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गुरुवर को प्रणाम


चैतन्यं शाश्वतं शान्तं व्योमातीतं निरंजनम्।

नादबिन्दुकलातीतं तस्मै श्रीगुरवे नमः।।

ʹजो चैतन्य, शाश्वत, शांत, आकाश से परे हैं, इन्द्रियों से परे हैं, जो नाद, बिंदु और कला से परे हैं, उन श्रीगुरुदेव को प्रणाम हैं !ʹ

यत्सत्येन जगत्सत्यं यत्प्रकाशेन विभाति यत्।

यदानन्देन नन्दन्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः।।

ʹजिसके अस्तित्त्व से संसार का अस्तित्त्व है, जिसके प्रकाश से जगत प्रकाशित होता है, जिसके आनंद से सब आनंदित होते हैं उन श्रीगुरुदेव को प्रणाम है !ʹ

कर्मणा मनसा वाचा सर्वादઽઽराधयेद् गुरुम्।

दीर्घदण्डनमस्कृत्य निर्लज्जो गुरुसन्निधौ।।

ʹगुरुदेव के समक्ष निःसंकोच होकर लंबा दण्डवत प्रणाम करके मन, कर्म तथा वचन से हमेशा गुरुदेव की आराधना करनी चाहिए।ʹ

आनन्दमानन्दकरं प्रसन्नं ज्ञानस्वरूपं निजभावयुक्तम्।

योगीन्द्रमीडयं भवरोगवैद्यं श्रीसदगुरुं नित्यमहं नमामि।।

ʹजो आनन्दस्वरूप हैं, जो आनंदमय करने वाले हैं, जो सदैव प्रसन्न हैं, जो ज्ञानस्वरूप हैं, जो निज भाव से युक्त हैं, जो योगियों के आराध्यदेव हैं, जो संसाररूपी रोग के वैद्य हैं ऐसे श्री सदगुरु को मैं नित्य प्रणाम करता हूँ।ʹ

नित्यशुद्धं निराभासं निराकारं निरंजनम्।

नित्यबोधं चिदानंदं गुरुं ब्रह्म नमाम्यहम्।।

ʹजो नित्यशुद्ध हैं, जो आभासरहित हैं, जो निराकार हैं, जो इन्द्रियों से परे हैं, जो नित्य ज्ञानस्वरूप हैं, जो चिदानंद हैं ऐसे ब्रह्मस्वरूप श्रीगुरुदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।ʹ

नमः शिवाय गुरवे सच्चिदानन्दमूर्तये।

निष्प्रपंचाय शान्ताय निरालम्बाय तेजसे।।

ʹशिवस्वरूप, सच्चिदानंदस्वरूप, प्रपंचों से रहित, शान्त निरालम्ब, तेजयुक्त श्रीगुरुदेव को प्रणाम है !ʹ

नमः शान्तात्मने तुभ्यं नमो गुह्यतमाय च।

अचिन्त्यायाप्रमेयाय अनादिनिधनाय च।।

ʹहे रहस्यमय, अचिन्तनिय, अपरिमित और आदि-अंत से रहित, शान्त आत्मस्वरूप ! तुझे प्रणाम है !ʹ

नमस्ते सते ते जगत्कारणाय। नमस्ते चिते सर्वलोकाश्राय।।

नमोद्वैततत्त्वाय मुक्तिप्रदाय। नमो ब्रह्मणे व्यापिने शाश्वताय।।

ʹजगत के कारण सत् तुझे प्रणाम है ! सर्व लोकों के आश्रयस्वरूप चित् तुझे प्रणाम है ! मुक्ति प्रदान करने वाले अद्वैत तत्त्व तुझे प्रणाम है ! शाश्वत, सर्वत्र व्याप्त ब्रह्म तुझे प्रणाम है !ʹ

