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मन एक कल्पवृक्ष


मन के साथ यदि मित्रता की जाये, विवेक से उसे उच्च लक्ष्य की ओर मोड़ा जाये तो वह बड़ा लाभ दे सकता है और यदि उसकी अधीनता स्वीकार करके, उसके कहे में आकर बह गये तो वह वह मन बड़ी हानि भी पहुँचा सकता है। इसीलिए शास्त्रों ने कहा हैः

मनः एव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयोः।

ʹमन ही मनुष्य के बंधन और मुक्ति का कारण है।ʹ

यदि मन अनात्म देह में, अनात्म भोगों में, अनात्म जगत में आकर स्थित होता है तो वह मनुष्य का शत्रु हो जाता है और वही मन अगर आत्मा-परमात्मा की ओर आकर्षित होता है, परमात्म-संबंधी बातों का श्रवण, मनन और निदिध्यासन करता है तो वह मन मित्र का काम करता है और सूक्ष्मता को पाकर परम सूक्ष्म परमात्मतत्त्व का साक्षात्कार भी कर लेता है।

मन जितना-जितना सूक्ष्म होता जायेगा, उतनी-उतनी विश्रांति अच्छी लगेगी और जितनी-जितनी विश्रांति लेंगे, उतना-उतना मन सूक्ष्म होगा।

मनुष्य का मन जितना स्थूल होगा, उसे जगत उतना सच्चा लगेगा, भोगों के प्रति आकर्षण होगा और वह तुच्छ होता जायेगा। जितना-जितना उसे जगत स्वप्न जैसा लगेगा, भोगों से उपरामता होगी और उसका मन सूक्ष्म होता जायेगा एवं विश्रांति लेता जायेगा, उतना-उतना वह व्यक्ति महान होता जायेगा।

चित्त की विश्रांति क्यों नहीं होती ? ध्यान क्यों नहीं लगता ?

हम बदलने वाले संसार को, बदलने वाली परिस्थितियों को हृदय में इतनी जगह दे बैठे हैं कि चित्त की विश्रांति नहीं हो पाती है। अगर अपने स्वरूप को पाने की इच्छा उत्पन्न हो जाये और तत्संबंधी प्रयास करें तो विश्रांति पाना आसान हो जाये। तेरह निमेष तक परब्रह्म परमात्मा में विश्रांति पाने से जगतदान करने का फल प्राप्त होता है। सत्रह निमेष तक उस सच्चिदानंद परमात्मा में डूबने से अश्वमेध यज्ञ करने का फल मिलता है और यदि कोई आधा घण्टा तक उस परमात्मस्वरूप में विश्रांति पा ले तो वह यक्ष, गंधर्व, किन्नरों और देवताओं से भी पूजे जाने योग्य हो जाता है।

यदि कोई प्रारंभिक जिज्ञासु है, ईश्वर की ओर चल रहा है, उसके सामने दो-चार कर्त्तव्य एक साथ आ जाते हैं और वह व्यावहारिक कर्त्तव्यों को मूल्य देता है, स्थूल जगत को सत्य मानकर जीनेवालों की बातों को मूल्य देता है तो बेचारा उलझ जाता है और उसका समय उसी में नष्ट हो जाता है। अगर वह विवेकशील है तो कर्त्तव्य उसे व्यवहार में तो खींचेंगे जैसे, पत्नी के प्रति कर्त्तव्य, पति के प्रति कर्त्तव्य, समाज के प्रति कर्त्तव्य और देह के प्रति कर्त्तव्य… फिर भी वह इन कर्त्तव्यों में उलझेगा नहीं और उसका अपना जो वास्तविक कर्त्तव्य है – अपने आत्मस्वरूप को जानने का,  उसी को महत्त्व देगा।

व्यक्ति की जैसी मति और जैसा उसका संग होगा वैसे ही कर्त्तव्यों को वह मूल्य देगा। अगर उसकी मति श्रेष्ठ है, उसका संग ऊँचा है तो वह ऊँचे कर्त्तव्यों को मूल्य देगा। यदि उसकी मति मध्यम है तो वह मध्यम कर्त्तव्यों को मूल्य देगा और यदि उसकी मति हल्की है तथा उसका संग भी हल्का है तो फिर वह निम्न कर्त्तव्यों को मूल्य देगा।

