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गुरु महिमा


वत्स ! गुरु में पूर्ण विश्वास रखो। उनकी कृपा से, उनकी ज्ञानज्योति से तुम्हारी अंतरात्मा पुनर्जीवित हुई है। उन्होंने तुम्हें ढूँढा और पूर्ण बनाया है। गुरु का साक्षात्कार शिष्य के ऊपर वर्षा की झड़ी सा गिरता है। यह अबाधित है और इसे कोई रोक नहीं सकता। तुम्हारे लिए उनका प्रेम असीम है। वे तुम्हारे लिये दूर से दूर तक जायेंगे। वे तुम्हें कभी भी नष्ट नहीं होने देंगे। उनका प्रेम ही उनकी दिव्यता का प्रमाण है। उनका शाप भी दूसरे रूप में आशीर्वाद ही है।

गुरु का साक्षात्कार तुम्हारे लिए प्रत्यक्ष और मूर्तिमान है। उऩ्हीं की प्रकृति-रूपान्तर से ही तुम ईश्वर को देखते हो।

तुम्हारे लिए अन्य मार्ग नहीं है। अपने को गुरु के प्रति पूर्णतया और सर्वभावेन समर्पित कर दो। अन्तस्तल में जो कुछ है वह ईश्वर ही है। जिसने उसकी प्रकृति का साक्षात्कार किया है वह सबसे बड़ा देव है। मनुष्य, जिसने आत्म-साक्षात्कार किया है, उसकी महान महिमा को देखते हुए उस साक्षात्कार को बहुत रूपों में देखता है। गुरु मनुष्य से विशेष होते हैं। उनके द्वारा ही ईश्वर के संपूर्णभाव प्रकाशित होते हैं। क्या वे स्वयं शिव नहीं हैं ? स्वयं शिव महान् गुरु का एक भागमात्र हैं। अपने गुरु को शिव समझकर ध्यान करो। उन्हें अपना इष्ट समझकर ध्यान करो और आत्मसाक्षात्कार की शुभ घड़ी में तुम समग्र प्रकृति को अपने इष्ट में मिली हुई पाओगे।

तुम्हारे सामने एक पुरुष खड़े हैं जो आत्म-साक्षात्कार के द्वारा अवतीर्ण ईश्वर हैं। तब फिर तुम्हें निराकार ईश्वर अथवा दैवी संकल्पों, भावों से क्या मिलेगा ? जहाँ भी जाओगे वे तुम्हारे पीछे चलेंगे। मनुष्य जाति की सहायता के लिए ही उन्होंने निर्वाण तक को त्याग दिया है। इस रूप में वे दूसरे बुद्ध ही हैं। जिसने उनके स्वर को पहचाना है, वह उनके व्यक्तित्व को और भी अधिक सत्य तथा शक्तिमान बना देता है। ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके वह अमानुषी जीवन और ज्ञान से संपन्न होता है।

जो ब्रह्म से एक हो चुके हैं उन्हें सब देवता नमन करते हैं। अपनी गुरुपूजा की दृष्टि से ही विद्यमान संपूर्ण दिव्यता को देखो। इस प्रकार सब एक बन जायेगा और सर्वोच्च अद्वैत ज्ञान प्राप्त होगा, क्योंकि गुरु और भी अधिक बड़े दृष्टिकोण से दिखेंगे। तुम्हारे निज के ज्ञान और भक्ति की बुद्धि के अनुसार ही वे दीख पड़ेंगे।

व्यक्तित्व के उत्तम विकास से ही सर्वोच्च निःस्वार्थता, जो  आत्मा है, पहचानी जाती है। वहाँ गुरु, ईश्वर और तुम भी, इतना ही नहीं, समस्त सृष्टि एक हो जाती है। यही लक्ष्य है। गुरु को अनंत के दृष्टिकोण से देखो। यही बुद्धिमत्ता है। गुरुभक्ति से ही तुम श्रेष्ठ मार्ग पर चलते हो। अक अर्थ में दैवी मनुष्य शुद्ध ईश्वरत्व से भी अधिक सत्य है। पिता को केवल पुत्र के द्वारा ही समझा जा सकता है। ईश्वर की पूजा करने से पहले भी मनुष्य की पूजा करो। मनुष्य की ब्रह्म-साक्षात्कार की भावना से पृथक ईश्वर कहाँ है ? शिष्य के लिए गुरु पूजा सर्वोपरि है क्योंकि उनके व्यक्तित्व की पूजा में ही व्यक्तित्व का भी सम्पूर्ण ज्ञान अन्त में नष्ट हो जायेगा। आध्यात्मिक दृष्टिकोण विस्तृत होता जायेगा। पहले गुरु की शारीरिक उपस्थिति आवश्यक है, तब गुरु की साकार पूजा होती है। दूसरा कदम इस शारीरिक उपस्थिति से और गुरु की पूजा से भी परे जाना है, क्योंकि वे शिक्षा देते हैं कि शरीर आत्मा नहीं है। शिष्य को बच्चे के समान ही शिक्षा देनी पड़ती है। शारीरिक भाव से गुरु के सन्देंशों और विचारों को पहचानना, व्यक्तित्व से भाव की ओर जाना, मन और शरीर उत्तम और घनिष्ठ सम्बन्धों में नहीं गिने जा सकते।

