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विवेक का चश्मा


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग प्रवचन से

सुनी है एक कथाः

एक ब्राह्मण यात्रा करते-करते किसी नगर से गुजरा। बड़े-बड़े महल एवं अट्टालिकाओं को देखकर ब्राह्मण भिक्षा माँगने गया किन्तु किसी ने भी उसे दो मुट्ठी अऩ्न नहीं दिया। आखिर दोपहर हो गयी। ब्राह्मण दुःखी होकर अपने भाग्य को कोसता हुआ जा रहा थाः “कैसा मेरा दुर्भाग्य है ! इतने बड़े नगर में मुझे खाने के लिए दो मुट्ठी अन्न तक न मिला ? टिक्कड़ बना कर खाने के लिए दो मुट्ठी आटा तक न मिला ?”

इतने में एक संत की निगाह उस पर पड़ी। उन्होंने ब्राह्मण की बड़बड़ाहट सुन ली। वे बड़े पहुँचे हुए संत थे। उन्होंने कहाः

“ब्राह्मण ! तुम मनुष्य से भिक्षा माँगो, पशु क्या जानें भिक्षा देना ?”

ब्राह्मण दंग रह गया और कहने लगाः “हे महात्मन् ! आप क्या कह रहे हैं ? बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं में रहने वाले मनुष्यों से ही मैंने भिक्षा माँगी है।”

संतः “नहीं ब्राह्मण ! मनुष्य शरीर में दिखने वाले वे लोग भीतर से मनुष्य नहीं हैं। अभी भी वे पुराने संस्कारों में जी रहे हैं। कोई शेर के चोले से आया है तो कोई बघेरे के चोले से आया है, कोई हिरण के चोले से आया है तो कोई गाय या भैंस के चोले से आया है। उनकी आकृति मानव-शरीर की जरूर है किन्तु अभी तक उनमें मनुष्यत्व निखरा नहीं है और जब तक मनुष्यत्व नहीं निखरता, तब तक दूसरे मनुष्य की पीड़ा का पता नहीं चलता।…. ‘दूसरे में भी मेरा ही दिलबर ही है’ यह ज्ञान नहीं होता। तुमने मनुष्यों से नहीं, पशुओं से भिक्षा माँगी है।”

ब्राह्मण का चेहरा चुगली खा रहा था। ब्राह्मण का चेहरा इन्कार की खबरें दे रहा था। सिद्धपुरुष तो दूरदृष्टि के धनी होते हैं। उन्होंने कहाः “देख ब्राह्मण ! मैं तुझे यह चश्मा देता हूँ। इस चश्मे को पहन कर जा और कोई भी मनुष्य दिखे, उससे भिक्षा माँग। फिर देख, क्या होता है।”

ब्राह्मण जहाँ पहले गया था, वहीं पुनः गया। योगसिद्ध कला वाला चश्मा पहनकर गौर से देखाः ‘ओहोऽऽऽऽ…. वाकई कोई बिलार है तो कोई बघेरा है। आकृति तो मनुष्य की है लेकिन संस्कार पशुओं के हैं। मनुष्य होने पर भी मनुष्यत्व के संस्कार नहीं हैं।’ घूमते-घूमते वह ब्राह्मण थोड़ा सा आगे गया तो देखा कि एक मोची जूते सिल रहा है। ब्राह्मण ने उसे गौर से देखा तो उसमें मनुष्यत्व का निखार पाया।

ब्राह्मण ने उसके पास जाकर कहाः “भाई ! तेरा धंधा तो बहुत हल्का है औऱ मैं हूँ ब्राह्मण। रीति रिवाज एवं कर्मकाण्ड को बड़ी चुस्ती से पालता हूँ। मुझे बड़ी भूख लगी है लेकिन तेरे हाथ का नहीं खाऊँगा। फिर भी मैं तुझसे माँगता हूँ क्योंकि मुझे तुझमें मनुष्यत्व दिखा है।”

उस मोची की आँखों से टप-टप आँसू बरसने लगे। वह बोलाः “हे प्रभु ! आप भूखे हैं ? हे मेरे रब ! आप भूखे हैं ? इतनी देर आप कहाँ थे ?”