स्वामी रामतीर्थ कहा करते थेः “कर्ज लेकर, उधार लेकर बेटे बेटियों की शादी की खुशी मनाना-हाय रे तेरा फर्ज ! … घूस लेकर, रिश्वत लेकर भी ठाठ-बाट करना – हाय रे तेरा फर्ज !…. छल-कपट करके भी देह-वस्त्र-घर को सजाना-हाय रे तेरा फर्ज !…. हे मानव ! क्या तेरा यही फर्ज है ? जिंदगी भर चिन्ताओं की गठरियाँ उठाते रहना, अन्तःकरण को मलिन करते रहना-क्या यही तेरा फर्ज है ? नहीं, तेरा मुख्य फर्ज है आत्मसिंहासन पर आने का, अपने आत्मराज्य में आने का, अपने असंग स्वभाव में नहीं आयेगा और प्रकृति के स्वभाव में बहता रहेगा तो फिर कौन से शरीर में तू अपना वास्तविक फर्ज निभायेगा ?”

जब मानव का विवेक सजाग हो उठता है तब उसे ये विचार सहज ही आने लगते हैं किः ʹमैं कब तक सामान्यजों की नाईं राग-द्वेष, अस्मिता और अभिनिवेश में आकर अपना जीवन बरबाद करता रहूँगा ? एक दिन…. दो दिन… सप्ताह… मास… वर्ष…. ऐसा करते-करते समय बीतता चला जा रहा है और जो करने जैसा कार्य है – आत्मस्वरूप में विश्रांति पाने का – उसकी मुझे सुधि तक नहीं है ! मैं कब तक ऐसी माया में फँसा रहूँगा ?…ʹ इस प्रकार का जगा हुआ विवेक मनुष्य को सहज ही में परमात्मप्राप्ति के लक्ष्य की ओर प्रेरित करने लगता है, संसार के भोगों से वैराग्य बढ़ाने लगता है और वह पहुँच जाता है किसी संत-महापुरुष के सान्निध्य में।

भोगी पुरुष की अधिक सेवा करने से बुद्धि मंद हो जाती है, नीच प्रकृति के व्यक्तियों की सेवा करने से लाभ नहीं, वरन् हानि ज्यादा होती है जबकि उच्च प्रकृति के व्यक्तियों की सेवा करने और उनके सान्निध्य़ से परम लाभ होता है। इसीलिए तुलसीदास जी ने कहा हैः

एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।

तुलसी संगत साध की, हरे कोटि अपराध।

साधु कौन है ? साध्यते परम कार्यं येन सः साधुः।

जिसने अपना परम कार्य साध लिया है, उसे ʹसाधुʹ कहते हैं। मनुष्य को चाहिए कि वह प्रयत्नपूर्वक साधु पुरुषों की संगति करे एवं उनके मार्गदर्शन के अनुसार साधना करके लक्ष्य-प्राप्ति के पथ पर अग्रसर होता रहे।

तुलसीदास जी ने कहा हैः

यह तन करू फल विषय न भाई।

इस शरीर का फल यह नहीं है कि विषय-भोग मिलें। इस मानवशरीर का फल तो है अपने स्वामी को, परम प्यारे को, परम हितैषी परमात्मा को जानना। गीता में भगवान ने कहा भी हैः

सुहृदं सर्वभूतानां….. ʹमैं प्राणिमात्र का सुहृद हूँ।ʹ वास्तव में केवल वही परमात्मा सबका सुहृद है। संसार के जो लोग बाहर से सुहृद दिखते हैं वे तो चार छः दिन के या केवल शमशान तक के सुहृद हैं, जबकि वह परम सुहृद परमात्मा तो सदियों से हमारे साथ था, है और रहेगा। हम उस परम सुहृद से जुड़ जायें तो हमारा बेड़ा पार हो जाये।

यह हम जानते हैं फिर भी उससे जुड़ नहीं पाते। क्यों ? क्योंकि हम मन-इन्द्रियों से जुड़ जाते हैं, जगत को सच्चा मानकर उससे जुड़ जाते हैं और उसी में इतने उलझे जाते हैं कि उस परम सुहृद से, उस अपने आत्मस्वरूप से जुड़ने का समय ही नहीं मिलता। हालाँकि हम सभी यह जानते हैं कि जगत के ये संबंध सदैव रहने वाले नहीं हैं फिर भी हम उसी के पीछे लगे रहते हैं।

भोले बाबा ने बड़ी सुंदर बात कही हैः

मानव ! तुझे नहीं याद क्या, तू ब्रह्म का ही अंश है ?

