All posts by Gurukripa

मृत्यु का रहस्य


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

ʹश्रीमद् भगवदगीताʹ में आता हैः

ʹन जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।

अजो नित्यः शाश्वतोयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।

ʹयह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता। (गीताः 2.20)

परमात्मा कहते हैं- ʹहे जीवात्मा तू अजर है, अमर है। जिस स्वरूप को जाने लेने से तेरी फिर कभी मौत नहीं होती, उसे जानकर अमर हो जा। यही तेरा कर्त्तव्य है।ʹ

यदि आप परमात्मा की इस बात को मान लो तो आपकी, आपके ससुराल की एवं आपके ननिहाल की सात-सात पीढ़ियों का अर्थात् कुल 21 पीढ़ियों का उद्धार हो जाये।

भगवान की बात मान लेने से हमारा कल्याण हो जाये, लेकिन हम करते क्या हैं ? हम दोस्त की बात मानते हैं, संबंधियों की बात मानते हैं, परिवारवालों की बात मानते हैं और अपनी इच्छा-वासना पूरी करने के पीछे सारा जीवन खपा देते हैं और जन्म-मृत्यु के चक्र में उलझ जाते हैं। दूसरों की बातें तो सदियों से मानते आ रहे हो किन्तु यदि एक बार भी परमात्मा की बात मान लो तो फिर जीते-जी मुक्ति पाना आपके लिए सहज हो जायेगा।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

देहिनोस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।

तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति।।

ʹजैसे इस मनुष्य देह में जीवात्मा की बाल्यावस्था, जवानी और वृद्धावस्था आती है, वैसे ही अन्य प्रकार के शरीरों की प्राप्ति होती है, उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता।ʹ (गीताः 2.13)

जिस प्रकार कपड़े पुराने एवं जीर्ण-शीर्ण हो जाने पर मनुष्य उन्हें बदलकर नये कपड़े धारण करता है, वैसे ही यह शरीर जब बाल्यावस्था एवं यौवनावस्था को पार कर जरावस्था में पहुँचता है तब हमारी आत्मा इसको त्यागकर नया शरीर धारण करती है। अतः इसमें दुःखी होने की, भयभीत होने की क्या बात है ? पुराने कपड़े उतारकर नये कपड़े पहनने में रूदन किस बात का ? पुराना झोंपड़ा छोड़ नये महल में जाने पर शोक किस बात का ? पुरानी जीर्ण-शीर्ण कार छोड़कर नयी चमचमाती हुई कार में बैठने में भय किस बात का ? इसी प्रकार जब यह शरीर पुराना हो जाता है, जर्जर हो जाता है तब प्रकृति माता इस शरीर को उठाकर, जीव को अपनी गोद में ले लेती है और कुछ समय आराम करवाकर फिर उसे नये शरीर में भेज देती है। यह तो उन अनन्त की, विराट की यात्रा में, मंजिल तक पहुँचने की यात्रा में एक प्रक्रियामात्र है, पड़ावमात्र है। जैसे कन्या ससुराल से थक-हारकर कुछ तरोताजा होने के लिए मायके जाती है, वहाँ कुछ दिन अपनी माँ के साथ स्वतंत्र होकर रहती है और माँ कुछ दिन बाद उसे समझाकर, सजा-धजाकर ससुराल में पति के घर भेज देती है, वैसे ही जब जीव प्रकृति माता की गोद में जाता है तो वह करूणामयी प्रकृति माँ उसे फिर से नूतन शरीर में नूतन प्राण देकर संसार में भेज देती है और वह जीव अपनी आगे की यात्रा शुरु कर देता है। फिर चिंता, भय, शोक और रूदन किस बात का ?

रोना ही हो तो इस बात के लिए रोओ कि न जाने कितने शरीर मिलने के बाद यह मानव-तन मिला है और अगर इस मनुष्य शरीर में अपना कल्याण नहीं किया तो फिर कब करेंगे ? अथवा तो यूँ मान लो कि दिनभर की थकान को मिटाने के लिए जैसे रात्रि की नींद नितांत जरूरी है, वैसे ही वर्षों से चली आ रही इस यात्रा में ʹमेरे-तेरेʹ की, राग-द्वेष की, काम-क्रोध की थकान मिटाने के लिए मृत्युरूपी रात्रि की जरूरत है, नहीं तो सदैव इस घुटन भरे माहौल में रहना मुश्किल हो जाये।

यह मृत्यु ही है जो इन्सान के जीवन में नम्रता, समता, स्नेह और सहानुभूति को पोसती है। अगर मृत्यु नहीं आती एवं सभी अमर होते तो पत्थर की तरह निष्क्रिय एवं कठोर होकर पड़े रहते। ʹमृत्यु जीवन का अनिवार्य अंग है…ʹ यह सोचकर ही इन्सान परलोक का कुछ विचार करता है। ʹमृत्यु तो आने ही वाली है…. अधिक इकट्ठा करके भी साथ क्या ले जायेंगे ? चलो, थोड़ा-बहुत दान-पुण्य करते हैं ताकि परलोक सँवर जाये…ʹ यह सोचकर भी इन्सान लोभ छोड़ते हैं, संग्रह में थोड़ा संयम बरतते हैं, सत्कर्म में लग जाते हैं। जीवन को सदगुणों से महकाने के ले यह मृत्युरूपी रात्रि उतनी ही जरूरी है जितनी जीवनरूपी सुबह।

कबीरजी ने कहा हैः

जा मरने से जग डरे, मोरे मन आनंद।

कब मरिये कब पाइए,  पूरण परमानंद।।

अभी तक तो हम इस देहरूपी घड़े को ʹमैंʹ मानकर सजाते-सँवारते रहे लेकिन आज पता चल गया कि इसके फूटने से इसमें व्याप्त आकाश का कुछ नहीं  बिगड़ता। संत-महापुरुष तो जानते हैं कि मृत्यु शरीर की होती है, हमारी (आत्मा) की नहीं। वे तो अपने पूर्ण स्वरूप को पाये हुए होते हैं और जो संतत्त्व को उपलब्ध होने की ओर अग्रसर हो रहे हैं, वे भी शोक क्यों करें ? मृत्यु और जन्म तो प्रकृति का खेल है। भगवान श्रीराम के होते हुए भी उनकी माँ को विधवा होना पड़ा था। जिनकी गोद में भगवान खेले, उन पिता दशरथ को भी ʹहाय राम ! हाय राम !ʹ कहते हुए संसार से आखिर जाना ही पड़ा। यह तो परमात्मा की कृपा है, व्यवस्था है कि कभी शरीर दिया तो कभी शरीर छीन लिया। अगर जीव न अपने वास्तविक स्वरूप को पा लिया तो फिर परमात्मा ने नया शरीर नहीं दिया और जीव मुक्त हो गया।