सत्यानन्दस्वरूपाय बोधैकसुखकारिणे।

नमो वेदान्तवेद्याय गुरवे बुद्धिसाक्षिणे।।

ʹजो सत्य और आनंदस्वरूप हैं, चेतनानंद के साधनस्वरूप हैं, बुद्धि के साक्षी हैं, वेदांत के द्वारा ज्ञेय हैं ऐसे श्रीगुरुदेव को नमस्कार है !ʹ

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।

चक्षुरून्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।।

ʹअज्ञानरूपी अंधकार से अंधे बने हुए की आँखों को ज्ञानरूपी अंजन-शलाका से खोलने वाले उऩ श्रीगुरुदेव को प्रणाम है !ʹ

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।

तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।।

ʹजो चर और अचर सृष्टि में अखण्ड-मण्डलाकार रूप में व्याप्त हैं, जिन्होंने ʹतत्पदʹ का दर्शन कराया है, उन श्रीगुरुदेव को प्रणाम है !ʹ

स्थावरं जङ्गमं व्याप्तं यत्किंचित्सचराचरम्।

त्वंपदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।।

ʹजो चर और अचल सृष्टि में स्थावर एवं जंगम सब जीवों में व्याप्त हैं, जिन्होंने ʹत्वंपदʹ का दर्शन कराया है, उऩ श्रीगुरुदेव को प्रणाम है !ʹ

चिन्मयं व्यापितं सर्व त्रैलोक्यं सचराचरम्।

असित्वं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।।

ʹजो चिन्मयस्वरूप, तीनों लोकों के चल एवं अचल सब जीवों में व्याप्त है, जिन्होंने ʹअसिपदʹ का दर्शन कराया है, उन श्रीगुरुदेव को प्रणाम है !ʹ

(स्कन्दपुराण)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 1999, पृष्ठ संख्या 13,14 अंक 79

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गुरुद्वार पर कैसे रहें


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

श्री महाभारत में आता हैः

न विना ज्ञानविज्ञाने मोक्षस्याधिगमो भवेत्।

न विना गुरुसम्बन्धं ज्ञानस्याधिगमः स्मृतः।।

गुरु प्लावयिता तस्य ज्ञानं प्लव इहोत्यते।

विज्ञाय कृतकृत्यस्तु तीर्णस्तदुभयं त्यजेत्।।

“जैसे ज्ञान विज्ञान के बिना मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता, उसी प्रकार सदगुरु से संबंध हुए बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती। गुरु इस संसारसागर से पार उतारने वाले हैं और उनका दिया हुआ ज्ञान नौका के समान बताया गया है। मनुष्य उस ज्ञान को पाकर भवसागर से पार और कृतकृत्य हो जाता है। फिर उसे नौका और नाविक दोनों को ही अपेक्षा नहीं रहती।ʹʹ (महा. शांति. 326.22,23)

छल, कपट, धोखा-धड़ी पलायनवादिता आदि आसुरी वृत्तियों से बचाकर जो हमें सच्चाई, पवित्रता एवं तत्परता की ओर ले जायें, ऐसे सदगुरु मिलना-यह मानव जन्म की सबसे बड़ी उपलब्धि है। लेकिन ऐसे सदगुरु मिल जायें, फिर भी हम सुधरे नहीं तो मनुष्य जन्म का दुर्भाग्य भी तो पूरा है। अतः गुरुद्वार पर कैसे रहना चाहिए-यह सभी को ज्ञात होना चाहिए।

शिष्य को चाहिए कि गुरु-आश्रम में वह अपना सारा समय सेवा, साधना, जप-ध्यान आदि में ही लगाये और अपनी गलती हो तो गलती को गलती मानकर उसका प्रायश्चित करे।

हमारी जो भी गलत आदत है उसको सामने रखकर सुबह संकल्प करो किः “अब मैं ऐसा नहीं करूँगा।” फिर भी गलत आदत नहीं निकलती है तो सदगुरु से, भगवान से प्रार्थना करो, गुरुभाइयों से कहो किः “मुझमें यह गलती है।” अपनी गलती को चिल्लाकर भगाओ तो भागेगी, नहीं तो गलती को गलती के रूप में भी नहीं स्वीकार कर सकोगे।

मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन लाना बड़ा विकट है। कोई भी व्यक्ति अपनी प्रकृति का बदलाव सरलता से स्वीकार नहीं करता है। जो आदतें पड़ गयी हैं, जो पुराने संस्कार पड़ गये हैं, उनको यह छोड़ना नहीं चाहता। इसीलिए पत्थर को भगवान बनाना बड़ा आसान है लेकिन झूठ-कपट करने वाले इस मिट्टी के पुतले को ब्रह्म बनाना बड़ा कठिन है। किसी मठ-मंदिर या संस्था को चलाना भी सरल है लेकिन बेईमानों-कपटियों को ब्रह्मसुख देना असंभव है क्योंकि वे अपनी गलत आदतों को छोड़ने के लिए राजी नहीं होते। दुर्गुणों का त्याग किये बिना सब ऐच्छिक साधन एवं सुख गुरु से प्राप्त कर लेना चाहते हैं। वे तो मानो, डामर की सड़क पर खेती करना चाहते हैं। यदि ब्रह्मसुख पाना है, आत्मसुख पाना है तो साधक को आगे झूठ-कपट, बेईमानी, अपने बचाव की आदत आदि दुर्गुणों का त्याग करना ही पड़ेगा।

साधक को चाहिए कि वह जप-ध्यान, सेवा, साधना तत्परता से करता रहे और नियम में निष्ठा रखे। ऐसा करने से पुरानी गंदी आदतें दूर होंगी एवं मनसुखता मिटेगी। लेकिन यदि जप-ध्यान से, सेवा से वह कतरायेगा, नियम में नहीं रहेगा तो भ्रष्ट हो जायेगा, पतित हो जायेगा।

साधारण जगह पर किये गये किसी भी कार्य़ की अपेक्षा तीर्थ व गुरुद्वार पर किये गये कार्य का फल अनंतगुना होता है। साधारण जगह पर किये हुए जप-तप की अपेक्षा तीर्थ व गुरुद्वार पर किया गया जप-तप अनंतगुना फल देता है। इसी प्रकार साधारण जगह पर किये गये झूठ-कपट, बेईमानी की अपेक्षा तीर्थ व गुरुद्वार पर किये गये झूठ-कपट एवं बेईमानी से ज्यादा पाप लगता है।

मन में जैसा आता है, वैसा ही जो करने लग जाता है उसका पतन हो जाता है। कोई भी काम करो तब सोचो की गुरु देखेंगे तो उनको कैसा लगेगा ? उनके मन में क्या होगा ?

ईश्वन ने मनुष्य जन्म दिया है, स्वास्थ्य दिया है, मार्गदर्शक सदगुरु मिले हैं, खाने-पीने रहने की सुविधा मिली है, फिर भी जो अपनी बुरी आदतें निकालकर अपना कल्याण न करे, अपनी उन्नति न करे तो किसका दोष ?

कई लोग ऐसे होते हैं जो शत्रु को भी मित्र बना लेते हैं और कई ऐसे होते हैं कि मित्र को भी शत्रु बना लेते हैं। कई ऐसे होते हैं कि असंत के आगे भी संत जैसा व्यवहार करते हैं तो असंत के अंदर भी छुपा हुआ संतत्व जग जाता है और कई मूर्ख ऐसे होते हैं कि संत के आगे भी ऐसा व्यवहार करते हैं कि संत को भी असंत जैसा नाटक करना पड़ता है। उनको क्रोध होता नहीं है, फिर भी क्रोध लाना पड़ता है। अतः अपना व्यवहार ऐसा होना चाहिए कि जहाँ से न मिलता हो वहाँ से भी मिलना शुरु हो जाये। ऐसा व्यवहार न करो कि जहाँ से छलकता हो, वहाँ से भी छलकना बंद हो जाये। इन्सान अपने कर्मों से ही ईश्वर और सदगुरु के करीब या उनसे दूर होता है। संत कभी किसी को अपने से दूर नहीं करते।