कुलगोत्र तेरा ब्रह्म है, सदब्रह्म का तू वंश है।।

संसार तेरा घर नहीं, दो चार दिन रहना यहाँ।

कर याद अपने राज्य की, स्वराज्य निष्कंटक जहाँ।।

जो बदलती हुई चीजों को ʹमेराʹ मान लेता है और साधन को ʹमैंʹ मान लेता है तथा वास्तविक साध्य का जिसको पता नहीं है, जिसके लिए साधन मिला है उस उद्देश्य का जिसको पता नहीं है – वह संसारी है। आँख देखने का साधन है, कान सुनने का साधन है, मन सोचने का साधन है, बुद्धि निर्णय करने का साधन है। इन साधनों का उपयोग करके  हम चाहें तो अपने परम लक्ष्य परमात्मतत्त्व को पा सकते हैं लेकिन इन साधनों को ही ʹमैंʹ मानने की गलती कर बैठते हैं इसीलिए बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं।

यह जरूरी नहीं कि हर जन्म में ये ही साधन और ऐसी ही बुद्धि मिले। यदि पशु-योनि मिलती है तो बुद्धि बहुत घट जाती है, मन की योग्यताएँ कम हो जाती हैं, शरीर की योग्यताएँ भी बदल जाती हैं। अरे, मनुष्य जन्म में ही बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में मन-बुद्धि-इन्द्रियों की क्षमता में अंतर आ जाता है, इतर योनियों की तो बात ही क्या ? बचपन का मन बेवकूफी से भरा हुआ होता है, जवानी का मन विषय-विकारों से भरा हुआ होता है और बुढ़ापे का मन फरियाद से भरा हुआ होता है। लेकिन बचपन, जवानी और बुढ़ापा तो देह की अवस्थाएँ हैं, आपकी नहीं। आप न बालक हो न जवान हो  न बूढ़े हो। वास्तव में जो आप हो उसमें न फरियाद है, न  विकार है और न ही बेवकूफी है। आप तो सबमें व्याप्त, सदा एकरस आत्मा हो। अपने उस वास्तविक स्वरूप को जान लो तो हो जाये बेड़ा पार…

इसके लिए श्रवण, मनन और निदिध्यासन का सहयोग लो। जिसका अंतःकरण अत्यंत शुद्ध है वह तो श्रवणमात्र से ज्ञान पा सकता है। जिसके कुछ कल्मष शेष हैं वह पहले जप-ध्यानादि करके अंतःकरण को शुद्ध करे, यत्नपूर्वक श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन करे, तब उसे बोध होगा जो उससे भी ज्यादा बहिर्मुख है उसका मन तो जप-ध्यानादि में भी शीघ्र नहीं लगेगा। अतः वह पहले निष्काम सेवा के द्वारा अंतःकरण को शुद्ध करे। ज्यों-ज्यों अंतःकरण शुद्ध होता जायेगा, त्यों-त्यों जप ध्यान में मन लगता जायेगा। फिर वह सत्शास्त्र एवं सदगुरु के वचनों का श्रवण करे, मनन एवं निदिध्यासन करे तो ज्ञान को पा लेगा।

साधक को चाहिए कि वह सजातीय वृत्तियों का आदर करे और विजातीय वृत्तियों का त्याग कर दे। सजातीय वृत्ति क्या है ? जो आत्मज्ञान के मार्ग पर हैं उनसे आत्मज्ञान संबंधी शास्त्रों का श्रवण, मनन एवं आत्मवेत्ता महापुरुषों के सान्निध्य में रहने का भाव ʹसजातीय वृत्तिʹ है।