गुरु के स्वरूप में शिष्य के व्यक्तित्व का अधिकाधिक लय होता है औऱ गुरु का व्यक्तित्व अधिकाधिक उसमें लय हुआ दिखाई पड़ता है, जिसमें उनका शरीर व्यक्त था। तब सर्वोत्कृष्ट एकता प्राप्त होती है। गुरु और शिष्य के द्वैत-व्यक्तित्व की धाराएँ अनन्त ब्रह्म का समुद्र बन जाती हैं। उस श्रेष्ठ सौन्दर्य की प्राप्ति के लिए जहाँ कहीं भी जाने की वे आज्ञा देते हैं, वहाँ नहीं जाओगे क्या ? यदि वे ऐसा चाहते हैं तो तुम्हें प्रसन्नतापूर्वक सहस्रों जन्म-मृत्यु में जाना होगा। तुम उनके प्रिय सेवक जो हो ! उनकी इच्छा तुम्हारा धर्म है, तुम्हारी इच्छा उनकी इच्छा की यंत्र बन गयी है। उनका अनुसरण करना ही तुम्हारा धर्म है। शास्त्र कहते हैं कि गुरु ही ईश्वर हैं। गुरु ब्रह्मा, विष्णु और महादेव हैं। वे वास्तव में परब्रह्म हैं। गुरु से बढ़कर कोई नहीं है।

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो….

गुरुगोविन्द दोऊ खड़े किसको लागूँ पाँय…..

श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मलीन

स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 1999, पृष्ठ संख्या 25,26 अंक 81

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ऋषि पंचमी


 

(14 सितम्बर 1999)

भारत ऋषि मुनियों का देश है। इस देश में ऋषियों की जीवन-प्रणाली का और ऋषियों के ज्ञान का अभी भी इतना प्रभाव है कि उनके ज्ञान के अऩुसार जीवन जीने वाले लोग शुद्ध, सात्त्विक, पवित्र व्यवहार में भी सफल हो जाते हैं और परमार्थ में भी पूर्ण हो जाते हैं।

ऋषि तो ऐसे कई हो गये, जिन्होंने अपना जीवन केवल ʹबहुजन हिताय-बहुजनसुखायʹ बिता दिया। हम उन ऋषियों का आदर करते हैं, पूजन करते हैं। उनमें से भी वशिष्ठ, विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, अत्रि, गौतम और कश्यप आदि ऋषियों को तो सप्तर्षि के रूप में नक्षत्रों के प्रकाशपुंज में निहारते हैं ताकि उऩकी चिरस्थायी स्मृति बनी रहे।

ऋषियों को ʹमंत्रदृष्टाʹ भी कहते हैं। ऋषि अपने को कर्ता नहीं मानते हैं। जैसे वे अपने साक्षी-दृष्टा पद में स्थित होकर संसार को देखते हैं, वैसे ही मंत्र और मंत्र के अर्थ को साक्षी भाव से देखते हैं। इसलिए उन्हें ʹमंत्रदृष्टाʹ कहा जाता है।

ऋषि पंचमी के दिन इन मंत्रदृष्टा ऋषियों का पूजन किया जाता है। इस दिन माताएँ विशेष रूप से व्रत रखती हैं।

