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जनकपुरी में लगी आग


पूज्यपाद संत श्री आशारामजी बापू

महर्षि याज्ञवल्क्य के सत्संग-प्रवचन में जब राजा जनक पहुँचते तभी महर्षि प्रवचन का प्रारम्भ करते थे। प्रतिदिन ऐसा होने से सत्संग में आने वाले अन्य ऋषि-मुनि एवं तपस्वियों को मन में ऐसा होता था कि याज्ञवल्क्य जैसे महर्षि भी सत्तावानों की, धनवानों की खुशामद करते हैं। क्या हम साधु-महात्मा उनके श्रोता नहीं हैं ?

साधु-महात्माओं के मन का बात महर्षि भाँप गये। उनके मन में आया कि गुरु के प्रति यदि थोड़ी-सी भी श्रद्धा में कमी आयेगी तो इन्हें लाभ नहीं हो पायेगा। उनकी शंका को दूर करने के लिए महर्षि ने एक लीला रची।

जनकपुरी के चहुँ ओर आग लग गई। अनुचर भागता हुआ आया। सत्संग-श्रवण में तल्लीन राजा जनक को समाचार दियाः “महाराज ! जनकपुरी को चारों ओर आग लग गई है।”

राजा ने उसे धीरे से कहाः “अभी तो मेरे मन में अज्ञान की भीषण आग लगी है, उसे सत्संगरूपी अमृतवर्षा से बुझा रहा हूँ। इस कार्य में विघ्न मत डाल। तू भी यहाँ शांति से बैठ जा।

थोड़ी देर में दूसरा आदमी आता है। फिर तीसरा आया। उन सबको राजा जनक ने यही समझाकर बिठा दिया- ” वह तो संसार की बाह्य आग है। एक दिन तो सबको उसमें जलना ही है। तुम लोग चुपचाप बैठ जाओ। मेरी अज्ञानरूपी आग पर हो रही सत्संगरूपी अमृतवर्षा से मेरी भीतरी आग बुझा लेने दो।”

इतने में राजा का मंत्री आया और बोलाः “राजन ! आग लगी है। महल के इर्द-गिर्द आग की लपटें नियंत्रण से बाहर हो रही हैं।”

यह सुनकर सत्संग में बैठे अन्य साधु-महात्मा उठे और भागने लगे।

उन्हें भागते देखकर याज्ञवल्क्य ने पूछाः “आप लोग क्यों भाग रहे हो ?”

तब किसी ने कहा मेरा तुम्बा जल जायेगा तो किसी ने कहा मेरी कौपीन जल जायेगी।

महर्षि याज्ञवल्क्यः “अरे महात्माओं ! राजा जनक तो अपने महल की भी चिन्ता नहीं करते और आप लोग ऐसी छोटी-मोटी वस्तुओं की चिंता कर रहे हो ? बैठ जाओ। यह वास्तविक आग नहीं है। यह तो मेरी योगशक्ति की लीला थी।”

तब साधुओं को अपनी स्थिति एवं राजा जनक की स्थिति का अंतर समझ में आया।

वे समझ गये कि महर्षि याज्ञवल्क्य सत्संग शुरु करते समय धनवान और सत्तावान राजा जनक की खुशामद करने के लिए उनकी प्रतीक्षा नहीं करते थे अपितु अपने सच्चे मुमुक्षु शिष्य की प्रतीक्षा करते थे। साधु महात्माओं को समझ में आ गया कि महाराज जनक राज्य भोगते भोगते भी साधु हैं। उनके मन पर संसार की परिस्थिति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वास्तव में वे ही ब्रह्मज्ञान के अधिकारी हैं।

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संसार कर्मभूमि है

एक बार माँ पार्वती ने भगवान शिव से पूछाः “भगवन ! कई ऐसे लोग देखे गये जो थोड़ा सा ही प्रयत्न करते हैं और सहज में ही उनके पास अनायास ही रथ, वस्त्र-अलंकार आदि धन-वैभव मंडराता रहता है और ऐसे भी कई लोग हैं जो खूब प्रयास करते हैं फिर भी उन्हें नपा तुला मिलता है। ऐसे भी कई लोग हैं जो जिंदगीभर प्रयत्न करते हैं फिर भी वे ठनठनपाल ही रह जाते हैं। जब सृष्टिकर्ता एक ही है, सबका सुहृद है, सबका है तो सबको एक समान चीजें क्यों नहीं मिलतीं ?”