आत्मज्ञान के पथिक को संसारी सुख के प्रसंगों से तो बचना ही चाहिए, संसारी सुख में जो उलझे हुए हैं ऐसे संसारियों से भी बचना चाहिए।

इस प्रकार सावधानी, सतर्कता, विवेक एवं वैराग्य को अपनाकर आप भी उसी तत्त्व को पा सकते हो, जिसमें भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण, ब्रह्माजी, भगवान शिव एवं अन्य अनेकों नामी अनामी महापुरुष रमण कर रहे हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2000, पृष्ठ संख्या 19-22, अंक 86

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गाजर


गाजर को उसके प्राकृतिक रूप में ही अर्थात् कच्चा खाने से ज्यादा लाभ होता है। उसके भीतर का पीला भाग निकालकर खाना चाहिए क्योंकि वह अत्यधिक गरम होता है अतः पित्त दोष, वीर्यदोष एवं छाती में दाह उत्पन्न करता है।

गाजर स्वाद में मधुर-कसैली-कड़वी, तीक्ष्ण, स्निग्ध, उष्णवीर्य, गरम, दस्त को बाँधने वाली, मूत्रल, हृदय के लिए हितकर, रक्त शुद्ध करने वाली, कफ निकालने वाली, वातदोषनाशक, पुष्टिवर्धक तथा दिमाग एवं नस नाड़ियों के लिए बलप्रद है। यह अफारा, संग्रहणी, बवासीर, पेट के रोगों, सूजन, खाँसी, पथरी, मूत्रदाह, मूत्राल्पता तथा दुर्बलता का नाश करने वाली है।

गाजर के बीज गरम होते हैं अतः गर्भवती महिलाओं को उनका उपयोग कभी नहीं करना चाहिए। बीज पचने में भारी होते हैं। गाजर में आलू से छः गुणा ज्यादा कैल्शियम होता है। कैल्शियम एवं कैरोटीन की प्रचुर मात्रा होने के कारण छोटे बच्चों के लिए यह एक उत्तम आहार है। रूसी डॉक्टर मेकनिकोफ के अनुसार गाजर में आँतों के हानिकारक जन्तुओं को नष्ट करने का अदभुत गुण पाया जाता है। इसमें विटामिन ʹएʹ भी काफी मात्रा में पाया जाता है अतः यह नेत्ररोगों में लाभदायक है।

गाजर रक्त शुद्ध करने वाली है। 10-15 दिन केवल गाजर के रस पर रहने से रक्त विकार, गाँठ, सूजन एवं पाण्डुरोग जैसे त्वचा के रोगों में लाभ होता है। इसमें लौह तत्त्व भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। खूब चबाकर गाजर खाने से दाँत मजबूत, स्वच्छ एवं चमकदार होते हैं तथा मसूढ़े मजबूत होते हैं।

विशेषः गाजर के भीतर का पीला भाग खाने से अथवा गाजर खाने के बाद 30 मिनट के अंदर पानी पीने से खाँसी होती है। अत्यधिक मात्रा में गाजर खाने से पेट में दर्द होता है। ऐसे समय में थोड़ा गुड़ खायें। अधिक गाजर वीर्य का क्षय करती है। पित्तप्रकृति के लोगों को गाजर का कम एवं सावधानीपूर्वक उपयोग करना चाहिए।

औषधि-प्रयोग

दिमागी कमजोरीः गाजर के रस का नित्य सेवन करने से कमजोरी दूर होती है।

दस्तः गाजर का सूप लाभदायक है।

सूजनः मरीज को सब आहार त्याग कर केवल गाजर के रस अथवा उबली हुई गाजर पर रहने से लाभ होता है।

मासिक न दिखने पर या कष्टार्तवः मासिक कम आने पर या समय होने पर भी न आने पर गाजर के 5 ग्राम बीजों का 20 ग्राम गुड़ के साथ काढ़ा बनाकर लेने से लाभ होता है। एलौपैथिक गोलियाँ जो मासिक को नियमित करने के लिए ली जाती हैं वे हानिकारक होती हैं।