करणी आपो आपनी के नेड़े के दूर।

आश्रम में आते हो तो ध्यान करने वाले व्यक्ति को मददरूप हो जाओ। यदि मददरूप नहीं हो सकते हो तो कम-से-कम उसे विघ्न मत डालो। यहाँ कई ऐसे नये-नये अटपटे लोग आ जाते हैं जो कि हम ध्यान में होते हैं, साधक लोग शांति से बैठे होते हैं फिर भी जोर से बड़बड़ाने लगते हैं किः “आश्रम अच्छा है…. महाराज कहाँ हैं ?ʹʹ ऐसा नहीं करना चाहिए। इतना बोलो, ऐसा बोलो और इसीलिए बोलो कि जिससे तुम्हारे भी पाप नष्ट हों, तुम्हारा मन भी शीतल हो, शांत हो और सुनने वाले का मन भी गहरी शांति में खो जाये। आश्रम की शांति बनी रहे।

इसी प्रकार आश्रम की स्वच्छता बनाये रखने में भी सावधान रहना चाहिए। ऐसा नहीं कि फल खाकर छिलके बगीचे में ही छोड़ दिये… आश्रम में कोई नौकर नहीं है। यहाँ साधक लोग रहते हैं। तुम जूठा पदार्थ छोड़कर जाओगे और साधक बुहारी करके उसे कचरापेटी में डालेंगे तो तुम्हारे पाप बढ़ेंगे और पुण्य नष्ट होंगे। हो सके तो तुम भी आश्रम में तिनका उठाकर किनारे लगाओ। हो सके तो जूठन उठाकर फेंक दो। तुम जूठा छोड़कर मत जाओ। पहले का काफी ʹजूठाʹ तुम्हारे सिर पर पड़ा है, और कब तक ढोते रहोगे ?

आश्रम में संत-दर्शन की भी कोई विधि होती है। जहाँ से हवा आती है उस तरफ संत हों, संत की हवा का हमें स्पर्श हो – ऐसी जगह पर खड़े रहना चाहिए। हमारा श्वास छूकर, हमारी हवा छूकर संत को लगे-यह ठीक नहीं है। नहीं तो हमारी खिन्नता और मूढ़ता वहाँ जाती हैं और वहाँ से जो छलकता है, उसमें 19-20 हो जाता है। फिर तुम्हारे विचार और तुम्हारी गंदगी का कुछ मिश्रण ही तुम्हें मिल जाता है। इसीलिए कुछ दुष्ट प्रकृति के लोग या तामसी लोग आ जाते हैं और ऐसे ढंग से खड़े होते हैं तो उनको प्रेम की जगह पर डाँट मिल जाती है क्योंकि उनके पास जो है वे ही आंदोलन मिश्रित हो जाते हैं।

संत यदि ध्यान में हों, किसी काम में हों या किसी से बात करते हों तो उनकी छाती पर ख़ड़े नहीं रहना चाहिए। संत जितना धीरे बोलेंगे उतना सारगर्भित होगा। जितनी भीड़ होगी उतना जोर से बोलना पड़ेगा। अतः ऐसे समय पर दूर खड़े रहो। अवसर पाकर ही बात करो।

इस प्रकार गुरुद्वार पर रहने की, गुरुदर्शन करने की युक्ति जानकर, उनका अमल करके तुम बहुत लाभ उठा सकते हो।

एक भगवान, भगवान के प्यारे संत सदगुरु एवं शास्त्र ही हमको परमात्मा के रास्ते पर चढ़ाते हैं, बाकी तो सब गिराने वाले ही मिलते हैं। बुद्धिमान वही है जो ससांररूपी ताप से बचने के लिए संतों का संग करता है, सत्शास्त्रों का विचार करता है एवं आत्मविद्या को पाकर संसार में तपाने वाली अविद्या को मिटा देता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 1999, पृष्ठ संख्या 10-12, अंक 79