ऋषि की दृष्टि में न तो कोई स्त्री है न पुरुष। सब अपना स्वरूप है। जिसने भी अपने-आपको नहीं जाना है, उन सबके लिए आज का पर्व है। जिस अज्ञान के कारण यह जीव कितनी ही माताओं के गर्भ में लटकता आया है, कितनी ही यातनाएँ सहता आया है उस अज्ञान को निवृत्त करने के लिए उऩ ऋषि-मुनियों को हम हृदयपूर्वक प्रणाम करते हैं उनका पूजन करते हैं।

उन ऋषि मुनियों का वास्तविक पूजन है-उनकी आज्ञा शिरोधार्य करना। वे तो चाहते हैं-

देवो भूत्वा देवं यजेत्।

देवता होकर देवता की पूजा करो। ऋषि असंग, दृष्टा, साक्षी स्वभाव में स्थित होते हैं। वे जगत के सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान, शुभ-अशुभ में अपने दृष्टाभाव से विचलित नहीं होते। ऐसे दृष्टाभाव में स्थित होने का प्रयत्न करना और अभ्यास करते-करते अपने दृष्टाभाव में स्थित हो जाना ही उनका पूजन करना है। उन्होंने खून पसीना एक करके जगत को आसक्ति से छुड़ाने की कोशिश की है। हमारे सामाजिक व्यवहार में, त्यौहारों में, रीत-रिवाजों में कुछ-न-कुछ ऐसे संस्कार डाल दिये कि अनंत काल से चली आ रही मान्यताओं के परदे हटें और सृष्टि को ज्यों-का-त्यों देखते हुए सृष्टिकर्ता परमात्मा को पाया जा सके। उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ऋषियों का पूजन करना चाहिए, ऋषिऋण से मुक्त होने का प्रयत्न करना चाहिए।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 1999, पृष्ठ संख्या 13,14 अंक 81

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उन्नति के चार सूत्र


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग प्रवचन से

संसाररूपी युद्ध के मैदान में परमात्मा को किस तरह पाया जा सकता है ? यह ज्ञान यदि पाना हो तो इसके लिए ʹश्रीमद् भगवदगीताʹ है। मृत्यु को किस तरह सुधारा जा सकता है ? यह ज्ञान यदि पाना हो तो राजा परीक्षित का अनुकरण करो।

परीक्षित राजा जब विचरण करते थे तब यह चिंतन करते थे कि आखिर क्या ? संसार के सब काम पूरे हो गये तो क्या और अधूरे रह गये तो क्या ? ऋषि कुमार शमीक का शाप मिलने से उनके चित्त में वैराग्य तो था ही। जब शुकदेवजी जैसे महान ब्रह्मवेत्ता का सत्संग मिल गया एवं आत्मचिन्तन में तत्परता से लग गये तो मात्र सात दिनों में ही उन्होंने परम तत्त्व का साक्षात्कार कर लिया। परमात्म-शांति पाई और परमात्म-शांति का उदगम स्थान अपने ʹसोहंʹ स्वभाव को भी जान लिया।

यदि तुम भी अपना काम शीघ्र बनाना चाहते हो, भागवत के धर्म को पाना चाहते हो तो परीक्षित की तरह सजाग हो जाओ कि ʹइतना खाया, इतना पिया, इतना घूमा, इतना छल-कपट किया लेकिन आखिर में इनमें क्या काम आयेगा ?

साधक को अपनी दिनचर्या का विश्लेषण करना चाहिए। महीने भर अथवा साल भर की योजना न बनायें वरन् रोज सुबह योजना बनायें किः ʹआज चाहे कुछ भी हो जाये, बेहोशी में नहीं जीऊँगा, होश में ही जीऊँगा, सजाग रहूँगा। जो कुछ भी करूँगा, खाऊँगा, पियूँगा, लूँगा-दूँगा, उसका परिणाम क्या होगा ? इसका पहले विचार करूँगा। मेरी सारी क्रियाएँ, सारी चेष्टाएँ ईश्वर की ओर ले जाने वाली हैं या ईश्वर से विमुख करने वाली हैं ? ऐसा पहले चिन्तन करूँगा….ʹ इस प्रकार विचार करके कर्म करते रहने से साधक को ईश्वराभिमुख होने में सहायता मिलती है।

यदि अपने चिंतन का, अपनी बुद्धि का सदुपयोग करने की  कला आ जाये तो मनुष्य संसार में खूब आनंद से, खूब शांति से एवं खूब प्रेम से जी सकता है। स्वर्ग के सुख से वह कई गुना ज्यादा सुख पा सकता है। मृत्यु के पहले और बाद भी मुक्ति का अनुभव कर सकता है।