यह कहकर मोची उठा एवं जूते सिलकर टका, आना-दो आना वगैरह जो इकट्ठे किये थे, उस चिल्लर (रेज़गारी) को लेकर हलवाई की दुकान पर पहुँचा और बोलाः “हे हलवाई ! मेरे इन भूखे भगवान की सेवा कर लो। ये चिल्लर यहाँ रखता हूँ। जो कुछ भी सब्जी-पराँठे-पूरी आदि दे सकते हो, वह इन्हें दे दो। मैं अभी जाता हूँ।”

यह कहकर मोची भागा। घर जाकर अपने हाथ से बनाई हुई एक जोड़ी जूती ले आया एवं चौराहे पर उसे बेचने के लिए खड़ा हो गया।

उस राज्य का राजा जूतियों का बड़ा शौकीन था। उस दिन भी उसने कई तरह की जूतियाँ पहनीं किंतु किसी की बनावट उसे पसंद नहीं आयी तो किसी का नाप नहीं आया। दो-पाँच बार प्रयत्न करने पर भी राजा को कोई पसंद नहीं आयी तो मंत्री से क्रुद्ध होकर बोलाः “अगर इस बार ढंग की जूती लाया तो जूती वाले को इनाम दूँगा और ठीक नहीं लाया तो मंत्री के बच्चे ! तेरी खबर ले लूँगा।”

दैवयोग से मंत्री की नज़र इस मोची के रूप में खड़े असली मानव पर पड़ गयी, जिसमें मानवता खिली थी, जिसकी आँखों में कुछ प्रेम के भाव थे, चित्त में दया-करूणा थी, गुरुओं के संग का थोड़ा रंग लगा था। मंत्री ने मोची से जूती ले ली एवं राजा के पास ले गया। राजा को वह जूती एकदम ‘फिट’ आ गयी, मानो वह जूती राजा के नाप की ही बनी थी। राजा ने कहाः “ऐसी जूती तो मैंने पहली बार ही पहन रहा हूँ। किस मोची ने बनाई है यह जूती ?”

मंत्री बोला ! “हुजूर ! यह मोची बाहर ही खड़ा है।”

मोची को बुलाया गया। उसको देखकर राजा की भी मानवता थोड़ी खिली। राजा ने कहाः “जूती के तो पाँच रूपये होते हैं किन्तु यह पाँच रूपयों वाली नहीं, पाँच सौ रूपयों वाली जूती है। जूती बनाने वाले को पाँच सौ और जूती के पाँच सौ, कुल एक हजार रूपये इसको दे दो।”

मोची बोलाः “राजा साहिब ! तनिक ठहरिये। यह जूती मेरी नहीं है, जिसकी है उसे मैं अभी ले आता हूँ।”

मोची जाकर विनयपूर्वक ब्राह्मण को राजा के पास ले आया एवं राजा से बोलाः “राजा साहब ! यह जूती इन्हीं की है।”

राजा को आश्चर्य हुआ ! वह बोलाः “यह तो ब्राह्मण है ! इसकी जूती कैसे ?”

राजा ने ब्राह्मण से पूछा तो ब्राह्मण ने कहाः “मैं तो ब्राह्मण हूँ। यात्रा करने निकला हूँ।”

राजाः “मोची ! जूती तो तुम बेच रहे थे। इस ब्राह्मण ने जूती कब खरीदी और बेची ?”