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गुरु की चाह


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

ऋषि कहते हैं-

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।

जो ब्रह्मा की नाईं हमारे हृदय में उच्च संस्कार भरते हैं, विष्णु की नाईं उनका पोषण करते हैं और शिवजी की नाईं हमारे कुसंस्कारों एवं जीवभाव का नाश करते हैं, वे हमारे गुरु हैं। फिर भी ऋषियों को संतोष नहीं हुआ अतः उन्होंने आगे कहाः

गुरुर्साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः।।

ब्रह्मा जी ने तो सृष्टि की रचना की, विष्णु जी ने पालन-पोषण किया और शिवजी संहार करके नई सृष्टि की व्यवस्था करते हैं लेकिन गुरुदेव तो इन सारे चक्करों से छुड़ाने वाले परब्रह्मस्वरूप है, ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ।

पुष्पों के इर्द-गिर्द मँडराने से क्या फायदा होता है, किसी भ्रमर से पूछो। जल में क्या मजा आता है, किसी जलचर से पूछो। ऐसे ही संत-महापुरुषों के सान्निध्य से क्या लाभ होता है, यह किसी सत्शिष्य से ही पूछो।

सम्राट के साथ राज्य करना भी बुरा है, न जाने कब रुला दे !

फकीरों के साथ भीख माँगकर रहना भी अच्छा है, न जाने कब मिला दे !

आज दुनिया में जो थोड़ी बहुत रौनक दिख रही है, वह ऐसे सदगुरुओं एवं सत्शिष्यों के कारण ही है। थोड़ा-बहुत जो आनंद है वह ऐसे फकीरों की करुणा का ही प्रसाद है।

आज दुनिया में जो थोड़ी-बहुत रौनक दिख रही है, वह ऐसे सदगुरुओं एवं सत्शिष्यों के कारण ही है। थोड़ा-बहुत जो आनंद है वह ऐसे फकीरों की करुणा का ही प्रसाद है।

भक्त लोग जो हनुमानजी से प्रार्थना करते हैं-

जय जय हनुमान गोसाईं। कृपा करो गुरुदेव की नाईं।।

यह देवता जैसी कृपा करने की याचना नहीं है, गुरुदेव जैसी कृपा करते हैं वैसी कृपा की याचना है। गुरुदेव कैसी कृपा करते हैं ? जीव शिव से एक हो जाये-ऐसी गुरुदेव की निगाहें होती हैं। आनंदस्वरूप गुरुदेव अपने शिष्य को भी उसी आनंद का दान देना चाहते हैं जो आनंद किसी वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति से आबद्ध नहीं है, जो आनंद कहीं आता-जाता नहीं है।

ऐसे सदगुरुओं के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने का जो दिन है-वही है गुरुपूर्णिमा, व्यासपूर्णिमा।

संसारी मित्रों एवं संबंधियों से बहुत मेहनत के बाद भी वह चीज नहीं मिलती जो संतों के द्वारा, महापुरुषों के द्वारा, ब्रह्मवेत्ताओं के द्वारा मिलती है। यदि हम उसका बदला कुछ न कुछ चुकाएँ नहीं तो हम कृतघ्नता के दोष हो जायेंगे। हम कृतघ्नता के दोष से बचें और कुछ न कुछ अभिव्यक्त करें। उनसे जो मिला है उसका बदला तो नहीं चुका सकते हैं फिर भी कुछ न कुछ भाव अभिव्यक्त करते हैं और यह भाव अभिव्यक्त करने का जो दिन है, उसे व्यासपूर्णिमा कहा जाता है।

ऐसा ही कोई दिन था, जब हृदय भावों से भर गया और प्रेम उमड़ पड़ा। गुरुजी के पैर पकड़कर मैंने कहाः “गुरुजी ! मुझे कुछ सेवा करने की आज्ञा दीजिए।”

गुरुजीः “सेवा करेगा ? जो कहूँगा वह करेगा ?”

मैने कहाः “हाँ, गुरुजी ! आज्ञा कीजिए, आज्ञा कीजिये।”

गुरुजीः “जो माँगू वह देगा ?”