भगवदगीता के सोलहवें अध्याय का उद्देश्य ही यह है कि मनुष्य अपने आत्मदेव के ज्ञान को पाकर मुक्त हो जाये। आसुरी वृत्तियों से किस प्रकार बचा जाये, सांसारिक बंधनों से किस प्रकार छूटा जाये और मुक्ति सरलता से मुट्ठी में कैसे आये ? इसके लिए गीता का सोलहवाँ अध्याय दैवी संपत्ति का अर्जन करने लिए कहता है। दैवी संपत्ति में निर्भयता, मौन, तप, आहार-संयम आदि गुण हैं।

मनुष्य को जीवन में निर्भय होना चाहिए। ʹशादी विवाह में इतना खर्च नहीं करूँगा तो बेइज्जती होगी…. उधार लेकर भी फर्नीचर नहीं खरीदूँगा तो लोग क्या कहेंगे…. इस प्रकार के कई भय मनुष्य को सताते रहते हैं। जिस काम से तुम्हारा चित्त भयभीत होता हो एवं दूसरों की खुशामद करने में लगता हो, उसे छोड़ दो। तुम तो केवल अपने अंतर्यामी परमात्मा को राजी करने का प्रयत्न करो। पफ-पावडर, लिपस्टिक-लाली आदि से शरीर को नहीं सजायेंगे तो लोग क्या कहेंगे ? इसकी परवाह न करो। ʹबाहर के इन सौन्दर्य-प्रसाधनों का उपयोग करके हमें लोगों का भोग्य नहीं बनना है वरन् हमें तो लोकेश्वर को पाने वाला साधक बनना है।ʹ ऐसा निश्चय करके अपना जीवन संयमी, सादा एवं पवित्र बनाना चाहिए।

जीवन में निर्भयता लाओ। शराबी कहता है किः ʹचलो मित्र ! शराब पियें।ʹ अब यदि तुम शराब नहीं पीते हो तो मित्र नाराज हो जाते हैं और यदि पीते हो तो तुम्हारी बरबादी होती है। फिर क्या करें ? अरे, मित्र नाराज होते हैं तो होने दो परन्तु शराब नहीं पीना है-यह निश्चय दृढ़ रखो। जो लोग तुम्हें खराब काम, हल्की संगति और हल्की प्रवृत्तियों की तरफ घसीटते हैं उनसे निर्भय हो जाओ लेकिन माता-पिता, गुरु, शास्त्र एवं भगवान क्या कहेंगे ? इस बात का डर रखो। ऐसा डर रखने से चित्त पवित्र होने लगता है क्योंकि ऐसा डर हल्के कामों, हल्की प्रवृत्तियों एवं हल्की संगति से बचाने वाला होता है।

हरि डर गुरु डर जगत डर, डर करनी में सार।

रज्जब डरिया सो उबरिया, गाफिल खायी मार।।

जीवन में निर्भयता आनी ही चाहिए। झूठे आडंबरों से बचने के लिए निर्भय बनो। आप मेहमानों को भिन्न-भिन्न प्रकार के अच्छे-अच्छे एवं तले हुए व्यंजन न खिला सको तो कोई बात नहीं, चिंता मत करो। परंतु यदि तुम सच्चे दिल से, एक प्रेम भरी नजर से पानी के एक प्याले से भी मेहमान का आदर-सत्कार कर सको तो वह मेहमान तुम्हारे यहाँ से उन्नत होकर जायेगा।

तुम लोगों की परवाह मत करो कि ʹऐसा नहीं करेंगे तो लोग क्या कहेंगे ?ʹ अरे ! तुम अपनी नाक से श्वास लेते हो कि लोगों की नाक से ? अपने जीवन का आयुष्य खर्चते हो कि लोगों के जीवन का ? हम एक दूसरे से ऐसे बँध गये हैं, ऐसे बँध गये हैं कि शराब-कबाब आदि की पार्टियों से भले अपना व दूसरों का सत्यानाश होता हो फिर भी ʹलोग क्या कहेंगे ?ʹ के भूत से ग्रस्त हो जाते हैं एवं अपनी हानि करते रहते हैं। इसीलिए गीता में कहा हैः अभयं सत्त्वसंशुद्धिः। तमोगुणी मत बनो।