जीवात्मा की मृत्य होती है तो उसे एक मुहूर्तपर्यन्त मूर्च्छा-सी रहती है। वह देखता है कि ʹये मेरे कुटुम्बी हैं… रो रहे हैं….ʹ तो वह उस शरीर में मोहवश पुनः प्रवेश करना चाहता हूँ लेकिन प्रकृति की ऐसी व्यवस्था है कि वह उसे उस शरीर में प्रवेश नहीं करने देती। एक मुहूर्त के बाद जब मूर्च्छा हटती है तब उसका शरीर उसके काबिल ही नहीं रहता, शरीर में परिवर्तन हो जाता है। जैसे गंदी बस्ती के झोंपड़े हटाकर नगरपालिका वहाँ सिपाही तैनात कर देती है ताकि लोग वापस वहीं जम न जायें। जब वे लोग कहीं अन्यत्र व्यवस्था कर लेते हैं तब पुलिस वहाँ से हटा ली जाती है। वैसे ही प्रकृति व्यवस्था करके मृत प्राणियों को मूर्च्छित सा कर देती है। उनका सूक्ष्म शरीर थोड़े समय तक उसी क्षेत्र में घूमता है लेकिन उस स्थूल शरीर में वह प्रवेश नहीं कर पाता।

जीवात्मा ज्यादा समय तक सूक्ष्म शरीर में न भटके, इसके लिए सनातन धर्म में कई व्यवस्थाएँ की गयी हैं। ऐसी ही एक व्यवस्था यह भी है कि जब किसी शव को शमशान में जलाकर दागी घर आते हैं तो उनसे पूछा जाता हैः

“आप कौन हो ?”

वे कहते हैं- “हम दागिये हैं।”

“यहाँ से गये थे तब पाँच थे। अभी कितने हो ?”

वे कहते हैं- “चार।”

फिर पूछते हैं- “पाँचवा कहाँ गया ?”

वे कहते हैं- “वह तो स्वर्ग चला गया है।”

ये प्रश्नोत्तर किये जाते हैं ताकि वह मृत जीव सूक्ष्म शरीर से यदि उनके इर्द-गिर्द भटकता हो तो सचमुच में स्वर्ग की यात्रा पर चला जाये। इस प्रकार सनातन धर्म में जीवात्मा की उन्नति के लिए की प्रकार की व्यवस्थाएँ की गई हैं।

यात्रा में चलते-चलते कई रात्रियाँ नींद भी करनी पड़ती है तो कई रात्रियाँ चलना भी पड़ता है। ऐसे ही मृत्यु भी एक यात्रा है। जितनी बार जन्म होता है, उतनी ही बार आराम करने के लिए मृत्यु भी होती है। अगर मृत्युरूपी नींद नहीं होती तो हर जन्म के ʹमेरे-तेरेʹ के संस्कार, लेन-देन के संस्कार मनुष्य को पागल कर देते। संसार एक पागलखाना हो जाता।

अगर माली बगीचे में काट-छाँट नहीं करे तो बगीचा जंगल में बदल जाये। ऐसे ही ईश्वररूपी माली अगर इस संसाररूपी बगीचे में मृत्यु के बहाने काट-छाँट नहीं करे तो यह संसार भयानक जंगल जैसा हो जाये। इसलिए मृत्यु बहुत जरूरी है। जैसे, आदमी तेज गर्मी के कारण पसीने से तरबतर हो गया हो और शीतल जल में डुबकी लगाये तो तरोताजा होकर बाहर निकालता है, ऐसे ही मृत्युरूपी महा निद्रा में गोता मारकर जीव पुरानी झंझटों, तनावों आदि को भूल जाता है, तरोताजा हो जाता है और नये सिरे से अपनी जीवन-यात्रा का आरम्भ करता है।

मृत्यु एक ईश्वरीय वरदान है, फिर भी यदि कोई जान-बूझकर आत्महत्या करता है तो यह महापाप है। परमात्मा ने हमें यह अमूल्य मानव-चोला दिया है तो हमारा कर्त्तव्य है कि हम इसे साफ-सुथरा रखें, इसे स्वस्थ-तंदुरुस्त रखें। ऐसा नहीं कि मृत्यु जरूरी है तो अनाप-शनाप खाकर मौत को आमंत्रण दें। यद्यपि कपड़ा मैला होता है, गलता है, फटता है लेकिन उसे जान-बूझकर फाड़ देना तो बेवकूफी है। ऐसे ही शरीर बूढ़ा होता है, बीमार होता है, मरता है – यह प्रकृति की व्यवस्था है लेकिन इसे जान-बूझकर मौत के मुँह में ढकेलना ठीक नहीं।

पूर्णता के शिखर पर पहुँचने के लिए जन्म मृत्यु मानों सीढ़ियों के समान हैं। दिन जितना प्रिय है, रात भी उतनी ही प्यारी है। जीवन जितना प्रिय है, विवेकीजनों को मृत्यु का सिलसिला भी उतना ही प्यारा है। वे इससे दुःखी नहीं होते हैं। जिसका विवेक मरा हुआ है वह तो जीते-जी मरा हुआ है, मगर जिसका विवेक जाग्रत है वह मृत्यु के समय भी नहीं मरता वरन् अमर हो जाता है।

