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मनोनिग्रह की महिमा


एक मनोवैज्ञानिक मीमांसा

पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

लोग कहते हैं कि यह प्रगति का युग है लेकिन वास्तव में यह भारी अवनति का युग है। आज के जवानों के साथ बड़ा अन्याय हो रहा है। चारों ओर से उन पर विकारों को भड़काने वाले आक्रमण होते रहते हैं।

एक तो वैसे ही पशु-प्रवृत्तियाँ यौन उच्छृंखलता की ओर प्रोत्साहित करती हैं, सामाजिक परिस्थितियाँ भी उसी ओर आकर्षण बढ़ाती हैं…. इस पर उस प्रवृत्तियों को वैज्ञानिक समर्थन मिलने लगे और संयम को हानिकारक बताया जाने लगे…. कुछ तथाकथित आचार्य भी, फ्रायड जैसे नास्तिक अधूरे मनोवैज्ञानिक के व्यभिचार-शास्त्र का आधार देकर ʹसंभोग से समाधिʹ का उपदेश देने लगे तब तो ईश्वर ही ब्रह्मचर्य और दाम्पत्यजीवन की पवित्रता का रक्षक है।

सेक्स को ऊर्ध्वगामी बनाकर जो उल्लास, प्रसन्नता, प्रमोद और आनंद मिलता है, योगशास्त्र में उसकी बड़ी प्रशंसा की गई है और उस सुख को काम सुख से सदैव बढ़कर बताया गया है। यौनाकर्षण तो क्षणिक सुख की प्रेरणा देता है। यौनाकर्षण से आंशिक सुख भले ही मिल जाता है लेकिन बाद में शरीर और आत्मा की दुर्गति होती है। मनुष्य के विचार और क्रिया कलाप सब अधोगामी होते चले जाते हैं। व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में उपद्रव खड़े हो जाते हैं।

आँकड़े बताते हैं कि आज पाश्चात्य देशों में यौन सदाचार की कितनी दुर्गति हुई है। इस दुर्गति के परिणामस्वरूप वहाँ के व्यक्तिगत जीवन में रोग इतने बढ़े हैं कि अमेरिका से तीन गुनी ज्यादा बस्ती भारत में होने पर भी भारत से 10 गुनी ज्यादा दवाइयाँ अमेरिका में खर्च होती हैं। मानसिक रोग इतने बढ़े हैं कि हर दस अमेरिकन में एक को मानसिक रोग होता है। दुर्वासनाएँ इतनी बढ़ी हैं कि हर वर्ष में 20 लाख कन्याएँ विवाह के पूर्व ही गर्भवती हो जाती हैं। मुक्त साहचर्य (Free Sex) के हिमायती होने के कारण शादी के पहले वहाँ प्रायः हर व्यक्ति जातीय संबंध बनाने लगता है। इसी की वजह से 65 प्रतिशत शादियाँ तलाक में बदल जाती हैं और मनुष्य के लिए प्रकृति के निर्धारित संयम का उपवास करने के कारण प्रकृति ने उनको जातीय रोगों का शिकार बना रखा है। उऩमें मुख्यतः एड्स की बीमारी दिन दुनी-रात चौगुनी फैलती जा रही है। वहाँ के पारिवारिक जीवन में क्रोध, कलह, असंतोष और संताप एवं सामाजिक जीवन में अशांति, उच्छृंखलता, उद्दंडता और शत्रुता का महाभयानक वातावरण छा गया है। विश्व की 4 प्रतिशत जनसंख्या अमेरिका में है। उसके उपयोग के लिए विश्व की 40 प्रतिशत साधन सामग्री (जैसे कि कार, टी.वी., एयरकंडिशन्ड घर आदि) जुटा रखी है फिर भी अपराधवृत्ति इतनी बढ़ी है कि हर 10 सेकंड में एक सेंधमारी होती है, हर लाख व्यक्तियों में से 425 व्यक्ति कारागार में सजा भोग रहे हैं जबकि भारत में हर लाख व्यक्ति में से 23 व्यक्ति जेल में रहते हैं। 1992 के वर्ष में अमेरिका में कुल 1 करोड़ 40 लाख अपराध पुलिस रेकार्ड पर दर्ज किये गये हैं।

इन तथ्यों का मूल कारण यही है कि पाश्चात्य लोगों ने फ्रायड के व्यभिचारशास्त्र का अनुकरण किया। मनोविज्ञानी फ्रायड ने कहा कि काम-वासना की अतृप्त इच्छाएँ ही मनोविकारों को उत्पन्न करती हैं और उस अपराध से प्रतिभा कुण्ठित होती है। मानसिक ही नहीं, शारीरिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है और व्यक्तित्व दब जाता है। उन्मुक्त कामसेवन की वकालत करते हुए उस पर लगे प्रतिबन्धों को हानिकारक बताया। उसका अनुकरण करने वाले पश्चिमी देशों में तो उल्टे ही परिणाम देखने को मिले।