मोची ने कहाः “राजन् ! मैंने मन में ही संकल्प कर लिया था कि जूती की जो रकम आयेगी वह इन ब्राह्मणदेव की होगी। जब रकम इनकी है तो मैं इन रूपयों को कैसे ले सकता हूँ ? इसीलिए मैं इन्हें ले आया हूँ। न जाने किसी जन्म में मैंने दान करने का संकल्प किया होगा और मुकर गया होऊँगा, तभी तो यह मोची का चोला मिला है। अब भी यदि मुकर जाऊँ तो तो न जाने मेरी कैसी दुर्गति हो ? इसीलिए राजन् ! ये रूपये मेरे नहीं हुए। मेरे मन में आ गया था कि इस जूती की रकम इनके लिए होगी। फिर पाँच रूपये मिलते तो भी इनके होते और एक हजार मिल रहे हैं तो भी इनके ही हैं। हो सकता है मेरा मन बेईमान हो जाता। इसीलिए मैंने रूपयों को नहीं छुआ और असली अधिकारी को ले आया।”

राजा ने आश्चर्य चकित होकर ब्राह्मण से पूछाः “ब्राह्मण ! मोची से तुम्हारा परिचय कैसे हुआ ?”

ब्राह्मण ने सारी आप बीती सुनाते हुए सिद्ध पुरुष के चश्मे वाली बात बतायी एवं कहाः “राजन् ! आपके राज्य में पशुओं के दीदार तो बहुत हुए लेकिन मनुष्यत्व का विकास इस मोची में ही नज़र आया।”

राजा ने कौतूहलवश कहाः “लाओ, वह चश्मा। जरा हम भी देखें।”

राजा ने चश्मा लगाकर देखा तो दरबारी वगैरह में उसे भी कोई सियार दिखा तो कोई हिरण, कोई बंदर दिखा तो कोई रीछ। राजा दंग रह गया कि यह तो पशुओं का दरबार भरा पड़ा है ! उसे हुआ कि ये सब पशु हैं तो मैं कौन हूँ ? उसने आईना मँगवाया एवं उसमें अपना चेहरा देखा तो शेर ! उसके आश्चर्य की सीमा न रही ! ‘ ये सारे जंगल के प्राणी और मैं जंगल का राजा शेर ! यहाँ भी इनका राजा बना बैठा हूँ !’ राजा ने कहाः “ब्राह्मणदेव ! योगी महाराज का यह चश्मा तो बड़ा गज़ब का है ! वे योगी महाराज कहाँ होंगे ?”

ब्राह्मणः “वे तो कहीं चले गये। ऐसे महापुरुष कभी-कभी ही और बड़ी कठिनाई से मिलते हैं।”

श्रद्धावान ही ऐसे महापुरुषों से लाभ उठा पाते हैं, बाकी तो जो मनुष्य के चोले में पशु के समान हैं वे महापुरुष के निकट रहकर भी अपनी पशुता नहीं छोड़ पाते।

ब्राह्मण ने आगे कहाः ‘राजन् ! अब तो बिना चश्मे के भी मनुष्यत्व को परखा जा सकता है। व्यक्ति के व्यवहार को देखकर ही पता चल सकता है कि वह किस योनि से आया है। एक मेहनत करे और दूसरा उस पर हक जताये तो समझ लो कि वह सर्पयोनि से आया है क्योंकि बिल खोदने की मेहनत तो चूहा करता है लेकिन सर्प उसको मारकर बल पर अपना अधिकार जमा बैठता है।”

अब इस चश्मे के बिना भी विवेक का चश्मा काम कर सकता है और दूसरे को देखें उसकी अपेक्षा स्वयं को ही देखें कि हम सर्पयोनि से आये हैं कि शेर की योनि से आये हैं या सचमुच में हममें मनुष्यता खिली है ? यदि पशुता बाकी है तो वह भी मनुष्यता में बदल सकती है। कैसे ?

