यहाँ हिन्दू लोग अपने माता-पिता की हड्डियाँ डालते हैं इसलिए इसका नाम ‘हड्डीद्वार’ होगा।

यह नाम और निर्णय सरकारी फाइलों में धरा रह गया, सड़ रहा है। पक्षपाती अंग्रेज न्यायाधीश का काला मुँह करके यह आदेश फाइल में ही धरा रह गया। अभी भी लोग ‘हड्डीद्वार’ नहीं हरिद्वार या हरद्वार की कहते हैं।

कुछ बाह्यतीर्थ हैं, कुछ आभ्यांतर तीर्थ हैं। जैसे गंगाजी, यमुनाजी, गोदावरी जी आदि के तट पर स्थित जो तीर्थ हैं वे धरती के उन स्थानों पर हैं, जहाँ विशेष चैतन्य के प्रभाव के परमाणु हैं। जैसे, शरीर में कुछ अंग मलिन होते हैं और कुछ अंग उत्तम होते हैं। नीचे के अंगों पर या पैर पर हाथ लग जाये तो हाथ धोना चाहिए लेकिन ललाट पर उँगली लग गयी तो हाथ धोने की जरूरत नहीं पड़ती है। ऐसे ही पृथ्वीरूपी शरीर पर कुछ विशेष चैतन्य के प्रभाव के परमाणु हैं वे बाह्यतीर्थ कहलाते हैं।

आत्मज्ञानरूपी रस और आत्ममाधुर्यरूपी भाव में जो नहाते हैं वे तीर्थों को तीर्थत्व देने वाले होते हैं।

तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि सच्छास्त्रीकुर्वन्ति शास्त्राणि।

जिन्होंने मन इन्द्रियों पर अनुशासन करके आत्मिक यात्रा की और अंदर का वैदिक अनुभव प्राप्त करके जो कुछ कहा, वही शास्त्र बन गये।

अयोध्या मथुरा माया काशी कांची ह्यवंतिका।

पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः।।

इन सात स्थानों की भूमि में वे विशेष परमाणु हैं। इसीलिए वहाँ जाने वालों को थोड़ा सा ही जप तप करने से आनंद और शांति की प्राप्ति होती है। ऐसे ही जहाँ जप-तप ध्यान भजन होता है और आत्मतीर्थ में नहाये हुए कोई महापुरुष मिलते हैं तो ऐसे स्थल अंतर के तीर्थ हैं, आभ्यांतर तीर्थ हैं।

कुछ स्थावर तीर्थ होते हैं, कुछ जंगम तीर्थ होते हैं। जैसे, गंगा, यमुना ये स्थावर तीर्थ हैं। ऐसे पुरुष जो आत्मगंगा, आत्मतीर्थ में नहाते हैं जंगम तीर्थ हैं, चलते फिरते तीर्थ हैं।

कुछ लोग मानते हैं कि ‘चलो, कुंभ में गये, नहाये पुण्य हुआ… तीर्थ में गये, बढ़िया हो गया….’ यह सब ठीक है। लेकिन यदि आत्मतीर्थ में नहीं आये तो इन तीर्थों के आस-पास रहने  वालों के हाल जरा देख लो। तीर्थ में जाना पुण्यकर्म तो है लेकिन जो आत्मतीर्थ में नहीं नहाते हैं, उन्हें शास्त्र सावधान करते हैं। शास्त्र कहते हैं-

ज्ञानो अमृतो न तृप्तस्य कृतकृतश्च योगिनाः।

नैवस्ति किंचित् कर्त्तव्यस्ति चेतसा तत्परितः।।

‘जो पुरुष ज्ञानरूपी अमृत से तृप्त हैं और कृतकृत्य हैं उन्हें किंचित भी कर्त्तव्य नहीं है। यदि वे अपने में कर्त्तव्य मानते हैं तो वे तत्त्ववेत्ता नहीं हैं।’

इदं तीर्थं इदं तीर्थम् भ्राम्येति तामसाजनाः।

आत्मतीर्थम् न जानन्ति कथं मोक्ष जितयेः।।

‘कपिल गीता’ का यह श्लोक एकदम ऊँचा, तात्त्विक ज्ञान की तरफ संकेत करने  वाला है। ‘इस तीर्थ में चलो, उस तीर्थ में चलो….’ ऐसा तामसी और राजसी सुख में उलझे हुए ल ग ही बोलते हैं। इन तीर्थों में, आत्मतीर्थ में आने के लिए ही जाया जाता है।