मैंने कहाः “हाँ, गुरुजी ! जरूर दूँगा।”

गुरुजी चुप हो गये और मनीराम सोचने लगाः “गुरुजी क्या माँगेंगे क्या पता ? गुरुजी समाज की सेवा के लिए, आश्रम के लिए दो-तीन लाख रूपये माँगेंगे तो वह तो मेरे बड़े भाई के हाथ में है। यदि भाई नहीं देगा तो मैं भाई से कह दूँगा कि, हमारी सम्पत्ति का आधा-आधा हिस्सा कर लें। फिर मेरे हिस्से के रूपये गुरु जी को दे दूँगा।

यह सोच ही रहा था कि इतने में गुरुजी ने कहाः “जो माँगूँ वह देगा ?” मैंने कहाः “हाँ, गुरुजी !”

गुरुजीः तू आत्मज्ञान पाकर मुक्त हो जा और दूसरों को भी मुक्त करते रहना। इतना ही दे।

सदगुरु की कितनी महिमावंत दृष्टि होती है ! हम लोगों का मन होता है कि ʹगुरुजी शायद यह न माँग लें….ʹ अरे, यदि सब कुछ देने के बाद भी अगर सदगुरु-तत्त्व हजम होता है तो सौदा सस्ता है। न जाने कितनी बार किन किन चीजों के लिए हमारा सिर चला गया ! एक बार और सही। ….और वे सदगुरु यह पंचभौतिक सिर नहीं लेते, वे तो हमारी मान्यताओं का, कल्पनाओं का सिर ही लेते हैं ताकि हम भी परमात्मा के दिव्य आनंद का, प्रेम का, माधुर्य का अनुभव कर सकें।

गुरु जी ने नाम रखा है-आसाराम। हम आपकी हजार-हजार अँगड़ाईयाँ इसी आस से मानते आये हैं, हजार-हजार अँगड़ाईयाँ इसी आस से सह रहे हैं कि आप भी कभी न कभी हमारी बात मान लो। ….और मेरी बात यही है कि तत्त्वमसि। तुम वही हो। सदैव रहने वाला तो एक चैतन्य आत्मा ही है। वही तुम्हारा अपना आपा है, उसी में जाग जाओ। मेरी यह बात मानने के लिए तुम भी राजी हो जाओ।

बाहर से देखो तो लगेगा किः ʹआहाहा…. बापू जी को कितनी मौज है ! कितनी फूल मालाएँ ! हजारों लोगों के सिर झुक रहे हैं…. हजारों-हजारों मिठाईयाँ आ रही हैं…. बाप जी को तो मौज होगी !ʹ

ना ना… इन चीजों के लिए हम बाप जी के नहीं हुए हैं। इन चीजों के लिए हम हिमालय का एकांत छोड़कर  बस्ती में नहीं आये हैं। फिर भी तुम्हारा दिल रखने के लिए…. तुमको जो आनंद हुआ है, तुम्हें जो लाभ हुआ है, उसकी अभिव्यक्ति तुम करते हो, जो कुछ तुम देते हो वह देते-देते तुम अपना ʹअहंʹ भी दे डालो, इस आशा से हम तुम्हारे फल-फूल आदि स्वीकार करते हैं।

तुम गुरुद्वार पर आते हो तो गुरु की बात भी तो माननी पड़ेगी। गुरुद्वार की बात यही है कि तुम्हारी पद-प्रतिष्ठा हमको दे दो, तुम्हारी जो जात-पाँत है वह दे दो, तुम फलाने नाम के भाई या माई हो वह दे दो और मेरे गुरुदेव का प्रसाद ʹब्रह्मभावʹ तुम ले लो। फिर देखो, तुम विश्वनियंता के साथ एकाकार होते हो कि नहीं।

सारे ब्रह्माण्ड को जो नाच नचा रहा है उसके साथ मिलकर सारे ब्रह्माण्ड के स्वामी अपने परमात्मा को पा लो, इसीलिए लेना-देना होता है। तुम कुछ-कुछ देते हो लेकिन मैं चाहता हूँ कि ये कुछ-कुछ लेने देने के सौदे में शायद कोई असली सौदा भी हो जाय ! ૐ…ૐ….ૐ…..