तुलसीदाज जी ने कहा हैः

बिगड़ी जनम अनेक की सुधरे अब और आजु।

तुलसी होई राम को रामभजि तजि कुसमाजु।।

कुसंस्कारों को छोड़ दें… बस। अपने कुसंस्कार आप निकालेंगे तो ही निकलेंगे। अपने भीतर छिपे हुए पशुत्व को आप निकालेंगे तो ही निकलेगा। यह भी तब संभव होगा, जब आप अपने समय की कीमत समझेंगे। मनुष्यत्व आये तो एक-एक पल को सार्थक किये बिना आप चुप नहीं बैठेंगे। पशु अपना समय ऐसे ही गँवाता है। पशुत्व के संस्कार पड़े रहेंगे तो आपका समय बिगड़ेगा। अतः पशुत्व के संस्कारों को आप निकालिये एवं मनुष्यत्व के संस्कारों को उभारिये। फिर सिद्धपुरुष का चश्मा नहीं, वरन् अपने विवेक का चश्मा ही कार्य करेगा और इस विवेक के चश्मे को पाने की युक्ति मिलती है सत्संग से।

मानवता से जो पूर्ण हो, वही मनुष्य कहलाता।

बिन मानवता के मानव भी, पशुतुल्य रह  जाता।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2002, पृष्ठ संख्या 18-20, अंक 109

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भारत का इतिहास


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग प्रवचन से

हमारी संस्कृति के पाँच स्तम्भों में उसका इतिहास विशिष्ट है।

432000 वर्ष का कलियुग, 864000 वर्ष का द्वापर युग, 1326000 वर्ष का त्रेता युग, 1728000 वर्ष का सतयुग होता है। इस प्रकार कुल मिलाकर 4320000 वर्ष बीतते हैं तब एक चतुर्युगी पूरी होती है। ऐसी 71 चतुर्युगियाँ बीतती हैं तब एक मन्वन्तर और ऐसे 14 मन्वन्तर बीतते हैं तब एक कल्प होता है अर्थात् करीब एक हजार चतुर्युगी बीतती हैं तब एक कल्प अर्थात् ब्रह्मा जी का एक दिन होता है। ऐसे ब्रह्माजी अभी 50 वर्ष पूरे करके 51वें वर्ष के प्रथम दिन के दूसरे प्रहर में है अर्थात् सातवाँ मन्वन्तर, अट्ठाइसवीं चतुर्युगी, कलियुग का प्रथम चरण और उसके भी 5227 वर्ष बीत चुके हैं।

ऐसा इतिहास दूसरी किस संस्कृति में है ?

श्राद्ध, पितृलोक और स्वर्गलोक की खोज हमारी संस्कृति के उपासकों ने की है।

अमेरिका की खोज करने वाला कोलम्बस जन्मा भी नहीं था उससे भी करीब 5000 वर्ष पहले भारत का वीर अर्जुन स्वर्ग से दिव्यास्त्र ले आया था, यह तो यहाँ का बच्चा-बच्चा जानता है। उससे भी वर्षों पहले खटवाँग, मुचकन्द आदि राजा स्वर्ग जाकर आ चुके थे।

एक ऐसा जमाना था जब आपके देश भारत में लोग सोने की थालियाँ एवं कटोरियों में भोजन किया करते थे एवं सोने के प्यालों में पानी पीते थे। युधिष्ठिर महाराज यज्ञ करते तब हाथ जोड़कर साध-ब्राह्मणों से प्रार्थना करके कि ‘हे ब्राह्मणों ! आपको जिस सोने की थाली-कटोरी एवं प्याले में भोजन परोसा गया है उन्हें आप दक्षिणा के रूप में स्वीकार करके घर ले जायें।’

कुछ साधु-ब्राह्मण दक्षिणा के रूप में सोने के बर्तन ले जाते तो कुछ कहते कि ‘हम आत्महीरा सँभालेंगें कि तुम्हारे इन ठीकरों को ?’ और वे उन्हें छोड़कर चले जाते। ऐसे थे, आपके भारत के साधु पुरुष !

धीरे-धीरे बाहरी लोग आकर भारत को लूटते चले गये। पहले तो फेरीवाले बोलते थेः ‘देना हो तो दे दो सोने-चाँदी के टूटे-फूटे बर्तन !’