कभी जाये केदार कभी जाये मक्के।

आत्मतीर्थ में नहीं आया तो खा ले दर-दर के धक्के।।

इदं तीर्थं इदं तीर्थं…. ‘यह तीर्थ है, वह तीर्थ है’ – ऐसा करके अज्ञानी जीव घूमते-फिरते रहते हैं क्योंकि वे आत्मतीर्थ को नहीं जानते हैं।

जिस पुरुष की अपने आत्मा में ही प्रीति है और जो अपने आत्मा में ही तृप्त हैं, संतुष्ट हैं, उनके लिए कोई कर्त्तव्य नहीं है।

लोग मृत्यु के समय काशी जाना पसंद करते हैं लेकिन आत्मतीर्थ में पहुँचे हुए कबीरजी ने कहाः

“ऐसा कहा जाता है कि मगहर में मरने वाला सुअर बनता। क्या उस स्थान का इतना प्रभाव है कि वह मेरे आत्मा-परमात्मा के आत्यंतिक सुख, आत्मज्ञान को छीन लेगा ? नहीं छीन सकता।”

कबीर जी मरने के लिए मगहर में गये। कबीर जी जैसा दृढ़ बोध जिनको हो जाता है वे ही तृप्त रहते हैं। बाकी के लोग तो कहते हैं- ‘मुझे तीर्थ में ले जाओ, मुझे गंगाजल पिलाओ।’ ऐसा कहना ठीक है, उचित है, लेकिन जिनको ब्रह्मज्ञान हो गया है वे गंगाजल पीयें यह कोई जरूरी नहीं है। वे तो जिस जल को छू दें, वही गंगाजल है और जहाँ चरण रख दें वहीं तीर्थ हैं। आत्मतीर्थ की ऐसी दिव्य महिमा है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2002, पृष्ठ संख्या 15,16 अंक 110

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जीवनी शक्ति


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

हमारे स्वास्थ्य का आधार है – जीवनी शक्ति (वाईटल एनर्जी)। यदि हमारी जीवनी शक्ति ठीक है तो हम रोगमुक्त रह सकते हैं। अगर जीवनी शक्ति दुर्बल है तो रोगों का आक्रमण होता है और जीवनी शक्ति नष्ट होने से मृत्यु आ जाती है।

जीवनी शक्ति के तीन प्रमुख कार्य हैं-

शरीर का पोषण, निर्माण एवं विकास करना।

विजातीय द्रव्यों को बाहर निकालना।

शरीर की मरम्मत करना।

शरीर में उत्पन्न होने वाले मल-मूत्र, पसीना, कफ आदि का पूर्ण विकास न होने पर, उन विजातीय पदार्थों के शरीर में ही जमा रहने पर रोग उत्पन्न होते हैं।

इन विजातीय पदार्थों के रक्त में मिलने से बुखार, हृदयरोग एवं चर्मरोग उत्पन्न होते हैं। आँतों में जमा होने पर कब्ज, गैस, दस्त-पेचिश, बवासीर, भगंदर, हर्निया एवं एपेण्डीसाईटीस को जन्म देते हैं। मस्तिष्क पर उनका प्रभाव पड़ने पर सिरदर्द, अनिद्रा, मिर्गी व पागलपन आदि उत्पन्न होते हैं। गुर्दों में प्रभाव पड़ने से पथरी आदि की सम्भावना बढ़ जाती है। फेफड़ों में उन विजातीय पदार्थों के जमा होने पर सर्दी, खाँसी, दमा, न्यूमोनिया, क्षय एवं कैंसर की सम्भावना रहती है।

मानसिक तनाव, चिंता, क्रोध, दुःख, आवेश, भावुकता तथा अधीरता आदि के कारण हृदय, मस्तिष्क एवं स्नायु के रोग होते हैं।

जीवनी शक्ति दुर्बल होने के पाँच मुख्य कारण हैं-

सामर्थ्य से अधिक शारीरिक तथा मानसिक कार्य करना एवं आवश्यक विश्राम न लेना।

भय, चिंता, क्रोध आदि के कारण शरीर व मन को तनाव में रखना।

पौष्टिक आहार का अभाव या आवश्यकता से अधिक खाना। नशीली वस्तुओं एवं गलत आहार का सेवन। रात्रि को देर से भोजन करना व दिन को भोजन करके सोना।