जीवन जीना तो कला है ही, मरना भी एक कला है। मनुष्य को चाहिए कि मौत आ जाये तो वह रोये नहीं, फिक्र न करे वरन् उस समय सावधान हो जाये। यदि कोई मृत्यु के करीब हो तो उसके पास अमरता भरे उच्चारण करो किः “तुम्हारी मौत नहीं हो रही है…. मौत हो रही है मरने वाले शरीर की। तुम शरीरी हो, शरीर नहीं हो। तुम कार के चालक हो, कार नहीं हो। तुम देह नहीं वरन् देह को चलाने वाले विदेही आत्मा हो।”

मृत्यु के बाद कहो किः “यह शरीर जो मरा पड़ा है वह तुम नहीं हो। तुम तो शरीर की मौत के बाद भी वातावरण में विद्यमान हो। तुम हमें देख रहे हो किन्तु हम तुम्हें नहीं देख पा रहे हैं। तुम्हारी सूक्ष्म इन्द्रियाँ जगी हैं, हमारी स्थूल इऩ्द्रियाँ हैं इसलिए तुम हमें देख सकते हो, हम तुम्हें नहीं देख सकते। अब तुम्हें यह प्रेरणा देते हैं कि हाड़-माँस का ऐसा शरीर तुमने पहले भी कई बार पाया और कई बार छोड़ा। अब एक बार और छोड़ दिया। अब तो तुम ऐसी यात्रा करो कि तुम्हें बार-बार शरीर में न आना पड़े। अब तो तुम अपनी आत्मा को पहचानकर परमात्मा से मुलाकात करो और मुक्त हो जाओ…. ૐ….. ૐ…. ૐ… तुम चैतन्यस्वरूप हो… तुम साक्षीस्वरूप हो… तुम भगवान के सनातन अंश हो… तुम अजन्मा आत्मा हो।”

यदि आप मृतात्मा को ऐसी प्रेरणा देते हैं तो उसका कल्याण तो उसी क्षण हो जायेगा और आपके कुटुम्ब में भी सुख-शांति छा जायेगी। यही तो मंगल मृत्यु है। ऐसी मृत्यु का स्वागत करके अमर हो जाओ। आखिर कब तक रोते रहोगे ? कब तक परेशान होते रहोगे ?

…और वास्तव में देखा जाये तो आपकी मृत्यु कभी होती ही नहीं है, मरने का कोई उपाय ही नहीं है। वैज्ञानिक कहते हैं कि आदमी जैसा चिन्तन करता है, वैसा ही हो जाता है। यदि कोई सौ बार झूठी कल्पना भी करे तो वैसी कल्पना सच में भी घट सकती है लेकिन मरने की आप लाख बार चेष्टा करो फिर भी नहीं मरते क्योंकि आप एक ऐसा सत्य हो कि वहाँ मृत्यु पहुँच नहीं सकती। यदि मृत्यु आपके आत्मस्वरूप में आये तो वह भी अमर हो जाये।

कोई कह सकता है किः “महाराज ! सारी दुनिया मर रही है। समय पाकर हम भी तो मर जायेंगे।ʹ

परन्तु भैया ! आपने अपनी मृत्यु कभी देखी ही नहीं है। यदि आपने अपनी मृत्य देखी होती तो हजार बार आपका शरीर मरा, उसके साथ आप भी मर जाते। किन्तु ऐसा नहीं होता। दूसरे के शरीर को छूटते हुए देखकर हम कह देते हैं कि हमने मृत्यु देखी है और हम भी मरेंगे। मृत्यु की यह मान्यता हम बना लेते हैं लेकिन जिस आदमी का शव पड़ा होता है वह भी सचमुच मरता नहीं है बल्कि गहरा बेहोश हो जाता है। उसका सूक्ष्म शरीर निकल जाता है और उसकी आगे की यात्रा होने लगती है – मुक्ति की अथवा लोक-लोकान्तरों की यात्रा, कर्म एवं वासनानुसार ऊँच-नीच योनियों में अथवा भगवद् धाम में। जैसे उसके कर्म, भाव, इच्छा की प्रधानता तैसी उसकी यात्रा। अगर कर्म निष्काम हैं, ध्यान-भजन करके भाव ऊँचे कर लिये हैं और तत्त्वज्ञान सुनकर वासनाओं को बाधित कर दिया है, तो फिर उस आत्मारामी जीवन्मुक्त को किसी शरीर में, लोक-लोकान्तर में अथवा भगवद् धाम में जाना नहीं पड़ता। अखिल ब्रह्माण्ड में सूक्ष्म शरीर सूक्ष्म तत्त्वों में विलीन हो जाता है और स्वयं व्पाप जाता है, परमेश्वर-स्वभाव में एकाकार हो जाता है।

चंदा को चाँदनी, सूरज को तेज, जल को रस, पृथ्वी को गन्ध, हवाओं को स्पर्श की सत्ता जिस परम चैतन्य से मिलती है, उस आत्मब्रह्म में वह आत्मवेत्ता, आत्म-साक्षात्कारी महापुरुष एक हो जाता है। जिसके ध्यान, आनंद और सामर्थ्य से ब्रह्मा, विष्णु, महेश और अन्य देव समर्थ हैं वह परम समर्थ तत्त्व सच्चिदानंदस्वरूप है। जैसे बिन्दु सिन्धु में मिलकर सिन्धु हो जाता है, जैसे घटाकाश महाकाश में मिलकर महाकाश हो जाता है वैसे ही वह जीव ब्रह्म में मिलकर ब्रह्म हो जाता है। वासना और कर्म के वशीभूत होकर निगुरे लोग, शास्त्र-विरूद्ध रास्ते पर चलने वाले लोग नरक और ऊँच-नीच योनियों में जाते हैं जबकि भक्त एवं गुरुमुख लोग यक्ष, गन्धर्व, देव आदि योनियों एवं स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होते हैं। दृढ़ भगवद् भक्त भगवद् धाम में  पहुँचते हैं और उनकी जैसी इच्छा एवं कर्मानुकूलता होती है, समय पाकर फिर वैसी यात्रा होती है। जीव का यह सिलसिला तब तक चलता रहता है जब तक जीव अपने ब्रह्मस्वरूप को नहीं जान लेता। स विषय को बार-बार पढ़ो, समझो और सोचो तथा पूर्णता को पाने का पूर्ण पुरुषार्थ करो। पूर्णता पाना कठिन नहीं, पर जिन्हें कठिन नहीं लगता उनमें श्रद्धा-विश्वास बने रहना कठिन है। माता देवहूति ने श्रद्धा-विश्वास से जहाँ आत्मसिद्धि पायी, वह स्थान आज गुजरात राज्य में सिद्धपुर के नाम से विख्यात है। कार्तिक क्षेत्र का बिन्दु सरोवर अभी भी माता देवहूति की श्रद्धा-विश्वास की सुवास फैला रहा है। माता देवहूति ने अपने अपने आत्मसाक्षात्कारी, आत्मारामी पुत्र कपिलदेव में श्रद्धा विश्वास करे ऊँची स्थिति पायी, आत्मसिद्धि पायी।