किन्तु लोग लुट गये तो फिर आवाज बदलीः ‘देना हो तो दो ताँबे-पीतल के पुराने बर्तन !’ आज से 45-50 वर्ष पहले जब हम बालक थे, तब यह आवाज सुनते थे। किन्तु आज हमारे बच्चे सुनते हैं- ‘देना है तो दो प्लास्टिक के पुराने जूते चप्पल !’

हम बालक थे तो सौ रूपयों में एक माह तक पूरे कुटुम्ब का भरण-पोषण मजे से हो जाता था। और आज…. दो हजार रूपये मासिक कमाने वाले लोग बेचारे कैसे जीते होंगे, यह पचीस हजार रूपये मासिक कमाने वालों को क्या पता ? अपने गाल में थप्पड़ मारकर, गाल लाल करके मध्यम वर्ग जी रहा है बेचारा। बेटे-बेटियों की शादी में तो माँ बाप बेचारे गिरवी रखा गये हों, ऐसी उनकी दशा हो जाती है। जिन्होंने परदेश में रूपयों की थप्पियाँ जमाकर रखी हों उऩ्हें इस बात का क्या पता चले ? अथवा जिनको देश में ही ऊँचा पद एवं ऊँची कमाई हो उन्हें भी क्या पता चले ? धन वैभव तो विदेशी लूट गये, राजनीति की समझ भी लूट गये तभी तो हमारे अधिकारियों को प्रशिक्षण के लिए विदेश भेजा जाता है। मानों, अपने देश में सब नष्ट हो चुका है। पहले राजकुमारों को किन्ही ऋषिद्वार या संतद्वार पर भेजते थे और अब अधिकारियों को शोषकों के यहाँ भेजा जाता है।

फिर भी एक बात की खुशी है कि हमारा देश कृषि प्रधान, भावना प्रधान, सहिष्णुता प्रधान तो है ही, साथ ही उसमें एक बड़ा सदगुण यह भी है कि पड़ोसी के प्रति उसका हाथ  उदार है। पर्व-त्यौहार पर गरीब-गुरबों को भी कुछ-न-कुछ देने की भावना है भारतवासियों में। और दूसरा भी एक बड़ा गुण है हमारे देश का कि हमारे पास भगवद् भक्ति का पाथेय है। चित्त की शांति, प्रसन्नता बनी रहे एवं आरोग्यशक्ति मिलती रहे ऐसे शुभ संस्कारों को अभी तक हमने खोया नहीं है। इन संस्कारों को वे लोग नहीं लूट पाये। हमारे भक्ति, ज्ञान, एवं धर्म के संस्कारों को कोई लूट नहीं पाया।

वे ही शुभ संस्कार प्रत्येक भारतवासी में ज्यादा से ज्यादा फले फूलें तो बाह्य रूप से भी हम पुनः पहले की तरह सुखी एवं समृद्ध हो सकते हैं, अपनी खोयी हुई गरिमा को पुनः लौटा सकते हैं। जागो, भारतवासियो ! जागो !!

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2002, पृष्ठ संख्या 25,26 अंक 109

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प्रार्थना की महिमा


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

किसी ने कहा हैः

जब और सहारे छिन जाते, कोई न किनारा मिलता है।

तूफान में टूटी किश्ती का, भगवान सहारा होता है।।

सच्चे हृदय की पुकार को वह हृदयस्थ परमेश्वर जरूर सुनता है, फिर पुकार चाहे किसी मानव ने की हो या किसी प्राणी ने। गज की पुकार को सुनकर स्वयं प्रभु ही ग्राह से उसकी रक्षा करने के लिए वैकुण्ठ से दौड़ पड़े थे, यह तो सभी जानते हैं।

पुराणों में कथा आती हैः

एक पपीहा पेड़ पर बैठा था। वहाँ उसे बैठा देखकर एक शिकारी ने धनुष पर बाण चढ़ाया। आकाश से भी एक बाज उस पपीहे को ताक रहा था। इधर शिकारी ताक में था और उधर बाज। पपीहा क्या करता ?