मैं कभी-कभी शाम को खेतों में घूमने जाता हूँ। खेतों के आस-पास कुछ घर भी होते हैं। वहाँ के कुत्ते मुझे देखकर भौंकने लगते हैं। मेरा तो विनोदी स्वभाव है। कुत्ते भौंकते हैं तब यदि मैं खड़ा रह जाता हूँ तो उनकी पूँछ भी दबी हुई पाता हूँ लेकिन जान-बूझकर विनोद में दौड़ने लगता हूँ तो कुत्ते तो मेरा पीछा करते ही हैं, साथ में उऩके छोटे-छोटे पिल्ले भी मेरा पीछा करने लग जाते हैं।

दुःख एवं मुसीबतें डरपोक मनुष्य का ही पीछा करती हैं, जबकि निर्भय व्यक्ति के सामने उनकी पूँछ दब जाती हैं। अतः दुःख एवं मुसीबतों को बुलाना हो तो भयभीत रहो और उनकी पूँछे दबानी हो तो निर्भय बनो।

भगवान से, गुरु से, माता-पिता से, शास्त्र से भले अनुशासित रहो परंतु जो हल्का संग करके पतन करा दें, उनसे निर्भय रहना चाहिए। उऩसे किनारा करके निर्भयतापूर्वक अपने जीवन में अच्छे संस्कारों को पकड़े रहना चाहिए।

पहली बात है कि निर्भय रहो। दूसरी बात है कि हृदय शुद्ध रहे ऐसा आहार-विहार और चिंतन करो। कहा भी गया है किः जैसा खाओ अन्न वैसा बनता मन। साधक को अपने आहार पर खूब ध्यान देना चाहिए। ʹआहारʹ शब्द केवल भोजन के लिए ही नहीं है वरन् आँखों से, कानों से, नाक से, त्वचा से जो ग्रहण किया जाता है, वह भी आहार के ही अंतर्गत आता है। अतः उसमें सात्त्विकता का ध्यान रहना चाहिए।

तीसरी बात है तप। हमारे जीवन में तपस्या भी होनी चाहिए। सुबह भले ठंड लगे फिर भी सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान कर लो। देखो इससे हृदय में कितनी प्रसन्नता और सत्त्वगुण बढ़ता है ! फिर थोड़ा ध्यान करो। यह तप हो जाता है। सत्संग अथवा सत्कर्म के समय थोड़ा तन-मन-धन तो अवश्य खर्च होता है किन्तु वह तुम्हारी तपस्या बन जाता है।

चौथी बात है मौन। प्रतिदिन एक-दो घंटे का मौन रखो। ससे तुम्हारी आंतरिक शक्ति बढ़ेगी, तुम्हारी वाणी में आकर्षण आयेगा। जो पतंगे की तरह इधर-उधर भटकते रहते हैं एवं व्यर्थ की बक-बक करते रहते हैं उनके चित्त में न शांति होती है न क्षमा, न विचारशक्ति होती है और न ही अनुमान शक्ति। वे बिखर जाते हैं। स्त्रियों को तो मानो ज्यादा बोलने का ठेका ही मिला हुआ है। सास बहू में, अड़ोस-पड़ोस में व्यर्थ की गप्पें मारकर वे स्वयं ही झगड़े पैदा कर लेती हैं। यदि झगड़े न भी होते हों तो फालतू बातें तो होती ही हैं। उऩ बेचारियों को पता ही नहीं होता कि व्यर्थ की बातें करने से प्राणशक्ति एवं वाक्शक्ति का ह्रास होता है।

अतः साधक को चाहिए कि वह मौन रखें। मौन से बहुत लाभ होता है। यदि एक बार भी तुम लंबे समय तक मौन रखो तो अंदर का आनंद प्रगट होने लगेगा। विचारशक्ति, अनुमानशक्ति के अलावा धैर्य, क्षमा, शांति आदि सदगुण भी आने लगेंगे।

गुजराती में कहावत हैः न बोल्यामां नव गुण। अर्थात् न बोलने में नौ गुण हैं। जो ज्यादा बोलते हैं वे झूठ बोलते हैं, झगड़े उत्पन्न करते हैं और अपनी आयु क्षीण करते हैं। किसी के साथ बात करो तो कम-से-कम, स्नेहयुक्त एवं सारगर्भित बात करो। इससे तुम्हारी वाणी का एवं तुम्हारा प्रभाव पड़ेगा।