इससे यह स्पष्ट होता है कि काम को संयत न किया जायेगा तो मनुष्य पशु से भी बदतर हो जायेगा। पूर्व के देशों में लोग नैतिक और धार्मिक मूल्यों के कारण मानसिक रोगों से, शारीरिक रोगों से और सामाजिक अव्यवस्था से उतने पीड़ित नहीं हैं जितने पाश्चात्य देशों के लोग पीड़ित हैं। अतः पाश्चात्य अंधानुकरण से बचना होगा। फ्रायड के उक्त प्रतिपादन से यौन-सदाचार पर बुरा प्रभाव पड़ा है और लोगों का जितना-जितना विश्वास फ्रायड के प्रतिपादन पर जमा है उतना ही उतना असंयम और व्यभिचार को प्रोत्साहन मिला है। सुशिक्षित वर्ग में इस तथाकथित मनोविज्ञान के आधार पर यह मान्यता जड़ जमाती जा रही है किः “कामेच्छा की पूर्ति आवश्यक है। उसे स्वच्छन्द उपभोग का अवसर मिलना चाहिए। संयम से शारीरिक और मानसिक हानि होती है।” इस प्रतिपादन का कुप्रभाव नर-नारी के बीच पावन संबंधों की समाज व्यवस्था, सुव्यवस्था एवं पवित्रता पर पड़ रहा है। दाम्पात्य जीवन में यदि कुछ अतृप्ति रह जाती है  व्यक्ति उसे बाहर पूरा करने में भय, लज्जा, संकोच का अनुभव नहीं करता वरन् उस उद्धत पाशवी आचरण को शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से आवश्यक मानता है। यह व्यभिचार का खुला समर्थन है। दाम्पत्य मर्यादाओं को फिर कैसे स्थिर रखा जा सकेगा ? अविवाहित या विधुर यदि व्यभिचार पर प्रवृत्त होते हैं तो उन्हें किस तर्क से समझाया जा सकेगा ? फिर जो छेड़छाड़ और गुण्डागर्दी की अश्लील शर्मनाक घटनाएँ आये दिन होती रही हैं उन्हें अवांछनीय या अनावश्यक कैसे ठहराया जा सकेगा ? फ्रायड का शास्त्र दूसरे शब्दों में व्यभिचारशास्त्र ही है जिसे मनोविज्ञान में दार्शनिक मान्यता देकर समाज-व्यवस्था पर कुठाराघात किया जा रहा है। मनोविज्ञानियों के प्रतिपादनों को देखते हुए फ्रायड के काम-स्वेच्छाचार का प्रतिपादन बहुत ही बचकाना और एकांगी प्रतीत होता है। फिर भी खेद इसी बात का है कि ऐसे अधूरे और अवांछनीय निष्कर्षों को अग्रिम पंक्ति में बिठाने की ऐसी भूल की जा रही है जिसका परिणाम मानव समाज का भविष्य अन्धकारमय ही बना सकता है।

यह फ्रायड जैसे कामुकता के समर्थक दार्शनिकों की ही देन है जिसने पाश्चात्य देशों को मनोविज्ञान के नाम पर बहुत प्रभावित किया है और वहीं से वह आँधी अब इस देश में भी बढ़ती आ रही है। अतः इस देश की भी अमेरिका जैसी अवदशा हो, उसके पहले सावधान होना पड़ेगा। यहाँ के कुछ अविचारी दार्शनिक भी फ्रायड के आधार पर ʹसंभोग से समाधिʹ का उपदेश देने लगे, जिससे युवा पीढ़ी गुमराह हुई है। फ्रायड ने  तो केवल मनोवैज्ञानिक मान्यता देकर व्यभिचारशास्त्र बनाया लेकिन तथाकथित दार्शनिक ने ʹसंभोग से समाधिʹ द्वारा व्यभिचार को आध्यात्मिक मान्यता देकर धार्मिक लोगों को भी भ्रष्ट किया। ʹसंभोग से समाधिʹ नहीं होती, सत्यानाश होता है। संयम से ही समाधि होती है। इस भारतीय मनोविज्ञान को अब पाश्चात्य मनोविज्ञानी भी स्वीकार करने लगे हैं। भारतीय मनोविज्ञानी पतंजलि के सिद्धान्तों पर चलने वाले हजारों योगसिद्ध महापुरुष इस देश में हुए हैं, अभी भी हैं और आगे भी होते रहेंगे जबकि संभोग से समाधि के मार्ग पर कोई योगसिद्ध महापुरुष हुआ हो ऐसा हमने तो नहीं सुना। उस मार्ग पर चलने वाले पागल हुए हैं। ऐसे कई नमूने हमने देखे हैं। वेदकालीन महापुरुषों के मनोविज्ञान के आधार पर रचे गये नैतिक और धार्मिक आदर्शों पर टिकी हुई भारतीय संस्कृति लाखों वर्षों के बाद भी जीवित हैं जबकि भोगवादी कई संस्कृतियाँ इस धरातल पर प्रकट हुई और भोगवाद के प्रभाव से नष्ट भी हो गईं। आजकल की पश्चिमी सभ्यता अभी 300 वर्ष पुरानी भी नहीं हुई और भोगवादी सिद्धान्तों के कारण विनाश के कगार पर जा पहुँची है। इस प्रकार परिणामों को देखते हुए भी बुद्धिमान व्यक्ति को संयम की आधारशिला पर खड़े भारतीय मनोविज्ञान को जीवन में लाना पड़ेगा, अन्यथा सर्वनाश होकर ही रहेगा।