जैसे, जब शल्यक्रिया की जाती है तब ʹक्लोरोफॉर्मʹ आदि सूँघाकर मरीज को बेहोश कर दिया जाता है और उसकी किडनी आदि बदल दी जाती है। ऐसे ही प्रकृति बड़ी-से-बड़ी शल्यक्रिया करती है और पूरा शरीर ही बदल देती है। मनुष्य के कर्मानुसार उसे घोड़ा, गधा या चूहा आदि किसी भी शरीर में बदल देती है। इसीलिए आदमी एक मुहूर्त के लिए बेहोश हो जाता है, उसे मूर्च्छा आ जाती है लेकिन उसकी मृत्यु नहीं होती।

जो लोग मूर्च्छा में मरते हैं उऩका मरना जारी रहता है और वे अपने को मरणधर्मा मानते हैं लेकिन जिन्होंने फकीरों की कृपा प्राप्त कर ली है, जो फकीरों के श्रीचरणों तक पहुँच चुके हैं वे सजाग हो जाते हैं। वे मृत्यु को भी उसी तरह देख लेते हैं जैसे मनुष्य अपने शरीर या शरीर के दर्दकारक अंग को देख पाता है। उसी प्रकार वे मृत्यु को भी शरीर पर घटते हुए देख लेते हैं। जो मृत्यु को भी होश के साथ देख लेते हैं वे अमर हो जाते हैं और जो बेहोश हो जाते हैं वे मरते ही रहते हैं।

आत्मसाक्षात्कार का अर्थ है कि होश से जियें, सजग होकर जियें। जो होश से जी सकता है वह होश से मर भी सकता है। उसका मरना भी मरना नहीं होता वरन् वह अमर हो जाता है, लेकिन जो बेहोशी में जीता है, वह मरता रहता है।

बेहोशी क्या है ? जैसा अहं का वेग आये, वैसा ही करने लगे। मन में जैसी धारणा बनी या बुद्धि ने जैसा निर्णय दिया वैसा ही काम करने लगे, यह बेहोशी है। होश क्या है ? धारणा, ध्यान, समाधि, प्राणायाम, आत्मविचार आदि करते हुए अपनी असलियत को जान लेना, अपने अहं का विसर्जन कर देना, यह होश है। शाह लतीफ कहते हैं किः

जे भाई जोगी थियां, तमा छद् तमाम।

सबूर जे शमशेर सां कर कीन्हे खे कतलाम।।

अगर आपको होश से मरना है तो योगी बनो और योगी होना है तो जो तमन्नाएँ स्फुरती हैं उन्हें हटाते जाओ। जो-जो इच्छाएँ उठती हैं उऩ्हें हटाते जाओ। तमन्नाएँ छोड़कर सब्र करो तो यह संभव है कि आप विराट से मिल सकते हो, आप विराट में विसर्जित हो सकते हो।

गोला जे गोलन्ह जा, तिनजो थिऊ गुलाम।

नागा तुहिंजो नाव, लिख जे लाहू तिन में।।

अर्थात् ʹसच्चे संतों के दासों के दास बन जाओ।ʹ

यदि आप सब दुःखों से छूटना चाहते हो, यदि आप परम ओज को प्राप्त करना चाहते हो तो इच्छाओं के गुलाम मत बनो, इच्छाओं के पीछे मत भागो, वरन् इच्छाओं के भी द्रष्टा हो जाओ।

अनेक इच्छाएँ उठती रहती हैं। उनमें पचासों इच्छाएँ तो व्यर्थ की होती हैं, थोड़ी ही धर्म के अनुकूल होती हैं। जो इच्छाएँ धर्म के अनुकूल हों एवं आपकी उन्नति में सहायक हों उन्हें सहयोग दो, उन्हें पूरी करने में शक्ति और समय लगाओ लेकिन जो इच्छाएँ आपकी उन्नति एवं धर्म के खिलाफ हों उन इच्छाओं को उठते ही हटा दो।

जो इच्छाओं-वासनाओं के पीछे नहीं भागता, वरन् उनका द्रष्टा हो जाता है वह असंगता का शस्त्र लेकर दृढ़ता से इच्छाओं का छेदन कर डालता है और ऐसी जगह पर पहुँच जाता है, जहाँ से फिर उसे जन्म-मरण के चक्र में नहीं आना पड़ता। उसकी मृत्यु भी अमरता में परिणत हो जाती है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 1999, पृष्ठ संख्या 2-6, अंक 84

ૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐ

दान का रहस्य


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन

स्नान-दान आदि पुण्य कर्म हैं किन्तु दान करते समय दाता अगर आनंदित नहीं हुआ, उसके भीतर शुभ का भाव उदित नहीं हुआ तो दान का सुखद फल नहीं मिलता। जो दान जबरदस्ती करवाया गया हो, झिझकते हुए किया गया हो, दबास से कराया गया हो-स्वर्ग में भी उसका कोई सुखद फल नहीं मिलता।

कोई नेता आकर किसी सेठ से कहेः “अरे भाई ! दान करो।”

सेठ कहेः “लिखो, दो हजार।”

“नहीं नहीं, सेठ ! आपका तो 11 हजार लिखेंगे।”

सेठ का मन में होता है कि ʹयह नेता तो जरा ऐसा ही। अगर पाँच नहीं दूँगा तो कहीँ आयकरवालों से छापा न मरवा दे !ʹ अतः वह बोलता हैः “साहब ! ऐसा करें कि दो नहीं, पाँच हजार लिख लें।”