ब्रह्मज्ञानी महापुरुष एक स्मितभरी नजर डालते हैं और पूरा जनसमुदाय तन्मय हो जाता है। अरे ! मनुष्यों की तो क्या बात, ब्रह्मलोक तक के देवी-देवता भी उनके अनुकूल हो जाते हैं। हम उनका माहात्म्य नहीं जानते, इसीलिए ʹहा-हा….ही-ही…ʹ में अपना जीवन गँवा डालते हैं। हमें पता ही नहीं है कि हमारे भीतर कितना खजाना भरा पड़ा है और हम कितना, किस प्रकार उसे खर्च कर रहे हैं।

ज्ञानवानों का स्मित ऐसा अनोखा होता है, जिससे कोई भी सहज में ही उऩके प्रति अहोभाव से भर जाता है। श्रीकृष्ण अपनी स्मितभरी नजर डालकर बंसी बजाते थे तो सब ग्वाल-गोपियों के चित्त सहज में ही पवित्र हो जाते थे। उसी प्रकार ब्रह्मज्ञानी महापुरुष की स्मित भरी नजर से लोगों का चित्त पवित्र होने लगता है। सिंधी भाषा में कहा हैः

नूरानी नजरूनसां दिलबर दरवेशन, मुंखे निहाल करे छड्यो।

अर्थात् अपनी नूरानी नजरों से उन दिलबर संत ने मुझे निहाल कर दिया।

निगाहों से वे निहाल हो जाते हैं, जो संतों की निगाहों में आ जाते हैं।

तुम भी अपनी दृष्टि ऐसी ही बनाओ। ऐसा नहीं कि व्यर्थ का इधर-उधर भटकते रहो, व्यर्थ बोलते रहो एवं अपने ज्ञानतंतुओं, अपनी रक्तवाहिनियों, अपने शरीर एवं मन को सताते रहो।

जीवन में निर्भयता, आहारशुद्धि, तप एवं मौन-ये गुण जायें तो जीवन काफी उन्नत हो जाये और ये काम तुम कर सकते हो। युद्ध के मैदान में अगर अर्जुन यह काम कर सकता है तो तुम क्यों नहीं कर सकते ? अर्जुन तो कितनी विपत्तियों के बीच था ! तुम्हारे आगे इतनी झंझटें नहीं हैं, भाई ! यदि अर्जुन युद्ध के मैदान में गीता का अधिकारी है तो तुम भी सत्संग के मैदान में गीता के अधिकारी जरूर हो। बस कमर कस लो इऩ दैवी गुणों को अपनाने के लिए….. निर्भयता, आहार-संयम, तप एवं मौन को आत्मसात् करने के लिए !

ʹहम क्या करें ? हम तो गृहस्थी हैं…. हम तो संसारी हैं…. हम तो नौकरी वाले हैं…ʹ अरे ! तुम्हारे साथ संसार की जितनी झंझटें हैं, उससे ज्यादा झंझटें पहले के समय में थीं। फिर भी हिम्मतवान्, बुद्धिमान पुरुषों ने समय बचाकर विकारों एवं बेवकूफियों पर विजय पा ली एवं अपने आत्मा-परमात्मा को, अपने रब को पहचान लिया।

वर्धमान के जीवन में कितने विघ्न आये ! फिर भी वे अडिग रहे एवं साधना में लगे रहे तो भगवान महावीर के रूप में उभरे। प्रह्लाद के जीवन में कितने विघ्न आये ! मीराबाई के जीवन में कितनी मुसीबतें आयीं ! फिर भी वे अडिग रहीं, निर्भय रहीं, हताश-निराश न हुई तो कितनी उन्नत हो गई !

तुम भी उन्नत हो सकते हो, अपने आपको जान सकते हो। शर्त इतनी ही है कि दैवी गुणों को बढ़ाओ, पुरुषार्थ करो एवं सत्संग अवश्य पूरा करो। सत्संग से ही तुम्हें अपने दैवी गुणों को विकसित करने की प्रेरणा मिलेगी, प्रोत्साहन मिलेगा, मार्गदर्शन मिलेगा, उत्साह उभरेगा। निर्भयता, आहारशुद्धि, वाणी का संयम एवं तप-इन दैवी गुणों का विकास तुम्हारे लिए उन्नति का द्वार सहजता से ही खोल देगा। अतः आज से, अभी से दृढ़ता से लगो। लगोगे न ?

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 1999, पृष्ठ संख्या 2-5, अंक 81

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