कोई ओर चारा न देखकर पपीहे ने प्रभु से प्रार्थना कीः “हे प्रभु ! तू सर्वसमर्थ है। इधर शिकारी है, उधर बाज है। अब तेरे सिवा मेरा कोई नहीं है। हे प्रभु ! तू ही रक्षा कर….”

पपीहा प्रार्थना में तल्लीन हो गया। वृक्ष के पास बिल में से एक साँप निकला। उसने शिकारी को दंश मारा। शिकारी का निशाना हिल गया। हाथ में से बाण छूटा और आकाश में जो बाज मँडरा रहा था उसे जाकर लगा। शिकारी के बाण से बाज मर गया और साँप के काटने से शिकारी मर गया। पपीहा बच गया।

इस सृष्टि का कोई मालिक नहीं है ऐसी बात नहीं है। यह सृष्टि समर्थ संचालक की सत्ता से चलती है।

कुछ समय पहले की बात हैः

जबलपुर (म.प्र.) में किसी कुम्हार ने देखा कि चिड़िया ने ईंटों के बीच में घोंसला बनाकर अण्डे दे दिये हैं। उसने सोचाः ‘आँवों में ईँटों को पकाते समय घोंसला निकाल देंगे।’ किन्तु वह भूल गया और आँवों में आग लगा दी। फिर उसे याद आया किः ‘अरे ! घोंसला तो रह गया !’ कुम्हार उनकी प्राणरक्षा के लिए ईश्वर से प्रार्थना करने लगा। लोगों ने कहाः

“तुम पागल हो गये हो ? यह कैसे सम्भव है कि आँवों की आग से घोंसला बच जाये ?”

कुम्हारः “जब प्रह्लाद के जमाने में सम्भव था तो इस जमाने का स्वामी भी तो वही है ! जमाना बदला है, पर परमात्मा थोड़े बदला है !”

उस कुम्हार ने आर्तभाव से प्रार्थना की और उस समर्थ सत्ता में खो गया। सुबह जब उसने अपना आँवाँ खोला और एक-एक करके ईंटें उठायीं तो क्या देखता है कि आँवों के बीच की ईंटों तक आग की आँच नहीं लगी है। चिड़िया उड़कर आकाश की ओर चली गयी और घोंसले में अण्डे ज्यों के त्यों !

यह घटित घटना है। ‘हिन्दुस्तान’ समाचार-पत्र में यह घटना छपी भी थी।

वह परमात्मा कैसा समर्थ है ! वह ‘कर्तुं अकर्तुं अन्याथाकर्तुं समर्थः’ है। असम्भव भी उसके लिए सम्भव है।

1970 की एक घटना अमेरिका के विज्ञान जगत में चिरस्मरणीय रहेगी।

अमेरिका ने 11 अप्रैल, 1970 को अपोलो-13 नामक अंतिरक्षयान चन्द्रमा पर भेजा। दो दिन बाद वह चन्द्रमा पर पहुँचा और जैसे ही कार्यरत हुआ कि उसके प्रथम युनिट ऑडीसी (सी.एस.एम.) के ऑक्सीजन की टंकी में विद्युत तार में स्पार्किंग होने के कारण अचानक विस्फोट हुआ जिससे युनिट में ऑक्सीजन खत्म हो गयी और विद्युत आपूर्ति बंद हो गयी।

उस युनिट में तीन अंतरिक्षयात्री थेः जेम्स ए. लोवेल, जॉन एल. स्वीगर्ट और फ्रेड वोलेस हेईज। इन अंतरिक्षयात्रियों ने विस्फोट होने पर सी.एस.एम. युनिट की सब प्रणालियाँ बंद कर दीं एवं वे तीनों उस युनिट को छोड़कर एक्वेरियस (एल.एम.) युनिट में चले गये।