पाश्चात्य मनोविज्ञान पिछले 300 वर्षों से ही प्रकाशित हुआ है जबकि भारत का मनोविज्ञान ईसा के पूर्व 2000 वर्ष पहले भी पूर्ण विकसित हो चुका था। भारतीय मनोविज्ञान की तुलना में पाश्चात्य मनोविज्ञान तुच्छ प्रतीत होता है। शरीर रचना शास्त्र (Anatomy) और जीव विज्ञान (Physiology) के आधार पर पाश्चात्य मनोविज्ञान खड़ा है। प्रोफेसर सिग्मंड फ्रायड ने चेतातंत्र के भ्रूणशास्त्र का अभ्यास किया था। बाद में प्रोफेसर ब्रुअर (जो हिस्टीरिया और अन्य मानसिक रोगियों का अभ्यास करते थे) के साथ अध्ययन किया। फिर उऩ्होंने अवचेतन मन में झाँकने की (Psychoanalysis) पद्धति का आविष्कार किया। मनोविश्लेषण तो किया पर मानसिक रोगियों का मनोविश्लेषण किया और उस अध्ययन से प्राप्त निष्कर्षों को सभी मनुष्यों पर लागू करने की भारी गलती की।

फ्रायड ने अपनी तराजू पर सारी दुनिया को तौलने की गलती की है। उसका अपना जीवन क्रम कुछ ऐसे ही बेतुके क्रम से विकसित हुआ। उसकी माता अमेलिया बड़ी खूबसूरत थी। उसने योकोव  के साथ अपना दूसरा विवाह किया था। जब फ्रायड जन्मा तब वह 21 वर्ष की थी। बच्चे को वह बहुत प्यार करती थी। सम्भव है कुछ समझ आने पर उसके रूप में फ्रायड की यौनाकांक्षा भड़की हो और उसने माँ के प्यार को प्रणय माना हो। वह बाल्यकाल से ही उद्दण्ड और ईर्ष्यालु था।

एक दिन वह माता-पिता के सोने के कमरे में घुस गया और उन दोनों को विचित्र परिस्थिति में डालकर हड़बड़ा दिया। हो सकता है उसे इस स्थिति में ईर्ष्या उत्पन्न हुई हो। वह जब सात साल का था तब एक दिन बाप की ओर मुँह बनाकर चिढ़ाने लगा। बाप ने उसे डाँटा और कहा कि यह छोकरा जिद्दी और निकम्मा बनता जाता है। ये घटनाएँ फ्रायड ने स्वयं लिखी हैं। इन घटनाओं के आधार पर फ्रायड कहता हैः “पुरुष बचपन से ही ईडिपस काम्पलेक्स में यौन-आकांक्षा अथवा यौन-ईर्ष्या से ग्रसित रहता है। लड़का माँ के प्रति यौनांकाक्षा से प्रेरित रहता है, लड़की बाप के प्रति आकर्षित होती है जिसे इलेक्ट्रा काम्पलेक्स नाम दिया। तीन वर्ष की आयु से ही बच्चा अपनी माँ के साथ यौन संबंध स्थापित करने के लिए लालायित रहता है। एकाध साल के बाद जब उसे पता चलता है कि उसकी माँ के साथ तो बाप का वैसा संबंध पहले से ही है अतः उसके मन में बाप के प्रति ईर्ष्या और घृणा जाग पड़ती है। यह विद्वेष उसकी अवचेतना में आजीवन बना रहता है। इसी प्रकार लड़की अपने बाप के प्रति सोचती है और माँ से ईर्ष्या करती है।”

फ्रायड कहता हैः “इस मानसिक अवरोध के कारण मनुष्य की गति रूक जाती है। ईडिपस काम्पलेक्स उसके सामने तरह तरह के अवरोध खड़े करता है। यह स्थिति अपवाद नहीं है वरन् साधारणतया प्रायः यही होता है।