पुराने घावः गाजर को उबालकर उसकी पुलटिस बनाकर घाव पर बाँधने से लाभ होता है।

खाजः गाजर को कद्दूकस करके अथवा बारीक पीसकर उसमें थोड़ा नमक मिला लें और पानी डाले बिना उसे गर्म करके खाज पर रोज बाँधने से लाभ होता है।

आधासीसीः गाजर के पत्तों पर दोनों ओर घी लगाकर उन्हें गर्म करें। फिर उनका रस निकालकर 2-3 बूँदें कान एवं नाक में डालें। इससे आधासीसी का दर्द मिटता है।

श्वास हिचकीः गाजर के रस की 4-5 बूँदें दोनों नथुनों में डालने से लाभ होता है।

नेत्ररोगः दृष्टिमंदता, रतौंधी, पढ़ते समय आँखों में तकलीफ होना आदि रोगों में कच्ची गाजर या उसके रस का सेवन लाभप्रद है। यह प्रयोग चश्मे का नंबर घटा सकता है।

पाचन संबंधी गड़बड़ीः अरूचि, मंदाग्नि, अपच आदि रोगों में गाजर के रस में नमक, धनिया, जीरा ,काली मिर्च, नींबू का रस डालकर पियें अथवा गाजर का सप बनाकर पियें।

पेशाब की तकलीफः गाजर का रस पीने से खुलकर पेशाब आता है, रक्तशर्करा भी कम होती है। गाजर का हलवा खाने से पेशाब में कैल्शियम, फास्फोरस का आना बंद हो जाता है।

नकसीर फूटनाः ताजी गाजर का रस अथवा उसकी लुगदी सिर एवं ललाट पर लगाने से लाभ होता है।

जलने परः जलने से होने वाली दाह में प्रभावित अंग पर बार-बार गाजर का रस लगाने से लाभ होता है।

हृदय रोगः हृदय की कमजोरी अथवा धड़कनें बढ़ जाने पर गाजर को भून लें या उबाल लें। फिर उसे रात भर के लिए खुले आकाश में रख दें। सुबह उसमें मिश्री तथा केवड़े या गुलाब का अर्क मिलाकर रोगी को देने से लाभ होता है अथवा उसे रोज 2-3 बार कच्ची गाजर का रस पिलायें।

प्रसवपीड़ाः यदि प्रसव के समय स्त्री को अत्यंत कष्ट हो रहा हो तो गाजर के बीजों के काढ़े में एक वर्ष का पुराना गुड़ डालकर गरम-गरम पिलाने से प्रसव जल्दी होता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2000, पृष्ठ संख्या 30, अंक 86

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स्वास्थ्योपयोगी मेथी


आहार में हरी सब्जियों का विशेष महत्त्व है। आधुनिक विज्ञान के मतानुसार हरे पत्तों वाली सब्जियों में ʹक्लोरोफिलʹ नामक तत्त्व रहता है जो कि जंतुओं का प्रबल नाशक है। दाँत एवं मसूढ़ों में सड़न उत्पन्न करने वाले जंतुओं को यह ʹक्लोरोफिलʹ नष्ट करता है। इसके अलावा इसमें प्रोटीन तत्त्व भी पाया जाता है।

हरी सब्जियों में लौह तत्त्व भी काफी मात्रा में पाया जाता है, जो पाण्डुरोग (रक्ताल्पता) व शारीरिक कमजोरी को नष्ट करता है। हरी सब्जियों में स्थित क्षार रक्त की अम्लता को घटाकर उसका नियमन करता है।

हरी सब्जियों में मेथी की भाजी का प्रयोग भारत के प्रायः सभी भागों में बहुलता से होता है। इसको सुखाकर भी उपयोग किया जाता है। इसके अलावा मेथीदानों का प्रयोग बघार के रूप में तथा कई औषधियों के रूप में भी किया जाता है। ठण्डी के दिनों में इसका ʹपाकʹ बनाकर भी सेवन किया जाता है।

वैसे तो मेथी प्रायः हर समय उगायी जा सकती है फिर भी मार्गशीर्ष से फाल्गुन महीने तक ज्यादा उगायी जाती है। कोमल पत्ते वाली मेथी कम कड़वी होती है।