भगवान शिव ने कहाः “जिसने किसी भी मनुष्य जन्म में, फिर चाहे दो जन्म पहले, दस जन्म पहले या पचास जन्म पहले बिना माँगे जरूरतमन्दों को दिया होगा और मिली हुई संपत्ति का सदुपयोग किया होगा तो प्रकृति उसे अनायास सब देती है। जिन्होंने माँगने पर दिया होगा, नपा-तुला दिया होगा, उन्हें इस जन्म में मेहनत करने पर नपा-तुला मिलता है और तीसरे वे लोग हैं जिन्होंने पूर्वजन्म में न पंचयज्ञ किये, न अतिथि सत्कार किया, न गरीब-गुरबों के आँसू पोंछे, न गुरुजनों की सेवा की वरन् केवल अपने लिये ही संपत्ति का उपयोग किया और कंजूस बने रहे ऐसे लोग इस जन्म में मेहनत करते हुए भी ठीक से नहीं पा सकते हैं और प्रकृति उन्हें देने में कंजूसी करती है।”

तब माँ पार्वती कहती हैं- “ऐसे लोग भी तो हैं, प्रभु ! कि जिनके पास धन-संपदा तो अथाह है लेकिन वे प्राप्त संपदा का भोग नहीं कर सकते।”

शिवजी ने कहाः “जिन्होंने जीवनभर संग्रह किया लेकिन मरते समय उन्हें ऐसा लगा कि कुछ तो कर जायें ताकि भविष्य में मिले…. इस भाव से अनाप-शनाप दान कर दिया तो उन्हें दूसरे जन्म में धन-संपदा तो अनाप-शनाप मिलती है किन्तु वे उसका उपयोग नहीं कर सकते क्योंकि जो पहले भी किसी के काम नहीं आया, वह उनके काम में कैसे आ सकता है ?”

माँ पार्वतीः “हे ज्ञाननिधे ! ऐसे भी कई लोग हैं जिनके पास धन, विद्या, बाहुबल बहुत है फिर भी वे अपने कुटुम्बियों के, पत्नी के प्रिय नहीं दिखते और कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके पास धन-संपदा नहीं है, बाहुबल, सत्ता नहीं है, सौन्दर्य नहीं है, मुट्ठीभर हाड़पिंजर शरीर है फिर भी कुटुम्बियों का, पत्नी का बड़ा स्नेह उन्हें मिलता है।

शिवजीः “हे उमा ! जिन्होंने अपना बाल्यकाल, अपना पूर्जन्म संयमपूर्वक एवं दूसरों को मान देकर गुजारा है उनको कुटुम्बी स्नेह करते हैं और वे गरीबी में भी सुखी जीते हैं लेकिन जिन्होंने पूर्वजन्म के दान-पुण्य के बल से धन-सत्तादि तो पा ली है किन्तु दूसरों को हृदयपूर्वक स्नेह नहीं किया है, मान नहीं दिया है, दूसरों का शोषण करते हैं उन्हें कुटुम्बी मान नहीं देते।”

संसार एक कर्मभूमि है। Every action creates reaction. आप जो भी करते हैं वह घूम-फिरक आपके ही पास आता है। अतः आप स्नेह देंगे तो स्नेह मिलेगा, मान देंगे तो मान मिलेगा लेकिन मान मिले इस वासना से नहीं वरन् जिनको भी मान दें ʹउऩकी गहराई  में मेरा परमात्मा हैʹ इस भाव से मान दें तो आपके भाव में परमात्मा प्रगटेगा और सामने वाले के हृदय में आपके लिए मान-आदर प्रगट हो जायेगा।

मान लेने के लिए नहीं वरन् मान देने के लिए व्यवहार करो। हम बड़े में बड़ी गलती क्या करते हैं ? पत्नी चाहती है मेरी चले, पति चाहता है मेरी चले। बहू चाहती है मेरी चले, सास चाहती है मेरी चले। देवरानी चाहती है मेरी चले, जेठानी चाहती है मेरी चले। पति-पत्नी, माँ-बाप, पुत्र-बहू, देवर-जेठ आदि सब चाहते हैं मेरी चले, मुझे सुख मिले, मुझे मान मिले।