यह कितना घृणित और हास्यास्पद प्रतिपादन है ! छोटा बच्चा यौनाकांक्षा से पीड़ित होगा सो भी अपनी माँ के साथ ? पशु-पक्षियों के शरीर में भी वासना तब उठती है जब उनके शरीर प्रजनन के योग्य सुदृढ़ हो जाते हैं। लेकिन मनुष्य के बालक को यह वृत्ति इतनी छोटी आयु में ही कैसे पैदा हो जाती है ? और माँ के साथ वैसी तृप्ति करने की उसकी शारीरिक-मानसिक स्थिति भी नहीं होती। फिर तीन वर्ष के बालक को काम-प्रयोग और उनमें माँ-बाप के संलग्न होने की जानकारी कहाँ से हो जाती है ? फिर वह कैसे समझ लेता है कि उसे बाप से ईर्ष्या करनी चाहिए ?

बच्चे द्वारा माँ का दूध पीने को  ऐसे मनोविज्ञानियों ने रतिसुख के समकक्ष बताया है। यदि इस स्तनपान को रतिसुख गिना जाय  आयु बढ़ने के साथ-साथ वह उत्कण्ठा भी प्रबल होती जानी चाहिए और व्यस्क होने तक बालक को माता का दूध ही पीते रहना चाहिए। यह किस प्रकार संभव है ?

…..तो ऐसे बेतुके प्रतिपादन हैं जिसके लिए भर्त्सना ही की जानी चाहिए।

ब्रह्मचर्य़ और इन्द्रिय निग्रह की महिमा सनातन धर्म ने ही गाई है ऐसी बात नहीं है। इस्लाम, ईसाइयत, जैन, सिक्ख एवं तमाम धर्मग्रन्थों ने भी संयम को अत्यंत महत्त्वपूर्ण बताया है। कुछ लोग मानते हैं कि ब्रह्मचर्य  केवल योगियों, साधु-संतों के लिए है लेकिन भोगवादी पाश्चात्य देशों की अवदशा देखकर यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि हर मनुष्य यदि मनुष्यता से दिव्यता की ओर बढ़ना चाहता है तब तो उसे संयम का सहारा लेना ही पड़ेगा, लेकिन जो साधना करना नहीं चाहता वह भी यदि मनुष्य से पशु बनना न चाहता हो, पशु से पिशाच बनना न चाहता हो तो भी उसे संयम का अवलंबन लेना ही पड़ेगा। जो मनुष्य शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक प्रसन्नता और बौद्धिक सामर्थ्य बनाये रखना चाहते हों, ऐसे संसारी मनुष्यों के लिए भी ʹयौवन सुरक्षाʹ पुस्तक पढ़ना अत्यन्त आवश्यक है।

जो लोग मानव समाज को पशुता में गिरने से बचाना चाहते हों, भावी पीढ़ी का जीवन पिशाच होने से बचाना चाहते हैं, इस देश को एडस जैसी घातक बीमारियों से ग्रस्त होने से रोकना चाहते हैं, स्वस्थ समाज का निर्माण करना चाहते हैं उन सबका यह नैतिक कर्तव्य है कि वे हमारी गुमराह युवा पीढ़ी को ʹयौनव सुरक्षाʹ जैसी पुस्तिका पढ़ायें। विद्यार्थियों में ऐसी पुस्तिका बाँटने से इस देश के जवानों को गुमराह होने से बचा सकते हैं। अतः ʹयौवन सुरक्षाʹ आप भी पढ़ें एवं औरों को भी पढ़ायें। आप यदि साधना करते हैं, ध्यान भजन करते हैं तब तो ʹयौवन सुरक्षाʹ के द्वारा आप दिव्यता प्राप्त कर सकते हैं। यदि आप साधना न भी करें  भी ʹयौवन सुरक्षाʹ के द्वारा शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक प्रसन्नता और बौद्धिक योग्यता का विकास कर सकते हैं…. अपने जीवन को पशुता से बचा सकते हैं और मानव समाज को पिशाची समाज बनने से रोक सकते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 1997, पृष्ठ संख्या 7,8,9,10,26 अंक 52

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ग्रीष्म ऋतु में आहार-विहार


वैसे तो स्वस्थ व नीरोगी रहने के लिए प्रत्येक ऋतु में ऋतु के अनुकूल आहार-विहार जरूरी होता है लेकिन ग्रीष्म ऋतु में आदानकाल का समय होने से आहार-विहार पर विशेष ध्यान देना पड़ता है क्योंकि इसमें प्राकृतिक रूप से शरीर के पोषण की अपेक्षा शोषण होता है। अतः उचित आहार-विहार में की गई लापरवाही हमारे लिये कष्टदायक हो सकती है।