मेथी की भाजी तीखी, कड़वी, रूक्ष, गरम, पित्तवर्धक, अग्निदीपक(भूखवर्धक), पचने में हल्की, मलावरोध को दूर करने वाली, हृदय के लिए हितकर एवं बलप्रद होती है। सूखे मेथीदानों की अपेक्षा मेथी की भाजी कुछ ठण्डी, पाचनकर्ता, वायु की गति ठीक करने वाली और सूजन मिटाने वाली है। मेथी की भाजी प्रसूता स्त्रियों, वायुदोष के रोगियों एवं कफ के रोगियों के लिए अत्यन्त हितकर है। यह बुखार, अरूचि, उलटी, खाँसी, वातरक्त (गाउट), वायु, कफ, बवासीर, कृमि तथा क्षय का नाश करने वाली है। मेथी पौष्टिक एवं रक्त को शुद्ध करने वाली है। यह शूल, वायुगोला, संधिवात, कमर के दर्द, पूरे शरीर के दर्द, मधुप्रमेह एवं निम्न रक्तचाप को मिटाने वाली है। मेथी माता का दूध बढ़ाती है, आमदोष को मिटाती है एवं शरीर को स्वस्थ बनाती है।

औषधि-प्रयोग

कब्जियतः कफदोष से उत्पन्न कब्जियत में मेथी की रेशेवाली सब्जी रोज खाने से लाभ होता है।

बवासीरः प्रतिदिन मेथी की सब्जी का सेवन करने से वायु-कफ के बवासीर में लाभ होता है।

बहुमूत्रताः जिन्हें एकाध घण्टे में बार-बार मूत्र त्याग के लिए जाना पड़ता हो अर्थात् बहुमूत्रता का रोग हो उन्हें मेथी की भाजी के 100 मि.ली. रस में डेढ़ ग्राम कत्था तथा तीन ग्राम मिश्री मिलाकर प्रतिदिन सेवन करना चाहिए। इससे लाभ होता है।

मधुप्रमेहः प्रतिदिन सुबह मेथी की भाजी का 100 मि.ली. रस पी जायें। शक्कर की मात्रा ज्यादा हो तो सुबह शाम दो बार रस पियें। साथ ही भोजन में गेहूँ, चावल एवं चिकनी (घी-तेलयुक्त) तथा मीठी चीजों का सेवन न करने से शीघ्र लाभ होता है।

निम्नरक्तचापः जिन्हें निम्नरक्तचाप की तकलीफ हो उनके लिए मेथी की भाजी में अदरक, लहसुन, गरम मसाला वगैरह डालकर बनायी गयी सब्जी का सेवन लाभप्रद है।

कृमिः बच्चों के पेट में कृमि हो जाने पर उन्हें भाजी का 1-2 चम्मच रस रोज पिलाने से लाभ होता है।

सर्दी-जुकामः कफ दोष के कारण जिन्हें हमेशा सर्दी-जुकाम-खाँसी की तकलीफ बनी रहती हो उन्हें तिल अथवा सरसों के तेल में गरम मसाला, अदरक एवं लहसुन डालकर बनायी गयी मेथी की सब्जी का सेवन प्रतिदिन करना चाहिए।

वायु का दर्दः रोज हरी अथवा सूखी मेथी का सेवन करने से शरीर के 80 प्रकार के वायु के रोगों में लाभ होता है।

आँव आने परः मेथी की भाजी के 50 मि.ली. रस में 6 ग्राम मिश्री डालकर पीने से लाभ होता है। 5 ग्राम मेथी का पाउडर 100 ग्राम दही के साथ सेवन करने से भी लाभ होता हो। दही खट्टा नहीं होना चाहिए।

वायु के कारण होने वाले हाथ-पैर के दर्द में- मेथीदानों को घी में सेंककर उसका चूर्ण बनायें एवं उसके लड्डू बनाकर प्रतिदिन एक लड्डू का सेवन करें तो लाभ होता है।

गर्मी में लू लगने परः  मेथी की सूखी सब्जी को ठण्डे पानी में भिगोएँ। अच्छी तरह भीग जाने पर मसलकर छान लें एवं उस पानी में शहद मिलाकर एक बार पिलायें। लू में लाभ होता है।