हकीकत में सुख और मान लेने की चीज नहीं, देने की चीज है। जो सुख का दाता है वह दुःखी कैसे रह सकता है ? आप सुख के भिखारी न बनो, मान के भिखारी न बनो अपितु सुख और मान देने लगो। कोई सुख और मान दे या न दे इसकी परवाह न करो तो आपके हृदय में सुख और मान का प्रकाश और माधुर्य प्रगट होने लगेगा।

कोई कहता हैः “बाबा जी ! फलाना आदमी बड़ी गुप्त सेवा करता है। उसने सत्संग में बहुत सेवा की। उसको तो हार पहनाने का मौका तक नहीं मिला।”

अरे ! हार पहनाने का मौका नहीं मिला तो क्या हुआ ? अखबार में नाम नहीं आया तो क्या हुआ ? वह ईश्वर का दैवी कार्य करता है तो उसका हृदयेश्वर तो उसकी सेवा स्वीकार कर ही रहा है। क्या ईश्वर के दो ही हाथ हैं कि जिस हाथ से सेवा लेता है उसी हाथ से बदला दे क्या ? नहीं, हजारों-हजारों हाथ ईश्वर के हैं और बिना हाथ भी ईश्वर आपको अपना कृपा-प्रसाद देता है, आपके हृदय में आनंद, माधुर्य और सदबुद्धि देता है इसलिए ईश्वर के दैवी कार्य में प्रशंसा की चाहना न रखो। प्रशंसनीय सत्कार्य करो और वह सत्कार्य ईश्वर को अर्पण कर दो। ईश्वरीय सुख, ईश्वरीय आनंद देर-सबेर आपको प्राप्त हो जायेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 1997, पृष्ठ संख्या 27,28,29 अंक 53

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दीक्षा से दिशा


पूज्यपाद संत श्री आशारामजी बापू

धर्म मनुष्य को जीवन जीने की सही दिशा देता है। धर्म की व्याख्या स्वामी विवेकानंद ने बहुत ही सुन्दर तरीके से की है। वे कहते हैं, ʹधर्म अनुभूति की वस्तु है। मुख की बात, मतवाद अथवा युक्तिमूलक कल्पना नहीं है, चाहे वह कितनी ही सुन्दर हो। आत्मा की ब्रह्मस्वरूपता को जान लेना, तदरूप हो जाना, उसका साक्षात्कार करना-यही धर्म है। धर्म केवल सुनने या मान लेने की चीज नहीं है। समस्त मन-प्राण विश्वास के साथ एक हो जायें – यही धर्म है।ʹ

सीदन्नपि ही धर्मेण न त्वधर्मं समाचरेत्।

धर्मो ही भगवान देवो गतिः सर्वेषु जन्तुषु।।

ʹधर्म पर चलने से कष्ट हो, तो भी अधर्म का आचरण नहीं करना चाहिए, क्योंकि धर्मदेवता साक्षात भगवान के स्वरूप हैं। वे ही सब प्राणियों की गति हैं।ʹ

लेकिन आजकल धर्म के नाम पर लोगों को भड़काया जाता है, फिर दूसरों को सताया जाता है, दूसरों का शोषण किया जाता है या लालच देकर उन्हें पथभ्रष्ट किया जाता है। यह धर्म नहीं है। सच्चा धर्म है अपने आपको सबमें बसे हुए उस एक-के-एक अन्तर्यामी परमात्मा के करीब लाना और उसका ज्ञान पाना।

शिक्षित आदमी के जीवन में यदि धर्म का प्रभाव है तो उसके जीवन की दिशा सही होगी तब वह महान से महान कार्यों का सम्पादन भी कर सकेगा। श्रीरामकृष्णदेव, कबीर, तुकाराम, मीरा, वल्लभाचार्य, रमण महर्षि, लीलाशाहजी महाराज जैसे अनेक महापुरुष हो गये, जिनके जीवन में ऐहिक शिक्षा तो नहीं के बराबर थी लेकिन ज्ञान के प्रभाव से उनके जीवन की दिशा ऐसी थी उनके द्वारा समाज का परम कल्याण हुआ है और आज भी लाखों-लाखों लोग उनके ज्ञान-प्रसाद से आनंदित हो रहे हैं और परम कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं।

जिसके जीवन की दिशा सही है, वह चाहे ऐहिक दृष्टि से अधिक पढ़ा-लिखा हो कि न हो, उसके पास सुख-सुविधाएँ अधिक हों या कम हों, उसकी वह परवाह नहीं करता है। वह बाहर के सुख-सुविधा की अपेक्षा अपने भीतर की शांति, तृप्ति पाता है। उसका जीवन अपने तथा दूसरों के लिए मंगलकारी हो जाता है।