सेठ बाहर से तो पाँच की उदारता दिखाता है किन्तु भीतर से सुखी नहीं होता। उसे दान भाव का एहसास नहीं होता, वरन् ऐसा होता है कि ʹचलो, मुसीबत टली।ʹ

जब दान अपनी ओर से दिया जाता है जैसे किसी दरिद्र को उसकी आवश्यकता की वस्तु का दान दे दिया, किसी रोगी को औषधि का दान दे दिया, किसी थके-हरे, निराश व्यक्ति को सान्त्वना का दान दे दिया, अभक्त को भगवान की भक्ति का दान दिलवा दिया…. तब ऐसे दान का भी यदि अंतःकरण में आनंद आता है तो ठीक, अन्यथा ऐसे दान का भी ज्यादा महत्त्व नहीं है।

इस प्रकार दान का भी अपना एक रहस्य है। इस संदर्भ में शास्त्रों में एक प्रसंग आता हैः

एक बार देवर्षि नारद महीसागर संगम में स्नान हेतु पधारें। उसी समय वहाँ बहुत से ऋषि-मुनि भी आ पहुँचे। नारदजी ने उनसे पूछाः “महात्माओं ! आप लोग कहाँ से पधारे हैं ?”

उन्होंने बतायाः “मुने ! हम लोग सौराष्ट्र देश में रहते हैं, जहाँ के राजा धर्मवर्मा हैं। एक बार राजा धर्मवर्मा ने दान के तत्त्व को समझने के लिए बहुत वर्षों तक तपस्या की। तब आकाशवाणी ने उन्हें निम्नांकित श्लोक सुनायाः

द्विहेतुः षडधिष्ठानं षडंगं च द्विपाकयुक्।

चतुष्प्रकारं त्रिविधं त्रिनाशं दानमुच्यते।।

ʹदान के दो हेतु, छः अधिष्ठान, छः अंग, दो फल, चार प्रकार, तीन भेद एवं तीन विनाश साधन हैं।ʹ

यह श्लोक कहकर आकाशवाणी मौन हो गयी। राजा के पूछने पर भी आकाशवाणी ने उसका अर्थ नहीं बतलाया तब राजा ने ढिंढोरा पिटवाकर यह घोषणा करवायी किः ʹजो इस श्लोक की ठीक-ठीक व्याख्या करेगा, उसे मैं सात लाख गौएँ, उतनी ही स्वर्णमुद्राएँ तथा सात गाँव दूँगा।ʹ हम सब वहीं से आ रहे हैं। श्लोक का अर्थ दुर्बोध होने से कोई उसकी व्याख्या नहीं कर सकता है।”

नारदजी यह सुनकर बड़े प्रसन्न हुए। वे एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप लेकर धर्मवर्मा के पास पहुँचे एवं बोलेः

“राजन ! मुझसे उस श्लोक की व्याख्या सुनिये एवं उसके बदले में जो देने के लिए ढिंढोरा पिटवाया है, उसकी सत्यता प्रमाणित कीजिये।”

राजाः “ब्राह्मण ! ऐसी बात तो बहुत-से ब्राह्मण कह चुके किन्तु किसी ने भी उसका वास्तविक अर्थ नहीं बताया। दान के दो हेतु कौन-से हैं ? छः अधिष्ठान एवं छः अंग  कौन से हैं ? दो फल, चार प्रकार, तीन भेद एवं तीन विनाश-साधन कौन-से हैं ? इन सात प्रश्नों के उत्तर यदि आप ठीक-ठीक बतला सकें तो मैं आपको सात लाख गौएँ, सात लाख स्वर्णमुद्राएँ एवं सात गाँव दूँगा।”

ब्राह्मण वेशधारी नारदजी बोलेः “राजन् ! दान के दो हेतु हैं – सामर्थ्य और श्रद्धा। श्रद्धा है और धन नहीं है तो क्या दान दिया जा सकता है ? ऐसे ही सामर्थ्य है पर श्रद्धा नहीं है, तब भी दान नहीं दिया जा सकता।

धर्म, अर्थ, काम, लज्जा, हर्ष और भय-ये दान के छः अधिष्ठान कहे जाते हैं। जो दान सत्पात्र को, सत्प्रवृत्ति के लिए भगवान का समझकर दिया जाये-वह दान उत्तम है। उससे धर्म लाभ होता है।

जो दान इस भाव से दिया जाये कि यहाँ देंगे तो वहाँ (परलोक में) मिलेगाʹ – यह अर्थयुक्त दान है।

कोई कामना पूर्ण हुई और दान कर दिया-यह कामयुक्त दान है। जैसे ʹमेरा इतना काम हो जाये तो मैं बूंदी के सवा मन लड्डू चढ़ाऊँगा।ʹ जिस दान में यह भाव हो कि ʹकई लोग कर रहे हैं। हम कुछ नहीं देंगे तो ठीक नहीं। चलो, कुछ दे देवें।ʹ यह लज्जायुक्त दान है। यदि दान नहीं देंगे तो पता नहीं, यह हमारा अहित न कर दें – इस भाव से जो दान दिया जाता है, वह भययुक्त दान है।

किसी भाट-चारण ने प्रशंसा कर दी और हर्षित होकर उसे कुछ दे दिया – इस प्रकार दान हर्षयुक्त दान कहलाता है।

इस प्रकार धर्म, अर्थ, काम, लज्जा, भय और हर्ष – ये दान के छः अधिष्ठान हैं। इन्हीं के कारण दान होता है।

दान के छः अंग हैं-1. दाता अर्थात् दान करने वाला। 2.  प्रतिगृहता अर्थात् दान लेने वाला। 3. शुद्धि अर्थात् अपनी शुद्ध कमाई का। कसाई, वेश्या आदि का धन अशुद्ध माना जाता है। 4. धर्मयुक्त देय वस्तु अर्थात् पवित्र वस्तु। 5. देश अर्थात् पवित्र स्थान। 6. काल अर्थात् पवित्र समय।

इहलोक एवं परलोक – दान के ये दो फल हैं।

ध्रुव, त्रिक, काम्य और नैमित्तिक – ये दान के चार प्रकार हैं। कुआँ-पोखरा खुदवाना, बगीचा लगाना आदि जो सबके काम आये वह ध्रुव है।