अब असीम अंतरिक्ष में केवल एल.एम. युनिट ही उनके लिए लाइफ बोट के समान था। परंतु बाहर की प्रचंड गर्मी से रक्षा करने के लिए उस युनिट में गर्मी रक्षा कवच नहीं था। अतः पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में प्रविष्ट होकर पुनः पृथ्वी पर वापस लौटने में उसका उपयोग कर सकना सम्भव नहीं था।

पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम के अनुसार पृथ्वी पर वापस लौटने में अभी चार दिन बाकी थे। इतना लम्बा समय चले उतना ऑक्सीजन एवं पानी का संग्रह नहीं बचा था। इसके अतिरिक्त इस युनिट के अंदर बर्फ की तरह जमा दे ऐसा ठंडा वातावरण एवं अत्यधिक कार्बन डाईऑक्साइड था। जीवन बचने की कोई गुंजाइश नहीं थी।

अंतरिक्षयात्री पृथ्वी के नियंत्रणकक्ष के निरंतर सम्पर्क में थे। उन्होंने कहाः “अंतरिक्षयान में धमाका हुआ है…. अब हम गये….”

लाखों मील ऊँचाई पर अंतरिक्ष में मानवीय सहायता पहुँचाना सम्भव नहीं था। अंतरिक्षयान गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से भी ऊपर था। इस विकट परिस्थिति में सब निःसहाय हो गये। कोई मानवीय ताकत अंतरिक्षयात्रियों को सहाय पहुँचा सके यह सम्भव नहीं था। नीचे नियंत्रण कक्ष से कहा गयाः

“अब हम तो कुछ नहीं कर सकते। हम केवल प्रार्थना कर सकते हैं। जिसके हाथों में यह सारी सृष्टि है उस ईश्वर से हम केवल प्रार्थना कर सकते हैं…… May God help you ! We too shall pray to God. God will help you.” और देशवासियों ने भी प्रार्थना की।

युवान अंतरिक्षयात्रियों ने हिम्मत की। उन्होंने ईश्वर के भरोसे पर एक साहस किया। चंद्र पर अवरोहण करने के लिए एल.एम. युनिट के जिस इन्जन का उपयोग करना था उस इन्जन की गति एवं दिशा बदलकर एवं स्वयं गर्मी-रक्षक कवचरहित उस एल.एम. युनिट में बैठकर अपोलो – 13 को पृथ्वी की ओर मोड़ दिया। ….और आश्चर्य ! तमाम जीवनघातक जोखिमों से पार होकर अंतरिक्षयान ने सही सलामत 17 अप्रैल, 1970 के दिन प्रशान्त महासागर में सफल अवरोहण किया।

उन अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने बाद में वर्णन करते हुए कहाः “अंतरिक्ष में लाखों मील दूर से एवं एल.एम. जैसे गर्मी-रक्षक कवच से रहित युनिट में बैठकर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में प्रवेश करना और प्रचण्ड गर्मी से बच जाना, हम तीनों का जीवित रहना असम्भव था…. किसी भी मनुष्य का जीवित रहना असम्भव था। यह तो आप सबकी प्रार्थना ने काम किया है एवं अदृश्य सत्ता ने ही हमें जीवनदान दिया है।”

सृष्टि में चाहे कितनी भी उथल-पुथल मच जाय लेकिन जब अदृश्य सत्ता किसी की रक्षा करना चाहती है तो वातावरण में कैसी भी व्यवस्था करके उसकी रक्षा कर देती है। ऐसे तो कई उदाहरण हैं।

कितना बल है प्रार्थना में ! कितना बल है उस अदृश्य सत्ता में ! अदृश्य सत्ता कहो, अव्यक्त परमात्मा कहो, एक ही बात है लेकिन वह है जरूर। उसी अव्यक्त, अदृश्य सत्ता का साक्षात्कार करना यही मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2002, पृष्ठ संख्या 12-14, अंक 109

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