राज्यसत्ता के मार्ग पर चलने वालों के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज का जीवन अनुकरणीय है। समर्थ गुरु स्वामी रामदास जी के मार्गदर्शन से उनके जीवन को सही दिशा मिली थी।

शिवाजी जब समर्थ रामदास के पास संन्यास की दीक्षा लेने गये तब समर्थ रामदास ने कहाः “मैं तुम्हें संन्यास की दीक्षा नहीं दूँगा। इस समय देश को तुझ जैसे वीर पुरुषों की जरूरत है।”

दीक्षा के दिन समर्थ रामदास ने शिवाजी महाराज को तीन वस्तुएँ प्रसाद के रूप में दीं- पहले खोबा भरकर मिट्टी दी, फिर खोबा भरकर घोड़ो की लीद दी और अन्त में नारियल दिया।

गुरु जब प्रसाद देते हैं तो प्रसाद में गुरु का संकल्प होता है, गुरु के हृदय का भाव होता है। सत्शिष्य उसे झेल ले तो उसका जीवन सफल हो जाता है।

शिवाजी महाराज दीक्षित होकर जीजामाता के पास गये और गुरु जी के दिए हुए प्रसाद के बारे में पूछाः “माँ ! मुझे कुछ समझ में नहीं आता है कि गुरु जी ने प्रसादरूप में यह सब क्या दिया, क्यों दिया ?”

माँ कहती हैं- “शिवा ! तुझे मिट्टी इसलिए दी है कि तू महीपति होगा। घोड़ों की लीद इसलिए दी है कि तेरे  अस्तबल में घोड़े होंगे और युद्ध के समय में या जब कभी तुझ पर संकट आ जाये तो गुरुकृपा घोड़े द्वारा तेरी रक्षा करेगी। यह लीद नहीं है बेटा ! यह तो गुरुदेव के रहस्यमय आशीर्वाद हैं। नारियल इसलिए दिया है कि तेरे भीतर अहंकार न उभर पाये। भीतर से तेरी सम्पूर्ण रक्षा तेरे गुरुदेव करेंगे। इतना ही नहीं, तेरा अहंकार मिटाने की जवाबदारी भी उन्होंने अपने सिर ले ली है। शिवा ! भोग और मोक्ष, दोनों ही तेरे हाथ में हैं। आज तुझे महादीक्षा मिल गई है।

ऐसे समर्थ महापुरुषों द्वारा जब दीक्षा मिल जाती है तो उनके द्वारा अच्छे काम, दूसरों की भलाई के काम सहज में हो जाते हैं। फिर चाहे वह दुकान चलाता हो, चाहे राज्य करता हो, चाहे छोटे-बड़े जो भी काम करता हो, क्योंकि उसके जीवन में महापुरुषों के ज्ञान का प्रभाव होता है, उनकी दुआ का प्रभाव होता है।

ब्रह्मज्ञानी ते कछु बुरा न भया।

ब्रह्मज्ञानी से किसी का कुछ भी बुरा नहीं होता है और ऐसे ब्रह्मवेत्ताओं के सच्चे शिष्यों से भी समाज का बुरा नहीं होता है क्योंकि ब्रह्मवेत्ताओं का ʹबहुजन हिताय बहुजन सुखाय प्रवृत्तिʹ का स्वभाव उनके शिष्यों में भी अनायास ही आ जाता है।

शिवाजी ऐसे महापुरुष द्वारा दीक्षित हुए थे और उनके जीवन की दिशा भी सही थी। एक बार युद्ध में उनकी सेना से परास्त किसी मुगल सरदार की सुन्दर स्त्री को शिवाजी के सिपाही पकड़ लाये और दरबार में पेश करते हुए उऩ्होंने सोचा कि महाराज खुश होंगे लेकिन शिवाजी उस स्त्री से कहते हैं- “यदि मेरा दोबारा जन्म हो तो मैं  प्रभु से प्रार्थना करता हूँ कि मैं ऐसी सुन्दर माता की कोख से जन्म लूँ।”

सैनिकों ने उस मुगल युवती को भोग्या बनाने के लिए शिवाजी के सम्मुख प्रस्तुत किया था लेकिन भारत का यह वीर उसे मातृदृष्टि से निहारता हुआ सम्मानपूर्वक उसे उसके पति के पास लौटा देता है। क्या मुगल सम्राटों के इतिहास में ऐसा दीखने को मिलेगा ?