नित्य दान ही त्रिक है। संतान, विजय, स्त्री आदिविषयक इच्छापूर्ति के लिए दिया गया दान काम्य है। ग्रहण-सक्रान्ति आदि पुण्य अवसरों पर दिया गया दान नैमित्तिक  है।

उत्तम, मध्यम, कनिष्ठ – ये दान के तीन भेद हैं।

दान देकर पछताना, कुपात्र को दान देना, बिना श्रद्धा के दान देना अर्थात् पश्चाताप, कुपात्र और अश्रद्धा – ये दान के तीन नाशक हैं।

राजन ! इस प्रकार मैंने तुम्हें तुम्हारे सात प्रश्नों के जवाब के रूप में दान का माहात्म्य सुना दिया।”

प्रश्नों के समुचित उत्तर पाकर धर्मवर्मा अत्यन्त चकित हुआ एवं बोलाः “जिस प्रश्न को बड़े-बड़े विद्वान तक न सुलझा पाये, उन्हें आपने बड़ी सरलता से बता दिया। वृद्ध ब्राह्मण के वेश में छुपे हुए आप कौन हैं ? कृपा आप अपने असली स्वरूप में प्रगट होइए।”

तब देवर्षि नारद अपने असली स्वरूप में आकर बोलेः “मैं देवर्षि नारद हूँ। मृत्युलोक के ब्राह्मण तुम्हें जवाब नहीं दे सके इसीलिए बूढ़े ब्राह्मण का रूप बनाकर मैं स्वयं उत्तर देने आया।”

राजा ! मेरा अहोभाग्य ! अब आप ये सात लाख गौएँ, सात लाख मुद्राएँ एवं सात गाँव लेने की कृपा कीजिये।”

देवर्षि नारदः “ठीक है। तुम्हारा संकल्प मैं ले लेता हूँ। अभी इन चीजों को मैं तुम्हारे पास ही धरोहर के रूप में छोड़ रहा हूँ। आवश्यकता पड़ने पर ले लूँगा।

ऐसा कहकर नारद जी रैवतक पर्वत पर चले गये और विचारने लगे कि मैंने भूमि, गौएँ एवं स्वर्णमुद्राएँ पा लीं, पर अब योग्य ब्राह्मण कहाँ मिले जिसे मैं ये सब दान दे सकूँ ? यह सोचकर उन्होंने बारह प्रश्न बनाये और उन्हें ही गाते हुए वे ऋषियों के आश्रमों पर विचरने लगे। नारदजी उन प्रश्नों को पूछते हुए सारी पृथ्वी घूम आये, पर कहीं उन प्रश्नों का समाधान न हुआ। योग्य ब्राह्मण न मिलने के कारण नारदजी बड़े दुःखी हुए और हिमालय पर्वत पर एकान्त में बैठकर विचारने लगे। सोचते-सोचते अकस्मात् उनके ध्यान में आया कि ʹमैं कलापग्राम तो गया ही नहीं। वहाँ 84 हजार विद्वान ब्राह्मण नित्य तपस्या करते हैं। सूर्य-चन्द्र वंश एवं सदब्राह्मणों के पुनः प्रवर्त्तक देवापि और मरूत वहीं रहते हैं।ʹ यों विचारकर वे आकाशमार्ग से कलापग्राम पहुँचे। वहाँ उन्होंने बड़े तेजस्वी, विद्वान एवं कर्मनिष्ठ ब्राह्मणों को देखा। उन्हें देखकर नारदजी बड़े प्रसन्न हुए। ब्राह्मण जहाँ बैठे शास्त्र-चर्चा कर रहे थे, वहाँ जाकर नारदजी ने कहाः “आप लोग यह क्या काँव-काँव कर रहे हैं ? यदि कुछ समझने की शक्ति है तो मेरे कठिन प्रश्नों का समाधान कीजिये।”

यह सुनकर ब्राह्मण बड़े अचंभे में पड़ गये और बोलेः “वाह ! सुनाओ तो जरा अपने प्रश्नों को।”

नारदजी ने कहाः “मेरे बारह प्रश्न इस प्रकार हैं- 1 मातृका क्या और कितनी हैं ? 2 . पच्चीस वस्तुओं से बना अदभुत गृह क्या है ? 3. अनेक रूपोंवाली स्त्री को एक रूपवाली बनाने की कला का ज्ञान किसको है ? 4. संसार में विचित्र कथा की रचना कौन जानता है ? 5. समुद्र में बड़ा ग्राह कौन है ? 6. आठ प्रकार के ब्राह्मण कौन हैं ? 7. चार युगों के आरम्भ दिन कौन से हैं ? 8. चौदह मन्वन्तरों का आरम्भ किस दिन हुआ ? 9. सूर्यनारायण रथ पर पहले-पहल किस दिन बैठे ? 10. काले साँप की तरह प्राणियों का उद्वेजक कौन है ? 11. इस घोर संसार में सबसे बड़ा चतुर कौन है ? 12. दो मार्ग कौन-से हैं ?”

नारदजी के प्रश्नों को सुनकर वे मुनि कहने लगेः “मुने ! आपके ये प्रश्न तो बालकों के प्रश्न जैसे हैं। आप यहाँ जिसे सबसे छोटा एवं मूर्ख समझते हों, उसी से पूछिये। वही इनका उत्तर दे देगा।”

अब नारदजी बड़े विस्मय में पड़ गये ! उन्होंने एक बालक से, जिसका नाम सुतनु था, ये प्रश्न पूछेः सुतनु ने कहाः “इन बालोचित प्रश्नों के उत्तर में मेरा मन नहीं लगता। फिर भी आपने मुझे सबसे छोटा एवं मूर्ख समझा है, इसलिए कहना पड़ता है। आपके प्रश्नों के उत्तर क्रमशः इस प्रकार हैं-