वसंतु ऋतु की समाप्ति के बाद ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ होता है। सूर्य उत्तर दिशा की तरफ होने से उसकी प्रचंड गर्मी के कारण पृथ्वी एवं प्राणियों का जलीयांश कम हो जाने से जीवों में रूखापन बढ़ता है। परिणामस्वरूप पित्त के विदग्ध होने से जठराग्नि मंद हो जाती है, भूख कम लगती है, आहार का पाचन नहीं होता, अतः इस ऋतु में दस्त, उल्टी, कमजोरी, बेचैनी आदि परेशानियाँ पैदा हो जाती हैं। ऐसे समय में कम आहार लेना व शीतल जल पीना अधिक हितकर है।

आहारः ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की तीव्र किरणों द्वारा संसार के जड़-चेतन का स्नेहांश सोख लेने के कारण रूक्ष रस की वृद्धि हो जाती है। अतः इस ऋतु में शीतवीर्य, मधुर रसयुक्त पदार्थ एवं स्निग्ध तथा बलवर्धक खाद्य व पेय पदार्थों का सेवन उपयोगी होता है। वाग्भट के अनुसार ग्रीष्मकाल में मीठे, हल्के, चिकनाई युक्त, शीतल व तरल पदार्थों का सेवन विशेष रूप से करना चाहिए। इस ऋतु में फलों में तरबूज, खरबूजा, मौसम्बी, सन्तरा, केला, मीठे आम, मीठे अंगूर आदि, सब्जियों में परवल, करेला, पके लाल टमाटर, पोदीना, हरा धनिया, नींबू आदि का सेवन करें।

विहारः इस ऋतु में प्रातः वायु सेवन, योगासन, व्यायाम, तेल मालिस हितकारी है।

अपथ्यः तेज मिर्च-मसालेवाले, तले, नमकीन, रूखे, बासे, कसैले, कड़वे, चटपटे, दुर्गन्ध युक्त पदार्थों का सेवन न करें। देर रात तक जागना, सुबह देर तक सोना, दिन में सोना, अधिक देर तक धूप में घूमना, कठोर परिश्रम, अधिक व्यायाम, अधिक स्त्री-पुरुष का सहवास, भूख-प्यास सहन करना, मलमूत्र के वेग को रोकना हानिप्रद है।

विशेषः ग्रीष्म ऋतु में पित्त दोष की प्रधानता से पित्त के रोग अधिक होते हैं जैसे दाह, उष्णता, आलस्य, मूर्च्छा, अपच, दस्त, नेत्रविकार आदि। अतः गर्मियों में घर से बाहर निकलते समय लू से बचने के लिए सिर पर कपड़ा रखें व एक गिलास पानी पीकर निकलें। जेब में कपूर रखें। गर्मियों में फ्रीज का ठंडा पानी पीने से गले, दाँत, आमाशय व आँतों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अतः फ्रीज का पानी न पीकर मटके का या सुराही का पानी पियें।

टमाटर

गुण-धर्मः टमाटर खट्टा मीठा, रूचिवर्धक, अग्निदीपक व शक्तिवर्धक है। इसके सेवन से शरीर की स्थूलता, उदररोग, अतिसार आदि रोगों का नाश होता है। इसमें लौहतत्त्व दूध की अपेक्षा दोगुना व अण्डे की अपेक्षा पाँच गुना अधिक है। सब्जियों व फलों की अपेक्षा इसमें लौहतत्त्व डेढ़ गुना अधिक होता है।

50 से 200 ग्राम टमाटर के नियमित सेवन से शरीर में बलवृद्धि होती है। रक्त शुद्ध होता है। सप्तधातुओं के लिए टमाटर अत्यंत उपादेय है, साथ ही यह पाचनतंत्र को सुचारू बनाये रखता है।

भोजन के पूर्व टमाटर का सेवन करने से भूख खुलकर लगती है व भोजन शीघ्र पचता है।

रक्ताल्पता के रोगियों को इसका सेवन अवश्य करना चाहिए। यकृत, पित्त, बदहजमी से पीड़ित रोगियों के लिए भी यह लाभकारी है। मधुमेह के रोगियों के लिए टमाटर का सेवन हितकारी है। नेत्रविकार, रतौंधी, मसूढ़े कमजोर हो गये हों, मुँह में बार-बार छाले पड़ना आदि चर्म रोगों में इसका सेवन अवश्य करना चाहिए।