जिनके जीवन की दिशा सही होती है वे राजसत्ता में भी धर्म को आगे रखकर निर्णय लेते हैं, इसीलिए उनका जीवन दूसरों के लिए आदर्श बन जाता है, प्रेरणादायी बन जाता है।

शिवाजी मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राणों की बाजी लगाकर जूझ रहे थे तो कई लोग उनके विरोधी भी थे, जो अपने ऐशो-आराम तथा वैभव-विलास के लिए वतन को बेच डालना चाहते थे। ऐसे वतन विरोधियों ने एक मजबूर लड़के की मजबूरी का लाभ उठाकर उसके द्वारा शिवाजी की हत्या करवाने का षड्यंत्र रचा। शिवाजी एक रात अपने शयन-खंड में सो रहे थे तब मालवजी नामक एक चौदह वर्षीय बालक अपने को छुपाता हुआ, संभालता हुआ, किसी तांत्रिक विद्या के सहारे शिवाजी के शयनखंड में पहुँच गया।

शिवाजी के सेनापति ताना जी ने उसे देख लिया था। तानाजी जानना चाहते थे कि वह क्या करने आया है। वे सतर्क थे, एकदम सावधान थे। वे भी छुपकर उसके पीछे-पीछे पहुँच गये। जैसे ही मालवजी ने म्यान से तलवार खींची और शिवाजी की गर्दन को धड़ से अलग करना चाहा कि पीछे से ताना जी ने उस बालक को दबोच लिया। शोरगुल सुनकर शिवाजी की नींद खुल गयी।

ताना जी कहते हैं- “महाराज ! इसे मृत्युदंड देना चाहिए। यह आपकी हत्या करने के लिए आया था।”

शिवाजी उस बालक से पूछते हैं- “भाई ! मैंने तेरा क्या बिगाड़ा है ? तू क्यों मुझे मारने आया है ?”

मालवजीः “मेरी माँ बीमार है और मेरे पिता बचपन में ही मुझे बेसहारा छोड़कर राज्य की रक्षा के लिए युद्ध के मैदान में अपनी प्राणहुति दे गये। इसी कारण परिवार की स्थिति अत्यधिक दयनीय हो गई। माँ के इलाज के लिए मेरे पास एक भी पैसा नहीं है। आपके विरोधियों ने मुझसे कहा कि ʹयदि तू शिवाजी की हत्या कर देगा तो हम तुझे बहुत सारा धन ईनाम में देंगेʹ और इसी लोभवश मैं आपकी हत्या करने आया था, लेकिन दुर्भाग्य कि मैं पकड़ा गया।”

ताना जी ने आवेश में आकर तलवार खींचते हुए कहते हैं- “लेकिन नादान ! तू अब मेरी तलवार से नहीं बच सकता।”

मालवजीः “आप मुझे मृत्युदंड दीजिये, उसके लिए मैं सहर्ष तैयार हूँ लेकिन मुझे एक रात की मोहलत दीजिये। मरने से पहले मैं अपनी माँ के पास जाकर उसे सान्त्वना के दो वचन सुनाना चाहता हूँ। मैं वनच देता हूँ कि सुबह तक मैं वापस लौट आऊँगा।”

उस बालक मालवजी की निर्भीकतापूर्वक कही गयी बातों को सुनकर शिवाजी महाराज कहते हैं- “ताना ! यह अपनी माँ के लिए छुट्टी माँग रहा है तो इसे छोड़ दे। इसके बोलने में भी कुछ सच्चाई नजर आ रही है।”

मालवजी को आजाद करते हुए शिवाजी कहते हैं- “जा ! अपनी माँ के सेवा करके, उससे आशीर्वाद लेकर सुबह आ जाना।”