उपवास की महत्ता न समझने से भी जीवनी शक्ति का ह्रास होता है। भविष्य में कभी भी किसी प्रकार की पीड़ा का अनुभव करें तो उपवास करें अथवा रसाहार या फलाहार पर रह कर, जीवनी शक्ति को पाचन कार्य में कम व्यस्त रखकर शरीर की शुद्धि तथा मरम्मत के लिए अवसर देंगे तो तुरंत स्वास्थ्य लाभ होगा।

वीर्यरक्षा (ब्रह्मचर्य) की उपेक्षा करना।

विषैली औषधियों, इंजेक्शनों का प्रयोग तथा ऑपरेशन कराना एवं प्रकृति के स्वास्थ्यवर्धक तत्त्वों से अपने को दूर रखना।

उपरोक्त 5 कारणों को समझकर अपने जीवन में सुधार लाने से हम अपनी जीवनी शक्ति को प्रबल रखकर सदा स्वस्थ रह सकते हैं।

अगर जीवनी शक्ति मजबूत है तो रोग आयेंगे ही नहीं और अगर आयें भी तो टिकेंगे नहीं। जीवनी शक्ति प्राणायाम से बढ़ती है। सूर्य की किरणों में भी रोगप्रतिकारक शक्ति होती है।

सूर्य की किरणों में बैठकर 10 प्राणायाम करें और शवासन में लेट जायें। जहाँ रोग है वहाँ हाथ घुमाकर रोग को मिटाने का संकल्प करें। इससे बड़ा लाभ होता है।

प्राणायाम करने से मनोबल भी बढ़ता है और बुद्धिबल भी बढ़ता है। बहुत से ऐसे रोग होते हैं जिनमें कसरत करना संभव नहीं होता लेकिन प्राणायाम किये जा सकते हैं।

प्राणायाम करने से एक विशेष फायदा यह होता है कि हमारे रोमकूप खुलने लगते हैं। हमारे शरीर में कई हजार रोम छिद्र हैं। उनमें से किसी मनुष्य के 200, किसी के 300 तो किसी-किसी के 500 छिद्र काम करते हैं शेष सब छिद्र बंद पड़े रहते हैं। प्राणायाम से ये बंद छिद्र खुल जाते हैं।

जो लोग प्राणायाम नहीं करते उनके ये छिद्र बंद ही पड़े रहते हैं। इससे उनकी प्राणशक्ति कमजोर हो जाती है और उन बंद छिद्रों में जीवाणु उत्पन्न होते हैं। ज्यों ही रोगप्रतिकारक शक्ति कम होती है वे जीवाणु दमा, टी.बी. आदि बीमारियों का रूप ले लेते हैं। प्राणायाम के अभ्यास से ऐसे कई रोगों के जीवाणु बाहर चले जाते हैं।

प्राणायाम से रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ती है और इस शक्ति से भी कई जीवाणु मर जाते हैं। प्राणायाम करने से विजातीय द्रव्य नष्ट हो जाते हैं और सजातीय द्रव्य बढ़ते हैं। इससे भी कई रोगों से बचाव हो जाता है।

प्राणायाम से वात-पित्त-कफ के दोषों का शमन होता है। अगर प्राण ठीक से चलने लगेंगे तो वात-पित्त-कफ आदि त्रिदोषों में जो गड़बड़ है, वह गड़बड़ी ठीक होने लगेगी।

वात-पित्त-कफ का शमन करने के लिए तुलसी के पत्ते वरदान सिद्ध होते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि आप 50 ग्राम तुलसी के पत्ते खा लो। ऐसा करने से गर्मी बढ़ जायेगी। तुलसी के 5-7 पत्ते खाने हितकारी हैं।

मंत्रजाप भी जीवनी शक्ति को बढ़ाता है।

इस प्रकार नियमित प्राणायाम, सुबह की हवा, सूर्य की किरणें एवं तुलसी के पत्तों का सेवन तथा मंत्रजाप – ये रोगप्रतिकारक शक्ति को बढ़ाते हैं, मन को प्रफुल्लित रखते हैं और बुद्धि को तेजस्वी बनाने में सहायक होते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2002, पृष्ठ संख्या 29,30 अंक 110