मेथीपाक

शीत ऋतु में विभिन्न रोगों से बचने के लिए एवं शरीर की पुष्टि के लिए कई परिवारों में ʹमेथीपाकʹ का प्रयोग किया जाता है। मेथीपाक बनाने की विधि निम्नानुसार हैः

विधिः मेथी एवं सोंठ 325-325 ग्राम की मात्रा में लेकर दोनों का कपड़छान चूर्ण कर लें। सवा पाँच लीटर दूध में 325 ग्राम घी डालें। उसमें यह चूर्ण मिला दें। यह सब एकरस होकर गाढ़ा हो जाये, तब तक उसे पकायें। उसके पश्चात उसमें ढाई किलो शक्कर डालकर फिर से धीमी आँच पर पकायें। अच्छी तरह पाक तैयार हो जाने पर  नीचे उतार लें। फिर उसमें लेंडीपीपर, सोंठ, पीपरामूल, चित्रक. अजवायन, जीरा, धनिया, कलौंजी, सौंफ, जायफल, दालचीनी, तेजपत्र एवं नागरमोथ ….. ये सभी 40-40 ग्राम एवं काली मिर्च का 60 ग्राम चूर्ण डालकर मिला लें।

यह पाक 40 ग्राम की मात्रा में अथवा शक्ति अनुसार मात्रा में सुबह खायें।

यह पाक आमवात, अन्य वातरोग, विषम ज्वर, पांडुरोग, पीलिया, उन्माद, अपस्मार(मिर्गी), प्रमेह, वातरक्त, अम्लपित्त, शिरोरोग, नासिका रोग, नेत्र रोग, प्रदर रोग आदि सभी में लाभदायक है। यह पाक शरीर के लिए पुष्टिकारक, बलकारक एवं वीर्यवर्धक भी है।

संत च्यवनप्राश

च्यवनप्राश विशिष्ट आयुर्वैदिक उत्तम औषध एवं पौष्टिक खाद्य है, जिसका प्रमुख घटक आँवला है। जठराग्निवर्धक और बलवर्धक च्यवनप्राश का सेवन अवश्य करना चाहिए। किसी-किसी की धारणा है कि च्यवनप्राश शीत ऋतु में ही सेवन करना चाहिए, परंतु यह सर्वथा भ्रान्त मान्यता है। इसका सेवन सब ऋतुओं में किया जा सकता है। ग्रीष्म ऋतु में भी वह गरमी नहीं करता, क्योंकि इसका प्रधान द्रव्य आँवला है, जो शीतवीर्य होने से पित्तशामक है।

लाभः बालक, वृद्ध, क्षत-क्षीण, स्त्री-संभोग से क्षीण, शोषरोगी, हृदय के रोगी और क्षीण स्वरवाले को इसके सेवन से काफी लाभ होता है। इसके सेवन से खाँसी, श्वास, प्यास, वातरक्त, छाती का जकड़ना, वातरोग, पित्तरोग, शुक्रदोष और मूत्ररोग आदि नष्ट हो जाते हैं। यह स्मरणशक्ति और बुद्धिवर्धक तथा कान्ति, वर्ण और प्रसन्नता देने वाला है तथा इसके सेवन से बुढ़ापा देरी से आता है। यह फेफड़े को मजबूत करता है, दिल को ताकत देता है, पुरानी खाँसी और दमा में बहुत फायदा करता है तथा दस्त साफ लाता है। अम्लपित्त में यह बड़ा फायदेमंद है। वीर्यविकार और स्वप्नदोष नष्ट करता है। इसके अतिरिक्त यह राजयक्षमा (टी.बी.) और हृदयरोगनाशक तथा भूख बढ़ाने वाला है। संक्षिप्त में कहा जाये तो पूरे शरीर की कार्यविधि को सुधार देने वाला है।

मात्राः दूध या नाश्ते के साथ 15 से 20 ग्राम सुबह-शाम। बच्चों के लिए 5 से 10 ग्राम की मात्रा।