1.अ,आ,इ,ई…..वगैरह बावन अक्षर ही मातृका हैं। 2. पच्चीस तत्त्वों से बना हुआ गृह यह शरीर ही है। 3. बुद्धि ही अनेक रूपों वाली स्त्री है। जब इसके साथ धर्म का संयोग होता है तब यह एकरूपा हो जाती है। 4. विचित्र रचनायुक्त कथन करना पण्डित ही जानते हैं। 5. इस संसारसागर में लोभ ही महाग्राह है। 6. मात्र, ब्राह्मण, श्रोत्रिय, अनूचान, भ्रूण, ऋषिकल्प, ऋषि और मुनि – ये आठ प्रकार के ब्राह्मण हैं। इनमें जो केवल ब्राह्मणकुल में उत्पन्न हैं और संस्कार आदि से हीन हैं, वह ʹमात्रʹ हैं। कामनारहित होकर सदाचारी, वेदोक्त कर्मकाण्डी ब्राह्मण ʹब्राह्मणʹ कहा जाता है। वेद-वेदांगों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर षट्कर्मपरायण ब्राह्मण ʹश्रोत्रियʹ है। वेद का पूर्ण तत्त्वज्ञ, शुद्धात्मा, केवल शिष्यों को अध्यापन कराने वाला ब्राह्मण ʹअनूचानʹ है। यज्ञावशिष्ट भोजी पूर्वोक्त अनूचान ही ʹभ्रूणʹ है। लौकिक, वैदिक समस्त ज्ञान से परिपूर्ण, जितेन्द्रिय ब्राह्मण ʹऋषिकल्पʹ है। ऊर्ध्वरेता, निःसंशय, शापानुग्रह-सक्षम, सत्यसन्ध ब्राह्मण ʹऋषिʹ है। सदा ध्यानस्थ, मृत्तिका और सुवर्ण में तुल्य दृष्टिवाला ब्राह्मण ʹमुनिʹ है।

अब सातवें प्रश्न का उत्तर सुनिये। कार्तिक शुक्ल नवमी को सतयुग का, वैशाख शुक्ल तृतिया को त्रेता का, माघ कृष्ण अमावस्या को द्वापर का और भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी को कलियुग का आरंभ हुआ। अतः उक्त तिथियाँ युगादि कही जाती हैं।

8.आश्विन शुक्ल नवमी, कार्तिक शुक्ल द्वादशी, चैत्र शुक्ल तृतिया, भाद्रपद शुक्ल तृतिया, फाल्गुन कृष्ण अमावस्या, पौष शुक्ल एकादशी, आषाढ़ शुक्ल दशमी, माघ शुक्ल सप्तमी, श्रावण कृष्ण अष्टमी, आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा और ज्येष्ठ की पूर्णिमा – ये स्वायम्भुव आदि चौदह मन्वन्तरों की आदि तिथियाँ हैं।

9.माघ शुक्ल सप्तमी को पहले-पहल भगवान सूर्य रथ पर सवार हुए थे। 10. सदा माँगने वाला ही उद्वेजक है। 11. पूर्ण चतुर या दक्ष वही है, जो मनुष्य जन्म का मूल्य समझकर इससे अपना पूर्ण निःश्रेयसादि सिद्ध कर लेता है। 12. ʹअर्चिʹ और ʹधूमʹ ये दो मार्ग हैं। अर्चि मार्ग से जाने वालों को मोक्ष होता है और धूममार्ग से जाने वालों को पुनः लौटना पड़ता है।

इन उत्तरों को सुनकर नारदजी बड़े प्रसन्न हुए और उस बालक को धर्मवर्मा से प्राप्त अपनी भूमि, सात लाख गौएँ आदि सब दान कर दिया।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 1999, पृष्ठ संख्या 13-16, अंक 83

ૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐ

जीवन की सहजता


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

जो सहज जीवन जीता है, उसका जीवन खूब सरल एवं आनन्द से परिपूर्ण होता है। मूर्ख एवं अहंकारी लोग जीवन को जटिल बना देते हैं। उनका जीवन अपने तथा औरों के लिए समस्या बन जाता है।

तीन प्रकार के लोग होते हैं- एक वे होते हैं जो ʹयह करूँ…. यह न करूँ…. यह छोड़ूँ…. यह पकड़ूँ…..ʹ ऐसी मान्यता रखते हैं। दूसरे प्रकार के वे लोग होते हैं जो कुछ भी करके अपने को बड़ा दिखाना चाहते हैं। ऐसे लोगों का जीवन उलझा हुआ होता है अथवा अधमतापूर्वक नष्ट होता है। तीसरे प्रकार के वे लोग होते हैं जो अपना व्यवहार इस ढंग से करते हैं कि जहाँ हैं, जैसे हैं, ठीक हैं। व्यवहार में अनाग्रहपूर्ण बुद्धि रखकर जीवन के रहस्य को, जीवन के छुपे खजाने को प्राप्त करने में अपना जीवन बिताते हैं, उनका जीवन सार्थक है।

जिसे कुछ बनने की, कुछ करने की इच्छा होती है वे तो किसी-न-किसी प्रकार के आग्रह से घिरे ही रहते हैं। कोई अपने को तपस्वी मानता हो। उसके पास यदि आप जाओ तो वह आपको कहेगा कि ʹबीड़ी सिगरेट छोड़ दो, मांस-मछली-अण्डे छोड़ दो…।ʹ आपने यह सब छोड़ा हा है तो कहेगा कि ʹलहसुन, प्याज छोड़ दो।ʹ आप ये छोड़कर आगे बढ़ना चाहोगे तो कहेगा कि ʹतीन बार भोजन करते हो तो दो बार ही करो।ʹ आप दो बार खाने लगोगे तो कहेगा कि ʹअब एक वक्त का भोजन बंद कर दो।ʹ एक बार खाते होगे तो कहेगा कि ʹनमक बंद कर दोʹ। आप वह भी बन्द कर दोगे तो कहेगा कि ʹअनाज छोड़ दो। अब फलाहार करने लगो।ʹ छोड़ो….. छोड़ो…. छोड़ते जाओ… छोड़ते जाओ…. फिर कहेगा कि ʹफल खाते हो, तपस्वी हो तो अब संसार में क्या रहना ? पत्नी और बच्चों को भी छोड़ दो।ʹ मान लो, वह भी छूट गया तो कहेगा कि ʹसब छूट गया, अब वस्त्रों को भी छोड़ दो। कौपीन पहनो।ʹ