तुम्हारा यह सब स्वीकार कर रहे हैं तो तुमसे प्रार्थना है कि यदि मेरे गुरुदेव का प्रसाद लेने की तुम्हारी तैयारी न हो तो इऩ चीजों को लेकर मत आना। तुम्हें भी परिश्रम होता है, हमें भी परिश्रम होता है और सँभालने वाले को भी परिश्रम होता है। यह परिश्रम हम तभी सहने को राजी हैं जब हमारे गुरुदेव का प्रसाद हजम करने की तुम्हारी तैयारी हो।

जिसको सच्ची प्यास होती है वह प्याऊ खोज ही लेता है। फिर उसके हिन्दू-मुसलमान, ईसाई-पारसी, वाद-संप्रदाय नहीं बचता है। प्यासे को पानी चाहिए। ऐसे ही यदि तुम्हें परमात्मा की प्यास है और तुम जिस मजहब, मत-पंथ में हो, उसमें यदि प्यास नहीं बुझती है तो उस मत-पंथ के बाड़े तोड़कर किसी फकीर तक  पहुँच जाओ। शर्त यही है कि प्यास ईमानदारीपूर्ण होनी चाहिए, ईमानदारी पूर्ण पुकार होनी चाहिए।

तुम्हें जितनी प्यास होगी, काम उतना जल्दी होगा। यदि प्यास नहीं होगी तो प्यास जगाने के लिए संतों को परिश्रण करना पड़ेगा और संतों का परिश्रम तुम्हारी प्यास जगाने में हो, उसकी अपेक्षा जगी हुई प्यास को तृप्ति प्रदान करने में हो तो काम जल्दी होगा। इसीलिए तुम अपने भीतर झाँक-झाँककर अपनी प्यास जगाओ ताकि वे ज्ञानामृत पिलाने का काम जल्दी से शुरु कर दें। अब वक्त बीता जा रहा है। न जाने कब, कहाँ, कौन चल दे ? कोई पता नहीं।

तुमको शायद लगता होगा कि तुम्हारी उम्र अभी दस साल और शेष हैं। लेकिन मुझे पता नहीं कि कल का दिन मैं जीऊँगा कि नहीं। मुझे इस देह का भरोसा नहीं है। इसीलिए मैं चाहता हूँ कि इस देह के द्वारा गुरु का कार्य जितना हो जाय, अच्छा है। गुरु का प्रसाद जो कुछ बँट जाय, अच्छा है और मैं बाँटने को तत्पर भी होता हूँ। रात्रि को साढ़े बारह-एक बजे तक आप लोगों के बीच होता हूँ। सुबह तीन-चार बजे भी बाहर निकलता हूँ, घूमता हूँ। तुम सोचते होगे कि ʹबापू थक गये हैं।ʹ ना, मैं नहीं थकता हूँ। मैं देखता हूँ कि तुम्हारे अंदर कुछ जगमगा रहा है। उसको देखकर ही मेरी थकान उतर जाती है। मैं निहारता हूँ कि तुम्हारे अंदर कोई ईश्वरीय नूर झलक रहा है, तो मेरी थकान उतर जाती है। फिर भी कहीं थकान आती है तो खिड़की बंद करके पानी पीकर आत्मा में गोता मार लेता हूँ। फिर तुमको श्रद्धा और तत्परता से युक्त पाता हूँ तो मैं ताजा हो जाता हूँ। सुबह सात बजे से रात्रि के बारह एक बजे तक तुम्हारे बीच होता हूँ और ताजे का ताजा दिखता हूँ… केवल इसी आशा से कि ताजे में ताजा जो परमात्मा है, जिसको कभी थकान नहीं लगती है, उस चैतन्यस्वरूप आत्मा में शायद तुम भी जाग जाओ….

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 1999, पृष्ठ संख्या 3-6, अंक 79

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