टमाटर में ताँबा अधिक होता है। फलस्वरूप वह रक्त में लाल कणों की वृद्धि करता है। वैज्ञानिक मतानुसार टमाटर खाद्य पदार्थों में अत्यंत महत्त्वपूर्ण और उपयोगी है। शरीर संवर्धन के लिए सभी उपयोगी तत्त्व टमाटर में प्रचुर मात्रा में विद्यमान हैं। गर्भवती स्त्रियों के लिए व प्रसूति के बाद शारीरिक व मानसिक शक्ति बढ़ाने के लिए इसका रस लाभदायक है।

मधुमेहः मधुमेह के रोगियों के लिए टमाटर अत्यंत हितकारी है। इस रोग में प्रातः व सायं 150 -200 ग्राम टमाटर के रस का सेवन करें। परिणामतः मूत्र में शर्करा की मात्रा धीरे-धीरे कम होकर मधुमेह दूर हो जायेगा।

रक्तदोषः रक्तविकार के कारण त्वचा पर लाल लाल चकते निकलना, मसूढ़ों में सूजन व खून का आना, इसमें 20-20 ग्राम टमाटर का रस दिन में तीन से चार बार पियें।

उल्टीः 100 ग्राम टमाटर का रस व 25 ग्राम शक्कर, लौंग, काली मिर्च व इलायची का थोड़ा सा चूर्ण – इन सबको मिलाकर पीने से उल्टियाँ बंद हो जाती है।

वायुविकारः टमाटर उत्तम वायुनाशक है। इसके रस में पुदीना व अदरक का रस मिलाकर चुटकी भर सैंधव नमक डालकर पीने से वायुविकार नष्ट होते हैं।

विशेषः पथरी के रोगी को टमाटर नहीं खाना चाहिए।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 1997, पृष्ठ संख्या 27,28 अंक 52

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धर्मात्मा की ही कसौटियाँ क्यों ?


पूज्यपाद संत श्री आशारामजी बापू

प्रायः भक्तों के जीवन में यह फरियाद बनी रहती है कि हम  भगवान की इतनी भक्ति करते हैं, रोज सत्संग करते हैं, निःस्वार्थ भाव से गरीबों की सेवा करते हैं, धर्म का यथोचित अनुष्ठान करते हैं ? आपका यह मानना-जानना सत्य है कि कसौटियाँ भक्तों की ही क्यों होती हैं ? आज हम इस विषय पर चर्चा करेंगे कि ʹक्योंʹ भक्तों का जीवन कसौटियों से भरा होता है।

बचपन में जब तुम स्कूल में दाखिल हुए थे तो ʹक…. ख….. ग….ʹ आदि का अक्षरज्ञान तुरन्त ही हो गया था कि विघ्न बाधाएँ आयी थीं ? लकीरें सीधी खींचते थे कि कलम टेढ़ी मेढ़ी हो जाती थी ? जब सायकल चलाना सीखा था तब भी तुम एकदम सीखे थे क्या ? नहीं। कई बार गिरे, कई बार उठे। चालनगाड़ी को पकड़ा, किसी की अंगुली पकड़ी तब चलने के काबिल बने और अब तो मेरे भैया ! तुम दौड़ में भाग ले सकते हो।

अब मेरा सवाल है कि जब तुम चलना सीखे तो विघ्न क्यों आये ? क्यों स्कूल में परीक्षा के बहाने कसौटियाँ होती थीं ? तुम्हारा जवाब होगा किः ʹबापू जी ! हम कमजोर थे, अभ्यास ज्ञान नहीं था।ʹ

ऐसे ही मेरे साधको ! तुमने परमात्मा को पाने की दिशा में कदम रख दिया है। तुम अभी पचास वर्ष के छोटे बच्चे हो, तुम्हें इस जगत का पता नहीं, ईश्वर के लिए अभी तुम्हारा प्रेम कमजोर है, नियम में सातत्य और दृढ़ता की जरूरत है। अहंकार-काम-क्रोध के तुम जन्मों के रोगी हो, इसीलिए तो तुम्हारी कसौटियाँ होती हैं और विघ्न आते हैं ताकि तुम मजबूत बन सको। साधक  विघ्न बाधाओं से खेलकर मजबूत होता है। कसौटियाँ इसलिए कि तुम प्रभु को प्यार करते हो और वे तुम्हें प्यार करते हैं। वे तुम्हारा परम कल्याण चाहते हैं। यही तो वजह है कि वे तुम्हें परेशानियाँ देकर, तुम्हारा विवेक-वैराग्य जगाकर, तुमसे नश्वर संसार की आसक्ति छुड़ाना चाहते हैं।

माता कुन्ता भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना करती थीं-

विपदः सन्तु नः शश्वत्तत्र तत्र जगदगुरो।

भक्तो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम्।।

ʹहे जगदगुरो ! हमारे जीवन में सर्वदा पद-पद पर विपत्तियाँ आती रहें क्योंकि विपत्तियों में ही निश्चित रूप से आपके दर्शन हुआ करते हैं और आपके दर्शन हो जाने पर फिर जन्म-मृत्यु के चक्कर में नहीं आना पड़ता है।ʹ