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सावधानी से स्वास्थ्य


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

स्वस्थ रहने के लिए स्वास्थ्यरक्षक कुछ नियम जान लें-

ब्रह्ममुहूर्त में उठें (सूर्योदय से लगभग दो घंटे पूर्व ब्रह्ममुहूर्त होता है।)

सुबह नींद से उठकर बासी पानी पियें। हो सके तो ताँबें के बर्तन में रखा हुआ पानी पियें। इससे पेट की तमाम बीमारियाँ दूर हो जाती हैं। कब्ज अनेक बीमारियों की जड़ है, वह इस प्रयोग से दस दिन में ठीक हो जाती है। गर्मी के दिनों में पानी ज्यादा पियें। इससे लू से बचाव होता है।

सुबह सूर्योदय से पूर्व स्नान करें और सर्वप्रथम अपने सिर पर पानी डालें फिर पैरों पर पानी डालें क्योंकि पहले पैरों पर पानी डालने से पैरों की गर्मी सिर पर चढ़ती है।

सदैव सूती एवं स्वच्छ वस्त्र पहनें। कृत्रिम (सिंथैटिक) कपड़े न पहनें। ये कपड़े जीवनशक्ति का ह्रास करते हैं।

चौबीस घंटों में केवल दो बार भोजन करें। अगर तीसरी बार करते हों तो बहुत सावधान रहें, हलका नाश्ता करें।

किसी को वायु और गैस की तकलीफ ज्यादा हो तो उसे आलु, चावल और चने की दाल आदि का परहेज रखना चाहिए। ये वायु करते हैं। वायु का रोगी दूध पिये तो एक-दो काली मिर्च डालकर पियें।

सामान्य रूप से भी चावल, आलू आदि ज्यादा न खायें नहीं तो आगे जाकर बुढ़ापे में जोड़ों का दर्द पकड़ लेगा। जो बीमारी होने वाली है, उससे बचने के लिए पहले से ही सावधान रहें।

चाय, काफी और नशीली वस्तुओं से बचना चाहिए। आहार ऐसा को कि आपका शरीर तंदुरुस्त रहे। विचार ऐसे करो कि मन  पवित्र रहे।

एक गिलास गुनगुने पानी में थोड़ा संतकृपा चूर्ण एवं शहद डाल दें। मुँह में अदरक का टुकड़ा चबायें, ऊपर से यह शहदवाला पानी पी जायें और थोड़ा घूमें। इससे शरीर का वज़न नियंत्रित हो जायेगा।

जिनकी उम्र 40 साल से ज्यादा है उनकी रोग प्रतिकारक शक्ति बनी रहे इसके लिए ‘रसायन चूर्ण’ का सेवन करना चाहिए। आँवला, गोखरू एवं दूसरी तीन-चार चीजें मिलाकर रसायन चूर्ण बनता है।

ड्राइवर लोग जानते हैं कि रेल का फाटक आता है अथवा बंपर आता है तो उसके पहले गाड़ी की गति धीमि करनी पड़ती है। ऐसे ही कोई पीड़ा या बीमारी बंपर बनकर आये तो उसके पहले ही अपनी शरीररूपी गाड़ी को नियन्त्रित कर लो।

किसी को पित्त की तकलीफ ज्यादा है तो सप्ताह में एक बार पेठे की सब्जी बनाकर खाय और उस दिन थोड़ी अदरक भी खाये ताकि भूख लगे।

किसी को भूख नहीं लगती है तो भोजन के पहले अदरक के टुकड़ों में नीँबू और नमक मिलाकर खाये, बाद में भोजन चबा-चबाकर करे।

रात को हल्का भोजन करे और संध्या के बाद जितनी जल्दी हो सके भोजन कर लेना चाहिए।

पंद्रह दिन में एकाध उपवास करें और उपवास के दन एक दो सेब को तवे प सेंक कर खायें। प्यास लगे तो एक दो चुटकी सोंठ गुनगुने पानी में लिया करें।

रात्रि को जल्दी सोना चाहिए और देर रात्रि को भोजन नहीं करना चाहिए। ज्यों-ज्यों सूर्यास्त होता जाता है, त्यों-त्यों जठराग्नि मंद होती जाती है। देर रात्रि को भोजन करने वाले को मोटापा, थकान और सुस्ती घेर लेती है।