जीवन जीने का यह एक मार्ग हैः त्याग….त्याग….त्याग…

जिन्होंने सब छोड़ दिया है, जो केवल कौपीन पहनते हैं, फलाहार अथवा भिक्षा पाते हैं एवं ईश्वर का चिंतन करते हैं उनके जीवन में यदि सत्संग नहीं है तो कोई दिव्य संगीत नहीं होता। जीवन में जो दबा हुआ होता है, वह कभी-कभार समय पाकर प्रगट हो जाता है कि ʹतू मुझे नहीं जानता, मैं कबसे घर-बार छोड़कर यहाँ बैठा हूँ ? संसारी लोग क्या जानें कि भजन क्या होता है ? तपस्या क्या होती है ? मैं लहसुन नहीं खाता, प्याज नहीं खाता…. मैंने बार-बच्चों को छोड़ दिया, पत्नी को छोड़ दिया…. मैं कोई जैसा-तैसा साधु थोड़े ही हूँ ? मेरे आगे तू क्या डींग मारता है?ʹ

अच्छा है, ठीक है कि छोड़ पाये हो, लेकिन छोड़कर आने की याद चित्त में अभी तक बनी हुई है। यह उचित नहीं है। अपने अहंकार को सजाने के लिए जो कुछ करते हो वह अनुचित है। आपके पास चीज-वस्तुएँ, रूपये पैसे होना कोई खराब बात नहीं है लेकिन दूसरों का शोषण करके, दूसरों को सताकर एकत्रित की गयी अथवा जिनका सदुपयोग न किया जा सका हो ऐसी चीजों, रुपयों पैसों का होना न होना बराबर ही है।

कुछ वर्ष पहले किसी व्यक्ति ने मुझे बताया किः “चार गधे लेकर जो आदमी यहाँ रोड पर काम करता था, उसके पास अब 25-30 लाख रूपये हैं लेकिन उसकी पत्नी हमारी कॉलोनी में 10-10 पैसे में नींबू बेचती है।”

बाह्य पदार्थ पाकर तो हम खूब ऊँचे दिखते हैं लेकिन समझ नहीं होती तो भीतर से हम खूब नीचे रह जाते हैं। अंदर या बाहर से न ऊँचे दिखने की कोशिश करो, न अपने को नीचा मानने की भूल करो। दिखना-मानना, यह सब सापेक्ष है। अपने को ऊँचा तब मानोगे, जब दूसरे को नीचा मानोगे। अपने को नीचा तब मानोगे जब दूसरे को ऊँचा मानोगे। लव-कुश आपके आगे बहुत अच्छे लगेंगे, बड़े समर्थ लगेंगे लेकिन श्रीराम के आगे उतने बड़े व समर्थ नहीं लगेंगे। तहसीलदार किसी  क्लर्क के आगे बड़ा दिखेगा लेकिन कलेक्टर के पास जाये तो छोटा दिखेगा। कलेक्टर मंत्री के आगे छोटा लगेगा। वह मुख्यमंत्री भी प्रधानमंत्री के आगे छोटा लगेगा।

बड़ों के आगे आप छोटे हो जाते हो और छोटों के आगे आप बड़े बन जाते हो। मूर्ख के आगे आप विद्वान लगते हो परन्तु अपने से अधिक विद्वान के आगे आप मूर्ख लगते हो। यह सापेक्ष दृष्टि है और सापेक्ष दृष्टि में हमेशा भय, घृणा, लज्जा आदि बने ही रहते हैं।

एक सुनी हुई घटना है, एक फौजी था। उसी पदोन्नति होते-होते वह कमाण्डर बन गया। जब वह परेड लेने जात अथवा कहीं घूमने जाता, तब दूसरे फौजी उसे सलाम करते। उनके सलाम करने पर कमाण्डर के मुख से स्वाभाविक ही निकल जाता किः “ऐसे ही तो करते हो !”

उसके निकट के दो अंगरक्षक बार-बार यह सुनते। वे आपस में कहते किः “जब भी कमाण्डर को कोई सलाम करता है तो उनके मुख से स्वाभाविक ही निकल जाता है कि ʹऐसे ही तो करते हो !ʹ इसका क्या कारण है ?” आखिर एक दिन उन्होंने अपने कमाण्डर से पूछ ही लियाः “साहब ! पिछले काफी समय से हम आपके साथ रह रहे हैं। जब कोई आपको सलाम करता है तब आप उसके ऊपर नाराज हो जाते हैं एवं कहते हैं किः ʹऐसे ही तो करते हो !ʹ इसका कारण क्या है ?”

कमाण्डर ने कहाः “इसका एक ही कारण है। मैं भी पहले सिपाही था। सलाम कर-करके बड़े पद पर पहुँचा हूँ। मैं जब सिपाही था, तब कोई साहब आता तो मुझे जबरदस्ती सलाम करनी पड़ती थी। ʹवे कब यहाँ से जायें ?ʹ इस भाव से, बिना प्रेम के उन्हें सलाम करता था। अब सभी मुझे सलाम करते हैं तो मुझे लगता है कि ये सब भी मुझे आदर नहीं देते, मुझे सलाम नहीं मारते, वरन् इस पद को सलाम करते हैं। वह भी करना पड़ता है, इसलिए करते हैं। इसीलिए मेरे मुँह से ʹऐसे ही तो करते होʹ – यह स्वाभाविक निकल जाता है।”

जीवन में जो भी प्रेम बिना का होगा, वह लेने वाला को भी बोझा लगेगा और देनेवाले को भी आनंद नहीं आयेगा। जो कुछ होगा, उसमें अहंकार की दुर्गंध आयेगी। लेकिन जिसके जीवन में हृदय की विशालता होगी, शुद्ध प्रेम होगा, उसका जीवन खिल उठेगा, सहज आनंदस्वभाव से परितृप्त हो उठेगा। फिर ʹयह करना है… यह छोड़ना है… यह पाना है….ʹ आदि नहीं बचेगा। जो भी करना होगा, वह सहज स्वाभाविक होता जायेगा। ऐसा जीवन जीने वाला ही अपने सहज स्वरूप को पा लेता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 1999, पृष्ठ संख्या 2,3 अंक 83

ૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