एक बीज को वृक्ष बनने तक कितने विघ्न आते हैं ! कभी पानी मिला कभी नहीं, कभी आँधी आयी, कभी तुफान आया, कभी पशु-पक्षियों ने मुँह-चोंचे मारीं….. ये सब सहते हुए भी वृक्ष खड़े  हैं। तुम भी कसौटियों को सहन करते हुए, उन पर खरे उतरते हुई ईश्वर के लिए खड़े हो जाओ तो तुम ब्रह्म हो जाओगे। परमात्मा की प्राप्ति की दिशा में कसौटियाँ तो सचमुच कल्याण की परम सोपान हैं। जिसे तुम प्रतिकूलता कहते हो सचमुच वह तो वरदान है क्योंकि अनुकूलता में विवेक सोता है और दुःख में विवेक जागता है। कसौटियों के समय घबराने से तुम दुर्बल हो जाते हो, तुम्हारा मनोबल क्षीण हो जाता है।

हम लोग पुराणों की कथाएँ सुनते हैं। ध्रुव तप कर रहा था। असुर लोग डराने के लिए आये लेकिन ध्रुव डरा नहीं। सुर लोग विमान लेकर प्रलोभन देने के लिए आये लेकिन ध्रुव फिसला नहीं। वह विजेता हो गया। ये कहानियाँ हम सुनते हैं, सुना भी देते हैं लेकिन समझते नहीं कि ध्रुव जैसा बालक दुःख से घबड़ाया नहीं और सुख में फिसला नहीं। उसने दोनों का सदुपयोग कर लिया तो ईश्वर उसके पास प्रकट हो गये।

हम क्या करते हैं ? जरा-सा दुःख पड़ता है तो दुःख देने वाले पर लांछन लगाते हैं, परिस्थितियों को दोष देते हैं अथवा अपने को पापी समझकर अपने को ही कोसते हैं। कुछ कायर तो आत्महत्या करने तक का सोच लेते हैं। कुछ पवित्र होंगे तो किसी संत-परमात्मा के पास जाकर मुक्ति पाते हैं। यदि आप प्रतिकूल परिस्थितियों में संतों के द्वार जाते हैं तो समझ लीजिये कि आपको पुण्यमिश्रित पापकर्म का फल भोगना पड़ रहा है क्योंकि कसौटी के समय जब परमात्मा याद आता है तो डूबते को सहारा मिल जाता है। नहीं तो कोई शराब का सहारा लेता है तो कोई और किसी का….. मगर इससे न तो समस्या हल होती है और न ही शांति मिल पाती है क्योंकि जहाँ आग है वहाँ जाने से शीतलता कैसे महसूस हो सकती है ? तुम कसौटी के समय धैर्य खोकर पतन की खाई में गिर जाते हो और फिर वहीं फँसकर रह जाते हो।

जो गुरुओं के द्वार पर जाते हैं उनको कसौटियों से पार होने की कुंजियाँ सहज ही मिल जाती है। इससे उऩके दोनों हाथों में लड्डू होते हैं। एक तो संत सान्निध्य से हृदय की तपन शांत होती है, समस्या का हल मिलता है, साथ-ही-साथ जीवन को नयी दिशा भी मिलती है। तभी तो स्वामी रामतीर्थ कहते थेः

हे परमात्मा ! रोज ताजा मुसीबत भेजना।

आज आप इस गूढ़ रहस्य को यदि भली-भाँति समझ लेंगे  आप हमेशा के लिए मुसीबतों से, कसौटियों से पार हो जायेंगे। बात है जरूर साधारण लेकिन अगर शिरोधार्य कर लेंगे तो आपका काम बन जायेगा।

आपने देखा होगा कि जिस खूँटे के सहारे पशु को बाँधना होता है उसे घर का मालिक हिलाकर देखता है कि कहीं पशु भाग तो नहीं जायेगा। फिर घर की मालकिन देखती है कि उचित जगह पर तो ठोका गया है या नहीं। फिर ग्वाला देखता है कि मजबूत है या नहीं। एक खूँटे को जिसके सहारे पशु बाँधना है, उसे इतने लोग देखते हैं, उसकी कसौटियाँ करते हैं, तो जिस भक्त के सहारे समाज को बाँधना है, समाज से अज्ञान भगाना है उस भक्त की, भगवान-सदगुरु यदि कसौटियाँ नहीं करेंगे तो भैया ! कैसे काम चलेगा ?