जिस कमरे में सूर्य की रोशनी अच्छी तरह से आती हो उस कमरे में शयन करना चाहिए और रात्रि में सोते हैं तब खिड़की खुली रखें ताकि ताजी हवा ठीक से मिलती रहे।

परिश्रम करने वालों को कम से कम 6 घंटे नींद करनी चाहिए और अधिक-से-अधिक सात घंटे। दिन में ज्यादा सोना नहीं चाहिए। गर्मियों के दिन हैं, बुढ़ापा है अथवा रात्रि को नहीं सो पाये हैं उनके लिए ठीक है। बाकी आम आदमी यदि दिन में सोयेगा तो त्रिदोष बढ़ेगा, मोटापा थकान, आलस्य और रोग बढ़ेंगे।

रात्रि को सोते समय पूर्व अथवा दक्षिण की तरफ सिरहाना होना चाहिए। पश्चिम अथवा उत्तर की तरफ सिर रखकर सोने से हानि होती है।

रात को सोते समय थके-माँदे होकर नमक के बोरे की नाईं मत गिरो। जब आप सोने की जगह पर जाते हो तो ईश्वर से प्रार्थना करो कि ‘हे प्रभु ! दिन भर में जो अच्छे काम हुए वह तेरी कृपा से हुए प्रभु!’ और कुछ गलत काम हो गये तो उस पर नजर डालो एवं प्रार्थना करो कि ‘हे प्रभु ! मुझे बचा ले। बुरे कर्म की आदत हो गयी है, वासना हो गयी है। तू बचा ले। आज का दिन जैसा भी हो गया तेरे चरणों में अर्पण है। कल से कोई बुरे कर्म न हों केवल अच्छे कर्म ही हों…. हे प्रभु ऐसे कर्म हों जिनसे तू प्रसन्न हो, तुझमें प्रीति बढ़े, कर्त्ताभाव मिटे तुझमें शांति मिले और हम तुझसे दूर नहीं, जुदा नहीं। इस असलियत का ज्ञान हो जाये ऐसी कृपा करना। ॐ शांति…. ॐ शांति.. ‘ ऐसा करके लेट जायें। श्वास अंदर जाता है शांति, बाहर आता है 1, अंदर जाता है ॐ, बाहर आये 2, अंदर आनंद या गुरुमंत्र या इष्टमंत्र बाहर 3, इस प्रकार श्वासोच्छवास की गिनती करते-करते सो जायें।

मैं सच कहता हूँ आपकी नींद प्रभुमय, शांतिमय योगनिद्रा हो जायेगी और उठोगे तब भी भक्तिमय होकर उठोगे। आज तक आप जैसे उठते थे उससे अलग स्वभाव और मधुरता से उठोगे। फिर सुबह जब उठो तब उस अंतर्यामी से हाथ मिलाकर उठना। ‘दायाँ मेरा, बायाँ तेरा… बिन फेरे हम तेरे प्रभु !’ इस प्रकार यह सरल स्वभाव की भगवान की भक्ति बेड़ा तारने वाली है।

विवाह करें लेकिन संयम से हें। पूनम अमावस, एकादशी, जन्मदिवस, श्राद्ध के दिनों में और पर्व तथा त्यौहार के दिनों में संसार-व्यवहार न करें। पत्नी रजस्वला हो, बीमार हो अथवा पति बीमार हो, दोनों में से किसी ने व्रत-उपवास किया हो, भूखे पेट हों, तब भी संसार व्यवहार नहीं करना चाहिए।

इस प्रकार की बातें पहले लोग गुरुकुल में सीखकर आते थे तो कितने तंदुरुस्त रहते थे। अभी तो दे धमाधम…. इतनी  अस्पतालें बन रही हैं फिर भी घर-घर में बीमारी। अतः स्वस्थ जीवन, सुखी जीवन, सम्मानित जीवन जीने का……

लक्ष्य न ओझल होने पाये, कदम मिलाकर चल।

मंजिल तेरे चरण चूमेगी, आज नहीं तो कल।।

साँईं श्री लीलाशाहजी उपचार केन्द्र, संत श्री आसाराम जी आश्रम

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2002, पृष्ठ संख्या 28-30, अंक 109

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