च्यवनप्राश केवल बीमारों की ही दवा नहीं है, बल्कि स्वस्थ मनुष्यों के लिए उत्तम खाद्य भी है। आँवले में वीर्य की परिपक्वता कार्तिक पूर्णिमा के बाद आती है। लेकिन जानने में आता है कि कुछ बाजारू फार्मेसियाँ धन कमाने व च्यवनप्राश की माँग पूरी करने के लिए हरे आँवले की अनुपलब्धता में आँवला पाउडर से ही च्यवनप्राश बनाती हैं और कहीं-कहीं तो स्वाद के लिए शकरकंद का ही प्रयोग किया जाता है। कैसी विडंबना है कि धन कमाने के लिए ऐसे स्वार्थी लोगों द्वारा कैसे-कैसे तरीके अपनाये जाते हैं ! ऐसे लोगों का लक्ष्य केवल पैसा कमाना होता है, जिनका मानव के स्वास्थ्य के साथ कोई संबंध ही नहीं होता।

करोड़ों रूपये कमाने की धुन में लाखों-लाखों रूपये प्रचार में लगाने वाले लोगों को यह पता ही नहीं चलता कि लोहे की कड़ाही में च्यवनप्राश नहीं बनाया जाता। उन्हें यह भी नहीं पता कि ताजे आँवले से और कार्तिक पूनम के बाद ही वीर्यवान च्यवनप्राश बनता है। 24 वनस्पतियों में उसे उबाला जाता है और 32 पौष्टिक चीजें (शहद, घी, इलायची आदि) डालकर कुल 56 वस्तुओं के मेल से असली च्यवनप्राश बनाया जाता है। ये वस्तुएँ निम्नलिखित हैं-

बिल्व छाल, छोटी भोरिंगडी, बड़ी भोरिंगडी, काकडासिंग, शिवा, वाराही कंद, विदारी कंद, कचूरो, पुनर्नवा, इलायची, सफेद चंदन, अश्वगंधा, शालपर्णी, पाटला, शीवण छाल, बड़ी पीपर, गोक्षुर, भोरिगडी के बीज, काली द्राक्ष, अमृता, बला, नागरमोथ, शतावरी, श्वेतकमल, अडूसे की छाल, अड़द, अरणी, समरेवा, गंधी समरेवा, हरड़, खरेटी का मूल (बलदाना), भोंय ईमली, अडूसी, पुष्करमूल, काकनासिका, जंगली मग, काकोली (आसगंध), अगर, वंशलोचन, वृद्धि, व्रजबला, शहद, जेठी मध, आँवला, घी, मिश्री, छोटी पीपर, दालचीनी, तमालपत्र, प्रवाल, जीवक, महामेदा, क्षीर काकोली, रिद्धिवृद्धि।

कार्तिक पूनम से पहले से ही जो च्यवनप्राश बनाकर बेचते हैं और लाखों रूपये विज्ञापन में खर्च करते हैं, वे करोड़ों रूपये कमाने के सपने साकार करने में ही लगे रहते हैं।

इसके विपरीत सूरत, दिल्ली व अमदावाद समिति द्वारा ʹन नफा न नुकसानʹ इस सेवाभाव से च्यवनप्राश में इऩ सब वस्तुओं के अतिरिक्त हिमालय से लायी गयी वज्रबला (सप्तधातुवर्द्धनी वनस्पति), सप्तधातुवर्धक उपसंजीवनी का रस भी डालकर च्यवनप्राश बनाया गया है, जो केवल साधक परिवार के लिए है। विधिवत इन वस्तुओं से युक्त शुद्ध एवं पौष्टिक यह च्यवनप्राश जरूर खाना चाहिए।

इन वस्तुओं से, वीर्यवान आँवलों से बने इस च्यवनप्राश का नाम रखते हैं ʹसंत च्यवनप्राशʹअन्य समितियाँ भी यह सेवाकार्य अगर करना चाहें तो उन्हें च्यवनप्राश बनाने की विधि एवं व्रजबला आश्रम की ओर से मिल सकती है। ʹन नफा न नुकसानʹ भाव से बनाकर आपस में बाँट लें।

साँईं श्री लीलाशाहजी उपचार केन्द्र,

संत श्री आसारामजी आश्रम,

जहाँगीरपुरा, वरियाव रोड, सूरत

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 1999, पृष्ठ संख्या 27-29 अंक 84

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