प्रातःकाल का समय है। शिवाजी महाराज अपने दरबार में बैठे हैं तभी द्वारपाल के पास आकर एक बालक कहता हैः “शिवाजी के कह दो कि मालवजी आया है।” द्वारपाल का संदेश सुनकर शिवाजी के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उन्होंने उसे भीतर बुलवाया। दरबार में उपस्थित होकर मालव जी कहता हैः “महाराज ! अपने अपराध की सजा पाने को मैं आ गया हूँ। मैं अपनी माँ को सान्त्वना देकर आया हूँ कि मेरे जैसे बेटे तो कई बार आये होंगे। मैं देर-सेबर आऊँ, न भी आऊँ तो तू मेरी चिंता मत करना बल्कि ईश्वर के चिंतन में ही मन को लगाये रखना। मैंने अपनी माँ से ऐसा नहीं कहा है कि मैं मर जाऊँगा, क्योंकि संतों की वाणी में मैंने सुना है कि मैं तो मरता नहीं हूँ। मरती तो देह है। अब आप खुशी से मुझे मृत्युदंड दीजिये।”

शिवाजी का हृदय दया से भर आया। उन्होंने कहाः “मालवजी ! तेरे जैसे सत्यनिष्ठ और वीर युवानों की तो मुझे बहुत आवश्यकता है। मैं तुझे अपने साथ ही रखूँगा।”

कितने बुद्धिमान और गुणग्राही थे शिवाजी ! सामने शत्रु खड़ा है, उसमें भी सदगुण देख रहे हैं ! यह गुणग्राही दृष्टि का प्रभाव। जिनके जीवन में धर्म का प्रभाव है उनके जीवन में सारे सदगुण आ जाते हैं, उनका जीवन ऊँचा उठ जाता है, दूसरों के लिए उदाहरणस्वरूप बन जाता है।

आप भी धर्म के अनुकूल आचरण करके अपना जीवन ऊँचा उठा सकते हो। फिर आपका जीवन भी दूसरों के लिए आदर्श बन जायेगा जिससे प्रेरणा लेकर दूसरे भी अपना जीवन स्तर ऊँचा उठाने को उत्सुक हो जायेंगे।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 1997, पृष्ठ संख्या 14,15,16,22 अंक 53

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आत्मज्ञान की महिमा


पूज्यपाद संत श्री आशारामजी बापू

आत्मज्ञान की बड़ी महिमा है। एक व्यक्ति को दुनियाभर का धन दे दो, दुनियाभर का सौन्दर्य दे दो लेकिन आत्मज्ञान से अगर वचिंत रखा तो वह अभागा रह जायेगा। उसके हृदय में अशांति जरूर रहेगी, खटकाव जरूर रहेगा और जन्म-मरण का चक्र उसके सिर पर मँडराता ही रहेगा। फिर किसी-न-किसी माता के गर्भ में उलटा लटकता ही रहेगा। यदि उसे आप और कुछ भी न दो, परन्तु किसी ब्रह्मज्ञानी गुरु की मधुर निगाहों की माधुर्यता की एक झलक दिला दो, उसकी रूचि ईश्वराभिमुख कर दो तो महाराज ! आपने उसे ऐसा दे डाला, ऐसा दे डाला कि हजारों जन्मों के माँ-बाप तक न दे सकें। हजारों-हजारों जन्म कों के दोस्त रिश्ते-नाते न दे सकें, ऐसी चीज आपने उसको हँसते-हँसते दिला दी। आप उसके परम हितैषी हो गये।

आत्मज्ञान की ऐसी महिमा है। भगवान श्रीकृष्ण युद्ध के मैदान में मुस्कराते हुए अर्जुन को आत्मज्ञान दे रहे हैं। श्रीकृष्ण आये हैं तो कैसे ? विषम परिस्थितियों में आये हैं। गीता का भगवान कैसा अनूठा है ! किसी का भगवान सातवें अर्स पर रहता है, किसी का खुदा कहीं होता है, किसी का भगवान कहीं होता है लेकिन भारत का भगवान ! जीव को रथ पर बिठाता है और खुद सारथि होकर, छोटा होकर भी जीव को ब्रह्म का साक्षात्कार कराने में संकोच नहीं करता। श्रीकृष्ण तो यह भी नहीं कहते कि ʹइतना नियम करो, इतना व्रत करो, इतना तप करो, फिर मैं मिलूँगा।ʹ नहीं ! वे तो कहते हैं-

अपि चेदसी पापेभ्यः सर्वेभ्य पापकृत्तमः।

सर्व ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सतंरिष्यसि।।

ʹयदि तू सब पापियों से भी अधिक ताप करने वाला है तो भी ज्ञानरूप नौका द्वारा निःसन्देह संपूर्ण पापों को अच्छी प्रकार तर जायेगा।ʹ गीताः 4.36