जिसे वो देना चाहता है, उसी को आजमाता है।

खजाने रहमतों के इसी बहाने लुटाता है।।

जब एक बार सदगुरु की, भगवान की शरण आ गये तो फिर क्या घबड़ाना ? जो शिष्य़ भी है और दुःखी भी है तो मानना चाहिए कि वह अर्धशिष्य है अथवा निगुरा है। जो शिष्य़ भी है और चिंतित भी है तो मानना चाहिए कि उसमें समर्पण का अभाव है। मैं भगवान का, मैं गुरु का तो चिंता मेरी कैसे ? चिन्ता भी भगवान की हो गई, गुरु की हो गई। हम भगवान के हो गये तो कसौटी, बेईज्जती हमारी कैसे ? अब तो भगवान को ही सब संभालना है। जैसे, आदमी कारखाने का कर्मचारी हो जाता है  कारखाने को लाभ हानि जो भी हो, उसे तो केवल वेतन मिलता ही है। ऐसे ही जब हम ईश्वर के हो गये तो हमारा शरीर ईश्वर का साधन हो गया। खेलने दो उस परमात्मा को तुम्हारे जीवनरूपी उद्यान में। बस, तुम तो अपनी ओर से पुरुषार्थ करते जाओ। जो तुम्हारे जिम्मे आये उसे तुम कर लो….. और जो ईश्वर के जिम्मे है वह उन्हें करने दो… फिर देखो, तुम्हारा काम कैसे बन जाता है। वे लोग मूर्ख हैं जो भगवान को कोसते हैं और वे लोग धन्य हैं जो हर हाल में खुश रहकर अपने आप में तृप्त रहते हैं। गरीबी है तो क्या ? खाने को, पहनने को नहीं है तो क्या ? यदि तुम्हारे दिल में गुरुओं के प्रति श्रद्धा है, उनके वचनों को आत्मसात् करने की लगन है तो तुम सचमुच बड़े ही भाग्यशाली हो। सच्चा भक्त भगवान से उनकी भक्ति के अलावा किसी और फल की कभी याचना नहीं करता।

जिसे वह इश्क देता है, उसे और कुछ नहीं देता है।

जिसे वह इसके काबिल नहीं समझता, उसे सब कुछ देता है।।

योगवाशिष्ठ में आता है कि चिन्तामणि के आगे जो चिंतन करो, वह चीज मिलती है लेकिन संतपुरुष के आगे जो चीज माँगोगे वही चीज वे नहीं देंगे, मगर जिसमें तुम्हारा हित होगा वही देंगे। यदि तुम्हारी निष्ठा है, संयम है, सत्य का आचरण है, सेवा का सदगुण है तो वे सबसे पहले तुम्हारी कसौटी हो, ऐसी परिस्थितियाँ देंगे ताकि इन सदगुणों के सहारे तुम सत्यस्वरूप परमात्मा को पा लो, परमात्मा को पाने की तड़पन बढ़ा दो क्योंकि वे तुम्हारे परम हितैषी हैं। सदगुरुओं का ज्ञान तुम्हें ऊपर उठाता है। परिस्थितियाँ हैं, सरिता का प्रवाह, जो तुम्हें नीचे की ओर घसीटती हैं और सदगुरु ʹपम्पिंग स्टेशनʹ हैं जो तुम्हें हरदम ऊपर उठाते रहते हैं।

अज्ञानी के रूप में जन्म लेना कोई पाप नहीं, मूर्ख के रूप में पैदा होना कोई पाप नहीं, लेकिन मूर्ख रहकर सुख-दुःख की थप्पड़ें खाना और जीर्ण-शीर्ण होकर मर जाना महा पाप है।

संक्षेप में, मेरे कहने का अभिप्राय इतना ही है कि मनुष्य जन्म मिला है, सदगुरु का सान्निध्य और परमतत्त्व का ज्ञान पाने का दुर्लभ मौका भी हाथ लगा है और सबसे बड़ी हर्ष की बात यह है कि तुममें उस परमतत्त्व को पाने की जिज्ञासा भी है तो फिर दुःख, चिन्ता और परेशानियों से क्या घबड़ाते हो ? यह तो वे कसौटियाँ हैं जो आपको निखारकर चमकाना चाहती हैं। हिम्मत, साहस, संयम की तलवार से जीवनरूपी कुरुक्षेत्र में आगे बढ़ते जाओ…. तुम्हारी निश्चित ही विजय होगी, तुम दिग्विजयी होंगे, तत्त्व के अनुभवी होंगे, तुममें और भगवान में कोई फासला नहीं रहेगा। सदगुरु का अनुभव तुम्हारा अनुभव हो जाये….. यही तुम्हारे सदगुरुओं का पवित्र प्रयास है।

तेरे दीदार के आशिक समझाये नहीं जाते हैं।

कदम रखते हैं तेरे द्वार पर तो लौटाये नहीं जाते हैं।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 1997, पृष्ठ संख्या 14,15,16 अंक 52

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