भगवान कहते हैं ʹपापकृत्तमʹ। जैसे प्रिय, प्रियतर, प्रियतम होता है ऐसे ही कृत, कृत्तर और कृत्तम अर्थात् पापियों में भी आखिरी पंक्ति का हो, वह भी यदि इस ब्रह्मज्ञान की, आत्मज्ञान की नाव में बैठेगा तो तर जायेगा।

भगवदगीता जिस देश में हो, उसे देश के वासी जरा-जरा सी बात में चिढ़ जायें, दुःखी हो जायें, भयभीत हो जायें, ईर्ष्या करने लगें तो यह गीता से विमुखता के ही दर्शन हो रहे हैं। यदि हम गीता के ज्ञान के सन्मुख हो जायें तो हमारा यह दुर्भाग्य नहीं रह सकता।

जरा-जरा सी बात में जर्मन टॉय जैसा बन जाना, कोई दो शब्द बोल जाये तो आग बबूला हो जाना अथवा किसी ने जरा सी बड़ाई कर दी, दो शब्द मीठे कह दिये तो फूल जाना, इतना तो लालिया, मोतिया और कालिया कुत्ता भी जानता है। जलेबी देखकर पूँछ हिलाना और डण्डा देखकर दुम दबा देना, इतनी अक्ल तो उसके पास भी है। अगर इतना ही ज्ञान आपके पास है तो इतनी पढ़ाई-लिखाई का फल क्या ? मनुष्य होने का फल क्या ? फिर तो हम लोग भी द्विपाद पशु हो गये।

भगवान कहते हैं कि तुम कितने भी ठगे गये हो लेकिन जब गीता की शरण आ जाओ। अभी-अभी तुमको हम राजमार्ग दिखा देते हैं। जैसे हवाई जहाज छः घण्टों में दरिया पार पहुँचा देता है किन्तु बैलगाड़ी वाला छः साल चलता रहे फिर भी दरिया-पार करना उसके लिए संभव नहीं। मनमानी सुख की बैलगाड़ी को छोड़कर अब तुम आत्म-परमात्मसुख के जहाज में बैठ जाओ तो भवसागर से भी तर जाओगे।

ज्ञान भिडई ज्ञानडी ज्ञान तो ब्रह्मज्ञान।

जैसे गोला तोप का सोलह सो मैदान।।

जगत के और ज्ञान, छोटे-मोटे तो ज्ञानडो हैं लेकिन ब्रह्मज्ञान तोप का गोला है, जो सारी मुसीबतों को मार भगाता है। उस ज्ञान को पाने का तरीका भी भगवान सहज, सरल बता रहे हैं और वह तुम कर सकते हो। उसमें जो अड़चनें आती हैं उनका कारण भी भगवान बता रहे हैं और उन अड़चनों को कुचलने का उपाय भी भगवान बता रहे हैं। केवल तुमको गाँठ बाँधनी है कि ʹईश्वरप्राप्ति करके ही रहेंगे। हमको इस संसारभट्ठी में पच-पचकर नहीं मरना है बल्कि हमको शहंशाह होकर जीना है और शहंशाह होकर ही परम शहंशाह से मिलना है।ʹ

राजा से मिलने जब जाते हैं तो भीखमंगों के कपड़े पहनकर नहीं जाते। किसी मिनिस्टर, कलेक्टर से मिलने जब व्यक्ति जाता है तो उस दिन कपड़े जरा ठीकठाक करके जाता है। जब मिनिस्टर, चीफ मिनिस्टर से मिलना है तो सज-धजकर जाते हैं तो उस ब्रह्मांडनायक परमेश्वर से मिलना हो तो शहंशाह होकर जाओ। दीनता, हीनता, वासना, चिंता, मुसीबतें, काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, मात्सर्य, यह कचरा लेकर कहाँ मुलाकात करने जाते हो ? इन विकारों से बचने का उपाय, संसार में सुगमता से स्वर्गीय जीवन जीने का उपाय और परमसुखस्वरूप उस परमेश्वर को पाने का उपाय, ये सब बातें श्रीमदभागवत में व भगवदगीता में बतायी गयी हैं। कोई भी व्यक्ति गीता के अध्ययन, मनन और निदिध्यासन से अपने जीवन-पुष्प को महका सकता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 1997, पृष्ठ संख्या 12,13 अंक 53

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